दलित उत्पीडन लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
दलित उत्पीडन लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

मंगलवार, 23 जनवरी 2018

भाजपा शासित राज्यों में दलित उत्पीड़न अधिक

भाजपा शासित राज्यों में दलित उत्पीड़न अधिक
-एस.आर.दारापुरी, आई.पी.एस. (से.नि.) एवं संयोजक, जनमंच उत्तर प्रदेश
राष्ट्रीय अपराध अनुसन्धान ब्यूरो (एनसीआरबी) द्वारा हाल में जारी की गयी क्राईम इन इंडिया2016 रिपोर्ट से एक बात पुनः उभर कर आई है कि भाजपा शासित राज्य दलित उत्पीड़न के मामले में देश के अन्य राज्यों से काफी आगे हैं. लगभग यही स्थिति वर्ष 2015 में भी थी. वर्तमान में भाजपा शासित राज्य गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, हरियाणा, छत्तीसगढ़, गोवा तथा झारखण्ड हैं जिनमे दलित उत्पीड़न के अपराध दूसरे राज्यों की अपेक्षा काफी अधिक हैं. यह स्थिति मोदी जी की दलितों के बारे में दिखाई गयी सहानुभूति तथा उनके दलित प्रेम की पोल खोलती है. इनके इलावा कुछ अन्य राज्य जैसे उड़ीसा, आन्ध्र प्रदेश, तेलन्गाना, उत्तर प्रदेश और बिहार हैं जिन में दलित उत्पीड़न के मामले राष्ट्रीय दर (प्रति एक लाख दलित आबादी पर) से ज्यादा हैं.
दलितों पर 2016 में कुल घटित अपराध:  इस वर्ष यह संख्या 40,801 है जो कि वर्ष 2015 की संख्या 38,670 से 2,131 अधिक है. इस प्रकार 2016 में पिछले वर्ष की अपेक्षा 5.5% की वृद्धि हुयी है. इस वर्ष प्रति एक लाख दलित आबादी पर घटित अपराध की राष्ट्रीय दर 20.3 रही है. इन अपराधों में दलित महिलाओं के शील भंग के कुल मामले 3,172 थे जो कि दलितों पर कुल घटित अपराध का 7.7% थे. इसी प्रकार बलात्कार के कुल मामले 2,541 थे जो कि कुल अपराध का 6.2% थे. इसी प्रकार उक्त अवधि में जनजाति वर्ग के विरुद्ध 6,568 अपराध घटित हुए जो कि 2015 की अपेक्षा में 4.7 % अधिक थे.
जनजाति वर्ग की महिलाओं पर बलात्कार के 974 मामले घटित हुए जो कि उन पर घटित कुल अपराध का 14.8% हैं. उन पर शील भंग के 835 मामले हुए जो कुल अपराध का 12.7% थे. इससे स्पष्ट है कि भाजपा राज में दलित महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं.
दलितों पर वर्ष 2016 में घटित अपराध की दृष्टि से भाजपा शासित राज्यों की स्थिति देखी जाये तो मध्य प्रदेश प्रथम स्थान पर है जिसमे 4,922 अपराध घटित हुए तथा अपराध की दर 43.4 रही जो कि राष्ट्रीय दर 20.3 से दुगनी है. इसी प्रकार राजस्थान दलित अपराध में देश में दूसरे नंबर पर है जहाँ 5,134 अपराध तथा उसकी दर 42.0 रही जो कि राष्ट्रीय दर (20.3) से दुगनी है. इसमें गोवा तीसरे स्थान पर है जहाँ अपराध दर 36.7 है. इसमें गुजरात 5वें स्थान पर है जहाँ अपराध दर 32.2 है जो कि राष्ट्रीय दर 20.3 से लगभग डेढ़ गुना है. इससे स्पष्ट है कि अधिकतर भाजपा शासित राज्यों में दलितों पर अपराध राष्ट्रीय औसत से काफी अधिक हैं.
अपराध वार राज्यों की स्थिति निम्न प्रकार है:-
1 हत्या : उक्त अवधि में देश में दलितों की हत्या के 786 अपराध हुए तथा प्रति लाख दर 0.4 रही. इसमें गुजरात के 32 मामलों में 35 दलितों की हत्याएं हुयीं और 0.8 की दर के कारण पूरे देश में प्रथम स्थान रहा. इसके बाद मध्य प्रदेश 81, हरियाणा 34 तथा उत्तर प्रदेश 271 मामलों में 274 हत्याएं एवं 0.7 की दर के साथ दूसरे स्थान पर रहे, राजस्थान 66 मामलों में 67 हत्याएं तथा 0.5 की दर के साथ पांचवें स्थान पर रहा. इससे स्पष्ट है कि हत्या के मामले में भाजपा शासित राज्यों की स्थिति बहुत बुरी है.
2. हत्या का प्रयास: उक्त अवधि में पूरे देश में 732 अपराध घटित हुए तथा अपराध की प्रति लाख दर 0.4 रही. इस अपराध में राजस्थान 106 और गुजरात 35 तथा अपराध की दर 0.9 जो कि राष्ट्रीय दर की दुगनी से भी अधिक है, के साथ प्रथम स्थान पर रहे. महाराष्ट्र में 60 मामले जिसमे 71 व्यक्ति प्रभावित हुए तथा दर 0.5 रही. यह भी राष्ट्रीय दर से अधिक है. इससे स्पष्ट है अधिकतर भाजपा शासित राज्यों में दलित सुरक्षित नहीं हैं.  
