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शनिवार, 4 फ़रवरी 2023

संत रैदास जयंती पर आल इंडिया पीपुल्स फ़्रंट (आइपीएफ) के उदगार

संत रैदास जयंती पर आल इंडिया पीपुल्स फ़्रंट (आइपीएफ) के उदगार

संत रैदास वाणी
ऐसा चाहूँ राज मैं जहाँ मिलै सबन कोअन्न।
छोट बड़ो सब सम बसै, रैदास रहै प्रसन्न।।
जात-जात में जात हैं, जों केलन के पात।
रैदास मनुष ना जुड़ सके जब तक जात न जात।।
रैदास कनक और कंगन माहि जिमि अंतर कछु नाहिं।
तैसे ही अंतर नहीं हिन्दुअन तुरकन माहि।।
हिंदू तुरक नहीं कछु भेदा सभी मह एक रक्त और मासा।
दोऊ एकऊ दूजा नाहीं, पेख्यो सोइ रैदासा।।
रैदास जन्म के कारनै, होत न कोउ नीच।
नर कूँ नीच करि डारि है, ओछे करम की कीच।।
बेगमपुरा सहर को नाउ, दुखु-अंदोहु नहीं तिहि ठाउ।
ना तसवीस खिराजु न मालु, खउफुन खता न तरसु जुवालु।
अब मोहि खूब बतन गह पाई, ऊहां खैरि सदा मेरे भाई।
काइमु-दाइमु सदा पातिसाही, दोम न सोम एक सो आही।
आबादानु सदा मसहूर, ऊहाँ गनी बसहि मामूर।
तिउ तिउ सैल करहि जिउ भावै, महरम महल न को अटकावै।
कह ‘रविदास’ खलास चमारा, जो हम सहरी सु मीतु हमारा।
(बेगमपुरा पद के बारे में दलित लेखक कंवल भारती लिखते हैं कि ‘यह पद डेरा सच्चखंड बल्लां, जालंधर के संत सुरिंदर दास द्वारा संग्रहित ‘अमृतवाणी सतगुरु रविदास महाराज जी’ से लिया गया है। यहां यह उल्लेखनीय है कि असल नाम ‘रैदास’ है, ‘रविदास’ नहीं है। यह नामान्तर गुरु ग्रन्थ साहेब में संकलन के दौरान हुआ। जिज्ञासु जी ने इस संबंध में लिखा है, अ‘ यह पता नहीं चल सका कि गुरु ग्रन्थ साहेब में संत रैदास जी के जो 40 पद मिलते हैं, वे किसके द्वारा पहुंचे और उनमें रैदास को रविदास किसने किया? यह बात विचारणीय इसलिए है, क्योंकि ‘रैदास’ का ‘रविदास’ किया जाना संत प्रवर रैदास जी का ब्राह्मणीकरण है; जो रैदास-भक्तों में सूर्याेपासना का प्रचार है। अन्य संग्रहों में रैदास साहेब का यह पद कुछ पाठान्तर के साथ मिलता है और उसमें ‘रैदास’ छाप ही मिलती है। जिज्ञासु जी के संग्रह में इस पद के आरंभ में यह पंक्ति आई है- ‘अब हम खूब वतन घर पाया, ऊँचा खैर सदा मन भाया।
इस पद में रैदास साहेब ने अपने समय की व्यवस्था से मुक्ति की तलाश करते हुए जिस दुःखविहीन समाज की कल्पना की है; उसी का नाम बेगमपुरा या बेगमपुर शहर है। रैदास साहेब इस पद के द्वारा बताना चाहते हैं कि उनका आदर्श देश बेगमपुर है, जिसमें ऊंच-नीच, अमीर-गरीब और छूतछात का भेद नहीं है। जहां कोई टैक्स देना नहीं पड़ता है; जहां कोई संपत्ति का मालिक नहीं है। कोई अन्याय, कोई चिंता, कोई आतंक और कोई यातना नहीं है। रैदास साहेब अपने शिष्यों से कहते हैं- ‘ऐ मेरे भाइयो! मैंने ऐसा घर खोज लिया है यानी उस व्यवस्था को पा लिया है, जो हालांकि अभी दूर है; पर उसमें सब कुछ न्यायोचित है। उसमें कोई भी दूसरे-तीसरे दर्जे का नागरिक नहीं है; बल्कि, सब एक समान हैं। वह देश सदा आबाद रहता है। वहां लोग अपनी इच्छा से जहां चाहें जाते हैं। जो चाहे कर्म (व्यवसाय) करते हैं। उन पर जाति, धर्म या रंग के आधार पर कोई प्रतिबंध नहीं है। उस देश में महल (सामंत) किसी के भी विकास में बाधा नहीं डालते हैं। रैदास चमार कहते हैं कि जो भी हमारे इस बेगमपुरा के विचार का समर्थक है, वही हमारा मित्र है।’)

