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रविवार, 2 नवंबर 2025

दलित राजनीति को चाहिए एक नया रेडिकल एजंडा

 

दलित राजनीति को चाहिए एक नया रेडिकल एजंडा  

-    एस आर दारापुरी, राष्ट्रीय अध्यक्ष, आल इंडिया पीपुल्स फ्रन्ट

डा. अंबेडकर दलित राजनीति के जनक माने जाते हैं। उन्होंने ही सबसे पहले 1936 में स्वतंत्र मजदूर पार्टी, 1942 में शैडयूलड कास्ट्स फेडरेशन और 1956 में रिपब्लिकन पार्टी आफ इंडिया (आरपीआई) बनाई थी। इन पार्टियों में एक खास बात यह थी कि शैडयूलड कास्ट्स फेडरेशन को छोड़ कर कोई भी पार्टी जाति आधारित नहीं थी। इन सभी पार्टियों का एजंडा व्यापक था जिसके केंद्र में दलित एजंडा था। यह भी सत्य है कि डा अंबेडकर ने कभी भी जाति के नाम पर वोट नहीं मांग था सिवाय शैडयूलड कास्ट्स फेडरेशन के। डा. अंबेडकर के निर्वाण के बाद 1957 से 1962 तक आरपीआई एजंडा आधारित राजनीति करती रही तब तक उसकी उपलब्धियां काफी अच्छी रहीं परंतु बाद में कांग्रेस द्वारा दलित नेताओं को लालच देकर फोड़ लिया गया और आरपीआई कई टुकड़ों में बाँट कर बिखर गई।

आरपीआई के विघटन के बाद उत्तर भारत में कांशीराम ने बहुजन समाज पार्टी का गठन किया और घोर दलित विरोधी पार्टी भाजपा से हाथ मिला कर तीन बार तथा एक बार स्वतंत्र तौर पर सरकार बनाई। इस पार्टी की सबसे बड़ी कमी इसका कोई भी एजंडा न होना था और न ही कोई सिद्धांत। कांशीराम जाति को काटने के लिए जाति का इस्तेमाल तथा अवसरवादी होने पर गर्व महसूस करते थे। भाजपा के साथ अवसरवादी एवं सिद्धांतहीन गठजोड़ करने का नतीजा यह हुआ कि उत्तर भारत में भाजपा तो निरंतर मजबूत होती गई और बसपा निरंतर कमजोर। वर्तमान में बसपा अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है।

बसपा के प्रयोग से यह बात बिल्कुल स्पष्ट हो गई है कि जाति की राजनीति करने वाली पार्टी बहुत समय तक नहीं चल सकती है। यह केवल एजंडा एवं सिद्धांत ही हैं जो किसी पार्टी को बिखरने से बचाए रखते हैं। यह भी स्थापित सत्य है कि जाति की राजनीति हिन्दुत्व की राजनीति को ही मजबूत करती है जैसाकि वर्तमान में हुआ भी है।  

 कांशीराम राजनीतिक सत्ता को गुरुकिल्ली अर्थात सब समस्याओं का इलाज कहते थे। इसके विपरीत डॉ. बाबासाहेब का मत था कि "राजनीतिक सत्ता शोषित वर्ग के सभी दु:खों का विनाश करने की गुरुकिल्ली नहीं हो सकती। उनकी मुक्ति उन द्वारा उच्च सामाजिक दर्जा हासिल करने में ही है।“ क्या अब भी कहेंगे कि पॉलिटिकल पावर ही मास्टर की है? अब तक के अनुभव ने इसे गलत सिद्ध कर दिया है। उत्तर प्रदेश इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। यह भी सही है कि बाद में बाबासाहेब ने राजनीतिक सत्ता को दलितों की समस्याओं की चाबी भी कहा था परंतु उसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा था कि राजनीतिक सत्ता का इस्तेमाल समाज के विकास के लिये किया जाना चाहिये। परंतु व्यवहार में उसका अधिकतर इस्तेमाल समाज के विकास की जगह व्यक्तिगत विकास के लिये ही किया गया। मायावती इसकी सब से बड़ी मिसाल है। अत: राजनीतिक सत्ता के साथ साथ समाज के विकास का एजेन्डा होना भी ज़रूरी है जोकि बहुजन की राजनीति में बिल्कुल गायब रहा है।

अतः अब अगर दलित राजनीति को अपने आप को पुनर्स्थापित करना है तो उसे सिद्धांत की राजनीति तथा एक रेडिकल दलित एजंडा अपनाना होगा। उस एजंडे की रूपरेखा निम्न हो सकती है:-

