शनिवार, 14 मार्च 2026

धर्मांतरण-विरोधी कानून और दलित-आदिवासियों पर उनका प्रभाव: एक आंबेडकरवादी दृष्टिकोण

 

धर्मांतरण-विरोधी कानून और दलित-आदिवासियों पर उनका प्रभाव: एक आंबेडकरवादी दृष्टिकोण

एस आर दारापुरी, राष्ट्रीय अध्यक्ष, आल इंडिया पीपुल्स फ्रन्ट

भारत में धार्मिक परिवर्तन (धर्मांतरण) के प्रश्न को केवल धार्मिक आस्था या धर्मशास्त्र के संदर्भ में नहीं समझा जा सकता। ऐतिहासिक रूप से उत्पीड़ित समुदायों—विशेषकर दलितों और आदिवासियों—के लिए धर्मांतरण अक्सर सम्मान, सामाजिक गतिशीलता और दमनकारी सामाजिक संरचनाओं से मुक्ति का मार्ग रहा है। इसी कारण भारत के कई राज्यों में बने धर्मांतरण-विरोधी कानूनों ने विद्वानों, न्यायविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के बीच गंभीर बहस को जन्म दिया है। आंबेडकरवादी दृष्टिकोण से देखें तो ये कानून अंतरात्मा की स्वतंत्रता, जाति-व्यवस्था और धर्म के मामलों में राज्य की भूमिका जैसे बुनियादी प्रश्न उठाते हैं।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 के अंतर्गत धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार प्रत्येक व्यक्ति को अंतरात्मा की स्वतंत्रता तथा धर्म को मानने, पालन करने और प्रचार करने का अधिकार देता है। लेकिन यह अधिकार पूर्ण नहीं है; यह लोक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य जैसी शर्तों के अधीन है। समय के साथ कई राज्यों ने ऐसे कानून बनाए हैं जिनका उद्देश्य बल, छल या प्रलोभन द्वारा किए जाने वाले धर्मांतरण को रोकना बताया जाता है। हालांकि इन कानूनों के समर्थक कहते हैं कि ये कमजोर समुदायों को जबरन धर्मांतरण से बचाने के लिए हैं, परंतु आलोचकों का तर्क है कि इनका प्रभाव विशेष रूप से दलितों और आदिवासियों पर पड़ता है।

दलितों पर इन कानूनों के प्रभाव को समझने के लिए पहले यह समझना आवश्यक है कि भारतीय समाज में धर्म और जाति का संबंध क्या रहा है। पारंपरिक हिंदू सामाजिक व्यवस्था में जाति-व्यवस्था ने सामाजिक संबंधों, व्यवसायों और संसाधनों तक पहुँच को नियंत्रित किया। दलितों—जिन्हें कभी “अछूत” कहा जाता था—को इस व्यवस्था में सबसे नीचे रखा गया और उन्हें लंबे समय तक सामाजिक बहिष्कार और अपमान का सामना करना पड़ा। इस संदर्भ में धर्मांतरण कई दलितों के लिए जातिगत कलंक से मुक्ति पाने का एक माध्यम बन गया।

धर्मांतरण को सामाजिक मुक्ति के साधन के रूप में सबसे प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करने वाले नेता थे B. R. Ambedkar। आंबेडकर का मानना था कि जाति-व्यवस्था हिंदू धार्मिक विचारधारा में गहराई से जड़ें जमाए हुए है और इसलिए उससे मुक्ति पाने के लिए केवल सामाजिक सुधार पर्याप्त नहीं है; इसके लिए धार्मिक ढाँचे से ही अलग होना आवश्यक है। उनका प्रसिद्ध कथन—“मैं हिंदू पैदा हुआ हूँ, लेकिन हिंदू के रूप में नहीं मरूँगा”—उनकी इसी सोच को दर्शाता है।

आंबेडकर ने अपने इस संकल्प को 1956 में Buddhist Conversion Movement of 1956 के माध्यम से पूरा किया, जब उन्होंने और उनके लाखों अनुयायियों ने बौद्ध धर्म स्वीकार किया। यह केवल धार्मिक परिवर्तन नहीं था; यह सामाजिक और राजनीतिक विद्रोह था, जिसका उद्देश्य जातिगत दमन को अस्वीकार करना और समानता तथा मानव गरिमा पर आधारित नई पहचान स्थापित करना था।

