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शनिवार, 20 जून 2026

क्या भाजपा शासन के तहत भारत एक पुलिस राज्य बन गया है?

 

क्या भाजपा शासन के तहत भारत एक पुलिस राज्य बन गया है?

एस आर दारापुरी आई.पी.एस.(से.नि.)

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यह प्रश्न कि क्या भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के शासनकाल में भारत एक पुलिस राज्य में बदल गया है, समकालीन भारतीय राजनीति के सबसे विवादास्पद प्रश्नों में से एक है। आलोचकों का तर्क है कि कानून-प्रवर्तन एजेंसियों की बढ़ती शक्ति, नागरिक स्वतंत्रताओं पर बढ़ते प्रतिबंध, निवारक निरोध (Preventive Detention) कानूनों का दुरुपयोग, हिरासत में यातना, तथा असहमति के दमन जैसी प्रवृत्तियाँ भारत को पुलिस राज्य की दिशा में ले जा रही हैं। दूसरी ओर, सरकार के समर्थकों का कहना है कि राष्ट्रीय सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए कठोर पुलिस व्यवस्था आवश्यक है तथा भारत की लोकतांत्रिक संस्थाएँ अब भी प्रभावी ढंग से कार्य कर रही हैं। इस विषय का वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन दोनों पक्षों के तर्कों की समीक्षा किए बिना संभव नहीं है।

सामान्यतः पुलिस राज्य उस राजनीतिक व्यवस्था को कहा जाता है जिसमें सरकार पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों के माध्यम से समाज पर व्यापक नियंत्रण स्थापित कर लेती है। ऐसी व्यवस्था में मनमानी गिरफ्तारियाँ, व्यापक निगरानी, असहमति का दमन, न्यायिक निगरानी का कमजोर होना, नागरिक स्वतंत्रताओं का हनन तथा कानून-प्रवर्तन एजेंसियों द्वारा दण्डमुक्ति (Impunity) के साथ कार्य करना शामिल होता है। भारत में बहस का मुख्य प्रश्न यह है कि क्या हाल के वर्षों में देश इस दिशा में आगे बढ़ा है।

आलोचकों की सबसे बड़ी चिंताओं में से एक निवारक निरोध और विशेष सुरक्षा कानूनों का बढ़ता उपयोग है। गैरकानूनी गतिविधियाँ (निवारण) अधिनियम (यूएपीए) तथा राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (एनएसए) जैसे कानून राज्य को व्यक्तियों को लंबे समय तक हिरासत में रखने की व्यापक शक्तियाँ प्रदान करते हैं। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का आरोप है कि इन कानूनों का उपयोग पत्रकारों, छात्रों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और राजनीतिक असहमति व्यक्त करने वालों के विरुद्ध बढ़ता जा रहा है। चूँकि इन कानूनों के अंतर्गत जमानत प्राप्त करना अत्यंत कठिन होता है, इसलिए कई लोग दोष सिद्ध होने से पहले ही वर्षों तक जेल में रहते हैं। आलोचकों के अनुसार यह उस मूल सिद्धांत को कमजोर करता है जिसके अनुसार किसी व्यक्ति को तब तक निर्दोष माना जाता है जब तक उसका अपराध सिद्ध न हो जाए।

एक अन्य गंभीर चिंता आतंकवाद और गैरकानूनी गतिविधियों से संबंधित मामलों में झूठे फँसाए जाने के आरोपों से जुड़ी है। पिछले वर्षों में कई ऐसे मामले सामने आए हैं जिनमें आतंकवाद के आरोप में गिरफ्तार व्यक्तियों को वर्षों जेल में रहने के बाद अदालतों ने बरी कर दिया। इससे जाँच एजेंसियों की कार्यप्रणाली और जवाबदेही पर गंभीर प्रश्न उठे हैं। नागरिक अधिकारों के समर्थकों का तर्क है कि वर्षों की कैद के बाद बरी होना न्याय का नहीं बल्कि न्यायिक विफलता का प्रतीक है और इससे समाज में भय का वातावरण उत्पन्न होता है।

पुलिस हिरासत में यातना और मौतें भी चिंता का प्रमुख विषय हैं। संवैधानिक संरक्षण और न्यायालयों द्वारा निर्धारित दिशानिर्देशों के बावजूद देश के विभिन्न भागों से हिरासत में हिंसा की घटनाएँ लगातार सामने आती रहती हैं। मानवाधिकार संगठनों ने बार-बार यातना, अवैध हिरासत और पुलिस हिरासत में मौतों के मामलों को उजागर किया है। आलोचकों का कहना है कि ऐसे मामलों में पुलिसकर्मियों को शायद ही कभी प्रभावी दंड मिलता है, जिसके कारण दण्डमुक्ति की संस्कृति को बढ़ावा मिलता है।

