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शनिवार, 25 अक्टूबर 2025

बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के पतन के लिए ज़िम्मेदार कारक

 

बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के पतन के लिए ज़िम्मेदार कारक

एस आर दारापुरी, राष्ट्रीय अध्यक्ष, आल इंडिया पीपुल्स फ्रन्ट)

बहुजन समाज पार्टी (BSP) की स्थापना कांशी राम ने 1984 में दलितों और हाशिये पर पड़े समुदायों को सशक्त बनाने के लिए की थी। 2007 में पार्टी ने उत्तर प्रदेश (UP) में एक बड़े "सर्वजन" गठबंधन के साथ पूर्ण बहुमत हासिल करके अपनी चरम सीमा हासिल की। ​​हालाँकि, 2012 से, पार्टी में भारी गिरावट आई है, जिसका सबूत 2007 में लगभग 30% से घटकर 2024 के लोकसभा चुनावों में 9.39% वोट शेयर (0 सीटें जीतीं) और 2022 के UP विधानसभा चुनावों में केवल 1 सीट मिलना है। यह गिरावट आंतरिक, रणनीतिक और बाहरी कारकों के मेल से हुई है। नीचे,  राजनीतिक कमेंट्री और अकादमिक जानकारियों के विश्लेषण के आधार पर मुख्य कारणों का उल्लेख किया जा रहा है।

मायावती के नेतृत्व में विफलताएँ और केंद्रीकरण

मायावती के लंबे समय तक प्रभुत्व के कारण एक अत्यधिक केंद्रीकृत, वंशवादी ढाँचा बन गया है जो इनोवेशन और जवाबदेही को रोकता है। पार्टी कांशी राम के जमीनी स्तर के आंदोलन से हटकर एक "सुप्रीमो-केंद्रित" इकाई बन गई, जिसमें अपने भतीजे आकाश आनंद को उत्तराधिकारी नियुक्त करने जैसे फैसलों से कार्यकर्ता नाराज़ हो गए। भूमि माफियाओं से संबंध और व्यक्तिगत संपत्ति जमा करने सहित भ्रष्टाचार के आरोपों ने उनकी छवि खराब की, जबकि उनके सीमित चुनाव प्रचार (अक्सर केंद्रीय एजेंसियों की जाँच के डर के कारण) ने उनकी दृश्यता कम कर दी। चुनाव के बाद, उन्होंने आंतरिक सुधारों के बजाय EVM और मुस्लिम अविश्वास जैसे बाहरी कारकों को दोषी ठहराया, जिससे विश्वसनीयता कम हुई।

मुख्य दलित मतदाता आधार का क्षरण

बसपा का पारंपरिक जाटव दलित समर्थन (UP की आबादी का लगभग 10%) खंडित हो गया है, यहाँ तक कि वफादार मतदाता भी BSP, BJP और SP-कांग्रेस गठबंधन के बीच बँट गए हैं। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि गैर-जाटव दलित (UP की 21% SC आबादी का बहुमत) 2014 से बड़े पैमाने पर BJP की ओर चले गए, जो उसके "सबअल्टर्न हिंदुत्व" और उज्ज्वला और PM आवास योजना जैसी कल्याणकारी योजनाओं से आकर्षित हुए। 2022 के बाद के सर्वेक्षणों से पता चला कि आधे से भी कम दलितों ने BSP को वोट दिया, जिसमें एक चौथाई जाटव और आधे गैर-जाटव BJP की ओर चले गए। यह एक ऊपर उठते हुए दलित मध्यम वर्ग की आकांक्षाओं को पूरा करने में पार्टी की विफलता को दर्शाता है।

बड़े गठबंधन और अल्पसंख्यक/ओबीसी समर्थन का नुकसान

2007 की "सर्वजन" रणनीति ने कुछ समय के लिए दलितों, ब्राह्मणों, मुसलमानों और ओबीसी को एकजुट किया, लेकिन दलित कार्यकर्ताओं के विरोध के कारण मुख्य वोटरों तक सीमित रहना पड़ा, जिससे सहयोगी दूर हो गए। ब्राह्मण बीजेपी में चले गए, मुसलमान एसपी में, और कुर्मी, कोइरी और राजभर जैसे ओबीसी समूह भी बीएसपी की समावेशी संदेश को बनाए रखने में असमर्थता के कारण ऐसा ही करने लगे। 2024 में, अल्पसंख्यकों और ओबीसी ने बड़े पैमाने पर एसपी-कांग्रेस INDIA ब्लॉक का समर्थन किया, जिससे बीएसपी एक "स्पॉइलर" बनकर रह गई जिसने बीजेपी विरोधी वोटों को बांटकर परोक्ष रूप से बीजेपी की मदद की।