कई दलितों ने बौद्ध धर्म, ईसाई धर्म, इस्लाम या सिख धर्म को इसलिए अपनाया क्योंकि इन धर्मों में समानता और भाईचारे का विचार अपेक्षाकृत अधिक दिखाई देता है। कुछ मामलों में मिशनरी संस्थाओं ने शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सेवाएँ भी प्रदान कीं, जो ऐतिहासिक रूप से वंचित समुदायों के लिए महत्वपूर्ण अवसर बने। विशेष रूप से दूरदराज़ क्षेत्रों में इन संस्थाओं ने सामाजिक उन्नति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

धर्मांतरण-विरोधी कानून इस प्रक्रिया को जटिल बना देते हैं क्योंकि वे धार्मिक परिवर्तन पर कानूनी और प्रशासनिक नियंत्रण स्थापित करते हैं। उदाहरण के लिए Uttar Pradesh, Madhya Pradesh और Odisha जैसे राज्यों में ऐसे कानून बनाए गए हैं जिनके अनुसार धर्मांतरण से पहले सरकारी अधिकारियों को सूचना देना या अनुमति लेना आवश्यक हो सकता है। इन कानूनों में बल, धोखाधड़ी या प्रलोभन से किए गए धर्मांतरण को दंडनीय अपराध माना गया है।

यद्यपि इन कानूनों का घोषित उद्देश्य जबरन धर्मांतरण को रोकना है, आलोचकों का कहना है कि व्यवहार में यह धार्मिक स्वतंत्रता को सीमित कर सकते हैं। यदि किसी व्यक्ति को धर्म बदलने के लिए सरकारी अनुमति लेनी पड़े, तो यह प्रक्रिया स्वयं में सामाजिक दबाव और प्रशासनिक बाधाएँ पैदा कर सकती है। कई बार स्थानीय समुदायों में तनाव बढ़ जाता है और धर्म बदलने वाले व्यक्तियों को सामाजिक बहिष्कार या उत्पीड़न का सामना करना पड़ सकता है।

एक और विवादास्पद पहलू “प्रलोभन” या “लालच” की व्यापक परिभाषा है। कई कानूनों में शिक्षा, आर्थिक सहायता या सामाजिक सेवाओं को भी प्रलोभन के रूप में व्याख्यायित किया जा सकता है। चूँकि मिशनरी संस्थाएँ अक्सर स्कूल, अस्पताल और सामाजिक सेवाएँ चलाती हैं, इसलिए उनके कार्यों को संदेह की दृष्टि से देखा जाने लगता है। इसका प्रभाव विशेष रूप से उन क्षेत्रों में पड़ता है जहाँ आदिवासी समुदायों ने लंबे समय से मिशनरी संस्थाओं के माध्यम से शिक्षा और संगठनात्मक शक्ति प्राप्त की है।

आदिवासी समुदायों के संदर्भ में धर्मांतरण का प्रश्न कुछ भिन्न ऐतिहासिक पृष्ठभूमि रखता है। कई आदिवासी समाज पारंपरिक रूप से अपनी स्वदेशी धार्मिक परंपराओं का पालन करते थे, जो मुख्यधारा के हिंदू धर्म से अलग थीं। औपनिवेशिक और उत्तर-औपनिवेशिक काल में अनेक आदिवासियों ने ईसाई धर्म या अन्य धर्मों को अपनाया, जिससे उन्हें शिक्षा, राजनीतिक जागरूकता और सामाजिक संगठन की नई संभावनाएँ मिलीं।

हालाँकि धर्मांतरण-विरोधी कानून कभी-कभी इन प्रक्रियाओं को बाधित करते हैं और धार्मिक परिवर्तन को लेकर अविश्वास का वातावरण बना देते हैं। कुछ क्षेत्रों में यह तनाव हिंसा में भी बदल गया है, जैसे Kandhamal district में हुई सांप्रदायिक हिंसा, जहाँ आदिवासी ईसाई समुदायों को गंभीर हमलों और विस्थापन का सामना करना पड़ा। यह उदाहरण दर्शाता है कि धर्मांतरण का मुद्दा अक्सर व्यापक सामाजिक और राजनीतिक संघर्षों से जुड़ जाता है।

