सोमवार, 7 सितंबर 2026

क्या भारत एक ‘Deeper State’ बन गया है?

 

क्या भारत एक ‘Deeper State’ बन गया है?

सत्ता, विचारधारा, संस्थाएँ और संवैधानिक लोकतंत्र का संकट

एस आर दारापुरी आई.पी.एस.(सेवानिवृत)

Behind India’s economic slowdown, our very own Deep State | The Indian ...

भारत आज भी एक संसदीय लोकतंत्र है। चुनाव होते हैं, सरकारें बदलती हैं, विपक्षी दल कई राज्यों में सत्ता में हैं, संसद और न्यायपालिका काम कर रहे हैं तथा नागरिकों को संवैधानिक अधिकार प्राप्त हैं। फिर भी लोकतंत्र का मूल्यांकन केवल संस्थाओं के औपचारिक अस्तित्व से नहीं किया जा सकता। असली प्रश्न यह है कि क्या ये संस्थाएँ सत्ता पर प्रभावी नियंत्रण रखती हैं, क्या कानून सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू होता है और क्या राज्य राजनीतिक तथा धार्मिक विचारधाराओं से संस्थागत रूप से निष्पक्ष बना हुआ है।

इसी संदर्भ में समकालीन भारत को समझने के लिए “Deeper State” की अवधारणा महत्वपूर्ण है।

Deep State से अलग अवधारणा

“Deep State” सामान्यतः सेना, खुफिया तंत्र, सुरक्षा प्रतिष्ठान या नौकरशाही के ऐसे गैर-निर्वाचित नेटवर्क को कहा जाता है जो निर्वाचित सरकार के पीछे से वास्तविक राजनीतिक प्रभाव डालते हैं। भारत इस पारंपरिक अर्थ में Deep State नहीं है। भारतीय सेना ने राजनीतिक सत्ता पर प्रत्यक्ष नियंत्रण स्थापित नहीं किया है।

Deeper State इससे अलग है। इसमें राज्य की औपचारिक संस्थाएँ राजनीतिक, वैचारिक, सामाजिक और आर्थिक नेटवर्कों के साथ इस प्रकार जुड़ने लगती हैं कि राज्य की शक्ति समाज में अधिक गहराई तक पहुँचती है और राज्य से बाहर मौजूद संगठन भी व्यवहार में राज्य-सदृश प्रभाव प्राप्त करने लगते हैं।

क्रिस्टोफ जाफरेलो ने इसी संदर्भ में “Deeper State” की अवधारणा विकसित की है। उनके अध्ययन में विशेष रूप से यह दिखाया गया है कि औपचारिक राज्य संस्थाओं, निगरानी तंत्र और हिंदुत्ववादी सामाजिक-सतर्कतावादी नेटवर्कों के बीच संबंध किस प्रकार सामाजिक नियंत्रण की अतिरिक्त परत बना सकते हैं।

इसलिए प्रश्न यह नहीं है कि कोई गुप्त शक्ति राज्य पर कब्जा कर चुकी है। अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न है कि राजनीतिक सत्ता, राज्य संस्थाएँ, विचारधारा, आर्थिक हित और सामाजिक संगठन किस सीमा तक एक-दूसरे को मजबूत कर रहे हैं।

सत्ता का केंद्रीकरण

समकालीन भारतीय शासन की प्रमुख प्रवृत्ति केंद्र में कार्यपालिका की शक्ति का बढ़ता केंद्रीकरण है। मजबूत सरकार अपने आप में अलोकतांत्रिक नहीं होती, लेकिन लोकतंत्र के लिए कार्यपालिका के साथ स्वतंत्र संस्थागत नियंत्रण भी आवश्यक है।

संसद, न्यायपालिका, निर्वाचन संस्थाएँ, जांच एजेंसियाँ, नियामक संस्थाएँ, मीडिया और संघीय ढाँचा इसी संतुलन का हिस्सा हैं। जब इनकी स्वायत्तता घटती है, तो संवैधानिक शक्ति-संतुलन प्रभावित होता है।

Freedom House की 2026 की रिपोर्ट भारत को बहुदलीय लोकतंत्र मानते हुए “Partly Free” श्रेणी में रखती है और राजनीतिक विरोधियों के विरुद्ध सरकारी संस्थाओं के उपयोग, पत्रकारों और नागरिक समाज पर दबाव तथा नागरिक स्वतंत्रताओं से जुड़ी चिंताओं को रेखांकित करती है।

यह निष्कर्ष हर घटना पर अंतिम निर्णय नहीं है, लेकिन यह महत्वपूर्ण प्रश्न अवश्य उठाता है कि क्या लोकतंत्र में सत्ता को नियंत्रित करने वाली संस्थाएँ स्वयं पर्याप्त रूप से स्वतंत्र रह गई हैं?