3. गंभीर चोट: इस अपराध के अंतर्गत पूरे देश में 1,070 मामले हुए जिनमें 1,148 व्यक्ति घायल हुए तथा राष्ट्रीय औसत दर 0.5 रही. इस अपराध की दर गुजरात में 1.6, बिहार में 1.5, उड़ीसा में 1.3, केरल में 1.0, मध्य प्रदेश में 0.8 रही जो कि राष्ट्रीय दर से काफी अधिक है.
4.  दलित महिलाओं के शील भंग के प्रयास का अपराध: उपरोक्त अवधि में पूरे देश में दलित महिलाओं के शील भंग के प्रयास के 3,172 अपराध तथा राष्ट्रीय अपराध दर 1.6 रही. इस अपराध की दर मध्य प्रदेश में 6.0, आन्ध्र प्रदेश में 3.6, महारष्ट्र में 2.7,  हरियाणा में 2.0 तथा गुजरात में 1.8 रही जो कि राष्ट्रीय औसत दर 1.6 से काफी अधिक है.
5. शील भंग: इस अपराध के अंतर्गत 2016 में कुल 1,268 अपराध हुए तथा राष्ट्रीय दर 0.6 रही. इस अपराध की दर मध्य प्रदेश में 3.6, छत्तीसगढ़ में 1.1, महाराष्ट्र में 1.3, राजस्थान में 0.8, हरियाणा में 0.7 तथा  गुजरात में 0.6 रही जो कि राष्ट्रीय दर 0.6 से काफी अधिक है.
6. बलात्कार : इस अपराध के अंतर्गत पूरे देश में 2,536 मामले हुए जिनमें 2,540 दलित महिलाएं बलात्कार का शिकार हुयीं तथा अपराध की राष्ट्रीय दर 1.3 रही. इस अपराध की दर केरल में 4.7, मध्य प्रदेश में 3.9, छत्तीसगढ़ में 2.9, राजस्थान में 2.7, हरियाणा में 1.9, गुजरात तथा महाराष्ट्र में 1.7 रही जो कि राष्ट्रीय दर 1.3 से बहुत अधिक है. इससे स्पष्ट है कि अधिकतर भाजपा शासित राज्यों में दलित महिलाएं असुरक्षित हैं. वास्तव में दलित महिलायों पर बलात्कार को दलितों का मनोबल  गिराने के लिए हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है.
7. अनुसूचित जाति/जन जाति अत्याचार निवारण एक्ट के अंतर्गत अपराध: इस श्रेणी के अंतर्गत पूरे देश में 35,676 अपराध घटित हुए जिनमें 36,855 व्यक्ति पीड़ित हुए तथा अपराध की राष्ट्रीय दर 18.0 प्रति एक लाख व्यक्ति रही. इस अपराध की दर मध्य प्रदेश में 43.4, राजस्थान में 41.1, बिहार में 32.9, गुजरात में 28.4, ओड़िसा में 25.0, केरल में 23.7, उत्तर प्रदेश में 22.6 रही जो कि राष्ट्रीय दर 18.0 से बहुत अधिक है.
  
उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि अधिकतर भाजपा शासित राज्य दलित उत्पीड़न में दूसरे राज्यों से काफी आगे हैं. यह आंकड़े मोदी जी द्वारा दलित उत्पीड़न को ले कर दिखाई गयी हमदर्दी तथा उनके “सब का साथ, सब का विकास” के नारे की भी पोल खोलती है. हाल में कोरगांव में दलितों पर हुआ हमला भी भाजपा की करनी और कथनी के अंतर को बेपर्दा करता है.   

 




बुधवार, 19 जुलाई 2017

मायावती का इस्तीफा: दलित हित में या कुछ और?

मायावती का इस्तीफा: दलित हित में या कुछ और?
-एस.आर.दारापुरी आई.पी.एस. (से.नि.) एवं संयोजक, जन मंच


कल मायावती ने राज्यसभा में दलित मुद्दों पर ब्यान देने के लिए अधिक समय न दिए जाने पर सदन से इस्तीफा दे दिया है जो कि उप राष्ट्रपति जी के विचाराधीन है. मायावती ने बाद में अपने ब्यान में कहा है कि उसे सदन में दलित उत्पीड़न खास करके सहारनपुर दलित उत्पीड़न काण्ड पर पूरा नहीं बोलने दिया गया जिससे दुखी होकर उसने इस्तीफा दिया है. मायावती के इस तरह नाटकीय ढंग से इस्तीफे देने के कई निहितार्थ हैं जिन पर विस्तार से चर्चा करने तथा यह देखने की ज़रुरत है कि मायावती ने क्या वास्तव में दलित हित में इस्तीफा दिया है या उसके पीछे कोई दूसरे कारण हैं.
यह तथ्य उल्लेखनीय है कि मायावती की राज्य सभा की सदस्यता 9 माह बाद वैसे ही समाप्त हो रही है और उसके दोबारा चुने जाने की कोई सम्भावना नहीं है क्योंकि वर्तमान में उसकी पार्टी का कोई भी सदस्य लोक सभा में नहीं है और उत्तर प्रदेश विधान सभा में उसके केवल 19 सदस्य हैं जो कि राज्य सभा का सदस्य चुनने के लिए काफी नहीं है. इससे ऐसा प्रतीत होता है कि मायावती ने केवल दलित वोटरों को प्रभावित करने के लिए दलित मुद्दों का बहाना बना कर इस्तीफा दिया है. वह भली प्रकार जानती है कि दलित हितों की उपेक्षा के कारण उसका दलित वोट बैंक बुरी तरह से खिसक चुका है जैसा कि 2012 से ले कर 2017 तक के चुनाव परिणामों से स्पष्ट है. अतः मायावती का इस नाटकीय ढंग से इस्तीफा देना उसकी हताशा का भी प्रतीक है. 