पुलिस मुठभेड़ों (एनकाउंटर) का मुद्दा भी अत्यंत विवादास्पद रहा है, विशेषकर उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में। सरकारें अक्सर इन्हें संगठित अपराध और खतरनाक अपराधियों के विरुद्ध प्रभावी कार्रवाई के रूप में प्रस्तुत करती हैं। इसके विपरीत मानवाधिकार समूहों का आरोप है कि कुछ मुठभेड़ें फर्जी हो सकती हैं या उनमें कानूनी प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया जाता। उनके अनुसार न्यायिक प्रक्रिया के बिना किसी व्यक्ति की हत्या संविधान द्वारा प्रदत्त जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन है तथा यह विधि के शासन (Rule of Law) को कमजोर करती है।

विरोध-प्रदर्शनों और असहमति के प्रति सरकारी रवैये ने भी लोकतांत्रिक स्वतंत्रताओं को लेकर चिंताओं को बढ़ाया है। आलोचक आंदोलनकारियों पर पुलिस कार्रवाई, सार्वजनिक सभाओं पर प्रतिबंध, इंटरनेट बंदी तथा पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के विरुद्ध आपराधिक मुकदमों को लोकतांत्रिक क्षेत्र के सिकुड़ने के संकेत के रूप में देखते हैं। उनके अनुसार असहमति को नियंत्रित करने के लिए पुलिस और कानूनी तंत्र का बढ़ता उपयोग आलोचना और विपक्ष के प्रति बढ़ती असहिष्णुता को दर्शाता है।

हालाँकि यह भी ध्यान देने योग्य है कि इनमें से अनेक समस्याएँ केवल भाजपा शासन तक सीमित नहीं हैं। हिरासत में यातना, फर्जी मुठभेड़ें, पुलिस का राजनीतिक दुरुपयोग, भ्रष्टाचार और मानवाधिकार उल्लंघन भारतीय पुलिस व्यवस्था की लंबे समय से चली आ रही समस्याएँ हैं। केंद्र और राज्यों में विभिन्न दलों की सरकारों पर भी पुलिस का राजनीतिक उद्देश्यों के लिए उपयोग करने के आरोप लगते रहे हैं। इसलिए कुछ विश्लेषकों का मानना है कि वर्तमान स्थिति किसी नए पुलिस राज्य के निर्माण की बजाय भारतीय पुलिस व्यवस्था की पुरानी संरचनात्मक कमजोरियों को दर्शाती है।

भाजपा और उसके समर्थक भारत को पुलिस राज्य कहे जाने को अस्वीकार करते हैं। उनका तर्क है कि भारत में नियमित और प्रतिस्पर्धी चुनाव होते हैं, विपक्षी दल अनेक राज्यों में सत्ता में हैं और न्यायालय समय-समय पर कार्यपालिका के निर्णयों की समीक्षा करते हैं। उनके अनुसार यदि भारत वास्तव में पुलिस राज्य होता तो ऐसी लोकतांत्रिक प्रक्रियाएँ संभव नहीं होतीं। वे यह भी कहते हैं कि आतंकवाद, संगठित अपराध, अलगाववादी आंदोलनों और सांप्रदायिक हिंसा जैसी चुनौतियों से निपटने के लिए कठोर सुरक्षा उपाय आवश्यक हैं।

एक स्वतंत्र न्यायपालिका, सक्रिय नागरिक समाज और विविधतापूर्ण मीडिया की उपस्थिति को भी इस बात का प्रमाण माना जाता है कि भारत अभी भी एक कार्यशील लोकतंत्र है। यद्यपि आलोचकों का कहना है कि इन संस्थाओं पर बढ़ता दबाव है, फिर भी समर्थकों के अनुसार ये संस्थाएँ अभी भी सरकार की शक्ति पर महत्वपूर्ण नियंत्रण बनाए हुए हैं।

