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सोमवार, 2 जून 2025

भारत में दलितों पर नवउदारवादी आर्थिक नीति का क्या प्रभाव है?

भारत में दलितों पर नवउदारवादी आर्थिक नीति का क्या प्रभाव है?

एस आर दारापुरी, राष्ट्रीय अध्यक्ष, आल इंडिया पीपुल्स फ्रन्ट

भारत में दलितों पर नवउदारवादी आर्थिक नीतियों का प्रभाव एक जटिल और बहुआयामी मुद्दा है, जो अवसरों और चुनौतियों दोनों को दर्शाता है। 1991 के आर्थिक सुधारों (उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण, या एलपीजी) के माध्यम से भारत में प्रमुखता से पेश किए गए नवउदारवाद ने अर्थव्यवस्था को बाजार-उन्मुखीकरण की ओर स्थानांतरित कर दिया, राज्य के हस्तक्षेप को कम कर दिया और वैश्विक व्यापार और निवेश के लिए खोल दिया। दलितों के लिए - जाति व्यवस्था के कारण ऐतिहासिक रूप से हाशिए पर रहे - इन नीतियों के सकारात्मक और नकारात्मक दोनों परिणाम हुए हैं, जो उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति और जाति-आधारित भेदभाव की निरंतरता से प्रभावित हुए हैं।

सकारात्मक प्रभाव

1. आर्थिक अवसर और गतिशीलता

- नवउदारवादी नीतियों ने आईटी, सेवाओं और विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में विकास को बढ़ावा दिया है, जिससे नए रोजगार के अवसर पैदा हुए हैं। कुछ दलितों के लिए, विशेष रूप से शिक्षा तक पहुँच रखने वालों के लिए, इसने ऊपर की ओर गतिशीलता को सक्षम किया है। दलित भारतीय वाणिज्य एवं उद्योग मंडल (DICCI) जैसे संगठनों द्वारा समर्थित दलित उद्यमियों का उदय इस बदलाव को दर्शाता है। उदाहरण के लिए, मिलिंद कांबले जैसे लोगों ने "नौकरी चाहने वालों" से "नौकरी देने वालों" की ओर बढ़ने को उजागर किया है, जो नई आर्थिक एजेंसी का संकेत है।

- शहरीकरण और औद्योगिकीकरण ने पारंपरिक जाति-आधारित व्यवसायों (जैसे, मैनुअल स्कैवेंजिंग या बंधुआ मजदूरी) को कमजोर कर दिया है, जिससे कुछ दलितों को जाति मानदंडों से कम बंधे आधुनिक कार्यबल क्षेत्रों में प्रवेश करने की अनुमति मिली है।

2. शिक्षा और कौशल विकास

- निजी क्षेत्र के बढ़ते निवेश और वैश्वीकरण ने शिक्षा और व्यावसायिक प्रशिक्षण तक पहुंच का विस्तार किया है, हालांकि असमान रूप से। सरकारी कार्यक्रमों ने, कुशल श्रम की बाजार-संचालित मांग के साथ मिलकर, कुछ दलितों को योग्यता प्राप्त करने और उदार अर्थव्यवस्था में प्रतिस्पर्धा करने में सक्षम बनाया है।

 

- शिक्षा और नौकरियों में आरक्षण की नीतियाँ, हालांकि नवउदारवाद से पहले की हैं, निजी संस्थानों के बढ़ने के साथ अतिरिक्त प्रासंगिकता प्राप्त कर ली हैं, जिससे दलितों को शामिल करने के लिए अधिक अवसर मिल रहे हैं।

3. एक धर्मनिरपेक्ष स्थान के रूप में बाजार

- बाजार अर्थव्यवस्था, सिद्धांत रूप में, जाति पदानुक्रम के बजाय योग्यता और लाभ पर काम करती है। इसने दलितों को एक ऐसी प्रणाली में भाग लेने के अवसर प्रदान किए हैं जहाँ जाति की पहचान उच्च जातियों के वर्चस्व वाले पारंपरिक कृषि व्यवस्था की तुलना में कम स्पष्ट रूप से बाधा है।

