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बुधवार, 21 जून 2023

डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर का श्रीलंका में बौद्धों की प्रथम विश्व फैलोशिप (WFB) सम्मेलन 1950 में दिया गया भाषण

 

डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर का श्रीलंका में बौद्धों की प्रथम विश्व फैलोशिप (WFB) सम्मेलन 1950 में दिया गया भाषण

(मूल अंग्रेजी से हिन्दी अनुवाद: एस आर दारापुरी आईपीएस (से. नि.)

 मैं एक इच्छुक पर्यवेक्षक हूं, प्रतिनिधि नहीं। मैं यहां कुछ बहुत ही गंभीर उद्देश्यों के साथ आया हूं। आप शायद जानते हैं कि भारत में ऐसे लोग हैं जिन्होंने सोचा था कि वह समय आ गया है जब भारत में बौद्ध धर्म को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया जा सकता है। मैं उनमें से एक हूं। मेरी यात्रा का निश्चित उद्देश्य सबसे पहले बौद्ध अनुष्ठानों को देखना है। संस्कार धर्म का अभिन्न अंग है। तर्कवादी चाहे जो कहें, धर्म में संस्कार बहुत जरूरी चीज है यहां आकर, मैंने सोचा कि मैं उस अनुष्ठान को देख पाऊंगा जो बौद्ध धर्म का अभिन्न अंग था।

दूसरे, मैं यह जानना चाहता हूं कि बुद्ध का धर्म किस हद तक अपनी प्राचीन शुद्धता में मनाया जाता है और किस हद तक उनका सुसमाचार बौद्ध धर्म और बुद्ध के सिद्धांतों के साथ साथ असंगत विश्वासों और अंधविश्वास से भरा हुआ है

मेरा तीसरा उद्देश्य यह पता लगाना है कि बुद्ध द्वारा स्थापित भिक्षु संघ किस हद तक समुदाय की सेवा कर रहा है और क्या वह केवल अपने लिए तथाकथित "जीवन की पवित्रता" में ही लगा हुआ है, या क्या यह है लोकधर्मियों की सेवा करने, सलाह देने और बुद्ध की इच्छा के अनुसार उसे पूर्ण बनाने में लगे हुए हैं।

मुझे यह जानने में दिलचस्पी है कि बुद्ध का धर्म किस हद तक एक जीवित शक्ति है या क्या यह कुछ ऐसा है जो इस तथ्य के कारण मौजूद है कि इस देश के लोग शब्द के पारंपरिक अर्थों में बौद्ध हैं और उन्हें यह विरासत में मिला है। बस इसे एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में पारित कर दिया, चाहे जहां तक गिनती का संबंध है, वहां धर्म की गतिशीलता थी। यह पता लगाने का सबसे अच्छा तरीका है कि धर्म स्थिर है या इसकी गति है और यह गतिशील है कि देश की युवा पीढ़ी द्वारा प्रदर्शित रुचि का अध्ययन और निरीक्षण करें कि उन्होंने अपना समय किस हद तक धर्म के लिए समर्पित किया, किस हद तक उनका धर्म में विश्वास है। धर्म उन्हें मुक्ति दे रहा है (मृत्यु के बाद मुक्ति के धार्मिक अर्थ में नहीं, बल्कि संसार के जीवन में)। बौद्ध देशों को केवल भाईचारा ही नहीं रखना चाहिए, बल्कि धर्म का प्रचार करना चाहिए और बलिदान करना चाहिए। केवल भिक्षुओं को बुद्ध के संदेश पर व्याख्यान देने के लिए भेजने से लोग उनके जीवन के तरीके को स्वीकार नहीं कर लेते।

यदि विश्व की शांति सुनिश्चित करनी है, तो यह केवल व्याख्यान देना नहीं है। जो लोग इस मार्ग की अच्छाइयों में विश्वास नहीं करते हैं उन्हें इसे स्वीकार करने के लिए राजी किया जाना चाहिए, और यह स्पष्ट है कि जिन देशों में बौद्ध धर्म मौजूद है, उन्हें त्याग करना चाहिए, मिशन स्थापित करना चाहिए और धन प्राप्त करना चाहिए, ताकि वे न केवल सुसमाचार का प्रसार करना, लेकिन पुरुषों और महिलाओं को अष्ठाँगिक मार्ग में परिवर्तित करना।