भारत की लोकतांत्रिक स्थिति के संबंध में अंतरराष्ट्रीय आकलनों ने भी इस बहस को नया आयाम दिया है। कई लोकतंत्र-निगरानी संस्थाओं ने भारत में नागरिक स्वतंत्रताओं के क्षरण और लोकतांत्रिक अवनति पर चिंता व्यक्त की है। कुछ ने भारत को “निर्वाचित निरंकुशता” (Electoral Autocracy) या “अउदार लोकतंत्र” (Illiberal Democracy) की श्रेणी में रखा है। इन वर्गीकरणों का अर्थ यह है कि चुनाव तो जारी हैं, लेकिन लोकतांत्रिक स्वतंत्रताएँ दबाव में हैं। फिर भी अधिकांश पर्यवेक्षक भारत को पूर्ण विकसित पुलिस राज्य कहने से बचते हैं।

निष्कर्षतः, यह प्रश्न कि क्या भाजपा शासन के तहत भारत एक पुलिस राज्य बन गया है, आज भी बहस और व्याख्या का विषय है। निवारक निरोध, आतंकवाद-रोधी कानूनों का उपयोग, हिरासत में हिंसा, मुठभेड़ हत्याएँ और असहमति पर नियंत्रण जैसे मुद्दों को लेकर गंभीर चिंताएँ मौजूद हैं। इन कारणों से अनेक पर्यवेक्षक नागरिक स्वतंत्रताओं और लोकतांत्रिक मूल्यों के क्षरण की चेतावनी देते हैं। दूसरी ओर, भारत में अभी भी नियमित चुनाव, सक्रिय न्यायपालिका, विपक्षी दल और नागरिक समाज जैसी लोकतांत्रिक विशेषताएँ मौजूद हैं। इसलिए वर्तमान भारत को एक पूर्ण पुलिस राज्य के बजाय ऐसा लोकतंत्र कहना अधिक उपयुक्त होगा जो नागरिक स्वतंत्रताओं, कानून के शासन और संस्थागत जवाबदेही से संबंधित गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा है। फिर भी आलोचकों द्वारा उठाए गए प्रश्न इस बात की याद दिलाते हैं कि लोकतंत्र की रक्षा के लिए संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा, पुलिस जवाबदेही और विधि के शासन को मजबूत करना अत्यंत आवश्यक है।

शनिवार, 7 जनवरी 2017

कितनी मुस्लिम हितैषी है मायावती?

