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मंगलवार, 13 अप्रैल 2021

डा. आंबेडकर और वर्तमान राजनीतिक एवं आर्थिक परिदृश्य

 

                डा. आंबेडकर और वर्तमान राजनीतिक एवं आर्थिक परिदृश्य

                    एस आर दारापुरी, राष्ट्रीय अध्यक्ष, आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट.

                 

            (14 अप्रैल को अम्बेडकर जयंती पर विशेष)

आज 14 अप्रैल है जिसे पूरे देश में ही नहीं विदेशों में भी डा. आंबेडकर जन्म दिवस अर्थात डा. आंबेडकर जयंती के रूप में मनाया जाता है. इस दिन जहाँ सरकारी तौर पर उन्हें श्रद्धांजलि दी जाती है तथा उनका गुणगान किया जाता है, वहीं उनके श्रद्धालु भी उन्हें अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं. यह सब आयोजन ज्यादातर एक उत्सव एवं  कर्मकांड का रूप लेकर ही रह जाते हैं. बहुत कम आयोजन ऐसे होते हैं जहाँ इस दिन डा. आंबेडकर के जीवन दर्शन तथा उसकी वर्तमान में प्रासंगिकता के बारे में गंभीर चर्चा होती है.  इसके उत्सव के रूप का अपना महत्व है. परन्तु डा. आंबेडकर के दर्शन की वर्तमान परिदृश्य  में प्रासंगिकता पर चर्चा अधिक उपयोगी हो सकती है. अतः डा. आंबेडकर के दर्शन एवं विचारधारा के आलोक में  वर्तमान राजनीतिक एवं आर्थिक परिदृश्य का मूल्याङ्कन करना अधिक समीचीन होगा.

आइये सबसे पहले वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य को देखें. जैसाकि सब अवगत हैं कि इस समय केंद्र तथा काफी राज्यों में भाजपा की सरकार है जिसका मुख्य एजंडा हिंदुत्व तथा हिन्दू राष्ट्र की स्थापना है. यह अवधारणा धर्म निरपेक्षता, बाहुल्यवाद  एवं अनेकता में एकता के संवैधानिक मूल्यों में विश्वास नहीं रखती है जबकि डा. आंबेडकर इन सबके प्रबल समर्थक थे. आरएसएस समर्थित भाजपा सरकार हिन्दू राष्ट्र की स्थापना के लिए कटिबद्ध है. डा. आंबेडकर ने 1940 में ही धर्म आधारित राष्ट्र पाकिस्तान की मांग पर आगाह करते हुए कहा था, “अगर हिन्दू राष्ट्र बन जाता है तो बेशक इस देश के लिए एक भारी खतरा पैदा हो जायेगा. हिन्दू कुछ भी कहें, पर हिंदुत्व स्वतंत्रता, बराबरी और भाईचारे के लिए खतरा है. इस आधार पर यह लोकतंत्र के लिए अनुपयुक्त है, हिन्दू राज को हर कीमत पर रोका जाना चाहिए.” आज से लगभग 80 साल पहले जिस खतरे के बारे में डा. आंबेडकर ने आगाह किया था, वह आज हमारे दरवाजे पर दस्तक दे रहा है. फिलहाल भले ही संविधान न बदला गया हो और भारत अभी भी, औपचारिक तौर पर धर्म निरपेक्ष हो, लेकिन वास्तविक जीवन में हिन्दुत्ववादी शक्तियां समाज-संस्कृति के साथ राजसत्ता पर भी प्रभावी नियंत्रण कायम कर चुकी हैं.

अतः डा. आंबेडकर हर हालत में हिन्दू राष्ट्र बनने से रोकना चाहते थे क्योंकि वे हिन्दू जीवन संहिता को पूरी तरह स्वतंत्रता, समानता एवं बंधुत्व का विरोधी मानते थे. उनके द्वारा हिन्दू राष्ट्र के विरोध का कारण केवल हिन्दुओं की मुसलमानों के प्रति नफरत तक ही सीमित नहीं था. सच तो यह है कि वे हिन्दू राष्ट्र को मुसलमानों की तुलना में हिन्दुओं  के लिए ज्यादा खतरनाक मानते थे. वे हिन्दू राष्ट्र को दलितों और महिलाओं के खिलाफ मानते थे. उन्होंने स्पष्ट कहा था कि जाति व्यवस्था को बनाये रखने की ज़रूरी शर्त है कि महिलाओं को अंतरजातीय विवाह करने से रोका जाये. उनका मानना था कि इस असमानता के रहते किसी भी सामाजिक भाईचारे की कल्पना नहीं की जा सकती. जातिवादी असमानता हिंदुत्व का प्राणतत्व है. यही बात उन्हें इस नतीजे पर पहुंचाती थी कि ‘हिंदुत्व और लोकतंत्र दो विरोधी छोरों पर खड़े हैं.’ सारे तथ्य यही बताते हैं कि हिन्दू सबकुछ छोड़ सकते हैं, लेकिन जाति नहीं जो उनका मूल आधार है और आंबेडकर इसके खात्मे के बिना लोकतान्त्रिक समाज की कल्पना नहीं करते थे.