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ऐसा चाहूँ राज मैं जहाँ मिलै सबन को अन्न।
छोट बड़ो सब सम बसै, रैदास रहै प्रसन्न।।’
रैदास जी जन साधारण के राज की बात करते हैं। एक ऐसे लोकतांत्रिक गणराज्य की जिसमें जनता की भौतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक सभी जरूरतें पूरी हों। यह रचना लगभग छः सौ साल पहले की है। फिर भी उन्होंने किसी राजा-रानी, नवाब या बादशाह के राज की वकालत नहीं की है, यहां तक कि उन्होंने किसी राम राज्य की बात भी नहीं की है। बहुत मुश्किल से दुनिया के किसी इतिहास में संत कवियों की रचना में इस तरह के लोक कल्याणकारी राज्य के विचार मिलते हैं। यहां तक कि राजनीतिक इतिहास में भी यह दुर्लभ है।
रैदास की बेगमपुरा रचना प्लेटो, थामस मूर के विचार की तरह यूटोपियन नहीं है, यह ठोस व व्यावहारिक है तथा लोगों की आवश्यकता के अनुरूप है। यह रचना उदात्त है और छोटी होते हुए भी जनराजनीति के राज्य का आज भी एक प्रामाणिक दस्तावेज है। यह एक पुख्ता प्रमाण है कि हमारे संविधान की प्रस्तावना की सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक न्याय की संकल्पना किसी पश्चिम की नकल नहीं है, यह भारतीय भूमि की ही पैदाइश है जो विभिन्न रूपों में संघर्ष की धारा के बतौर आज भी मौजूद है।
बेगमपुरा में किसी मूर्ति-मंदिर की राजनीतिक संस्कृति कहीं भी नहीं दिखती है। आजकल कुछ लोग भारतीय संस्कृति को एकांगी बनाकर दलितों, आदिवासियों और आम नागरिकों के सहज मानव प्रेम, मानव मुक्ति की भावना को नष्ट करने में लगे हुए है। यहीं नहीं हिन्दू परम्परा में भी जो ग्राहय है उसको भी वे नष्ट करने पर तुले हुए हैं। आखिर स्वामी विवेकानंद, दयानंद सरस्वती जैसे बड़े संतों ने भी सदैव मूर्ति-मंदिर की राजनीतिक संस्कृति का विरोध ही किया, उनसे बड़ा वैदिक धर्म का ज्ञानी हिन्दुत्व की वकालत करने वाले लोगों में कौन है? गोलवरकर जो हिटलर को अपना आदर्श मानते थे या मोदी सरकार, जो जनता के खून पसीने की गाढ़ी कमाई से खड़ी हुई जनसम्पत्ति को देशी-विदेशी पूंजीपतियों के हाथ कौड़ी के मोल बेच रही है, विदेशी ताकतों की सेवा में दिन रात लगी हुई है।
बहुलता को कमजोरी और धर्म निरपेक्षता को जो लोग विदेशी मानते हैं, वे भारतीय संस्कृति को वास्तविक अर्थों में ना जानते हैं, न मानते हैं। भारत ने विश्व को बहुत कुछ दिया है, और विश्व से बहुत कुछ लिया भी है। हमने यूनान, मिस्र, अरब, चीन जैसी सभ्यताओं को दिया भी और लिया भी।
शर्म आनी चाहिये उन लोगों को, जिनके श्लाघा पुरुष हिटलर, मुसोलिनी, तोजो जैसे तानाशाह हैं। शर्म आरएसएस करे, भाजपा करे जो हमारे सांस्कृतिक जीवन में रचे - बसे बहुलता व धर्म निरपेक्षता को खारिज करने में लगे हैं। धर्मनिरपेक्षता के विचार के विदेशी होने के तर्क को यदि मान भी लें तो भी क्या ? सत्य - शिव - सुंदर तो मानव जाति की आत्मा है, अगर कहीं भी सत्य है, तो वह ग्राह्य है ।
रैदास सामाजिक सच्चाइयों से भी रूबरु हो कर ही कहते हैं
- छोट बड़ो सब सम बसे,
रैदास रहे प्रसन्न ।
समता, स्वतंत्रता, बंधुत्व और न्याय की भावना कितनी गहरी है उनके अंदर यह उनके इसी पद से समझ सकते हैं। वर्ण व्यवस्था और जाति के जंजाल के भार से दबी मानवता की मुक्ति की भावना, जो बाद में ज्योतिबा फुले, पेरियार और डाक्टर अंबेडकर के संघर्षों में दिखती है उसकी जमीन रैदास जी जैसे संत कवि ही बनाते हैं।
समता की यही संकल्पना, आधुनिक भारत के संविधान की संकल्पना है और न्याय की चाह है।
बेगमपुरा के रचयिता रैदास को आइपीएफ का नमन है और बेगमपुरा की भावना तथा संविधान की प्रस्तावना के संकल्प को जन-जन तक पहुंचाने के लिए आइपीएफ प्रतिबद्ध है।

