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रविवार, 18 मई 2025

भारत में दलितों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति क्या है और इसे कैसे सुधारा जा सकता है?

 

भारत में दलितों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति क्या है और इसे कैसे सुधारा जा सकता है?

एसआर दारापुरी, राष्ट्रीय अध्यक्ष, ऑल इंडिया पीपुल्स फ्रंट

भारत में दलितों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति ऐतिहासिक हाशिए पर रहने, लगातार भेदभाव और नीतिगत हस्तक्षेपों के माध्यम से क्रमिक प्रगति के जटिल अंतर्संबंध को दर्शाती है। दलितों को ऐतिहासिक रूप से "अछूत" के रूप में लेबल किया गया है और अब आधिकारिक तौर पर अनुसूचित जाति (एससी) के रूप में मान्यता दी गई है, जो भारत की आबादी का लगभग 16.6% हिस्सा है (2011 की जनगणना के अनुसार लगभग 200 मिलियन लोग)। संवैधानिक सुरक्षा और सकारात्मक कार्रवाई के बावजूद, वे आर्थिक अवसर, शिक्षा और सामाजिक गतिशीलता के मामले में सबसे वंचित समूहों में से एक बने हुए हैं।

वर्तमान सामाजिक-आर्थिक स्थिति

1. आर्थिक स्थितियाँ:

- गरीबी: 2021 के वैश्विक बहुआयामी गरीबी सूचकांक के अनुसार, लगभग एक-तिहाई दलित (लगभग 100 मिलियन) बहुआयामी गरीबी में रहते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में, 2011-12 में 33.8% अनुसूचित जाति के परिवार गरीबी रेखा से नीचे थे, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह 21.8% था। यह राष्ट्रीय औसत से काफी अधिक है।

- रोजगार: ग्रामीण क्षेत्रों में 90% से अधिक दलित अकुशल मजदूर या सीमांत किसान के रूप में काम करते हैं, अक्सर कृषि या अनौपचारिक क्षेत्रों में। केवल 18% दलित परिवारों के पास औपचारिक ऋण तक पहुँच है (भारतीय रिज़र्व बैंक, 2018), जो उद्यमशीलता के अवसरों को सीमित करता है। भूमि स्वामित्व न्यूनतम है, केवल 2.2% दलितों के पास भूमि है, जबकि राष्ट्रीय औसत 17.9% है, जो आर्थिक निर्भरता को कायम रखता है।

- आय असमानता: दलित श्रमिकों का औसत वेतन गैर-दलित श्रमिकों (राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय, 2012) की तुलना में 17% कम है, जो व्यावसायिक अलगाव और भेदभाव को दर्शाता है।

 2. शिक्षा:

- साक्षरता: दलितों में साक्षरता दर 73.5% है, जो राष्ट्रीय औसत 80.9% (भारत की जनगणना, 2020) से कम है। शिक्षा से ऐतिहासिक बहिष्कार और स्कूलों में चल रहे भेदभाव इस अंतर को बढ़ाने में योगदान करते हैं।

- पहुँच: जबकि प्राथमिक विद्यालय में नामांकन में सुधार हुआ है, गरीबी, जाति-आधारित पूर्वाग्रह और ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी ढाँचे की कमी के कारण ड्रॉपआउट दर अभी भी अधिक है। दलितों के लिए उच्च शिक्षा में उपस्थिति 2004-05 में 8% से बढ़कर 2011-12 में 15% हो गई, लेकिन यह अभी भी उच्च जातियों से पीछे है।

3. सामाजिक स्थिति:

- भेदभाव: अस्पृश्यता पर कानूनी प्रतिबंध (भारतीय संविधान के अनुच्छेद 17) के बावजूद, जाति-आधारित भेदभाव जारी है, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में जहाँ 80% दलित रहते हैं। जल स्रोतों, मंदिरों और सार्वजनिक स्थानों तक सीमित पहुँच जैसी प्रथाएँ जारी हैं।

- हिंसा: राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (2020) ने अनुसूचित जातियों के खिलाफ 50,291 अपराधों की रिपोर्ट की, जिसमें हमला, बलात्कार और हत्या शामिल है, जो उनकी भेद्यता को रेखांकित करता है।

