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रविवार, 26 अप्रैल 2026

भगवान दास के कथा-कर्म का मूल्यांकन

 

            भगवान दास के कथा-कर्म का मूल्यांकन

             (कँवल भारती)

                        

 

 हिन्दी में दलित साहित्य के आरम्भिक दौर को मिशनरी दौर माना जाता है। यह दौर चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु युग रूप में जाना जाता है। जिज्ञासु के सिवा इस युग के अन्य प्रमुख साहित्यकारों में स्वामी अछूतानन्द, ललई सिंह, शंकरानंद शास्त्री, लाल चंद राही, मंगलदेव विशारद, मोतीराम शास्त्री, राजवैद्य माताप्रसाद सागर, सुंदर लाल सगर (आगरा) सुंदर लाल सागर (मैनपुरी), डी. आर. जाटव, लाहौरी राम बाली, रामस्वरूप वर्मा, भगवान दास, अंगने लाल, गया प्रसाद प्रशांत, गजाधर प्रसाद बौद्ध, बदलू राम रसिक, राम शरण विद्यार्थी, रमेश चन्द्र मल्लाह, माता प्रसाद, डी. पी. वरुण,  इत्यादि हैं। मुख्य रूप से ये साहित्यकार कवि, निबन्धकार, नाटककार और उपन्यासकार थे। कहानियाँ केवल भगवान दास ने लिखी थीं। इसलिए पहले दलित कहानीकार के रूप में भगवान दास का कथा-कर्म ही हमारे सामने आता है।

भगवान दास की कुल नौ कहानियाँ मिलती हैं, जिनका विवेचन पिछले दो अध्यायों में किया जा चुका है। यहाँ उनके कथा-कर्म पर कुछ चर्चा करनी है। यदि भगवान दास अपना कहानी लेखन जारी रखते, तो निस्संदेह उनकी क़लम से दलित चेतना की और भी कई अच्छी कहानियाँ हिन्दी साहित्य को मिलतीं। लेकिन उनके जीवन का लक्ष्य आंबेडकर मिशन सोसाइटी का प्रचार-प्रसार करना था, जिसके कारण उन्होंने रचनात्मक साहित्य का क्षेत्र छोड़ दिया था। इसका एक कारण यह भी था कि उन्हें हिन्दी का ज्ञान नहीं था। उनके पढ़ने-लिखने की भाषा उर्दू और अंग्रेज़ी थी। इसलिए हिन्दी में लेखन करना उनके लिए एक मुश्किल काम था। उन्होंने हिन्दी के बारे में अपनी पुस्तक ‘मैं भंगी हूँ’ में लिखा है, ‘हिन्दी का मेरा ज्ञान केवल लिपि तक सीमित है। देश की सरकारी भाषा और राष्ट्रीय भाषाओं में से एक होने के कारण मैंने इसे सीखने की कोशिश की, परन्तु न तो मैं इसके लिए प्यार पैदा कर सका, (और) न दक्षता प्राप्त कर सका।’

 इसलिए भगवान दास की कहानियों की भाषा पर बात करना मेरी दृष्टि में न्यायसंगत नहीं होगा, क्योंकि उनकी मूल भाषा हिन्दी नहीं है। लेकिन शिल्प और सामाजिक सरोकार की दृष्टि से इन कहानियों पर चर्चा होनी चाहिए। दलित परिवेश से आने के कारण भगवान दास की प्रत्येक कहानी में दलित समाज की चिंता है। पहली कहानी ‘कॉफ़ी हाउस’ में जातीय भेदभाव की चिंता है। कॉफ़ी हाउस में कुमार कहता है कि हिंदुस्तान की सबसे बड़ी लानत जातपांत है, जिसे ख़त्म किए बिना यह देश कभी एक नहीं हो सकता। इस सच्चाई को वर्ग की राजनीति करने वाले कम्युनिस्ट विचारक नहीं समझते। वे जाति को ख़त्म किए बिना क्रान्ति लाना चाहते हैं, जो असंभव है। वे उस वर्ग की बात करते हैं, जो भारतीय समाज में अभी बने ही नहीं हैं। यह कहानी पहली बार वर्ग की चेतना के विरुद्ध जाति की चेतना की बात करती है। कहानी साफ़-साफ़ कहती है कि दलित वर्गों का भला भारतीय कम्युनिज्म में नहीं है। यदि भारतीय कम्युनिज्म को सफल होना है, तो उसे दलितों के पास जाना होगा।