जांच एजेंसियाँ और चयनात्मक कानून-प्रयोग

ED, CBI, NIA और आयकर विभाग जैसी एजेंसियों के वैधानिक कार्य आवश्यक हैं। समस्या उनके अस्तित्व में नहीं, बल्कि उनकी निष्पक्षता और जवाबदेही में है।

जब कानून का प्रयोग राजनीतिक रूप से असमान दिखाई देता है, तो नागरिकों का राज्य की निष्पक्षता पर विश्वास कमजोर होता है। विपक्षी नेताओं के विरुद्ध जांच की असामान्य अधिकता को लेकर लगातार उठती चिंताएँ इसी समस्या की ओर संकेत करती हैं।

हर जांच को राजनीतिक षड्यंत्र मानना गलत होगा; लेकिन हर कार्रवाई को स्वतः निष्पक्ष मान लेना भी उतना ही गलत है। लोकतांत्रिक राज्य में जांच एजेंसियों की वैधता इस बात पर निर्भर करती है कि वे सत्ता और विपक्ष दोनों के प्रति समान दूरी बनाए रखें।

पुलिस और अनौपचारिक सत्ता

राज्य की वास्तविक शक्ति नागरिक को सबसे पहले पुलिस और प्रशासन के स्तर पर अनुभव होती है। FIR, गिरफ्तारी, जांच, जमानत और सुरक्षा—यही वे बिंदु हैं जहाँ संवैधानिक समानता व्यवहार में बदलती है।

समस्या तब गंभीर होती है जब औपचारिक पुलिस शक्ति और अनौपचारिक वैचारिक दबाव एक-दूसरे के समानांतर काम करने लगें। गौ-रक्षा, नैतिक पुलिसिंग, अंतरधार्मिक संबंधों का विरोध और अन्य प्रकार की सामाजिक निगरानी के मामलों में निजी समूह यदि नागरिकों के व्यवहार को नियंत्रित करने लगें और प्रशासन प्रभावी हस्तक्षेप न करे, तो निजी दबाव अर्ध-राज्यीय शक्ति में बदल सकता है।

यही Deeper State का महत्वपूर्ण पहलू है: राज्य को औपचारिक रूप से किसी संगठन को अधिकार देने की आवश्यकता नहीं; राजनीतिक संरक्षण, सामाजिक भय और प्रशासनिक निष्क्रियता भी निजी समूहों को व्यवहार में प्रभावशाली बना सकती है।

न्यायपालिका: अंतिम संवैधानिक अवरोध

न्यायपालिका सत्ता के केंद्रीकरण के विरुद्ध सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक सुरक्षा है। भारतीय न्यायालयों ने अनेक अवसरों पर सरकारों को सीमित किया और मौलिक अधिकारों की रक्षा की है। फिर भी न्यायिक स्वतंत्रता, नियुक्तियों, मामलों के निपटारे में देरी और न्याय तक असमान पहुँच को लेकर चिंताएँ बनी हुई हैं।

इसलिए न्यायपालिका की औपचारिक स्वतंत्रता पर्याप्त नहीं है। उसका वास्तविक महत्व इस बात में है कि वह लोकप्रिय बहुमत के विरुद्ध भी नागरिक और अल्पसंख्यक अधिकारों की रक्षा करने में सक्षम है या नहीं।

यदि न्यायपालिका कमजोर पड़ती है तो संविधान में लिखे अधिकार और नागरिक के वास्तविक अधिकार के बीच दूरी बढ़ सकती है।

संसद और संघवाद

लोकतंत्र केवल बहुमत से सरकार बनाने का नाम नहीं है। संसद का काम सरकार की निगरानी, कानूनों की समीक्षा और सार्वजनिक बहस सुनिश्चित करना भी है। यदि संसद की deliberative भूमिका कमजोर होती है, तो सत्ता का संतुलन कार्यपालिका की ओर झुकता है।

इसी तरह संघवाद केंद्रित सत्ता के विरुद्ध एक महत्वपूर्ण राजनीतिक-संवैधानिक सुरक्षा है। अलग-अलग राज्यों में अलग राजनीतिक शक्तियों का अस्तित्व लोकतंत्र को बहुलतावादी बनाए रखता है। केंद्रीय संस्थाओं, वित्तीय संसाधनों या राज्यपालों के माध्यम से अत्यधिक राजनीतिक केंद्रीकरण संघीय संतुलन को कमजोर कर सकता है।

विचारधारा, RSS और Deeper State

RSS को सीधे “राज्य” कहना उचित नहीं होगा। इसके लिए पर्याप्त प्रमाण भी नहीं हैं कि भारत की सभी प्रमुख संस्थाएँ RSS के नियंत्रण में हैं। लेकिन RSS और उससे जुड़े व्यापक संगठनों का महत्व उनके दीर्घकालीन सामाजिक और वैचारिक नेटवर्क में है।