संगठनात्मक गिरावट और नेतृत्व का पलायन

पार्टी को कुंवर दानिश अली और रितेश पांडे जैसे सांसदों और विधायकों सहित कई दिग्गजों के बड़े पैमाने पर पलायन का सामना करना पड़ा है, जो "बेहतर अवसरों" के लिए बीजेपी या एसपी में चले गए हैं। जमीनी स्तर के कार्यकर्ता कमजोर हो गए हैं, चुनावों के दौरान मुख्य दलित क्षेत्रों में कोई बैनर या रैलियां दिखाई नहीं देतीं, जो अरुचि का संकेत है। यह लेन-देन वाली राजनीति से उपजा है - बिना किसी वैचारिक जांच के फंड/टिकट के लिए दलबदलुओं का स्वागत करना - जिसने बीएसपी को एक स्थायी आंदोलन के बजाय एक "चुनाव मशीन" में बदल दिया है।

वैचारिक कठोरता और राजनीतिक बदलावों के अनुकूल ढलने में विफलता

बीएसपी की बीजेपी की हल्की आलोचना, संवैधानिक क्षरण जैसे मुद्दों पर चुप्पी, और विपक्षी अभियानों (जैसे, "संविधान बचाओ") से दूरी ने प्रतिद्वंद्वियों को दलितों की चिंताओं को भुनाने का मौका दिया। इसने 2007-2012 के शासन के दौरान पुनर्वितरण जैसे सामाजिक-आर्थिक सुधारों की उपेक्षा की, शासन के बजाय प्रतीकात्मकता (जैसे, अंबेडकर की मूर्तियां) पर ध्यान केंद्रित किया। बीजेपी-एसपी के प्रभुत्व वाली यूपी की द्विध्रुवीय राजनीति में, प्रभावी गठबंधन बनाने से बीएसपी के इनकार (दलित हितों के अधीन होने के डर से) ने इसे और अलग-थलग कर दिया।

व्यापक बाहरी दबाव: बीजेपी का प्रभुत्व और ध्रुवीकरण

बीजेपी की संगठनात्मक ताकत, कल्याणकारी लोकलुभावनवाद और हिंदू राष्ट्रवादी अपील ने दलित-बहुजन एकता को खंडित कर दिया है, जिससे गैर-जाटव एससी और ओबीसी उसके पाले में आ गए हैं। राम मंदिर उद्घाटन जैसे कार्यक्रमों ने इसे और बढ़ा दिया, जबकि बीएसपी की नरम रणनीति इसका मुकाबला करने में विफल रही। इसके अलावा, नई दलित आवाजों (जैसे, भीम आर्मी के चंद्रशेखर आज़ाद) के उदय ने दलित लामबंदी पर बीएसपी के एकाधिकार को कम कर दिया है।

हालांकि ये फैक्टर् BSP की भारी गिरावट को समझाते हैं, लेकिन कुछ एनालिस्ट्स का कहना है कि यह "परमानेंट" नहीं है। पार्टी का लगातार ~10% वोट शेयर एक मज़बूत कोर दिखाता है, और पिछली रिकवरी (जैसे 1990 के दशक के बाद की गिरावट) से पता चलता है कि अगर मायावती दूसरी लाइन की लीडरशिप को बढ़ावा देती हैं और जाति जनगणना की मांगों के हिसाब से खुद को ढालती हैं तो पार्टी फिर से मज़बूत हो सकती है। हालांकि, बिना आत्मनिरीक्षण के, UP के बदलते माहौल में पार्टी का महत्व खत्म होने का खतरा है।

साभार: गरोक.काम  

शनिवार, 21 मई 2022

बहुजन राजनीति को चाहिए एक नया रेडिकल विकल्प

 