अब सबसे पहले यह देखना ज़रूरी है कि क्या मायावती दलित उत्पीड़न या दलित हितों के प्रति इतनी संवेदनशील रही है जैसा कि वह इस समय दिखाने की कोशिश कर रही है. आइए सबसे पहले मायावती के मुख्य मंत्री के तौर पर दलित उत्पीड़न के प्रति संवेदनशीलता को ही देखें. क्या यह एक चिंताजनक एतहासिक परिघटना नहीं है मायावती ने दलित उत्पीड़न से सम्बंधित एस.सी/एस.टी एक्ट को लागू करने पर 2001 में रोक लगा दी थी जो कि 2002 में इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा रद्द होने पर ही रुक सकी. क्या कोई ऐसी रोक लगाने की उम्मीद किसी दलित मुख्य मंत्री से कर सकता है? परन्तु मायावती ने ऐसा किया. इस रोक का दलितों को बहुत भारी खामियाजा भुगतना पड़ा. इससे एक तो दलित उत्पीड़न के मामले इस एक्ट के अंतर्गत दर्ज नहीं हो सके और दूसरे दलितों को इस एक्ट के अंतर्गत मिलने वाला मुयाव्ज़ा नहीं मिल सका. इस प्रकार मायावती के इस कुकृत्य से दलितों को  दोहरी मार का  शिकार होना पड़ा.
इसके अतिरिक्त अपने मुख्य मंत्री काल में मायावती अपराध के आंकड़े कम रहने पर बहुत जोर देती थी और उनके बढ़ जाने पर अधिकारियों को सस्पेंड अथवा स्थानांतरित कर देती थी. इसका खामियाजा भी दलितों को ही भुगतना पढ़ा क्योंकि अपराध के आंकड़े कम रखने के लिए पुलिस दलितों के अपराध की प्रथम सूचना ही दर्ज नहीं करती थी. इसके इलावा मायावती की बदनामी बचाने के लिए बसपा कार्यकर्त्ता भी अपराध दर्ज न करने पर जोर देते थे. एक अध्ययन के अनुसार 2007 में समाचार पत्रों से उपलब्ध सूचना के अनुसार उस वर्ष दलित उत्पीड़न के 60% अपराध दर्ज ही नहीं किये गए थे. इससे आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि मुख्य मंत्री के तौर पर मायावती दलित उत्पीड़न के प्रति कितनी संवेदनशील रही है.
अब अगर पिछले कुछ वर्षों में दलित उत्पीड़न के कुछ बड़े मामलों को देखा जाये तो पाया जायेगा कि इन मामलों में मायावती की प्रतिक्रिया बहुत मामूली सी ही रही है. हैदराबाद में रोहित वेमुला की संस्थागत हत्या को लेकर मायावती हैदराबाद नहीं गयी और उसने केवल राज्य सभा में उसके बारे में ब्यान देकर रस्मादयगी कर दी. इसी तरह ऊना दलित उत्पीड़न के मामले में वह वहां पर गयी तो सही परन्तु उसकी प्रतिक्रिया बहुत हलकी फुलकी रही. सहारनपुर के दलित उत्पीड़न के मामले में वह घटना के 18 दिन बाद 23 मई को शब्बीरपुर गयी जब उसे 21 मई को जन्तर मंतर पर भीम सेना के पक्ष में उमड़ी भीड़ से लगा कि उसका वोट बैंक और खिसक गया है. वहां पर भी मायावती केवल समरसता बनाये रखने का उपदेश दे कर चली आई. इतना ही नहीं उसने लखनऊ आ कर सहारनपुर के दलितों को न्याय दिलाने के लिए लड़ने वाली भीम सेना के विरोध में ब्यान दिया और उसे भाजपा की उपज कहा. इतना ही नहीं उसने भीम आर्मी पर बसपा के नाम पर चंदा इकठ्ठा करने का आरोप भी लगाया. इससे भी आप मायावाती के दलित प्रेम का अंदाज़ा लगा सकते हैं.
मायावती के चार बार के मुख्य मंत्री काल के उसके दलित प्रेम के कुछ उदहारण निचे दिए जा रहे हैं:
* मायावती भी तो आर्थिक आधार पर आरक्षण देने की वकालत करती रही है जिस से दलितों और पिछड़ों के जाति आधारित आरक्षण पर उँगलियाँ उठती रही हैं.
*  मायावती भी पिछड़ी जातियों को अनुसूचित जातियों की सूची में शामिल करने की वकालत करती रही है. उसने भी इस सम्बन्ध में विधान सभा से बिल पारित करा कर केंद्र सरकार को भेजा था. यह अलग बात है कि केंद्र सरकार ने उसे रद्द कर दिया था.
* मायावती ने पांच साल (2007-12) में मुख्य मंत्री रहते हुए अनुसूचित जातियों के पदोन्नति में आरक्षण की बहाली हेतु इलाहबाद हाई कोर्ट में वांछित आंकड़े प्रस्तुत नहीं किये और कोर्ट में मामले की उचित पैरवी नहीं की जिस के फलस्वरूप हजारों दलित अधिकारियों को पदावनत होना पड़ा. इस त्रासदी के लिए मायावती पूर्णतया उत्तरदायी है.