अतः आज डा. आंबेडकर की विचारधारा तथा संविधान में विश्वास रखने वाले सभी देशवासियों का कर्तव्य है कि वे आरएसएस/ भाजपा की हिन्दुत्ववादी सरकार के हिन्दू राष्ट्र की स्थापना के एजंडे के विरुद्ध लामबंद हों तथा इसे विफल बनाएं.

अब अगर वर्तमान भाजपा सरकार की आर्थिक नीतियों को देखें तो यह कार्पोरेटपरस्त वित्तीय पूँजी आधारित जनविरोधी नीतियाँ हैं जबकि डा. आंबेडकर राजकीय समाजवाद के प्रबल पक्षधर थे. उन्होंने संविधान के अपने मसौदे, जो उन्होंने शैडयूल्ड कास्ट्स फेडरेशन की तरफ से संविधान सभा के सदस्यों को भेजा था तथा जो बाद में “राज्य एवं अल्पसंख्यक” (स्टेट्स एण्ड माइनारटीज़) नामक पुस्तक के रूप में छपी थी, में कृषि भूमि के राष्ट्रीयकरण, अधिग्रहीत भूमि को उचित आकार के फार्मों में विभाजित करके ग्रामीण परिवार समूहों को इकाई मान कर उत्पादन करने हेतु आवंटित करना, उन पर सामूहिक खेती, खेती को उद्योग का दर्जा दिया जाना आदि क्रांतिकारी सुझाव थे. इसके साथ ही वे सभी प्रमुख उद्योगों को सरकारी नियंत्रण में रखने, वे उद्योग जो प्रमुख नहीं हैं किन्तु आधारभूत हैं, सरकार अथवा सरकारी उद्यमों द्वारा चलाने जाने के पक्ष में थे. वे बीमा को केवल सरकार के हाथ में रखने तथा हरेक व्यक्ति के लिए बीमा पॉलिसी अनिवार्य रूप से होने के पक्ष में थे. वे सभी प्रकार के खनन के भी सरकारी हाथ में रखने के पक्ष में थे. वास्तव में वे अबाध पूंजीवाद के स्थान पर राजकीय समाजवाद के प्रबल समर्थक थे.

इसके विपरीत आज हम देख रहे हैं कि वर्तमान मोदी सरकार निजीकरण एवं भूमंडलीकरण की नीति को कठोरता के साथ लागू कर रही है. सहकारी खेती के माध्यम से खेती को लाभकारी बनाने की बजाये नये कृषि कानून बना कर खेती को अलाभकारी बनाकर उसे बड़ी कम्पनियों एवं कार्पोरेट्स को सौंपने की व्यवस्था कर रही है जिसके विरोध में देशव्यापी किसान आन्दोलन लम्बे समय से चल रहा है. बीमा क्षेत्र में निजी कम्पनियों का प्रवेश हो चुका है तथा सरकारी बीमा कंपनी बेची जा रही है. जनता के पैसे से बने सरकारी उपक्रम कौड़ियों के भाव बेचे जा रहे है. डा. आंबेडकर द्वारा स्थापित बिजली व्यवस्था का नया कानून बना कर निजीकरण किया जा रहा है. खनन का तेजी से निजीकरण किया जा रहा है. आज़ादी के बाद देश में लागू की गयी मिश्रित अर्थ व्यवस्था को ख़त्म करके ग्लोबल वित्तीय पूँजी से चालित कार्पोरेट्स के हाथों में सौंपी जा रही है और खुले बाज़ार को बढ़ावा दिया जा रहा है जो आम नागरिक के हित में नहीं है. संविधान में राष्ट्रीय संपत्ति के न्यायपूर्ण वितरण को सुनिश्चित करने एवं उसके कुछ हाथों में केंद्रीकरण को रोकने की बजाये सभी राष्ट्रीय संपत्ति कुछ हाथों में बेचीं जा रही है. खनन का तेजी से निजीकरण हो रहा है जिससे खनन संपदा की लूट हो रही है. मोदी सरकार कार्पोरेट समर्थित सरकार है जो उन्हें लाभ पहुँचाने में संविधान में निहित समाजवादी प्रावधानों/कानूनों को पूरी तरह से पलट रही है. इसका राष्ट्रहित में विरोध किया जाना चाहिए.