बहुजन राजनीति को चाहिए एक नया रेडिकल विकल्प

   - एस आर दारापुरी, राष्ट्रीय अध्यक्ष, आल इंडिया पीपुल्स फ्रन्ट

डा. अंबेडकर दलित राजनीति के जनक माने जाते हैं। उन्होंने ने ही गोलमेज कांफ्रेंसों में दलितों को राजनीतिक अधिकार दिए जाने की मांग उठाई थी तथा गांधी जी के कड़े विरोध के बावजूद दलितों को हिंदुओं से अलग अल्पसंख्यक वर्ग का दर्जा तथा राजनीतिक अधिकार प्राप्त किए जिनकी घोषणा कम्यूनल अवार्ड के रूप में हुई। इसमें दलितों को दूसरे अल्पसंख्यकों जैसे सिख तथा मुसलमानों की तरह अपने प्रतिनिधि स्वयं चुनने के लिए अलग मताधिकार का अधिकार प्राप्त हुआ। गांधी जी ने इसे हिन्दू समाज के विभाजन की साजिश बता कर इसका आमरण अनशन द्वारा विरोध किया तथा आखिर में गांधी जी की जान बचाने के लिए उन्हें पूना पैकट करना पड़ा। इससे दलितों को अलग मताधिकार के स्थान पर संयुक्त मताधिकार द्वारा विधायिका में आरक्षित सीटें, सरकारी नौकरियों तथा स्थानीय निकायों में आरक्षण तथा शिक्षा के लिए विशेष प्रोत्साहन की सुविधा प्राप्त हुई परंतु दलितों का स्वतंत्र राजनीति का अधिकार छिन्न गया।  

डा. अंबेडकर ने इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी (स्वतंत्र मजदूर पार्टी) बना कर 1937 के प्रथम चुनाव में बंबई प्रेसीडेंसी में भाग लिया। इस चुनाव में उनका मुख्य जोर मजदूर वर्ग के मुद्दों पर था। इसमें उन्होंने 15 सीटें जीतीं जिनमें 3 सामान्य सीटें भी थीं। इसके बाद उन्होंने 1942 में आल इंडिया शैडयूलड कास्ट्स फेडरेशन बनाई जिसकी सदस्यता केवल दलितों तक सीमित थी। इससे उन्होंने 1946 तथा 1952 में चुनाव लड़े परंतु उन्हें कोई खास सफलता नहीं मिली। अंत में उन्होंने 14 अक्तूबर, 1956 को फेडरेशन को भंग करके रिपब्लिकन पार्टी आफ इंडिया (आरपीआई) की स्थापना की। इसका संविधान भी उन्होंने ही बनाया।

अब यह देखने की बात है कि इन पार्टियों को बनाने के पीछे बाबासाहेब का मुख्य नजरिया क्या था। आइए सब से पहले बाबा साहेब की स्वतंत्र मजदूर पार्टी को देखें। डॉ. आंबेडकर ने अपने ब्यान में पार्टी के बनाने के कारणों और उसके काम के बारे में स्पष्टीकरण देते हुए कहा था- “इस बात को ध्यान में रखते हुए कि आज पार्टियों को सम्प्रदाय के आधार पर संगठित करने का समय नहीं है, मैंने अपने मित्रों की इच्छायों से सहमति रखते हुए पार्टी का नाम तथा इस के प्रोग्राम को विशाल बना दिया है ताकि अन्य वर्ग के लोगों के साथ राजनीतिक सहयोग संभव हो सके। पार्टी का मुख्य केंद्रबिंदु तो दलित जातियों के 15 सदस्य ही रहेंगे परन्तु अन्य वर्ग के लोग भी पार्टी में शामिल हो सकेंगे।” इस पार्टी की राजनीति जातिवादी न होकर वर्ग और मुद्दा आधारित थी और इस के केंद्र में मुख्यतया दलित थे।

बाबा साहेब द्वारा 1942 में स्थापित आल इंडिया शैडयूल्ड कास्टस फेडरेशन के उद्देश्य और एजंडा को देखा जाये तो पाया जाता है कि डॉ. आंबेडकर ने इसे सत्ताधारी कांग्रेस और सोशलिस्ट पार्टियों के बीच संतुलन बनाने के लिए तीसरी पार्टी के रूप में स्थापित करने की बात कही थी। इसकी सदस्यता केवल दलित वर्गों तक सीमित थी क्योंकि उस समय दलित वर्ग के हितों को प्रोजेक्ट करने के लिए ऐसा करना जरूरी था।

