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शनिवार, 23 मई 2026

भारतीय पुलिस को क्रूर, भ्रष्ट, सांप्रदायिक, जातिवादी और मानवाधिकार उल्लंघनकारी क्यों माना जाता है

 

भारतीय पुलिस को क्रूर, भ्रष्ट, सांप्रदायिक, जातिवादी और मानवाधिकार उल्लंघनकारी क्यों माना जाता है

एस आर दारापुरी आई.पी.एस. (से. नि.)

प्रस्तावना

पुलिस आधुनिक राज्य की सबसे प्रत्यक्ष और प्रभावशाली संस्थाओं में से एक है। किसी लोकतांत्रिक समाज में पुलिस से अपेक्षा की जाती है कि वह नागरिकों की सुरक्षा करे, कानून और व्यवस्था बनाए रखे, अपराधों की रोकथाम करे तथा संविधानिक मूल्यों की रक्षा करे। आदर्श रूप में पुलिस को न्याय की निष्पक्ष संरक्षक तथा मानवाधिकारों की रक्षक संस्था होना चाहिए। किंतु भारत में पुलिस व्यवस्था को लंबे समय से क्रूरता, भ्रष्टाचार, जातिगत पूर्वाग्रह, सांप्रदायिक पक्षपात, निरंकुश व्यवहार तथा मानवाधिकार उल्लंघनों के लिए आलोचना का सामना करना पड़ा है। हिरासत में यातना, फर्जी मुठभेड़ें, अवैध गिरफ्तारियाँ, विरोध प्रदर्शनों का दमन तथा वंचित समुदायों के प्रति भेदभावपूर्ण व्यवहार जैसी घटनाएँ सार्वजनिक विमर्श का नियमित हिस्सा बन चुकी हैं। मानवाधिकार संगठनों, न्यायिक आयोगों, पत्रकारों तथा नागरिक समाज के कार्यकर्ताओं ने बार-बार भारतीय पुलिस व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्न उठाए हैं।

इसके साथ ही यह भी स्वीकार करना आवश्यक है कि भारतीय पुलिस अत्यंत कठिन परिस्थितियों में कार्य करती है। पुलिसकर्मियों को लंबे कार्य-घंटों, अपर्याप्त संसाधनों, राजनीतिक दबावों, कर्मचारियों की कमी, मानसिक तनाव तथा जनता के अविश्वास का सामना करना पड़ता है। इसलिए समस्या को केवल कुछ व्यक्तियों की नैतिक विफलता के रूप में नहीं देखा जा सकता। इसके पीछे ऐतिहासिक, संरचनात्मक, राजनीतिक तथा सामाजिक कारण मौजूद हैं, जिन्होंने भारतीय पुलिस व्यवस्था को गहराई से प्रभावित किया है।

भारतीय पुलिस के चरित्र को समझने के लिए उसके औपनिवेशिक मूल, भारतीय समाज की जातीय-सामाजिक संरचना, राजनीतिक हस्तक्षेप, संस्थागत कमजोरियों, जवाबदेही की कमी तथा शासन में बढ़ती अधिनायकवादी प्रवृत्तियों का विश्लेषण आवश्यक है। भारतीय पुलिस व्यवस्था का संकट केवल संस्थागत विफलता नहीं बल्कि भारतीय लोकतंत्र के अंतर्विरोधों का भी दर्पण है।

भारतीय पुलिस व्यवस्था की औपनिवेशिक उत्पत्ति

भारतीय पुलिस व्यवस्था का आधुनिक स्वरूप ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के दौरान विकसित हुआ। इसके बाद ब्रिटिश शासन ने भारतीय जनता पर नियंत्रण मजबूत करने के लिए प्रशासनिक पुनर्गठन किया। इसी संदर्भ में इंडियन पुलिस एक्ट-1861 लागू किया गया। इस कानून ने एक केंद्रीकृत और सैन्यीकृत पुलिस संरचना स्थापित की, जिसका मुख्य उद्देश्य जनता की सेवा नहीं बल्कि औपनिवेशिक शासन की रक्षा करना था।

