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रविवार, 24 सितंबर 2023

पूना पैकट : एक पुनर्मूल्यांकन

 

पूना पैकट : एक पुनर्मूल्यांकन

       एस. आर. दारापुरी, राष्ट्रीय अध्यक्ष, आल इंडिया पीपुल्स फ्रन्ट

                  (24 सितंबर को पूना पैकट दिवस पर विशेष)

भारतीय हिन्दू समाज में जाति को आधारशिला माना गया है. इस में श्रेणीबद्ध असमानता के ढांचे में अछूत सबसे निचले स्तर पर हैं जिन्हें 1935 तक सरकारी तौर पर 'डिप्रेस्ड क्लासेज' कहा जाता था. गांधीजी ने उन्हें 'हरिजन' के नाम से पुरस्कृत किया था जिसे अधिकतर अछूतों ने स्वीकार नहीं किया था. अब उन्होंने अपने लिए 'दलित' नाम स्वयं चुना है जो उनकी पददलित स्थिति का परिचायक है. वर्तमान में वे भारत की कुल आबादी का लगभग छठा भाग (16.20 %) तथा कुल हिन्दू आबादी का पांचवा भाग (20.13 %) हैं. अछूत सदियों से हिन्दू समाज में सभी प्रकार के सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक व शैक्षिक अधिकारों से वंचित रहे हैं और काफी हद तक आज भी हैं.

दलित कई प्रकार की वंचनाओं एवं निर्योग्यताओं को झेलते रहे हैं. उनका हिन्दू समाज एवं राजनीति में बराबरी का दर्जा पाने के संघर्ष का एक लम्बा इतिहास रहा है. जब श्री. ई. एस. मान्टेग्यु, सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट फॉर इंडिया, ने पार्लियामेंट में 1917 में यह महत्वपूर्ण घोषणा की कि '"अंग्रेजी सरकार का अंतिम लक्ष्य भारत को डोमिनियन स्टेट्स देना है तो दलितों ने बम्बई में दो मीटिंगें कर के अपना मांग पत्र वाइसराय तथा भारत भ्रमण पर भारत आये सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट फॉर इंडिया को दिया. परिणामस्वरूप निम्न जातियों को विभिन्न प्रान्तों में अपनी समस्यायों को 1919 के भारतीय संवैधानिक सुधारों के पूर्व भ्रमण कर रहे कमिशन को पेश करने का मौका मिला.

तदोपरांत विभिन्न कमिशनों, कांफ्रेंसों एवं कौंसिलों का एक लम्बा एवं जटिल सिलसिला चला. सन 1918 में मान्टेग्यु चैमस्फोर्ड रिपोर्ट के बाद 1924 में मद्दीमान कमेटी रिपोर्ट आई जिसमें कौंसलों में डिप्रेस्ड क्लासेज के अति अल्प प्रतिनिधित्व और उसे बढ़ाने के उपायों के बारे में बात कही गयी. साईमन कमीशन (1928) ने स्वीकार किया कि डिप्रेस्ड क्लासेज को पर्याप्त प्रतिनिधित्व दिया जाना चाहिए. सन 1930 से 1932 एक लन्दन में तीन गोलमेज़ कान्फ्रेंसें हुईं जिन में अन्य अल्पसंख्यकों के साथ साथ दलितों के भी भारत के भावी संविधान के निर्माण में अपना मत देने के अधिकार को मान्यता मिली. यह एक ऐतिहासिक एवं निर्णयकारी परिघटना थी. इन गोलमेज़ कांफ्रेंसों में डॉ. बी. आर. आंबेडकर तथा राव बहादुर आर. श्रीनिवासन द्वारा दलितों के प्रभावकारी प्रतिनिधित्व एवं ज़ोरदार प्रस्तुति के कारण 17 अगस्त, 1932 को ब्रिटिश सरकार द्वारा घोषित 'प्रधानमंत्री अवार्ड' में दलितों को पृथक निर्वाचन का स्वतन्त्र राजनीतिक अधिकार मिला. इस अवार्ड से दलितों को आरक्षित सीटों पर पृथक निर्वाचन द्वारा अपने प्रतिनिधि स्वयं चुनने का अधिकार मिला और साथ ही सामान्य जाति के निर्वाचन क्षेत्रों में सवर्णों को चुनने हेतु दो वोट का अधिकार भी प्राप्त हुआ. इस प्रकार भारत के इतिहास में अछूतों को पहली वार राजनीतिक स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त हुआ जो उनकी मुक्ति का मार्ग प्रशस्त कर सकता था.

उक्त अवार्ड द्वारा दलितों को गवर्नमेंट आफ इंडिया एक्ट,1919 में अल्प संख्यकों के रूप में मिली मान्यता के आधार पर अन्य अल्पसंख्यकों - मुसलमानों, सिक्खों, ऐंग्लो इंडियनज तथा कुछ अन्य के साथ साथ पृथक निर्वाचन के रूप में प्रांतीय विधायिकाएं एवं केन्द्रीय एसेम्बली हेतु अपने प्रतिनिधि स्वयं चुनने का अधिकार मिला तथा उन सभी के लिए सीटों की संख्य निश्चित की गयी. इसमें अछूतों के लिए 78 सीटें विशेष निर्वाचन क्षेत्रों के रूप में आरक्षित की गईं.