बाबासाहेब ने 14 अक्तूबर, 1956 को आरपीआई बनाई जिसका मुख्य उद्देश्य एक ऐसी पार्टी बनाना था जो संविधान में किये गए वादों के अनुसार हो और उन्हें पूरा करना उस का उद्देश्य हो। वे इसे केवल अछूतों की पार्टी नहीं बनाना चाहते थे क्योंकि एक जाति या वर्ग के नाम पर बनायी गयी पार्टी सत्ता प्राप्त नहीं कर सकती। वह केवल दबाव डालने वाला ग्रुप ही बन सकती है। आरपीआई की स्थापना के पीछे मुख्य ध्येय थे: (1) समाज व्यवस्था से विषमतायें हटाई जाएँ ताकि कोई विशेषाधिकार प्राप्त तथा वंचित वर्ग न रहे, (2) दो पार्टी सिस्टम हो: एक सत्ता में दूसरा विरोधी पक्ष, (3) कानून के सामने समानता और सब के लिए एक जैसा कानून हो, (4) समाज में नैतिक मूल्यों की स्थापना, (5) अल्पसंख्यक लोगों के साथ सामान व्यवहार, (6) मानवता की भावना जिसका भारतीय समाज में अभाव रहा है।  

“पार्टी के संविधान की प्रस्तावना में पार्टी का मुख्य लक्ष्य व उद्देश्य “न्याय, स्वतंत्रता, समता व बंधुता” को प्राप्त करना था। पार्टी का कार्यक्रम बहुत व्यापक था। पार्टी की स्थापना के पीछे बाबा साहेब का उद्देश्य था कि अल्पसंख्यक लोग, गरीब मुस्लिम, गरीब ईसाई, गरीब तथा निचली जाति के सिक्ख तथा कमज़ोर वर्ग के अछूत, पिछड़ी जातियों के लोग, आदिम जातियों के लोग, शोषण का अंत, न्याय और प्रगति चाहने वाले सभी लोग एक झंडे के तल्ले संगठित हो सकें और पूंजीपतियों के मुकाबले में खड़े होकर संविधान तथा अपने अधिकारों की रक्षा कर सकें।“ -  (दलित राजनीति और संगठन - भगवान दास)

उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि बाबासाहेब द्वारा स्थापित राजनीतिक पार्टियों का उद्देश्य एक बहुवर्गीय पार्टी बनाना था जिसमें दलित, पिछड़े, मुसलमान, मजदूर तथा किसान शामिल हो सकते थे। पार्टी का एजंडा भी इन वर्गों के मुद्दों को लेकर ही बना था। उनकी पार्टियों का एजंडा जातिवादी बिल्कुल नहीं था।

अब अगर वर्तमान दलित राजनीति को देखा जाए तो इसमें बहुजन के नाम पर राजनीति सामने आती है। इसके मुख्य जनक कांशी राम कहे जाते हैं। कांशी रामजी की बहुजन की अवधारणा दलित, मुस्लिम तथा अन्य पिछड़ी जातियों के गठबंधन से थी जिन्हें वे भारत की कुल आबादी का 85% मानते थे तथा शेष 15% सवर्ण। अतः उनकी बहुजन राजनीति 15 बनाम 85 के नाम से भी जानी जाती है। उनका मुख्य एजंडा 15% सवर्णों से राजनीतिक सत्ता छीनना था। सुनने में यह फार्मूला बहुत अच्छा लगता है परंतु व्यवहार में यह ऐसा नहीं है। कांशी राम जी की बहुजन राजनीति में नेतृत्व दलितों, पिछड़ों तथा मुसलमानों के संभ्रांत लोगों के हाथ में ही था। वे ही पहुँच/पैसे के बल पर टिकट पाते थे और जीत कर मंत्री, विधायक तथा सांसद बनते थे। सरकार बनने पर वे ही उसका सबसे अधिक फायदा उठाते थे। आम दलित, ओबीसी तथा मुसलमान वोटर मात्र थे जो सरकार बनने पर अपनी समस्याओं के हल होने की अपेक्षा में जोरशोर से वोट देते थे। परंतु चार वार बसपा की सरकार बनने पर भी उनकी भौतिक स्थितियों में कोई सुधार नहीं हुआ।  