नकारात्मक प्रभाव

1. बढ़ती असमानता

- नवउदारवादी नीतियों ने उच्च जातियों और वर्गों को असमान रूप से लाभ पहुँचाया है, जिससे आय और धन असमानताएँ बढ़ गई हैं। विश्व असमानता डेटाबेस जैसे अध्ययनों से पता चलता है कि 1991 के सुधारों के बाद, भारत की आबादी के शीर्ष 1% ने अपनी संपत्ति का हिस्सा तेज़ी से बढ़ाया, जबकि निचले 50% - जहाँ दलितों का प्रतिनिधित्व अधिक है - में ठहराव या गिरावट देखी गई। दलित, अक्सर कम पूंजी या भूमि के साथ शुरुआत करते हैं, बाजार के अवसरों का लाभ उठाने में कम सक्षम रहे हैं। - अनौपचारिक क्षेत्र, जहाँ अधिकांश दलित काम करते हैं (जैसे, मज़दूर या छोटे विक्रेता के रूप में), कम श्रम सुरक्षा और बहुराष्ट्रीय निगमों से प्रतिस्पर्धा के कारण बढ़ी हुई अनिश्चितता का सामना कर रहा है।

2. कल्याण और सार्वजनिक सेवाओं का क्षरण

नवउदारवाद के तहत राज्य के पीछे हटने से कल्याण तंत्र कमज़ोर हो गया है, जिस पर दलित ऐतिहासिक रूप से निर्भर थे, जैसे सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) और सब्सिडी वाली स्वास्थ्य सेवा। निजीकरण ने आर्थिक साधनों के बिना उन लोगों के लिए आवश्यक सेवाओं को कम सुलभ बना दिया है, जो भारत के सबसे ग़रीब लोगों में से एक दलितों को असमान रूप से प्रभावित कर रहे हैं।

उदाहरण के लिए, सार्वजनिक क्षेत्र की नौकरियों में कटौती - जो कभी आरक्षण के माध्यम से दलितों के रोजगार का एक प्रमुख रास्ता था - ने सुरक्षित आजीविका के विकल्पों को सीमित कर दिया है।

3. भूमि और कृषि चुनौतियाँ

दलित, जिनके पास भारत की भूमि का केवल 2.2% हिस्सा है, जबकि राष्ट्रीय औसत 17.9% है, नवउदारवादी कृषि नीतियों द्वारा उन्हें और भी हाशिए पर डाल दिया गया है। नकदी फसलों, कॉर्पोरेट खेती और औद्योगिक परियोजनाओं के लिए भूमि अधिग्रहण की ओर बदलाव ने कई दलित किसानों और मजदूरों को विस्थापित कर दिया है, जिससे उनकी आर्थिक सुरक्षा कम हो गई है। - 2020 के कृषि कानूनों को नवउदारवादी सुधारों के विस्तार के रूप में देखा जाता है, जिससे दलित श्रमिक संघों के बीच पीडीएस को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने और पल्लेदारों (बोरी उठाने वालों) जैसे श्रमिकों के लिए आजीविका के नुकसान के बारे में चिंताएं पैदा हो गई हैं, क्योंकि आवश्यक वस्तुओं पर स्टॉकहोल्डिंग सीमा में ढील दी गई थी।

4.*लगातार भेदभाव

- बाजार के धर्मनिरपेक्ष वादे के बावजूद, जाति-आधारित भेदभाव नियुक्ति, वेतन और संसाधनों तक पहुँच में जारी है। दलितों को कार्यस्थलों पर, यहाँ तक कि आधुनिक क्षेत्रों में भी, उत्पीड़न और बहिष्कार का सामना करना पड़ता है, जिससे आर्थिक उदारीकरण के लाभ सीमित हो जाते हैं। अध्ययनों से पता चलता है कि नवउदारवाद ने सामाजिक पदानुक्रम को खत्म नहीं किया है, बल्कि उनके ऊपर आर्थिक असमानता की परतें बिछा दी हैं।