1.गरीबी एवं बेरोजगारी: नीति आयोग की 2024 की रिपोर्ट के अनुसार 42% SC दलित परिवार गरीबी रेखा से नीचे हैं जब कि राष्ट्रीय औसत 20% है। PLFS 2023-24 के अनुसार एससी के लिए बेरोज़गारी दर 7.8% जबकि राष्ट्रीय दर 5.8% है । 70% दलित दिहाड़ी मजदूरी या कृषि मजदूरी में हैं।

2011 की जनगणना के अनुसार केवल 4.88% दलित सरकारी तथा 2.42 प्राइवेट नौकरी में हैं। आय की दृष्टि से 83.6% दलितों की मासिक आय 5000 से कम, 11.7% की 5000 से 10,000 तक तथा केवल 4.7% की आय 10,000 से अधिक है।

अतः गरीबी उन्मूलन एवं बेरोजगारी दलित राजनीति का प्रमुख मुद्दा होना चाहिए।

2. भूमिहीनता:  2011 की जनगणना के अनुसार केवल 18.41% दलितों के पास असिंचित एवं 17.41% के पास सिंचित तथा 6.98% के पास अन्य भूमि है। इनमें से 60% दलितों के पास 1 एकड़ से भी कम भूमि है। इस प्रकार अधिकतर दलित लघु एवं सीमांत कृषक हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण सूखाग्रस्त क्षेत्रों में प्रभावित होने वाले किसानों में 80% दलित किसान होते हैं। अतः भूमिहीन दलितों के लिए भूमि आवंटन (आवासीय तथा कृषि भूमि पट्टे) का मुद्दा अति महत्वपूर्ण है जो एक प्रमुख राजनीतिक मांग होना चाहिए।

3. हिंसा एवं अत्याचार: NCRB की 2023 की रिपोर्ट के अनुसार दलितों  के खिलाफ अपराध के 54,750 मामले दर्ज किए गए जो 2022 के मुकाबले से 7% अधिक हैं। इनमें 4,800 बलात्कार और 1,200 हत्याएं शामिल हैं। इसमें उत्तर प्रदेश (25%), राजस्थान (15%), और बिहार (12%) में आधे से ज़्यादा मामले हैं। एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत दोषसिद्धि दर केवल 32% है, जो पुलिस के पूर्वाग्रह और गवाहों को डराने-धमकाने के कारण है। एमनेस्टी इंटरनेशनल (2024) ने अकेले तमिलनाडु में 200 से ज़्यादा ऐसे मामले दर्ज किए हैं जिनकी रिपोर्ट नहीं की गई। वर्तमान में हर 18 मिनट में एक दलित के खिलाफ अपराध होता है, जिसमें रोजाना 13 हत्याएं होती हैं। अतः दलितों पर होने वाले अत्याचार को रोकने के लिए एससी/एसटी एक्ट को प्रभावी ढंग से लागू करने की मांग दलित राजनीति के एजंडा पर होनी चाहिए।

4. छुआछूत एवं भेदभाव: NFHS-5 ग्रामीण डेटा एवं इंडिया ह्यूमन डेवलपमेंट सर्वे 2024 के अनुसार 40% गाँवों में 25-30% दलितों को मंदिरों/पानी के स्रोतों में प्रवेश पर रोक का सामना करना पड़ता है।

इसी प्रकार शहरों में 2023 के CSDS अध्ययन के अनुसार दिल्ली में 70% मकान मालिक दलित  किरायेदारों को मकान देने से मना करते हैं)।

सुप्रीम कोर्ट (2024) ने SC कोटा के उप-वर्गीकरण को बरकरार रखा लेकिन कहा कि "श्रेणीबद्ध असमानता" बनी हुई है। दलित महिलाओं को तिहरे भेदभाव (जाति-लिंग-गरीबी) का सामना करना पड़ता है।

सफाई कर्मचारी आंदोलन की 2024 की रिपोर्ट के अनुसार गटर सफाई से होने वाली सालाना 50-70 मौतें, ऑनर किलिंग, और अंतर-जातीय संबंधों या गौ रक्षा को लेकर भीड़ द्वारा पीट-पीटकर हत्याएं आम बात है। अतः छुआछूत एवं भेदभाव निवारण का मुद्दा भी दलित राजनीति के केंद्र में होना चाहिए।