इसके अतिरिक्त, धर्म बदलने के बाद भी जातिगत भेदभाव पूरी तरह समाप्त नहीं होता। ईसाई या मुस्लिम बनने वाले कई दलितों को सामाजिक जीवन में अभी भी भेदभाव का सामना करना पड़ता है। इसके साथ ही भारतीय राज्य द्वारा अनुसूचित जाति के लिए निर्धारित आरक्षण लाभ मुख्यतः हिंदू, सिख और बौद्ध समुदायों तक सीमित हैं। यह व्यवस्था Constitution (Scheduled Castes) Order 1950 के आधार पर बनी है। परिणामस्वरूप यदि कोई दलित ईसाई या मुस्लिम धर्म स्वीकार करता है, तो उसे आरक्षण जैसे संवैधानिक लाभों से वंचित होना पड़ सकता है। इस प्रकार धर्मांतरण सामाजिक सम्मान दिला सकता है, लेकिन इसके साथ कुछ कानूनी अधिकारों का नुकसान भी हो सकता है।

आंबेडकरवादी दृष्टिकोण से धर्मांतरण-विरोधी कानून केवल कानूनी नियम नहीं हैं; वे भारतीय समाज की संरचना को भी प्रभावित करते हैं। यदि दलितों और आदिवासियों के लिए धर्म बदलना कठिन बना दिया जाए, तो यह उन्हें उसी धार्मिक ढाँचे के भीतर बनाए रख सकता है जहाँ जातिगत असमानता ऐतिहासिक रूप से मौजूद रही है। आंबेडकर का मानना था कि अंतरात्मा की स्वतंत्रता में धर्म बदलने की स्वतंत्रता भी शामिल होनी चाहिए, विशेषकर तब जब कोई धर्म सामाजिक अन्याय को वैध ठहराता हो।

हालाँकि इन कानूनों के समर्थकों का तर्क है कि कमजोर समुदायों को जबरन या धोखे से किए जाने वाले धर्मांतरण से बचाना भी आवश्यक है। इसलिए वास्तविक चुनौती यह है कि व्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करते हुए किसी भी प्रकार के दबाव या शोषण को रोका जाए

अंततः यह कहा जा सकता है कि दलितों और आदिवासियों पर धर्मांतरण-विरोधी कानूनों का प्रभाव केवल कानूनी नहीं बल्कि गहराई से सामाजिक और राजनीतिक है। इन समुदायों के लिए धर्मांतरण कई बार सम्मान और समानता की खोज का माध्यम रहा है। आंबेडकरवादी दृष्टिकोण से यह प्रश्न उठता है कि क्या अंतरात्मा की स्वतंत्रता का संवैधानिक वादा तब तक पूर्ण रूप से साकार हो सकता है, जब तक समाज में जाति-आधारित असमानताएँ बनी रहती हैं। इसलिए धर्मांतरण-विरोधी कानूनों पर चल रही बहस वास्तव में भारत में धार्मिक स्वतंत्रता, सामाजिक न्याय और राज्य की भूमिका के बीच संतुलन की व्यापक चर्चा का हिस्सा है।

 

गुरुवार, 12 मार्च 2026

भारत के विभाजन का दलितों पर प्रभाव: एक अम्बेडकरवादी दृष्टिकोण

                                                 

भारत के विभाजन का दलितों पर प्रभाव: एक अम्बेडकरवादी दृष्टिकोण

एस आर दारापुरी, राष्ट्रीय अध्यक्ष, आल इंडिया पीपुल्स फ्रन्ट

                                                India's Partition: A History in Photos - The New York Times

प्रस्तावना

1947 में भारतीय उपमहाद्वीप का विभाजन आधुनिक इतिहास की सबसे त्रासद घटनाओं में से एक माना जाता है। ब्रिटिश भारत के भारत और पाकिस्तान नामक दो स्वतंत्र राष्ट्रों में विभाजन के परिणामस्वरूप व्यापक सांप्रदायिक हिंसा, भारी जन-विस्थापन और मानव इतिहास के सबसे बड़े प्रवासों में से एक घटित हुआ। विभाजन के इतिहास को सामान्यतः हिंदू-मुस्लिम संघर्ष और राजनीतिक नेतृत्व के बीच प्रतिस्पर्धा के संदर्भ में समझाया जाता है, विशेषकर नेताओं जैसे Jawaharlal Nehru और Muhammad Ali Jinnah की भूमिका के माध्यम से।