5. आर्थिक झटकों के प्रति संवेदनशीलता

- भारत की अर्थव्यवस्था के उदारीकरण ने वैश्विक बाजार में उतार-चढ़ाव के प्रति इसके जोखिम को बढ़ा दिया है, जैसा कि 2008 के वित्तीय संकट और कोविड-19 महामारी के दौरान देखा गया था। कम वेतन वाली, अस्थिर नौकरियों में केंद्रित दलितों ने इन झटकों का खामियाजा भुगता। उदाहरण के लिए, महामारी के कारण अनौपचारिक क्षेत्र में बड़े पैमाने पर नौकरियाँ चली गईं, जिससे कई दलित परिवार और भी ज़्यादा गरीबी और भुखमरी की ओर बढ़ गए।

व्यापक सामाजिक-राजनीतिक संदर्भ

- राजनीतिक सशक्तीकरण बनाम आर्थिक अनिश्चितता: जबकि दलितों ने बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) जैसी पार्टियों और आरक्षण नीतियों के माध्यम से राजनीतिक प्रतिनिधित्व प्राप्त किया है, नवउदारवाद ने अक्सर सामाजिक न्याय पर कॉर्पोरेट हितों को प्राथमिकता देकर इन लाभों को कमज़ोर कर दिया है। कल्याणकारी राज्य के पतन ने दलितों की राजनीतिक शक्ति को आर्थिक समानता हासिल करने में कम प्रभावी बना दिया है।

- प्रतिरोध और अनुकूलन: दलित आंदोलनों ने भूमि अधिकारों, श्रम सुरक्षा और न्यायसंगत विकास की वकालत करके नवउदारवादी चुनौतियों का जवाब दिया है। दलित उद्यमिता का उदय अनुकूलन का एक रूप है, हालांकि यह एक छोटे, शिक्षित अभिजात वर्ग तक ही सीमित है।

निष्कर्ष

नवउदारवादी आर्थिक नीति ने भारत में दलितों को मिश्रित लाभ दिया है: इसने कुछ लोगों के लिए, विशेष रूप से शहरी और शिक्षित क्षेत्रों में आर्थिक भागीदारी और गतिशीलता के द्वार खोले हैं, लेकिन इसने असमानता को भी गहरा किया है, कल्याणकारी समर्थन को खत्म किया है, और बहुसंख्यकों को बाजार की ताकतों और लगातार जातिगत भेदभाव के प्रति संवेदनशील बना दिया है। दलितों के लिए बढ़ती लहरों का वादा पूरी तरह से साकार नहीं हुआ है, क्योंकि संरचनात्मक बाधाएं - भूमिहीनता, पूंजी की कमी और सामाजिक बहिष्कार - समान रूप से लाभ उठाने की उनकी क्षमता को सीमित करती रहती हैं। इन असमानताओं को दूर करने के लिए लक्षित राज्य हस्तक्षेप, मजबूत श्रम सुरक्षा और ऐसी नीतियों की आवश्यकता है जो बाजार उदारीकरण के साथ-साथ समावेशी विकास को प्राथमिकता दें।

साभार: grok 3


शनिवार, 20 जनवरी 2024

उत्तर प्रदेश में दलित-आदिवासी और भूमि का प्रश्न

 