5. शिक्षा में पिछड़ापन : राष्ट्रीय, जनगणना 2011; NFHS-5 के अनुसार दलितों की साक्षरता दर 66.1% है जबकि राष्ट्रीय दर 73% है। इसके अतिरिक्त दलित बच्चों का कक्षा 8 के बाद ड्रॉपआउट दर 2 गुना ज़्यादा है। (AISHE 2023) के अनुसार उच्च शिक्षा में केवल 7% दलित छात्र हैं। सामाजिक न्याय मंत्रालय की 2023 की ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार 40% दलित  छात्रों को छात्रवृत्ति मिलने में देरी होती है जिससे उन्हें अपनी पढ़ाई चालू रखने में बड़ी कठिनाई होती है। इधर मेडिकल, इंजीनियरिंग  एवं अन्य व्यावसायिक कोर्सेस की फीस कई गुण बढ़ा दी गई है जिसे दलित छात्रों के लिए देना बहुत मुश्किल होता है। हाल में बीजेपी शासित राज्यों में बेसिक तथा माध्यमिक शिक्षा स्तर पर बहुत बड़ी संख्या में विद्यालयों को बंद किया जा रहा है जिससे दलितों के बच्चे महंगे निजी विद्यालयों न पढ़ सकने के कारण शिक्षा से वंचित रह जाएंगे। सरकार शिक्षा का तेजी से निजीकरण कर रही है जो दलित तथा गरीब तबके के बच्चों को शिक्षा से वंचित रखने का षड्यन्त्र है। अतः शिक्षा के निजीकरण का विरोध तथा शिक्षा का बजट बढ़ाने एवं सब को समान गुणवत्ता वाली शिक्षा उपलब्ध कराने की मांग उठनी चाहिए।

6. स्वास्थ्य सेवाएं एवं स्वास्थ्य असमानताएँ: राष्ट्रीय, NFHS-5 की रिपोर्ट के अनुसार 60% दलित महिलाओं में एनीमिया है जबकि यह राष्ट्रीय स्तर पर 53% है। इसी कारण से लैंसेट (2023) की रिपोर्ट के अनुसार COVID से दलितों की मृत्यु दर सामान्य से 1.5 गुना अधिक थी। इधर सरकार स्वास्थ्य सेवाओं का बजट लगातार घटा रही है और अपरोक्ष रूप से निजीकरण को बढ़ावा दे रही है। यद्यपि सरकार ने आयुष्मान योजना लागू की है परंतु इससे गरीबों को कम और निजी अस्पतालों को अधिक लाभ मिल रहा है। अतः सरकार को आयुष्मान योजना के स्थान पर सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृढ़ करना चाहिए जिससे दलितों सहित सभी गरीबों को अधिक लाभ होगा। अतः स्वास्थ्य सेवाओं के निजीकरण पर रोक तथा सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृढ़ करने तथा अस्पतालों की संख्या तथा बजट बढ़ाने की मांग उठाई जानी चाहिए।

उपरोक्त के अतिरिक्त कृषि उपज का उचित समर्थन मूल्य, सरकारी उपक्रमों के निजीकरण पर रोक, पूंजी के केन्द्रीयकरण पर रोक, रोजगार सृजन करने के लिए सुपर रिच पर उचित टैक्स लगा कर संसाधन जुटाने, कारपोरेट की लूट रोकने, महंगाई, जीएसटी का यौकितीकरण, कृषि तथा कृषि उद्योगों को बढ़ावा देने तथा खेती का सहकारीकरण, न्यूनतम मजदूरी को बढ़ाने तथा मजदूरों को लिविंग वेज देने, 80 करोड़ लोगों को मुफ़्त राशन देने की बजाए उनको रोजगार देकर उनकी आमदनी बढ़ाने, हिन्दुत्व एवं कारपोरेट के गठजोड़ को तोड़ने, अल्पसंख्यकों का उत्पीड़न बंद कराने, शिक्षा एवं स्वास्थ्य सेवाओं का सुदृढ़ीकरण जैसे मुद्दे सामान्य वर्ग के साथ साथ दलित वर्ग के भी मुद्दे हैं। अतः यह सब मुद्दे राजनीति के केंद्र में होने चाहिए। दलित राजनीति को भी इन मुद्दों को उठाना चाहिए।

यह सर्वविदित है कि भाजपा इन जनमुद्दों पर बात न करके धर्म/संप्रदाय के अभौतिक एवं भावनात्मक मुद्दों को उठा कर आम लोगों का ध्यान बटाने की चाल चलती है ताकि उसकी 11 साल की नाकामियों पर कोई सवाल न उठाए और जवाब न मांगे। अतः यह जरूरी है सभी विपक्षी पार्टियां दलित पार्टियों सहित उपरोक्त जनमुद्दों को उठाएं तथा वैकल्पिक आर्थिक नीति एवं योजनाएं पेश करें। ऐसा करके ही भाजपा की हिन्दुत्व-कारपोरेट गठजोड़ की राजनीति को रोकना संभव होगा। यह भी उल्लेखनीय है कि नरम हिन्दुत्व एवं जाति तथा धर्म की राजनीति हिन्दुत्व की राजनीति को ही मजबूत करती है जिसे हर कीमत पर हराना जरूरी है। 