औपनिवेशिक पुलिस जनता के प्रति जवाबदेह नहीं थी। उसका प्रमुख कार्य राजनीतिक विरोध को दबाना, जनता पर निगरानी रखना और साम्राज्यवादी व्यवस्था बनाए रखना था। दमन और हिंसा को प्रशासनिक उपकरण के रूप में वैधता प्राप्त थी। परिणामस्वरूप पुलिस और जनता के बीच विश्वास के बजाय भय का संबंध विकसित हुआ।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत ने लोकतांत्रिक संविधान अपनाया, जिसमें मौलिक अधिकारों, समानता तथा नागरिक स्वतंत्रताओं की गारंटी दी गई। किंतु पुलिस की औपनिवेशिक संरचना में मूलभूत परिवर्तन नहीं किए गए। पुलिस का कार्य-संस्कार नियंत्रण और दमन पर आधारित ही बना रहा। इसीलिए अनेक विद्वानों का मत है कि भारत ने राजनीतिक स्वतंत्रता तो प्राप्त कर ली, परंतु पुलिस व्यवस्था का लोकतंत्रीकरण नहीं हो सका।

सामाजिक संरचना और जाति-सांप्रदायिक प्रभाव

भारतीय पुलिस समाज से अलग कोई स्वतंत्र इकाई नहीं है। पुलिसकर्मी उसी समाज से आते हैं जो जाति-व्यवस्था, पितृसत्ता, वर्गीय असमानता और सांप्रदायिक विभाजन से प्रभावित है। इसलिए सामाजिक पूर्वाग्रह पुलिस व्यवस्था में भी प्रवेश कर जाते हैं।

पुलिस व्यवस्था में जातिगत पक्षपात

भारतीय पुलिस पर सबसे गंभीर आरोपों में से एक दलितों, आदिवासियों तथा अन्य वंचित समुदायों के प्रति भेदभावपूर्ण व्यवहार का है। अनेक अध्ययनों और रिपोर्टों से पता चलता है कि उत्पीड़ित जातियों के लोगों को अक्सर अपमान, शिकायत दर्ज करने में बाधा, हिरासत में हिंसा तथा पक्षपातपूर्ण जांच का सामना करना पड़ता है। जातिगत अत्याचारों के मामलों में पुलिस पर अक्सर प्रभावशाली जातियों का पक्ष लेने के आरोप लगते रहे हैं।

कानून के क्रियान्वयन में भी संस्थागत पक्षपात के अनेक उदाहरण सामने आए हैं। पीड़ितों की शिकायत रहती है कि पुलिस प्राथमिकी दर्ज करने में टालमटोल करती है या आरोपों को कमजोर बना देती है। इससे न्याय व्यवस्था में वंचित समुदायों का विश्वास कमजोर पड़ता है।

जातिगत पूर्वाग्रहों की जड़ें भारतीय समाज की ऐतिहासिक संरचना में निहित हैं। जिस समाज ने लंबे समय तक जातीय असमानता और अस्पृश्यता को सामान्य माना हो, वहाँ राज्य संस्थाओं का उससे मुक्त रह पाना कठिन होता है।

सांप्रदायिक पक्षपात और बहुसंख्यकवाद

भारतीय राजनीति और समाज में बढ़ते सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का प्रभाव पुलिस व्यवस्था पर भी पड़ा है। विभिन्न सांप्रदायिक दंगों और धार्मिक हिंसा की घटनाओं में पुलिस पर पक्षपातपूर्ण भूमिका निभाने के आरोप लगे हैं। विशेष रूप से मुस्लिम समुदाय के लोगों ने अक्सर पुलिस पर चयनात्मक गिरफ्तारियों, पक्षपातपूर्ण जांच तथा सुरक्षा प्रदान करने में विफलता के आरोप लगाए हैं।

विभिन्न दंगा-जांच आयोगों ने प्रशासनिक विफलताओं के साथ-साथ कई मामलों में पुलिस की मिलीभगत की ओर भी संकेत किया है। आलोचकों का मत है कि जब राजनीतिक विमर्श बहुसंख्यकवादी हो जाता है, तब राज्य संस्थाएँ भी उसी विचारधारा से प्रभावित होने लगती हैं।