यह सर्वविदित है कि स्वतंत्रता पूर्व वायसराय की कार्यकारिणी के लेबर सदस्य के रूप में डा. आंबेडकर नें श्रमिकों के कल्याण एवं संरक्षण के लिए बहुत सारे श्रम कानून बनाये थे जो अब तक लागू थे. इनमें काम के 8 घंटे, कर्मचारी बीमा योजना, प्रसूति अवकाश, समान काम के लिए समान वेतन, आवासीय सुविधा, ईपीएफ, हड़ताल का अधिकार, प्रबंधन में मजदूरों का प्रतिनिधित्व, ट्रेड यूनियन अधिकार आदि प्रमुख हैं. वास्तव में भारत में मजदूरों को जितने अधिकार बाबासाहेब ने चार साल की अवधि (1942 से 1946) में दिलवाए वे दुनियां के दूसरे देशों में बहुत लम्बे संघर्ष के बाद मिल पाए थे. इसके विपरीत वर्तमान मोदी सरकार ने उन सभी कानूनों को ख़त्म करके जो चार लेबर कोड बनाये हैं वे घोर मजदूर विरोधी हैं. यह वास्तव में श्रमिकों की गुलामी का दस्तावेज़ हैं. इसमें काम के घंटे 12 कर दिए गए हैं, टेक होम सेलरी घटा दी गयी है, ठेका मजदूरों के परमानेंट होने के अधिकार को छीन लिया गया है. साप्ताहिक अवकाश ख़त्म कर दिया गया है, ठेकेदारों को पंजीकरण से छूट दे दी गयी है और मालिकों को मजदूरों की सामाजिक व् जीवन की सुरक्षा सम्बन्धी जिम्मेदारियों से मुक्त कर दिया गया है. मोदी सरकार यह सब उद्योगों को सुविधा से चलाने के नाम पर कर रही है. मोदी सरकार का यह कार्य घोर मजदूर विरोधी तथा उनके शोषण को बढ़ावा देने वाला है. यह डा. आंबेडकर द्वारा श्रम कल्याण हेतु बनाये गए कानूनों का निषेध है.

 उपरोक्त संक्षिप्त विवेचन से स्पष्ट है कि वर्तमान मोदी सरकार हिन्दू राष्ट्र की स्थापना, निजीकरण एवं भूमंडलीकरण को तेज़ी से लागू करने एवं देश की अर्थव्यवस्था को ग्लोबल वित्तीय पूँजी के अधीन करने, खेती, बाज़ार, उद्योग, खनन एवं बीमा को कार्पोरेट्स को सौंपने, श्रम कानूनों का खात्मा करने, काले कानूनों का दुरुपयोग करने तथा लोकतंत्र को खत्म करने आदि जनविरोधी नीतियों का तेज़ी से अनुसरण कर रही है जोकि डा. आंबेडकर के समाजवादी दर्शन एवं लोकतान्त्रिक विचारधारा के विपरीत है. आज आंबेडकर जयंती के अवसर पर वर्तमान आर्थिक नीतियों एवं देश को एक धर्म निरपेक्ष राज्य की जगह एक धर्म आधारित हिन्दू राष्ट्र बनाने के प्रयासों का विवेचन तथा राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था का कार्पोरेटकरण एवं निजीकरण का संगठित विरोध किया जाना चाहिए. यही डा. आंबेडकर के प्रति  सच्ची श्रद्धांजलि होगी.    

