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बुधवार, 7 नवंबर 2018

''मै भंगी हूं`` आज भी प्रासंगिक है।


''मै भंगी हूं`` आज भी प्रासंगिक है।
-       संजीव खुदशाह
सन् १९८३-८४ के आस-पास जब मैं छठवीं क्लास में था। समाज के सक्रीय कार्यकर्ताओं की बैठक में, मै भी शामिल हो जाया करता था। वहीं पर पहली दफा यह तथ्य सामने आया कि हमारे बीच के एक सुप्रीम कोर्ट के जज (वकील है ये जानकारी बाद में हुई) है,जो समाज के लिए भी काम कर रहे है। मुझे इस जज के बारे में और जानने की उत्सुकता हुई, किन्तु ज्यादा जानकारी नही मिल सकी । इस दौरान मैने डा. अम्बेडकर की आत्मकथा पढ़ी। दलित समाज के बारे में और जानने पढ़ने की इच्छा जोर मार रही थी। रिश्ते के मामाजी जो वकालत की पढ़ाई कर रहे थे, मुझे किताबे लाकर देते थे और मै उन्हे पढ़कर वापिस कर देता था । उन्हेाने अमृतलाल नागर की 'नाच्यो बहुत गोपाला` उपन्यास लाकर दी परिक्षाएं नजदीक होने के कारण उसे मै पूरा न पढ़ सका । पढ़ाई को लेकर बहुत टेन्शन रहता था। माता-पिता को मुझसे बड़ी अपेक्षाऐ थी जैसा कि सभी माता-पिता को अपने बच्चों से रहती है। चूंकि मै मेघावी छात्र था इसलिए कक्षा में अपना स्थान बनाए रखने के लिए मुझे काफी मेहनत करनी पड़ती थी। इस समय मेरे मन में समाज के लिए कुछ करने हेतु इच्छा जाग चुकी थी इसलिए कम उम्र का होने पर भी मै सभी सामाजिक गतिविघियों में भाग लेने लगा। इसी दौरान मामाजी ने मुझे यह किताब लाकर दी ''मै भंगी हूं`` इसे मैने दो-तीन दिनों में ही पढ़  डाली। मन झकझोर देनेवाली शैली में लिखी इस किताब ने मुझे बहुत अंदर तक प्रभावित किया। चूंकि मेरी आर्थिक हालत अच्छी नही थी, इसलिए इस किताब को मै खरीद नही पाया। पिताजी की छोटी सी नौकरी के साथ घर का खर्च बड़ी कठिनाई से चल पाता था।
मैं भंगी हूं किताब पढ़ते समय भी मुझे यह जानकारी नही थी। कि ये वही सुप्रीम कोर्ट के जज है, जिनके बारे मे मैने सुना था। बाद में मुझे अन्य बुद्धि जीवियों से मुलाकात के दौरान ज्ञात हुआ कि वे जज नही बल्कि सुप्रीम कोर्ट के वकील है, जिन्होने मै भंगी हूं किताब की रचना की है। मैने एक चिट्ठी एड. भगवानदास जी के नाम लिखी, जिसमें मै भंगी हूं की प्रशंसा की थी।
अत्यधिक सामाजिक गतिविधियों में भाग लेने के कारण तथा चिन्तन के कारण मै स्कूल की पढ़ाई की ओर ध्यान नही दे पा रहा था। माता-पिता चिन्तित रहने लगे। मां ने अपने पिता यानी मेरे नानाजी को यह बात बताई । नानाजी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के साथ-साथ समाज-सेवक भी थे। मै उनसे बहुत प्रभावित था। मै नानाजी की हर बात को बड़े ध्यान से सुनता था। वे रिलैक्स होकर बहुत रूक-रूक कर बाते करते थे। उन्होने मुझे एक दिन अपने पास बिठाकर  पूछा कि -