राजनीतिक दल चुनाव हार सकता है; सामाजिक संगठन और विचारधारा लंबे समय तक समाज में सक्रिय रह सकते हैं। इसलिए असली प्रश्न यह है कि क्या हिंदुत्व की वैचारिक उपस्थिति केवल चुनावी राजनीति तक सीमित है या उसने शिक्षा, संस्कृति, सामाजिक संगठनों, प्रशासनिक वातावरण और सार्वजनिक विमर्श में भी पर्याप्त गहराई हासिल कर ली है।

यहीं Deeper State की अवधारणा पारंपरिक “Deep State” से अधिक उपयोगी हो जाती है। यह किसी गुप्त सत्ता की नहीं, बल्कि औपचारिक और अनौपचारिक शक्तियों के बढ़ते अंतर्संबंध की पड़ताल करती है।

मीडिया, डिजिटल निगरानी और आर्थिक शक्ति

आधुनिक राज्य की शक्ति केवल पुलिस और प्रशासन तक सीमित नहीं है। सूचना, डिजिटल तकनीक और आर्थिक संसाधन भी सत्ता के महत्वपूर्ण साधन बन चुके हैं।

मीडिया स्वामित्व का केंद्रीकरण, पत्रकारों पर दबाव, ऑनलाइन उत्पीड़न, दुष्प्रचार और डिजिटल निगरानी नागरिकों की स्वतंत्र राजनीतिक समझ को प्रभावित कर सकते हैं। इसी तरह राजनीतिक और कॉरपोरेट शक्ति का अत्यधिक केंद्रीकरण नियामक संस्थाओं की स्वतंत्रता और नीति-निर्माण की निष्पक्षता पर प्रश्न खड़े करता है।

इसलिए Deeper State को समझने के लिए सत्ता के तीन पारंपरिक क्षेत्रों—राजनीति, प्रशासन और सुरक्षाके साथ सूचना और अर्थव्यवस्था को भी देखना आवश्यक है।

दलितों और अल्पसंख्यकों के लिए अर्थ

Deeper State का सबसे गंभीर परीक्षण कमजोर नागरिकों के साथ राज्य के व्यवहार में दिखाई देता है।

मुसलमानों, दलितों, आदिवासियों और अन्य वंचित समूहों के लिए संविधान केवल मतदान का अधिकार नहीं देता। वह समान संरक्षण, गरिमा, स्वतंत्रता और न्याय की गारंटी देता है।

आंबेडकर की दृष्टि में राजनीतिक लोकतंत्र सामाजिक लोकतंत्र के बिना अधूरा है। यदि राज्य की संस्थाएँ नागरिक को उसके व्यक्तिगत अधिकारों के बजाय उसकी जाति, धर्म, समुदाय या राजनीतिक निष्ठा के आधार पर देखने लगें, तो संवैधानिक नागरिकता कमजोर पड़ती है।

यही कारण है कि Deeper State का प्रश्न केवल संस्थागत नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय का प्रश्न भी है।

क्या भारत Deeper State बन चुका है?

भारत को अभी पूर्ण रूप से स्थापित Deeper State कहना जल्दबाजी होगी। चुनावी प्रतिस्पर्धा मौजूद है, विपक्षी दल प्रभावशाली हैं, कई राज्यों में सत्ता परिवर्तन होते हैं, न्यायपालिका कई मामलों में स्वतंत्र भूमिका निभाती है और नागरिक समाज तथा सामाजिक आंदोलन सक्रिय हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव ने भी दिखाया कि मतदाता सत्ता के राजनीतिक संतुलन को प्रभावित कर सकते हैं।

लेकिन दूसरी ओर, कार्यपालिका का केंद्रीकरण, जांच संस्थाओं के चयनात्मक उपयोग की आशंकाएँ, संस्थागत स्वायत्तता पर दबाव, सार्वजनिक जीवन में हिंदुत्व की बढ़ती वैचारिक उपस्थिति, निजी-सामाजिक निगरानी, मीडिया पर दबाव और आर्थिक शक्ति के केंद्रीकरण जैसी प्रवृत्तियाँ एक व्यापक परिवर्तन की ओर संकेत करती हैं।

इसलिए अधिक सटीक निष्कर्ष यह होगा कि भारत में Deeper State की महत्वपूर्ण विशेषताएँ विकसित हो रही हैं, यद्यपि उसका पूर्ण संस्थानीकरण अभी नहीं हुआ है।

संवैधानिक नैतिकता ही निर्णायक कसौटी

आंबेडकर के लिए संविधान केवल संस्थाओं की संरचना नहीं था; वह एक ऐसी राजनीतिक संस्कृति की मांग करता था जिसमें स्वतंत्रता, समानता, बंधुता, कानून का शासन और संस्थागत संयम सर्वोपरि हों।

