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शुक्रवार, 17 नवंबर 2023

मोदी सरकार का ‘जनजातीय गौरव दिवस’ मनाने का सच

मोदी सरकार का ‘जनजातीय गौरव दिवस’ मनाने का सच

-    एस आर दारापुरी, राष्ट्रीय अध्यक्ष आल इंडिया पीपुल्स फ्रन्ट

आज मोदी सरकार ‘विरसा मुंडा जयंती’ के बहाने पूरे देश में ‘जनजातीय गौरव दिवस’ मना रही है।  एक समाचार पत्र में केन्द्रीय जनजातीय कार्य मंत्री अर्जुन मुंडा के छपे लेख के अनुसार यह प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी का आदिवासी समाज और उसकी संस्कृति के प्रति सम्मान और अटूट प्रेम ही है कि उन्होंने भगवान विरसा मुंडा की जयंती को ‘जनजातीय गौरव दिवस’ के नाम से मनाने की घोषणा करके आदिवासी समाज का पूरे देश में मान बढ़ाया है। आज यह तीसरा वर्ष है जब हमारा देश पूरे आदर, सम्मान व उत्साह के साथ ‘जनजातीय गौरव दिवस’ मना रहा है। लेख में आगे लिखा गया है कि ‘जनजातीय गौरव दिवस’ हाशिये पर मौजूद इन समूहों के कल्याण और सशक्तिकरण के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता का प्रमाण है। विभिन्न नीतियों, कार्यक्रमों एवं कानूनों के माध्यम से केन्द्रीय सरकार का लक्ष्य आदिवासी समाज का उत्थान करना और ऐतिहासिक अन्याय को दूर करना है। लेख में वन अधिकार अधिनियम, पेसा और अन्य कानूनों द्वारा आदिवासी समुदाय के अधिकारों को और मजबूत करने की बात भी कही गई है।

आइए देखें कि मोदी सरकार के आदिवासी लोगों के संबंध में उपरोक्त किए गए दावों का सच क्या है? खास करके जब मोदी सरकार ने आदिवासियों को प्रभावित करने के लिए एक आदिवासी महिला श्रीमती द्रौपदी मुर्मू को भारत का राष्ट्रपति भी बनाया है। इसे निम्नलिखित संक्षिप्त विवेचन से देखा जा सकता है:-

1.   आदिवासियों में भूमिहीनता, नौकरी एवं गरीबी :

2011 की जनगणना के अनुसार देश में 35.65% आदिवासी भूमिहीन हैं तथा इनमें से केवल 8% लोग ही सरकारी तथा निजी क्षेत्र में नौकरी में हैं। आदिवासियों में 44.7% परिवार गरीबी की रेखा के नीचे हैं जिनकी मासिक आय मात्र 816 रु है। आदिवासी परिवारों का 79% हिस्सा अति वंचित श्रेणी में आता है। इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि देश में आदिवासी समाज कितना भूमिहीन, बेरोजगार और गरीबी का शिकार है। यह भी उल्लेखनीय है कि केंद्र में 2014 से मोदी सरकार के आने के बाद भी आदिवासियों की हालत में कोई सुधार नहीं आया है क्योंकि इस सरकार द्वारा आदिवासियों के कल्याण तथा सशक्तिकरण हेतु कोई भी ठोस प्रयास नहीं किए गए हैं। बल्कि इसके विपरीत उनका भूमि से वंचितीकरण ही किया गया है।  

2.   आदिवासियों को भूमि का अधिकार देने हेतु बने वनाधिकार कानून को विफल करना:

 2006 में तत्कालीन यूपीए सरकार ने आदिवासियों को भूमि का अधिकार देने हेतु वनाधिकार कानून बनाया था जो 2008 में लागू हुआ था। इस कानून का मुख्य ध्येय आदिवासियों तथा वनवासियों को अपने कब्जे की जमीन के स्वामित्व का अधिकार देना था ताकि वे एक जगह पर स्थायी तौर पर रह सकें तथा इस कानून के अंतर्गत मिली जमीन पर खेती करके अपना जीवन यापन कर सकें। दुर्भाग्यवश सरकारी मशीनरी की आदिवासी एवं दलित विरोधी मानसिकता के कारण इस कानून को ईमानदारी से लागू नहीं किया गया जिस कारण आदिवासियों/वनवासियों को जमीन का मालिकाना अधिकार नहीं मिल सका। राज्य सरकारों ने इस में वांछित स्तर की इच्छा शक्ति एवं दिलचस्पी नहीं दिखाई। परिणामस्वरूप पूरे देश में केवल त्रिपुरा, केरल तथा ओडिसा ही तीन राज्य थे जहां आदिवासियों को इस कानून के अंतर्गत भूमि आवंटन किया गया। इसका श्रेय त्रिपुरा तथा केरल की कम्युनिस्ट सरकार तथा ओडिसा में आदिवासी संगठनों तथा पटनायक सरकार की सक्रियता को जाता है।

2014 में केंद्र में बनी मोदी सरकार ने वनाधिकार कानून को कड़ाई से लागू करने की बजाए उसे विफल करने का ही काम किया है क्योंकि यह तो आदिवासी क्षेत्र की जमीन को खनन  हेतु कार्पोरेट्स को देने के लिए कटिबद्ध है। यही कारण है कि  2019 में जब वाइल्ड लाइफ ट्रस्ट संस्था द्वारा सुप्रीम कोर्ट में जंगल की जमीन पर अवैध कब्जे हटाने तथा उसे खाली कराकर वन विभाग को देने की जनहित याचिका की सुनवाई शुरू हुई तो मोदी सरकार की तरफ से आदिवासियों का पक्ष रखने हेतु कोई भी सरकार वकील पेश नहीं हुआ। इस याचिका में यह भी कहा गया था कि जंगल की जमीन पर अवैध कब्जों के इलावा वनाधिकार कानून के अन्तर्गत रद्द हो चुके दावों की जमीन को भी खाली कराया जाना चाहिए क्योंकि कानून की नजर में वह भी अवैध कब्जे ही हैं। इस का परिणाम यह हुआ कि सुप्रीम कोर्ट ने एक तरफा  आदेश पारित कर दिया जिसमें सभी राज्यों को आदेशित किया गया कि वे 24 जुलाई, 2019 तक वनाधिकार कानून के अंतर्गत रद्द हो चुके सभी दावों वाली जमीन को खाली कराकर वन विभाग को सौंपने की अनुपालन आख्या प्रेषित करें। सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश से पूरे देश में प्रभावित होने वाले आदिवासी परिवारों की संख्या लगभग 20 लाख है जिनमें उत्तर प्रदेश के भी 74,700 परिवार हैं। सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के विरुद्ध हमारी पार्टी आल इंडिया पीपुल्स फ्रन्ट ने कुछ अन्य संगठनों के साथ मिल कर सुप्रीम कोर्ट के उक्त आदेश के विरुद्ध अपील दायर की जिसमें हम लोगों ने सुप्रीम कोर्ट से वनाधिकार के रद्द हुए दावों वाली जमीन से बेदखली के आदेश पर रोक लगाने तथा सभी राज्यों को सभी दावों का पुनर्परीक्षण करने का अनुरोध किया जिसे सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार कर लिया। वर्तमान में उसी आदेश के कारण  आदिवासियों तथा वनवासियों की बेदखली रुकी हुई है। यह अत्यंत खेदजनक है भाजपा शासित राज्यों में इन  दावों के पुनर्परीक्षण का कार्य अत्यंत धीमी गति से चल रहा है जो मोदी सरकार के आदिवासी प्रेम के दावों की पोल खोलता है।

3.    वन (संरक्षण) संशोधन अधिनियम् -2023 द्वारा आदिवासियों के वनाधिकारों का हनन:

 इस संशोधन द्वारा कई प्रकार की भूमि को वन संरक्षण कानून 1980 के दायरे से बाहर कर दिया गया है। इससे वन भूमि में चिड़िया घर, मनोरंजन स्थल  तथा सफारी बनाना संभव हो जाएगा। इसी प्रकार चीन तथा पाकिस्तान की सरहद के पास 100 किलोमीटर तक रक्षा कार्यों के लिए भूमि का अधिग्रहण किया जा सकेगा। इसी प्रकार वन भूमि को गैर वनभूमि प्रयोजन में बदलने के लिए ग्राम सभा की पूर्व अनुमति लेने की शर्त को हटा दिया गया है। इससे वन भूमि के क्षेत्र फल में भारी कमी आएगी जो कि आदिवासियों के हित में नहीं है। नए संशोधन द्वारा दोबारा वन उगाने का कार्य निजी व्यक्तियों तथा संगठनों जिन में करपोरेटस भी शामिल हैं, को भी दिया जा सकता है। इससे आदिवासियों तथा वन वासियों को वन पर मिलने वाले सामुदायिक अधिकारों का हनन होगा। मोदी सरकार द्वारा लाया गया यह संशोधन आदिवासियों/ वन वासियों के हितों पर कुठाराघात है।

4.   आदिवासी अस्तित्व संकट में:

आरएसएस तथा भाजपा आदिवासियों को आदिवासी न कह कर वनवासी कहती है और वनवासी नाम से अपना संगठन भी चलाती है। इसके पीछे आरएसएस की गहरी चाल है। यह सभी जानते हैं कि हमारे देश में भिन्न-भिन्न समुदाय रहते हैं जिनकी अपने-अपने धर्म तथा अलग-अलग पहचान हैं। अदिवासी जिन्हें संविधान में अनुसूचित जनजाति कहा जाता है, भी एक अलग समुदाय है, जिसका अपना धर्म, अपने देवी देवता तथा एक विशिष्ट संस्कृति है। इनके अलग भौगोलिक क्षेत्र हैं और इनकी अलग पहचान है।

हमारे संविधान में भी इन भौगोलिक क्षेत्रों को जनजाति क्षेत्र कहा गया है और उनके के लिए अलग प्रशासनिक व्यवस्था का भी प्रावधान है। इस व्यवस्था के अंतर्गत इन क्षेत्रों की प्रशासनिक व्यवस्था राज्य के मुख्यमंत्री के अधीन न हो कर सीधे राज्यपाल और राष्ट्रपति के अधीन होती है जिसकी सहायता के लिए एक ट्राइबल एरिया काउंसिल होती है जिसकी अलग संरचना होती है। इन के अधिकारों को संरक्षित करने के लिए संविधान की अनुसूची 5 6 भी है।

इन क्षेत्रों में ग्राम स्तर पर सामान्य पंचायत राज व्यवस्था के स्थान पर विशेष ग्राम पंचायत व्यवस्था जिसे Panchayats (Extension to Scheduled Areas Act, 1996) अर्थात PESA कहा जाता है तथा यह ग्राम स्वराज के लिए परंपरागत ग्राम पंचायत व्यवस्था है। इसमें पंचायत में सभी प्राकृतिक संसाधनों/खनिजों पर पंचायत का ही अधिकार होता है और उनसे होने वाला लाभ ग्राम के विकास पर ही खर्च किया जा सकता है। परंतु यह विभिन्न राजनीतिक पार्टियों की सरकारों का ही षड्यंत्र है जिसके अंतर्गत केवल कुछ ही जनजाति क्षेत्रों में इस व्यवस्था को लागू किया गया है।

इसके अतिरिक्त यह भी उल्लेखनीय है कि हमारे संविधान में दलित और आदिवासियों को अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जन जातियों के तौर पर सूचीबद्ध किया गया है। उन्हें राजनीतिक आरक्षण के अलावा सरकारी सेवाओं तथा शिक्षा के क्षेत्र में आरक्षण दिया गया है। हमारी जनगणना में भी उनकी उपजातिवार अलग गणना की जाती है।

इसके अतिरिक्त आदिवासियों पर हिन्दू मैरेज एक्ट तथा हिन्दू उत्तराधिकार कानून भी लागू नहीं होता है। इन कारणों से स्पष्ट है कि आदिवासी समुदाय का अपना अलग धर्म, अलग देवी- देवता, अलग रस्मो-रिवाज़ और अलग संस्कृति है।