''तुम क्या करना चाहते हो..?``
''मैं अपने समाज को ऊपर उठाना चाहता हूं।`` मैंने गर्व से अपना जवाब दिया। यह सोचते हुए कि नानाजी मेरा पीठ थपथपायेगें। मेरा उत्साहवर्धन करेगें।
''जब तुम खुद ऊपर उठोगे तथा ऐसी मजबूत स्थिति में पहुँच जाओगे कि तुम्हारे नीचे आने का भय नही होगा, तभी तो तुम दूसरों को ऊपर उठा सकोगे। ये तो बड़े दुख की बात है कि तुम तो खुद नीचे हो और दूसरों को उपर उठाना चाहते हो। ऐसी उल्टी धारा तो मैं ने कही नही देखी।``-उन्होने कहा उनकी इस बात का मेरे जेहन में बहुत असर हुआ और सामाजिक गतिविधियों पर से ध्यान हटाते हुए मैने अपना पूरा ध्यान पढ़ाई में लगाना प्रारंभ किया । १९९८ में मुझे शासकीय नौकरी मिली, इसी बीच मैं सुदर्शन समाज, वाल्मीकि समाज के कार्य-क्रमों में एक दर्शक की भंाति जाता था। मुझे सुदर्शन ऋषि का इतिहास जानने की इच्छा होती मै इस समाज के नेताओं से इस बाबत पूछताछ करता तो सब अपनी बगले झाकनें लगते। मैने इसका इतिहास विकास उत्पत्ति हेतु सामग्री इकट्ठी करनी शुरू की। मैं जैसे-जैसे किताबों का अध्ययन करता गया , मेरी आंखो से धुंध छॅटती गई। अब सुदर्शन ऋषि, वाल्मीकि ऋषि एवं उनके नाम पर समाज का नामाकरण मुझे गौण लगने लगा। डा. अम्बेडकर की शूद्र कौन और कैसे ? तथा अछूत कौन है? पढ़ी तो पूरी स्थिति स्पष्ट हो गई। दलित आन्दोलन से ही समाज ऊपर उठ सकता है, मुझे विश्वास हो गया। मैने अपनी चर्चित पुस्तक ''सफाई कामगार समुदाय`` पर काम करना प्रारंभ किया । कई किताबों, लाइब्रेरियों की खाक छानी बुद्धिजीवियों के इन्टरव्यू लिये। इसी परिप्रेक्ष्य में मेरा दिल्ली आना हुआ और मेरी मुलाकात एड. भगवान दास जी से हुई। मैने पहले उनसे फोन पर बात की, उन्होने शाम को मिलने हेतु समय दिया। जब शाम को फ्लैट में उनसे मुलाकात हुई तो देखा सफेद बाल वाले, उची कद के बुजुर्ग कक्ष मे किताबों से घिरे बैठे है। मैंने उन्हे बताया कि मैं उनकी किताब से बहुत प्रभावित हूं तथा उन्हे एक चिट्ठी भी लिखी थी । अभी मैं  इस विषय पर रिसर्च कर रहा हूं। उन्होने कहा चिट्ठी इस नाम से मुझे मिली थी । मैने सफाई मुद्दे पर कई प्रश्न पूछे उन्होने बड़ी ही संजीदगी के साथ मेरे प्रश्नों का उत्तर दिया । उन्हे यकीन नही हो रहा था कि मै ऐसा कोई गंभीर काम करने जा रहा हूं। वे इसे मेरा लड़कपन समझ रहे थे । उनका व्यवहार, उनके मन की बात मुझे अनायास ही एहसास करा रही थी। वे कह रहे थे लिखने-विखने मे मत पड़ो और खूब पढ़ो । उन्होने अंग्रेजी की कई किताबे मुझे सुझाई । मैंने उनको नोट किया। ये किताबे मुझे उपलब्ध नही हो पाई। शायद आउट आफ प्रिन्ट थी । उन्होने अपनी लिखी कुछ किताबे मुझे दी और अपने पुत्र से कहने लगे, इनसे किताब के पैसे जमा करा लो । मैने एक किताब ली और शेष किताबे पैसे की कमी होने के कारण नही ले सका । यही मेरी उनसे पहली मुलाकात थी । उनसे मैने उनकी जाति सम्बन्धी प्रश्न पूछा, लेकिन वे टाल गये । शायद वे मुझे सवर्ण समझ रहे होगें। मै लौट आया ।