गाँधी जी ने उक्त अवार्ड की घोषणा होने पर यरवदा (पूना) जेल में 18 अगस्त, 1932 को दलितों को मिले पृथक निर्वाचन के अधिकार के विरोध में 20 सितम्बर, 1932 से आमरण अनशन करने की घोषणा कर दी. गाँधी जी का मत था कि इससे अछूत हिन्दू समाज से अलग हो जायेंगे जिससे हिन्दू समाज व हिन्दू धर्म विघटित हो जायेगा. यह ज्ञातव्य है कि उन्होंने मुसलमानों, सिक्खों व ऐंग्लो- इंडियनज को मिले उसी अधिकार का कोई विरोध नहीं किया था. गाँधी जी ने इस अंदेशे को लेकर 18 अगस्त, 1932 को तत्कालीन ब्रिटिश प्रधान मंत्री, श्री रेम्ज़े मैकडोनाल्ड को एक पत्र भेज कर दलितों को दिए गए पृथक निर्वाचन के अधिकार को समाप्त करके संयुक्त मताधिकार की व्यवस्था करने तथा हिन्दू समाज को विघटन से बचाने की अपील की. इसके उत्तर में ब्रिटिश प्रधान मंत्री ने अपने पत्र दिनांकित 8 सितम्बर, 1932 में अंकित किया, " ब्रिटिश सरकार की योजना के अंतर्गत दलित वर्ग हिन्दू समाज के अंग बने रहेंगे और वे हिन्दू निर्वाचन के लिए समान रूप से मतदान करेंगे, परन्तु ऐसी व्यवस्था प्रथम 20 वर्षों तक रहेगी तथा हिन्दू समाज का अंग रहते हुए उनके लिए सीमित संख्या में विशेष निर्वाचन क्षेत्र होंगे ताकि उनके अधिकारों और हितों की रक्षा हो सके. वर्तमान स्थिति में ऐसा करना नितांत आवश्यक हो गया है. जहाँ जहाँ विशेष निर्वाचन क्षेत्र होंगे वहां वहां सामान्य हिन्दुओं के निर्वाचन क्षेत्रों में दलित वर्गों को मत देने से वंचित नहीं किया जायेगा. इस प्रकार दलितों के लिए दो मतों का अधिकार होगा - एक विशेष निर्वाचन क्षेत्र के अपने सदस्य के लिए और दूसरा हिन्दू समाज के सामान्य सदस्य के लिए. हम ने जानबूझकर जिसे आप ने अछूतों के लिए साम्प्रदायिक निर्वाचन कहा है, उसके विपरीत फैसला दिया है. दलित वर्ग के मतदाता सामान्य अथवा हिन्दू निर्वाचन क्षेत्रों में सवर्ण उम्मीदवार को मत दे सकेंगे तथा सवर्ण हिन्दू मतदाता दलित वर्ग के उम्मीदवार वार को उसके निर्वाचन क्षेत्र में मतदान कर सकेंगे. इस प्रकार हिन्दू समाज की एकता को सुरक्षित रखा गया है.“ कुछ अन्य तर्क देने के बाद उन्होंने गाँधी जी से आमरण अनशन छोड़ने का आग्रह किया था.

परन्तु गाँधी जी ने प्रत्युत्तर में आमरण अनशन को अपना पुनीत धर्म मानते हुए कहा कि दलित वर्गों को केवल दोहरे मतदान का अधिकार देने से उन्हें तथा हिन्दू समाज को छिन्न - भिन्न होने से नहीं रोका जा सकता. उन्होंने आगे कहा, " मेरी समझ में दलित वर्ग के लिए पृथक निर्वाचन की व्यवस्था करना हिन्दू धर्म को बर्बाद करने का इंजेक्शन लगाना है. इस से दलित वर्गों का कोई लाभ नहीं होगा." गांधीजी ने इसी प्रकार के तर्क दूसरी और तीसरी गोल मेज़ कांफ्रेंस में भी दिए थे जिसके प्रत्युत्तर में डॉ. आंबेडकर ने गाँधी जी के दलितों के भी अकेले प्रतिनिधि और उनके शुभ चिन्तक होने के दावे को नकारते हुए उनसे दलितों के राजनीतिक अधिकारों का विरोध न करने का अनुरोध किया था. उन्होंने यह भी कहा था कि फिलहाल दलित केवल स्वतन्त्र राजनीतिक अधिकारों की ही मांग कर रहे हैं न कि हिन्दुओं से अलग हो अलग देश बनाने की. परन्तु गाँधी जी का सवर्ण हिन्दुओं के हित को सुरक्षित रखने और अछूतों को हिन्दू समाज का गुलाम बनाये रखने का स्वार्थ था. यही कारण था कि उन्होंने सभी तथ्यों व तर्कों को नकारते हुए 20 सितम्बर, 1932 को अछूतों के पृथक निर्वाचन के अधिकार के विरुद्ध आमरण अनशन शुरू कर दिया. यह एक विकट स्थिति थी. एक तरफ गाँधी जी के पक्ष में एक विशाल शक्तिशाली हिन्दू समुदाय था, दूसरी तरफ डॉ. अंबेडकर और अछूत समाज. अंततः भारी दबाव एवं अछूतों के संभव नरसंहार के भय तथा गाँधी जी की जान बचाने के उद्देश्य से डॉ. आंबेडकर तथा उनके साथियों को दलितों के पृथक निर्वाचन के अधिकार की बलि देनी पड़ी और सवर्ण हिन्दुओं से 24 सितम्बर, 1932 को तथाकथित पूना पैक्ट करना पड़ा. इस प्रकार अछूतों को गाँधी जी की जिद्द के कारण अपनी राजनैतिक आज़ादी के अधिकार को खोना पड़ा.