उत्तर प्रदेश में दलित-आदिवासी और भूमि का प्रश्न

-    एस आर दारापुरी, राष्ट्रीय प्रवक्ता, आल इंडिया पीपुल्स फ्रन्ट

2011 की जनगणना के अनुसार उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जाति (दलित) की कुल आबादी 4.13 करोड़ है जो उत्तर प्रदेश की कुल आबादी का लगभग 21% है। इसी जनगणना के अनुसार उत्तर प्रदेश में दलितों के 61.91 लाख परिवार हैं जो उत्तर प्रदेश के कुल परिवारों का 23% हैं। इसी प्रकार उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जनजाति (आदिवासी) की कुल आबादी लगभग 11.34 लाख है जो उत्तर प्रदेश की कुल आबादी का लगभग 1% है। इसमें आदिवासियों के लगभग 1.77 लाख परिवार हैं।

उपरोक्त जनगणना के अनुसार उत्तर प्रदेश में लगभग 42% दलित परिवार भूमिहीन एवं हाथ का श्रम करने वाले हैं। दलित परिवारों में से केवल 2.93% सरकारी, 1.14% गैर सरकारी तथा 1.92% निजी क्षेत्र में अर्थात लगभग 6% ही नौकरी पेशा हैं। शेष 94% मजदूरी तथा अन्य  पेशों में हैं। इसी प्रकार 35.30% आदिवासी परिवार भूमिहीन तथा हाथ का श्रम करने वाले हैं। इनमें से 3.54% सरकारी, 1.63% गैर सरकारी तथा 2.95% निजी क्षेत्र में अर्थात 8% परिवार ही नौकरी पेशा हैं। शेष 92% मजदूर तथा अन्य पेशों में हैं।

इसी जनगणना के अनुसार उत्तर प्रदेश के 82.40% परिवारों की आय 5000 प्रतिमाह से कम है। 13.25% परिवारों की आय 5000 से 10,000 तथा 4.29% परिवारों की  आय 10,000 प्रतिमाह से अधिक है। सरकारी नौकरी से 5000 से अधिक आय वाले परिवारों की संख्या केवल 2.71% ही है। 2011 की जनगणना के अनुसार उत्तर प्रदेश में 81.35% आदिवासी परिवारों की आय 5000 प्रतिमाह से कम है। 13.82% परिवारों की आय 5000 से 10,000 के बीच तथा 4.81% परिवारों की आय 10,000 प्रतिमाह से अधिक है। केवल 3.31% प्रतिशत परिवारों की सरकारी नौकरी से 5000 से अधिक आय है।

2011 की जनगणना के अनुसार उत्तर प्रदेश में 15.69% दलित परिवारों के पास असिंचित, 42.06% के पास सिंचित तथा 9.12% परिवारों के पास अन्य भूमि उपलब्ध है। इसी प्रकार 28.16% आदिवासी परिवारों के पास असिंचित, 39.33% के पास सिंचित तथा 12.50% के पास अन्य भूमि थी।

उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि उत्तर प्रदेश के दलित अधिकतर भूमिहीन, अल्प आय तथा बेरोजगार हैं जोकि उनके सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक पिछड़ापन का मुख्य कारण है। भूमिहीन तथा केवल हाथ का श्रम करने वाले होने के कारण गाँव में वे अधिकतर कृषि मजदूर का काम करते हैं। अपने जानवरों के लिए चारा तथा टट्टी पेशाब के लिए भी उन्हें दूसरे के खेतों में जाना पड़ता है। भूमिहीन तथा बेरोजगार होने के कारण उन्हें ऊंची जातियों के अत्याचार तथा शोषण को झेलना पड़ता है। इसी कमजोरी को चिह्नित करते हुए डा. अंबेडकर ने आगरा  में अपने भाषण में कहा था, “मेरे ग्रामीण भाइयों पर अत्याचार होता है क्योंकि उनके पास जमीन नहीं है। इसी लिए अब मैं उनके लिए जमीन की लड़ाई लड़ूँगा।“