इस समय राजकमल प्रकाशन के प्रबंध निदेशक श्री अशोक महेश्वरी जी ने इस किताब को प्रकाशित करने हेतु सहमति दे दी थी। २००५ को यह किताब प्रकाशित होकर बाजार में उपलब्ध हो गई। नेकडोर ने सन २००७ को दलितों का द्वितीय अधिवेशन आयोजित किया। उन्होने मुझे सफाई कामगार सेशन के प्रतिनिधित्व हेतु आमंत्रित किया। दिल्ली में हुए इस कार्यक्रम में एड. भगवानदास जी भी आये थे। मैने उनसे मुलाकात की एवं हालचाल पूछा लेकिन वे मुझे पहचान नही पा रहे थे। शायद उनकी स्मरण-शक्ति कुछ कम हो गई थी। कुछ लोग विभिन्न भाषा में ''मै भंगी हूं`` किताब के अनुवाद प्रकाशित होने पर बधाई दे रहे थे। मुझे आश्चर्य हुआ कि कुछ अनुवाद के बारे मे उन्होने अनभिज्ञता जाहिर की। वे बधाई सुनकर बिल्कुल नार्मल थे। कोई घमंण्ड का भाव नही था। सबसे साधारण ढंग से मुलाकात कर रहे थे।
जब सफाई कामगारों पर सेशन प्रारंभ हुआ तो वे स्टेज में मेरी बगल में बैठे थे। मुझे अपने बचपन के वे दिन याद आने लगे,जब सामाजिक गतिविधियों में इनके बारे में चर्चा सुना करता था। बड़े ही गर्व से लोग इनके कार्यो की प्रसंशा करते थे। आज मै अपने-आपको सबसे बड़ा सौभाग्यशाली समझता हूं कि उनके साथ मुझे वक्तव्य देने का मौका मिला। स्टेज पर ही उन्होने मुझसे पूछा-
''संजीव खुदशाहजी, आप ही हैं न..?``
''जी हां`` -मैने कहां ।
''मैने आपकी किताब देखी, बहुत ही अच्छी लिखी है आपने । इस विषय पर इस तरह की ये पहली किताब है।`` - उन्होने कहा ।
इतना सुन कर मेरी आंखे नम हो गई। मैने उनको धन्यवाद दिया और कहा - ''आदरणीय इस किताब में आपका भी जिक्र है। मैने शोध के दौरान आपका इन्टरव्यू भी लिया था।``
वे मेरी ओर देखते हुए अपनी भृकुटियों में जोर डाल रहे थे, साथ ही सहमति में सिर भी हिला रहे थे।
आज उनकी जितनी भी किताबे उपलब्ध है, वह भंगी विषय पर पहले पहल किये गये काम का उदाहरण है। वे ये कहते हुए बिल्कुल भी नही शर्माते है कि उन्हे हिन्दी नही आती (आशय संस्कृत निष्ठ हिन्दी से है।)। फिर भी साधारण भाषा में लोकप्रिय साहित्य की रचना उन्होने की है। अपनी शैली के बारे में वे लिखते हैं कि मैं भागवतशरण उपध्याय की ''खून के छीटे इतिहास के पन्ने पर`` पुस्तक की शैली से प्रभावित हूं। अंग्रेजी और उर्दू भाषा पर वे अपना समान अधिकार समझते है। बावजूद इसके हिन्दी में उनकी कृति ''मैं भंगी हूं``आज भी प्रासंगिक है।