कितनी मुस्लिम हितैषी है मायावती?
-एस.आर. दारापुरी, भूतपूर्व पुलिस महानिरीक्षक एवं राष्ट्रीय प्रवक्ता, आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट
माह फरवरी, 2017 में होने वाले विधान सभा चुनाव में मायावती ने मुसलामानों का वोट प्राप्त करने के लिए उन्हें 97 टिकट दिए हैं. इस वार मायावती दलित-मुस्लिम कार्ड खेलने की कोशिश कर रही है. अतः यह देखना ज़रूरी है कि मायावती ने अपने चार वार के मुख्य मंत्री काल में मुसलमानों का कितना कल्याण किया था. यह भी ज्ञातव्य है कि मायावती इससे पहले तीन वार मुसलमानों की धुरविरोधी पार्टी भारतीय जनता पार्टी से गठबंधन करके सरकार बना चुकी है. आगे भी इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि ज़रुरत पड़ने पर वह भाजपा से फिर हाथ नहीं मिलाएगी. इतना ही नहीं 2002 में मायावती ने गुजरात जा कर मोदी के पक्ष मे चुनाव प्रचार किया था और मोदी को 2000 से अधिक मुसलमानों की हत्याएं करवाने के मामले में क्लीन चिट भी दी थी.
 पिछले दिनों आजमगढ़ रैली में मुसलमानों को फुसलाने के लिए मायावती ने कहा था कि “ निर्दोष मुसलमानों को आतंक के मामलों में झूठा फंसाया जाता है.” मायावती के मुसलमानों के बारे में पूर्व रिकार्ड को देखते हुए मायावती का यह कथन केवल चुनावी जुमला ही है. यह सर्वविदित है कि मायावती के 2007 वाले मुख्य मंत्री काल में ही सब से अधिक निर्दोष मुसलमान निम्नलिखित बम बिस्फोटों के मामलों में फंसाए गए थे: (1) तीन बम  विस्फोट, गोरखपुर. 22 मई, 2007, (2) वाराणसी कचेहरी विस्फोट, 23 नवम्बर, 2007,  (3) फैजाबाद कचेहरी विस्फोट, 23 नवम्बर, 2007 तथा (4) लखनऊ कचेहरी विस्फोट, 23 नवम्बर, 2007.
इस तथ्य की पुष्टि इस बात से होती है कि 2008 में जब आतंक के मामलों में इंडियन मुजाहिदीन ग्रुप के कुछ लोग अन्य राज्यों में पकड़े गए थे तो उन्होंने ने यह स्वीकार किया था कि उत्तर प्रदेश में उक्त बम बिस्फोट उन्होंने किये थे. इस की सूचना उत्तर प्रदेश पुलिस को भी प्राप्त हो गयी थी परन्तु उस से पहले उत्तर प्रदेश पुलिस इन मामलों में दूसरे लोगों को पकड़ कर जेल भेज चुकी थी. होना तो यह चाहिए था कि उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा इन निर्दोष लोगों को जमानत पर छुड़वा देना चाहिए था और सही मुजरिमों को पकड़ना चाहिए था. परन्तु ऐसा नहीं किया गया. इन्हीं निर्दोष लोगों में खालिद मुजाहिद भी था जिस की बाद में फैजाबाद से बाराबंकी अदालत में पेशी पर लाते समय हत्या कर दी गयी थी. इन आरोपों में बंद किये गए कुछ लोग हाल में छूट गए हैं और अधिकतर अभी भी जेलों में सड़ रहें हैं. अतः आजमगढ़ रैली में मायावती का कथन अगर सही है तो इसके लिए सबसे ज्यादा जिम्मेवार मायावती ही है.
इसी तरह जब 2007 में मायावती उत्तर प्रदेश की मुख्य मंत्री बनी थी तो उसी काल में दिल्ली में बाटला हाउस फर्जी मुठभेड़ हुयी थी जिस में आजमगढ़ के तीन लड़के मारे गए थे और आजमगढ़ को आतंक की नर्सरी घोषित किया गया था. इस पर जब उत्तर प्रदेश पुलिस के बारे में यह कहा जाने लगा कि दूसरे राज्यों की पुलिस उत्तर प्रदेश से आतंकियों को गिरफ्तार करके ले जा रही है परन्तु उत्तर प्रदेश पुलिस कुछ नहीं कर रही है तो इस पर उत्तर पुलिस ने भी बाटला हाउस जैसी फर्जी मुठभेड़ करने की योजना बनाई. इसमें 4/5 अक्तूबर, 2007 की रात में सेना और पुलिस द्वारा मिल कर सेना के कार्यालय पर लखनऊ छावनी में फर्जी आतंकी हमला दिखाने की योजना बनाई गयी. इस मुठभेड़ में सेना और पुलिस को शामिल होना था और दो कश्मीरी आतंकवादियों को मार गिराया जाना था. किसी तरह इस षड्यंत्र की खबर सामाजिक कार्यकर्त्ता संदीप पांडे को मिल गयी जिस पर उन्होंने एक सेवा निवृत पुलिस महानिदेशक से इसे रुकवाने का अनुरोध किया जिन्होंने  इस बारे में तत्कालीन पुलिस महानिदेशक से बातचीत की और उक्त फर्जी मुठभेड़ को रुकवाने के लिए कहा. इस पर उक्त फर्जी मुठभेड़ रुक गयी क्योंकि संदीप पांडे जी ने इसके बारे में रात में ही प्रेस को भी सूचित कर दिया था. बाद में इस बारे में पूछताछ करने के लिए संदीप पांडे को एटीएस मुख्यालय में बुलाया गया तो मैं भी उनके साथ गया था. इस प्रकार उस समय