हालाँकि यह दृष्टिकोण महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाओं को स्पष्ट करता है, लेकिन यह अक्सर समाज के हाशिये पर स्थित समुदायों—विशेषकर दलितों—के अनुभवों को अनदेखा कर देता है।

अम्बेडकरवादी इतिहासलेखन के दृष्टिकोण से भारत के विभाजन को समझने के लिए यह आवश्यक है कि हम यह देखें कि जाति संरचना ने इस घटना और उसके परिणामों को किस प्रकार प्रभावित किया। B. R. Ambedkar के विचार इस विश्लेषण के लिए एक महत्वपूर्ण बौद्धिक आधार प्रदान करते हैं। अम्बेडकर का तर्क था कि भारतीय समाज मूलतः जाति-आधारित पदानुक्रम में विभाजित है और सामाजिक परिवर्तन के बिना केवल राजनीतिक स्वतंत्रता वास्तविक समानता स्थापित नहीं कर सकती।

विभाजन के दौरान दलितों के अनुभव इस बात को स्पष्ट करते हैं कि भारतीय समाज में जाति किस प्रकार सामाजिक और राजनीतिक वास्तविकताओं को निर्धारित करती रही। दलित भी हिंसा, विस्थापन और आर्थिक क्षति से प्रभावित हुए, किंतु उनकी पीड़ा मुख्यधारा के इतिहास में बहुत कम दिखाई देती है। कई मामलों में उन्हें न केवल सांप्रदायिक हिंसा बल्कि अपने ही धार्मिक समुदायों के भीतर भेदभाव का सामना करना पड़ा।

इस प्रकार विभाजन का दलितों पर प्रभाव हमें दक्षिण एशियाई इतिहास में धर्म, जाति और सत्ता के जटिल संबंधों को समझने का अवसर प्रदान करता है।

विभाजन के अदृश्य पीड़ित के रूप में दलित

विभाजन के इतिहास का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि इसमें दलितों के अनुभव अपेक्षाकृत अदृश्य रहे हैं। अधिकांश ऐतिहासिक विवरण हिंसा को हिंदू, मुस्लिम और सिख समुदायों के संदर्भ में वर्णित करते हैं, जबकि इन समुदायों के भीतर मौजूद जातिगत विभाजन को अनदेखा कर दिया जाता है।

वास्तव में, विभाजन की हिंसा के दौरान अनेक दलित भी पीड़ित हुए। लेकिन सामाजिक और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के अभाव के कारण उनके अनुभव अक्सर दर्ज नहीं हो पाए। प्रभुत्वशाली जातियों के विपरीत, दलित समुदायों के पास ऐसे नेतृत्व या संस्थागत नेटवर्क नहीं थे जो उनकी पीड़ा को सार्वजनिक कर सकें।

अम्बेडकरवादी दृष्टिकोण से यह अदृश्यता भारतीय समाज की एक व्यापक समस्या को दर्शाती है—जातिगत असमानता को राष्ट्रीय राजनीतिक मुद्दों की तुलना में गौण मान लेना। इस प्रकार विभाजन ने उस ऐतिहासिक प्रवृत्ति को और मजबूत किया जिसमें दलितों की आवाज़ राष्ट्रीय इतिहास से बाहर रह जाती है।

विस्थापन और शरणार्थी अनुभव

विभाजन के परिणामस्वरूप लगभग डेढ़ करोड़ लोग नए बने भारत और पाकिस्तान के बीच विस्थापित हुए। इन शरणार्थियों में बड़ी संख्या में दलित भी शामिल थे, विशेषकर पंजाब और बंगाल जैसे क्षेत्रों में।

पूर्वी भारत में नमशूद्र समुदाय, जो बंगाल का एक प्रमुख दलित समुदाय था, विभाजन से गंभीर रूप से प्रभावित हुआ। 1947 के बाद कई नमशूद्र किसान पूर्वी पाकिस्तान में ही रहने का प्रयास करते रहे, क्योंकि वे अपनी भूमि और आजीविका से जुड़े रहना चाहते थे। लेकिन बाद के वर्षों में बढ़ती असुरक्षा और सांप्रदायिक तनाव के कारण बड़ी संख्या में उन्हें भारत आकर बसना पड़ा।