 मनुष्य होने की चिंता भगवान दास की लगभग सभी कहानियों में है। यह चिंता ‘बिन ब्याही बीवी’ में भी है, जिसमें एक खत्री महिला, प्रोफ़ेसर वाल्मीकि से प्यार करने के बावजूद उन्हें एक अछूत मानती है, और उनसे शादी करने से इंकार कर देती है। वह इस भय से आशंकित है कि यदि उसने अछूत पुरुष से शादी कर ली, तो उसके घर वाले उसका बहिष्कार कर देंगे। ‘चोर’ कहानी में जज भी जातिवादी है, और आरोपी को जाति के चश्मे से देखता है। चोरी के झूठे आरोप में फंसाए गए ईश्वर सिंह की सफाई पर वह कोई ध्यान नहीं देता है, क्योंकि वह चूहड़ा जाति से है। जज यह मानकर चलता है कि दलित है, तो उसने ज़रूर चोरी की होगी।

 शूद्र का शाप’ रामायण के रामराज्य की कहानी है। हालांकि शूद्र शंबूक का शाप रामराज्य के लिए अभिशाप साबित नहीं हुआ। ब्राह्मणों ने उसे एक आदर्श राजव्यवस्था के आदर्श के रूप में मान्यता दी, यहाँ तक कि गाँधी भी रामराज्य के समर्थक थे। स्वामी करपात्री ने तो रामराज्य के समर्थन में संस्कृत में एक भारीभरकम ग्रन्थ लिखा था, जिसमें उन्होंने रामराज्य को मार्क्सवाद की तुलना में सर्वश्रेष्ठ व्यवस्था साबित किया था। लेकिन भगवान दास इस कहानी में जो कह नहीं सके, वह यह है कि राम को अपने द्वारा की गईं निरपराध मनुष्यों की हत्याओं का पाप-बोध हुआ था, जिसका पश्चाताप उन्होंने, जैसाकि वाल्मीकीय रामायण में लिखा है, सरयू नदी में जल-समाधि लेकर किया था।

 दलितों के प्रति उच्च जातियों की अमानवीयता कोई ऐसी घटना नहीं है, जिस पर आश्चर्य किया जाए। यह हिन्दुओं की जीवन-शैली का एक अनिवार्य मूल्य है, जो उन्हें विरासत में मिला है। ‘फसाद’ कहानी पढ़कर मालूम होता है कि हिन्दू गाँवों में दलित जातियों पर लगाए गए तमाम तरह के प्रतिबंधों में एक प्रतिबंध यह भी था कि वे अपने मुर्दे भी अपने तरीक़े से नहीं दफ़ना  सकते थे। वहाँ भी सवर्णों की मर्ज़ी चलती थी, जिसकी अवहेलना का मतलब था दलितों का अत्याचार। यह फसाद सहुगढ़ गाँव में हुआ था। पर वास्तव में यह फसाद एक संघर्ष था, जो दलितों ने उच्च जातियों के प्रतिबंधों के ख़िलाफ़ किया था। जातिभेद के विरुद्ध ऐसे संघर्ष उस दौर में देशभर में हो रहे थे। भगवान दास ने इस संघर्ष के परिणाम को भी कहानी में चित्रित किया है, जिसके कारण दलितों का गाँव से निष्कासन होता है, और उनके स्थान के नए गुलामों के रूप में नए अछूत बसा दिए जाते हैं। यह निष्कासन भारत के सम्पूर्ण हिन्दू गांवों में दलितों की नियति थी।