* मायावती ने ही कांशी राम जी के प्रयासों से बनायीं गयी फिल्म "तीसरी आज़ादी" तथा रामास्वामी नायकर द्वारा लिखी पुस्तक "सच्ची रामायण" को प्रतिबंधित कर दिया था जो आज तक जारी है.
* मायावती ने ही स्पोर्ट्स कालेज में दलितों के आरक्षण का कुछ सवर्णों द्वारा विरोध करने पर उसे रद्द कर दिया था.
*  मायावती ने ही सरकारी विद्यालयों में कुछ विद्यार्थियों द्वारा कुछ दलित रसोईयों द्वारा बनाये गए मध्यान्ह भोजन का बहिष्कार करने पर दोषियों को दण्डित करने की बजाये दलित रसोईयों की नियुक्ति सम्बन्धी आदेश को ही रद्द कर दिया था जो कि सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अवहेलना थी. इससे विद्यालयों में दलित रसोईयों की नियुक्तियां बंद हो गयीं और सरकारी सकूलों में छुआछूत को बढ़ावा मिला.
*  मायावती ने ही दलितों के आवास की भूमि को उनके पक्ष में नियमित किये जाने के आदेश का सवर्णों द्वारा विरोध करने पर यह कह कर रद्द कर दिया था कि सम्बंधित दलित अधिकारी ने उससे धोखे से दस्तखत करवा लिए थे।
*  मायावती ने ही 2007 में उत्तर प्रदेश में आंबेडकर महासभा को कार्यालय हेतु 1991 में आंबेडकर रोड, लखनऊ पर आवंटित सरकारी भवन का आवंटन रद्द करके उसे अपने मंत्री को आवास हेतु आवंटित कर दिया था जिस के विरुद्ध आंबेडकर महासभा को इलाहबाद हाई कोर्ट, लखनऊ में जनहित याचिका दायर करके स्टे लेना पड़ा था. इस प्रकार उसने उत्तर प्रदेश में दलितों की एक मात्र संस्था को ही ख़त्म करने की कोशिश की.
* मायावती ने 1995 के मुख्य मंत्री काल के छोटे समय को छोड़ कर शेष समय में भूमिहीन दलितों को कोई भी भूमि आबंटन नहीं किया जबकि उस दौरान प्रदेश में पर्याप्त मात्रा में आबंटन हेतु भूमि उपलब्ध थी. इसके दुष्परिणाम स्वरूप आज भी अधिकतर दलित भूमिहीन हैं और शोषण और सामंतों के अत्याचार का शिकार हो रहे हैं.  
*  मायावती ने ही 2008 में लागू हुए वनाधिकार कानून के अंतर्गत वनवासियों और आदिवासियों को भूमि का मालिकाना अधिकार देने की बजाए उनके 81% दावों को रद्द कर दिया था जिस कारण उन्हें अपने कब्ज़े की ज़मीन का मालिकाना हक नहीं मिल सका। विवश हो कर आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट को इलाहाबाद हाई कोर्ट में जनहित याचिका दाखिल कर आदेश प्राप्त करना पड़ा था.
*  मायावती ने ही उत्तर प्रदेश के 2% आदिवासियों के लिए विधान सभा की दो सीटें आरक्षित करने संबंधी बिल का विरोध किया था जिस कारण उन्हें 2012 के विधान सभा चुनाव में कोई भी सीट नहीं मिल सकी थी. अब आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट की सुप्रीम कोर्ट में पैरवी के कारण  इस चुनाव में उनके लिए दो सीटें आरक्षित हो सकी हैं.
उपरोक्त दिए गए कुछ तथ्यों से स्पष्ट है कि मायवती ने अपने चार बार के मुख्य मंत्री काल में दलित उत्पीड़न और दलित हितों की घोर उपेक्षा की जिससे कुछ दलितों का भावनात्मक तुष्टिकरण तो हुआ परन्तु उनकी सामाजिक और आर्थिक स्थिति में कोई सुधार नहीं हो सका. इसके विपरीत मायावती के व्यक्तिगत भ्रष्टाचार के कारण दलित सरकारी कल्याणकारी योजनाओं के लाभ से भी केवल आंशिक तौर पर ही लाभावित हो सके. इसी का दुष्परिणाम है कि आज उत्तर प्रदेश के दलित सरकारी आंकड़ों के अनुसार विकास के मापदंडों पर बिहार, ओड़िसा और मध्य प्रदेश के दलितों को छोड़ कर शेष सभी राज्यों के दलितों से पिछड़े हुए हैं.
अब नाटकीय ढंग से इस्तीफा दे कर मायावती दलित हितैषी होने का जो स्वांग कर रही है उसे सभी दलित बहुत अच्छी तरह से समझ रहे हैं. मायावती के दलित उपेक्षा के पूर्व आचरण को देख कर अब वे उसके झांसे में आने वाले नहीं हैं. अब दलित जाति की राजनीति से बाहर निकल कर अपने सम्मान, भूमि, रोज़गार, शिक्षा, स्वास्थ्य और उत्पीड़न से मुक्ति की लड़ाई सड़क पर स्वयम लड़ने के लिए आगे आ रहे हैं. इसकी शुरुआत उत्तर प्रदेश, पंजाब, राजस्थान और गुजरात से हो चुकी है. उत्तर प्रदेश में भी पूर्वांचल के दलित स्वराज अभियान के बैनर तले वनाधिकार के अंतर्गत भूमि संघर्ष के लिए लामबंद हो चुके हैं. अब यह तय है कि दलितों के नाम पर जातिवादी, अवसरवादी, व्यक्तिवादी, स्वार्थपरता और भ्रष्टाचार की राजनीति के दोबारा पनपने की कोई उम्मीद नहीं है. दलित अब पूरी तरह से समझ रहे हैं कि मायावती का इस्तीफा किसी भी तरह से दलित हित में नहीं बल्कि दलितों को पुनः अपने मायाजाल में फंसाने का प्रयास मात्र है.   