भारत आने के बाद दलित शरणार्थियों को अक्सर कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। जहाँ कई उच्च जाति के शरणार्थी सामाजिक नेटवर्क और संसाधनों के माध्यम से भूमि या रोजगार प्राप्त करने में सफल रहे, वहीं दलितों के पास ऐसे अवसर बहुत सीमित थे। परिणामस्वरूप उन्हें अक्सर दूरस्थ और अविकसित क्षेत्रों—जैसे दंडकारण्य—में बसाया गया।

इन पुनर्वास नीतियों ने यह स्पष्ट किया कि स्वतंत्र भारत के राज्य ढाँचे में भी जाति-आधारित असमानताएँ बनी रहीं।

दोहरी हाशियाकरण: धर्म और जाति

विभाजन के दौरान दलितों को दोहरी प्रकार की हाशियाकरण का सामना करना पड़ा।

पहला, वे अपने धार्मिक समुदायों के साथ होने वाली सांप्रदायिक हिंसा के शिकार बने।

दूसरा, उन्हें अपने ही समुदायों के भीतर जातिगत भेदभाव का सामना करना पड़ा।

उत्तर भारत के अनेक शरणार्थी शिविरों में उच्च जाति के शरणार्थियों ने दलितों से सामाजिक दूरी बनाए रखी। दलितों को प्रायः सफाई जैसे श्रमसाध्य कार्यों में लगाया जाता था और सामुदायिक निर्णय-प्रक्रिया में उन्हें शामिल नहीं किया जाता था। राहत सामग्री और पुनर्वास के अवसरों में भी जातिगत पक्षपात देखा गया।

यह स्थिति दर्शाती है कि विभाजन की त्रासदी के बीच भी जाति व्यवस्था समाप्त नहीं हुई; बल्कि कई मामलों में उसने सामाजिक संबंधों को और प्रभावित किया।

जबरन धर्म परिवर्तन और असुरक्षा

विभाजन के दौरान हुई अराजक हिंसा में दलित समुदाय विशेष रूप से असुरक्षित थे। कई क्षेत्रों में विभिन्न धार्मिक समूह अपनी जनसंख्या बढ़ाने के उद्देश्य से दलितों को धर्म परिवर्तन के लिए दबाव में लाते थे।

दलितों को कई बार सुरक्षा या संसाधनों तक पहुँच पाने के लिए अपना धार्मिक पहचान बदलने के लिए मजबूर किया गया। चूँकि उनके पास राजनीतिक शक्ति और सामाजिक संरक्षण की कमी थी, इसलिए वे ऐसे दबावों का विरोध करने में सक्षम नहीं थे।

यह अनुभव विभाजन के दौरान दलितों की कमजोर सामाजिक स्थिति को उजागर करता है।

दलित नेतृत्व की राजनीतिक दुविधा

विभाजन के समय दलित नेतृत्व को जटिल राजनीतिक परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। इसका एक महत्वपूर्ण उदाहरण Jogendra Nath Mandal का है, जो बंगाल के एक प्रमुख दलित नेता थे।

मंडल का विश्वास था कि मुसलमानों और दलितों का गठबंधन उच्च जाति हिंदुओं के प्रभुत्व का संतुलन बना सकता है। इसी कारण उन्होंने पाकिस्तान के निर्माण का समर्थन किया और वहाँ के पहले विधि एवं श्रम मंत्री बने।

लेकिन पाकिस्तान में दलितों के खिलाफ हिंसा और भेदभाव की खबरों के बाद मंडल ने 1950 में इस्तीफा दे दिया और भारत लौट आए। यह घटना इस बात को दर्शाती है कि विभाजन के समय दलित नेतृत्व को किस प्रकार कठिन राजनीतिक विकल्पों का सामना करना पड़ा।

दलित राजनीतिक आंदोलनों का विघटन

स्वतंत्रता से पहले दलित राजनीतिक आंदोलनों ने काफी गति प्राप्त कर ली थी। विभिन्न संगठनों ने राजनीतिक अधिकार, सामाजिक सुधार और प्रतिनिधित्व की माँग उठाई।

