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शनिवार, 26 मई 2018

डॉं आंबेडकर एवं कार्ल मार्क्स - वर्ण बनाम वर्ग


-संजीव खुदशाह
आज हम कार्ल मार्क्स की 200 वी जयंती के उपलक्ष में वर्ग बनाम वर्ण पर बात करने जा रहे हैं। मेरी आप सब से गुज़ारिश है कि मेरी बातों को बिना किसी पूर्वाग्रह के गौर करने का कष्ट करें तभी शायद मैं अपनी बात आप तक सही ढंग से पहुंचाने में सफल हो सकूंगा। दूसरी बिनती मैं यह करना चाहता हूं की यहां पर अपनी बात रखने का मकसद यह नहीं है कि किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचे। मैं एक स्वस्थ चर्चा करने पर विश्वास रखता हूं।
वर्ग बनाम वर्ण की चर्चा इससे पहले भी होती रही है। लेकिन जब हम कार्ल मार्क्स के बरअक्स इस चर्चा को आगे बढ़ाते हैंतो यहां पर वर्ग के मायने कुछ अलग हो जाते हैं। भारत में वर्ग के मायने होते हैं अमीर वर्ग और गरीब वर्ग। लेकिन कार्ल मार्क्स जिस वर्ग की बात कर रहे हैं। उसमें मालिक वर्ग और मजदूर वर्ग है। इसलिए हमें बहुत ही सावधानी पूर्वक इस अंतर को समझते हुए बात करनी होगी।इसी प्रकार वर्ण की भी विभीन्‍न परिभाषाएं सामने आती है। कई बार वर्ण को रंगों के विभाजन के तौर पर देखा जाता है। तो कई बार वर्णों को जाति व्यवस्था की एक महत्वपूर्ण इकाई के तौर पर भी देखा जाता है। हम यहां पर चर्चा के दौरान इसे इसी परिभाषा के तौर पर आगे बातचीत करेंगे।
मार्क्स ने जिस मालिक और मजदूर की बात की और उनके संघर्ष को महत्वपूर्ण बताया तथा पूंजीवाद को इन वर्ग के सिद्धांतों के आधार पर परिभाषित किया। वह अपने स्थान पर महत्वपूर्ण है लेकिन इन सिद्धांतों को उसी वर्ग के आधार पर भारत के परिप्रेक्ष में लागू करना कहीं ना कहीं जल्दबाजी करने जैसा रहा है। क्योंकि भारत में वर्ग का अस्त्वि कभी भी मालिक और नौकर की तरह नहीं रहा है। भारत में पूंजीपति वर्ग और मजदूर वर्ग कहा गया या फिर अमीर वर्ग गरीब वर्ग कहां गया। लेकिन जैसा रिश्ता यूरोप में मालिक और मजदूर के बीच रहा है वैसा रिश्ता भारत में अमीर और गरीब के बीच कभी भी नहीं रहा है।भारत में इन वर्गों के बीच जातीय संरचना भी है जो मालिक और नौकर के सिद्धांत पर नहीं चलती।
मुझे लगता है यह भारत के परिपेक्ष में मार्क्सवादी सिद्धांतों को मालिक और नौकर के नजरिए से नहीं बल्कि जाति व्यवस्था की जटिलताओं उनके बीच भेदभाव उनके बीच अछूतपन और धार्मिक संहीता को ध्यान में रखते हुए देखना होगा।
भारत में एक छोटी जाति का व्यक्ति अमीर तो हो सकता है। उसके कल कारखाने भी हो सकते है। इसके पहले भी हुए हैं। गंगू तेली का उदाहरण सामने पड़ा है। शिवाजी का उदाहरण है लेकिन इन्हें धार्मिक स्वीकृति या कहें सामाजिक राजनीतिक स्वीकृति प्रदान नहीं होती है। इस कारण राजा होने के बावजूद शिवाजी को राज तिलक करवाने के लिए पापड़ बेलने पड़ते हैं। और किसी ब्राम्हण के पैर के अंगुठे से अपने माथे पर राज तिलक करवाने के लिए मजबूर होना पड़ता है। यह उदाहरण बेहद महत्वपूर्ण है जब हम वर्ग बनाम वर्ण की बात करते हैं।
गंगू तेली और शिवाजी के उदाहरण से यह बात स्पष्ट तौर पर सामने आती है कि भारत के परिप्रेक्ष में साम्यवाद या समाजवादजिसकी बात कार्ल मार्क्स कहते हैं। वह और उसका आधार आर्थिक नहीं है उससे कहीं आगे है। भारत के परिपेक्ष में आर्थिक समानता कभी भी राजनीतिक और सामाजिक समानता का रूप नहीं ले पाती है। और ना ले पाई है। इसके तमाम उदाहरण इतिहास में मौजूद है। शायद मार्क्सवाद के सिद्धांत को भारत में लागू करने से पहले इन ऐतिहासिक तथ्यों को नजरअंदाज कर दिया गया।
इस कारण भारत के परिपेक्ष में कम्युनिस्ट विचारधारा फेल हो गई या फिर सिर्फ पूंजी की लड़ाई तक सीमित रह गई या फिर उन जगह ही रह पाई जहां पर फैक्ट्री और मजदूर रहे हैं। यह लड़ाई कभी भी किसानों तक नहीं पहुंच पाई ना ही उन दलित पिछड़ा वर्ग आदिवासियों तक पहुंच पाई जिन्हें समानता साम्यवाद या समाजवाद की जरूरत थी। उन प्राइवेट दुकानों संस्थानों तक नहीं पहुंच पाई जहां पर पढ़ा-लिखा कलम चलाने वाला मजदूर शोषण का शिकार रोज होता है।
जहां एक ओर यूरोप में पूंजीवाद के गर्भ से श्रमिक वर्ग का जन्म हुआ वहीं भारत में श्रमिक वर्ग मां के गर्भ से पैदा होता है।
भारत में युरोप का वर्ग नहीं है और जब वर्ग ही नहीं तो वर्ग संघर्ष का सवाल ही पैदा नहीं होता। बल्कि भारत में वर्ग की जगह वर्ण संघर्ष हो रहा है। जिसे मार्क्स ने भी भूल स्वीकार करते हुए कहा कि भारत में वर्ण संघर्ष ही संभव है और उसके बाद ही वर्ग संघर्ष हो सकता है। इसे इमीएस नम्बूदरीपाद ने भी स्वीकार कियाजिनके नेतृत्व में केरल में पहली बार कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार बनी थी। बी. टी. रणदीवे ने भी स्वीकार कियाक्योंकि भारत में सत्ता और संपत्ति पर सवर्ण वर्ग का ही कब्जा है।
दरअसल हमें मार्क्स के साम्यवाद को नए सिरे से भारत के परिप्रेक्ष में परिभाषित करना पड़ेगा। यहां पर आर्थिक समानता से कहीं ज्यादा जरूरी सामाजिक और राजनीतिक समानता की बात है। कार्ल मार्क्स ने जिन स्थानों पर काम किया वहां पर आर्थिक विषमता तो थी लेकिन सामाजिक तथा राजनीतिक विषमताएं नहीं रही। इसीलिए उन्होंने यह सिद्धांत दिया की पूंजी का समान वितरण होने पर साम्यवाद स्थापित हो सकेगा।
डॉ आंबेडकर अपनी किताब बुद्ध अथवा कार्ल मार्क्स में कार्ल मार्क्स की अवधारणा को 10 बिंदुओं में रेखांकित करते हैं। जिन पर कार्ल मार्क्स के सिद्धांत खड़े हुए हैं।
1 दर्शन का उद्देश्य विश्व का पुनः निर्माण करना है ब्रह्मांड की उत्पत्ति की व्याख्या करना नहीं है।
2 जो शक्तियां इतिहास की दिशा को निश्चित करती है वह मुख्यतः आर्थिक होती हैं।
3 समाज दो वर्गों में विभक्त है मालिक तथा मजदूर ।
4 इन दोनों वर्गों के बीच हमेशा संघर्ष चलता रहता है ।
5 मजदूरों का मालिकों द्वारा शोषण किया जाता है। मालिक उस अतिरिक्त मूल्य का दुरुपयोग करते हैं जो उन्हें अपनी मजदूरों के परिश्रम के परिणाम स्वरुप मिलता है।
6 उत्पादन के साधनों का राष्ट्रीयकरण अर्थात व्यक्तिगत संपत्ति का उन्मूलन करके शोषण को समाप्त किया जा सकता है।
7 इस शोषण के फलस्वरुप श्रमिक और अधिकाधिक निर्बल व दरिद्र बनाए जा रहे हैं।
8 श्रमिकों की इस बढ़ती हुई दरिद्रता व निर्बलता के कारण श्रमिकों की क्रांतिकारी भावना उत्पन्न हो रही है और परस्पर विरोध वर्ग संघर्ष के रूप में बदल रहा है।
9 चूंकि श्रमिकों की संख्या स्वामियों की संख्या से अधिक है। अतः श्रमिकों द्वारा राज्य को हथियाना और अपना शासन स्थापित करना स्वाभाविक है। इसे उसने सर्वहारा वर्ग की तानाशाही के नाम से घोषित किया है।
10 इन तत्वों का प्रतिरोध नहीं किया जा सकता इसलिए समाजवाद अपरिहार्य है.।-
पृष्ठ क्रमांक 346 वॉल्यूम 7
यहां पर आप देख सकते हैं की कंडिका 9 मे इस बात का जिक्र किया गया है कि श्रमिकों द्वारा उनकी संख्या ज्यादा होने के कारण बलपूर्वक अपना शासन स्थापित करना स्वाभाविक है। जिसे उन्होंने सर्वहारा वर्ग की तानाशाही नाम घोषित किया है। यानी कार्ल मार्क्स श्रमिकों के द्वारा तानाशाही शासन की अनुमति देते हैं।
जबकि डॉ आंबेडकर कहते हैं बलपूर्वक प्राप्त किया गया शासन वह भी तानाशाही वाला शासन ज्यादा दिन तक नहीं टिक सकता। भविष्य में भी संघर्ष की संभावनाएं बनी रहती है। वह कहते हैं "मार्क्सवादी सिद्धांत को 19वी शताब्दी के मध्य में जिस समय प्रस्तुत किया गया था उसी समय से उसकी काफी आलोचना होती रही है इस आलोचना के फलस्वरुप कार्ल मार्क्स द्वारा प्रस्तुत विचारधारा का काफी बड़ा ढांचा ध्वस्त हो चुका है इसमें कोई संदेह नहीं कि मांस का यह दावा कि उसका समाजवाद अपरिहार्य है पूर्णतया असत्य सिद्ध हो चुका है सर्वहारा वर्ग की तानाशाही सर्वप्रथम 19 सौ 17 में उसकी पुस्तक दास कैपिटल समाजवाद का सिद्धांत के प्रकाशित होने के लगभग 70 वर्ष के बाद सिर्फ एक देश में स्थापित हुई थी यहां तक कि साम्यवाद जो कि सर्वहारा वर्ग की तानाशाही का दूसरा नाम है और उसमें आया तो यह किसी प्रकार की मानवीय प्रयास के बिना किसी अपरिहार्य वस्तु के रूप में नहीं आया था वहां एक क्रांति हुई थी और इसके रूस में आने से पहले भारी रक्तपात हुआ था तथा अत्यधिक हिंसा के साथ वहां सोद्देश्य योजना करनी पड़ी थी शेष विश्व में अभी भी सर्वहारा वर्ग की तानाशाही के आने की प्रतीक्षा की जा रही है मार्क्सवाद का कहना है कि समाजवाद अपरिहार्य है उसके इस सिद्धांत के झूठे पर जाने के अलावा सूचियों में वर्णित अन्य अनेक विचार भी तर्क तथा अनुभव दोनों के द्वारा ध्‍वस्‍त  हो गए हैं अब कोई भी व्यक्ति इतिहास की आर्थिक व्याख्या को यह इतिहास की केवल एक मात्र परिभाषा स्वीकार नहीं करता इस बात को कोई स्वीकार नहीं करता कि सर्वहारा वर्ग को उत्तरोत्तर कंगाल बनाया गया है और यही बात उसके अन्य तर्क के संबंध में भी सही है" पृष्ठ क्रमांक 347 वॉल्यूम 7
 भारत के परिप्रेक्ष्य में वर्ग की लड़ाई
जब आप वर्ग की लड़ाई लड़ते हैं तो आप सिर्फ आर्थिक समानता की बात करते हैं दरअसल भारत में जो वर्गीय अंतर है वह सिर्फ आर्थिक नहीं है। यह समझना होगा। यहां पर जातीय असमानता है। राजनीतिक असमानताएं गहरे पैठ बनाए हुए हैं। और इन जटिलताओं को सुलझाने के लिए समानता लाने के लिए आर्थिक गैरबराबरी को खत्म करना काफी नहीं है। जातीय एवं राजनीतिक असमानता को खत्म करने के लिए तमाम क्षेत्रों में प्रतिनिधित्व देना जरूरी है । यह प्रतिनिधित्व राजनीतिधार्मिकसमाजिक पदवी मेंप्रशासन मेंन्यायालय में देना होगा। डॉ अंबेडकर ने इसी प्रतिनिधित्व को रिजर्वेशन का नाम दिया। रिजर्वेशन कभी भी गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम के तौर पर नहीं तैयार किया गया। दरअसल यह भारत में फैली असामान्यताओं को खत्म करने के लिए बेहद जरूरी कार्यक्रम है। इसीलिए डॉक्टर अंबेडकर ने आजादी के पहले गोलमेज सम्मेलन में प्रतिनिधित्व के अधिकार की मांग की थी।
यह बात सही है कि डॉ आंबेडकर और मार्क्स दोनों समाज में समानता चाहते थे। लेकिन दोनों के समानता के उद्देश्य में बुनियादी फर्क है।
एक वर्ण व्यवस्था में समानता की बात करते हैं तो दूसरे वर्ग व्यवस्था में समानता की बात करते हैं।
एक वर्ग व्यवस्था में समानता के लिए संघर्ष की बात करते हैं। चाहे इसके लिए सर्वहारा तानाशाही ही क्यों ना करनी पड़े।
दूसरे वर्ण व्यवस्था में समानता लाने के लिए लोकतांत्रिक उपाय किए जाने की बात करते हैं जिसमें खूनी संघर्ष और तानाशाही के लिए कोई जगह नहीं है। वे जाति व्‍यवस्‍था का उन्‍मूलन में सबको साथ लेकर चलने की बात करते है। डॉं अंबेडकर कहते है एक ऊंच नीच वाली प्रणाली को खत्‍म करने के लिए नई ऊंच नीच वाली प्रणाली का निर्माण नही किया जाना चाहिए।
जब आप वर्ण यानी जाति व्यवस्था की लड़ाई लड़ते हैं तो आप सामाजिक आर्थिक राजनैतिक तीनों प्रकार की समानता की बात करते हैं।
यह बात शायद भारतीय मार्क्सवादियों ने नजरअंदाज कर दिया होगा। क्योंकि बीमारी डायग्नोसिस करना किसी भी बीमारी के इलाज का पहला चरण होता है। डायग्नोज करने के बाद ही उसी हिसाब से उसका इलाज किया जा सकता है। जहां पर वर्ग की समस्या नहीं है वहां पर आप वर्ग के हिसाब से उसका इलाज करेंगे तो रिजल्ट्स नहीं आने वाले। जहां पर वर्ण की समस्या हैवर्ण संघर्ष की समस्या है वहां पर वर्ण के हिसाब से ही उसका इलाज करना होगा। तब कहीं जाकर उसके परिणाम सामने आ सकेंगे। यही जो बुनियादी फर्क है, वर्ग और वर्ण में। उसे समझना होगा। तब कहीं जाकर हम मार्क्सवाद और अंबेडकरवाद के समानता के सिद्धांत को अमलीजामा पहना पाएंगे।