यद्यपि पूना पैक्ट के अनुसार दलितों के लिए ' प्रधान मंत्री अवार्ड' में सुरक्षित सीटों की संख्या बढ़ा कर 78 से 151 हो गयी परन्तु संयुक्त निर्वाचन के कारण उनसे अपने प्रतिनिधि स्वयं चुनने का अधिकार छिन्न गया जिसका दुष्परिणाम आज तक दलित समाज झेल रहा है. पूना पैकट के प्रावधानों को गवर्नमेंट आफ इंडिया एक्ट, 1935 में शामिल करके सन 1937 में प्रथम चुनाव संपन्न हुआ जिसमें गाँधी जी के दलित प्रतिनिधियों को कांग्रेस द्वारा कोई भी दखल न देने के दिए गए आश्वासन के बावजूद कांग्रेस ने 151 में से 78 सीटें हथिया लीं क्योंकि संयुक्त निर्वाचन प्रणाली में दलित पुनः सवर्ण वोटों पर निर्भर हो गए थे . गाँधी जी और कांग्रेस के इस छल से खिन्न होकर डॉ. आंबेडकर ने कहा था, " पूना पैकट में दलितों के साथ बहुत बड़ा धोखा हुआ है."

प्रधान मंत्री अवार्ड के माध्यम से अछूतों को  पृथक निर्वाचन के रूप में अपने प्रतिनिधि स्वयं चुनने और दोहरे वोट के अधिकार से सवर्ण हिन्दुओं की भी दलितों पर निर्भरता से दलितों का स्वंतत्र राजनीतिक अस्तित्व सुरक्षित रह सकता था परन्तु पूना पैक्ट करने की विवशता ने दलितों को फिर से सवर्ण हिन्दुओं का गुलाम बना दिया. इस व्यवस्था से आरक्षित सीटों पर जो सांसद या विधायक चुने जाते हैं वे वास्तव में दलितों द्वारा न चुने जा कर विभिन्न राजनैतिक पार्टियों एवं सवर्णों द्वारा चुने जाते हैं जिन्हें उन का गुलाम/ बंधुआ बन कर रहना पड़ता है. सभी राजनीतिक पार्टियाँ गुलाम मानसिकता वाले ऐसे प्रतिनिधियों पर कड़ा नियंत्रण रखती हैं और पार्टी लाइन से हट कर किसी भी दलित मुद्दे को उठाने या उस पर बोलने की इजाजत नहीं देतीं. यही कारण है कि लोकसभा तथा विधान सभायों में दलित प्रतिनिधियों कि स्थिति महाभारत के भीष्म पितामह जैसी रहती है जिस ने यह पूछने पर कि " जब कौरवों के दरबार में द्रौपदी का चीर हरण हो रहा था तो आप क्यों नहीं बोले?" इस पर उन का उत्तर था, " मैंने कौरवों का नमक खाया है." (भगवान दास)

वास्तव में प्रधान मंत्री अवार्ड से दलितों को स्वतंत्र राजनीतिक अधिकार प्राप्त हुए थे जिससे वे अपने प्रतिनिधि स्वयं चुनने के लिए सक्षम हो गए थे और वे उनकी आवाज़ बन सकते थे. इस के साथ ही दोहरे वोट के अधिकार के कारण सामान्य निर्वाचन क्षेत्र में सवर्ण हिन्दू भी उन पर निर्भर रहते और दलितों को नाराज़ करने की हिम्मत नहीं करते. इस से हिन्दू समाज में एक नया समीकरण बन सकता था जो दलित मुक्ति का रास्ता प्रशस्त करता. परन्तु गाँधी जी ने हिन्दू समाज और हिन्दू धर्म के विघटित होने की झूठी दुहाई दे कर तथा आमरण अनशन का अनैतिक हथकंडा अपना कर दलितों की राजनीतिक स्वतंत्रता का हनन कर लिया जिस कारण दलित सवर्णों के फिर से राजनीतिक गुलाम बन गए. वास्तव में गाँधी जी की चाल काफी हद तक राजनीतिक भी थी जो कि बाद में उनके एक अवसर पर सरदार पटेल को कही गयी इस बात से भी स्पष्ट है:

"अछूतों के अलग मताधिकार के परिणामों से मैं भयभीत हो उठता हूँ. दूसरे वर्गों के लिए अलग निर्वाचन अधिकार के बावजूद भी मेरे पास उनसे सौदा करने की गुंजाइश रहेगी परन्तु मेरे पास अछूतों से सौदा करने का कोई साधन नहीं रहेगा. वे नहीं जानते कि पृथक निर्वाचन हिन्दुओं को इतना बाँट देगा कि उसका अंजाम खून खराबा होगा. अछूत गुंडे मुसलमान गुंडों से मिल जायेंगे और हिन्दुओं को मारेंगे. क्या अंग्रेजी सरकार को इस का कोई अंदाज़ा नहीं है? मैं ऐसा नहीं सोचता." (महादेव देसाई, डायरी, पृष्ठ 301, प्रथम खंड).

गाँधी जी के इस सत्य कथन से आप गाँधी जी द्वारा अछूतों को पूना पैक्ट करने के लिए बाध्य करने के असली उद्देश्य का अंदाज़ा लगा सकते हैं.

दलितों की संयुक्त मताधिकार व्यवस्था के कारण सवर्ण हिन्दुओं पर निर्भरता के फलस्वरूप दलितों की कोई भी राजनैतिक पार्टी पनप नहीं पा रही है चाहे वह डॉ. आंबेडकर द्वारा स्थापित रिपब्लिकन पार्टी ही क्यों न हो. इसी कारण डॉ. आंबेडकर को भी दो वार चुनाव में हार का मुंह देखना पड़ा क्योंकि आरक्षित सीटों पर सवर्ण वोट ही निर्णायक होता है. इसी कारण सवर्ण पार्टियाँ ही अधिकतर आरक्षित सीटें जीतती हैं. पूना पैक्ट के इन्हीं दुष्परिणामों के कारण ही डॉ. आंबेडकर ने संविधान में राजनीतिक आरक्षण को केवल 10 वर्ष तक ही जारी रखने की बात कही थी. परन्तु विभिन्न राजनीतिक पार्टियाँ इसे दलितों के हित में नहीं बल्कि अपने स्वार्थ के लिए अब तक लगातार 10-10 वर्ष तक बढ़ाती चली आ रही हैं क्योंकि इस से उन्हें अपने मनपसंद और गुलाम दलित सांसद और विधायक चुनने की सुविधा रहती है.

सवर्ण हिन्दू राजनीतिक पार्टियाँ दलित नेताओं को खरीद लेती हैं और दलित पार्टियाँ कमज़ोर हो कर टूट जाती हैं. यही कारण है की उत्तर भारत में तथाकथित दलितों की कही जाने वाली बहुजन समाज पार्टी भी ब्राह्मणों और बनियों के पीछे घूम रही है और " हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा, विष्णु, महेश है" जैसे नारों को स्वीकार करने के लिए बाध्य है. अब तो उसका रूपान्तरण  बहुजन से सर्वजन में हो गया है. इन परिस्थितियों के कारण दलितों का बहुत अहित हुआ है वे राजनीतिक तौर पर सवर्णों के गुलाम बन कर रह गए हैं. अतः इस सन्दर्भ में पूना पैक्ट के औचित्य की समीक्षा करना समीचीन होगा. क्या दलितों को पृथक निर्वाचन की मांग पुनः उठाने के बारे में सोचना चाहिए ?

यद्यपि पूना पैक्ट की शर्तों में छुआ-छूत को समाप्त करने, सरकारी सेवाओं में आरक्षण देने तथा दलितों की शिक्षा के लिए बजट का प्रावधान करने की बात थी परन्तु आजादी के 75 वर्ष बाद भी उनके क्रियान्वयन की स्थिति दयनीय ही है. डॉ. आंबेडकर ने अपने इन अंदेशों को पूना पैक्ट के अनुमोदन हेतु बुलाई गयी 25 सितम्बर, 1932 को बम्बई में सवर्ण हिन्दुओं की बहुत बड़ी मीटिंग में व्यक्त करते हुए कहा था, "हमारी एक ही चिंता है. क्या हिन्दुओं की भावी पीढ़ियां इस समझौते का अनुपालन करेंगी? " इस पर सभी सवर्ण हिन्दुओं ने एक स्वर में कहा था, " हाँ, हम करेंगे." डॉ. आंबेडकर ने यह भी कहा था, “हम देखते हैं कि दुर्भाग्यवश हिन्दू सम्प्रदाय एक संघटित समूह नहीं है बल्कि विभिन्न सम्प्रदायों की फेडरेशन है. मैं आशा और विश्वास करता हूँ कि आप अपनी तरफ से इस अभिलेख को पवित्र मानेंगे तथा एक सम्मानजनक भावना से काम करेंगे." क्या आज सवर्ण हिन्दुओं को अपने पूर्वजों द्वारा दलितों के साथ किए  गए इस समझौते को ईमानदारी से लागू करने के बारे में थोड़ा  बहुत आत्म चिंतन नहीं करना चाहिए. यदि वे इस समझौते को ईमानदारी से लागू करने में अपना अहित देखते हैं तो क्या उन्हें दलितों के पृथक निर्वाचन का राजनीतिक अधिकार लौटा नहीं देना चाहिए?