गुरुवार, 1 सितंबर 2016

दलित उत्पीड़न में भाजपा शासित राज्य काफी आगे



दलित उत्पीड़न में भाजपा शासित राज्य काफी आगे
-एस.आर. दारापुरी, भूतपूर्व पुलिस महानिरीक्षक एवं राष्ट्रीय प्रवक्ता, आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट
राष्ट्रीय अपराध अनुसन्धान ब्यूरो (एनसीआरबी) द्वारा हाल में जारी की गयी क्राईम इन इंडिया– 2015 रिपोर्ट से एक बात पुनः उभर कर आई है कि भाजपा शासित राज्य दलित उत्पीड़न के मामले में देश के अन्य राज्यों से काफी आगे हैं. लगभग यही स्थिति वर्ष 2014 में भी थी. वर्तमान में भाजपा शासित राज्य गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, हरियाणा, छत्तीसगढ़, गोवा और हिमाचल प्रदेश हैं. इनके इलावा कुछ अन्य राज्य जैसे उड़ीसा, आन्ध्र प्रदेश, तेलन्गाना, उत्तर प्रदेश और बिहार हैं जिन में दलित उत्पीड़न के मामले राष्ट्रीय दर (प्रति एक लाख दलित आबादी पर) से ज्यादा हैं. भाजपा शासित राज्यों व् अन्य  राज्यों में दलितों पर उपरोक्त रिपोर्ट के अनुसार घटित अपराधों की स्थिति निम्न प्रकार है:-
दलितों पर 2015 में कुल घटित अपराध: इस वर्ष में यह संख्या 45,003 है जो कि यद्यपि वर्ष 2014 की संख्या 47,064 से कम है परन्तु 2013 की संख्या 39,408 से लगभग 5,500 अधिक है. इसी प्रकार 2015 में प्रति एक लाख दलित आबादी पर घटित अपराध की राष्ट्रीय दर 22.3 है जो कि यद्यपि 2014 की 23.4 से कम है परन्तु  2013 की 19.6 से 2.7 अधिक है. इस से स्पष्ट है कि यद्यपि 2015 में कुल घटित अपराध में पिछले वर्ष की अपेक्षा कुछ कमी आई है परन्तु यह 2013 की अपेक्षा काफी बढ़ा है. यह वृद्धि अधिकतर भाजपा शासित राज्यों में अपराध में बढ़ोतरी के कारण ही है.
दलितों पर वर्ष 2015 में घटित अपराधों में से उत्तर प्रदेश- 8,358, राजस्थान- 6,998, बिहार- 6,438,  आंध्र प्रदेश- 4,415, मध्य प्रदेश- 4,188, उड़ीसा- 2,305, महाराष्ट्र- 1,816, तमिलनाडु– 1,782, गुजरात- 1,046, छत्तीसगढ़- 1,028 तथा झारखण्ड- 752 अपराध घटित हुए हैं. इसी प्रकार 22.3 की राष्ट्रीय दर के विपरीत राजस्थान- 57.2, आन्ध्र प्रदेश- 52.3, गोवा- 51.1, बिहार- 38.9, मध्य प्रदेश- 36.9, उड़ीसा- 32.1,छत्तीसगढ़- 31.4, तेलन्गाना-30.9, गुजरात- 25.7, केरल- 24.7, उत्तर प्रदेश- 20.2 रही है. इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि भाजपा शासित राज्य राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात, छत्तीसगढ़, गोवा तथा अन्य राज्य जैसे आन्ध्र प्रदेश, बिहार, उड़ीसा, तेलन्गाना, केरल, उत्तर प्रदेश में दलितोंपर घटित अपराध की दर राष्ट्रिय दर से काफी अधिक है.  
 हत्या: 2015 में दलितों की हत्या के 707 अपराध हुए थे और राष्ट्रीय औसत 0.4 थी. इन में से मध्य प्रदेश-80, राजस्थान- 71, बिहार- 78, महाराष्ट्र- 42, उड़ीसा- 21, गुजरात- 17, तमिलनाडु- 48, तेलन्गाना -17, हरियाणा- 22, आन्ध्र प्रदेश- 23 तथा उत्तर प्रदेश- 204 थे. हत्या के अपराध की राष्ट्रीय औसत दर 0.4 थी  परन्तु भाजपा शासित राज्य मध्य प्रदेश (0.7), राजस्थान (0.6), झारखण्ड (0.5), बिहार (0.5), उत्तर प्रदेश (0.5), हरियाणा (0.4) और गुजरात में (0.4) थी. इन आकड़ों से स्पष्ट है कि भाजपा शासित राज्यों मध्य प्रदेश, राजस्थान में दलित हत्यायों की दर राष्ट्रीय दर से काफी अधिक रही है.
