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सोमवार, 20 अक्टूबर 2025

धर्मनिरपेक्षता एवं भाजपा सरकारों द्वारा हिंदू त्योहारों के आयोजन पर सार्वजनिक धन का खर्च

 

धर्मनिरपेक्षता एवं  भाजपा सरकारों द्वारा हिंदू त्योहारों के आयोजन पर सार्वजनिक धन का खर्च

एस आर दारापुरी आईपीएस (से. नि.)

भारत में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व वाली सरकारों, विशेष रूप से राज्य स्तर पर (जैसे, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश), ने प्रमुख हिंदू त्योहारों के आयोजन और प्रचार के लिए पर्याप्त सार्वजनिक धन आवंटित किया है। इनमें कुंभ मेला और अयोध्या का दीपोत्सव जैसे आयोजन शामिल हैं। सरकार अक्सर ऐसे खर्चों को विशुद्ध धार्मिक प्रचार के बजाय सांस्कृतिक विरासत, पर्यटन और आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के प्रयासों के रूप में उचित ठहराती है। हालाँकि, विपक्षी नेताओं और संवैधानिक विशेषज्ञों सहित आलोचकों का तर्क है कि यह प्रथा करदाताओं के पैसे का उपयोग एक धर्म के पक्ष में करने के लिए करके भारत के धर्मनिरपेक्ष ढांचे का उल्लंघन करती है, जो संभवतः राज्य की तटस्थता के सिद्धांतों का उल्लंघन करती है।

सार्वजनिक व्यय के प्रमुख उदाहरण

- कुंभ मेला (2025, प्रयागराज, उत्तर प्रदेश):  उत्तर प्रदेश सरकार ने इस आयोजन के लिए बुनियादी ढाँचे, स्वच्छता, सुरक्षा और प्रचार पर रिकॉर्ड ₹70 बिलियन (लगभग £640 मिलियन) का निवेश किया, जिसमें अनुमानित 400 मिलियन श्रद्धालु शामिल हुए। इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की तस्वीरों वाला एक राष्ट्रव्यापी अभियान भी शामिल था। इस उत्सव को धार्मिक महत्व और आधुनिक विकास के मिश्रण के रूप में तैयार किया गया था, जिसमें मोदी स्वयं अनुष्ठानों में शामिल हुए। हालाँकि उपस्थिति ने रिकॉर्ड तोड़ दिए, जनवरी 2025 में भीड़ की भारी भीड़ के कारण कम से कम 30 लोगों की मृत्यु हो गई, जिससे सार्वजनिक संसाधनों द्वारा वित्त पोषित रसद संबंधी चुनौतियों पर प्रकाश डाला गया।

- अयोध्या दीपोत्सव (19 अक्टूबर, 2025, उत्तर प्रदेश):  राज्य सरकार ने एक भव्य दिवाली समारोह का आयोजन किया, जिसमें सरयू नदी के किनारे 1,50,000 तेल के दीये जलाए गए, 2,100 कलाकारों द्वारा विश्व रिकॉर्ड आरती, प्रकाश और ध्वनि शो और आतिशबाजी की गई। मुख्यमंत्री आदित्यनाथ ने इस आयोजन का नेतृत्व किया, जिसे भगवान राम की वापसी के प्रतीक और पर्यटन आकर्षण के रूप में प्रचारित किया गया। खर्च के सटीक आंकड़े सार्वजनिक रूप से नहीं बताए गए, लेकिन विपक्षी नेताओं ने दीप खरीदने और अनुष्ठानों के आयोजन के लिए सार्वजनिक धन के उपयोग पर सवाल उठाए, और इसी तरह के पिछले आयोजनों के आधार पर करोड़ों रुपये की लागत का अनुमान लगाया।

ये कोई अनोखी घटनाएँ नहीं हैं; पहले के उदाहरणों में 2019 का कुंभ मेला शामिल है, जहाँ मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने चुनावों से पहले इस आयोजन पर अभूतपूर्व धनराशि (₹4,000 करोड़ से अधिक) खर्च की थी, जिसमें धार्मिक भव्यता को राजनीतिक संदेश के साथ मिला दिया गया था।