 

मंगलवार, 4 जून 2019

राजनीतिक सत्ता सब समस्याओं के समाधान की चाबी है- पूर्व आईजी एसआर दारापुरी


राबर्टसगंज लोकसभा क्षेत्र से आल इणिडया पीपुल्स फ्रंट (आइपीएफ) के प्रत्याशी उ प्र पुलिस के पूर्व आर्इजी आर्इपीएस एस आर दारापुरी(सरवण राम दारापुरी) से दैनिक 'भवदीय प्रभात' के प्रबंध सम्पादक अवनिंद्र ठाकुर  की मार्च, 2014 में बातचीत।:
प्रश्न: दारापुरी जी आप आईपीएस कब बने?
उत्तर: मैं 1972 में आईपीएस बना।
प्रश्न: आप का रुझान नौकरी के दौरान भी सामाजिक बदलाव की तरफ रहा है। आप अपने जीवन के बारे में बताएं?
उत्तर: मैं एक गरीब दलित परिवार में पैदा हुआ और मैंने गाँव में छुआछूत और उत्पीड़न को देखा है। मैंने आम लोगों के प्रति पुलिस और प्रशासन का व्यवहार भी देखा। मेरे मन में पढ़ लिख कर इस व्यवस्था को बदलने की लगन थी। इसीलिए मैंने बहुत मेहनत से पढ़ार्इ की और आर्इपीएस में आया। पुलिस की नौकरी के दौरान मैं ने हरेक व्यक्ति को कानून के अंतर्गत न्याय दिलाने का प्रयास किया। अपने सरकारी काम के साथ-साथ मैं सामाजिक बदलाव कीमुहिम से भी बराबर जुड़ा रहा। 2003 में सेवानिवृत्त होने के बाद एक सामाजिक कार्यकर्ता के तौर पर मैं जनहित के मुद्दों जैसे सूचना का अधिकार, भोजन का अधिकार, शिक्षा का अधिकार और मानवाधिकार आदि  पर काम करता रहा हूँ। वर्तमान में पीयूसीएल(उ.प्र.) का उपाध्यक्ष और आंबेडकर महासभा का पदाधिकारी भी हूँ।