 सती की समाधि’ कुछ नए सवाल उठाती है। हिन्दू प्रथा के अनुसार मृतक पति की चिता पर ज़बरन जलाई जाने वाली विधवा पत्नी तो सती है ही, लेकिन भगवान दास ने एक दलित गांव में उस समाधि को खोजा है, जिसने उच्च जातियों की वासना से बचने के लिए आत्महत्या कर ली थी। गाँव के लोगों ने उसकी समाधि बनाकर उसको अमर कर दिया। मेहतर समाज की उस सुंदर स्त्री पर उच्च जाति के दरोगा ने उसका जिस्म पाने के लिए इतने ज़ुल्म ढाए थे कि उसके सामने आत्महत्या करने के सिवा कोई रास्ता नहीं बचा था। हम कल्पना कर सकते हैं कि गाँवों में जो समाधियाँ दिखाई देती हैं, वह अत्याचार की शिकार महिलाओं की भी हो सकती हैं। यह कहानी हमें इस दृष्टिकोण से भी सोचने के लिए बाध्य करती है।

 शूद्र का शाप’ छोड़कर, जो एक रामायण पर आधारित है, भगवान दास की कहानियाँ उनके जीवन-अनुभवों की अभिव्यक्तियाँ हैं। अनुभव से वेदना पैदा होती है और वेदना से समाज की समस्या का अहसास होता है। यह अहसास ही विद्रोह को जन्म देता है, जो दलित साहित्य की मुख्य प्रवृत्ति है।

(1/3/2026)

बुधवार, 22 अप्रैल 2026

भगवान दास का जीवन और मिशन: एक सच्चे आंबेडकरवादी की बौद्धिक यात्रा

 

भगवान दास का जीवन और मिशन: एक सच्चे आंबेडकरवादी की बौद्धिक यात्रा

एस आर दारापुरी आई.पी.एस.(से.नि.)

(भगवान दास जी के 23 अप्रैल को जन्म दिवस पर विशेष)

 


Bhagwan Das In Pursuit of Ambedkar: Documentary Film:

https://www.youtube.com/watch?v=ZxKV3coY9wY 

आधुनिक भारत में सामाजिक न्याय के संघर्ष का इतिहास भीमराव रामजी आंबेडकर के जीवन और विचारों के बिना अधूरा है। किंतु आंबेडकर के विचारों का संरक्षण, प्रसार और व्याख्या केवल राजनीतिक आंदोलनों के माध्यम से संभव नहीं था; इसके लिए ऐसे समर्पित बौद्धिक कर्मियों की आवश्यकता थी जिन्होंने उनके चिंतन को आने वाली पीढ़ियों तक सही रूप में पहुँचाया। इस संदर्भ में भगवान दास का नाम अत्यंत महत्वपूर्ण है। वे केवल अनुयायी नहीं, बल्कि आंबेडकरवादी विचारधारा के सबसे विश्वसनीय संरक्षकों और व्याख्याकारों में से एक थे।

यह निबंध भगवान दास के जीवन, उनके बौद्धिक योगदान, बौद्ध धर्म के प्रति उनकी प्रतिबद्धता तथा आंबेडकरवादी आंदोलन में उनकी भूमिका का विश्लेषण करता है। यह तर्क प्रस्तुत करता है कि भगवान दास “बौद्धिक आंबेडकरवाद” के प्रतिनिधि थे, जिसमें वैचारिक निष्ठा, शोधपरकता और ज्ञान के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन की प्रतिबद्धता प्रमुख है।

प्रारंभिक जीवन और सामाजिक पृष्ठभूमि

भगवान दास का जन्म 1927 में भारत में एक सामाजिक रूप से अछूत समुदाय में हुआ। उनका बचपन जातिगत भेदभाव, सामाजिक बहिष्कार और असमानता के अनुभवों से प्रभावित रहा। इन अनुभवों ने उनके भीतर अन्याय के प्रति संवेदनशीलता और परिवर्तन की आकांक्षा उत्पन्न की।