यह भी सर्वविदित है कि भारत एक कृषि प्रधान देश है और इसकी लगभग 60% आबादी कृषि से किसान तथा खेतिहर मजदूर के तौर पर जुड़ी हुई है। उपरोक्त आंकड़ों से यह भी स्पष्ट है कि उत्तर प्रदेश में भी अधिकतर दलित एवं आदिवासी भूमिहीन हैं और वे केवल हाथ की मजदूरी ही कर सकते हैं। भूमिहीनता और केवल हाथ की मजदूरी उनकी सब से बड़ी दुर्बलताएं हैं। इनके कारण न तो वे जातिभेद और छुआछूत के कारण अपने ऊपर होने वाले अत्याचारों का मजबूती से सामना कर पाते हैं और न ही मजदूरी के सवाल पर सही ताकत से लड़ाई। क्योंकि खेती में रोज़गार केवल मौसमी होता है, अतः उन्हें शेष समय मजदूरी के लिए अन्यत्र खोजना पड़ता है या फिर बेरोजगार रहना पड़ता है।

ग्रामीण क्षेत्र में यह भी एक यथार्थ है कि भूमि न केवल उत्पादन का साधन है बल्कि यह सम्मान और सामाजिक दर्जे का भी प्रतीक है। गाँव में जिस के पास ज़मीन है वह न केवल आर्थिक तौर पर मज़बूत है बल्कि सामाजिक तौर पर भी सम्मानित है। अब चूँकि अधिकतर दलितों के पास न तो ज़मीन है और न ही नियमित रोज़गार, अतः वे न तो सामाजिक तौर पर सम्मानित हैं और न ही आर्थिक तौर पर मज़बूत। ग्रामीण क्षेत्र में दलित तभी सशक्त हो सकते हैं जब उन के पास ज़मीन आये और उन्हें नियमित रोज़गार मिले। अतः भूमि वितरण और सुरक्षित रोज़गार की उपलब्धता दलितों और आदिवासियों तथा अन्य भूमिहीनों की प्रथम ज़रूरत है।

भारत के स्वतंत्र होने पर देश में संसाधनों के पुनर्वितरण हेतु ज़मींदारी व्यवस्था समाप्त करके भूमि सुधार लागू किये गए थे। इस द्वारा देश में व्याप्त भूमि सीमारोपण कानून बनाये गए थे जिस से भूमिहीनों को आवंटन के लिए भूमि उपलब्ध करायी जानी थी। परन्तु इन कानूनों को लागू करने में बहुत बेईमानी की गयी क्योंकि उस समय सत्ताधारी पार्टी कांग्रेस में अधिकतर नेता पुराने ज़मीदार ही थे और प्रशासन में भी इसी वर्ग का बर्चस्व था। इसी लिए एक तो इन कानूनों से बहुत कम ज़मीन निकली और जो निकली भी उसका भूमिहीनों को वितरण नहीं किया गया। परिणामस्वरूप इन कानूनों को लागू करने से पहले जिन लोगों के पास उक्त ज़मीन थी वह उनके पास ही बनी रही। आज भी विभिन्न राज्यों में बेनामी और ट्रस्टों व मंदिरों के नाम हजारों हजारों एकड़ ज़मीन बनी हुई है. उत्तर प्रदेश में भी यही स्थिति है।

सामाजिक-आर्थिक एवं जाति जनगणना के आंकड़ों के विश्लेषण से स्पष्ट है ग्रामीण क्षेत्र के दलितों एवं आदिवासियों के लिए भूमि का प्रश्न सब से महत्वपूर्ण प्रश्न है जिसे भूमि सुधारों को सही ढंग से लागू किये बिना हल करना संभव नहीं है। परन्तु यह बहुत बड़ी बिडम्बना है कि भूमि सुधार और भूमि वितरण किसी भी दलित अथवा गैर दलित राजनीतिक पार्टी के एजंडे पर नहीं है. अतः दलितों एवं आदिवासियों का तब तक सशक्तिकरण संभव नहीं है जब तक उन्हें भूमि वितरण द्वारा भूमि उपलब्ध नहीं करायी जाती।