अब क्योंकि वर्तमान परिस्थितियों में अलग मताधिकार के बहाल होने की संभावना नहीं है, अतः दलितों को अपनी राजनीति को जाति की राजनीति से बाहर निकाल कर मुद्दों की राजनीति को अपनाना चाहिए। इसके साथ ही केवल जाति के आधार पर किसी को वोट देने की बजाए उस व्यक्ति के दलित वर्ग हित में किए गए कार्यों को सामने रख कर ही वोट देना चाहिए। दलितों को व्यक्ति पूजा से भी मुक्त होना होगा जिसके बारे में बाबासाहेब ने पूरी तरह से सचेत किया था। दलितों को राजनीतिक अलगाव की जगह लोकतान्त्रिक, धर्मननिरपेक्ष एवं प्रगतिशील ताकतों से साथ हाथ मिलाना चाहिए। उन्हें याद रखना चाहिए कि दलितों की मुक्ति में ही सब की मुक्ति है।

 

 

शनिवार, 28 मार्च 2015

डॉ. आंबेडकर : आधुनिक भारत के निर्माता



डॉ. आंबेडकर : आधुनिक भारत के निर्माता
-एस.आर. दारापुरी आई.पी.एस.(से.नि.)

डॉ. बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर एक अछूत परिवार में पैदा हुए थे जो सभी प्रकार के सामाजिक, शैक्षिक, धार्मिक व राजनीतिक अधिकारों से वंचित वर्ग था. इसके बावजूद भी उनकी गिनती दुनिया के सबसे अधिक शिक्षित लोगों में की जाती है. उनके पास अमेरिका, इंग्लैण्ड तथा जर्मनी की उच्च डिग्रियां थीं. इतना शिक्षित होते हुए भी उन्हें समाज में घोर अपमान का सामना करना पड़ा. जब वे महाराजा बड़ोदा के दरबार में सैनिक सलाहकार के उच्च पद पर नियुक्त हुए तो उन्हें इतना अपमानित होना पड़ा कि उन्हें यह नौकरी छोड़नी पड़ी. जाति अपमान से तंग आ कर उन्होंने कभी भी नौकरी न करने का निर्णय लिया तथा इंग्लैण्ड से वकालत पास कर स्वतंत्र रूप से बम्बई में वकालत शुरू कर दी.
डॉ. आंबेडकर  इस्राईल के लोगों के मुक्तिदाता मोजिज़ की तरह अपने लोगों को जगाने, संगठित करने, अपनी शक्ति से परिचित कराने तथा अपने अधिकारों का प्रयोग सम्मानसहित करने के लिए प्रेरित कर रहे थे. उन्होंने दलितों को “शिक्षित हो, संघर्ष करो और संगठित हो” का नारा देकर मुक्ति का रास्ता दिखाया.
उन्होंने चालू शिक्षा पद्धति के बारे में महात्मा गणाधी, सी. राजगोपालचारी, रविन्द्रनाथ टैगोर, डॉ. जाकिर हुसैन तथा अन्य की तरह मैकाले की अंग्रेजी शिक्षा की आलोचना नहीं की और न ही वे नए सिदधान्त गढ़ने में लगे रहे. इस के विपरीत डॉ. आंबेडकर ने अपने बच्चों को स्कूल तथा कालेज भेज कर पढ़ाने की प्रेरणा दी. उनका शिक्षा प्रचार का कार्यक्रम केवल दलितों तक ही सीमित नहीं था बल्कि उन्होंने सभी वर्गों के लिए उच्च शिक्षा उपलब्ध कराने का प्रयास किया. डॉ. आंबेडकर ने इस हेतु “पीपल्ज़ एजुकेशन सोसायटी” के माध्यम से बबई में कालेज स्थापित किये जिनमें बिना किसी भेदभाव के सभी को शिक्षा उपलब्ध करायी और जनसाधारण की समस्यायों को सामने रख कर उनमें प्रातः तथा सायंकाल पढ़ाई की व्यवस्था की. इससे हजारों नवयुकों और महिलायों ने लाभ उठाया. बाबा साहेब ने दलित वर्ग के पढ़े लिखे युवकों के लिए सरकारी नौकरियों में मुसलामानों तथा अन्य अल्पसंख्यक वर्गों की तरह आरक्षण की मांग उठाई.
बाबा साहेब ने केवल अछूतों की मुक्ति के लिए ही संघर्ष नहीं किय बल्कि उन्होंने राष्ट्र के निर्माण एवं भारतीय समाज के पुनरनिर्माण में कई तरीकों से महत्वपूर्ण योगदान दिया. वे अपने देश के लोगों को बहुत प्यार करते थे तथा उन्होंने उनकी मुक्ति और खुशहाली के लिए बहुत काम किया.