धर्मनिरपेक्षता और सार्वजनिक धन पर संवैधानिक परिप्रेक्ष्य

भारत का संविधान धर्मनिरपेक्षता को एक मूल सिद्धांत के रूप में प्रतिष्ठित करता है, जिसे 1976 में प्रस्तावना में स्पष्ट रूप से जोड़ा गया था और 1994 के एस.आर. बोम्मई मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इसे "मूल संरचना" के रूप में पुष्टि की गई थी, जिसका अर्थ है कि इसे संशोधनों द्वारा बदला नहीं जा सकता। अनुच्छेद 25-28 के अंतर्गत प्रासंगिक प्रावधान राज्य की तटस्थता को अनिवार्य करते हुए धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देते हैं:

अनुच्छेद 25:  सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के अधीन, धर्म को मानने, आचरण करने और प्रचार करने की स्वतंत्रता। व्यक्तिगत धार्मिक अभिव्यक्ति की अनुमति देता है, लेकिन पक्षपात को रोकने के लिए राज्य विनियमन की अनुमति देता है। त्योहारों का निजी तौर पर पालन किया जा सकता है, लेकिन राज्य प्रायोजन से असमान व्यवहार का खतरा होता है।

अनुच्छेद 26:  धार्मिक संप्रदायों को अपने मामलों का प्रबंधन करने का अधिकार। समुदायों को स्वशासन का अधिकार देता है, जिससे राज्य के हस्तक्षेप या वित्तपोषण का औचित्य कम हो जाता है।

अनुच्छेद 27:  किसी विशेष धर्म के प्रचार या रखरखाव के लिए कोई कर नहीं लगाया जाएगा। यह किसी एक धर्म को बढ़ावा देने के लिए सार्वजनिक (करदाता) धन के उपयोग पर प्रत्यक्ष रूप से प्रतिबंध लगाता है, क्योंकि यह नागरिकों को उन विश्वासों को सब्सिडी देने के लिए बाध्य करता है जिनसे वे सहमत नहीं हो सकते। आलोचक त्योहारों पर होने वाले खर्च को इसका उल्लंघन मानते हैं, इसे अप्रत्यक्ष "प्रचार" मानते हैं।

अनुच्छेद 28:  राज्य द्वारा वित्त पोषित संस्थानों में कोई धार्मिक शिक्षा नहीं (संपन्न संस्थानों के लिए अपवादों के साथ)। धार्मिक शिक्षा या पूजा से राज्य के संसाधनों को रोककर, आयोजनों तक समान रूप से विस्तारित करके अलगाव को मजबूत करता है।

अनुच्छेद 27 महत्वपूर्ण है:  यह धार्मिक प्रचार के लिए कर की आय के विनियोग पर रोक लगाता है, यह सुनिश्चित करता है कि राज्य संरक्षक की भूमिका न निभाए। कानूनी विद्वानों का तर्क है कि दीपोत्सव या कुंभ मेले जैसे हिंदू-विशिष्ट त्योहारों के लिए धन मुहैया कराना एक धर्म को प्राथमिकता देकर इस सिद्धांत का उल्लंघन है, जिससे अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) के तहत समानता का अधिकार कमज़ोर हो सकता है। सर्वोच्च न्यायालय ने त्योहारों के लिए धन मुहैया कराने पर सीधे तौर पर कोई फैसला नहीं सुनाया है, लेकिन संबंधित संदर्भों में धर्मनिरपेक्षता को बरकरार रखा है, जैसे कि राज्य के आयोजनों में अंतरधार्मिक भागीदारी को चुनौती देने वाली याचिकाओं को खारिज करना (सितंबर 2025 का फैसला) और स्कूल फंडिंग के मामलों में अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करना।