 

 

शुक्रवार, 12 मई 2017

डॉ. आंबेडकर और श्रमिक सरोकार

डॉ. आंबेडकर और श्रमिक सरोकार
-  बादल सरोज
डॉ. अम्बेडकर को सिर्फ जाति और वर्ण के प्रश्न तक बाँध कर रख देना एक बड़े ग्रैंड प्लान का हिस्सा है जो शासक वर्गों के लिए भी मुफीद है और उनके लिए भी जो बाबा नाम केवलम करके उन्हें एक मूर्ति में बदल कर भगवान बना देने पर आमादा हैं ।
जाति भेद और अस्पृश्यता के विरुद्ध संघर्षों के अनेक तजुर्बों के बाद डॉ. अम्बेडकर ने 1936 में एक राजनीतिक पार्टी बनाई और उसका नाम रखा -इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी । इसका झण्डा लाल था और घोषणापत्र का सार मोटा मोटी समाजवादी । इस पार्टी के गठन के समय उनकी साफ़ मान्यता थी कि वास्तविक समानता लानी है तो आर्थिक और सामाजिक शोषण से एक साथ लड़ना होगा ।
उनका मानना था कि भारत में वर्गों के निर्माण में जाति और वर्ण की अहम भूमिका रही है । वर्ण और जाति के विकास के बारे में यही समझदारी मार्क्सवादी इतिहासकार डी डी कौशाम्बी ने अपने तरीके से सूत्रबद्द की थी । मार्क्स के समकालीन रहे जोतिबा फुले, जिन्होंने दलित शब्द का पहली बार इस्तेमाल किया था, उस जमाने में ही इस नतीजे पर पहुँच चुके थे कि आर्थिक, सामाजिक शोषण और लैंगिक असमानता के विरुद्ध एक साथ ही लड़ा जा सकता है ।
मगर इन दिनों कुछ निहित स्वार्थों का जोर इस बात पर अधिक है कैसे शोषण के विरुद्ध जारी लड़ाईयों के बीच लड़ाई कराई जाए । ऐसा क्यों , कैसे, किसलिए है इस पर बाद में चर्चा की जरूरत है । अभी मई दिवस के मौके पर मजदूरों के बारे में डॉ आंबेडकर की चिंताओं और मौक़ा मिलने पर उनके लिए किये गए कामों पर नजर डालना ठीक होगा ।
अपने जीवन में डॉ आंबेडकर ने मजदूरों के बीच भी काम किया । रेलवे मजदूरों के बीच उनका भाषण उनकी समझ स्पष्ट कर देता है । इस भाषण में उन्होंने कहा था कि साझी यूनियन में, लाल झंडे की यूनियन में काम करो, उसी में अपनी समस्याये भी उठाओ । अगर यूनियन तुम्हारी नहीं सुनती है तब अलग से यूनियन बनाने पर विचार करो । टेक्सटाइल मजदूर आंदोलन में उनके और श्रमिक यूनियन के बीच संवाद से न जाने कितनी भूले, चूकें दुरुस्त हुयी थीं ।
डॉ. आंबेडकर 1942 से 46 तक वाइसराय की कार्यकारी परिषद् में लेबर मेंबर (आज के ढाँचे में श्रम मंत्री के समकक्ष ) रहे । इस अवधि में, अंगरेजी राज के चलते उपस्थित हुयी बंदिशों और सीमाओं के बावजूद डॉ. आंबेडकर ने उस समय में जारी तीखे मजदूर आंदोलनों की मांगों को अपने एजेंडे में लिया । उनमे से अनेक के बारे में दूरगामी निर्णय लिए, बाध्यकारी क़ानून बनवाये ।
सातवे भारतीय श्रम सम्मेलन में 27 नवम्बर 1942 को डॉ अम्बेडकर ने आठ घंटे काम का क़ानून रखा । इसे रखते हुए उनकी टिप्पणी थी कि "काम के घंटे घटाने का मतलब है रोजगार का बढ़ना ।" इस क़ानून के मसौदे को रखते हुए उन्होंने आगाह किया था कि कार्यावधि 12 से 8 घंटे किये जाते समय वेतन कम नहीं किया जाना चाहिए ।
महिलाओं के प्रति डॉ अम्बेडकर का सोच उस समय के (और आज के भी) कथित बड़े राष्ट्रीय नेताओं से काफी आगे था । श्रम सदस्य के रूप में भी उन्होंने इसी दिशा में प्रयत्न किये । खदान मातृत्व लाभ क़ानून, महिला कल्याण कोष, महिला एवं बाल श्रमिक संरक्षण क़ानून, महिला मजदूरों के लिए मातृत्व लाभ क़ानून के साथ उन्होंने भूमिगत कोयला खदानों में महिला मजदूरों से काम न कराने के क़ानून की बहाली करवाई ।