उपरोक्त वर्णित कारणों से आरएसएस आदिवासियों को आदिवासी न कह कर वनवासी (वन में रहने वाले) कहता है क्योंकि इन्हें आदिवासी कहने से उन्हें स्वयम् को आर्य और आदिवासियों को अनार्य (मूलनिवासी) मानने की बाध्यता खड़ी हो जाएगी। इससे आरएसएस का हिंदुत्व का मॉडल ध्वस्त हो जाएगा जो कि एकात्मवाद की बात करता है। इसी लिए आरएसएस आदिवासियों का लगातार हिन्दुकरण करने में लगा हुआ है। इसमें उसे कुछ क्षेत्रों में सफलता भी मिली है जिसका इस्तेमाल गैर हिंदुओं पर आक्रमण एवं उत्पीड़न करने में किया जाता है। यह भी एक सच्चाई है कि ईसाई मिशनरियों ने भी कुछ आदिवासियों का मसीहीकरण किया है, परंतु उन्होंने उनका इस्तेमाल गैर मसीही लोगों पर हमले करने के लिए नहीं किया है।

आरएसएस का मुख्य ध्येय आदिवासियों को आदिवासी की जगह वनवासी कह कर तथा उनका हिन्दुकरण करके हिंदुत्व के माडल में खींच लाना है और उनका इस्तेमाल गैर- हिंदुओं को दबाने में करना है। इसके साथ ही उनके धर्म परिवर्तन को रोकने हेतु गलत कानून बना कर रोकना है जबकि हमारा संविधान सभी नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार देता है।

बहुत से राज्यों में ईसाई हुए आदिवासियों की जबरदस्ती घर वापसी करवा कर उन्हें हिन्दू बनाया जा रहा है। इधर आरएसएस ने आदिवासी क्षेत्रों में एकल स्कूलों की स्थापना करके आदिवासी बच्चों का हिन्दुकरण (जय श्रीराम का नारा तथा राम की देवता के रूप में स्थापना) करना शुरू किया है। इसके इलावा आरएसएस पहले ही बहुत सारे वनवासी आश्रम चला कर आदिवासी बच्चों का हिन्दुकरण करती आ रही है। देश के अधिकतर राज्यों में भाजपा की सरकारें स्थापित हो जाने से यह प्रक्रिया और भी तेज हो गयी है।

इस प्रकार आरएसएस आदिवासियों को वनवासी घोषित करके उनके अस्तित्व को ही नकारने का प्रयास कर रहा है। यह न केवल आदिवासियों बल्कि पूरे देश की विविधता के लिए खतरा है। अतः आदिवासियों को आरएसएस की इस चाल को समझना होगा तथा उनकी अस्मिता को मिटाने के षड्यंत्र को विफल करना होगा।

उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट है कि मोदी सरकार का आदिवासी प्रेम एक छलावा मात्र है और उसकी आदिवासियों के कल्याण तथा सशक्तिकरण में कोई दिलचस्पी नहीं है। वह केवल उनका वोट लेने हेतु तरह तरह के हथकंडे अपनाती है जैसाकि जनजातीय गौरव दिवस का मनाया जाना। 

                    


 

 

 