लेकिन विभाजन की उथल-पुथल ने इन आंदोलनों को कई क्षेत्रों में कमजोर कर दिया। बंगाल और पंजाब जैसे क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर हुए विस्थापन ने उन सामाजिक नेटवर्कों को तोड़ दिया जिन पर दलित राजनीतिक सक्रियता आधारित थी।

इसके परिणामस्वरूप अनेक दलित, जो पहले संगठित राजनीतिक गतिविधियों में शामिल थे, शरणार्थी जीवन की कठिनाइयों में उलझ गए। इससे उनके राजनीतिक आंदोलन की गति धीमी पड़ गई।

आर्थिक परिणाम

विभाजन का आर्थिक प्रभाव भी दलितों पर अत्यंत गंभीर पड़ा। कई दलित परिवारों ने हिंसा और विस्थापन के दौरान अपनी भूमि, पशुधन और आजीविका खो दी।

पहले से ही आर्थिक रूप से कमजोर होने के कारण इन नुकसान ने उन्हें और गहरी गरीबी में धकेल दिया। पुनर्वास क्षेत्रों में वे अक्सर भूमिहीन कृषि मजदूर या कम मजदूरी वाले श्रमिक बन गए।

शिक्षा, ऋण और रोजगार के सीमित अवसरों ने उनकी आर्थिक उन्नति को और कठिन बना दिया।

अम्बेडकर की व्याख्या

अम्बेडकर का विश्लेषण विभाजन को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण दृष्टिकोण प्रदान करता है। अपने ग्रंथ Pakistan or the Partition of India में उन्होंने सांप्रदायिक संघर्ष की जड़ों और एक लोकतांत्रिक राज्य की स्थापना की चुनौतियों का विश्लेषण किया।

अम्बेडकर का मानना था कि राजनीतिक लोकतंत्र तभी टिकाऊ हो सकता है जब उसके आधार में सामाजिक लोकतंत्र मौजूद हो। सामाजिक लोकतंत्र से उनका अर्थ था—स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व पर आधारित समाज।

लेकिन जाति-आधारित समाज में इन सिद्धांतों को लागू करना अत्यंत कठिन था। विभाजन की घटनाओं ने इस चेतावनी को और स्पष्ट कर दिया कि केवल राजनीतिक स्वतंत्रता सामाजिक असमानताओं को समाप्त नहीं कर सकती।

निष्कर्ष

भारत के विभाजन का दलितों पर प्रभाव इतिहास का एक महत्वपूर्ण लेकिन अक्सर उपेक्षित पक्ष है। दलितों ने भी हिंसा, विस्थापन और आर्थिक संकट का सामना किया, लेकिन उनके अनुभव मुख्यधारा के इतिहास में बहुत कम दिखाई देते हैं।

अम्बेडकरवादी दृष्टिकोण से यह अनुपस्थिति भारतीय समाज में जातिगत असमानता की गहरी समस्या को दर्शाती है। विभाजन ने इन असमानताओं को समाप्त नहीं किया; बल्कि कई मामलों में उन्हें और जटिल बना दिया।

इसलिए विभाजन के इतिहास को समझने के लिए केवल धार्मिक संघर्ष पर ध्यान केंद्रित करना पर्याप्त नहीं है। इसके लिए धर्म, जाति और सामाजिक संरचना के व्यापक विश्लेषण की आवश्यकता है।

दलितों के अनुभवों और B. R. Ambedkar के विचारों को ध्यान में रखते हुए ही विभाजन की एक अधिक समावेशी और आलोचनात्मक समझ विकसित की जा सकती है।

अंततः विभाजन की त्रासदी केवल भूभाग के विभाजन की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस विफलता की भी कहानी है जिसमें समाज समानता और सामाजिक न्याय पर आधारित लोकतंत्र स्थापित करने में सफल नहीं हो सका।

 


धर्मांतरण-विरोधी कानून और दलित-आदिवासियों पर उनका प्रभाव: एक आंबेडकरवादी दृष्टिकोण

  धर्मांतरण-विरोधी कानून और दलित-आदिवासियों पर उनका प्रभाव: एक आंबेडकरवादी दृष्टिकोण एस आर दारापुरी, राष्ट्रीय अध्यक्ष, आल इंडिया पीपुल्...