आलोचनाएँ और बचाव

- आलोचनाएँ (धर्मनिरपेक्षता के विरुद्ध): समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव जैसे विपक्षी नेताओं ने इस तरह के खर्च को "व्यर्थ" और राजकोषीय प्राथमिकताओं के प्रति असंवेदनशील बताया है, और विदेशों में क्रिसमस जैसे साल भर चलने वाले दीयों की ओर रुख करने का आग्रह किया है—जिससे हिंदू परंपराओं का कथित तौर पर मज़ाक उड़ाने के लिए तीखी प्रतिक्रिया हुई है। कांग्रेस के राशिद अल्वी ने भी यही बात दोहराई और कहा कि "दीपक जैसे धार्मिक मामलों" के लिए सार्वजनिक धन का इस्तेमाल संविधान का उल्लंघन है। व्यापक चिंताओं में राजनीतिकरण शामिल है: कुंभ मेले जैसे आयोजनों को भाजपा के हिंदुत्व एजेंडे के हथियार के रूप में देखा जाता है, जो एक "हिंदू राष्ट्र" की अवधारणा को बढ़ावा देते हैं जो अल्पसंख्यकों को दरकिनार करती है और धर्मनिरपेक्षता को कमज़ोर करती है। 2023 में, उत्तर प्रदेश में रामनवमी जैसे त्योहारों के लिए धन के आवंटन को "धर्म को प्रशासन के साथ जोड़ने का प्रयास" करार दिया गया।

- बचाव (सांस्कृतिक, धार्मिक नहीं):

भाजपा नेताओं का कहना है कि ये एकता और पर्यटन को बढ़ावा देने वाले सांस्कृतिक उत्सव हैं, न कि धार्मिक समर्थन। उदाहरण के लिए, उत्तर प्रदेश के उप-मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने आलोचकों पर वोट बैंक की राजनीति के लिए "हिंदू आस्था का अपमान" करने का आरोप लगाया और दीयों को सद्भाव के प्रतीक के रूप में महत्व दिया। सरकार का तर्क है कि ऐसे आयोजन आर्थिक लाभ (जैसे, रोज़गार, तीर्थयात्रा अर्थव्यवस्था) उत्पन्न करते हैं और भारत की बहुलवादी विरासत के अनुरूप हैं, जहाँ राष्ट्रीय अवकाशों में कई धर्मों के त्योहार (दिवाली, ईद, क्रिसमस) शामिल होते हैं। किसी भी प्रमुख अदालत ने इन खर्चों को रद्द नहीं किया है, जिससे यह एक अस्पष्ट क्षेत्र का संकेत मिलता है जहाँ "सांस्कृतिक" ढाँचा छूट प्रदान करता है।

निष्कर्ष: एक विवादित प्रथा

हाँ, भाजपा सरकारें हिंदू त्योहारों पर सार्वजनिक धन खर्च कर रही हैं, जिसके प्रलेखित उदाहरण हाल के वर्षों में अरबों रुपये के हैं। यह "धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा के विरुद्ध" है या नहीं, यह व्याख्या पर निर्भर करता है: कानूनी रूप से, यह अनुच्छेद 27 के निषेध के करीब है, जो एक बहु-धार्मिक समाज में राज्य के पक्षपात के बारे में वैध चिंताओं को जन्म देता है। राजनीतिक रूप से, यह शासन में हिंदुत्व की भूमिका पर बहस को हवा देता है। एक निश्चित समाधान के लिए, प्रभावित नागरिक अदालतों में याचिका दायर कर सकते हैं, लेकिन चल रहे विवाद के बीच मौजूदा प्रथा जारी है। भारत की धर्मनिरपेक्षता अभी भी आकांक्षापूर्ण है—आस्था और समानता के बीच संतुलन—न कि निरपेक्ष।

साभार: grok

रविवार, 15 नवंबर 2020

भाजपा से धर्मनिरपेक्षता की राजनीति से नहीं लड़ा जा सकता

 

भाजपा से धर्मनिरपेक्षता की राजनीति से नहीं लड़ा जा सकता

(कँवल भारती)