प्रश्न: जो लोग पुलिस या नौकरशाही में रहते हैं आम तौर पर उनका रुझान कांग्रेस या भाजपा जैसी सत्ताधारी पार्टियों की तरफ दिखता है लेकिन आपने आइपीएफ के राष्ट्रीय प्रवक्ता के बतौर अपनी भूमिका क्यों चुनी?
उत्तर: मैंने किसी व्यक्तिगत लाभ के लिए राजनीति को नहीं चुना है। मैं डॉ. आंबेडकर की इस बात से प्रेरित रहा हूँ कि राजनीति सब समस्याओं के समाधान की चाबी है और राजनीतिक सत्ता का उपयोग समाज के विकास के लिए किया जाना चाहिए। मैंने आइपीएफ को ही इस दिशा में र्इमानदारी से काम करते हुआ पाया है। मैं ही नहीं इस आंदोलन को भारत सरकार के पूर्व वित्त एवं वाणिज्य सचिव व योजना आयोग के सदस्य रहे एसपी शुक्ला, भारत सरकार के पूर्व सचिव प्रो. केबी सक्सेना जैसे तमाम लोंगो का समर्थन प्राप्त है। इसकी राष्ट्रीय अध्यक्ष योजना आयोग के उपाध्यक्ष रहे डी आर गाडगिल की पुत्री प्रख्यात अर्थशास्त्री डॉ. सुलभा ब्रहमें और राष्ट्रीय प्रवक्ता मलेशिया की मशहूर उत्तरा विश्वविधालय में कानून के प्रोफेसर निहालुददीन अहमद है।
प्रश्न: आपने राबर्टसगंज चुनाव क्षेत्र को ही क्यों चुना। मिर्जापुर, सोनभद्र और चंदौली के पहाड़ी इलाकों के पिछड़ेपन के पीछे आप क्या कारण समझते हैं और इसे हल कैसे करेंगे?
उत्तर: मुझे नौकरी के दौरान भी विभिन्न जांचों के सम्बन्ध में इस क्षेत्र को देखने का मौका मिला था, इस लिहाज से यह मेरा जाना पहचाना क्षेत्र है। मेंने देखा है कि यह इलाका प्राकृतिक संसाधनों और कृषि के लिहाज से बेहद समृद्ध है और इसमें इतनी क्षमता है कि यह प्रदेश की बिजली की सारी जरूरतों को पूरा कर सकता है .  इसके  कृषि के विकास में यह उत्तर प्रदेश का सब से अधिक पिछड़ा इलाका बना हुआ है। वनाधिकार कानून को लागू कराने के लिए भी हमें हार्इकोर्ट से आदेश कराना पड़ा। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी नदियों और पहाड़ों का अवैध खनन हुआ। आप देख सकते है यहां की वायु व जल विषाक्त हो गया है।
प्रश्न: आप के चुनाव के प्रमुख मुद्दे क्या हैं?
उत्तर: सोनभद्र, चंदौली और मिर्ज़ापुर के पहाड़ी क्षेत्र के विकास के लिए कें लिए सरकार से विशेष पैकेज दिलवाना, वनाधिकार कानून को सख्ती से लागू कराकर आदिवासियों और अन्य परम्परागत वनाश्रित जातियों को उनके कब्जे की जमीन का मालिकाना हक दिलाना, ठेकेदारी प्रथा में लगे मजदूरों को नियमित नौकरी और वेतनमान दिलवाना, पूरे क्षेत्र में पेयजल, बिजली, अस्पताल और शिक्षा की व्यवस्था सुनिशिचत करवाना और कृषि के विकास के लिए सिचांर्इ हेतु पानी, कृषि आधारित उधोग व कोल्ड स्टोरेज का निर्माण कराना और किसानों को उपज का उचित मूल्य दिलवाना, विस्थापितों के अधिकारों की गारंटी, पर्यावरण की सुरक्षा और मानवाधिकारों की रक्षा, सामाजिक न्याय के अधिकारों को दिलाना मेरे चुनाव के प्रमुख मुद्दे हैं। मुझे बेहद तकलीफ हुर्इ जब मैंने यहां खेतों में टमाटर को सड़ते हुए देखा।
प्रश्न: भ्रष्टाचार, महंगार्इ और रोजगार जैसे इस समय के ज्वलंत राष्ट्रीय सवालों पर आपका नजरिया क्या है?
उत्तर: यह तो हमारे आंदोलन के राष्ट्रीय मुददे है। वैसे हम आपको बताना चाहेंगे और आप जानते भी होंगे कि आइपीएफ के राष्ट्रीय संयोजक अखिलेन्द्र प्रताप सिंह ने पूरे राजनीतिक तंत्र को भ्रष्ट कर रहे बड़े पूंजी घराने यानी कारपोरेट जगत को लोकपाल कानून के दायरे में लाने, महंगार्इ पर नियंत्रण के लिए वायदा कारोबार रोकने और रोजगार को संविधान का मूल अधिकार बनाने जैसे सवालों को लेकर संसद के अंतिम सत्र में दिल्ली में जंतर-मंतर पर दस दिवसीय उपवास किया है।
प्रश्न: लोकसभा के 543 सदस्यों में से अलग आप की क्या विशिष्ट भूमिका होगी?
उत्तर: देखिए यह विडम्बना है कि देश के ज्वलंत सवाल और जनता की जिदंगी के महत्वपूर्ण मुददे संसद में नहीं उठ पा रहे है। इसी प्रकार आप देखेंगे कि आजकल नीतियों के मामलों में भी दलों में कोर्इ खास अतंर रह नहीं गया है। ऐसी सिथति में लोगों की जिदंगी के लिए महत्वपूर्ण उन सवालों को जो मेरे चुनाव के भी मुददे है और जिन्हें आइपीएफ समेत जनांदोलनों की ताकतें और इंसाफ पसंद नागरिक उठाते रहे है उन्हें संसद में उठाने और हल कराने में मैं अपनी भूमिका देखता हूं। मैं समझता हूं कि 543 में कुछ लोग इन सवालों पर देश का ध्यान आकर्षित कराने के लिए संसद में पहुंचे।
प्रश्न: आप इस चुनाव को जनमत संग्रह के रूप में ले रहें हैं। जनता का रुझान आप को कैसा दिखता है?
उत्तर: मुझे जनता का भारी समर्थन प्राप्त हो रहा है।