आल इंडिया पीपुल्स फ्रन्ट (रेडिकल) – (एआईपीएफ) काफी समय से जन मुद्दा आधारित जन लोकतान्त्रिक राजनीति को ले कर काम कर रहा है और एक बहु-वर्गीय गठजोड़ को मूर्तरूप देने का प्रयास कर रहा है। वर्तमान में एआईपीएफ अन्य सहमना संगठनों के साथ मिलकर रोजगार और सामाजिक अधिकार अभियान चला रहा है जिसका मुख्य  उद्देश्य रोजगार के मुद्दे को राजनीति के केंद्र में लाना है। एआईपीएफ का निश्चित मत है कि यदि देश के 350 सुपररिच पर समुचित टैक्स लगाया जाए, जीएसटी का पुनर्गठन किया जाए और फिसकल रिस्पांसिबिलिटी मैनेजमेंट एक्ट को समाप्त किया जाए तो इससे इतना फंड पैदा हो सकता है कि देश के सभी बेरोजगारों को नौकरी देने के इलावा मनरेगा, शिक्षा एवं स्वास्थ्य सेवाओं के लिए भी पैसा उपलब्ध हो सकता है।  

गुरुवार, 27 फ़रवरी 2025

अप्प दीपो भव : एक क्रांतिकारी पथप्रदर्शक की महाकाव्य यात्रा

 

अप्प दीपो भव : एक क्रांतिकारी पथप्रदर्शक की महाकाव्य यात्रा

अरिंदम सेन द्वारा

(पुस्तक समीक्षा)

Atma Deep Bhabo[1]: The Epic Journey of a Radical Pathbreaker

(मूल अंग्रेजी से हिन्दी अनुवाद: एस आर दारापुरी, राष्ट्रीय अध्यक्ष, आल इंडिया पीपुल्स फ्रन्ट)

बाबासाहेब अंबेडकर मेरे लिए सिर्फ़ एक व्यक्ति नहीं हैं, बल्कि वे उस आंदोलन का भी प्रतिनिधित्व करते हैं जिसने 200 मिलियन से ज़्यादा लोगों के जीवन को आकार दिया। इसलिए उनकी कहानी एक साथ उस संघर्ष की गाथा भी है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वे बीते हुए अतीत का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि एक जीवंत शक्ति हैं, शायद अपने जीवनकाल से ज़्यादा शक्तिशाली, जो अभी भी लाखों लोगों के भविष्य को प्रभावित कर रही है, न सिर्फ़ जीवित लोगों के बल्कि उन लोगों के भी जो अभी पैदा होने वाले हैं। इसलिए मेरा उद्देश्य उनकी कहानी को इस तरह से बताना है जिससे लोगों को उन शक्तियों को समझने में मदद मिले जिन्होंने उनके जीवन को आकार दिया और उन्हें अपने वर्तमान पर फिर से विचार करने के लिए एजेंसी संभालने में सक्षम बनाया।”

यह समीक्षाधीन पुस्तक की प्रस्तावना से है। जब एक जीवनी इस तरह के महान लक्ष्य के साथ लिखी जाती है, तो यह वैचारिक संघर्ष का एक वास्तविक साधन बन जाती है - भक्तों के धुएं के परदे के पीछे से असली क्रांतिकारी आंबेडकर को फिर से खोजने और लोकप्रिय बनाने का संघर्ष, और उन्हें केवल एक बुद्धिमान राजनेता के रूप में गलत तरीके से प्रस्तुत करने और उनका दुरुपयोग करने की आधिकारिक साजिश से भी, जिन्होंने भारत का संविधान लिखा था।