       जिस तरह उत्तर प्रदेश में भाजपा ने मायावती को मुख्यमंत्री बनाकर अपना जनाधार बढ़ाया, उसी तरह उसने बिहार में नितीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाकर अपनी ताकत बढ़ाई. मायावती और नितीश दोनों सामाजिक परिवर्तन और धर्मनिरपेक्ष राजनीति के चेहरे थे, पर भाजपा ने दोनों को ही हिंदुत्व का चेहरा बना दिया. सिर्फ चेहरा ही नहीं बनाया, बल्कि जैसा चाहा, वैसा नचाया भी. मायावती को सत्ता में लाने वाली भी भाजपा है, और सत्ता से हटाने वाली भी वही है. अब स्थिति यह है कि भाजपा को मायावती की जरूरत नहीं है, पर मायावती को हमेशा भाजपा की जरूरत बनी रहेगी—सिर्फ अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए. ठीक यही परिणति आगे चलकर नितीश की भी होनी है. भाजपा ने नितीश के सहारे बिहार में हिन्दू एजेंडे को धीरे-धीरे धार दी, आरएसएस के संगठनों को कुछ भी करने की खुली छूट मिली, जिस तरह मायावती ने उत्तर प्रदेश में दी थी. आज उसी के बल पर बिहार में भाजपा नितीश की पार्टी से बड़ी पार्टी हो गई है. अब नितीश की ताकत भी कम होगी, और भाजपा अपने एजेंडे को भी पूरी तरह लागू करेगी, जिसका परिणाम यह होगा कि 2025 के चुनावों में भाजपा बिहार में अपनी पूर्ण बहुमत की सरकार बना सकती है. रहा सवाल महागठबंधन का तो भाजपा उसे अस्तित्व में रहने ही नहीं देगी. जब सपा और बसपा का गठबन्धन वह खत्म करा सकती है, तो उसके लिए महागठबंधन कौन बड़ी चीज है? वैसे भी महागठबंधन स्वार्थ पर बना है और स्वार्थ पर ही टूट भी जायेगा. तात्कालिक राजनीति की आयु लंबी नहीं होती.

       बिहार के नतीजों के साथ ही उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के उपचुनावों का भी नतीजा भाजपा के पक्ष में आया है. इससे पता चलता है कि दलित और पिछड़ा वर्ग काफी हद तक भाजपा के साथ है. अगर दलित और पिछड़ा वर्ग भाजपा के साथ न होता, तो न केवल उपचुनावों में, बल्कि बिहार में भी भाजपा का जीतना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन भी था. इसका स्पष्ट कारण यही है कि हिन्दू उच्च जातियों की संख्या इतनी अधिक नहीं है, कि उसके बल पर भाजपा जीत सके. अब सवाल यह है कि दलित और पिछड़ा वर्ग भाजपा को क्यों वोट देता है? उत्तर है, हिन्दूवादी होने की वजह से.

इससे एक बात साफ़ है कि धर्मनिरपेक्षता की राजनीति से भाजपा को नहीं हराया जा सकता. भाजपा से लड़ने के लिए आक्रामक हिन्दूवाद का विरोध करना भी ठीक नहीं है, क्योंकि ऐसा करने से भाजपा उसे हिन्दू-विरोध का मुद्दा बना लेगी. और यह एक ऐसा खेल है, जिसे आरएसएस और भाजपा सबसे अच्छा खेलते हैं.

अब सवाल यह है कि भाजपा को किस तरह कमजोर किया जाए? इसे थोड़ा इतिहास से समझना होगा. आज जिस जगह भाजपा खड़ी है, कल उसी जगह इतनी ही मजबूती से कांग्रेस खड़ी थी. कांग्रेस के विरुद्ध बाबासाहेब डा. आंबेडकर ने जीवन-भर संघर्ष किया. पर कांग्रेस कमजोर नहीं हुई. लोहिया भी अपने घोर कांग्रेस-विरोध से कांग्रेस को सत्ता से बेदखल नहीं कर पाए. इसका कारण क्या है? कारण वही है, जो आज भाजपा के विरोध में है. बाबासाहेब आंबेडकर ने कांग्रेस को उसकी ब्राह्मणवादी नीतियों के कारण कटघरे में खड़ा किया था. उन्होंने यहाँ तक कहा था कि अगर कांग्रेस के हाथों में सत्ता आई, तो वह भारत में हिन्दूराज कायम करेगी, जो दलितों, पिछड़ों और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों के लिए हानिकारक होगा. लेकिन भारत की जनता पर इसका कोई असर नहीं हुआ. असर इसलिए नहीं हुआ, क्योंकि भारत की जनता ब्राह्मणवाद के जबरदस्त प्रभाव में थी. वह आज भी उसके प्रभाव में है, और यह कहना गलत न होगा कि ब्राह्मणवाद का विस्तार पहले से अब और भी ज्यादा हुआ है. यह सिर्फ भारत में संभव है कि सामाजिक न्याय के झंडावरदार कमजोर होकर बैठ जाएँ, और उसके विरोध में कमंडल की राजनीति सत्तारूढ़ हो जाए. आखिर कुछ तो कारण होगा इसका?