प्रश्न: आमिर खान के 'सत्यमेव जयते' कार्यक्रम के 'पुलिस सुधार' एपिसोड में पुलिस अधिकारी के बतौर आप ने कहा है कि हमारे यहाँ 'डंडा तफ्तीश' होती है। इसका क्या मतलब है?
उत्तर: 'डंडा तफ्तीश'' से मेरा मतलब पुलिस द्वारा गिरफ्तार व्यक्ति के साथ गैर कानूनी ढंग से मारपीट करके जबरदस्ती अपराध कबूल करवाना है जिसके कारण कर्इ बार उनकी मौत भी हो जाती है। इस प्रकार के उत्पीड़न को रोकने के लिए टार्चर के विरुद्ध कानून बनाया जाना चाहिए और कानून के शासन को सख्ती से लागू किया जाना चाहिए।
प्रस्तुति
दिनकर कपूर
संपर्कः dinkarjsm786@rediffmail.com


श्रमिक कल्याण में डॉ. अंबेडकर की ऐतिहासिक भूमिका

श्रमिक कल्याण में डॉ. अंबेडकर की ऐतिहासिक भूमिका एस.आर. दारापुरी , राष्ट्रीय अध्यक्ष , अखिल भारतीय पीपुल्स फ्रंट (आज 1 मई को अंतर्राष्...