बलात्कार: वर्ष 2015 में दलित महिलायों के बलात्कार के राष्ट्रीय स्तर पर कुल मामले 2,326 थे तथा राष्ट्रीय दर 1.2 थी. इन में से मध्य प्रदेश (460), उत्तर प्रदेश (444), राजस्थान (318), महाराष्ट्र (238), उड़ीसा (129), हरियाणा (107), तेलन्गाना (107), आन्ध्र प्रदेश (104), केरल (99) छत्तीसगढ़ (81), गुजरात (65), तमिलनाडु (43) और बिहार (42) में रहे. इसी प्रकार बलात्कार की राष्ट्रीय दर 1.2 थी जबकि इसके मुकाबले में मध्य प्रदेश (4.1), केरल (3.3), राजस्थान (2.6), छत्तीसगढ़ (2.5), हरियाणा (2.1), तेलन्गाना (2.0), महाराष्ट्र (1.8), उड़ीसा (1.8), गुजरात (1.6) और आन्ध्र प्रदेश (1.2) रही. इन आंकड़ों से भी स्पष्ट है कि दलित महिलाओं पर बलात्कार के मामले में मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, हरियाणा, महाराष्ट्र और गुजरात में अपराध दर राष्ट्रीय दर से काफी अधिक रही है.
दलित महिलाओं पर शील भंग के लिए हमला:  वर्ष 2015 में राष्ट्रीय स्तर पर इस शीर्षक के अंतर्गत कुल 2,800 अपराध घटित हुए तथा राष्ट्रीय दर 1.4 रही. इन में से मध्य प्रदेश- 777, उत्तर प्रदेश- 756, महाराष्ट्र- 353, आन्ध्र प्रदेश- 153, उड़ीसा- 155, हरियाणा- 109, राजस्थान- 107, कर्नटका- 60 और गुजरात- 51 थे.  इस प्रकार के अपराध की राष्ट्रीय दर 1.4 थी जबकि यह मध्य प्रदेश- 6.9, महाराष्ट्र- 2.7, हरियाणा- 2.1, केरल- 2.2, उड़ीसा- 2.2, आन्ध्र प्रदेश एवं तेलन्गाना- 1.8, उत्तर प्रदेश -1.8 रही. इन आंकड़ों से भी स्पष्ट है भाजपा शासित राज्यों मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, हरियाणा में दलितों महिलायों पर शीलभंग के लिए हमले के अपराध की दर राष्ट्रीय दर से काफी ऊँची रही है.
दलित महिलायों का अपहरण: वर्ष 2015 में इस प्रकार के कुल 687 अपराध हुए तथा राष्ट्रीय दर 0.3 रही. इस प्रकृति के अपराध उत्तर प्रदेश- 415, राजस्थान- 62, मध्य प्रदेश- 43, गुजरात- 37, महाराष्ट्र- 34, हरियाणा-29, उड़ीसा- 22 और आन्ध्र प्रदेश- 10 थे. इसकी राज्यवार दर उत्तर प्रदेश- 1.0, गुजरात- 0.9, राजस्थान- 0.5, मध्य प्रदेश- 0.4, महाराष्ट्र और उड़ीसा- 0.3 रही. इस विश्लेषण से भी स्पष्ट है कि इस अपराध में भी उत्तर प्रदेश, गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश की दर राष्ट्रीय दर से काफी ऊपर रही.
दलित महिलायों का विवाह के लिए अपहरण: वर्ष 2015 में पूरे देश में इस प्रकार के 455 प्रकरण हुए तथा राष्ट्रीय दर 0.2 रही. इनमे उत्तर प्रदेश- 338, राजस्थान- 28, गुजरात- 20, मध्य प्रदेश- 18, महाराष्ट्र- 18 तथा मध्य प्रदेश- 18 घटित हुए.  इसकी राज्यवार दर उत्तर प्रदेश- 0.8, गुजरात- 0.5, मध्य प्रदेश और राजस्थान- 0.2  रही. इससे से भी स्पष्ट है इस अपराध में भी उत्तर प्रदेश के बाद राजस्थान, गुजरात और राजस्थान की दर राष्ट्रीय दर से ऊँची रही.
आगजनी: वर्ष 2015 में आगजनी के कुल 179 मामले हुए तथा राष्ट्रीय दर 0.1 रही. इसमें से छत्तीसगढ़- 43, उत्तर प्रदेश- 30, मध्य प्रदेश- 21, राजस्थान- 21, तमिलनाडु- 14, उड़ीसा- 15 तथा महाराष्ट्र- 11 में अपराध घटित हुए.  दर की दृष्टि से छत्तीसगढ़- 0.3, मध्य प्रदेश- 0.2, राजस्थान- 0.2, गुजरात- 0.2 की दर रही. इस से भी  स्पष्ट है कि छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान और गुजरात में आगजनी के अपराध की दर राष्ट्रीय औसत से अधिक रही.
एससी/एसटी एक्ट के अपराध: इस एक्ट के अंतर्गत वर्ष 2005 में कुल 6,005 अपराध पंजीकृत हुए और राष्ट्रीय दर 3.0 रही. इनमें से मध्य प्रदेश-1, महाराष्ट्र- 290, हिमाचल प्रदेश- 74, गुजरात- 190, छत्तीसगढ़- 0, हरियाणा- 19, उड़ीसा- 1, राजस्थान- 92 तथा तेलन्गाना- 358 पंजीकृत हुए. इस अपराध के अंतर्गत भाजपा शासित राज्यों में कम आंकड़ों का कारण इन राज्यों में इस अपराध का कम होना नहीं बल्कि इस एक्ट का प्रयोग न किया जाना है.