भारत के भावी संविधान के निर्माण के सम्बन्ध में 1930 तथा 1932 में इंग्लैण्ड में गोलमेज़ कांफ्रेंस बुलाई गयी जिसमें उन्हें डिप्रेस्ड क्लासेज़ के प्रतिनिधि के रूप में आमंत्रित किया गया तो इसका गांधी जी ने बहुत विरोध किया. डॉ. आंबेडकर ने अपने भाषण में अँग्रेज़ सरकार की तीखी आलोचना करते हुए कहा, “अँग्रेज़ सरकार ने हमारे उद्धार के लिए कुछ भी नहीं किया है. हम इस से पहले भी अछूत थे और अब भी अछूत हैं. यह सरकार दलित हितों की विरोधी है तथा उनकी मुक्ति और अपेक्षायों के प्रति उदासीन है. यह सरकार  ऐसा जानबूझ कर कर रही है. केवल लोगों की सरकार, लोगों के लिए सरकार और लोगों द्वारा सरकार स्थापित होने पर ही उनका भला हो सकता है. अतः हमारी पहली मांग है – स्वराज.” इस संक्षिप्त उद्धरण से बाबा साहेब की देश प्रेम और स्वंत्रता की चाह का अंदाज़ा लगाया जा सकता है.
बाबा साहेब को केवल दलित हितों को बढ़ाने तथा शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए ही याद नहीं किया जाता है बल्कि उन्हें राष्ट्र निर्माण एवं उसके आधुनिकीकरण में महत्वपूर्ण योगदान देने के लिए भी याद किया जाता है. इसके कुछ प्रमुख पहलू निम्नलिखित हैं:-
1.       भारत सरकार अधिनियम 1935 लागू होने पर प्रान्तों में विधान सभाएं स्थापित करने एवं स्वराज की पद्धति लागू करने का निर्णय लिया गया तो बाबा साहेब ने राजनीतिक क्षेत्र में दलितों की हिस्सेदारी करने के ध्येय से स्वतंत्र मजदूर पार्टी (Independent Labour Party) की स्थापना की तथा उसके झंडे तले 1937 का पहला चुनाव लड़ा. इसमें उन्हें बहुत अच्छी सफलता मिली. इस पार्टी में दलितों के हितों के साथ साथ मजदूर हितों की वकालत भी की गयी थी तथा कई प्रस्ताव रखे गए थे. बाबा साहेब चाहते थे कि मजदूरों को केवल बेहतर कार्य स्थिति से ही संतुष्ट नहीं हो जाना चाहिए बल्कि उन्हें राजनीति में भाग लेकर राजनीतिक सत्ता में हिस्सेदारी प्राप्त करनी चाहिए.
2.       बाबा साहेब जानते थे कि भारत की निरंतर बढ़ती आबादी भी उस के पिछड़ेपन का कारण है. इसी लिए उन्होंने 1940 में बम्बई एसेम्बली में परिवार नियोजन योजना लागू करने का बिल प्रस्तुत किया था. इससे भी उनके देश प्रेम की झलक मिलती है.
3.       उन्होंने 1942 में स्वतंत्र मजदूर पार्टी भंग करके “शैड्युल्ड कास्ट्स फेडरेशन” नाम की पार्टी की स्थापना की तथा दलित वर्ग की अखिल भारतीय स्तर की कांफ्रेंस की. उन्होंने दलित महिलायों का भी सम्मलेन किया. वे चाहते थे कि महिलायों को अपनी मुक्ति और अधिकारों के लिए स्वयं लड़ना चाहिए. उन्होंने महिलायों को शराब बंदी लागू करने के लिए संघर्ष करने के लिए भी प्रेरित किया. उन्होंने महिलायों को सलाह दी कि यदि उनका पति शराब पीकर घर आये तो वे उसे खाना न दें. इस से बाबा साहेब की महिलायों की मुक्ति सम्बन्धी चिंता का आभास मिलता है.
4.       सन 1932 में साम्प्रदायिक पंचाट के अनुसार दलितों को सरकारी नौकरियों में एवं विधान सभायों  में आरक्षण की सुविधा मिली थी जिस का महात्मा गाँधी द्वारा मरण व्रत रख कर विरोध किया गया.  अंत में बाबा साहेब को गाँधी जी की जान बचाने के लिए दलितों के पूना पैकट करके राजनीतिक अधिकारों की बलि देनी पड़ी तथा अपने प्रतिनिधि स्वयं चुनने के अधिकार को छोड़ना पड़ा जिस का खमियाज़ा दलित वर्ग आज तक भुगत रहा है.
5.       यह देखा गया था कि कांग्रेस के लोग दलित वर्ग की मीटिंगों में गड़बड़ी फैलाकर अशांति फैला देते थे. अतः इसे रोकने के लिए बाबा साहेब ने स्वयं सेवक संघ की तरज पर दलित नवयुवकों का “समता सैनिक दल’ बनाया. सन 1942 में उन्होंने इस का बड़ा सम्मलेन भी किया. बाबा साहेब इस के माध्यम से दलित नवयुवकों में अनुशासन, आत्म रक्षा एवं अपने नेताओं की रक्षा करने तथा अत्याचार का विरोध करने की भावना पैदा करना चाहते थे.