भाजपा ने अपनी राजनीति को नया तेवर या नई धार पिछली सदी के अंतिम दशक में दी, जब उसने 1990 में सामाजिक न्याय की राजनीति के विरोध में राम-मंदिर की राजनीति आरम्भ की. विडम्बना देखिए कि  भाजपा के इस राजनीतिक आन्दोलन में आरएसएस ने पिछड़ी जातियों के ही नेताओं और नौजवानों को झोंका, जिनके आर्थिक उत्थान के लिए सामाजिक न्याय का आन्दोलन शुरू हुआ था. कल्याण सिंह, विनय कटियार, उमा भारती सामाजिक न्याय के विरुद्ध प्रमुख चेहरा बनकर उभरे. सवर्णों के नेतृत्व में पिछड़ी जातियों के नौजवान सड़कों पर तोड़फोड़ कर रहे थे, और स्कूल-कालेजों और छात्रावासों में दलित छात्रों को बेरहमी से मार रहे थे. इसी हिन्दू उन्माद ने उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार बनाई, जिसके कल्याण सिंह मुख्यमंत्री बने. स्टूडेंट इस्लामिक मूवमेंट पर प्रतिबंध लगा, और विद्यार्थी परिषद को खुली छूट देकर आक्रामक बनाया गया. 1992 में 6 दिसंबर को संविधान-शिल्पी डा. आंबेडकर के निधन के दिन, संविधान को ठेंगा दिखाकर आरएसएस और भाजपा ने अपनी भेजी हुई उस भीड़ से, जिसमें बहुसंख्या पिछड़ी जातियों के नौजवानों की थी, बाबरी मस्जिद गिरवा दी. तब केन्द्र में कांग्रेस की सरकार थी, पर कांग्रेस ने भाजपा के खिलाफ कोई आक्रामक रुख नहीं अपनाया. इस मुद्दे पर वह भाजपा को घेर भी नहीं सकती थी, क्योंकि वह तो उसका ही मुद्दा था. मंदिर आन्दोलन के दौरान आरएसएस ने अपनी तमाम तिकड़मी हथकंडों में पिछड़ी जातियों को शामिल किया. दस सालों के अंदर आरएसएस ने दलित-पिछड़ी जातियों के दिमागों में मुस्लिम-विरोध पर खड़ा हिंदुत्व ऐसा रचा-बसा दिया कि उसे अब कोई साबुन साफ़ नहीं कर सकता.

अब प्रश्न है कि भाजपा ने कांग्रेस को सत्ता से बेदखल कैसे किया? कांग्रेस भाजपा की परम सहायक पार्टी थी, आज़ादी के बाद से ही वह धर्मनिरपेक्ष पार्टी बनकर रही और ब्राह्मणवाद का विस्तार करने में भी सबसे ज्यादा काम उसी ने किया. हिंदुत्व की जो फसल आज लहलहा रही है, उसकी जमीन कांग्रेस ने ही तैयार की. तब भाजपा ने कांग्रेस का विरोध किस आधार पर किया? इसी को समझना होगा.

कांग्रेस को सत्ता से बेदखल करने की रणनीति आरएसएस ने तैयार की थी. उसने कांग्रेस-विरोध का मुद्दा भ्रष्टाचार को बनाया. उसके लिए उसने दिल्ली में आन्दोलन के लिए अन्ना हजारे को तैयार किया. रातोंरात ऐसा जादू हुआ कि देश के कोने-कोने से लोग दिल्ली पहुँचने लगे. रामलीला मैदान खचाखच भर गया. कांग्रेस के खिलाफ भ्रष्टाचार की रणनीति कामयाब हो गई. आरएसएस जनता का जैसा मानस बनाना चाहता था, वैसा ही बन गया. भ्रष्टाचार ने कांग्रेस को अर्श से फर्श पर लाकर पटक दिया. भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई से सब कुछ सुरक्षित रहता है—ब्राह्मणवाद भी, और वर्णव्यवस्था भी. भाजपा की विजय हुई. भाजपा उसी एजेंडे को लेकर सत्ता में आ गई, जो कांग्रेस का ‘गुप्त’ था.