शनिवार, 30 जुलाई 2016

सफाई कर्मचारी दिवस - 31 जुलाई


 

सफाई कर्मचारी दिवस - 31 जुलाई 

-एस. आर. दारापुरी, राष्ट्रीय अध्यक्ष, आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट  
31
जुलाई देश भर में “सफाई कर्मचारी दिवस” के रूप में मनाया जाता है. इस दिन दिल्ली, नागपुर और शिमला नगरपालिका में सफाई कर्मचारियों को छुट्टी होती है. इस दिन सफाई कर्मचारी इकट्ठा हो कर अपनी समस्यायों पर विचार-विमर्श करते हैं और अपनी मांगें सामूहिक रूप से उठाते हैं.
सफाई कर्मचारी दिवस का इतिहास यह है कि 29 जुलाई, 1957 को दिल्ली म्युनिसिपल कमेटी के सफाई कर्मचारियों ने अपने वेतन तथा कुछ काम सम्बन्धी सुविधाओं की मांग को लेकर हड़ताल शुरू की थी. उसी दिन केन्द्रीय सरकार के कर्मचारियों की फेडरेशन ने भी हड़ताल करने की चेतावनी दी थी. पंडित नेहरु उस समय भारत के प्रधान मंत्री थे. उन्होंने केन्द्रीय सरकार के कर्मचारियों तथा सभी हड़ताल करने वालों को कड़े शब्दों में चेतावनी दी कि उनकी हड़ताल को सख्ती से दबा दिया जायेगा.
30
जुलाई को नई दिल्ली सफाई कर्मचारियों की हड़ताल शुरू हो गयी.  नगरपालिका ने हड़ताल को तोड़ने के लिए बाहर से लोगों को भर्ती करके काम चलाने की कोशिश की. उधर सफाई कर्मचारियों ने एक तरफ तो कूड़ा ले जाने वाली गाड़ियों को नए भर्ती हुए कर्मचारियों को काम करने के लिए जाने से रोका और दूसरी ओर काम करने वालों से जाति के नाम पर अपील की कि वे उनके संघर्ष को सफल बनायें. हुमायूं रोड, काका नगर, निजामुद्दीन आदि के करीब हड़ताली तथा नए भर्ती सफाई कर्मचारियों की झडपें भी हुइं.
31
जुलाई को दोपहर तीन बजे के करीब भंगी कालोनी रीडिंग रोड से नए भर्ती किये गए कर्मचारियों को लारियों में ले जाने की कोशिश की गयी. सफाई कर्मचारियों ने इसे रोकने की कोशिश की. पुलिस की सहायता से एक लारी निकाल ली गयी. परंतु जब दूसरी लारी निकाली जाने लगी तो हड़ताल करने वाले कर्मचारियों ने ज्यादा जोर से इस का विरोध किया. पुलिस ने टिमलू नाम के एक कर्मचारी को बुरी तरह से पीटना शुरू कर दिया। उस पर भीड़ उत्तेजित हो गयी और किसी ने पुलिस पर पत्थर फेंके. उस समय मौके पर मौजूद डिप्टी एस.पी. ने भीड़ पर गोली चलाने का आदेश दे दिया. बस्ती के लोगों का कहना है कि पुलिस ने बस्ती के अन्दर आ कर लोगों को मारा और गोलियां चलायीं. गोली चलाने के पहले न तो कोई लाठी चार्ज किया गया और न ही आंसू गैस ही छोड़ी गई. कितनी गोलियां चलाई गयीं पता नहीं. पुलिस का कहना था कि 13 गोलियां चलायी गइं.
इस गोली कांड में भूप सिंह नाम का एक नवयुवक मारा गया जो कि सफाई कर्मचारी तो नहीं था परन्तु वहां पर मेहमानी में आया हुआ था. जो नगरपालिका सफाई कर्मचारियों की 30 जुलाई तक कोई भी मांग मानने को तैयार नहीं थी, हड़ताल शुरू होने के बाद मानने को तैयार हो गयी. हड़ताल के दौरान पुलिस द्वारा गोली चलाये जाने और एक आदमी की मौत हो जाने के कारण सफाई कर्मचारियों में गुस्सा और जोश बढ़ा जो भयानक रूप ले सकता था. बहुत से लोगों ने हमदर्दी जताई और आहिस्ता-आहिस्ता लोग इस घटना को भूलने लगे.
भंगी कालोनी में रहने वाले कर्मचारी नौकरी खो जाने के डर से किसी भी गैर कांग्रेसी राजनीतिक पार्टी को नजदीक नहीं आने देते थे. उधर कर्मचारी इस घटना को भुलाना भी नहीं चाहते थे. वे गोली का शिकार हुए नौजवान भूप सिंह की मौत को अधिक महत्व देते थे, उस की मौत के कारणों को या शासकों के रवैये को नहीं. उनकी भावनाओं को ध्यान में रखते हुए इस बस्ती में रहने वाले नेताओं ने भूप सिंह की बर्सी मनाने की प्रथा शुरू कर दी. 1957 के बाद हर वर्ष पंचकुयीआं रोड स्थित भंगी कालोनी में “भूप सिंह शहीदी दिवस” मनाया जाने लगा और भूप सिंह को इस आन्दोलन का हीरो बनाया जाने लगा. भूप सिंह की बड़ी सी तस्वीर बाल्मीकि मंदिर से जुड़े कमरे में लगायी गयी. इस मीटिंग में हर वर्ष भूप सिंह को श्रदांजलि पेश की जाती है.