शुक्रवार, 19 जुलाई 2019

उत्तर प्रदेश में ज़मीन के सवाल को हल करे योगी सरकार


उत्तर प्रदेश में ज़मीन के सवाल को हल करे योगी सरकार
-एस.आर.दारापुरी आई.पी.एस. (से.नि.)
हाल में सोनभद्र जिले के उभी गाँव में ज़मीन के कब्जे को लेकर हुए नरसंहार से, जिसमे 10 लोग मर चुके हैं तथा तिन दर्जन के करीब घायल हैं, भूमि का सवाल फिर चर्चा के केंद्र में आ गया है. इससे एक बात स्पष्ट तौर पर उभर कर आई है कि इस क्षेत्र में किस तरह अधिकारियों, राजनेताओं और दबंग लोगों ने आदिवासियों, ग्राम समाज तथा जंगल की ज़मीन को हथिया रखा है. इस प्रकार की स्थिति पूर्वांचल के सोनभद्र, मिर्ज़ापुर और चंदौली जिले की चकिया और नौगढ़ तहसील में व्याप्त है. इन जिलों में वन में रहने वाले आदिवासियों और उस पर आश्रित लोगों (वनवासी) की काफी बड़ी जनसँख्या है.इन जिलों में जंगल तथा पहाड़ हैं और इसमें आदिवासी तथा वनवासी आबादी का बड़ा हिस्सा निवास करता है परन्तु उनमें से अधिकतर लोगों के पास ज़मीन का मालिकाना हक़ नहीं है. जंगल तथा ग्राम समाज की ज़मीन ट्रस्ट तथा सहकारी समितियां बना कर हथिया ली गयी है. यहाँ पर गैर हाज़िर अधिकारियों, राजनेताओं तथा दबंग लोगों के बड़े बड़े फार्म हैं. भूमि पर सीलिंग एक्ट लागू होने पर भी इस क्षेत्र में ज़मींदारी व्यवस्था बरकरार है. इस क्षेत्र में ज़मीन तथा आदिवासियों/दलितों के शोषण के विरुद्ध नक्सलवाडी आन्दोलन काफी लम्बी अवधि तक चलता रहा है. अब भी अगर ज़मीन के प्रशन को शीघ्र हल नहीं किया गया तो इसके पुनः खड़े होने में बहुत देर नहीं लगेगी.
2011 की सामाजिक एवं आर्थिक जनगणना के अनुसार उत्तर प्रदेश की दलित आबादी के 42% तथा आदिवासी आबादी के  35%  परिवार भूमिहीन मजदूर है.  1991 में उत्तर प्रदेश में 42.03% दलित भूमिधर थे जो 2001 में 30% रह गए थे और इसके बाद और कम हो गए हैं. उत्तर प्रदेश में बहुत कम दलितों के पास ज़मीन  होने का एक कारण यह है कि यहाँ भी बिहार की तरह भूमि सुधारों को सही ढंग से लागू नहीं किया गया जिस कारण बहुत कम ज़मीन सीलिंग में चिन्हित हो सकी और जो चिन्हित भी हुयी थी उसका भूमिहीनों को सही आवंटन नहीं किया गया. भूमि का थोडा बहुत आवंटन इंदिरा गाँधी के समय 1976-77 में किया गया जिसमे दलितों को छोटे छोटे पट्टे दिए गये थे. इनमें से अभी भी बहुत से पट्टों पर दलितों का कब्ज़ा नही है. सत्ता में आने से पहले बसपा का एक नारा था-“जो ज़मीन सरकारी है, वो ज़मीन हमारी है”. परन्तु चार बार मुख्य मंत्री बनने पर मायावती को इस नारे पर अमल करने की याद नहीं आई. परिणामस्वरूप पच्छिमी यूपी में तो 1995 थोडा बहुत भूमि आवंटन तो हुआ पर पूर्वांचल में वह भी नहीं. इसी लिए आज पूर्वांचल के जिलों खास करके  मिर्ज़ापुर, सोनभद्र तथा चंदौली में अधिकतर दलितों के पास ज़मीन नहीं है जबकि आज भी हरेक गाँव में ग्राम समाज की ज़मीन मौजूद है परन्तु वह दबंगों के कब्जे में है. मायावती ने दबंगों से उक्त ज़मीन खाली कराकर भूमिहीनों को आवंटन नहीं किया क्योंकि इससे उसके सर्वजन वोटर के नाराज़ हो जाने का डर था.