 द आइकोनोक्लास्ट इस कल्पना को चुनौती देना और उसका खंडन करना चाहता है, जिसे सबसे अच्छी तरह से संविधान को पकड़े हुए आंबेडकर की प्रतिष्ठित मूर्ति में कैद किया गया है, जिसमें उनके दूसरे हाथ की तर्जनी (पुरानी) संसद की ओर इशारा कर रही है।अब सर्वव्यापी स्थिर मूर्ति के विपरीत, पुस्तक के कवर पर एक बूढ़े, मजबूत योद्धा की प्रतीकात्मक छवि है जो हाथ में बड़ा डंडा लिए आगे बढ़ रहा है और उसके चेहरे पर दृढ़ संकल्प साफ झलक रहा है, वहां आप पाएंगे कि लेखक यह समझा रहा है कि उसने यह वाक्पटु और बहुत ही विचारोत्तेजक शीर्षक क्यों चुना और यह क्यों महत्वपूर्ण है कि यह न भूलना महत्वपूर्ण है कि अंबेडकर, सबसे पहले और सबसे महत्वपूर्ण, आधुनिक भारत के सबसे प्रभावशाली मूर्तिभंजक थे: "बाबासाहेब अंबेडकर को कई विशेषणों और रूपकों द्वारा चित्रित किया गया है, आश्चर्यजनक रूप से जिस चीज को उन्होंने खुद परिभाषित किया है, वह है एक 'मूर्तिभंजक', प्रतीकों को तोड़ने वाला। ... उन्होंने हिंदू धर्मशास्त्रों को 'बारूद से उड़ाने', नियमों के धर्म को 'नष्ट' करने और हिंदू देवताओं को त्यागने की बात की, ... अपने समय के बड़े दिग्गजों जैसे जॉन मेनार्ड कीन्स, मोहनदास करमचंद गांधी और बर्ट्रेंड रसेल जैसे महान लोगों के बारे में भी... यह उनके मूर्तिभंजक उत्साह में था कि उन्होंने बिना पलक झपकाए अपने स्वयं के विचारों और निर्णयों को त्याग दिया मैंने वह शीर्षक चुना जो अंबेडकर के जीवन के सार और उनके तर्कवादी उत्साह को दर्शाता है, जिसे उनके अनुयायियों को आत्मसात करने की आवश्यकता है। उनका प्रतीकीकरण केवल आभारी लोगों की आंतरिक भक्ति का मामला नहीं है; अंबेडकर को कट्टरपंथी बनाने और दलितों को अराजनीतिक बनाने के लिए सभी तरह के राजनेताओं द्वारा इसे प्रतिस्पर्धात्मक रूप से बढ़ावा दिया जा रहा है। यह देश में चुनावी राजनीति का एक प्रमुख आधार बन गया है। यह महत्वपूर्ण है कि उन्हें उनके वास्तविक व्यक्तित्व, एक मूर्तिभंजक के रूप में प्रस्तुत किया जाए।”

 हमने इस असाधारण जीवनी को लिखने में लेखक की मुख्य चिंताओं में से एक को रेखांकित करने के लिए ऊपर जोर दिया है। आनंद बिना रुके आगे कहते हैं: “मैंने सोचा कि जीवनी के माध्यम से इस तरह के उद्देश्य को पूरा करने का तरीका न केवल जीवन की कहानी को निष्पक्ष रूप से प्रस्तुत करना है, बल्कि इसे मेरे विचारों के साथ पूरक करना भी है। … मेरे विचार टिप्पणियों, प्रश्न चिह्नों और उन बिंदुओं पर चर्चा के रूप में हैं जो मुझे लगा कि दलितों के साथ-साथ अन्य लोगों के जीवन के लिए महत्वपूर्ण थे।” इस तरह के चिंतन या हस्तक्षेप के रूपों का विवेकपूर्ण उपयोग करते हुए आनंद अपने पाठकों, कार्यकर्ताओं और सामाजिक वैज्ञानिकों के साथ एक बहुत ही सार्थक संवाद की शुरुआत करते हैं, यह संवाद इस बात पर आधारित है कि अंबेडकर के मुख्य विचारों की सही व्याख्या कैसे की जाए और उनके दृष्टिकोण को साकार करने के लिए रचनात्मक तरीके से काम किया जाए। उनका कहना है कि यह प्रभावी रूप से किया जा सकता है, विवाद में नहीं बल्कि अन्य वामपंथी और लोकतांत्रिक ताकतों के साथ सहयोग में। पुस्तक में कई जगहों पर और अन्य लेखों में, वे दलित और वामपंथी संगठनों की उग्र एकता की वकालत करते हैं और इसकी कमी पर खेद व्यक्त करते हैं।

बंबई (1938) में हुई महान औद्योगिक हड़ताल का वर्णन करते हुए, जिसमें सीपीआई और आईएलपी (स्वतंत्र मजदूर पार्टी) दोनों सक्रिय रूप से शामिल थे, वे कहते हैं, "हड़ताल ने मजदूर वर्ग के आंदोलनों की दो धाराओं (दलित और कम्युनिस्ट) के एक साथ आने का मार्ग प्रशस्त किया, लेकिन किसी ने इसका उपयोग नहीं किया। जबकि कम्युनिस्ट अंबेडकर के कांग्रेस विरोधी रुख को साझा करने से सावधान रहेंगे, क्योंकि उन्होंने साम्राज्यवाद विरोधी लोगों के मोर्चे के रूप में कांग्रेस के साथ काम करने का फैसला किया था, ... और अंबेडकर कम्युनिस्टों के रवैये के खिलाफ अपनी नाराजगी को लगातार व्यक्त करते रहेंगे। उदाहरण के लिए, अभी एक साल पहले, सितंबर 1937 की शुरुआत में मसूर में दलित वर्गों के एक जिला सम्मेलन में उन्होंने घोषणा की थी कि वे कम्युनिस्टों के पक्के दुश्मन हैं, जो अपने राजनीतिक उद्देश्य के लिए मजदूरों का शोषण करते हैं।'' उपरोक्त कथन की अत्यधिक कठोरता शायद अनावश्यक थी, लेकिन आनंद ने अपने पाठकों को यह बताने में संकोच नहीं किया। अन्य स्थानों की तरह यहाँ भी उनका निष्पक्ष रवैया दिखाई देता है।