सांप्रदायिक पुलिसिंग धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र को कमजोर करती है, क्योंकि इससे समान नागरिकता का सिद्धांत प्रभावित होता है। जब नागरिक पुलिस को किसी विशेष धार्मिक समुदाय या राजनीतिक विचारधारा के पक्ष में देखते हैं, तो कानून के शासन पर उनका विश्वास कम हो जाता है।

राजनीतिक हस्तक्षेप और पुलिस का राजनीतिकरण

भारतीय पुलिस व्यवस्था की सबसे गंभीर समस्याओं में से एक राजनीतिक हस्तक्षेप है। आदर्श स्थिति में पुलिस को संविधान और कानून के अनुसार निष्पक्ष रूप से कार्य करना चाहिए। किंतु व्यवहार में तबादलों, नियुक्तियों, पदोन्नतियों और जांचों पर राजनीतिक प्रभाव व्यापक रूप से देखा जाता है।

इससे पुलिस में कानून के प्रति निष्ठा के बजाय सत्ताधारी दल के प्रति निष्ठा विकसित होती है। परिणामस्वरूप पुलिस का उपयोग राजनीतिक विरोधियों को दबाने, आलोचकों को परेशान करने, चयनात्मक कार्रवाई करने तथा प्रभावशाली लोगों को बचाने के लिए किया जाता है।

इस समस्या को देखते हुए Supreme Court of India ने 2006 के प्रकाश सिंह  मामले में महत्वपूर्ण पुलिस सुधारों के निर्देश दिए थे। न्यायालय ने वरिष्ठ अधिकारियों के लिए निश्चित कार्यकाल, स्वतंत्र शिकायत प्राधिकरण तथा राजनीतिक हस्तक्षेप को सीमित करने जैसे उपाय सुझाए। किंतु अधिकांश राज्यों में इन सुधारों का प्रभावी क्रियान्वयन अब भी अधूरा है।

क्रूरता, यातना और “थर्ड डिग्री” संस्कृति

पुलिस क्रूरता भारतीय लोकतंत्र के सामने एक गंभीर चुनौती है। हिरासत में यातना, अवैध निरोध, जबरन स्वीकारोक्ति तथा फर्जी मुठभेड़ों की घटनाएँ लगातार सामने आती रही हैं।

थर्ड डिग्री” यानी शारीरिक और मानसिक यातना का प्रयोग अनेक पुलिस थानों में सामान्यीकृत हो चुका है। इसके पीछे कई कारण हैं:

मामलों को जल्दी सुलझाने का दबाव, वैज्ञानिक जांच सुविधाओं की कमी, कमज़ोर फोरेंसिक ढाँचा, कम दोषसिद्धि दर तथा परिणाम-केंद्रित प्रशासनिक संस्कृति।

कई बार साक्ष्य-आधारित जांच के बजाय हिंसा और दबाव का सहारा लिया जाता है। गरीब, दलित, आदिवासी और राजनीतिक रूप से कमजोर लोग अक्सर इसका सबसे अधिक शिकार बनते हैं।

यातना की निरंतरता का एक कारण दंडहीनता भी है। पुलिस अत्याचारों के मामलों में अभियोजन दुर्लभ होता है तथा आंतरिक जांच प्रायः निष्पक्ष नहीं मानी जाती। पीड़ित प्रतिशोध के भय से शिकायत दर्ज कराने से भी डरते हैं।

भारत ने United Nations Convention Against Torture पर हस्ताक्षर तो किए हैं, किंतु अभी तक इसे पूर्ण रूप से घरेलू कानून का हिस्सा नहीं बनाया गया है। इसलिए मानवाधिकार कार्यकर्ता कठोर प्रतिरोधी कानूनों की मांग करते रहे हैं।

पुलिस व्यवस्था में भ्रष्टाचार

भ्रष्टाचार भारतीय पुलिस व्यवस्था की एक अन्य गंभीर समस्या है। रिश्वतखोरी, जबरन वसूली, जांचों में हेरफेर तथा अपराधियों से सांठगांठ जैसी शिकायतें व्यापक हैं। इसके पीछे कई कारण हैं:

राजनीतिक संरक्षण, कमजोर जवाबदेही, पारदर्शिता का अभाव, रिश्वतखोरी की सामाजिक स्वीकृति तथा संस्थागत आर्थिक दबाव।

भ्रष्टाचार प्राथमिकी दर्ज करने से लेकर जांच, यातायात नियंत्रण, भूमि विवादों तथा नियुक्तियों तक अनेक स्तरों पर दिखाई देता है। कई बार लाभकारी पदों की नियुक्तियाँ अनौपचारिक राजनीतिक-आर्थिक नेटवर्क का हिस्सा बन जाती हैं। इससे कानून का शासन कमजोर होता है और जनता का विश्वास समाप्त होता है।

जवाबदेही की कमजोरी

लोकतांत्रिक पुलिस व्यवस्था के लिए प्रभावी जवाबदेही आवश्यक है। किंतु भारत में पुलिस के विरुद्ध शिकायतों की जांच की व्यवस्था अक्सर कमजोर और अप्रभावी होती है।

आंतरिक विभागीय जांच स्वतंत्र नहीं मानी जाती। पीड़ित प्रतिशोध के भय से शिकायत दर्ज नहीं कराते। न्यायिक प्रक्रिया धीमी और महंगी है। राजनीतिक संरक्षण भी कई मामलों में दोषी अधिकारियों को बचा लेता है।

यद्यपि मानवाधिकार आयोगों और न्यायालयों ने समय-समय पर हस्तक्षेप किया है, फिर भी जवाबदेही की एक मजबूत और निरंतर प्रणाली विकसित नहीं हो सकी है। परिणामस्वरूप दंडहीनता की संस्कृति विकसित होती है।

पुलिसकर्मियों की कार्य-स्थितियाँ और संस्थागत तनाव

विडंबना यह है कि स्वयं पुलिसकर्मी भी अत्यंत कठिन परिस्थितियों में काम करते हैं। उन्हें लंबे कार्य-घंटों, अवकाश की कमी, अपर्याप्त आवास, मानसिक तनाव, कर्मचारियों की कमी तथा खराब संसाधनों का सामना करना पड़ता है।

निम्न स्तर के पुलिसकर्मियों को विभागीय पदानुक्रम में भी कठोर व्यवहार झेलना पड़ता है। ऐसी परिस्थितियाँ उनमें निराशा, आक्रामकता और असंवेदनशीलता उत्पन्न कर सकती हैं।

पुलिस प्रशिक्षण में भी लोकतांत्रिक मूल्यों, मानवाधिकारों, लैंगिक संवेदनशीलता तथा संवैधानिक नैतिकता पर पर्याप्त बल नहीं दिया जाता। प्रशिक्षण मुख्यतः अनुशासन, नियंत्रण और बल-प्रयोग पर केंद्रित रहता है।

सैन्यीकरण और अधिनायकवादी शासन

जहाँ आंतरिक सुरक्षा चुनौतियाँ अधिक होती हैं, वहाँ पुलिस व्यवस्था का सैन्यीकरण बढ़ जाता है। आतंकवाद, उग्रवाद, अलगाववाद या सांप्रदायिक तनाव के नाम पर राज्य को असाधारण शक्तियाँ प्रदान की जाती हैं। इससे नागरिक स्वतंत्रताओं पर प्रभाव पड़ता है।

जब शासन नागरिकों को अधिकार-संपन्न व्यक्तियों के बजाय संभावित “खतरे” के रूप में देखने लगता है, तब मनमानी गिरफ्तारियाँ, निगरानी और बल-प्रयोग सामान्य हो जाते हैं।

अधिनायकवादी राजनीतिक संस्कृति भी इस प्रवृत्ति को मजबूत करती है। “मजबूत राज्य” और “आंतरिक दुश्मन” जैसी अवधारणाएँ आक्रामक पुलिसिंग को वैधता प्रदान करती हैं।

जनता की मानसिकता और पुलिस हिंसा की स्वीकृति

एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि समाज का एक हिस्सा स्वयं कठोर पुलिस कार्रवाई का समर्थन करता है। लोग पुलिस भ्रष्टाचार और हिंसा की आलोचना तो करते हैं, किंतु साथ ही “तुरंत न्याय” और “सख्त कार्रवाई” की मांग भी करते हैं। मीडिया भी कई बार मुठभेड़ों और आक्रामक पुलिसिंग का महिमामंडन करता है।