बाबा साहेब आंबेडकर की बड़ी इच्छा थी कि समूचे भारत के सफाई कर्मचारियों को एक मंच पर इकट्ठा किया जाये. उनकी एक देशव्यापी संस्था बनायी जाये जो उनके उत्थान और प्रगति के लिए संघर्ष करे और उन्हें गंदे पेशे तथा गुलामी से निकाल सके. वे 1942 से 1946 तक जब वाईसराय की एग्जीक्यूटिव कोंसिल के श्रम सदस्य थे,  उनकी राष्ट्रीय स्तर पर ट्रेड यूनियन बनाना चाहते थे ताकि वे अपने अधिकारों के लिए संगठित तौर पर लड़ सकें।
उन्होंने सफाई मजदूरों की समस्याओं के अध्ययन के लिए एक समिति भी बनायी थी. दरअसल बाबा साहेब भंगियों से झाड़ू छुड़वाना चाहते थे और इसी लिए उन्होंने “भंगी झाड़ू छोड़ो” का नारा भी दिया था.
सफाई कर्मचारियों पर सब से अधिक प्रभाव गाँधी जी, कांग्रेस और हिन्दू राजनेताओं और धार्मिक नेताओं का रहा है. उन्होंने एक ओर तो सफाई कर्मचारियों को बाबा साहेब के स्वतंत्र आन्दोलन से दूर रखा और दूसरी ओर उन्हें अनपढ़ , पिछड़ा, निर्धन और असंगठित रखने का प्रयास किया है ताकि वे सदा के लिए हिंदुयों पर निर्भर रहें, असंगठित रहें और पखाना साफ़ करने और कूड़ा ढोने का काम करते रहें. दूसरी ओर उनकी संस्थाओं को स्वतंत्र और मज़बूत बनने से रोका. उनकी लगाम हमेशा कांग्रेसी हिन्दुओं के हाथ में रही है.
सफाई कर्मचारियों में हमेशा से संगठन का अभाव रहा है क्योंकि बाल्मीकि या सुपच के नाम से समूचे भारत के सफाई कर्मचारियों को एक मंच पर इकट्ठा नहीं किया जा सकता है. ऐसा करने से उन में जातिगत टकराव का भय रहता है. अतः सफाई कर्मचारियों को बतौर “सफाई कर्मचारी” संगठित करना ज़रूरी है. इसी उद्देश्य से “अम्बेडकर मिशन सोसाइटी” जिस की स्थापना श्री भगवान दास जी ने की थी, ने 1964 में यह तय किया कि “मजदूर दिवस” की तरह दिल्ली में भी “सफाई कर्मचारी दिवस” मनाया जायेगा ताकि उस दिन सफाई कर्मचारी अपनी समस्याओं और मांगों पर विचार विमर्श कर सकें और उन्हें संगठित रूप से उठा सकें. धीरे धीरे भारत के अन्य शहरों में भी 31 जुलाई को स्वीपर- डे अथवा सफाई कर्मचारी दिवस के नाम से मनाया जाने लगा. दिल्ली के बाद नागपुर पहला शहर है जहाँ पर 1978 के बाद से बाकायदा हर वर्ष स्वीपर-डे पब्लिक जलसे के तौर पर मनाया जाता है. इस दिन वहां पर अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने, दुर्घटनाओं तथा अपनी सेवाकाल के दौरान मरने वाले सफाई कर्मचारियों को श्रदांजलि पेश की जाती है और अन्य समस्याओं के समाधान के लिए विचार विमर्श किया जाता है. प्रस्ताव पास करके सरकार को भेजे जाते हैं और सफाई कर्मचारियों की उन्नति और प्रगति के लिए प्रोग्राम बनाये जाते हैं.
भगवान दास जी ने अपनी पुस्तक “सफाई कर्मचारी दिवस 31, जुलाई” में “सफाई कर्मचारी दिवस कैसे मनाएं?” में इसे सार्थक रूप से मनाने पर चर्चा में कहा है कि इसे बाल दिवस, शिक्षक दिवस और मजदूर दिवस की तरह मनाया जाना चाहिए. उन्होंने आगे कहा है कि इस दिन जलसे में उनकी व्यवसायिक, आर्थिक तथा सामाजिक व्यवस्था और शिक्षा आदि समस्याओं पर चर्चा करना उचित होगा. शिक्षा के प्रसार खास करके लड़कियों तथा महिलायों की शिक्षा पर जोर दिया जाना चाहिए. शिक्षा में सहायता के ज़रूरतमंद छात्र-छात्राओं को पुरस्कार, संगीत तथा चित्रकारी, मूर्ति कला तथा खेलों को प्रोत्साहन देने तथा छोटे परिवार, स्वास्थ्य और नशा उन्मूलन पर जोर दिया जाना चाहिए. इस जलसे में मंत्रियों और बाहरी नेताओं को नहीं बुलाया जाना चाहिए. बाबासाहेब तथा अन्य महापुरुषों के जीवन संघर्ष आदि से लोगों को परिचित कराया जाना चाहिए ताकि उन्हें इस से प्रेरणा मिले और उनमें साहस एवं उत्साह बढ़े और वे खुद आगे की ओर बढ़ने की कोशिश करें.
वास्तव में सफाई कर्मचारी दिवस को कर्मचारियों में संगठन-जागृति, शिक्षा और उत्थान के लिए पूरी तरह से उपयोगी त्यौहार के रूप में मनाया जाना चाहिए क्योंकि वे ही सब से अधिक शोषित, घृणित और पिछड़ा मजदूर वर्ग है.

 



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