बहुजन राजनीति का मुख्य उद्देश्य या तो राजनीतिक सत्ता को हथियाना या उसमें हिस्सेदारी करना था। उसकी नीतियाँ या एजंडा वर्तमान शोषक वर्ग की राजनीति की नीतियों या एजंडे को बदलना नहीं था। यद्यपि कांशी राम जी ने व्यवस्था परिवर्तन का नारा तो दिया था परंतु सत्ता में आने पर इसके लिए कुछ किया नहीं। वास्तव में उनकी अपनी कोई वैकल्पिक नीतियाँ या एजंडा नहीं था जिससे आम आदमी (दलित, पिछड़ा या अल्पसंख्यक या अन्य) का उत्थान हो। बहुजन राजनीति की धुरी दलित वर्ग का सरकारी नौकरियों में आया तबका था जिसका सबसे बड़ा मुद्दा आरक्षण था। अतः बहुजन राजनीति का मुख्य एजंडा भी आरक्षण, पदोन्नति तथा अच्छी पोस्टिंग आदि ही रहा। उसके एजंडे में आम दलित के लिए भूमि आवंटन, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य एवं उत्पीड़न से मुक्ति नहीं रहा। मायावती के चार वार मुख्यमंत्री बनने से उसका भावनात्मक तुष्टीकरण तो हुआ और उत्पीड़न में भी कुछ कमी जरूर आई परंतु उसकी हालत में कोई बड़ा परिवर्तन नहीं आया। वास्तव में बहुजन राजनीति में हिन्दुत्व तथा कार्पोरेटपरस्त राजनीति से लड़ने की कोई क्षमता ही नहीं थी तथा इसका पतन होना लाजमी  था।  

कांशी राम जी की बहुजन राजनीति के मुकाबले में यदि डा. अंबेडकर की राजनीति को देखा जाए तो उसके केंद्र में गरीब दलित, गरीब पिछड़ा, गरीब मुसलमान, मजदूर तथा गरीब किसान थे। बाबासाहेब ने अपने आगरा के भाषण में दलितों की भूमिहीनता पर गहरी चिंता जिताई  थी तथा उनको जमीन दिलाने के लिए संघर्ष करने की बात कही थी। उनका उद्देश्य इन लोगों को एक पार्टी के झंडे के तले एकत्र करके पूंजीपतियों तथा ब्राह्मणवाद के विरुद्ध खड़ा करके अपने संवैधानिक अधिकारों के लिए लड़ना था। कांशी राम जी का मुख्य ध्येय किसी भी तरह से सत्ता प्राप्त करना था जिसके लिए उन्होंने घोर दलित विरोधी भाजपा से तीन वार समर्थन भी लिया जिससे बहुजन राजनीति दिशा भ्रमित हो कर पतन की ओर अग्रसर हो गई।

बाबासाहेब ने रिपब्लिकन पार्टी आफ इंडिया को एक बड़े प्लेटफार्म के तौर पर बनाया था जिसमें दलितों के इलावा दूसरे वर्गों के लोग भी शामिल हो सकते थे। इसके माध्यम से बाबासाहेब एक वैकल्पिक राजनीति खड़ी कर रहे थे जिसके केंद्र में आम आदमी था। पार्टी का मुख्य उद्देश्य एक ऐसी पार्टी बनाना था जो संविधान में किये गए वादों के अनुसार हो और उन्हें पूरा करना उस का उद्देश्य हो. शुरू में जब पार्टी ने इन उद्देश्यों और एजंडे को लेकर काम किया तो उसे 1962 और 1967 के चुनावों में बहुत अच्छी सफलता भी मिली। 1964-65 में इसने बहुत बड़ा भूमि आंदोलन भी किया जिससे दलितों को भूमि आवंटन हुआ। बाद में यह पार्टी कुछ नेताओं के व्यक्तिगत स्वार्थ के कारण विभाजित हो गई जिसके पीछे कांग्रेस का बड़ा हाथ था। कांग्रेस ने पद का लालच देकर इसके नेताओं को तोड़ लिया और अब यह कई टुकड़ों में बटी हुई है और बेअसर है। आजकल दलित पार्टियों के नेता भी व्यक्तिगत लाभ के लिए इसी तरह पार्टियां बदलते रहते हैं।