ऐसी सामाजिक मानसिकता पुलिस को कानूनसम्मत प्रक्रिया के बजाय कठोरता प्रदर्शित करने के लिए प्रेरित करती है। इस प्रकार पुलिस निरंकुशता केवल राज्य की समस्या नहीं बल्कि व्यापक सामाजिक चेतना का भी प्रतिबिंब है।

लोकतंत्र और मानवाधिकारों पर प्रभाव

जब पुलिस सांप्रदायिक, जातिवादी, भ्रष्ट या राजनीतिक रूप से पक्षपाती हो जाती है, तब लोकतंत्र कमजोर होने लगता है। कानून का शासन प्रभावित होता है, वंचित समुदायों का राज्य पर विश्वास समाप्त होता है, असहमति का अपराधीकरण होने लगता है तथा नागरिक स्वतंत्रताएँ सिकुड़ने लगती हैं।

लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता; उसे ऐसी संस्थाओं की आवश्यकता होती है जो संविधान, समानता और मानव गरिमा के प्रति प्रतिबद्ध हों। इसलिए पुलिस सुधार लोकतंत्र की रक्षा के लिए अनिवार्य है।

निष्कर्ष

भारतीय पुलिस व्यवस्था की समस्याएँ इतिहास, राजनीति और समाज में गहराई से निहित हैं। औपनिवेशिक विरासत, जातिगत असमानता, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण, राजनीतिक हस्तक्षेप, कमजोर जवाबदेही, भ्रष्टाचार तथा संस्थागत तनाव ने मिलकर ऐसी पुलिस संस्कृति को जन्म दिया है जिसे अक्सर क्रूर और अलोकतांत्रिक माना जाता है।

फिर भी सुधार संभव हैं। पुलिस को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त करना, स्वतंत्र शिकायत प्राधिकरण स्थापित करना, मानवाधिकार प्रशिक्षण को मजबूत करना, वैज्ञानिक जांच पद्धतियों को बढ़ावा देना, कार्य-स्थितियों में सुधार करना तथा संवैधानिक मूल्यों को संस्थागत संस्कृति का हिस्सा बनाना आवश्यक है।

अंततः पुलिस उसी समाज और राज्य का प्रतिबिंब होती है जिसकी वह सेवा करती है। इसलिए एक मानवीय, लोकतांत्रिक और संवैधानिक पुलिस व्यवस्था तभी विकसित हो सकती है जब समाज स्वयं लोकतांत्रिक मूल्यों, समानता और न्याय के प्रति अधिक प्रतिबद्ध बने।

शनिवार, 12 सितंबर 2020

भारत में अधिकतर पुलिस जातिवादी और सांप्रदायिक है

                   भारत में अधिकतर पुलिस जातिवादी और सांप्रदायिक है

            - एस.आर. दारापुरी आईपीएस (से.नि.), राष्ट्रीय अध्यक्ष, आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट 

                       

दिसंबर 2018 में, महाराष्ट्र के एक पुलिस अधिकारी भाग्यश्री नवटेके की एक वीडियो रिकॉर्डिंग वायरल हुई, जिसमें वह दलितों और मुसलमानों के खिलाफ झूठे मामले दर्ज करने और उन्हें प्रताड़ित करने के बारे में डींग मारते हुए दिखाई दे रही है। उसने जो कहा वह भारत के पुलिस बल में सामाजिक पूर्वाग्रहों की एक कच्ची लेकिन सच्ची तस्वीर का प्रतिनिधित्व करता है।