यह ज्ञातव्य है कि उत्तर प्रदेश में 1995 से लेकर 2012 तक मायावती चार बार मुख्य मंत्री रही है। उसके शासन काल में केवल 1995 तथा 1997 में उत्तर प्रदेश के मध्य तथा पच्छिमी क्षेत्र को छोड़ कर शेष भागों में कोई भी भूमि आवंटन नहीं किया गया। पूर्वी उत्तर प्रदेश जहाँ दलितों की सब से घनी आबादी है, में तो गोरखपुर को छोड़ कर कहीं भी भूमि आवंटन नहीं हुआ, वह भी एक अधिकारी (हरीश चंद्र, आयुक्त गोरखपुर) के प्रयासों के फलस्वरूप ही। ऐसा नहीं है कि उत्तर प्रदेश में आवंटन के लिए भूमि उपलब्ध नहीं थी। 1995 में उत्तर प्रदेश में सीलिंग की अतिरिक्त भूमि, ग्राम समाज तथा भूदान की इतनी भूमि उपलब्ध थी कि उससे न केवल दलित बल्कि अन्य जातियों के भूमिहीनों को भी गुज़ारे लायक भूमि मिल सकती थी परन्तु मायावती ने उसका आवंटन नहीं किया।  इतना ही नहीं जो भूमि पूर्व में आवंटित थी उसके कब्ज़े दिलाने के लिए भी कोई कार्रवाही नहीं की। 1997 के बाद तो फिर सर्वजन की राजनीति के चक्कर में न तो कोई आवंटन किया गया और न ही कोई कब्ज़ा ही दिलवाया गया।

उत्तर प्रदेश में जब 2002 में मुलायम सिंह यादव की सरकार आई तो उन्होंने राजस्व कानून में संशोधन करके दलितों की भूमि आवंटन की वरीयता को ही बदल दिया और उसे अन्य भूमिहीन वर्गों के साथ जोड़ दिया।  उनकी सरकार में भूमि आवंटन तो हुआ परन्तु ज़मीन दलितों को न दे कर अन्य जातियों को दी गयी। इसके साथ ही उन्होंने कानून में संशोधन करके दलितों की ज़मीन को गैर दलितों द्वारा ख़रीदे जाने वाले प्रतिबंध को भी हटा दिया। उस समय तो यह कानूनी संशोधन टल गया था परन्तु बाद में उन्होंने इसे विधिवत कानून का रूप दे दिया। इस प्रकार मायावती द्वारा दलितों को भूमि आवंटन न करने, मुलायम सिंह द्वारा कानून में दलितों की भूमि आवंटन की वरीयता को समाप्त करने के कारण उत्तर प्रदेश के दलितों को भूमि आवंटन नहीं हो सका और ग्रामीण क्षेत्र में उनकी स्थिति अति दयनीय बनी हुई है।

आदिवासियों के सशक्तिकरण हेतु वनाधिकार कानून- 2006 तथा नियमावली 2008 में लागू हुई  थी  इस कानून के अंतर्गत सुरक्षित जंगल क्षेत्र में रहने वाले आदिवासियों तथा गैर आदिवासियों को उनके कब्ज़े की आवासीय तथा कृषि भूमि का पट्टा दिया जाना था। इस सम्बन्ध में आदिवासियों द्वारा अपने दावे प्रस्तुत किये जाने थे. उस समय उत्तर प्रदेश में मायावती की सरकार थी परन्तु उसकी सरकार ने इस दिशा में कोई भी प्रभावी कार्रवाही नहीं की जिस का नतीजा यह हुआ कि 30.1.2012 को उत्तर प्रदेश में आदिवासियों द्वारा प्रस्तुत कुल 92,406 दावों में से 74,701 दावे अर्थात 81% दावे रद्द कर दिए गए थे और केवल 17,705 अर्थात केवल 19% दावे स्वीकार किये गए तथा कुल 1,39,777 एकड़ भूमि ही आवंटित की गयी थी।