शुक्रवार, 12 मई 2017

डॉ. अम्बेडकर और वाम : ए शॉर्ट रीविजिट- बादल सरोज

डॉ. अम्बेडकर और वाम : ए शॉर्ट रीविजिट
- बादल सरोज 


हाल में एक प्रस्थापना पढ़ने में आयी कि : "अम्बेडकर ने जातिवाद को मजबूत किया - इतिहास के स्वाभाविक विकास-क्रम में जो जातिवाद नष्ट हो रहा था, उसे रोका - वर्ण-व्यवस्था को और आधार देते हुए वर्ण-विभाजन को बढ़ावा दिया - वर्ग-संघर्ष को कमजोर किया - जातिगत चेतना को पैदा किया और मजबूत किया !" यह आरोप नया नहीं है । इसका मजेदार पहलू यह है कि डॉ. अम्बेडकर पर इस तरह की तोहमत मढ़ने के मामले में दक्षिण और अति-वाम दोनों जुगलबंदी करते दिखाई देते हैं । इसलिए, इस बहाने अम्बेडकर और उनकी भूमिका का संक्षिप्त सा पुनरावलोकन उपयोगी होगा ।
इस प्रस्थापना में कई झोल हैं । जैसे एक यही कि कोई व्यक्ति, भले वह कितना असरदार क्यों न हो, कितना भी जोर क्यों न लगा ले "इतिहास के स्वाभाविक विकास-क्रम" को नहीं रोक सकता । उसकी गति को धीमा तेज मध्यम करने में भूमिका निबाह सकता है । मगर कुछ समय के लिए । क्योंकि इतिहास का विकास-क्रम व्यक्ति/व्यक्ति समूहों की इच्छाओं सदिच्छाओं से नहीं ठोस कारकों के पहियों पर चलता फिरता है । क्या सचमुच इतिहास के स्वाभाविक विकास-क्रम में जातिवाद नष्ट हो रहा था ? जिसे रोककर अम्बेडकर ने ''वर्ण-व्यवस्था को और आधार देते हुये वर्ण-विभाजन को बढ़ावा दिया - वर्ग-संघर्ष को कमजोर किया - जातिगत चेतना को पैदा किया और मजबूत किया ।"
सबसे पहले जाति की दीर्घायुता पर, उसकी जीवनी शक्ति पर !! पिछली दो सहस्राब्दियों में जाति नहीं गयी । तुर्क आये, मंगोल आये, यवन आये, उनके पहले शक आये, हूण आये, कुषाण आये । सदियों तक मुगलों ने राज किया । डेढ़ सदी अंग्रेजों ने राज किया । इनमे से किसी की पृष्ठभूमि-धर्म-विचार श्रृंखला में जाति नहीं थी । मगर इनमे से किसी ने भी जाति संरचना पर प्रहार नही किया । क्यों ? इसी दौरान पूँजीवाद आया, जिसे खुद के विकास की मान्य अवधारणा - बाजार के विस्तार और श्रम की अबाध उपलब्धता - के लिए जाति की बेड़ियां तोड़नी चाहिए थी । नहीं तोड़ी। यहां तक कि उनके मोस्ट मॉडर्न एडीशन वैश्वीकरण वाले साम्राज्यवाद ने भी इनसे छेड़छाड़ नहीं की । बल्कि ठीक उलट इन दोनों ने जाति को मजबूत बनाने में ही इन्वेस्ट किया । क्यों ?
इसलिए कि जाति सिर्फ और केवल सामाजिक संरचना नहीं है । यह मोटा मोटी, समय द्वारा जांची परखी जा चुकी आर्थिक संरचना भी है। डी डी कौशाम्बी के शब्दों में कहें तो " जाति उत्पादन के आदिम स्तर पर वर्ग का नाम है । सामाजिक चेतना का इस तरह से संयोजन करने वाली पद्वत्ति है जिसमे न्यूनतम बल प्रयोग के साथ उत्पादक को उसके अधिकार से वंचित कर दिया जाता है ।" इसलिए राज बदले, शासकों के धर्म-,विधान बदले, जमाना बदल गया, जाति नहीं बदली । शासक वर्ग इतने बुद्दू नहीं हैं कि वे अपने रेडीमेड फायदे को उगलने वाली गटर को बंद कर दें ।
तथ्य सत्य तक पहुंचने में मददगार होते हैं कुछ वर्ष पहले फोर्ब्स ने भारत के 55 डॉलर अरबपतियों की सूची जारी की थी । इनमे से ऊपर वाले 10 में 7 वैश्य जाति से हैं । बकाया 45 में भी वैश्यों का बहुमत है । जो वैश्य नहीं हैं वे खत्री हैं, बोहरा हैं, पारसी - सभी व्यापारी जातियां - हैं !! कुछ ब्राह्मण भी हैं । मगर भूले से भी कोई दलित या आदिवासी नहीं है ।
इन दिनों सत्ता का दूसरा नवद्विज है : मीडिया । मालिकाने में तो पूरा द्विज है ही, एक आधिकारिक सर्वेक्षण के अनुसार नई दिल्ली के निर्णय क्षमता वाले पत्रकारों के मामले में भी पूरी तरह द्विज है । उनमे एक भी दलित या आदिवासी नहीं । यह अनायास है ? नहीं । कोई फ़िल्टर है, कोई छन्नी हैं जो बहुत पतला छान रही है । छोटे व्यापार, भूमि स्वामित्व, नौकरशाही में हिस्सा, वंचितों-कुपोषितों-भूमिहीनों-आवासहीनों के जाति घनत्व का प्रोफाइल आदि इत्यादि के आंकड़ों के बोझ से दबाने का कोई अर्थ नहीं । छन्नी/फ़िल्टर सर्वत्र हैं। हाँ, निचले दर्जे की सरकारी नौकरियों में आज़ादी के बाद थोड़ी बहुत हलचल हुयी थी, जिसके कुछ सामाजिक राजनीतिक असर भी नजर आये, किन्तु नवउदार के बाद अब यह भी ठिकाने लगाई जा चुकी है ।
जाति रिश्ते उत्पादन के रिश्तों का हिस्सा हैं, इसे समझे बिना जाति को नहीं समझा जाना चाहिए । जाति में वर्ग छुपे हैं । भारतीय समाज में नए वर्गों का निर्माण जाति व्यवस्था की कोख से हुआ है !!
किताबें और भारत का सर्वहारा
ऐसा पढ़ते ही शुध्द (??) वाम एकदम बिलबिला जाता है । अरे, ऐसा कैसे हो सकता है । ऐसा तो किसी किताब में लिख्खाईच नहीं है !! तो किताबों में ये कहाँ लिखा है कि इन किताबों में अ से ज्ञ तक ए टू जेड "सब कुछ" लिखा है ? बल्कि किताबों में तो ठोक के इससे उलट और सावधान करते हुए लिखा है कि "सामाजिक विकास के ये नियम टूल हैं, औजार हैं, इन्हें हर देश, समाज की ठोस परिस्थितियों पर ठोस तरीके से लागू करके ही सही नतीजे निकलेंगे ।" किताब लिखने वालो के पास ज्यादातर प्राथमिक जानकारी विकसित होते यूरोपीय पूंजीवाद और वहीँ के उसके पूर्ववर्ती सामन्तवाद की थी । सर्वज्ञ या “खुदा” नहीं थे मार्क्स-एंगेल्स !! न उनकी पहुँच में था, ना ही इतनी दूर होने के चलते उनकी सामर्थ्य में था भारतीय जाति व्यवस्था का अध्ययन । इस बारे में उनकी जो भी थोड़ी बहुत माहिती थी वह किसी दूसरे तीसरे स्रोत/जरिये से हासिल की हुयी थी और मूलतः विवरणात्मक थी ।
उनका सर्वहारा, खांटी यूरोप का मजदूरवर्ग था । सीधा पूँजीवाद से लुटा पिटा, शोषित और उसके सामने खड़ा, जूझता । क्या भारत में रॉबर्ट, जॉनसन, मैथ्यू और एडवर्ड और फिलिप या मारिया या एडविना उसी तरह के शुध्द सर्वहारा हैं ? नहीं । वे कुछ अलग हैं, कुछ अनोखे हैं । इनके भारतीय क्लोन/पर्याय रामाश्रय शुकुल, कामेश्वर सिंह, हनुमंतलाल, रफीक खान, जगदीश राम सिदार, गुलज़ार सिंह मरकाम, बिहारीलाल जाटव या महादेवी और अनुसुइया उत्पादन की क्रिया में तो एक जैसे मजदूर वर्ग हैं, क्लासिकल टर्म में सर्वहारा । ट्रेड यूनियनों में भी -संभवतः - वे एक समान मजदूर वर्ग है, मगर टाउनशिप, बस्ती, दफाई, कॉलोनी, सेक्टर, गाँव, कसबे में वे वर्ण हैं, जाति हैं, गोत्र हैं, उपगोत्र हैं । अगर यह आधुनिक उत्पादन में लगे सर्वहारा का हाल है, तो ग्रामीण सर्वहारा का क्या होगा ?
तो ? तो क्या वर्ग संघर्ष फेल ? वर्ण संघर्ष शुरू ? या तो ये या फिर ये ही तो रास्ता नहीं होता । रास्ता है, वर्गीय शोषण के दोनों रूपों से एकसाथ लड़ना । दोनों स्तरों - आर्थिक शोषण और सामाजिक चेतना - पर एक साथ मोर्चा खोलना । पहले ये और उसके बाद वो करने से नहीं होने का । वर्ग को वर्ग बनाना होगा । न्यूक्लियर साइन्स की शब्दावली में कहें तो खांटी यूरेनियम नहीं है हमारे पास, मगर थोरियम बहुत सारा है । बड़ी हलचल - क्रान्ति - पैदा करनी है तो क्रिटिकलिटी की स्टेज तक आना जरूरी है । उसकी साइन्स भी सही है । जरूरी है । मगर यहां यूरेनियम वाली टेक्नोलॉजी नहीं चलेगी । थोरियम के अनुकूल तकनीक ढूंढनी होगी ।
प्रैक्टिसिंग पॉलिटिशियन अम्बेडकर और सोशल रेवोल्यूशनरी अम्बेडकर