उनके जीवन में निर्णायक मोड़ तब आया जब उन्होंने आंबेडकर के लेखन का अध्ययन किया। आंबेडकर द्वारा शिक्षा, तर्कशीलता और सामाजिक न्याय पर दिया गया बल उनके लिए एक वैचारिक मार्गदर्शक बन गया। “शिक्षित बनो, संघर्ष करो और संगठित हो,” का आह्वान उनके जीवन का मूल सिद्धांत बन गया।¹

डॉ. आंबेडकर का प्रभाव

भगवान दास को डॉ. आंबेडकर के साथ संपर्क का अवसर मिला, जिसने उनके बौद्धिक विकास को गहराई से प्रभावित किया। उन्होंने आंबेडकरवादी दर्शन के निम्नलिखित तत्वों को आत्मसात किया:

स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के सिद्धांत, जाति व्यवस्था की संरचनात्मक आलोचना, संवैधानिक नैतिकता का महत्व तथा तर्कवाद और वैज्ञानिक दृष्टिकोण

आंबेडकर की प्रसिद्ध कृति जाति का उन्मूलन (Annihilation of Caste) ने भगवान दास के चिंतन को गहराई से प्रभावित किया।² इससे उन्हें यह समझ मिली कि जाति केवल सामाजिक समस्या नहीं, बल्कि एक जटिल संरचनात्मक व्यवस्था है जिसे समाप्त करना आवश्यक है।

आंबेडकर के लेखन का संरक्षण

भगवान दास का सबसे महत्वपूर्ण योगदान आंबेडकर के लेखन के संरक्षण में रहा। 1956 में आंबेडकर के निधन के बाद उनके अनेक लेख, भाषण और पांडुलिपियाँ बिखरी हुई थीं। भगवान दास ने इन्हें एकत्रित करने, संपादित करने और व्यवस्थित करने का महत्वपूर्ण कार्य किया।

उनके प्रयासों से प्रकाशित हुआ विशाल संकलन—

“दस स्पोक अंबेडकर” चार खंड। यह संग्रह आज आंबेडकर के अध्ययन के लिए सबसे प्रामाणिक स्रोत माना जाता है। यदि यह कार्य न हुआ होता, तो आंबेडकर के अनेक विचार इतिहास में खो सकते थे।

व्याख्या और प्रसार

भगवान दास केवल संग्रहकर्ता नहीं थे, बल्कि एक गहन व्याख्याकार भी थे। उन्होंने आंबेडकर को केवल दलित नेता के रूप में नहीं, बल्कि एक व्यापक चिंतक के रूप में प्रस्तुत किया— राजनीतिक दार्शनिक, सामाजिक सिद्धांतकार, अर्थशास्त्री एवं संवैधानिक विचारक

उनकी पुस्तक Thus Spoke Ambedkar के माध्यम से उन्होंने जटिल विचारों को सरल और सुलभ रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने अनुवाद कार्यों के माध्यम से भी आंबेडकर के विचारों को विभिन्न भाषाओं में पहुँचाया।

बौद्ध धर्म के साथ जुड़ाव

आंबेडकर द्वारा 1956 में नागपुर में आयोजित दीक्षा समारोह के बाद भगवान दास ने 1957 में बौद्ध धर्म को अपने जीवन का अभिन्न अंग बना लिया।

उन्होंने बौद्ध धर्म को इस रूप में देखा:

तर्कसंगत और नैतिक व्यवस्था, सामाजिक समानता का आधार एवं जाति-विरोधी दर्शन

आंबेडकर की कृति The Buddha and His Dhamma इस संदर्भ में उनके लिए मार्गदर्शक रही।³ उन्होंने इस ग्रंथ की व्याख्या और प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