उत्तर प्रदेश में जब 2002 में मुलायम सिंह यादव की सरकार आई तो उन्होंने राजस्व कानून में संशोधन करके दलितों की भूमि आवंटन की वरीयता को ही बदल दिया और उसे अन्य भूमिहीन वर्गों के साथ जोड़ दिया. उनकी सरकार में भूमि आवंटन तो हुआ परन्तु ज़मीन दलितों को न दे कर अन्य जातियों को दे दी गयी. इसके साथ ही उन्होंने कानून में संशोधन करके दलितों की ज़मीन को गैर दलितों द्वारा ख़रीदे जाने वाले प्रतिबंध को भी हटा दिया. उस समय तो यह कानूनी संशोधन टल गया था परन्तु बाद में इसे विधिवत कानून का रूप दे दिया है. इस प्रकार मायावती द्वारा दलितों को भूमि आवंटन न करने, मुलायम सिंह द्वारा कानून में दलितों की भूमि आवंटन की वरीयता को समाप्त करने के कारण उत्तर प्रदेश के दलितों को भूमि आवंटन नहीं हो सका और ग्रामीण क्षेत्र में उनकी स्थिति अति दयनीय बनी हुयी है. 
आदिवासियों के सशक्तिकरण हेतु वनाधिकार कानून- 2006 तथा नियमावली 2008 में लागू हुयी थी. इस कानून के अंतर्गत सुरक्षित जंगल क्षेत्र में रहने वाले आदिवासियों तथा गैर आदिवासियों को उनके कब्ज़े की आवासीय तथा कृषि भूमि का पट्टा दिया जाना था. इस सम्बन्ध में आदिवासियों द्वारा अपने दावे प्रस्तुत किये जाने थे. उस समय उत्तर प्रदेश में मायावती की सरकार थी परन्तु उसकी सरकार ने इस दिशा में कोई भी प्रभावी कार्रवाही नहीं की जिस का नतीजा यह हुआ कि 30.1.2012 को उत्तर प्रदेश में आदिवासियों द्वारा प्रस्तुत कुल 92,406 दावों में से 74,701 दावे अर्थात 81% दावे रद्द कर दिए गए और केवल 17,705 अर्थात केवल 19% दावे स्वीकार किये गए तथा कुल 1,39,777 एकड़ भूमि आवंटित की गयी.
मायावती सरकार की आदिवासियों को भूमि आवंटन में लापरवाही और दलित/आदिवासी विरोधी मानसिकता को देख कर आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दाखिल की थी जिस पर उच्च न्यायालय ने अगस्त, 2013 में राज्य सरकार को वनाधिकार कानून के अंतर्गत दावों को पुनः सुन कर तेज़ी से निस्तारित करने के आदेश दिए थे परन्तु उस पर भी कोई ध्यान नहीं दिया गया. इस प्रकार मायावती तथा मुलायम सरकार की लापरवाही तथा दलित/आदिवासी विरोधी मानसिकता के कारण 80% दावे रद्द कर दिए गए. उत्तर प्रदेश सरकार ने यह भी दिखाया है की सरकारी स्तर पर कोई भी दावा लंबित नहीं है. इसी प्रकार दिनांक 30.04.2016 तक राष्ट्रीय स्तर पर कुल 44,23,464 दावों में से 38,57,379 दावों का निस्तारण किया गया जिन में केवल 17,44,274 दावे स्वीकार किये गए तथा कुल 1.03,58,376 एकड़ भूमि आवंटित की गयी जो कि प्रति दावा लगभग 5 एकड़ बैठती है. राष्ट्रीय स्तर पर अस्वीकृत दावों की औसत 53.8 % है जब कि उत्तर प्रदेश  में यह 80.15% है. इससे स्पष्ट है कि उत्तर प्रदेश में वनाधिकार कानून को लागू करने में घोर लापरवाही बरती गयी है जिस के लिए मायावती तथा अखिलेश सरकार बराबर के ज़िम्मेदार हैं.  
इसके बाद आरएसएस से जुडी कुछ संस्थाओं द्वारा दाखिल की गयी जनहित याचिका में फरवरी 2019 में सुप्रीम कोर्ट का एक निर्णय आया है जिसमें वनाधिकार के सभी रद्द हुए दावों वाली भूमि को 27 जुलाई तक खाली कराने का आदेश पारित किया गया था. इसका प्रभाव उत्तर प्रदेश के 74,000 परिवारों  तथा पूरे देश में 20 लाख परिवारों पर पड़ने वाला है जिनकी बेदखली  होने की सम्भावना है.  सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के विरुद्ध हमारी पार्टी से जुडी आदिवासी वनवासी महासभा ने कुछ अन्य संस्थाओं के साथ मिल कर पिटीशन की थी जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने 10 जुलाई तक बेदखली पर रोक लगते हुए सभी दावों की पुनः सुनवाई करने की अनुमति दे दी थी परन्तु अभी तक उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा इस दिश में कोई भी कार्रवाही की गयी प्रतीत नहीं होती है.