एससी/एसटी एक्ट का प्रयोग न किया जाना: उपरोक्त रिपोर्ट में दिए गए आंकड़ों से यह तथ्य भी उभर कर आया है कि लगभग सभी भाजपा शासित राज्यों में एससी/एसटी एक्ट का प्रयोग नहीं किया जा रहा है जिस कारण दलितों पर अत्याचार के मामले सामान्य कानून के अन्तर्गत दर्ज किये जाते हैं. इससे दलितों को अत्याचार के मामलों में न तो कोई मुयाव्ज़ा मिलता है और न ही दोषियों को कड़ी सजा. इन राज्यों में 6,009 आईपीसी अपराध के मामलों में इस एक्ट का प्रयोग नहीं किया गया है. राज्यवार स्थिति यह है: आन्ध्र प्रदेश -2050, राजस्थान- 1,040, छत्तीसगढ़- 790, मध्य प्रदेश- 638, उड़ीसा- 482, तेलन्गाना- 357, हरियाणा- 322, कर्नाटक- 131. इन आंकड़ों के विश्लेषण से स्पष्ट है कि भाजपा शासित राज्यों राजस्थान, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, हरियाणा के इलावा आन्ध्र प्रदेश, तेलन्गाना, उड़ीसा और कर्नाटक में भी एससी/एसटी एक्ट का प्रयोग नहीं किया जा रहा है जो कि इन राज्यों के दलितों के साथ बहुत बड़ा अन्याय और धोखा है.
अनुसूचित जनजातियों पर अत्याचार: वर्ष 2015 में इस वर्ग पर 10,914 अपराध घटित हुए और अपराध की राष्ट्रीय दर 10.5 रही जो 2014 के कुल अपराध 11, 415 और राष्ट्रीय दर 11.0 से तो कुछ कम है परन्तु 2013 के 6,793 अपराध और राष्ट्रीय दर 6.5 से काफी अधिक है. 2015 के कुल अपराध में से राजस्थान -3,207, मध्य प्रदेश- 1,531, छत्तीसगढ़- 1,518, उड़ीसा- 1,307, आन्ध्र प्रदेश- 719, तेलन्गाना- 698, महारष्ट्र-483, गुजरात- 256 और झारखण्ड में 269 अपराध घटित हुए. इनकी राज्यवार दर राजस्थान- 34.7, आन्ध्र प्रदेश- 27.3, तेलन्गाना- 21.2, छत्तीसगढ़- 19.4 और उड़ीसा- 14.5 है जो कि राष्ट्रीय दर से काफी अधिक है.
उक्त रिपोर्ट के अनुसार 2015 में अनुसूचित जनजातियों पर इस वर्ष कुल 10,914 अपराध घटित हुए तथा अपराध की राष्ट्रीय दर 10.5 रही. इनमें से राजस्थान- 3,207, मध्य प्रदेश- 1,531, छत्तीसगढ़- 1,518, उड़ीसा- 1,387, आन्ध्र प्रदेश- 719, तेलन्गाना- 698 में अपराध घटित हुए. दर की दृष्टि से केरल- 36.3, राजस्थान- 34.7, आन्ध्र प्रदेश- 27.3, तेलन्गाना- 21.2, छत्तीसगढ़- 19.4, उड़ीसा- 14.5, मध्य प्रदेश- 10.0 की दर रही. इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि केरल, उड़ीसा, आन्ध्र प्रदेश तथा तेलन्गाना को छोड़ कर शेष भाजपा शासित राज्यों राजस्थान, छत्तीसगढ़, और मध्य प्रदेश में अपराध की दर राष्ट्रीय दर से काफी ऊँची रही है.
हत्या:  वर्ष 2015 में अनुसूचित जनजाति के विरुद्ध हत्या की 144 अपराध घटित हुए जिन में से मध्य प्रदेश- 50, राजस्थान- 22, उड़ीसा- 14, गुजरात- 13, महाराष्ट्र- 11 में घटित हुए. इससे भी स्पष्ट है इस वर्ग पर भाजपा शासित राज्यों में हत्या के अधिक अपराध हुए.
बलात्कार: उक्त अवधि में पूरे देश में अनुसूचित जनजातियों की महिलाओं पर बलात्कार के 952 अपराध घटित हुए और इसकी राष्ट्रीय दर 0.9 रही. इन में से मध्य प्रदेश- 359, छत्तीसगढ़- 138, महाराष्ट्र- 99, उड़ीसा- 94, राजस्थान- 80, केरल- 47, गुजरात और तेलन्गाना- 44, तथा आन्ध्र प्रदेश- 21 में अपराध हुए. दर की दृष्टि से केरल- 9.7, मध्य प्रदेश- 2.3, छत्तीसगढ़- 1.8, तेलन्गाना- 1.3, उड़ीसा- 1.0, महाराष्ट्र- 0.9 की दर रही. इस विश्लेषण से स्पष्ट है कि केरल को छोड़ कर शेष भाजपा शासित राज्यों में ब्लात्कार की दर राष्ट्रिय दर से काफी अधिक रही है.
महिलायों पर शीलभंग के लिए हमले:  वर्ष 2015 में अनुसूचित जनजातियों पर इस प्रकार के 818 अपराध घटित हुए तथा राष्ट्रीय दर 0.8 रही. इनमें से मध्य प्रदेश- 378, महाराष्ट्र- 146, छत्तीसगढ़- 86, उड़ीसा- 65, तेलन्गाना- 32 तथा आन्ध्र प्रदेश- 29 में अपराध घटित हुए. दर की दृष्टि से केरल- 3.9, मध्य प्रदेश- 2.5, महाराष्ट्र- 1.4, छत्तीसगढ़ और आन्ध्र प्रदेश- 1.1, तेलन्गाना- 1.0 की रही. इन आंकड़ों से भी स्पष्ट है किकेरल को छोड़ कर शेष सभी भाजपा शासित राज्यों में इस वर्ग पर सब से अधिक अपराध घटित हुए हैं.    