मायावती सरकार की आदिवासियों को भूमि आवंटन में लापरवाही और दलित/आदिवासी विरोधी मानसिकता को देख कर आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में जनहित याचिका दाखिल की थी जिस पर हाई कोर्ट ने अगस्त, 2013 में राज्य सरकार को वनाधिकार कानून के अंतर्गत सभी दावों को पुनः सुन कर तेज़ी से निस्तारित करने के आदेश दिए थे परन्तु उस पर भी कोई ध्यान नहीं दिया गया। इस प्रकार मायावती तथा अखिलेश की  सरकार की लापरवाही तथा दलित/आदिवासी विरोधी मानसिकता के कारण 81% दावे रद्द कर दिए गए।

आइये अब ज़रा वनाधिकार कानून को लागू करने के बारे में भाजपा की योगी सरकार की भूमिका को भी देख लिया जाए। यह सर्विदित है कि भाजपा ने उत्तर प्रदेश के 2017 विधान सभा चुनाव में अपने संकल्प पत्र में लिखा था कि यदि उसकी सरकार बनेगी तो ज़मीन के सभी अवैध कब्जे (ग्राम सभा तथा वनभूमि) खाली कराए जायेंगे। मार्च 2017 में सरकार बनने पर जोगी ने इस पर तुरंत कार्रवाही शुरू कर दी और इसके अनुपालन में ग्राम समाज की भूमि तथा जंगल की ज़मीन से उन लोगों को बेदखल किया जाने लगा जिन का ज़मीन पर कब्ज़ा तो था परन्तु उनका पट्टा उनके नाम नहीं था। इस आदेश के अनुसार 13 जिलों के वनाधिकार के ख़ारिज हुए 74,701 दावेदारों को भी बेदखल किया जाना था। जब योगी सरकार ने बेदखली की कार्रवाही शुरू की तो इस के खिलाफ हम लोगों को फिर इलाहाबाद हाई कोर्ट की शरण में जाना पड़ा। हम लोगों ने बेदखली की कार्रवाही को रोकने तथा सभी दावों के पुनर परीक्षण का अनुरोध किया। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने हमारे अनुरोध पर बेदखली की कार्रवाही पर रोक लगाने, सभी दावेदारों को छुटा हुआ दावा दाखिल करने तथा पुराने दावों पर अपील करने के लिए एक महीने का समय दिया तथा सरकार को तीन महीने में सभी दावों की पुनः सुनवाई करके निस्तारण करने का आदेश दिया। परंतु उक्त अवधि पूर्ण हो जाने के बाद भी सरकार द्वारा इस संबंध में कोई भी कार्रवाही नहीं की गयी।

कुछ वर्ष पहले वाईल्ड लाइफ ट्रस्ट आफ इंडिया द्वारा सुप्रीम कोर्ट में वनाधिकार कानून की वैधता को चुनौती दी गयी तथा वनाधिकार के अंतर्गत निरस्त किये गये दावों से जुड़ी ज़मीन को खाली करवाने हेतु सभी राज्य सरकारों को आदेशित करने का अनुरोध किया गया था। मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में आदिवासियों/वनवासियों का पक्ष नहीं रखा। परिणामस्वरूप सुप्रीम कोर्ट ने 24 जुलाई, 2019 तक वनाधिकार के ख़ारिज हुए सभी दावों की ज़मीन खाली कराने का आदेश पारित कर दिया। इससे पूरे देश में प्रभावित होने वाले परिवारों की संख्या 20 लाख है जिसमें उत्तर प्रदेश के 74,701  परिवार हैं। इस आदेश के विरुद्ध हम लोगों ने आदिवासी वनवासी महासभा के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट में फिर गुहार लगाई जिसमें हम लोगों ने बेदखली पर अपने आदेश पर रोक तथा सभी राज्यों को सभी दावों का पुनर्परीक्षण करने का अनुरोध किया। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने हमारे अनुरोध को स्वीकार करते हुए 10 जुलाई, 2019 तक बेदखली पर रोक तथा सभी राज्यों को सभी दावों की पुन: सुनवाई का आदेश दिया था परंतु दो वर्ष बीत जाने पर इस पर कोई कार्रवाही नहीं की गई है.

उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि किस तरह पहले मायावती और फिर अखिलेश यादव की सरकार ने दलितों, आदिवासियों और परंपरागत वनवासियों को वनाधिकार कानून के अंतर्गत भूमि के अधिकार से वन्चित किया है और भाजपा सरकार में उन पर बेदखली की तलवार लटकी हुई है। यह विचारणीय है कि यदि मायावती और अखिलेश यादव ने अपने कार्यकाल में इन लोगों के दावों का विचरण कर उन्हें भूमि का अधिकार दे दिया होता तो आज उनकी स्थिति इतनी दयनीय नहीं होती। इसी प्रकार यदि मायावती ने अपने शासन काल में भूमिहीनों को ग्रामसभा की ज़मीन जो आज भी दबंगों के कब्जे में है, के पट्टे कर दिए होते तो उनकी आर्थिक हालत कितनी बदल चुकी होती। अतः यह विचारणीय है कि क्या मायावती और अखिलेश यादव जोकि सामाजिक न्याय के नाम पर सरकार बनाते रहे हैं ने दलितों-आदिवासियों को कोई सामाजिक न्याय दिया है. भाजपा तो सामाजिक न्याय की जगह समरसता की बात करती है जोकि यथास्थितिवाद  है। क्या उत्तर प्रदेश के दलित आदिवासी आगामी विधान सभा चुनाव में अपने साथ किए गए उपरोक्त अन्याय के लिए सपा, बसपा और भाजपा से जवाब नहीं मांगेंगे?

अतः अगर उत्तर प्रदेश के दलितों और आदिवासियों का वास्तविक सशक्तिकरण करना है तो वह भूमि सुधारों को कड़ाई से लागू करके तथा भूमिहीनों को भूमि आवंटित करके ही किया जा सकता है। इसके लिए वांछित स्तर की राजनीतिक इच्छा शक्ति की ज़रूरत है जिस का वर्तमान में सर्वथा अभाव है. अतः भूमि सुधारों को लागू कराने तथा भूमिहीन दलितों/आदिवासियों को भूमि आवंटन कराने के लिए एक मज़बूत भूमि आन्दोलन चलाये जाने की आवश्यकता है। इस आन्दोलन को बसपा जैसी अवसरवादी और केवल जाति की राजनीति करने वाली पार्टी नहीं चला सकती है क्योंकि इसे सभी प्रकार के आंदोलनों से परहेज़ है. समाजवादी पार्टी भी केवल सत्ता की राजनीति करती है। उसे भी दलितों आदिवासियों के सशक्तिकरण से कोई सरोकार नहीं है।

आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट ने हमेशा भूमि सुधार और भूमि आवंटन को अपने एजंडे में प्रमुख स्थान दिया है और इसके लिए अदालत में तथा ज़मीन पर भी लड़ाई लड़ी है।  इसी पार्टी ने उत्तर प्रदेश में वनाधिकार कानून को ईमानदारी से लागू कराने के लिए इलाहाबाद उच्च न्यायालय तथा सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिकाएं  दायर करके आदेश भी प्राप्त किया था जिसे मायावती और अखिलेश की सरकार ने विफल कर दिया। अतः आइपीएफ सभी दलित/आदिवासी हितैषी संगठनों और दलित राजनीतिक पार्टियों का आवाहन करता है कि वे अगर सहमत हों तो उत्तर प्रदेश के 2022  के चुनाव में भूमि सुधार और भूमि आवंटन को सभी राजनीतिक पार्टियों के एजंडे में शामिल कराने के लिए जन दबाव बनाने हेतु एक मंच पर आएं।

 

 

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