4. राजनीतिक प्रतिनिधित्व:

- दलितों के पास लोकसभा में 84 आरक्षित सीटें हैं और उन्हें नौकरी और शिक्षा कोटा से लाभ मिलता है। हालाँकि, राजनीतिक प्रभाव अक्सर प्रतीकात्मक रहता है, जिसका व्यापक समुदाय पर सीमित प्रभाव पड़ता है।

सामाजिक-आर्थिक स्थिति में सुधार के तरीके

दलितों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति में सुधार के लिए संरचनात्मक असमानताओं, आर्थिक सशक्तीकरण और सामाजिक एकीकरण को संबोधित करने वाले बहुआयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता है। यहाँ साक्ष्य-आधारित रणनीतियाँ दी गई हैं:

1. आर्थिक सशक्तीकरण:

- भूमि सुधार: भूमिहीन दलित परिवारों को भूमि का पुनर्वितरण गरीबी के चक्र को तोड़ सकता है। ऐतिहासिक भूमि सुधार प्रयासों (जैसे, स्वतंत्रता के बाद के प्रयास) में दलितों को दरकिनार कर दिया गया; कार्यान्वयन पर नए सिरे से ध्यान देना महत्वपूर्ण है।

- ऋण तक पहुँच: माइक्रोफाइनेंस और औपचारिक बैंकिंग तक पहुँच (वर्तमान 18% से आगे) का विस्तार उद्यमशीलता को सक्षम करेगा। दलित इंडियन चैंबर ऑफ़ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (DICCI) जैसे कार्यक्रम दलित व्यापारिक नेताओं को बढ़ावा देने में आशाजनक हैं।

- रोज़गार सृजन: भारत की अर्थव्यवस्था पर हावी निजी क्षेत्र में आरक्षण का विस्तार करने से रोज़गार के अवसरों में विविधता आ सकती है। वर्तमान में, कोटा केवल सार्वजनिक क्षेत्र की नौकरियों पर लागू होता है, जिससे दलित कार्यबल के केवल 5% को लाभ होता है।

2. शिक्षा सुधार:

- गुणवत्ता और पहुँच: दलित-बहुल क्षेत्रों में अधिक स्कूल बनाने और शिक्षकों की जवाबदेही सुनिश्चित करने से साक्षरता और प्रतिधारण को बढ़ावा मिल सकता है। छात्रवृत्ति और मुफ़्त संसाधन (जैसे, 2023 X पोस्ट में उल्लिखित 1 करोड़ रुपये की छात्रवृत्ति) को बढ़ाया जाना चाहिए।

- जागरूकता अभियान: स्कूली पाठ्यक्रम में जाति-विरोधी शिक्षा को शामिल करने से कम उम्र से ही पूर्वाग्रह को कम किया जा सकता है, जिससे भेदभाव की सांस्कृतिक जड़ों को संबोधित किया जा सकता है।

3. सामाजिक समावेशन:

- कानूनों का प्रवर्तन: अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के कार्यान्वयन को मजबूत करना, कठोर दंड और तेज़ न्यायिक प्रक्रियाओं के साथ, हिंसा और भेदभाव को रोक सकता है।

- सामुदायिक कार्यक्रम: सार्वजनिक पहलों (जैसे, साझा सामुदायिक स्थान) के माध्यम से अंतर-जातीय बातचीत को बढ़ावा देना समय के साथ सामाजिक बाधाओं को मिटा सकता है।

4. राजनीतिक और कानूनी उपाय:

- संस्थानों को सशक्त बनाना: अपराधियों को सीधे दंडित करने के लिए अनुसूचित जाति के राष्ट्रीय आयोग के अधिकार को बढ़ाने से जवाबदेही में सुधार होगा।

- जमीनी स्तर पर लामबंदी: दलितों के नेतृत्व वाले आंदोलनों को राष्ट्रीय स्तर पर एकजुट करने के लिए प्रोत्साहित करना उनकी राजनीतिक आवाज़ को बढ़ा सकता है, जो उत्तर प्रदेश में मायावती के नेतृत्व जैसी सफलताओं पर आधारित है।

5. प्रौद्योगिकी और नवाचार:

- कौशल प्रशिक्षण और नौकरी के अवसरों के लिए डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म का लाभ उठाने से शहरी-ग्रामीण विभाजन को पाटा जा सकता है। दलितों के बीच मोबाइल फोन स्वामित्व में वृद्धि (एसईसीसी 2011 के अनुसार 66.64%) आउटरीच के लिए एक मार्ग प्रदान करती है।

निष्कर्ष

जबकि दलितों ने प्रगति की है - बढ़ती साक्षरता, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और समृद्धि के क्षेत्रों में देखा गया है - उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति जातिगत गतिशीलता और आर्थिक बहिष्कार के कारण अनुपातहीन रूप से कम बनी हुई है। सुधार लक्षित नीतियों पर निर्भर करता है जो प्रतीकात्मक इशारों से परे जाते हैं, भूमिहीनता, शैक्षिक असमानता और सामाजिक कलंक जैसे मूल कारणों से निपटते हैं। सतत प्रगति सुनिश्चित करने के लिए राज्य की कार्रवाई, सामुदायिक पहल और सामाजिक मानसिकता में बदलाव का संयोजन आवश्यक है।

सौजन्य: Gork.com

शनिवार, 20 जनवरी 2024

उत्तर प्रदेश में दलित-आदिवासी और भूमि का प्रश्न

 

उत्तर प्रदेश में दलित-आदिवासी और भूमि का प्रश्न

-    एस आर दारापुरी, राष्ट्रीय प्रवक्ता, आल इंडिया पीपुल्स फ्रन्ट

2011 की जनगणना के अनुसार उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जाति (दलित) की कुल आबादी 4.13 करोड़ है जो उत्तर प्रदेश की कुल आबादी का लगभग 21% है। इसी जनगणना के अनुसार उत्तर प्रदेश में दलितों के 61.91 लाख परिवार हैं जो उत्तर प्रदेश के कुल परिवारों का 23% हैं। इसी प्रकार उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जनजाति (आदिवासी) की कुल आबादी लगभग 11.34 लाख है जो उत्तर प्रदेश की कुल आबादी का लगभग 1% है। इसमें आदिवासियों के लगभग 1.77 लाख परिवार हैं।

उपरोक्त जनगणना के अनुसार उत्तर प्रदेश में लगभग 42% दलित परिवार भूमिहीन एवं हाथ का श्रम करने वाले हैं। दलित परिवारों में से केवल 2.93% सरकारी, 1.14% गैर सरकारी तथा 1.92% निजी क्षेत्र में अर्थात लगभग 6% ही नौकरी पेशा हैं। शेष 94% मजदूरी तथा अन्य  पेशों में हैं। इसी प्रकार 35.30% आदिवासी परिवार भूमिहीन तथा हाथ का श्रम करने वाले हैं। इनमें से 3.54% सरकारी, 1.63% गैर सरकारी तथा 2.95% निजी क्षेत्र में अर्थात 8% परिवार ही नौकरी पेशा हैं। शेष 92% मजदूर तथा अन्य पेशों में हैं।

इसी जनगणना के अनुसार उत्तर प्रदेश के 82.40% परिवारों की आय 5000 प्रतिमाह से कम है। 13.25% परिवारों की आय 5000 से 10,000 तथा 4.29% परिवारों की  आय 10,000 प्रतिमाह से अधिक है। सरकारी नौकरी से 5000 से अधिक आय वाले परिवारों की संख्या केवल 2.71% ही है। 2011 की जनगणना के अनुसार उत्तर प्रदेश में 81.35% आदिवासी परिवारों की आय 5000 प्रतिमाह से कम है। 13.82% परिवारों की आय 5000 से 10,000 के बीच तथा 4.81% परिवारों की आय 10,000 प्रतिमाह से अधिक है। केवल 3.31% प्रतिशत परिवारों की सरकारी नौकरी से 5000 से अधिक आय है।

2011 की जनगणना के अनुसार उत्तर प्रदेश में 15.69% दलित परिवारों के पास असिंचित, 42.06% के पास सिंचित तथा 9.12% परिवारों के पास अन्य भूमि उपलब्ध है। इसी प्रकार 28.16% आदिवासी परिवारों के पास असिंचित, 39.33% के पास सिंचित तथा 12.50% के पास अन्य भूमि थी।

उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि उत्तर प्रदेश के दलित अधिकतर भूमिहीन, अल्प आय तथा बेरोजगार हैं जोकि उनके सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक पिछड़ापन का मुख्य कारण है। भूमिहीन तथा केवल हाथ का श्रम करने वाले होने के कारण गाँव में वे अधिकतर कृषि मजदूर का काम करते हैं। अपने जानवरों के लिए चारा तथा टट्टी पेशाब के लिए भी उन्हें दूसरे के खेतों में जाना पड़ता है। भूमिहीन तथा बेरोजगार होने के कारण उन्हें ऊंची जातियों के अत्याचार तथा शोषण को झेलना पड़ता है। इसी कमजोरी को चिह्नित करते हुए डा. अंबेडकर ने आगरा  में अपने भाषण में कहा था, “मेरे ग्रामीण भाइयों पर अत्याचार होता है क्योंकि उनके पास जमीन नहीं है। इसी लिए अब मैं उनके लिए जमीन की लड़ाई लड़ूँगा।“

यह भी सर्वविदित है कि भारत एक कृषि प्रधान देश है और इसकी लगभग 60% आबादी कृषि से किसान तथा खेतिहर मजदूर के तौर पर जुड़ी हुई है। उपरोक्त आंकड़ों से यह भी स्पष्ट है कि उत्तर प्रदेश में भी अधिकतर दलित एवं आदिवासी भूमिहीन हैं और वे केवल हाथ की मजदूरी ही कर सकते हैं। भूमिहीनता और केवल हाथ की मजदूरी उनकी सब से बड़ी दुर्बलताएं हैं। इनके कारण न तो वे जातिभेद और छुआछूत के कारण अपने ऊपर होने वाले अत्याचारों का मजबूती से सामना कर पाते हैं और न ही मजदूरी के सवाल पर सही ताकत से लड़ाई। क्योंकि खेती में रोज़गार केवल मौसमी होता है, अतः उन्हें शेष समय मजदूरी के लिए अन्यत्र खोजना पड़ता है या फिर बेरोजगार रहना पड़ता है।

ग्रामीण क्षेत्र में यह भी एक यथार्थ है कि भूमि न केवल उत्पादन का साधन है बल्कि यह सम्मान और सामाजिक दर्जे का भी प्रतीक है। गाँव में जिस के पास ज़मीन है वह न केवल आर्थिक तौर पर मज़बूत है बल्कि सामाजिक तौर पर भी सम्मानित है। अब चूँकि अधिकतर दलितों के पास न तो ज़मीन है और न ही नियमित रोज़गार, अतः वे न तो सामाजिक तौर पर सम्मानित हैं और न ही आर्थिक तौर पर मज़बूत। ग्रामीण क्षेत्र में दलित तभी सशक्त हो सकते हैं जब उन के पास ज़मीन आये और उन्हें नियमित रोज़गार मिले। अतः भूमि वितरण और सुरक्षित रोज़गार की उपलब्धता दलितों और आदिवासियों तथा अन्य भूमिहीनों की प्रथम ज़रूरत है।

भारत के स्वतंत्र होने पर देश में संसाधनों के पुनर्वितरण हेतु ज़मींदारी व्यवस्था समाप्त करके भूमि सुधार लागू किये गए थे। इस द्वारा देश में व्याप्त भूमि सीमारोपण कानून बनाये गए थे जिस से भूमिहीनों को आवंटन के लिए भूमि उपलब्ध करायी जानी थी। परन्तु इन कानूनों को लागू करने में बहुत बेईमानी की गयी क्योंकि उस समय सत्ताधारी पार्टी कांग्रेस में अधिकतर नेता पुराने ज़मीदार ही थे और प्रशासन में भी इसी वर्ग का बर्चस्व था। इसी लिए एक तो इन कानूनों से बहुत कम ज़मीन निकली और जो निकली भी उसका भूमिहीनों को वितरण नहीं किया गया। परिणामस्वरूप इन कानूनों को लागू करने से पहले जिन लोगों के पास उक्त ज़मीन थी वह उनके पास ही बनी रही। आज भी विभिन्न राज्यों में बेनामी और ट्रस्टों व मंदिरों के नाम हजारों हजारों एकड़ ज़मीन बनी हुई है. उत्तर प्रदेश में भी यही स्थिति है।