यह एक तथ्य है कि आखिरकार, हमारे पुलिस अधिकारी और कांस्टेबल समाज से आते हैं, और इसलिए पुलिस संगठन हमारे समाज की एक सच्ची प्रतिकृति है। यह सर्वविदित है कि हमारा समाज जाति, धार्मिक और क्षेत्रीय आधार पर विभाजित है। इसलिए, जब व्यक्ति पुलिस बल में प्रवेश करते हैं, तो वे अपने सभी पूर्वाग्रहों और द्वेष को अपने साथ ले जाते हैं। ऐसे व्यक्ति जब सत्ता में आते हैं तो ये पक्षपात और मजबूत हो जाते हैं। उनकी व्यक्तिगत पसंद और नापसंद, जातिगत और सांप्रदायिक पूर्वाग्रह उनके कार्यों को बहुत दृढ़ता से प्रभावित करते हैं। इन पूर्वाग्रहों को अक्सर उनके व्यवहार और कार्यों में उन स्थितियों में प्रदर्शित किया जाता है जहां अन्य जातियों या समुदायों के लोग शामिल होते हैं।

1976 में जब मैं सहायक पुलिस अधीक्षक (एएसपी), गोरखपुर के पद पर था, तब पुलिस में जातिगत भेदभाव की स्थिति मेरे सामने आई। बतौर एएसपी, मैं रिजर्व पुलिस लाइंस का प्रभारी था। एक मंगलवार, जो कि परेड दिवस था,  पुलिस मेस के निरिक्षण के दौरान मैंने पाया कि कुछ पुलिसवाले सीमेंटेड टेबल और बेंच पर भोजन कर रहे थे, जबकि कुछ भोजन करते समय जमीन पर बैठे थे। यह मुझे बहुत अजीब लगा। मैंने एक हेड कांस्टेबल को बुलाया और इस स्थिति के बारे में पूछताछ की। उसने मुझे बताया कि जो लोग बेंच पर बैठे हैं वे उच्च जाति के हैं और जो लोग जमीन पर बैठे हैं वे निम्न जाति के  हैं।

पुलिस लाइन्स में जातिगत भेदभाव के इस ज़बरदस्त प्रदर्शन को देखकर मैं हैरान रह गया, और मैंने इस भेदभावपूर्ण प्रथा को समाप्त करने का फैसला किया। उस समय से, जब भी मैंने इसे  देखा  तो मैंने पुलिसकर्मियों को जमीन पर बैठने के लिए डांटा और और उन्हें बेंचों पर बैठने के लिए कहा। हालाँकि मुझे अपने निर्देशों को एक से अधिक बार दोहराना पड़ा, लेकिन मैं अंततः अलग-अलग भोजन के भेदभावपूर्ण व्यवहार को बंद करने में सफल रहा।

संयोग से, उसी अवधि में , मुझे अपने बॉस द्वारा अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों (एससी और एसटी) के लिए आयुक्त द्वारा की गई टिप्पणियों पर एक रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए कहा गया, जिन्होंने 1974 की एक रिपोर्ट में पुलिस मैसों में दलित वर्ग के लोगों को अलग बैठाने की जातिगत भेदभाव वाली प्रथा का उल्लेख किया था जोकि पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के पुलिस लाइंस व्याप्त था।

मैंने अपने बॉस को बताया कि यह सच था और मैंने इस प्रथा को हाल ही में समाप्त किया है। उन्होंने मुझसे कहा कि आप केवल यह उल्लेख कर दीजिये कि यह "अब प्रचलित नहीं है"। मुझे पूर्वी उत्तर प्रदेश  के अन्य जिलों के बारे में पता नहीं है लेकिन गोरखपुर में मैंने उस समय पुलिस के बीच जाति-आधारित अलगाव का अंत सुनिश्चित कर दिया था। हालांकि राष्ट्रीय अनुसूचित जाति/जनजाति आयुक्त ने दशकों पहले इस भेदभावपूर्ण व्यवहार को इंगित किया था, लेकिन यह चौंकाने वाला है कि यह आज भी जारी है। कुछ समय पहले यह बताया गया था कि बिहार में अभी भी अलग-थलग खाने की प्रथा जारी है और बिहार पुलिस में उच्च और निम्न जाति के लोगों के लिए अलग-अलग बैरक हैं।