6.       यह सर्वविदित है कि स्वतंत्र भारत के संविधान निर्माण में बाबा साहेब का महत्वपूर्ण योगदान है. परन्तु फिर भी कुछ लोग इस को बहुत कम करके दिखाने की कोशिश करते रहते हैं. इस से कोई भी इनकार नहीं कर सकता कि आज भारत में यदि लोकतंत्र जीवित है तो वह इस संविधान के कारण ही है. भारत में संसदीय लोकतंत्र और सरकारी समाजवाद की स्थापना में बाबा साहेब का अद्वितीय योगदान है.
7.       बाबा साहेब अछूतों के साथ-साथ महिलायों के भी शुद्र होने की स्थिति के कारण व्याप्त दुर्दशा एवं अधोगति से बहुत दुखी थे. अतः वे महिलायों को भी कानूनी अधिकार दिलाना चाहते थे. 1952 में जब वे भारत के कानून मंत्री बने तो उन्होंने अथक परिश्रम करके हिन्दू कोड बिल तैयार किया और उसे पास करने हेतु संसद में पेश किया. परन्तु जब कट्टरपंथी हिंदुयों द्वारा उस बिल का विरोध किया गया और तत्कालीन प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरु भी कमजोरी दिखाने लगे तो डॉ. आंबेडकर ने खिन्न हो कर विरोध स्वरूप अपने पद से इस्तीफा दे दिया. बाद में वही बिल हिन्दू विवाह एक्ट, हिन्दू उतराधिकार एक्ट, हिन्दु स्पेशल मैरेज एक्ट आदि के रूप में 1956 में पास हुआ. इससे स्पष्ट है कि भारतीय, खास करके हिन्दू नारी के उत्थान में डॉ. आंबेडकर का महान योगदान है. इतना ही नहीं डॉ. आंबेडकर समान नागरिक संहिता ( Common Civil Code) के भी पक्षधर थे.
उपरोक्त के अतिरिकित डॉ. आंबेडकर का बहुत बड़ा योगदान भारत के औद्योगीकरण और आधुनिकीकरण की नींव डालने का रहा है. दुर्भाग्यवश  उनके इस क्षेत्र में दिए गए योगदान को लोगों के सामने प्रकट नहीं किया गया. इस क्षेत्र में उन का प्रमुख योगदान मजदूर वर्ग का कल्याण, बाढ़ नियंत्रण, बिजली उत्पादन, कृषि सिंचाई एवं जल यातायात सम्बंधी योजनाएं तैयार करना था. इसके फलस्वरूप ही बाद में भारत में औद्योगीकरण एवं बहुउद्देशीय नदी जल योजनायें बन सकीं.
सन 1942 में जब बाबा साहेब वायसराय की कार्यकारिणी समिति के सदस्य बने थे तो उन के पास श्रम विभाग था जिस में श्रम, श्रम कानून, कोयले की खदानें, प्रकाशन एवं लोक निर्माण विभाग थे.
बाबा साहेब लम्बे अरसे तक मजदूरों की बस्ती में रहे थे. अतः वे मजदूरों की समस्यायों से पूरी तरह परिचित थे. अतः श्रम मंत्री के रूप में उन्होंने मजदूरों के कल्याण के लिए बहुत से कानून बनाये जिन में प्रमुख इंडियन ट्रेड यूनियन एक्ट, औद्योगिक विवाद अधिनियम, मुयावज़ा, काम के घंटे तथा प्रसूतिलाभ आदि प्रमुख हैं. अंग्रेजों के विरोध के बावजूद भी उन्होंने महिलायों के गहरी खदानों में काम करने पर प्रतिबंध लगाया. उन्होंने मजदूरों को राजनीतिक सत्ता में हिस्सेदारी प्राप्त करने हेतु भी प्रेरित किया. वास्तव में वर्तमान में जितने भी श्रम कानून हैं उनमें से अधिकतर बाबा साहेब के ही बनाये हुए हैं जिस के भारत का मजदूर वर्ग उनका सदैव ऋणी रहेगा.
बाबा साहेब सफाई मजदूरों का कल्याण और उन्हें संगठित करने के लिए भी बहुत प्रयासरत थे जबकि गाँधी जी उन्हें भंगी बने रहने की शिक्षा देते थे तथा उन की हड़ताल को अनैतिक कार्य मानते थे. बाबा साहेब ने सर्वप्रथम बम्बई नगर महापालिका के सफाई मजदूरों को संगठित करके उनकी ट्रेड यूनियन बनवाई. वे इसी प्रकार के संगठन की स्थापना देश के अन्य भागों में भी करना चाहते थे और उसे अखिल भारतीय स्वरूप देना चाहते थे. उन्होंने इसी उद्देश्य से दो सदस्यी समिति भी बनायी तथा उसे विभिन्न प्रान्तों में जाकर सफाई मजदूरों की स्थिति एवं लागू कानूनों का अध्ययन कर रिपोर्ट देने को कहा. इस से स्पष्ट है कि बाबा साहेब सफाई मजदूरों को न्याय दिलाने तथा उन्हें अन्य ट्रेड यूनियनों की तर्ज़ पर संगठित करने में कितने प्रयासरत थे.