आंबेडकरवादी आंदोलन में भूमिका

भगवान दास ने सक्रिय राजनीति से दूरी बनाकर बौद्धिक क्षेत्र को अपनी कार्यभूमि बनाया। उनकी भूमिका को निम्न रूप में समझा जा सकता है:

1. वैचारिक नेतृत्व

उन्होंने आंदोलन को सैद्धांतिक स्पष्टता प्रदान की।

2. प्रतीकवाद की आलोचना

उन्होंने आंबेडकर को केवल प्रतीक तक सीमित करने का विरोध किया।

3. शिक्षा पर बल

उन्होंने शिक्षा को मुक्ति का मुख्य साधन माना।

4. वैचारिक शुद्धता की रक्षा

उन्होंने आंबेडकर के विचारों के विकृतिकरण का विरोध किया।

उनके मिशन के मूल तत्व

भगवान दास के जीवन का सार निम्न सिद्धांतों में निहित है:

आंबेडकर के विचारों के प्रति निष्ठा, जाति उन्मूलन की प्रतिबद्धता, तर्कवाद और वैज्ञानिक दृष्टिकोण, सामाजिक लोकतंत्र की स्थापना एवं शिक्षा के माध्यम से सशक्तिकरण

सम्मान और विरासत

उनके योगदान के लिए उन्हें दिल्ली सरकार द्वारा “अंबेडकर रत्न” के अवार्ड से से सम्मानित किया गया।

उनकी वास्तविक विरासत उनके बौद्धिक कार्यों में निहित है, जिनके माध्यम से उन्होंने आंबेडकरवादी अध्ययन को संस्थागत रूप दिया और भविष्य की पीढ़ियों के लिए एक मजबूत आधार तैयार किया।

आलोचनात्मक मूल्यांकन

यद्यपि भगवान दास का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है, फिर भी कुछ सीमाएँ देखी जा सकती हैं:

जन-आंदोलनों में सीमित भागीदारी एवं अकादमिक क्षेत्र में अधिक प्रभाव

फिर भी, यह उनकी भूमिका की विशिष्टता को दर्शाता है। किसी भी सामाजिक आंदोलन को वैचारिक और राजनीतिक दोनों प्रकार के नेतृत्व की आवश्यकता होती है, और भगवान दास ने बौद्धिक नेतृत्व का दायित्व उत्कृष्ट रूप से निभाया।

निष्कर्ष

भगवान दास एक सच्चे आंबेडकरवादी थे, जिन्होंने अपने जीवन को विचारों के संरक्षण और प्रसार के लिए समर्पित किया। उन्होंने भीमराव रामजी आंबेडकर के विचारों को न केवल संरक्षित किया, बल्कि उन्हें नई पीढ़ियों तक सटीक और प्रभावी रूप में पहुँचाया।

उनका जीवन यह दर्शाता है कि सामाजिक परिवर्तन केवल राजनीतिक संघर्ष से नहीं, बल्कि बौद्धिक प्रतिबद्धता और ज्ञान के प्रसार से भी संभव है।

संदर्भ

  1. आंबेडकर, भीमराव रामजी. जाति का उन्मूलन. Dr. Babasaheb Ambedkar: Writings and Speeches, खंड 1.
  2. आंबेडकर, भीमराव रामजी. The Buddha and His Dhamma. BAWS, खंड 11.
  3. Omvedt, Gail. Ambedkar: Towards an Enlightened India. New Delhi: Penguin, 2004.
  4. Jaffrelot, Christophe. Dr Ambedkar and Untouchability. New York: Columbia University Press, 2005.
  5. Zelliot, Eleanor. From Untouchable to Dalit. New Delhi: Manohar, 1992.
  6. Rodrigues, Valerian (ed.). The Essential Writings of B. R. Ambedkar. Oxford University Press, 2002.
  7. Das, Bhagwan. Thus Spoke Ambedkar. New Delhi: Buddhist Publishing House.

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