एससी/एसटी एक्ट के अंतर्गत अपराध: वर्ष 2015 में पूरे देश में अनुसूचित जनजाति पर अत्याचार के सम्बन्ध में इस एक्ट के अंतर्गत 6,275 अपराध पंजीकृत हुए. इनमें से राजस्थान- 1,409, मध्य प्रदेश- 1,358, उड़ीसा- 691, महाराष्ट्र- 481, तेलन्गाना और कर्नाटक- 386, छत्तीसगढ़- 373, आन्ध्र प्रदेश- 362 और गुजरात- 248, केरल- 165 घटित हुए. दर की दृष्टि से केरल- 34.0, राजस्थान- 15.3, आन्ध्र प्रदेश- 13.8,तेलन्गाना- 11.7, मध्य प्रदेश- 8.9, उड़ीसा- 7.2 की रही. इस विश्लेषण से भी स्पष्ट है कि केरल को छोड़ कर भाजपा शासित राज्य इस अपराध में भी अन्य से आगे हैं.   
एससी/एसटी एक्ट का लागू न किया जाना: वर्ष 2015 के दौरान अनुसूचित जनजाति के विरुद्ध आईपीसी के 4203 मामले रहे हैं जिन में इस एक्ट का प्रयोग ही नहीं किया गया. इनमें से राजस्थान- 1,746, छत्तीसगढ़- 816, उड़ीसा- 696, आन्ध्र प्रदेश- 352, तेलन्गाना- 302 तथा मध्य प्रदेश- 171 में घटित हुए. दर की दृष्टि से राजस्थान- 18.9, आन्ध्र प्रदेश- 13.4, छत्तीसगढ़- 10.4, तेलन्गाना- 9.2, उड़ीसा- 7.3 रही. इन आंकड़ों से भी स्पष्ट है कि आन्ध्र प्रदेश, तेलन्गाना और उड़ीसा को छोड़ कर शेष भाजपा शासित राज्यों में एससी/एसटी एक्ट को लागू न करने की दर काफी ऊँची है.  
दलित उत्पीड़न के मामलों में न्यायालय से सज़ा की दर: वर्ष 2015 के दलित उत्पीड़न के मामलों के न्यायालय द्वारा निस्तारण के अनुसार इस वर्ष में 17,012 मामले निस्तारित किये गए जिन में से केवल 4,702 मामलों में ही सजा हुयी तथा 12,310 मामलों में आरोपी दोष मुक्त हो गए. इस प्रकार सजा होने की दर केवल 27.6 प्रतिशत रही. इसी प्रकार उक्त अवधि में न्यायालय द्वारा अनुसूचित जनजाति के 4,894 मामले निस्तारित किये गए जिन में से केवल 1,349 मामलों में सजा हुयी और 3,545 मामलों में आरोपी रिहा हो गए. इस मामले में भी सजा की दर केवल 27.6 ही रही. इन आंकड़ों से यह स्पष्ट हो जाता है कि अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति को उत्पीड़न के मामलों में न्याय दिलाने के लिए सरकारों की क्या प्रतिबद्धता है?
वर्ष 2015 के अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति पर अत्याचार के मामलों के आंकड़ों के विश्लेषण से यह स्पष्ट है कि भाजपा शासित राज्यों गुजरात, महारष्ट्र, राजस्थान, छत्तीसगढ़, हरियाणा में इन वर्गों पर अत्याचार के मामले आन्ध्र प्रदेश, उड़ीसा, तेलन्गाना, कर्नाटक को छोड़ कर बहुत अधिक हैं. इन राज्यों में न तो एससी/एसटी एक्ट का इस्तेमाल किया जा रहा है और न ही दोषियों को सजा दिलाने के लिए प्रभावी कार्रवाही  की जा रही है. इन राज्यों में 2013 के मुकाबले में अत्याचार के मामलों में बहुत वृद्धि हुयी है. यह भी सर्वविदित है कि सरकारी आंकड़ों में दिखाया गया अपराध वास्तविक आंकड़ों का एक छोटा हिस्सा होता है. कुल घटित अपराध तो इससे कहीं अधिक होता है. मोदी सरकार ने एक तरफ तो एससी/एसटी एक्ट में संशोधन करने का दिखावा किया है वहीँ दूसरी ओर इस एक्ट को भाजपा शासित तथा कुछ अन्य राज्यों में लागू ही नहीं किया जा रहा है. गुजरात का दलित आक्रोश इसी की परिणति है. ऐसी परिस्थिति में दलितों को इस सम्बन्ध में गंभीरता से मनन करना चाहिए और दलित नेताओं और भाजपा शासित तथा अन्य राज्यों की सरकारों के विरुद्ध एससी/एसटी एक्ट को सख्ती से लागू करने के लिए जनांदोलन करना चाहिए.     

श्रमिक कल्याण में डॉ. अंबेडकर की ऐतिहासिक भूमिका

श्रमिक कल्याण में डॉ. अंबेडकर की ऐतिहासिक भूमिका एस.आर. दारापुरी , राष्ट्रीय अध्यक्ष , अखिल भारतीय पीपुल्स फ्रंट (आज 1 मई को अंतर्राष्...