सत्ता में आने के बाद भाजपा ने भ्रष्टाचार का राग बंद कर दिया, और आक्रामक हिंदुत्व को अपना एजेंडा बना लिया. जब ब्राह्मणों और सवर्णों की अपनी पार्टी सत्ता में आ गयी, तो कांग्रेस के ब्राह्मण-सवर्ण भी भाजपा में शामिल हो गए. अब भाजपा की राजनीति में हिन्दूवाद मुख्य है, वही राष्ट्रवाद है, और वही देश-भक्ति है. इसलिए भाजपा की सरकार में हिंदुत्व का विरोध राष्ट्र और देश का विरोध है. जो हिंदुत्व का विरोध करेगा, उसके खिलाफ आरएसएस के लोग कहीं भी राष्ट्र-द्रोह का मुकदमा लिखवा सकते हैं. जनता के बीच एक सीमा-रेखा खींच दी गयी है—जो भाजपा के साथ नहीं है, वह राष्ट्र के साथ नहीं है. अमेरिका में ट्रम्प  के नियंत्रण में बहुत सी चीजें नहीं थीं. पर भारत में सब भाजपा के नियंत्रण में है—सेना, पुलिस, चुनाव आयोग और न्यायपालिका तक. इसलिए भारत में उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती, जो अमेरिका में हो गया.

यहाँ यह लम्बी भूमिका लिखने का मतलब यह है कि धर्मनिरपेक्षता की राजनीति से भाजपा से नहीं लड़ा जा सकता. क्योंकि आरएसएस और भाजपा ने बहुत चालाकी से हिंदुओं के दिमाग में यह डाल दिया है कि धर्मनिरपेक्ष राजनीति का मतलब हिन्दूवाद का विरोध या मुसलमानों का समर्थन करना है. जैसे ही आप एनआरसी का विरोध करेंगे, दिल्ली दंगों में सरकार की भूमिका पर सवाल उठाएंगे, आपके खिलाफ आरएसएस के अराजक तत्वों की बयानबाजी शुरू हो जायेगी, और आपको देशद्रोही करार दे दिया जायेगा. ऐसे लोकतान्त्रिक और धर्मनिरपेक्षतावादी लोगों के लिए, उन्होंने ‘अर्बन नक्सल’ का खतरनाक शब्द गढ़कर रखा हुआ है. आप हैरान हो सकते हैं यह जानकार कि फेसबुक पर भाजपा-विरोधी एक पोस्ट पर महादलित संगठन का एक नेता मुझे ‘अर्बन नक्सल’ लिख चुका है. इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि आरएसएस और भाजपा ने दलित-पिछड़े लोगों के दिमागों को किस कदर हिंदुत्व से भर दिया है कि उनकी समझ में कुछ नहीं आने वाला है.

बिहार में तेजस्वी यादव ने एक राह दिखाई है, जिसे आगे बढ़ाने की जरूरत है. उन्होंने जिस तरह बिना हिंदुत्व का विरोध किए, केवल रोजगार के मुद्दे पर नितीश कुमार और भाजपा को घेरा, उससे काफी हद तक जनता का ध्रुवीकरण किया. हमें यह समझना होगा कि जाति और धर्म दो ऐसे संवेदनशील मुद्दे हैं, जिनसे लोगों की भावनाएं जल्दी आहत हो जाती हैं, भले ही वे उनकी बर्बादी का कारण भी हों. हमें रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएं, अधिनायकवाद, आर्थिक सवालों जैसे निजीकरण तथा वित्तीय पूंजी का विस्तार आदि पर ही आरएसएस और भाजपा को घेरना होगा. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को तेजस्वी के रोजगार के मुद्दे ने ही विचलित किया, जो उन्होंने तेजस्वी को ‘जंगलराज के युवराज’ की बहुत ही घटिया उपाधि दी. मोदी इसके सिवा कुछ कह भी नहीं सकते थे. आरएसएस और भाजपा की कमजोर नस रोजगार और आर्थिक मुद्दे हैं. पर इन मुद्दों पर दलित-पिछड़ों को कैसे लाया जायेगा, यही वह प्रश्न है, जिस पर हम सबको विचार करना होगा.

(13/11/2020)

 

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