(पृष्ठ 102 - 103, WFB सम्मेलन 1950 की रिपोर्ट)

 

पहले WFB सम्मेलन ने भारत में बौद्ध धर्म के पुनरुद्धार के लिए प्रस्ताव संo 15 पारित किया:

इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि वर्तमान बौद्ध धर्म की उत्पत्ति की भूमि में उसके पुनरुद्धार के लिए सबसे अनुकूल क्षण है, यह सम्मेलन विभिन्न बौद्ध देशों से भारत के विभिन्न हिस्सों में केंद्र शुरू करने के लिए भारत में मिशन भेजने के लिए सबसे उत्कट अपील करता है। देश और कलकत्ता में एक अंतर्राष्ट्रीय बौद्ध संस्थान शुरू करने के लिए मिशनरियों को प्रशिक्षण देने के लिए जिसका केंद्र बारह साल पहले बौद्ध धर्माकुर सभा द्वारा शुरू किए गए नालंदा विद्याभवन में रखा जा चुका है।

गुरुवार, 26 सितंबर 2013

श्रीलंका की स्थिति : रामायण की प्रमाणिकता को चुनौती

श्रीलंका की स्थिति : रामायण की प्रमाणिकता को चुनौती
अंग्रेजी में मूल लेखक: भगवान दास 
अनुवादक: एस आर. दारापुरी