सारे सवालों के उत्तर अम्बेडकर में तलाशने और न मिलने पर उन्हें पूरी तरह खारिज करने का रुख अवैज्ञानिक है । अम्बेडकर मार्क्सवादी नहीं थे, वे फेबियनवादी थे, प्रैग्मैटिस्ट थे । वर्ग की उनकी संकल्पना मार्क्स और बेबर से भिन्न थी । हालांकि वे विचार के रूप में मार्क्सवाद को अच्छा मानते थे । उनकी कुछ व्याख्याओं, धारणाओं को लेकर समस्यायें भी है । वे एक लगातार 'इवोल्व' होते हुए व्यक्तित्व हैं । अंतिम वर्षों में कई बार वे काफी झुंझलाये से, हताश से भी नजर आते हैं । शायद इसके पीछे तकरीबन अकेले दम, सिंगल हैंडेडली इतने बहुआयामी मोर्चों पर, बेहद मजबूत ताकतों से लड़ना और अपने ही जीवन में सारे नतीजे देख लेने की उम्मीद लगाना रहा हो । जो भी हो, उनके एक या दो वक्तव्यों के आधार पर न जाते हुए सार पर जाना होगा । प्रैक्टिसिंग पॉलिटिशियन अम्बेडकर और सोशल रेवोल्यूशनरी अम्बेडकर में अंतर करना होगा । इसके लिए कल्पित अम्बेडकरवाद के कथित अनुयायी और चालचलन में उनके ठीक विपरीत, स्वयंभू अम्बेडकरवादियों - जिनमे से कई जाति विरोधी कम वाम विरोधी अधिक हैं - के कहे, करे का संज्ञान लेने की बजाय खुद डॉक्टर साब की तरफ देखना होगा ।
जैसे उनका वस्तुपरक नजरिया । वे लिखते हैं : "....कुछ भी स्थिर नहीं है । कुछ भी शाश्वत नहीं है और ना ही कुछ सनातन है । हर चीज परिवर्तनशील है । व्यक्ति और समाज के लिए परिवर्तन जीवन का नियम है । एक बदलते हुए समाज में पुराने मूल्यों में सतत क्रांतिकारी बदलाव आना चाहिए .....। " यह बात वे बुद्द धर्म अपनाने के 20 वर्ष पहले कह रहे हैं ।
जैसे, आर्थिक और सामाजिक दोनों तरह के शोषण से लड़ने के बारे में उनकी समझ कमोबेश व्यावहारिक थी । उन्होंने कास्ट और क्लास दोनों से लड़ने की बात की । एससी फेडरेशन तो उन्होंने 1942 में बनाया था । इससे पहले 1936 में उन्होंने पहली पार्टी - इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी - बनाई थी। इसका झण्डा लाल रखा । इसके मैनिफेस्टो में इसे किसी जाति की नही वर्किंग क्लास की पार्टी कहा गया। 1928 और उसके बाद की बॉम्बे के टेक्सटाइल मजदूरों की हड़ताल के वक़्त ट्रेडयूनियनो के साथ उनका संवाद शिक्षाप्रद और दिलचस्प तो है ही, आत्ममूल्यांकन के लिए भी विवश करता है । 1942 से 46 के दौरान वाइसरॉय की एग्जीक्यूटिव में लेबर मेंबर (श्रम मंत्री समकक्ष) की भूमिका में उनकी पहलें "क्रांतिकारी" हैं । (देखें . https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=1424660400931597&id=100001629517443) ।
जैसे जाति के बारे में उनका दृष्टिकोण !! यह मान लेने में किसी की हेठी नहीं हो जायेगी कि डॉ. अम्बेडकर जाति के पहले व्याख्याकार थे । उन्होंने जाति व्यवस्था का तब तक का सबसे उन्नत विश्लेषण दिया था । वे अपने जमाने के बड़े नेताओं में अकेले थे जिसने जाति व्यवस्था के ध्वंस - ऐनीहिलेशन - की बात की । उसके धार्मिक मूलाधार को चिन्हांकित कर उसके भी निर्मूलन पर जोर दिया । वे कहते हैं : "एक आर्थिक संगठन के रूप में (भी) जातिप्रथा एक हानिकारक व्यवस्था है क्योंकि इसमें व्यक्ति की स्वाभाविक शक्तियों का दमन होता है और सामाजिक नियमों की तात्कालिक आवश्यकताओं की प्रवृत्ति होती है ।" (ऐनीहिलेशन ऑफ़ कास्ट, 1936) । इसी में वे यह भी कहते हैं कि : " जाति एक ऐसा दैत्य है, जो आपके मार्ग में खड़ा है। जब तक आप इस दैत्य को नहीं मारोगे, आप न कोई राजनीतिक सुधार कर सकते हो, न आर्थिक सुधार ।" जो अम्बेडकर जातियों के ध्वंस की बात करते हैं उन पर "वर्ण-व्यवस्था को और आधार देते हुये वर्ण-विभाजन को बढ़ावा देने - वर्ग-संघर्ष को कमजोर करने- जातिगत चेतना को पैदा करने और मजबूत करने" का आरोप लगाना अम्बेडकर का कुपाठ ही नहीं सरासर पूर्वाग्रह भी है ।
फतवा ; “वर्ग संघर्ष की बुनियादी अवधारणा से भटकाव ,राजनीतिक अवसरवाद !!”
आख़िरी बात वह फतवा जो इन दिनों फैशन में है कि "भारत के संगठित वाम द्वारा जाति मुद्दों को सक्रियता के एजेंडे में शामिल करना वर्ग संघर्ष की बुनियादी अवधारणा से भटकाव है, राजनीतिक अवसरवाद है ।" इसमें से पहली बात पर ऊपर पर्याप्त चर्चा की जा चुकी है । रही दूसरी बात, तो इसे वे ही सिध्द पुरुष कह सकते हैं जिन्हें भारत के वामपंथ के बारे में जानकारी नहीं है । इस आरोप में कई झोल हैं ।
एक तो यही कि कम्युनिस्ट पार्टी अपने पहले सैध्दांतिक दस्तावेज (1930 के प्लेटफार्म ऑफ़ एक्शन) में ही कह चुकी थी कि "साम्राज्यवाद, सामन्तशाही, जातिप्रथा उन्मूलन, छुआछूत की समाप्ति के लिए साथ साथ संघर्ष चलाने होंगे ।" मन्दिर सहित सार्वजनिक स्थानों पर प्रवेश की बंदिशों के विरुद्ध आंदोलनों की अगुआई में कम्युनिस्ट थे । आंध्रा, तमिलनाडु, त्रिपुरा सहित कुछ राज्यों में आज भी वे इस अभियान के अगुआ हैं । बाद के दिनों में, दमन और तात्कालिकता के चलते यह मुद्दा प्राथमिकता क्रम में नीचे खिसका, तो जरूरी तो नही कि चूक जारी रखी जाये ।
दूसरे, हिन्दुत्वमार्का साम्प्रदायिकता के तीव्र उभार के बाद स्थिति नयी हुयी है । यह धार्मिक कट्टरपंथ और नवउदार का सांघातिक मेल है । आर्थिक और सामाजिक दोनों मामलो में घोर प्रतिगामी । ये एक हाथ में मनुस्मृति पकडे दूसरे हाथ से साम्राज्यवाद के साथ गलबहियां कर रहा है । चातुर्वर्ण की शुध्द बहाली से लेकर शुध्द आर्य नस्ल पैदा करने, महिलाओं को रसोई और प्रसूतिगृहो तक महदूद करने, शंबूको-एकलव्यों की श्रृंखला खड़ी करने तक की इसकी कार्यसूची है । जाति और वर्ण के आधार पर भेद का अंतर्विरोध जिस तेजी से उभरा है उसी तेजी से प्रतिवाद और प्रतिरोधकारी शक्तियों के पुनरेकीकरण की आवश्यकता उभरी है । लिहाजा यह काम प्राथमिकताओं में और ऊपर आया है ।
इसमें अनोखा कुछ नहीं है । जिन्हें 70 के दशक के अंत और 80 के दशक के पूर्वार्ध की याद है वे जानते हैं कि तब पंजाब से असम तक राष्ट्रीय एकता को लेकर उभरे अंतर्विरोध के अनुकूल कार्यनीति अपनाई गयी थी । व्यापकतम संभव लामबंदी और कुर्बानी दोनों में वामपंथ ही अगुआ था । उसके पहले इमरजेंसी के मुकाबले एक कार्यनीति बनी थी, जिसके नतीजे निकले । इस बार का प्रश्न तो सीधे सीधे रणनीति का भी है, कार्यनीति का भी है ।
अमानुषिक और हिंसक प्रतिक्रियावादी उभार की इस स्थिति के बिना भी अम्बेडकर प्रासंगिक थे । इसके चलते तो उनकी तथा जाति विरोधी आंदोलनों के उनके पूर्ववर्तियों की प्रासंगिकता और बढ़ी है ।

मंगलवार, 21 मार्च 2017

क्रांति से अभी कोसों दूर , मायाजी ! -- मीरा नंदा

क्रांति से अभी कोसों दूर , मायाजी ! -- मीरा नंदा



(अनुवादकीय नोट: यद्यपि मीरा नंदा ने यह लेख 2007 में मायावती के चौथी बार मुख्यमंत्री बनने के समय तहलका मैगज़ीन में अंग्रेजी में लिखा था परन्तु इसमें उसने मायावती की सर्वजन की राजनीति से उपजे जिन खतरों और कमजोरियों को डॉ. आंबेडकर के माध्यम से इंगित किया था, आज वे सभी सही साबित हुयी हैं. मायावती हिंदुत्व को रोकने में सफल होने की बजाये स्वयम उसमें समा गयी है. मीरा नंदा की अम्बेडकरवाद की समझ बहुत गहरी और व्यापक है.- एस.आर. दारापुरी) 
मायावती के चुनाव अभियान में भीम राव आंबेडकर का नाम बार बार आता है . परन्तु क्या संविधान निर्माता उसकी राजनीति की तारीफ करते? मीरा नंदा ने चुनाव उपरांत इन दोनों के बीच वार्तालाप की कल्पना की है.

लखनऊ, रविवार, 13 मई, 2007
आधी रात गुजर चुकी थी, और मायावती थकी हुयी थी. उसका दिन राज्यपाल हाउस पर मुख्य मंत्री के पद की शपथ ग्रहण में गुजरा था. यह एक भव्य दृश्य था- उसके पीछे उसके 50 मंत्री बड़ी भीड़ और कैमरों की चमक. मायवती एक लम्बी दौड़ के बाद समाप्ति रेखा को छूने वाले विजेता की तरह, उत्साही परन्तु थकी हुयी थी.  वह तकिये पर सर रखते ही सो गयी. उस पर डॉ. आंबेडकर की मूर्ती जिसे उसने दिन में आंबेडकर पार्क में हार पहनाया था सजीव हो उठी और बोलना शुरू किया जैसा कि सपने में मूर्तिया बोलने लगती हैं.