वर्तमान में बहुजन राजनीति की मुख्य प्रतिनिधि बहुजन समाज पार्टी मानी जाती है। इसके इलावा महाराष्ट्र में रामदास आठवले की आरपीआई (ए) तथा बिहार में रामविलास पासवान वाली लोक जनशक्ति पार्टी है जिसका भाजपा के साथ गठजोड़ है। इन सभी पार्टियों का एजंडा सत्ता प्राप्त करना या सत्ता में हिस्सेदारी करना मात्र है। इनका सत्ताधारी पार्टी भाजपा या कांग्रेस से भिन्न कोई  नीति  या एजंडा नहीं है। इसी लिए वे भाजपा की हिन्दुत्व तथा कारपोरेटपरस्त राजनीति का मुकाबला नहीं कर सकते। इन पार्टियों में लोकतंत्र की जगह अधिनायकवाद है और नेतृत्व एक व्यक्ति के हाथ में है। इसमें आम आदमी का कोई दखल नहीं है। इसी लिए इनके नेता व्यक्तिगत लाभ के लिए किसी से भी गठजोड़ कर लेते हैं जिससे आम आदमी को कोई लाभ नहीं होता। डा. अंबेडकर ने कहा था कि राजनीतिक सत्ता सब समस्याओं की चाबी है। उन्होंने आगे कहा था कि राजनीतिक सत्ता का इस्तेमाल समाज के विकास के लिए किया जाना चाहिए परंतु बहुजन राजनीति के नेताओं का आचरण इसके बिल्कुल विपरीत है।

अतः उपरोक्त परिस्थितियों को देखते हुए वर्तमान बहुजन राजनीति के स्थान पर दलितों, पिछड़ों एवं अल्पसंख्यकों की नई राजनीति विकसित करने की जरूरत है जिसकी नीतियाँ  एवं एजंडा भाजपा की हिन्दुत्व एवं कारपोरेटपरस्त राजनीति एवं वैश्विक पूंजी के हमले के विरोध में हो। इसके लिए वैकल्पिक नीतियाँ जैसे रोजगार को मौलिक अधिकार बनाना, शिक्षा को सर्वसुलभ बनाना, स्वास्थ्य सेवाएं बेहतर बनाना, निजीकरण पर रोक, कृषि को लाभकारी बनाना, भूमिहीनों को भूमि आवंटन, कारपोरेट के एकाधिकार को खत्म करना, लोकतंत्र की बहाली, काले कानूनों का खात्मा तथा धर्म निरपेक्षता आदि की जरूरत है। इसके साथ ही समाज के जनतन्त्रीकरण जिसमें जाति का विनाश प्रमुख है, को भी लागू करने की जरूरत है। जाति की वर्तमान राजनीति हिन्दुत्व की ही पोशाक है। अतः इसके स्थान पर जनमुद्दों की राजनीति अपनाई जानी चाहिए।

बहुजन राजनीति की इसी आवश्यकता को सामने रख कर हम लोगों ने 2013 में आल इंडिया पीपुल्स फ्रन्ट का गठन किया था। इस पार्टी के नेतृत्व में दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यकों, अति पिछड़ों एवं महिलायों को प्रमुखता दी गई है। इसका मुख्य ध्येय संत रविदास की बेगमपुरा की अवधारणा को मूर्तरूप देना है। यह पार्टी धर्म निरपेक्षता एवं लोकतंत्र की पक्षधर है। हमारा प्रयास एक बहुवर्गीय पार्टी बनाने का है ताकि इसमें विभिन्न विचारधारा के बुद्धिजीवी, सामाजिक कार्यकर्ता एवं पार्टियां शामिल हो सकें और वर्तमान में भाजपा/ आरएसएस के हिन्दुत्व एवं कारपोरेट के सहयोग से वित्तीय पूंजी के अधिनायकवाद को रोका जा सके। यह स्मरण रहे कि वैकल्पिक नीतियों एवं एजंडा के अभाव में वर्तमान बहुजन राजनीति इसमें बुरी तरह से विफल रही है। अतः अब बहुजन राजनीति को एक नए रेडिकल विकल्प की जरूरत है।  

आइए हम लोग मिल कर ईमानदारी से एक बहुवर्गीय राजनीति को खड़ा करें जो भाजपा की  हिन्दुत्व एवं कार्पोरेटपरस्त राजनीति एवं वैश्विक पूंजी के हमले का सामना कर सके और डा. अंबेडकर के जातिविहीन एवं वर्गविहीन समाज की स्थापना के सपने को साकार कर सके।

डॉ. आंबेडकर के बौद्ध धर्मांतरण आंदोलन का दलितों पर प्रभाव

  डॉ. आंबेडकर के बौद्ध धर्मांतरण आंदोलन का दलितों पर प्रभाव एस आर दारापुरी आई.पी.एस.(सेवानिवृत) (14 अक्तूबर दीक्षा दिवस पर विशेष)   ...