जैसा की सर्वविदित है कि मिर्जापुर, सोनभद्र और खासकर चंदौली के चकिया व नौगढ़ क्षेत्र भूमि प्रश्नों पर आंदोलन, हिंसा और दमन के इलाके रहे हैं. यहां पर बैराठ फार्म से लेकर ढेर सारी अन्य जगहों पर गैरकानूनी ढंग से जमीनों को हड़पा गया है और अधिकांश जमीनों से आदिवासी, वनवासी, खेत मजदूर या तो बेदखल किए गए या जमीनों को हासिल करने के लिए उन्हें जो कानूनी अधिकार मिले थे, उनको उन्हें उपलब्ध नहीं कराया गया। इस पूरे क्षेत्र में जमीन के सवाल को लेकर कई बार हिंसक झड़पें हुई हैं, ढेर सारे लोग मारे गए हैं।
इसलिए यह आवश्यक है कि उत्तर प्रदेश सरकार भूमि के प्रश्न पर महत्वपूर्ण निर्णय ले और भूमि के सवाल को जो विकास, रोजगार और सामाजिक न्याय दिलाने की कुंजी है, उसे वरीयता के आधार पर हल करे।
अतः उत्तर प्रदेश सरकार से अनुरोध है कि -
1. उभा काण्ड की न्यायिक जांच करायी जाए और यह पता लगाया  जाए कि एक प्रशासनिक अधिकारी द्वारा कैसे आदर्श कोपरेटिव सोसाइटी बनाकर ग्रामसभा की इतनी ज्यादा जमीन हड़प ली गयी और बाद में उसके परिजनों द्वारा उसकी बिक्री की गयी। खरीद बिक्री की इस पूरी प्रक्रिया में लिप्त प्रशासनिक अधिकारियों की जवाबदेही तय कर उन्हें दण्डित किया जाए. उभा गांव में कोपरेटिव सोसाइटी की जमीन को सरकार द्वारा अधिगृहित कर जो ग्रामीण उस पर काबिज है उन्हें पट्टा दिया जाए. उभा गांव में पीड़ित ग्रामीणों पर लगाए गुण्डा एक्ट के मुकदमें तत्काल वापस लिए जायें.
2. प्रदेश सरकार जमीन के सवाल को हल करने के लिए भूमि आयोग का गठन करे। उक्त आयोग ट्रस्ट या अन्य माध्यमों से गांव सभा या लोगों से छीन ली गई या हड़प ली गई जमीनों को अधिगृहीत करे और ग्राम सभा की फाजिल जमीनों समेत इन जमीनों को गरीबों में वितरित करने के लिए काम करे. औद्योगिक विकास के नाम पर भी जो जमीनें किसानों से ली गई थीं उन जमीनों को किसानों को वापस कर देना विधि सम्मत होगा.
3. प्रदेश में वनाधिकार कानून को ईमानदारी से लागू किया जाए और इसके तहत प्रस्तुत दावों का विधिसम्मत निस्तारण किया जाए और जो आदिवासी व वनाश्रित पुश्तैनी रूप से वन भूमि पर रहते हैं और खेती किसानी करते है, उन्हें तत्काल उसका पट्टा दिया जाए और जब तक उनके दावों का विधिक निस्तारण नहीं हो जाता तब तक उन्हें बेदखल करने से रोके और वन विभाग उनके खेती-बाड़ी के अधिकार में हस्तक्षेप न करे.
4. भूमि विवादों के तत्काल निस्तारण के लिए उत्तर प्रदेश सरकार रेवन्यू फास्ट ट्रैक कोर्ट का गठन करे।
 उम्मीद की जाती है कि उत्तर प्रदेश में सोनभद्र गांव की हृदय विदारक घटना अन्य जिलों और गांव में न घटित हो, इसलिए उत्तर प्रदेश की सरकार इस दिशा में पहल करेगी और भूमि सुधार को लागू किया जाएगा। यह काम उच्च प्राथमिकता पर एक विशेष अभियान चला कर किया जाना लाभप्रद होगा.


डॉ. अम्बेडकर द्वारा मनुस्मृति की आलोचना और नीत्शे की उसकी व्याख्या

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