सामाजिक-आर्थिक एवं जाति जनगणना के आंकड़ों के विश्लेषण से स्पष्ट है ग्रामीण क्षेत्र के दलितों एवं आदिवासियों के लिए भूमि का प्रश्न सब से महत्वपूर्ण प्रश्न है जिसे भूमि सुधारों को सही ढंग से लागू किये बिना हल करना संभव नहीं है। परन्तु यह बहुत बड़ी बिडम्बना है कि भूमि सुधार और भूमि वितरण किसी भी दलित अथवा गैर दलित राजनीतिक पार्टी के एजंडे पर नहीं है. अतः दलितों एवं आदिवासियों का तब तक सशक्तिकरण संभव नहीं है जब तक उन्हें भूमि वितरण द्वारा भूमि उपलब्ध नहीं करायी जाती।

यह ज्ञातव्य है कि उत्तर प्रदेश में 1995 से लेकर 2012 तक मायावती चार बार मुख्य मंत्री रही है। उसके शासन काल में केवल 1995 तथा 1997 में उत्तर प्रदेश के मध्य तथा पच्छिमी क्षेत्र को छोड़ कर शेष भागों में कोई भी भूमि आवंटन नहीं किया गया। पूर्वी उत्तर प्रदेश जहाँ दलितों की सब से घनी आबादी है, में तो गोरखपुर को छोड़ कर कहीं भी भूमि आवंटन नहीं हुआ, वह भी एक अधिकारी (हरीश चंद्र, आयुक्त गोरखपुर) के प्रयासों के फलस्वरूप ही। ऐसा नहीं है कि उत्तर प्रदेश में आवंटन के लिए भूमि उपलब्ध नहीं थी। 1995 में उत्तर प्रदेश में सीलिंग की अतिरिक्त भूमि, ग्राम समाज तथा भूदान की इतनी भूमि उपलब्ध थी कि उससे न केवल दलित बल्कि अन्य जातियों के भूमिहीनों को भी गुज़ारे लायक भूमि मिल सकती थी परन्तु मायावती ने उसका आवंटन नहीं किया।  इतना ही नहीं जो भूमि पूर्व में आवंटित थी उसके कब्ज़े दिलाने के लिए भी कोई कार्रवाही नहीं की। 1997 के बाद तो फिर सर्वजन की राजनीति के चक्कर में न तो कोई आवंटन किया गया और न ही कोई कब्ज़ा ही दिलवाया गया।

उत्तर प्रदेश में जब 2002 में मुलायम सिंह यादव की सरकार आई तो उन्होंने राजस्व कानून में संशोधन करके दलितों की भूमि आवंटन की वरीयता को ही बदल दिया और उसे अन्य भूमिहीन वर्गों के साथ जोड़ दिया।  उनकी सरकार में भूमि आवंटन तो हुआ परन्तु ज़मीन दलितों को न दे कर अन्य जातियों को दी गयी। इसके साथ ही उन्होंने कानून में संशोधन करके दलितों की ज़मीन को गैर दलितों द्वारा ख़रीदे जाने वाले प्रतिबंध को भी हटा दिया। उस समय तो यह कानूनी संशोधन टल गया था परन्तु बाद में उन्होंने इसे विधिवत कानून का रूप दे दिया। इस प्रकार मायावती द्वारा दलितों को भूमि आवंटन न करने, मुलायम सिंह द्वारा कानून में दलितों की भूमि आवंटन की वरीयता को समाप्त करने के कारण उत्तर प्रदेश के दलितों को भूमि आवंटन नहीं हो सका और ग्रामीण क्षेत्र में उनकी स्थिति अति दयनीय बनी हुई है।