बाबा साहेब भारत की बढ़ती आबादी के कारण उपजी गरीबी, बेरोज़गारी, भुखमरी आदि समस्यायों के बारे में बहुत चिंतित थे. अतः वे खेती को अधिक उन्नत करना चाहते थे. वास्तव में वे इसे उद्योग का दर्जा देना चाहते थे. अतः उन्होंने सम्पूर्ण कृषि भूमि का राष्ट्रीयकरण करके रूस की भांति सामूहिक खेती का प्रस्ताव रखा ताकि कृषि का मशीनीकरण हो सके. इस के लिए वे नदी सिंचाई की  योजनाओं को लागू करना चाहते थे. उन्होंने नदियों पर बाँध बना कर उनसे नहरें निकलने तथा बिजली पैदा करने की योजनायें बनायीं थीं. इस प्रकार वे नदियों की बाढ़ से होने वाली तबाही को खुशहाली के साधन बनाना चाहते थे. इसी उद्देश्य से उन्होंने भारत में सर्वप्रथम “दामोदर नदी घाटी” की योजना बनायी जो अमेरिका की “टेनिस वेली अथारिटी” की तरह की थी. इसी प्रकार उन्होंने भारत की अन्य नदियों के जल का उपयोग करने की योजनायें भी बनायीं. बाबा साहेब कृषि की छोटी जोतों को ख़त्म  करके उसे लाभकारी बनाना चाहते थे. वे खेती से बेशी मजदूरों को अधिक औद्योगीकरण करके उत्पादिक श्रम में बदलना चाहते थे.  
बाबा साहेब नदी यातायात को भी बहुत बढ़ावा देना चाहते थे क्योंकि यह काफी सस्ता है. इसी उद्देश्य से उन्होंने सेंट्रल वाटरवेज़, इर्रीगेशन एंड नेवीगेशन कमीशन (CWINC)की स्थापना भी की थी. वर्तमान मोदी सरकार इसी का अनुसरण कर रही है. बाबा साहेब नदियों में मिटटी भराव के कारण आने वाली बाढ़ को रोकने हेतु अधिक गहरा करने के लिए छोटी एटमी शक्ति का प्रयोग करने के भी पक्षधर थे. इस से हम अंदाज़ा लगा सकते हैं कि कृषि, सिंचाई तथा नदी जल के सदुपयोग के बारे में बाबा साहेब की सोच कितनी आधुनिक एवं प्रगतिशील थी.
बाबा साहेब का यह निश्चित मत था कि औद्योगीकरण के बिना भारत की बेरोज़गारी, गरीबी एवं उपभोक्ता वस्तुओं की कमी दूर नहीं की जा सकती. इसके विपरीत गांधी जी मशीनों के प्रयोग और औद्योगीकरण के कट्टर विरोधी थे. बाबा साहेब यह भी जानते थे कि बिजली के बिना औद्योगीकरण संभव नहीं है. अतः उनका विचार था कि हमें सस्ती बिजली बनानी चाहिए. बाबा साहेब नदियों पर बांध बांधकर बिजली पैदा करना चाहते थे. इसी उद्देश्य से उन्होंने दामोदर घाटी योजना बनायी तथा सेंट्रल वाटरवेज़, इर्रीगेशन एंड नेवीगेशन कमीशन की स्थापना की. इसका तथा कमीशन का मुख्य काम प्रान्तों को कृषि, सिंचाई एवं बिजली उत्पादन सम्बन्धी परामर्श देना था. इनके सहयोग से बाद में कई बड़ी बहुउद्देशीय नदी योजनायें बनायीं गयीं जिनसे बिजली के उत्पादन के साथ साथ कृषि सिंचाई एवं बाढ़ नियंतरण में सहायता मिली. बाबा साहेब ने ही बिजली के उत्पादन एवं सुचारू वितरण के लिए केन्द्रीय तथा राज्य बिजली बोर्डों की स्थापना भी की थी. वास्तव में बाबा साहेब ने बिजली उत्पादन, बाढ़ नियंतरण, कृषि सिंचाई एवं बहुद्देशीय नदी योजनायें बनाकर भारत के औद्योगीकरण की नींव रखी थी.
उपरोक्त संक्षिप्त विवरण से स्पष्ट है कि बाबा साहेब भारत के नव निर्माण,औद्योगीकरण, कृषि विकास एवं सिंचाई, बाढ़ नियंतरण, नदी यातायात तथा बिजली उत्पादन बढ़ाने के लिए विशेष तौर पर प्रयासरत थे जिससे उन्होंने भारत के आधुनिकीकरण की नींव रखी. उन्होंने वायसराय की कार्यकारिणी के श्रम सदस्य के रूप में भारत के औद्योगीकरण और आधुनिकीकरण में जो महान योगदान दिया है उस के लिए भारत उनका हमेशा ऋणी रहेगा.                             

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