अधिकतर इतिहासकार रामायण को एक काल्पनिक कृति मानते हैं. फिर भी बहुत पढ़े लिखे, अनपढ़ और अज्ञानी हिन्दू इसे इतिहास की पुस्तक मानते हैं जो कि यह बिलकुल नहीं है. भारत में रामायण के पांच रूपांतर प्रचलित हैं और वे सभी श्लोकों और कांडों की संख्या एवं वृतांत में भिन्न भिन्न हैं. अयोध्या के उत्तर प्रदेश में स्थित होने का विश्वास किया जाता है. अयोध्या में पुरातत्व विभाग द्वारा की गयी खुदाई में ऐसा कुछ भी नहीं मिला है जिस का राम या रामायण से दूर दूर तक का कोई सम्बन्ध हो. खोज करने वालों को बौद्धों से जुडी कुछ वस्तुएं तो ज़रूर मिलीं थीं. उन्नीसवी सदी से रावण की राजधानी श्रीलंका की स्थिति के बारे में वाद विवाद चल रहा है. हिन्दू मानते हैं कि आज की श्रीलंका रावण की राजधानी थी जिस पर राम ने हमला किया था. श्रीलंका के विदवान खास करके बौद्ध विद्वान् इस पर बिलकुल  विश्वास नहीं करते क्योंकि उनके इतिहास में हिन्दुओं के विशवास और ब्राह्मणों विद्वानों के बार बार किये गए दावों को सिद्ध करने के लिए कुछ भी नहीं है. इतिहास और पुरातत्व अन्वेषी भी ब्राह्मण विद्वानों के दावों को झुठलाते हैं. एक विद्वान्  जिस ने कर्नाटक में बीसवीं सदी के प्रारंभ में अन्वेषण किये थे के अनुसार ऐसे कोई भी प्रमाण नहीं हैं जिन से यह कहा जा सके कि राम नर्मदा नदी के उस पार कभी गए भी थे. अन्वेषक विद्वानों के अनुसार लंका विन्ध्याचल या उड़ीसा के बीच कहीं स्थित रही है.
प्रसिद्ध अन्वेषक विदवान डॉ. एच डी सांकलिया के अनुसार लंका कन्या कुमारी के उस पार न हो कर उड़ीसा में कहीं स्थित थी. 8 मार्च, 1980 को भंज नगर ( उड़ीसा) में उड़ीसा इतिहास कांग्रेसके अधिवेशन में विद्वानों और इतिहासकारों ने लंका के उड़ीसा में स्थित होने के प्रश्न पर विचार विमर्श किया था. प्रो. आर पी दास ने डॉ. सांकलिया के निष्कर्षों के सन्दर्भ में कहा था कि रामायण का लेखन पांचवी सदी ईसा पूर्व से पहले का नहीं है. सांकलिया का निष्कर्ष था रामायण के लेखक या लेखकों ने कभी दक्षिण भारत या लंका (श्रीलंका) को नहीं देखा था और उन्होंने काल्पनिक शहर बनाये थे. डॉ. नवीन कुमार साहू, एक प्रसिद्ध विदवान और संबलपुर विश्वविद्याल्याके कुलपति ने दावा किया कि रामायण में कहीं भी श्रीलंका (लंका) के द्वीप को सही रूप से चिन्हित नहीं किया गया है. इस द्वीप का नाम तो मुश्किल से 500 वर्ष पूर्व जब यह चोला राजाओं के अधीन आया लंकारखा गया था. डॉ. साहू ने यह भी इंगित किया कि  एतिहासिक अभिलेखों और यात्रा वृतांतों (चीनी यात्री ह्युन्सांग जो इस द्वीप पर आया था) में कहीं भी लंका का नाम अंकित नहीं है. तब इसे सिंहल द्वीप कहा जाता था. सभी इतिहासकार सहमत हैं कि वाल्मीकि को चाहे वह ब्राह्मण या अस्पृश्य (अछूत) रहा हो, नर्मदा के परे दक्षिण भारत के भूगोल, फूल व पेड़ पौदों के बारे में बहुत कम जानकारी थी.
लंका का ब्राह्मण विद्वानों की गालियों और निंदा का निशाना बनने का एक कारण भारत में बौद्ध धम्म का लोप हो जाने पर भी बौद्ध धम्म का मज़बूत गढ़ बना रहना था. ब्राह्मणवाद और चातुरवर्ण के रक्षक राम को देवता बनाने, अवतारवाद को लोकप्रिय बनाने और उसकी मानवीय कमियों को छुपाने के लिए रामायण में बहुत से शलोक क्षेपक के रूप में जोड़ दिए गए हैं. रामायण के एक शलोक में बुद्ध की तुलना एक चोर से की गयी है जिस की बात नहीं सुननी चाहिए क्योंकि वह वेदों में विश्वास नहीं करते.
जर्मन विद्वान् जाकोबी जिस ने रामायण का गहन अध्ययन किया था से लेकर फादर कामिल बुल्के जिन का शोध ग्रन्थ रामकथाजो इस विषय के सभी ग्रंथों में अगरगणी है, कोई भी यह सिद्ध नहीं करता कि रामायण एक एतहासिक पुस्तक है. फिर भी यह विवाद बना रहेगा क्योंकि यह कहानी दूर दूर तक पहुँच चुकी है. बेशक भारत को छोड़ कर किसी भी देश में राम को देवता नहीं माना जाता जिसे इस दुनिया में ब्राह्मणों के चातुरवर्ण को बचाने और रामायण को एक धार्मिक ग्रन्थ के रूप में मनवाने के लिए भेजा गया था.  
नोट: पिछले कुछ समय से राम सेतु को लेकर उठाये गए विवाद की सत्यता भी रामायण की प्रमाणिकता से ही आंकी जा सकती है. श्रीलंका का पूर्व नाम सिंहल द्वीप था जिसे चोला राजा ने बदल कर श्रीलंका रखा था. मध्य प्रदेश में आज भी कोरकू जनजाति के लोग हैं जो अपने आप को रावण और मेघनाथ के वंशज होने का दावा करते हैं और त्योहार मना कर उनकी पूजा करते हैं. आप इस सम्बन्ध में मध्य प्रदेश के कोरकू आदिवासियों के इस दावे को YouTube के इस लिंक http://www.youtube.com/watch?v=7j4pOCXfi14 पर सुन भी सकते हैं.


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