आंबेडकर:  मायाजी आज आप को पार्क में अपने बहुत साथियों के साथ देख कर बहुत अच्छा लगा. अपने भारतीय भाईयों को इतने जोश, उत्साह और आशा के साथ वोट डालते देख कर  बहुत अच्छा लगा.
मायावती: पूज्य बाबासाहेब! क्या शुभ मुहूर्त है कि आप के दर्शन  मिले. ( आंबेडकर के चरण छूने के लिए झुकती है )
आंबेडकर:  (पीछे हट जाते हैं और अभिवादन में हाथ जोड़ते हैं). कृपया मेरे सामने अथवा किसी दूसरे के सामने भी अपने आप को मत झुकाइये. मुझे याद आया कि अब आप मुख्य मंत्री हैं. आप ने अपने पिछले तीन बार के मुख्यमंत्री काल में बहुत उत्साह दिखाया था. मेरी मूर्तियाँ खड़ी करने की बजाये जनता के पैसे  को बेहतर ढंग से खर्च करने के तरीके हैं.
मायावती:  आप हमारे मार्गदर्शक हैं. आप की मूर्तियों से दलित जनता में आत्मविश्वास और स्वाभिमान को प्रेरणा मिलती है.
आंबेडकर:  मैं उनके संघर्षों से द्रवित हो जाता हूँ और मुझे उनकी उपलब्धियों पर अभिमान होता है. परन्तु प्रेरणा लेने के लिए उन्हें मेरी मूर्तियों की ज़रुरत नहीं है.
.मायावती:  हम जिस तरह से आप के विचारों पर काम कर रहे हैं उस पर आप को बहुत गर्व होगा. हम ने उत्तर प्रदेश में जो क्रांति शुरू की है वह आप की विचारधारा का रूपान्तर है. जब कांशी राम जी थे हम लोगों ने बसपा में  "बाबा तेरा मिशन अधूरा, कांशी राम करेंगे  पूरा" का नारा लगाया था.
आंबेडकर:  मैं आप की इसी "सामाजिक क्रांति" के बारे में ही तो बात करने के लिए आया हूँ. मैंने सुना है कि बहुत से विद्वान लोग आप की तुलना माओ से कर रहे हैं, वामपंथी पत्रकार जाति पिरामिड को पलटने के लिए आप की तारीफ कर रहे हैं, दक्षिण पंथी हिन्दू उग्रवादी जाति समरसता को बढ़ाने के लिए आप की प्रशंसा कर रहे हैं. मैं इन प्रशंसकों में शामिल नहीं हो सकता. यह मेरे सपनों की क्रांति नहीं है. मुझे गलत मत समझना: एक चमार की बेटी के इतना ऊपर उठने पर मुझे खुशी है. मैं आपकी और कांशी राम की अपने दलित भाईयों, जिन्हें अब तक केवल वोट बैंक समझा जाता था, को लामबंद करने के लिए प्रशंसा करता हूँ. और आप ने एक जीतने वाले राजनीतिक गठजोड़ को अंजाम दिया है. मुझे विश्वास है आप एक अच्छी चेस खिलाड़ी बन सकती हैं.
मायावती:  सब आप की कृपा है, बाबासाहेब! हम आप के शिष्य हैं. हम अम्बेडकरवाद को लागू कर रहे हैं.
आंबेडकर:  परन्तु जैसा मैं कह रहा था, मैं आप के अम्बेडकरवाद के साथ असहज महसूस कर रहा हूँ. यह तो मेरी विचारधारा के साथ भद्दा मजाक है. मेरे विचार में लोकतंत्र केवल उपरी समानता और समयबद्ध चुनाव जीतने का नाम नहीं है. यह तो समानता, स्वतंत्रता, भाईचारा और न्याय पर आधारित नए समाज के निर्माण की प्रक्रिया है. सच्चे लोकतंत्र का अर्थ है भाईचारा, एक साहचर्य जीवन और अपने साथियों के प्रति सम्मान. समाज में इस प्रकार के लोकतंत्र की जड़ें जमाने के लिए ज़रूरी है कि उन सभी विचारों को नष्ट किया जाये जो जाति, वर्ग एवं लिंगभेद को स्वाभाविक एवं समरस बताते हैं. मेरा जातिभेद के विनाश से यही मतलब था. इसी लिए आप अगर इसे अम्बेडकरवाद कहना चाहती हैं तो यह केवल चुनाव जीतने के लिए ही नहीं है. अगर आप को फुर्सत मिले तो मेरी पुस्तक "जातिभेद का विनाश" से धूल पोंछियेगा. उस छोटी सी पुस्तक में मेरे दर्शन का निचोड़ है. यह सही है कि मैं चाहता था कि उन्हें शासक समुदाय बनने के लिए साथी बनाने चाहिए. उदाहरण के लिए स्वतंत्र मजदूर पार्टी में हम लोगों ने सभी जातियों के मजदूरों को लिया था. बहुत से अवसरों पर जागरूक ब्राह्मणों और द्विजों ने मेरी सहायता की थी. मैंने उनको इस लिए साथ नहीं लिया था कि वे मुझे वोट दिला सकते हैं परन्तु इस लिए क्योंकि वे मेरी स्वतंत्रता, समानता और भ्रातृभाव की विचारधारा में विश्वास रखते थे. परन्तु आप की पार्टी के लिए सत्ता प्राप्ति ही लक्ष्य बन गयी है. आप को इससे  कोई मतलब नहीं है कि आप किस से हाथ मिला रही हैं, आप उनको कैसे पटाती हैं और सत्ता पाने के बाद आप क्या करेंगी. बड़े परिवर्तन का एजंडा कहाँ है जो पूँजीवाद, ब्राह्मणवाद और धार्मिक अंध विश्वासों को चुनौती दे सके?
मायावती:  परन्तु बाबासाहेब समय बदल गया है. आज कल सभी राजनीतिक पार्टियाँ सौदे करती हैं  जिसे "सोशल इन्जिनीरिंग" कहते हैं. क्यों, अभी पंजाब में अकाली बीजेपी की मदद से सत्ता में आये हैं जो सिक्खों को अभी भी हिन्दू मानती है. कांग्रेस इतने दिन सत्ता में इसी लिए बनी रही क्योंकि उसने ब्राह्मणों, मुसलमानों और दलितों का बड़ा गठजोड़ बना रखा था. जैसा आप जानते हैं कि उत्तर प्रदेश में दलित केवल 21% ही हैं. हम लोग जब तक बड़ा गठबंधन नहीं बनायेंगे, हम लोग सत्ता में नहीं आ सकते.
आंबेडकर:  मायाजी, आप 100% सही हैं. सभी बड़ी पार्टियाँ चुनाव जीतने के लिए सब प्रकार के सौदे करती हैं. एक पुरानी कहावत है कि राजनीति अजनबियों को भी हमबिस्तर कर देती है. क्योंकि हरेक ऐसा कर रहा है, इसी लिए यह ठीक नहीं हो जाता. इस प्रकार की खरीद-फरोख्त से लोकतंत्र की गुणवत्ता कम हो जाती है. हमारा देश जमीनी स्तर पर अभी भी कानून का देश नहीं है बल्कि यह सत्ता में बैठे लोगों के रहमो-कर्म पर आश्रित है. परन्तु इस सौदेबाजी को अम्बेडकरवाद का नाम क्यों दे रही है? अगर आप जातिगत गणित को अम्बेडकरवाद कहती हैं तो मैं अम्बेडकरवादी नहीं हूँ. आंबेडकरवाद चुनाव जीतने से बहुत कुछ आगे है. यह एक नए समतावादी, तार्किक सांस्कृतिक सोच और राजनैतिक लोकतंत्र को धर्मनिरपेक्ष सामाजिक लोकतंत्र में बदलने के लिए है. जैसा कि मैं संविधान सभा में कांग्रेस वालों को जताता रहता था कि " हमारे पास राजनैतिक लोकतंत्र हमारी सामाजिक व्यवस्था को सुधरने के लिए है जो कि बहुत असमानताओं और भेदभाव से भरा हुआ है...."
मायावती:  परन्तु हम अपनी सामाजिक व्यवस्था को सुधारने के लिए सत्ता हथियाना चाहते हैं. हम लोग बसपा में जाति के विनाश के लिए प्रतिबद्ध हैं परन्तु हम व्यवहारिक हैं. हम दलितों के नेतृत्व में उच्च जातियों, पिछड़ी जातियों और गरीब मुसलमानों को एक इन्द्रधनुष में ला रहे है.
आंबेडकर:  मत के तौर पर तो यह बहुत अच्छा लगता है. परन्तु यह एक निराशाजनक तथ्य है कि भारत में सच्ची भाईचारे की भावना मौजूद नहीं है. यद्यपि हम लोग आज कल चातुर्वर्ण का शब्द प्रयोग नहीं करते परन्तु ऊँचनीच को उचित ठहराने की मानसिकता अभी भी मौजूद है.
मायावती:  मैं सहमत हूँ कि समाज के सभी स्तरों पर जातिभेद व्यापत है. परन्तु सभी जातियों को दलितों के नेतृत्व में लाकर इसे चुनौती देने की कोशिश कर रहे हैं ताकि हम सब के लिए समानता के द्वार खोल सकें.