दरअसल, पुलिस बल में,  इसकी संरचना के कारण,  उच्च-जाति के लोगों का वर्चस्व है और इस तरह के भेदभावपूर्ण व्यवहार बेरोकटोक जारी हैं। यह केवल आरक्षण नीति के कारण है कि  निचली जातियों के कुछ व्यक्तियों, विशेष रूप से एससी और एसटी, को पुलिस बल में जगह मिली है। इसने बलों को अधिक धर्मनिरपेक्ष और प्रतिनिधि बना दिया है। हालांकि, अल्पसंख्यकों का अभी भी बहुत कम प्रतिनिधित्व है। इसके अलावा, पुलिसकर्मियों में जाति, सांप्रदायिक और लैंगिक पक्षपात अभी भी काफी मजबूत हैं।

जैसा कि हम जानते हैं कि, यूपी में प्रांतीय सशस्त्र बल (पीएसी) के खिलाफ सांप्रदायिक पूर्वाग्रह की लगातार शिकायतें मिलती रही हैं। मैंने इन शिकायतों में सचाई पाई थी जब मैं 1979 में 34 बटालियन पीएसी, वाराणसी के कमांडेंट के पद पर तैनात था। मुझे अपने लोगों को जाति एवं धर्मनिरपेक्ष बनाने के लिए बहुत प्रयास करने पड़े थे. मैंने उन्हें हमेशा जाति और सांप्रदायिक पूर्वाग्रहों से ऊपर रहने की बात कही थी। मैं उनसे कहता था,  धर्म आपका निजी मामला है। जब आप अपनी वर्दी पहंन लेते हैं, तो आप केवल पुलिसकर्मी होते हैं और कानून के अनुसार काम करने के लिए बाध्य होते हैं।“ मेरे निरंतर ब्रीफिंग और डीब्रीफिंग का उन पर बहुत ही अच्छा प्रभाव पड़ा था, और मैं अपने कर्मचारियों को बहुत हद तक जाति एवं धर्मनिरपेक्ष बनाने में सफल रहा था।

इस की परीक्षा 1991 में वाराणसी में एक सांप्रदायिक दंगे के दौरान हुयी। 1991 के आम चुनाव में, एक सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी, श्री चंद दीक्षित, वाराणसी शहर से विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) के उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ रहे थे। हमेशा की तरह, विहिप ने मुसलमानों को मतदान से दूर रखने के लिए एक सांप्रदायिक दंगा किया था। परिणामस्वरूप, कर्फ्यू लगा दिया गया।

अगले दिन समाचार पत्रों में समाचार दिखाई दिया कि पीएसी के लोगों ने मुस्लिम इलाके में लोगों को लूटने और पीटने का काम किया था। मैंने तुरंत जांच शुरू कर दी। मेरे आश्चर्य के लिए, मैंने पाया कि ये लोग पीएसी के नहीं थे बल्कि सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के थे, जिन्होंने मुस्लिम इलाके में लूटपाट, संपत्ति को नष्ट करने और बूढ़े पुरुषों और महिलाओं की बुरी तरह से पिटाई की थी। इससे पता चलता है कि सांप्रदायिक पूर्वाग्रह न केवल पीएसी में, बल्कि केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के बीच भी मौजूद थे। उन इलाकों से कोई शिकायत नहीं मिली जहां मेरी बटालियन के आदमी तैनात थे।

मैंने देखा है कि पुलिस के निचले रैंक का व्यवहार मुख्य रूप से उच्च रैंकिंग अधिकारियों के व्यवहार और दृष्टिकोण से प्रभावित रहता है। यदि उच्च श्रेणी के अधिकारियों में जाति और सांप्रदायिक पूर्वाग्रह हैं, तो उनके अधीन कर्मचारियों के बीच में भी समान रूप से होने की संभावना है। मैंने पुलिस सेवा के दौरान कई शीर्ष रैंकिंग पुलिस अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से अपनी जाति और सांप्रदायिक पूर्वाग्रहों को प्रदर्शित करते हुए देखा है।

सच्चाई यह है कि कई आईपीएस अधिकारी उच्चकोटि का प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद भी  निम्न जातियों और अल्पसंख्यक समुदाय के प्रति दृष्टिकोण में कोई बदलाव नहीं दिखाते हैं।