लेकिन आगे बढ़ने से पहले, आइकोनोक्लास्ट के बारे में कुछ त्वरित तथ्य हमारे पाठकों के साथ साझा करना बेहतर होगा। इसमें एक बहुत ही विचारोत्तेजक प्रस्तावना के अलावा, नोट्स और संदर्भों की एक लंबी सूची, एक बहुत विस्तृत सूचकांक और अंबेडकर के संपूर्ण जीवन को कवर करने वाली तस्वीरों की एक गैलरी शामिल है। जैसी कि उम्मीद थी, यह बहुत अच्छा है। लेकिन पेंगुइन, कम से कम पीडीएफ संस्करण में जो इस समीक्षक के हाथ लगा, प्रूफिंग के मामले में एक प्रकाशन गृह के रूप में अपनी प्रतिष्ठा के साथ न्याय करने में विफल रहता है। कई टाइपो हैं, और कम से कम एक मामले में एक ही तस्वीर दो अलग-अलग शीर्षकों के साथ दो बार प्रदर्शित की गई है।

 यह याद रखने योग्य है कि जब भीमा कोरेगांव मामले के सिलसिले में यूएपीए के तहत उन्हें जेल में डाला गया था, तब पुस्तक संपादन के अंतिम चरण में थी। नवंबर 2022 में जेल में कोविड अटैक के बाद जमानत पर रिहा होने के बाद ही वे बाधित काम को फिर से शुरू कर पाए और 2024 में इसे पूरा किया। इस बेहद प्रभावशाली काम में आनंद ने अतीत और वर्तमान, जीवनी और राजनीतिक प्रवचन, सिद्धांत और व्यवहार को आसानी से पार किया है - ये सब भारत की उस लड़ाई की व्यापक पृष्ठभूमि में है, जो हमारे पास अभी भी जो भी लोकतंत्र है उसे फासीवादी हिंदुत्व की कसती हुई पकड़ से मुक्त करने के लिए है। यह विस्तृत परिदृश्य है, जो आनंद की तीक्ष्ण, गहन विश्लेषण और दृढ़ इच्छाशक्ति वाली सरलता की विशेषता से मेल खाता है, जो किताब को वास्तव में एक पेज-टर्नर बनाता है। "इस पुस्तक को लिखने के पीछे की प्रेरणा... दलितों की नई पीढ़ी से आग्रह करना है कि वे अंबेडकर के सांप्रदायिक भक्त न बनें, बल्कि उन्हें अपने मुक्ति संघर्ष के अभिन्न अंग के रूप में देखें और उनकी विरासत से सीखें।" -- प्रस्तावना

जीवन भर ऊंची जातियों के जबरदस्त प्रतिरोध, मध्य जीवन तक गंभीर आर्थिक तंगी और पिछले दस सालों में अत्यधिक श्रम के कारण होने वाली विनाशकारी स्वास्थ्य स्थितियों (उनके पहले अंग्रेजी-भाषा जीवनीकार धनंजय कीर के अनुसार, पिछले कुछ हफ्तों में अंबेडकर ने वास्तव में खुद को मौत के घाट उतार दिया) के बावजूद अंबेडकर के महान आदर्शों, पहलों और उपलब्धियों पर प्रकाश डालते हुए आनंद उन कई बातों की ओर इशारा करने से नहीं कतराते जिन्हें वे गंभीर गलतफहमियां या अस्वीकार्य बयान मानते हैं। उदाहरण के लिए, वे पिछले कुछ सालों में अंबेडकर के "कम्युनिस्ट फोबिया" को आज दलित आंदोलन में चरम कम्युनिस्ट विरोधी सांप्रदायिकता के लिए आंशिक रूप से जिम्मेदार मानते हैं।