आदिवासियों के सशक्तिकरण हेतु वनाधिकार कानून- 2006 तथा नियमावली 2008 में लागू हुई  थी  इस कानून के अंतर्गत सुरक्षित जंगल क्षेत्र में रहने वाले आदिवासियों तथा गैर आदिवासियों को उनके कब्ज़े की आवासीय तथा कृषि भूमि का पट्टा दिया जाना था। इस सम्बन्ध में आदिवासियों द्वारा अपने दावे प्रस्तुत किये जाने थे. उस समय उत्तर प्रदेश में मायावती की सरकार थी परन्तु उसकी सरकार ने इस दिशा में कोई भी प्रभावी कार्रवाही नहीं की जिस का नतीजा यह हुआ कि 30.1.2012 को उत्तर प्रदेश में आदिवासियों द्वारा प्रस्तुत कुल 92,406 दावों में से 74,701 दावे अर्थात 81% दावे रद्द कर दिए गए थे और केवल 17,705 अर्थात केवल 19% दावे स्वीकार किये गए तथा कुल 1,39,777 एकड़ भूमि ही आवंटित की गयी थी।

मायावती सरकार की आदिवासियों को भूमि आवंटन में लापरवाही और दलित/आदिवासी विरोधी मानसिकता को देख कर आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में जनहित याचिका दाखिल की थी जिस पर हाई कोर्ट ने अगस्त, 2013 में राज्य सरकार को वनाधिकार कानून के अंतर्गत सभी दावों को पुनः सुन कर तेज़ी से निस्तारित करने के आदेश दिए थे परन्तु उस पर भी कोई ध्यान नहीं दिया गया। इस प्रकार मायावती तथा अखिलेश की  सरकार की लापरवाही तथा दलित/आदिवासी विरोधी मानसिकता के कारण 81% दावे रद्द कर दिए गए।

आइये अब ज़रा वनाधिकार कानून को लागू करने के बारे में भाजपा की योगी सरकार की भूमिका को भी देख लिया जाए। यह सर्विदित है कि भाजपा ने उत्तर प्रदेश के 2017 विधान सभा चुनाव में अपने संकल्प पत्र में लिखा था कि यदि उसकी सरकार बनेगी तो ज़मीन के सभी अवैध कब्जे (ग्राम सभा तथा वनभूमि) खाली कराए जायेंगे। मार्च 2017 में सरकार बनने पर जोगी ने इस पर तुरंत कार्रवाही शुरू कर दी और इसके अनुपालन में ग्राम समाज की भूमि तथा जंगल की ज़मीन से उन लोगों को बेदखल किया जाने लगा जिन का ज़मीन पर कब्ज़ा तो था परन्तु उनका पट्टा उनके नाम नहीं था। इस आदेश के अनुसार 13 जिलों के वनाधिकार के ख़ारिज हुए 74,701 दावेदारों को भी बेदखल किया जाना था। जब योगी सरकार ने बेदखली की कार्रवाही शुरू की तो इस के खिलाफ हम लोगों को फिर इलाहाबाद हाई कोर्ट की शरण में जाना पड़ा। हम लोगों ने बेदखली की कार्रवाही को रोकने तथा सभी दावों के पुनर परीक्षण का अनुरोध किया। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने हमारे अनुरोध पर बेदखली की कार्रवाही पर रोक लगाने, सभी दावेदारों को छुटा हुआ दावा दाखिल करने तथा पुराने दावों पर अपील करने के लिए एक महीने का समय दिया तथा सरकार को तीन महीने में सभी दावों की पुनः सुनवाई करके निस्तारण करने का आदेश दिया। परंतु उक्त अवधि पूर्ण हो जाने के बाद भी सरकार द्वारा इस संबंध में कोई भी कार्रवाही नहीं की गयी।

कुछ वर्ष पहले वाईल्ड लाइफ ट्रस्ट आफ इंडिया द्वारा सुप्रीम कोर्ट में वनाधिकार कानून की वैधता को चुनौती दी गयी तथा वनाधिकार के अंतर्गत निरस्त किये गये दावों से जुड़ी ज़मीन को खाली करवाने हेतु सभी राज्य सरकारों को आदेशित करने का अनुरोध किया गया था। मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में आदिवासियों/वनवासियों का पक्ष नहीं रखा। परिणामस्वरूप सुप्रीम कोर्ट ने 24 जुलाई, 2019 तक वनाधिकार के ख़ारिज हुए सभी दावों की ज़मीन खाली कराने का आदेश पारित कर दिया। इससे पूरे देश में प्रभावित होने वाले परिवारों की संख्या 20 लाख है जिसमें उत्तर प्रदेश के 74,701  परिवार हैं। इस आदेश के विरुद्ध हम लोगों ने आदिवासी वनवासी महासभा के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट में फिर गुहार लगाई जिसमें हम लोगों ने बेदखली पर अपने आदेश पर रोक तथा सभी राज्यों को सभी दावों का पुनर्परीक्षण करने का अनुरोध किया। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने हमारे अनुरोध को स्वीकार करते हुए 10 जुलाई, 2019 तक बेदखली पर रोक तथा सभी राज्यों को सभी दावों की पुन: सुनवाई का आदेश दिया था परंतु दो वर्ष बीत जाने पर इस पर कोई कार्रवाही नहीं की गई है.

उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि किस तरह पहले मायावती और फिर अखिलेश यादव की सरकार ने दलितों, आदिवासियों और परंपरागत वनवासियों को वनाधिकार कानून के अंतर्गत भूमि के अधिकार से वन्चित किया है और भाजपा सरकार में उन पर बेदखली की तलवार लटकी हुई है। यह विचारणीय है कि यदि मायावती और अखिलेश यादव ने अपने कार्यकाल में इन लोगों के दावों का विचरण कर उन्हें भूमि का अधिकार दे दिया होता तो आज उनकी स्थिति इतनी दयनीय नहीं होती। इसी प्रकार यदि मायावती ने अपने शासन काल में भूमिहीनों को ग्रामसभा की ज़मीन जो आज भी दबंगों के कब्जे में है, के पट्टे कर दिए होते तो उनकी आर्थिक हालत कितनी बदल चुकी होती। अतः यह विचारणीय है कि क्या मायावती और अखिलेश यादव जोकि सामाजिक न्याय के नाम पर सरकार बनाते रहे हैं ने दलितों-आदिवासियों को कोई सामाजिक न्याय दिया है. भाजपा तो सामाजिक न्याय की जगह समरसता की बात करती है जोकि यथास्थितिवाद  है। क्या उत्तर प्रदेश के दलित आदिवासी आगामी विधान सभा चुनाव में अपने साथ किए गए उपरोक्त अन्याय के लिए सपा, बसपा और भाजपा से जवाब नहीं मांगेंगे?

अतः अगर उत्तर प्रदेश के दलितों और आदिवासियों का वास्तविक सशक्तिकरण करना है तो वह भूमि सुधारों को कड़ाई से लागू करके तथा भूमिहीनों को भूमि आवंटित करके ही किया जा सकता है। इसके लिए वांछित स्तर की राजनीतिक इच्छा शक्ति की ज़रूरत है जिस का वर्तमान में सर्वथा अभाव है. अतः भूमि सुधारों को लागू कराने तथा भूमिहीन दलितों/आदिवासियों को भूमि आवंटन कराने के लिए एक मज़बूत भूमि आन्दोलन चलाये जाने की आवश्यकता है। इस आन्दोलन को बसपा जैसी अवसरवादी और केवल जाति की राजनीति करने वाली पार्टी नहीं चला सकती है क्योंकि इसे सभी प्रकार के आंदोलनों से परहेज़ है. समाजवादी पार्टी भी केवल सत्ता की राजनीति करती है। उसे भी दलितों आदिवासियों के सशक्तिकरण से कोई सरोकार नहीं है।

आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट ने हमेशा भूमि सुधार और भूमि आवंटन को अपने एजंडे में प्रमुख स्थान दिया है और इसके लिए अदालत में तथा ज़मीन पर भी लड़ाई लड़ी है।  इसी पार्टी ने उत्तर प्रदेश में वनाधिकार कानून को ईमानदारी से लागू कराने के लिए इलाहाबाद उच्च न्यायालय तथा सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिकाएं  दायर करके आदेश भी प्राप्त किया था जिसे मायावती और अखिलेश की सरकार ने विफल कर दिया। अतः आइपीएफ सभी दलित/आदिवासी हितैषी संगठनों और दलित राजनीतिक पार्टियों का आवाहन करता है कि वे अगर सहमत हों तो उत्तर प्रदेश के 2022  के चुनाव में भूमि सुधार और भूमि आवंटन को सभी राजनीतिक पार्टियों के एजंडे में शामिल कराने के लिए जन दबाव बनाने हेतु एक मंच पर आएं।

 

 

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