किसी के रवैये को बदलना सबसे मुश्किल काम है क्योंकि इसमें खुद को पूर्वाग्रहों से मुक्त करने के लिए बहुत प्रयास करने की आवश्यकता होती है। सांप्रदायिक पूर्वाग्रहों को अक्सर तथाकथित  आतंकवाद के मामलों में स्पष्ट तौर से देखा जा सकता  है, जहां मुसलमानों को फर्जी तौर पर फंसाने की शिकायतें अक्सर होती रहती हैं जो वर्षों जेल में रहने के बाद उनके निर्दोष पाए जाने से सही पाई जाती हैं. मेरे व्यक्तिगत अनुभव में, उच्च रैंकिंग अधिकारियों का अच्छा रोल मॉडल, निचले स्तर के पुलिसकर्मियों के दृष्टिकोण और व्यवहार को बदलने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

इस संबंध में मेरे प्रयासों को 1992 में एक बार फिर से परखने का मौका आया था जब  राम मंदिर आंदोलन पूरे जोरों पर था। एक दिन, बजरंग दल के लोगों ने वाराणसी शहर में राम मंदिर आन्दोलन के पक्ष में प्रदर्शन करने की योजना बनाई थी। उनका इरादा वाराणसी के प्रसिद्ध हनुमान मंदिर के परिसर में इकठ्ठा हो कर शहर में जुलुस निकलने का था। जिला प्रशासन ने इसे रोकने के लिए उनके मंदिर के गेट से बाहर आते ही उन्हें गिरफ्तार करने की योजना बनाई थी। उन्होंने आंदोलनकारियों को घेरने के लिए पीएसी के जवान लगा दिए थे और उन्हें बसों में भर कर ले जाना था।

सिटी एसपी और सिटी मजिस्ट्रेट मौके पर थे। जब आंदोलनकारी गेट से बाहर आए, तो ड्यूटी पर मौजूद अधिकारियों ने पीएसी के जवानों को उन्हें घेरकर बसों में बिठाने का आदेश दिया। लेकिन उनको जोरदार झटका लगा, जब पीएसी के लोग बिल्कुल नहीं हिले और आंदोलनकारी शहर की ओर बढ़ने लगे। इस पर पीएसी के दूसरे लोगों को सिटी कंट्रोल रूम से घटनास्थल पर ले जाना पड़ा। वहां पहुंचते ही उन्होंने आंदोलनकारियों को घेर लिया और बसों में डाल दिया। इस प्रकार, इन पीएसी वालों की त्वरित कार्रवाई के कारण शहर में संभावित गड़बड़ी से बचा जा सका।

मुझे यह जानकर खुशी हुई कि पीएसी का यह बाद वाला समूह मेरी बटालियन का था। अन्य पीएसी के जिन लोगों ने कार्रवाई करने से इनकार कर दिया था, वे दूसरी बटालियन के थे, जो अनुशासनहीनता के लिए कुख्यात थी। मेरे लोगों द्वारा इस त्वरित कार्रवाई की जिला प्रशासन द्वारा सराहना की गई और पहले वाले पीएसी के जवानों को ड्यूटी से हटा दिया गया। एक वर्दीधारी बल में नेतृत्व से बहुत फर्क पड़ता है।

जैसा कि बीड़ (महाराष्ट्र) की  आईपीएस अधिकारी भाग्यश्री नवटेके के वीडियो से देखा जा सकता है, कि यदि ऐसे अधिकारियों को अधिकार प्राप्त पद पर रखा जाता है तो उनके पक्षपातपूर्ण रूप से कार्य करने की अधिक  संभावना रहती है। अतः ऐसे अधिकारियों पर लगातार नजर रखने की जरूरत है। उन्हें ऐसे कर्तव्यों पर नहीं रखा जाना चाहिए जहां वे अपने पूर्वाग्रहों को प्रदर्शित कर सकें।

अल्पसंख्यक वर्ग के लोगों  की भर्ती करके पुलिस बल की संरचना को बदलना आवश्यक है ताकि इसे प्रतिनिधि और धर्मनिरपेक्ष बनाया जा सके। एससी / एसटी, अल्पसंख्यकों और महिलाओं के मुद्दों के बारे में उन्हें संवेदनशील बनाने के लिए अधिकारियों और कर्मचारियों दोनों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए।


 

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