लेकिन क्या ऐसी आलोचनात्मक टिप्पणियां अंबेडकर की आलोचना करने वालों की मदद नहीं करतीं? बिलकुल नहीं। उनके पास अपने खुद के वेतनभोगी बुद्धिजीवी हैं, जो नियमित रूप से प्रचार के लिए इस्तेमाल की जा सकने वाली सभी सामग्रियों की आपूर्ति करते हैं। रचनात्मक आलोचना -- वास्तव में आनंद के मामले में आत्म-आलोचना, यह देखते हुए कि वे भारत में दलितों के सबसे साधन संपन्न और स्पष्ट जैविक बुद्धिजीवियों में से एक हैं -- वास्तव में आंदोलन को गलतियों को सुधारने, व्यापक ताकतों को आकर्षित करने और खुद को फिर से सक्रिय करने में मदद करती है। हम सीपीआई (एमएल) में अपने अनुभव के आधार पर इस महत्वपूर्ण तथ्य की पुष्टि कर सकते हैं।

आनंद अंबेडकर को, मुख्य रूप से इकोनोक्लास्ट में और अन्य कार्यों में भी, एक ऐसे तरीके से प्रस्तुत करते हैं जो बुद्ध के जीवन और शिक्षाओं को प्रस्तुत करने के अंबेडकर के तरीके से काफी मिलता-जुलता है, और वे खुद भी ऐसा कहते हैं। एक बार जब अंबेडकर ने जाति के अभिशाप से बचने के लिए बौद्ध धर्म को बड़े पैमाने पर अपनाने का फैसला कर लिया, तो उन्होंने बौद्ध धर्म को आमूलचूल रूप से पुनर्गठित करने और उस धर्म का एक नया, तीसरा संस्करण या “तीसरा रास्ता” -- महायान और हीनयान, पुराने के बाद नयायान गढ़ने का कठिन कार्य अपने ऊपर ले लिया। बौद्ध धर्म की इस पुनर्व्याख्या या पुनर्निर्माण में, उन्होंने बौद्ध परंपरा के मूल विचारों और सिद्धांतों को उठाया, सबसे मानवीय, तर्कसंगत और प्रासंगिक लोगों को उजागर किया और अस्वीकार्य सिद्धांतों और अनुष्ठानों को त्याग दिया, जो उनके अनुसार बुद्ध के बाद के सहस्राब्दियों में जमा हो गए थे, इस प्रकार उन्होंने नए संस्करण को सामाजिक सुधार में सहायता के रूप में और आधुनिक युग में समाज के नैतिक आधार के रूप में अपनाया। काफी हद तक इसी तरह की भावना में, आनंद ने अंबेडकर के कार्यों में आज जो आवश्यक, तर्कसंगत और प्रासंगिक है उसे अलग किया और उसे बनाए रखा, और जो इतिहास का हिस्सा प्रतीत होता है उसे अनावश्यक, पुराना या गलत लगता है उसे अलग रख दिया। यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य है, जो भारत के लोगों, दलितों और विशेष रूप से अन्य अनुयायियों को आवश्यक अंबेडकर को जानने में मदद करेगा - राजनीति में अथक खोजकर्ता, मूर्तिभंजक जिनके पास न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के उच्चतम आदर्शों में भारत के समाज और राजनीति के आमूल पुनर्निर्माण की दृष्टि थी। इससे वामपंथी हलकों में अंबेडकर के बारे में कई संदेह दूर करने में मदद मिलेगी और वामपंथी और दलित/दलित बहुजन संगठनों के लिए आपसी मतभेदों को दूर करना तथा 1930 के दशक में हमारे साझा दुश्मनों, ब्राह्मणवाद और पूंजीवाद के खिलाफ हमारे बीच अल्पकालिक सौहार्द की विरासत को आगे बढ़ाना आसान हो जाएगा।