आंबेडकर:  तुम्हारे ही रिकार्ड के अनुसार जाति आधारित गठजोड़ जातिवाद को कम करने की बजाये बढ़ावा देते हैं. जब आप मुख्यमंत्री थीं तो आप ने अपने लोगों को बढ़ाया और जब मुलायम सिंह मुख्यमंत्री थे तो उसने अपने यादव लोगों को बढ़ाया. जब आप मुख्यमंत्री थीं तो आप ने दलितों पर अत्याचार रोकने के लिए कानून व्यवस्था को कड़ा किया (वास्तव में मायावती ने तो दलित एक्ट लागू करने पर रोक लगा दी थी) और जब आपकी सहयोगी बीजेपी सत्ता में आई तो उन्होंने तुरंत इन कानूनों को शिथिल कर दिया. जब आप तीसरी वार 2002 में सत्ता में आयीं तो आप ने  बीजेपी के समर्थन को कायम रखने के लिए गुजरात में मुसलमानों के नरसंहार के लिए मोदी को दोष मुक्त कर दिया (वास्तव में इस वर्ष मायावती ने गुजरात जा कर मोदी के पक्ष में चुनाव प्रचार भी किया था). इस सब के बाद आप समझ जाएँगी कि मुझे आप की जीत पर कोई ख़ुशी नहीं है.
मायावती:  दूसरे सभी अवसरों पर बसपा सरकार थोड़ी थोड़ी अवधि के लिए थी. इस बार हम अधिक काम करेंगे क्योंकि हमें पूरे पांच साल मिलेंगे.
आंबेडकर:  हाँ हाँ, मैं जानता हूँ कि इस बार उच्च जाति के लोग बसपा में हैं और इसे बाहर से समर्थन नहीं दे रहे हैं. परन्तु क्या आप को विश्वास है कि क्योंकि वे इस बार बसपा के टिकट पर लड़े हैं उन्होंने हिन्दू बहुलवादी और परम्परावादी सोच छोड़ दी है. आप नहीं सोचतीं कि वे आप का इस्तेमाल कर रहे हैं जैसा कि आप सोचती हैं कि आप उनका इस्तेमाल कर रही हैं.
मायावती:  ऐसा हो सकता है. क्या आप एक मुख्यमंत्री की इंजीनियरिंग का दलितों पर असर नहीं देख रहे? जब भी मैं सत्ता में होती हूँ तो दलित अधिक सुरक्षित और अधिक आत्मविश्वासी दिखाई देते हैं. क्या आप ने देखा कि किस तरह शपथ ग्रहण के समय सभी ब्राह्मण मंत्रियों और अन्यों ने मेरे चरण छुए थे.
आंबेडकर:  यह लोकतंत्र का खोखलापन है कि जब दलित मुख्यमंत्री होता है तो दलित अधिक आश्वासित होते हैं. और ब्राह्मणों का आप के चरण छूने को आप को बढ़ावा नहीं देना चाहिए. मेरी एक अच्छे समाज की अवधारणा है जहाँ पर चरण वंदना और चापलूसी नहीं होनी चाहिए.
मायावती:  आप को ये चरणवंदना और चापलूसी अच्छी न लगती हो परन्तु हमें तो रीति रिवाज़ का आदर करना है. इतनी सदियों के बाद यह कोई छोटी बात नहीं है कि बलशाली सवर्ण हमारे सामने झुक रहे हैं. इससे एक ताकत का अहसास होता है. परन्तु हमारी क्रांति संकेतों से आगे बढ़ कर है. जब भी हम सत्ता में आये हैं हम हजारों आंबेडकर- गाँव के लिए सड़क, बिजली, पानी और स्कूल का ठोस लाभ लाये हैं. दलित जानते हैं कि जब कोई उनका अपना सत्ता में होगा तो उनकी ज़रूरतें पूरी होंगी. इसी लिए हमें बार बार वोट देते हैं
आंबेडकर:  मैं मानता हूँ यह सकारात्मक कदम हैं. परन्तु दूसरी जातियों और धार्मिक अल्पसंख्यक वर्ग के गरीब लोग भी तो इसी देश के नागरिक हैं और उन्हें  भी अच्छे जीवन के लिए सुविधायों का अधिकार है. उनका कल्याण सत्ता में व्यक्तियों की जाति पर निर्भर नहीं रहना चाहिए.
मायावती:  आप का विचार विमर्श का लोकतंत्र सुनने में तो बहुत अच्छा लगता है. परन्तु राजनेतायों को ज़मीनी हकीकत की चिंता करनी होती है. परन्तु एक बिंदु पर तो आप हमें पूरे अंक दीजिये कि हम धर्मनिरपेक्षता की सुरक्षा कर रहे हैं. मैं इसे अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि मानती हूँ. बसपा ने बीजेपी से ब्राह्मण वोट छीन लिया है. एक बार हम लोग यूपी माडल पूरे देश में ले आयें तो बीजेपी ख़त्म हो जाएगी.
आंबेडकर:  यह सही है की बसपा को बीजेपी की कीमत पर लाभ हुआ है. मुझे हिन्दू राष्ट्रवादियों पर रोक  लगने पर ख़ुशी है. परन्तु दो कारणों से मैं अभी भी चिंतित हूँ. एक आप ने अपनी चुनाव अपीलों में देवताओं का आवाहन करके धर्म निरपेक्षता के पहले सिद्धांत का उलंघन किया है. मैं बसपा के हाथी के गणेश में बदलने और उसके हिन्दू त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु और महेश) में बदलने पर हक्का बक्का रह गया हूँ. अगर चुनाव में बीजेपी के लिए देवताओं का प्रदर्शन गलत है तो फिर बीएसपी द्वारा भी ऐसा किया जाना गलत है. दरअसल बीएसपी द्वारा देवताओं का सम्मान करना बिलकुल ढोंग है जिससे दलित और शूद्र सदियों से वर्जित रहे हैं. आप ने फ़िलहाल बीजेपी को तो रोका है परन्तु आप जनता में धर्मनिरपेक्षता को आगे बढ़ाने में विफल रही हैं.
मायावती:  सम्मानित बाबासाहेब ! आप वर्तमान सच्चाई को उच्च आदर्शों पर माप रहे हैं.
आंबेडकर:  हमें अपने कृत्यों को उच्च आदर्शों पर ही मापना चाहिए. वर्ना आदर्श किस काम के? परन्तु मैं आप की धर्म निरपेक्षता की रक्षा करने पर खुश न होने का दूसरा कारण बताता हूँ. आप समझती हैं कि गाँव में अगर ब्राह्मण भूमिहीन दलित मजदूरों पर रोब  नहीं गान्ठेगा तो वे शूद्र भूमिधरों के विरुद्ध आप के साथी बन जायेंगे. क्योंकि ब्राह्मणों और दलितों में कोई आर्थिक टकराहट नहीं है अतः दलितों और ब्राह्मणों में कोई विचारधारा की टकराहट भी नहीं है. मुझे डर है की आप रीति रिवाज़, मिथक और मन के विश्वास को कम करके आंक रही हैं. न तो शहरी मध्य वर्ग और न ही ज़मींदारों ने ऊँचनीच और लिंगभेद की आत्मा और पुनर्जन्म की अवधारणाओं को बदला है. अगर कुछ हुआ है तो यह कि इन नव-हिन्दू गुरुओं और पुरातन पंडितों ने इस अन्धविश्वासी विश्वदृष्टि को विज्ञान के पर्दे से ढकने की कोशिश की है. इसी लिये मैं हमेशा दलितों को वैज्ञानिक सोच विकसित करने और अतार्किक विचार और व्यवहारों को सक्रिय रूप से चुनौती देने के लिए कहता रहा हूँ. मेरे "बुद्ध और उनका धम्म" का यही सन्देश है. यह संभव है कि जिन ब्राह्मणों ने एक रणनीति के अंतर्गत आप को वोट दिया है वे वास्तव में मंदिरों और वैदिक पाठशालाओं, जो आप के राज्य में बहुतायत में हैं, में रुढ़िवादी सामाजिक मूल्य और  अन्धविश्वासी धार्मिक प्रथाओं का प्रचार करके रोज़ी कमाँ रहे हैं. अब चूँकि उनका सरकार में दखल हो गया है वे शिक्षा और अन्य सांस्कृतिक परम्परागत एजंडा के लिए सरकारी मदद की अपेक्षा नहीं करेंगे? मेरी धारणा है कि हिन्दू परम्परावाद हिन्दू राष्ट्रवाद की जननी है. इसी लिए मुझे चिंता है कि क्या आप हिंदूत्व की ताकतों को रोक पाएंगी?
मायावती:  मैं समझती हूँ कि मैं हिन्दू एजंडा को विफल करने के लिए मज़बूत हूँ. हमारा एजंडा धर्म निरपेक्ष है और मैं किसी भी हिंदुत्व एजंडा को सहन नहीं करुँगी.
आंबेडकर:  मायाजी! आप मज़बूत हों. आपको और यूपी में आप के लोगों को मेरी शुभ कामनाएं. मैं लेट हो रहा हूँ और मैं आप से विदा लूँ. परन्तु मैं भावनाओं में हमेशा आप के साथ रहूँगा.
आंबेडकर की आवाज़ धीमी पड़ जाती है और मूर्ति फिर पत्थर में बदल जाती है. मायावती जाग जाती है और भोर में बैठ कर सोचने लगती है.
(मीरा नंदा एक विज्ञान दार्शनिक हैं  और जॉन टेम्प्लटन फैलो हैं.)