बिना किसी लैंगिक भेदभाव के समान काम के लिए समान वेतन का क़ानून भी इसी दिशा में एक कदम था ।
ट्रेड यूनियन एक्ट भले 1926 में बन गया था । मगर मालिकों द्वारा श्रमिक संगठनो को मान्यता देना अनिवार्य बनाने का क़ानूनी संशोधन 1943 में हुआ । यही वह समय था जब काम करते समय दुर्घटना के बीमा, जिसे बाद में ईएसआई का रूप मिला, का क़ानून बना - इसी समय बने कोयला तथा माइका कर्मचारियों के प्रोविडेंट फण्ड और सारे मजदूरों के प्रोविडेंट फंड्स ।
न्यूनतम वेतन क़ानून के निर्धारण की प्रक्रिया और उसकी शुरुआती ड्राफ्टिंग में डॉ आंबेडकर का प्रत्यक्ष योगदान था ।
मजदूरी के दूसरे पक्ष, ग्रामीण मजदूरों के सम्बन्ध में डॉ आंबेडकर की समझ साफ़ थी । वे उनके संरक्षण के साथ साथ भूमि सुधारों के हामी थे । भूमि के संबन्धो के पुनर्निर्धारण के मामले में डॉ अम्बेडकर का रुख अपने सहकर्मियों की तुलना में अलग था । वे राजकीय समाजवाद के हिमायती थे । भूमि सुधारों और आर्थिक गतिविधियों में राज्य के हस्तक्षेप के पक्षधर थे । संविधान सभा में बुनियादी अधिकारों में जोड़ने के लिए उन्होंने जो बिंदु सुझाये थे उनमे अन्य बातों के अलावा जो तीन विषय शामिल थे वे इस प्रकार थे :
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प्रमुख केंद्रीय उद्योग सरकारी क्षेत्र में सरकार द्वारा संचालित हों ।
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बुनियादी प्रमुख उद्योग (गैर रणनीतिक) भी सरकारी मालिकाने में रहें, इनका संचालन खुद सरकार या उसके नियंत्रण वाले निगमों द्वारा किया जाए । 
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कृषि राजकीय उद्योग हो । इसका पुनर्संगठन करने के लिए सरकार सारी भूमि का अधिग्रहण करे फिर समुचित आकार में उन जमीनों को गाँव के लोगों के बीच बाँट दे । इस पर परिवारों के समूहों द्वारा सहकारी खेती की जाए ।
डॉ अम्बेडकर अंग्रेजों की राजस्व प्रणाली के कटु आलोचक थे । उनका मानना था कि किसी अर्थव्यवस्था के सामाजिक आर्थिक विकास के लिए जरूरी है पर्याप्त वित्त की उपलब्धता और उसका सही इस्तेमाल !! इस लिहाज से कर प्रणाली को वे महत्वपूर्ण मानते थे और इस बारे में उनका मानना था कि : टैक्स आमदनी और भुगतान क्षमता के आधार पर लगना चाहिए । इसकी दरे इस प्रकार से ऊपर की ओर बढ़ती हुयी तय की जानी चाहिए कि वे गरीब के लिए कम और अमीरों के लिए अधिक हों । एक ख़ास सीमा से कम आमदनी वालों को टैक्स से मुक्त रखा जाना चाहिए आदि आदि ।
मई दिवस के मौके पर इन सारी बातों के लिखे जाने की जरूरत इसलिए है ताकि हर तरह के शोषण के खिलाफ लड़ाई को एक सूत्र में पिरोया जा सके । इसलिए भी जरूरी है ताकि आंबेडकर के कुपाठ के आधार पर उदारीकरण की आर्थिक नीतियों को दलितों के लिए वैतरणी की राह बताने वाले, दलित चैम्बर ऑफ़ कॉमर्स जैसे अपवाद शिगूफों के आधार पर कारपोरेट पूँजी की वन्दना करने वाले कुछ तथाकथित स्वयंभू अम्बेडकरवादियों की समझदारी का खोखलापन और उनके मकसद की वास्तविकता समझी जा सके । यह ठीक तरह से जाना जा सके कि इन दिनों , इनमे से कुछ भद्र पुरुष जिस शिद्दत से वामपंथ के विरोध के लिए बहाने ढूंढते हैं, उन्हें इस पुण्य काम के लिए सुपारी किसने दी है ।


क्या महाऋषि वाल्मीकि अछूत या शूद्र थे?

क्या महाऋषि वाल्मीकि अछूत या शूद्र थे ? एस आर दारापुरी आई.पी.एस.(सेवानिवृत) आज वाल्मीकि जयंती है। मेरे विचार में इस मौके पर महाऋषि व...