इस बहुत ही महत्वपूर्ण कार्य में, लेखक ने अंबेडकर के राजनीतिक दर्शन के मूल विचारों को उनके विशिष्ट ऐतिहासिक परिवेश में और साथ ही वर्तमान भारतीय परिस्थितियों के संदर्भ में उजागर करने और स्पष्ट करने का शानदार काम किया है। उन मुद्दों पर जहां अंबेडकर की स्थिति समय के साथ सूक्ष्म रूप से या काफी हद तक बदल गई, उन्होंने परिश्रमपूर्वक संदर्भ दिया है और बदलावों को जोड़ा है और इसके पीछे संभावित कारणों को इंगित किया है जिससे पाठक को विषय की व्यापक समझ प्राप्त करने में मदद मिलती है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अंबेडकर के सामाजिक राजनीतिक विचारों के व्याख्याकार और संचारक के रूप में, उन्होंने बाबासाहेब के प्रति अपनी श्रद्धा को एक निष्पक्ष निर्णय और सम्मानित नेता के निष्पक्ष, सत्य चित्रण के रास्ते में नहीं आने दिया। कई बिंदुओं पर, वे अंबेडकर के साथ मुद्दों को जोड़ते हैं, कभी-कभी बहुत कड़े शब्दों में। उदाहरण के लिए, आनंद संविधान के अनुच्छेद 1 में समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष शब्दों को शामिल करने के प्रस्ताव को अंबेडकर द्वारा अस्वीकार करने और विधानसभाओं के चुनावों के लिए आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली (पीआरएस) के एक अन्य प्रस्ताव का जोरदार तरीके से खंडन करते हैं। दोनों ही मामलों में वे अंबेडकर के तर्कों को विस्तार से, बिंदुवार खारिज करते हैं। अंबेडकर के इस कथन का विरोध करते हुए कि मौलिक अधिकारों और राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांतों के प्रावधान के साथ ही हमारे संविधान में समाजवादी सिद्धांत पहले से ही समाहित थे, वे पूछते हैं, “क्या लीक वाले मौलिक अधिकार और बिना दांतों वाले निर्देशक सिद्धांत समाजवाद की भरपाई कर सकते हैं?” आनंद का अपना जवाब है, “न तो संविधान धर्मनिरपेक्ष था और न ही समाजवादी; मौलिक अधिकार और निर्देशक सिद्धांत, जो वास्तव में अच्छे-अच्छे प्रावधान थे, लेकिन बिना किसी ताकत के, लोगों को यह विश्वास दिलाने के लिए सिर्फ छल-कपट थे कि संविधान में वह सब कुछ है जो वे चाहते हैं।”

 यह देखते हुए कि मौलिक अधिकार और निर्देशक सिद्धांत कानूनी रूप से लागू करने योग्य नहीं हैं, आनंद अंबेडकर के मुकाबले मजबूत कानूनी आधार पर खड़े दिखते हैं। उनकी स्थिति की पुष्टि तब हुई जब, आइकोनोक्लास्ट के प्रकाशित होने के कुछ सप्ताह बाद, सुप्रीम कोर्ट ने “धर्मनिरपेक्ष” और “समाजवादी” शब्दों को हटाने की मांग करने वाली याचिकाओं को खारिज कर दिया, खास तौर पर इसलिए क्योंकि ये शब्द संविधान की प्रस्तावना में शामिल थे, जो संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा है। हम इस तरह से आगे बढ़ सकते हैं, लेकिन दो संक्षिप्त टिप्पणियों के साथ निष्कर्ष निकालते हैं। हम सीपीआई (एमएल) में इस तथ्य से अवगत हैं कि आज अंबेडकर हमारे देश और कुछ अन्य देशों में उस समय की तुलना में कहीं अधिक प्रभावशाली हैं, जब वे धरती पर थे। हमें खुशी है कि आइकोनोक्लास्ट, जिसे कई लोग आनंद की अब तक की सर्वश्रेष्ठ रचना मानते हैं, इस बात की पुष्टि करती है। आइकोनोक्लास्ट ठीक उसी समय सामने आता है, जब इसकी सबसे अधिक आवश्यकता होती है। यह भारत और विदेशों में अंबेडकर के गंभीर अध्ययनों में स्वागत योग्य उछाल के मद्देनजर आता है, जो लोकतंत्र पर नवउदारवादी-दक्षिणपंथी आक्रमण के खिलाफ बढ़ते वैचारिक प्रतिरोध का हिस्सा है। हमारे देश में इस हमले का नेतृत्व एक हिंदू राज कर रहा है, जिसके बारे में अंबेडकर के रूप में दूरदर्शी ने हमें भारत के लोकतांत्रिक गणराज्य के जन्म के समय ही आगाह कर दिया था। समय की सबसे बड़ी जरूरत है कि जनांदोलन के क्षेत्र में इस प्रतिरोध को मजबूत किया जाए और इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि वैचारिक मोर्चे पर भी दोनों एक दूसरे से बहुत करीब से जुड़े हुए हैं। हमारा दृढ़ विश्वास है कि आइकोनोक्लास्ट यहां महत्वपूर्ण योगदान देगा और आनंद के अनुसार मजदूर वर्ग के आंदोलनों की दो धाराएं (दलित और कम्युनिस्ट) के बीच की खाई को पाटने में मदद करेगा।

 

नोट:

1. अंबेडकर ने बुद्ध से लिए गए आत्मदीप भबो या 'खुद के लिए मशाल बनो' को अपने जीवन में एक मार्गदर्शक सिद्धांत के रूप में देखा और 14 अक्टूबर, 1956 को नागपुर में बुद्ध धर्म दीक्षा के अवसर पर अपने अनुयायियों को यही सलाह दी।

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