रविवार, 19 मार्च 2017

दलित-जातिवादी राजनीति बनाम हिंदुत्व

दलित-जातिवादी राजनीति बनाम हिंदुत्व
 -  तुलसी राम



पिछले पचीस सालों में दलितों के साथ पिछड़े वर्ग की राजनीति में जातिवाद अपनी चरम सीमा पार कर गया था, जिसका परिणाम यह हुआ कि विशुद्ध हिंदुत्व की राजनीति करने वाली भाजपा ने अकेले बहुमत पाकर भारत की सत्ता प्राप्त कर ली। भारतीय जाति-व्यवस्था की सबसे बड़ी विशेषता यह रही है कि इसे धर्म और ईश्वर से जोड़ दिया गया। यही कारण था कि इसे ईश्वरीय देन मान लिया गया। गांधीजी जैसे व्यक्ति भी इसी अवधारणा में विश्वास करते थे। इस अवधारणा का प्रचार सारे हिंदू ग्रंथ करते हैं। इसलिए हिंदुत्व पूर्णरूपेण जाति-व्यवस्था पर आधारित दर्शन है।
विभिन्न जातियां हिंदुत्व की सबसे मजबूत स्तंभ हैं। इसलिए इन स्तंभों की रक्षा के लिए ही भारत के सभी देवी-देवताओं को हथियारबंद दिखाया गया है। इसका परिणाम यह हुआ कि दलितों पर आज भी वैदिक हथियारों से हमले जारी हैं। ऐसी स्थिति में जब जाति को मजबूत किया जाता है, तो हिंदुत्व स्वत: मजबूत होता चला जाता है। पिछले पचीस वर्षों में ऐसा ही हुआ है।
नब्बे के दशक में कांशीराम ने एक अत्यंत खतरनाक नारा दिया था- 'अपनी-अपनी जातियों को मजबूत करो'। इसी नारे पर बहुजन समाज पार्टी (बसपा) खड़ी हुई। परिणामस्वरूप डॉ. आंबेडकर द्वारा स्थापित जाति-व्यवस्था विरोधी आंदोलन की अवधारणा को मायावती ने शुद्ध जातिवादी अवधारणा में बदल दिया। इतना ही नहीं, गौतम बुद्ध द्वारा दी गई 'बहुजन हिताय' की अवधारणा को चकनाचूर करके उन्होंने 'सर्वजन हिताय' का नारा दिया, जिसका व्यावहारिक रूप सभी जातियों के गठबंधन के अलावा कुछ भी नहीं था। परिणामस्वरूप दलितों की विभिन्न जातियों के साथ-साथ ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्यों के अलग-अलग सम्मेलनों की बसपा ने भरमार कर दी, जिससे हर जाति का दंभी गौरव खूब पनपने लगा।
ब्राह्मण सम्मेलनों के दौरान बसपा के मंचों पर हवन कुंड खोदे जाने लगे और वैदिक मंत्रों के बीच ब्राह्मणत्व का प्रतीक परशुराम का फरसा (वह भी चांदी का) मायावती को भेंट किया जाने लगा। इस दौरान दलित बड़े गर्व के साथ नारा लगाते थे- 'हाथी नहीं, गणेश हैं, ब्रह्मा-विष्णु-महेश हैं'। मायावती हर मंच से दावा करने लगीं कि ब्राह्मण हाशिये पर चले गए हैं, इसलिए वे उनका खोया हुआ गौरव वापस दिलाएंगी। वे इस तथ्य को जरा भी समझ नहीं पार्इं कि ब्राह्मण कभी भी हाशिये पर नहीं जाते हैं। उनका सबसे बड़ा हथियार धर्म और ईश्वर है। इन्हीं हथियारों के बल पर ब्राह्मणों ने हमेशा समाज की बागडोर अपने हाथ में रखी।
इससे पहले मायावती तीन बार भाजपा के सहयोग से मुख्यमंत्री बनीं और गठबंधन की सरकार चलाई। इतना ही नहीं, भाजपा के सहयोग से मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए मायावती विश्व हिंदू परिषद के त्रिशूल दीक्षा समारोह में भी शामिल हुर्इं। पर जब वे मोदी का प्रचार करने गुजरात गर्इं, तो उन्होंने धार्मिक उन्माद पर खुलेआम ठप्पा लगा दिया। दलित सत्ता के नारे के साथ मायावती ने जातीय सत्ता की प्रतिस्पर्द्धा को जन्म दिया। इस जातीय सत्ता की होड़ में मंडलवादियों ने शामिल होकर धर्म के स्तंभों को और मजबूत किया।
अगर राजनीति में धर्म का इस्तेमाल धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत के विरुद्ध है, तो धर्म से उत्पन्न जाति का इस्तेमाल कैसे धर्म-निरपेक्ष हो सकता है? इसलिए धर्म का राजनीति में इस्तेमाल जितना खतरनाक है, जाति का इस्तेमाल उससे कम खतरनाक नहीं है। इस तथ्य को न कभी मायावती समझ पार्इं और न ही मंडलवादी। मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव, शरद यादव और नीतीश कुमार आदि सब ने जातिवादी राजनीति के माध्यम से धर्म की राजनीति को मजबूत किया।
आज नरेंद्र मोदी जो छप्पन इंच का सीना तान कर घूम रहे हैं, उसकी पृष्ठभूमि में जातिवादी राजनीति रही है। उक्त सारे नेताओं द्वारा जाति के साथ-साथ मुसलिम वोटों का अपने पक्ष में ध्रुवीकरण करने के प्रयास से आम हिंदू नाराज होकर पूरी तरह भाजपा की तरफ चला गया। इसलिए संघ परिवार जिसकी वकालत बरसों से कर रहा था, उसमें वह पूर्णत: सफल रहा। भाजपा ने धर्म और जाति, दोनों का इस्तेमाल बड़ी रणनीति के साथ किया, जिसके पीछे वह चालाकी से 'विकास' की बात करके जनता को भ्रमित करने में सफल रही, जबकि असली मुद्दा धार्मिक ध्रुवीकरण का ही था।
मायावती ने डॉ. आंबेडकर की मूर्तियों और पार्कों की आड़ में दलितों को उनके रास्ते से भटकाने का काम बड़ी सफलता से किया। डॉ. आंबेडकर ने दलितों को सामाजिक और धार्मिक भेदभाव से मुक्ति दिलाने के लिए एक दोहरी रणनीति अपनाई थी। एक तरफ उन्होंने जाति-व्यवस्था विरोधी आंदोलन का सूत्रपात करके 'मनुस्मृति' को जलाया था और दूसरी तरफ जातिवाद को स्थापित करने वाले वैदिक ब्राह्मण धर्म के विकल्प के रूप में बौद्ध धर्म को अपनाया था। मायावती डॉ. आंबेडकर की दोनों रणनीतियों को दरकिनार करके जातिवादी राजनीति के चंगुल में फंसती चली गर्इं।
एक बार कांशीराम ने घोषणा की थी कि वे डॉ. आंबेडकर से कहीं ज्यादा लोगों के साथ, यानी बीस लाख से अधिक लोगों के साथ बौद्ध धर्म ग्रहण करेंगे, पर स्वास्थ्य की समस्या के कारण वे ऐसा नहीं कर पाए। बाद में मायावती ने कहा कि बौद्ध धर्म ग्रहण करने से सामाजिक सद्भावना के बिगड़ने की संभावना है, इसलिए जब वे प्रधानमंत्री बन जाएंगी, तो बौद्ध धर्म ग्रहण करेंगी। जाहिर है, जब उन्होंने उक्त बातें कहीं, उस समय मायावती भाजपा के साथ उत्तर प्रदेश की सरकार चला रही थीं।
डॉ. आंबेडकर के दर्शन के बारे में एक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि वे भारत के लिए द्वि-दलीय प्रणाली की वकालत करते थे, इसलिए वे दलित नाम से कोई पार्टी नहीं चलाना चाहते थे। इसलिए उन्होंने रिपब्लिकन पार्टी को प्रस्तावित किया। कांग्रेस का यही विकल्प उन्होंने प्रस्तुत किया था। पर एक बात उन्होंने जोर देकर कही थी कि दलितों को आरएसएस और हिंदू महासभा (वर्तमान विश्व हिंदू परिषद) जैसे संगठनों के साथ कभी भी समझौता नहीं करना चाहिए।
संघ ने 1951 में जनसंघ की स्थापना की थी, पर आंबेडकर के समय में उसका प्रभाव नगण्य था। इसीलिए सीधे-सीधे उन्होंने संघ से किसी भी तरह का समझौता करने से दलितों को मना किया था। मायावती ने डॉ. आंबेडकर के हर कदम को नजरअंदाज करके संघ-परिवार का हाथ मजबूत किया। डॉ. आंबेडकर का जनतंत्र में अटूट विश्वास था, जिसकी झलक भारत के संविधान में साफ तौर पर मिलती है। उनका मानना था कि जाति-व्यवस्था एक तरह से तानाशाही वाली व्यवस्था थी, जिसके चलते दलित हर तरह के मानवीय अधिकारों से वंचित रहे। इसलिए जनतांत्रिक प्रणाली को वे दलितों के लिए सर्वोत्तम प्रणाली समझते थे।
पर सारी जातिवादी पार्टियां अपनी ही जाति के लोगों को हमेशा जनतांत्रिक अधिकारों से वंचित करती रही हैं। ऐसी पार्टी के नेताओं में मायावती का नाम सबसे ऊपर आता है। यहां तक कि बैठकों के दौरान न सिर्फ मायावती कुर्सी पर बैठा करती थीं और बाकी नेता जमीन पर बैठते थे; विधानसभा हो या संसद, उनके डर से कोई पार्टी विधायक या सांसद कुछ भी बोलने से डरता था। उनका व्यवहार एकदम सामंती हो गया था। उन्हें आम सभाओं में चांदी-सोने के ताज पहनाए जाते थे और उनके हर जन्म दिवस पर लाखों रुपए की भारी-भरकम माला भी पहनाई जाती थी। 1951 में मुंबई के दलितों ने बड़ी मुश्किल से दो सौ चौवन रुपए की एक थैली डॉ. आंबेडकर को उनके जन्मदिन पर भेंट की थी, जिस पर नाराज होकर उन्होंने चेतावनी दी थी कि अगर कहीं भी ऐसा दोबारा किया तो वे ऐसे समारोहों का बहिष्कार करेंगे।
पिछली दफा राज्यसभा का परचा दाखिल करते हुए मायावती ने आमदनी वाले कॉलम में एक सौ तेईस करोड़ रुपए की संपत्ति दिखाई थी। हकीकत यह थी कि मायावती के गैर-जनतांत्रिक व्यवहार के चलते बसपा में भ्रष्ट और अपराधी तत्त्वों की भरमार हो गई थी, जिसके कारण पूरा दलित समाज न सिर्फ बदनाम हुआ, बल्कि इससे दलित विरोधी भावनाएं भी समाज में खूब विकसित हुर्इं। एक तरह से मायावती दलित वोटों का व्यापार करने लगी थीं। पिछले अनेक वर्षों में चमार और जाटव समाज के लोग उत्तर प्रदेश में भेड़ की तरह मायावती के पीछे चलने लगे थे। इसलिए वे भ्रष्टाचारियों और अपराधियों को चुन कर विधानसभा और संसद में भेजने लगे थे।
बाबा साहेब आंबेडकर ने संविधानसभा में बोलते हुए एक बार कहा था, 'धर्म में नायक पूजा किसी को मुक्ति प्रदान कर सकती है, पर राजनीति में नायक पूजा निश्चित रूप से तानाशाही की ओर ले जाएगी।' मायावती के संदर्भ में यह शत-प्रतिशत सही सिद्ध हुआ। राजा-रानियों की तरह मायावती ने अपने उत्तराधिकारी की घोषणा करते हुए प्रेस सम्मेलन में कहा था, 'मेरा उत्तराधिकारी चमार जाति का ही होगा, जिसका नाम मैंने एक लिफाफे में बंद कर दिया है। यह लिफाफा मेरी मृत्यु के बाद खोला जाएगा।' इससे एक बात साफ हो गई कि मायावती के रहते कोई अन्य दलित नेता नहीं बन सकता था।
उनके द्वारा बार-बार चमार जाति के उल्लेख से दलित की गैर-चमार जातियां बसपा से कटती चली गर्इं और उनमें से अधिकतर या तो भाजपा के साथ हो गर्इं या मुलायम सिंह यादव के साथ चली गर्इं। उत्तराधिकारी की घोषणा के बाद एक रोचक घटना हुई। मीडिया वालों ने अंदाजवश आजमगढ़ के राजाराम के रूप में उत्तराधिकारी की पहचान कर ली। परिणामस्वरूप मायावती ने अविलंब राजाराम को पार्टी से बर्खास्त कर दिया।
जब मायावती सामाजिक अभियांत्रिकी (सोशल इंजीनियरी) के नाम पर ब्राह्मणों को सतीश मिश्रा के माध्यम से अपनी तरफ खींचने का अभियान चला रही थीं तो दलितों के विरुद्ध उसका दूरगामी प्रभाव पड़ा। इससे पहले चुनावी राजनीति में ही सही, सारी पार्टियां दलितों को अपनी तरफ खींचने का प्रयास करती थीं और उनके लिए तरह-तरह के वादे भी किया करती थीं, जिसका परिणाम अनेक अवसरों पर काफी सकारात्मक भी हुआ करता था। इसलिए दलित हमेशा एक दबाव समूह का काम करते थे। पर मायावती उस तथाकथित सामाजिक अभियांत्रिकी के चलते हर पार्टी के लिए ब्राह्मण खुद दबाव समूह के लिए दलितों को हाशिये पर डाल दिए। परिणामस्वरूप मायावती के चक्कर में दलित हर पार्टी के लिए दुश्मन बन गए। अब उनके कल्याण के लिए कोई भी पार्टी तत्पर नहीं दिखाई पड़ती। सच ही कहा गया है, 'माया मिली न राम।'
मायावती के एक अन्य दलित-विरोधी फैसले का दूरगामी प्रभाव पड़ा। किसी गैर-दलित मुख्यमंत्री की कभी हिम्मत नहीं पड़ी कि वह 'दलित अत्याचार विरोधी अधिनियम' से छेड़छाड़ करे। पर मायावती जब भाजपा के साथ संयुक्त सरकार चला रही थीन, तो उन्होंने गैर-दलितों को खुश करने के लिए उपरोक्त अधिनियम में संशोधन करके यह प्रावधान कर दिया कि दलित महिलाओं के साथ बलात्कार जैसे अपराधों को पुलिस तब तक दर्ज न करे, जब तक कि डॉक्टर प्रमाणित न कर दे कि सही मायने में बलात्कार हुआ है। मायावती के इस आदेश का परिणाम यह हुआ कि दलितों पर तरह-तरह के अत्याचार होते रहे, पर पुलिस अधिकतर मामलों में आज भी केस दर्ज नहीं करती है।
इस बार लोकसभा चुनावों में जब बसपा का सफाया हो गया, तो मायावती ने इसके लिए कांग्रेस को जिम्मेदार ठहरा दिया। हकीकत तो यह है कि मायावती अपनी व्यक्तिगत सत्ता के लिए लगातार जातिवादी नीतियां अपनाती रही हैं, जिससे दलित निरंतर सबसे कटते चले गए। पिछले पचीस सालों के अनुभव से पता चलता है कि अब देश को जातिवादी पार्टियों की जरूरत नहीं है, बल्कि सबके सहयोग से जाति-व्यवस्था विरोधी एक मोर्चे की आवश्यकता है, अन्यथा जातियां मजबूत होती रहेंगी, जिससे धर्म की राजनीति को ऑक्सीजन मिलता रहेगा। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान डॉ. आंबेडकर ने गांधीजी से कहा था, 'स्वतंत्रता आंदोलन में सारा देश एक तरफ है, पर जाति-व्यवस्था विरोधी आंदोलन सारे देश के खिलाफ है, इसलिए यह काम बहुत मुश्किल है।' उम्मीद है, दलित इतिहास से कुछ सीख अवश्य लेंगे।
(जनसत्ता 25 मई, 2014 से साभार)