लखनऊ में भी संदीप पांडे के उद्यम से आतंक के नाम पर दो कश्मीरी लड़कों को फर्जी मुठभेड़ में मारे जाने की घटना टल गयी और उत्तर प्रदेश का माहौल बिगड़ने से बच गया. यह बहुत खेद की बात है कि जिन दो कश्मीरी लड़कों को लखनऊ में फर्जी मुठभेड़ में मारा जाना था बाद में उन्हे 25 जनवरी, 2008 को दिल्ली गाज़ियाबाद बार्डर पर फर्जी मुठभेड़ कर मार गिराया गया. इससे आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि मुख्य मंत्री के रूप में मायावती ने मुसलमानों को कितनी सुरक्षा और न्याय दिया था. क्या मायावती के सख्त प्रशासन की यही परिभाषा है?
मायावती के मुख्य मंत्री काल में ही 6 फरवरी, 2010 को सीमा आज़ाद और उसके पति को इलाहाबाद में माओवादी होने के आरोप में गिरफतार किया गया और उन पर अन्य आरोपों के साथ साथ देश द्रोह का आरोप भी लगाया गया. सीमा आज़ाद एक पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्त्ता भी है. सीमा आज़ाद पीयूसीएल उत्तर प्रदेश की संगठन सचिव भी है. उसने इलाहाबाद में बालू का अवैध खनन करने वाले माफिया के खिलाफ जंग छेड़ रखी थी. सीमा ने मायावती के प्रिय प्रोजेक्ट गंगा-एक्सप्रेस के लिए जबरदस्ती भूमि अधिग्रहण का भी कड़ा विरोध करवाया था. इस कारण तथा रेत माफिया के इशारे पर सीमा आज़ाद को माओवादी कह कर गिरफ्तार किया गया. उसे कई साल तक जेल में रहना पड़ा और जिला न्यायालय ने सीमा आजाद और उसके पति को उम्र कैद की सजा सुना दी है जिस के विरुद्ध हाई कोर्ट में अपील चल रही है. इस घटना से भी आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि मायावती ने मुसलामानों के साथ साथ खनन माफिया के इशारे पर किस तरह सामाजिक कार्यकर्ताओं को प्रताड़ित किया है. सीमा आज़ाद के मामले में जब पीयूसीएल के एक प्रतिनिधि मंडल जिस में मैं भी शामिल था ने मायावती के उस समय के चहेते अपर पुलिस महानिदेशक (अपराध) जो अब उसे छोड़ कर दूसरे खेमे में चले गए हैं, से मिलने के लिए समय माँगा तो उन्होंने यह कह कर मना कर दिया कि आप लोग तो माओवादियों की हिमायत करते हैं.
आतंकवाद के मामले में मायावती की हिन्दू आतंकवादियों से सहानुभूति की सब से बड़ी मिसाल कानपुर में बम विस्फोट की घटना है. इस घटना में बजरंग दल के दो कार्यकर्त्ता बम बनाते समय मारे गए थे.  यह घटना 23 अगस्त, 2008 की है जब पियूष मिश्रा और भूपिंदर सिंह कानपुर के कल्यानपुर क्षेत्र स्थित एक होस्टल में बम्ब बनाते समय मारे गए थे. मौके से बम बनाने का बहुत सा सामान भी मिला था. इस मामले में पुलिस ने इसे केवल एकल घटना मान कर इस के पीछे के गिरोह का पता लगाने का कोई प्रयास नहीं किया. बाद में जब मैं ने संदीप पांडे के साथ कानपुर जाकर इस मामले की जांच की तो पाया कि उक्त विस्फोट के एक दो दिन बाद ही जन्माष्टमी का त्यौहार था और मृतकों का इरादा उक्त अवसर पर कानपुर के सबसे बड़े हिन्दू मंदिर में बम विस्फोट करके मुसलामानों के विरुद्ध माहौल पैदा करना था. यह सर्वविदित है कि कानपुर हिन्दू आतंकवादियों का गढ़ रहा है. कानपुर के ही दयानंद पांडे मालेगांव बम ब्लास्ट के मुख्य आरोपी हैं. इस घटना से यह भी स्पष्ट हो जाता है कि जहाँ एक तरफ मायावती के मुख्य मंत्री काल में बहुत बड़ी संख्या में निर्दोष मुसलामानों को आतंकी घटनाओं में फर्जी फंसाया गया वहीँ उसी काल में हिन्दू आतंकवादियों के प्रति कितनी नरमी दिखाई गयी.
अतः उपरोक्त संक्षिप्त विवरण से स्पष्ट है कि अब जो मायावती यह कह रही है कि निर्दोष मुसलमानों को आतंक के मामलों में झूठा फंसाया जाता है उसके लिए वह स्वयं सब से अधिक दोषी है क्योंकि उस के समय में ही उत्तर प्रदेश में सब से अधिक निर्दोष मुसलमान युवक आतंक के मामलों में फंसाए गए थे. उन में से खालिद मुजाहिद की तो पुलिस कस्टडी में हत्या भी कर दी गयी थी. मायावती के शासन काल में केवल मुसलमान ही नहीं बल्कि जनता के हित में लड़ने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं को भी मायोवादी कह कर जेलों में डाला गया था. इस समय मायावती जो कह रही है है अगर वह सही है तो मायावती को इसका अपने समय का हिसाब भी देना होगा.    


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