सोमवार, 19 दिसंबर 2011

भूख के एहसास को शेरो-सुखन तक ले चलो

भूख के एहसास को शेरो-सुखन तक ले चलो
या अदब को मुफलिसों की अंजुमन तक ले चलो

जो गजल माशूक के जल्वों से वाकिफ हो गयी
उसको अब बेवा के माथे की शिकन तक ले चलो

मुझको नज्‍मो-जब्त की तालीम देना बाद में
पहले अपनी रहबरी को आचरन तक ले चलो

गंगाजल अब बूर्जुआ तहजीब की पहचान है
तिशनगी को वोदका के आचमन तक ले चलो

खुद को जख्मी कर रहे हैं गैर के धोखे में लोग
इस शहर को रोशनी के बांकपन तक ले चलो
-अदम गोंडवी

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