सोमवार, 11 जुलाई 2016

क्या डॉ. आंबेडकर विफल हुए?- कँवल भारती



क्या डॉ. आंबेडकर विफल हुए?
 - कँवल भारती




 दलित चिन्तक एवं लेखक आनन्द तेलतूमड़े ने कहा है कि आंबेडकर के सारे प्रयोगए ब्राह्मणवाद के प्रति उनकी नफरत के कारण विफलता में समाप्त हुये। यह बात उन्होंने चण्डीगढ़ मेंजाति प्रश्न और मार्क्सवाद’ विषय पर आयोजित एक पाँच दिवसीय (12.16 मार्च 2013) संगोष्ठी में कही थी। कात्यायनी ने मुझे भी इस संगोष्ठी में आमन्त्रित किया था. आमन्त्रण पत्र में कुछ केन्द्रीय मुद्दे भी दिये गये थे, जिनमें जाति प्रश्न पर मार्क्सवादी प्रतिपक्ष था। मैं आंबेडकरवादी पक्ष रखने के मकसद से इस संगोष्ठी में जाने के लिये बहुत उत्सुक था, पर अपने घुटने की तकलीफ की वजह से नहीं जा सका था। लेकिन संगोष्ठी की जो रिपोर्ट पढ़ने को मिली, वह दलितों को निराश करती है।
पहले आनन्द तेलतूमड़े की बात को लें। उन्हें मैं पिछले कुछ महीनों से जानता हूँ। वे मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालयए उदयपुर में एक सेमिनार (20-21 नवम्बर, 2012) में मुख्य अतिथि थे और मैं मुख्य वक्ता। संयोग से हम दोनों के पेपर भी एक ही विषय पर थे. आंबेडकर और मार्क्स के विचारों पर। लेकिन फर्क यही था कि उनका पेपर अंग्रेजी में था, मेरा हिन्दी में। पर, मेरे पेपर में भी आलोचना के केन्द्र में मार्क्सवादी थे और उनके पेपर में भी। लेकिन एक भिन्नता बौद्ध धर्म को लेकर जरूर थी, जिसे मैं दलित जातियों में जाति-विनाश के रूप में देखता हूँ और वे उसे एक विफल प्रयोग मानते हैं। जब वे दलित आन्दोलन और राजनीति पर चर्चा करते हैं, तो जाति की राजनीति का विरोध करते हैं, जो सही भी है और जैसा कि मैं भी अक्सर कहता हूँ कि जाति की राजनीति डॉ. आंबेडकर के समाजवादी विचारों के विरुद्ध पूँजीवाद को मजबूत करती है। लेकिन जब वे जाति व्यवस्था पर आंबेडकर के लेखन पर चर्चा करते हैं, तो वे उसके विरोधी हो जाते हैं। कम्युनिस्टों और ब्राह्मणवादियों की दृष्टि में उनका यही विरोध उन्हें आंबेडकर-विरोधी बना देता है। उन्होंने कहा कि अंबेडकरवाद नाम की कोई चीज नहीं है और आंबेडकर की ‘भारत में जाति’ तथा ‘जाति का उन्मूलन’ पुस्तकों में उनके सभी समाधन गलत हैं। लेकिन उन्होंने यह नहीं बताया कि वे समाधन किस तरह गलत हैं, न ही वे आंबेडकर का कोई अकादमिक मूल्याँकन कर सके।
                संगोष्ठी के आमन्त्रण-पत्र में दी गयी तहरीर इस बात की गवाही है कि संगोष्ठी का मकसद ही जाति प्रश्न पर आंबेडकर के नेतृत्व की असफलता और अप्रासंगिकता को रेखांकित करना था। इसलिये मैं इस आलेख में पहले उन्हीं बिन्दुओं पर चर्चा करना चाहता हूँ, जो संगोष्ठी के आमन्त्रण-पत्र में उठाये गये हैं। वे कहते हैं कि दलित प्रश्न को हल करने की प्रक्रिया के बिना व्यापक मेहनतकश अवाम की वर्गीय एकजुटता और उनकी मुक्ति-परियोजना की सफलता की कल्पना नहीं की जा सकती। बात सही है, लेकिन जब वे ये कहते हैं कि ‘जो मार्क्सवाद को सच्चे अर्थों में आज भी क्रान्तिकारी व्यवहार का मार्गदर्शक मानते हैं, उनके लिये यह अनिवार्य हो जाता है कि वे मार्क्सवादी नज़रिये से जाति प्रश्न के हर पहलू की सांगोपांग समझदारी बनाने की कोशिश करें, शोध, अध्ययन और वाद-विवाद करें’, तो सवाल यह जरूर पैदा होता है कि जब मार्क्सवाद में जाति का प्रश्न है ही तो उस नज़रिये से शोध, अध्ययन और वाद-विवाद कोई कर भी कैसे सकता है? दुनिया जानती है कि मार्क्सवाद वर्ग की बात करता है, जाति की नहीं। फिर मार्क्सवादी नज़रिये से जाति के प्रश्न पर चर्चा करने की जरूरत क्या है?  क्या इसका यह अर्थ नहीं है कि वे एक गम्भीर बीमारी का इलाज उस पैथी में ढूँढ रहे हैं, जिसका उसमें इलाज ही नहीं है?
वे एक और बिन्दु उठाते हुये कहते हैं, ‘ऐसे मार्क्सवादी अकादमीशियनों की कमी नहीं है, जो सबऑल्टर्न स्टडीज़ और ‘आइडेण्टिटी पॉलिटिक्स’ की पद्धति की मार्क्सवादी पद्धति के साथ खिचड़ी पका कर ‘वर्ग अपचयनवादी दोषो’ को दुरुस्त करने की कोशिश कर रहे हैं। अतः इस विषय पर विस्तृत बहस-मुबाहसे की और अधिक जरूरत है। मतलब साफ है कि उन्हें दलित अस्मिता की राजनीति पसन्द नहीं है। वे अपनी विचारधरा के साथ दलित विचारधरा की खिचड़ी नहीं चाहते। सम्भवतः, इसीलिये वे मार्क्सवाद और आंबेडकरवाद का समन्वय भी नहीं चाहते हैं, जिसका उल्लेख संगोष्ठी में पढ़े गये उनके आधार-आलेख में मिलता है। इसका अर्थ यह हुआ कि जो दलित बुद्धिजीवी जाति और वर्ग-विहीन समाज का सपना लेकर मार्क्स और आंबेडकर की विचारधरा के साथ चल रहे हैं, वे उनकी नजर में गलत काम कर रहे हैं। इसका उन्हें बिल्कुल अहसास नहीं है कि इससे सामाजिक क्रान्ति को कितना धक्का लगेगा। वे सिर्फ मार्क्सवाद के जरिये क्रान्ति लाना चाहते हैं, जो वे आज तक नहीं ला सके। भारत के कम्युनिस्ट डॉ. आंबेडकर के समय से क्रान्ति का ढोल पीटते आ रहे हैं, पर सफल नहीं हो सके। वे भरसक दलितों पर विजय पाने की कोशिश करते हैं, परन्तु आज तक दलितों को अपनी विचारधरा से नहीं जोड़ पाये। किसी समय उत्तर प्रदेश के पूर्वी जिलों में कम्युनिस्ट पार्टी से बीस-बाईस विधायक और आधा दर्जन के करीब सांसद हुआ करते थे। पर, आज क्या स्थिति है? वह जनाधार  रेत की दीवार की तरह भरभरा कर क्यों ढह गया? कहाँ चला गया वह सारा जनाधार? क्या इसका कारण यह नहीं है कि वे कम्युनिस्ट थे ही नहीं, ब्राह्मणवादी मानसिकता वाले सवर्ण थे?  वे छद्म कम्युनिस्ट थे और अपनी ब्राह्मणवादी मानसिकता से मुक्त ही नहीं हुये थे। इसलिये जब दलित उभार की आँधी चली, तो वे अपने जातीय अहं की तुष्टि के लिये उन्हीं पार्टियों में चले गये, जहाँ उनका वर्चस्व था।
अतः, कहना न होगा कि भारत का कम्युनिस्ट आन्दोलन इसी जातीय मानसिकता के कारण दलित जातियों में लोकप्रिय नहीं हो सका। मार्क्सवादियों का यह कहना सही है कि अस्मिता की राजनीति ने दलितों में वर्ग-चेतना विकसित नहीं होने दी। पर, दलितों का यह कहना भी सही है कि कम्युनिस्ट नेतृत्व अपने ब्राह्मणवादी चोले से बाहर ही नहीं निकला। उसने यह समझने की कोशिश ही नहीं की कि दलितों के लिये अस्मिता सबसे ज्यादा जरूरी चीज क्यों बन गयी? क्यों वे आज भी आरक्षण को अपने लिये सबसे ज्यादा जरूरी समझते हैं? मुझे नहीं लगता कि किसी मार्क्सवादी ने इस सवाल पर विचार किया होगा। अगर किसी ने किया भी होगा, तो सिर्फ इस वजह से कि राजनीतिक मंच पर वह दलित विरोधी न समझ लिये जायें। क्या मार्क्सवादी यह जानने की कोशिश करेंगे कि उनसे कहाँ गलती हुयी है? यह गलती उनसे उसी दौर में हुयी, जब देश में आजादी की लड़ाई चल रही थी। तब उन्होंने उसी काँग्रेस का साथ दिया था, जो राजाओं-महाराजाओं, ब्राह्मणवादियों और पूँजीवादियों के साथ खड़ी थी। उस समय डॉ. आंबेडकर पूँजीवाद और ब्राह्मणवाद के खिलाफ समाजवादियों से अपीलें कर रहे थे कि वे काँग्रेस के विरुद्ध संयुक्त मोर्चा बनायें। पर, तब समाजवादी नेता जाति के सवाल पर डॉ. आंबेडकर के साथ खड़े होने के लिये बिल्कुल भी तैयार नहीं थे। वे सिर्फ वर्ग की ही बातें करते थे, जो वे आज भी करते हैं। जातियों में वर्ग हैं, इससे इन्कार नहीं है। पर, वर्ग में जातियां भी तो हैं । तब वे जाति व्यवस्था पर नजर क्यों नहीं डालते, जिसने एक बड़ी आबादी को सारे अधिकारों और मनुष्य होने की गरिमा तक से वंचित करके रखा हुआ था। क्या इस आबादी को समाज में अधिकार और मनुष्य की गरिमा दिलाने का डॉ. आंबेडकर का आन्दोलन गलत था? क्या यह दलितों की स्वतन्त्रता और मुक्ति की लड़ाई नहीं थी? आज जिस पूँजीवादी समाज में हम सब रहते हैं, उसमें यदि दलित पढ़ लिख गए हैं, शासन-प्रशासन में आ गये हैं, साहित्यकार और कलाकार हो गये हैं, उनमें एक मध्य वर्ग विकसित होने लगा है और कुछ उद्योगपति भी बनने लगे हैं, तो निस्सन्देह यह सब अस्मिता और भागीदारी की राजनीति के कारण हुआ है और यह भी सच है कि यह सब आरक्षण के कारण हुआ है, भले ही इससे पूँजीवाद मजबूत होता हो। लेकिन विचार का बिन्दु यहाँ यह है कि वंचित जातियाँ यह कैसे बरदाश्त कर लें कि उनको छोड़ कर बाकी सब लोग पढ़ें-लिखें, तरक्की करें, अफसर बनें, जज बनें, सारी सुविधाओं के साथ कोठियों में रहें और वे जिन्दगी भर अनपढ़, गरीब, फटेहाल मजदूर बने रहें और झुग्गी.झोंपड़ियों और फुटपाथों पर ही जिन्दगी गुजारते रहें। अगर अस्मिता की राजनीति ने उन्हें भी कुछ तरक्की करने का रास्ता दिखाया है, तो वे कम्युनिस्ट आन्दोलन से क्यों जुड़ेंगे, जो आज भी उनकी अस्मिता को स्वीकार करने को तैयार नहीं है। हम जानते हैं कि वर्गीय दृष्टि से यह सही नहीं है, परन्तु दलितों में वर्गों का निर्माण होने में अभी समय लगेगा, वंचित जातियों में वर्ग-निर्माण की प्रक्रिया बहुत धीमी होती है, जब वर्ग पूरी तरह बन जायेंगे, तब समाजवाद की चेतना भी दलितों में विकसित होनी ही है। पूँजीवाद का विकास ही वर्ग निर्माण की प्रक्रिया को जन्म देता है और जो दलितों में अवश्यम्भावी है।
दलित चिन्तन अक्सर इस बात को उठाता है कि स्वतन्त्रता-संग्राम के दौरान समाजवादी नेताओं ने डॉ. आंबेडकर के दलित-स्वतन्त्रता-आन्दोलन को समर्थन नहीं दिया। यह समझ में नहीं आने वाली पहेली है कि वह उनकी नजरों में समाजवादी आन्दोलन क्यों नहीं था? आज मार्क्सवादियों को इस सवाल पर आत्मचिन्तन और मन्थन करने की आवश्यकता है कि क्यों उनके नेतृत्व ने साम्राज्यवाद का विरोध तो किया, पर ब्राह्मणवाद का विरोध नहीं किया? क्यों उनके नेतृत्व ने दलित-मुक्ति के सवाल को अपने कार्यक्रम में शामिल नहीं किया? और क्यों उन्होंने सामाजिक क्रान्ति के बिना राजनीतिक क्रान्ति को महत्व दिया? संगोष्ठी के आधार आलेख में इस सत्य को स्वीकार किया गया है कि भारत में कम्युनिस्ट पार्टी का नेतृत्व जन्म से ही, ढीला-ढाला था। वह यह भी स्वीकार करता है कि ‘जिस कम्युनिस्ट पार्टी के पास 1951 तक भारतीय क्रान्ति का कोई कार्यक्रम ही नहीं था, उससे सिर्फ जाति प्रश्न पर सुस्पष्ट दिशा की अपेक्षा भला कैसे की जा सकती थी? इससे साफ पता चलता है कि डॉ. आंबेडकर के दलित-नेतृत्व के महत्वपूर्ण दौर में कम्युनिस्ट पार्टी इस योग्य ही नहीं थी कि अपने उत्तरदायित्व को समझती। जब भारत के दलितों ने 1928 में साइमन कमीशन का स्वागत किया था और 1932 में डॉ. आंबेडकर ने गाँधी के साथ दलितों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व के सवाल पर पूना में समझौता किया था, तब भारत की कम्युनिस्ट पार्टी की कोई भूमिका दलितों के सन्दर्भ में नहीं थी। अब सवाल यह पैदा होता है कि तब कम्युनिस्ट पार्टी की भूमिका किस सन्दर्भ में थी? जाहिर है कि तब वह काँग्रेस के स्वतन्त्रता आन्दोलन में शामिल थी, जिसका नेतृत्व ब्राह्मणों और पूँजीपतियों के हाथों में था। उस काल में, जैसा कि श्रीपाद अमृत डांगे का कहना था, ‘कम्युनिस्ट पार्टी का तात्कालिक लक्ष्य ब्रिटिश साम्राज्य को उखाड़ फेंकना था।‘ पर, यहाँ आंबेडकर का सवाल यह था कि ब्रिटिश साम्राज्य को उखाड़ना तो ठीक है, पर समाजवादियों के लिये यह सवाल भी गौरतलब होना चाहिये कि ब्रिटिश साम्राज्य के जाने के बाद भारत की शासन-सत्ता किनके हाथों में आयेगी, क्या वह ब्राह्मणों, सामन्तों और पूँजीपतियों के हाथों में ही रहेगी या मजदूर वर्ग के हाथों में आयेगी ? समाजवादियों ने इस सवाल को हवा में उड़ा दिया। परिणाम वही हुआ, ब्रिटिश के जाने के बाद ब्राह्मणों, सामन्तों और पूँजीपतियों का ही साम्राज्य क़ायम हुआ। क्या आंबेडकर ने गलत सवाल उठाया था? उन्होंने सही सम्भावना व्यक्त की थी कि काँग्रेस का राष्ट्रीय आन्दोलन भारत में ब्राह्मण-राज ही कायम करेगा, जिसमें दलित-मजदूरों को कोई आजादी नहीं मिलने वाली है। इसे कोई कितना ही नकारने की कोशिश करे, पर सच्च यही है कि भारत में ब्राह्मणवादी और पूँजीवादी साम्राज्यवाद कायम करने में कम्युनिस्ट और समाजवादी ताकतें अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकतीं।
अब रहा यह सवाल कि वे उपनिवेशवाद-विरोधी संघर्ष से अलग क्यों रहे? हालांकि स्वयं डॉ. आंबेडकर ने इन सवालों पर काफी कुछ कहा है, जिसे मार्क्सवादी न पढ़ना चाहते हैं और न समझना। चालीस के दशक का राजनैतिक परिदृश्य गवाह है कि जब डॉ. आंबेडकर ने इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी बनायी थी, तो एम. एन. राय सहित सारे समाजवादी नेता उनके इसलिये विरोधी हो गये थे कि उन्होंने वर्ग-आधार पर काँग्रेस से बाहर कोई पार्टी क्यों बनायी? इन्हीं में उनके एक विरोधी अखिल भारतीय किसान सभा के अध्यक्ष स्वामी सहजानन्द भी थे, जिन्होंने यह कहते हुये सभी राजनीतिक पार्टियों को काँग्रेस में शामिल होने का आह्वान किया था कि काँग्रेस ही एकमात्र साम्राज्यवाद-विरोधी पार्टी है। इस पर डॉ. आंबेडकर ने स्वामी सहजानन्द को कहा था, ‘यदि काँग्रेस के मन्त्री साम्राज्यवाद के विरोध में मन्त्रिमण्डल से इस्तीफा दे देते हैं, तो वह यह लिख कर देने को तैयार हैं कि वह और उनकी पार्टी काँग्रेस में शामिल हो जायेंगे। ‘उनका कहना था, ‘हम सबसे ज्यादा भूखे, सबसे ज्यादा पददलित, सबसे ज्यादा गरीब और पीड़ित लोग हैं। हमारे साथ जितना अन्याय हुआ है, उतना किसी के साथ नहीं हुआ है। पर, हम उच्च वर्गों के साथ अपने सारे मतभेद इसी क्षण खत्म करने को तैयार हैं, हम अपनी वर्गीय माँगों को भी छोड़ देंगे और काँग्रेस में शामिल हो जायेंगे, अगर काँग्रेस साम्राज्यवाद से लड़ने का निश्चय करती है।‘ लेकिन उन्होंने कहा कि ‘यह सच्च  नहीं है कि काँग्रेस साम्राज्यवाद-विरोधी संगठन है। वह साम्राज्यवाद के विरुद्ध संघर्षरत नहीं है, बल्कि अपनी संवैधानिक मशीनरी का उपयोग पूँजीपतियों और अन्य निहित स्वार्थों के हितों के लिये कर रही है। वह मजदूरों और किसानों के हितों की बलि चढ़ाकर उनके शोषकों को ही पाल-पोस रही है।‘ यह पूरी रिपोर्ट 27 दिसम्बर 1938 के ‘दि टाइम्स ऑफ इण्डिया’ और दि बाम्बे क्रॉनिकल’ में देखी जा सकती है। यहाँ यह भी गौरतलब है कि जिन स्वामी सहजानन्द ने सभी पार्टियों को काँग्रेस में शामिल होने का आह्वान किया था, बाद में उन्हें ही काँग्रेस छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा था।
इसी सवाल पर फरवरी 1938 में डॉ. आंबेडकर ने दलित कामगार सभा में बहुत विस्तार से अपनी बात रखी थी। उन्होंने मजदूरों को काँग्रेस से स्वतन्त्र संगठन बनाने पर बल दिया था, जिसका विरोध कम्युनिस्टों का वह गुट भी कर रहा था, जिसके नेता एम. एन. राय थे। आंबेडकर ने आश्चर्य के साथ कहा कि ‘एक कम्युनिस्ट ! और वह भी स्वतन्त्र मजदूर संगठन का विरोधी! इतना भयानक विरोधभास! इसने कब्र में लेनिन को भी पागल कर दिया होगा।‘ उन्होंने सवाल किया कि ‘यदि राय जैसे कम्युनिस्टों की नजर में साम्राज्यवाद का विनाश ही मुख्य लक्ष्य है, तो क्या वे इस बात की गारन्टी दे सकते हैं कि साम्राज्यवाद के समाप्त होने के साथ ही पूँजीवाद के सम्पूर्ण अवशेष भी भारत से समाप्त हो जायेंगे? यदि नहीं, तो दलित मजदूरों को आज से ही क्यों नहीं संगठित होना चाहिये?’ डॉ. आंबेडकर के ये विचार क्या उन्हें साम्राज्यवादी साबित करते हैं? क्या वे समाजवादी और कम्युनिस्ट अपनी जगह सही थे, जो उस काँग्रेस के साथ थे, जिसका जन्म ही ब्रिटिश साम्राज्यवाद की रक्षा के लिये हुआ था?
आइये, इस सवाल पर विचार किया जाये कि डॉ. आंबेडकर स्वतन्त्रता-संग्राम से अलग क्यों रहे? इस सम्बन्ध में भी उन्होंने अपना पक्ष खुलकर स्पष्ट किया है, जिसे उनके विरोधी बिलकुल भी समझना नहीं चाहते। मार्क्सवादी और दूसरे समाजवादी भी इसका जो कारण मानते हैं, वह बिल्कुल गलत है। वे मानते हैं कि आंबेडकर वायसराय की काउन्सिल (मंत्री परिषद्) में शामिल थे, इसलिये उपनिवेशवाद के साथ थे। कौंसिल में और भी बहुत से ब्राह्मण और मुस्लिम शामिल थे, पर उन्हें कोई भी उपनिवेशवादी और अंग्रेज-भक्त नहीं कहता, जबकि वे आंबेडकर की तरह दलितों के हित के लिये नहीं, बल्कि सत्ता-सुख के लिये कौंसिल में शामिल हुये थे। चूँकि अंग्रेज देश के शासक थे, इसलिये दलित अपनी मुक्ति की अपील अंग्रेज से ही कर सकते थे, हिन्दुओं से तो नहीं, जिनके पास कुछ भी ताकत नहीं थी। हिन्दू-मुसलमान सभी अपने दुखों के लिये अंग्रेज से ही अपील करते थे। पर उन्हें देशद्रोही नहीं कहा जाता?  लेकिन कम्युनिस्टों ने आंबेडकर को देशद्रोही माना, क्योंकि उन्होंने साइमन कमीशन का बहिष्कार नहीं किया था, स्वागत किया था। उसे दलितों की दुर्दशा पर ज्ञापन दिया था। गोलमेज सम्मेलन, लन्दन में उन्होंने हिन्दू प्रतिनिधियों का साथ न देकर उनका विरोध करते हुये दलितों के लिये राजनैतिक अधिकारों की माँग की थी। हाँ, यह सब उन्होंने किया था और सही किया था, क्योंकि दलित-हित में यही जरूरी था। उनके इसी संघर्ष से दलितों की मुक्ति के दरवाजे खुले। कम्युनिस्ट और हिन्दूवादी कितना ही आंबेडकर की भूमिका पर सवाल खड़े करें, पर दलित चिन्तन में वे दलित-मुक्ति की लड़ाई के अप्रितम योद्धा थे, जिन्होंने अकेले ही दलितों को संगठित किया, संघर्षशील बनाया और राष्ट्रवादियों, हिन्दूवादियों और कम्युनिस्टों के विरोधों-अवरोधों से लगातार जूझते हुये उन्हें वे सारे हक दिलाये, जो इससे पहले उन्हें कभी नहीं मिले थे। उन्होंने दलित-मुक्ति के सवाल पर अपने व्याख्यान ‘जाति का उन्मूलन’ में पूछा है कि उन हिन्दुओं को आजादी की माँग करते का क्या हक है, जिन्होंने स्वयं करोड़ों लोगों को गुलाम बनाकर रखा हुआ है? जब आंबेडकर ने दलितों के राजनैतिक अधिकारों की माँग की थी, तब बम्बई में तिलक ने कहा था कि महार, मांग, तेली पार्लियामेंट में बैठ कर क्या करेंगे? ये वही तिलक थे, जिनका नारा “स्वतन्त्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है” प्रसिद्ध है। डॉ. आंबेडकर ने उन्हें कहा था कि अगर तिलक अछूत जाति में जन्मे होते, तो उनका नारा होता. ‘अस्पृश्यता मिटाना मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है।‘ ‘यदि स्वतन्त्रता हिन्दुओं का जन्मसिद्ध अधिकार है, तो यह अछूतों का भी जन्मसिद्ध अधिकार क्यों नहीं है, जिन्हें हिन्दुओं ने गुलाम बनाकर रखा है? आंबेडकर के सामने उपनिवेशवाद से भी बड़ा सवाल दलितों की स्वतन्त्रता का सवाल था। उनका कहना था कि यदि एक देश को दूसरे देश पर शासन करने का अधिकार नहीं है, जैसा कि उपनिवेशवाद के खिलाफ हिन्दू तर्क देते हैं, तो फिर एक वर्ग को दूसरे वर्ग पर भी शासन करने का अधिकार नहीं है। हिन्दू सिर्फ अपने लिये आजादी चाहते थे, दलितों को वे हिन्दू फोल्ड  में रख कर अपने अधीन शासित बनाकर ही रखना चाहते थे। कम्युनिस्ट पार्टी के पास क्रान्ति की ऐसी कोई रूपरेखा ही नहीं थी, जिससे यह पता चलता कि क्रान्ति के बाद उनकी समाजवादी या तानाशाही सरकार में दलितों की स्थिति और भूमिका क्या होगी? क्या उन्हें सिर्फ अच्छी मजदूरी और मुफ्त मकान मिलेगा या शासन-प्रशासन में भागीदारी भी मिलेगी?  चूँकि दलितों को हिन्दुओं पर बिल्कुल भी भरोसा नहीं था। उनका राज ब्राह्मणों और पूँजीपतियों का ही राज होता। ऐसे राजनैतिक घटाटोप में दलितों का भविष्य अंधकार में ही था, यदि उन्हें डॉ. आंबेडकर का क्रान्तिकारी नेतृत्व नहीं मिला होता। किन्तु यदि वे उपनिवेशवाद के साथ थे, तो उनके विरोधियों के लिये यह जानना जरूरी है कि यह उपनिवेशवाद ही था, जिसने दलितों के लिये उन दरवाजों और रास्तों को खोला था, जिन्हें ब्राह्मणवाद ने बन्द किया हुआ था। ब्राह्मणवाद ने उन्हें मानवीय अधिकारों से वंचित रखा हुआ था, पर यह उपनिवेशवाद ही था, जिसने उन्हें समान मानवाधिकार प्रदान किये थे। ब्राह्मणवाद ने उनको पशुवत स्थिति में रखा हुआ था, पर यह उपनिवेशवाद ही था, जिसने उन्हें मानवीय गौरव दिया था।
मार्क्सवादी जाति-मुक्ति का सवाल उठाते हैं, जबकि डॉ. आंबेडकर ने दलित-मुक्ति का सवाल उठाया था। जाति का उन्मूलन वही कर सकते हैं, जिन्होंने इसे बनाया है। यह दलितों की बनायी हुयी व्यवस्था नहीं है, इसलिये दलित इसे नष्ट नहीं कर सकते। चूँकि चण्डीगढ़ की संगोष्ठी जाति-मुक्ति के सवाल पर थी, दलित-मुक्ति के सवाल पर नहीं, इसलिये उन्होंने आंबेडकर को गरियाने में अपनी ऊर्जा व्यर्थ ही नष्ट की। जाति-मुक्ति का उनके पास न कोई समाधान है और न वे कोई समाधान दे पाये। जाति का उन्मूलन दलितों का विषय नहीं है, इसलिये यह दलित आन्दोलन का कार्यभार कभी नहीं रहा। अतः मार्क्सवादी चिन्तक डॉ. आंबेडकर और दलित आन्दोलन में जाति-मुक्ति का हल तलाशने की कवायद व्यर्थ ही करते हैं।
(१४-११-१४)


श्रमिक कल्याण में डॉ. अंबेडकर की ऐतिहासिक भूमिका

श्रमिक कल्याण में डॉ. अंबेडकर की ऐतिहासिक भूमिका एस.आर. दारापुरी , राष्ट्रीय अध्यक्ष , अखिल भारतीय पीपुल्स फ्रंट (आज 1 मई को अंतर्राष्...