इसलिए निर्णायक प्रश्न यह नहीं है कि किसी अधिकारी, न्यायाधीश, पुलिसकर्मी या नागरिक की निजी विचारधारा क्या है। प्रश्न यह है कि जब निजी या राजनीतिक विचारधारा और संवैधानिक दायित्व में टकराव हो, तो किसे प्राथमिकता दी जाती है।

यदि संविधान सर्वोपरि रहता है तो संस्थाएँ लोकतंत्र की रक्षा करती हैं। यदि राजनीतिक या धार्मिक निष्ठा संवैधानिक दायित्व पर हावी होने लगे, तो राज्य की निष्पक्षता कमजोर पड़ती है।

निष्कर्ष

भारत न तो पारंपरिक अर्थ में Deep State बन चुका है और न ही उसकी लोकतांत्रिक संस्थाएँ पूरी तरह समाप्त हुई हैं। लेकिन Deeper State की दिशा में बढ़ती प्रवृत्तियों को नजरअंदाज करना भी उचित नहीं होगा।

इस अवधारणा का वास्तविक महत्व यह समझने में है कि लोकतांत्रिक संस्थाएँ औपचारिक रूप से मौजूद रहते हुए भी सत्ता का वास्तविक संतुलन कैसे बदल सकता है।

Deeper State का सबसे बड़ा खतरा किसी अचानक संवैधानिक तख्तापलट में नहीं, बल्कि संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता को धीरे-धीरे भीतर से कमजोर करने में है।

संसद बनी रह सकती है, चुनाव होते रह सकते हैं, न्यायालय काम करते रह सकते हैं और सरकारें बदल सकती हैं। लेकिन यदि कानून का प्रयोग चयनात्मक हो, संस्थाएँ राजनीतिक दबाव में आ जाएँ, निजी वैचारिक समूहों को अनौपचारिक शक्ति मिलने लगे, मीडिया की स्वतंत्रता सीमित हो और कमजोर समुदाय राज्य को निष्पक्ष न मानें, तो लोकतंत्र का संवैधानिक चरित्र क्षीण होने लगता है।

इसलिए भारत के भविष्य की वास्तविक कसौटी केवल यह नहीं है कि कौन चुनाव जीतता है, बल्कि यह है कि क्या संविधान सरकार से ऊपर, बहुमत से ऊपर और राजनीतिक-वैचारिक शक्ति से ऊपर बना रहता है।

आंबेडकरवादी दृष्टि से यही अंतिम प्रश्न है:

क्या राज्य समान नागरिकता का संरक्षक बना रहेगा, या वह धीरे-धीरे प्रभुत्वशाली राजनीतिक, सामाजिक और वैचारिक शक्तियों के समाज में गहरे प्रवेश का माध्यम बन जाएगा?

यदि संविधान राज्य की शक्ति को नियंत्रित करता रहता है, तो लोकतंत्र जीवित रहेगा। यदि राज्य संविधान को नियंत्रित करने लगे, तो लोकतंत्र का बाहरी ढाँचा बचा रहकर भी उसकी आत्मा कमजोर हो सकती है।

 

 

शनिवार, 5 सितंबर 2026

क्या भारत में पुलिस किसी व्यक्ति को नजरबंद (House Arrest) कर सकती है?

क्या भारत में पुलिस किसी व्यक्ति को नजरबंद (House Arrest) कर सकती है?

एस आर दारापुरी आई.पी.एस.(सेवानिवृत)

India Towards a Police-State? | InFeed

निवारक पुलिस कार्रवाई, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और राजनीतिक असहमति की संवैधानिक सीमाएँ

भारत में पुलिस द्वारा किसी व्यक्ति को “हाउस अरेस्ट” अर्थात् उसके घर में नजरबंद करने का प्रश्न विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो गया है, खासकर राजनीतिक कार्यकर्ताओं, विपक्षी नेताओं, छात्रों, ट्रेड यूनियन कार्यकर्ताओं और नागरिक अधिकार समूहों के मामलों में। कई बार किसी प्रदर्शन या राजनीतिक कार्यक्रम से पहले पुलिस किसी व्यक्ति के घर पहुँचती है और उसे घर से बाहर निकलने से रोक देती है। कभी इसे “निवारक कार्रवाई”, कभी “सुरक्षा व्यवस्था” और कभी केवल प्रस्तावित कार्यक्रम में शामिल न होने की पुलिस सलाह कहा जाता है। लेकिन यदि पुलिसकर्मी किसी व्यक्ति के घर के बाहर तैनात होकर उसे बाहर निकलने से रोकते हैं, तो एक गंभीर संवैधानिक प्रश्न उठता है: क्या पुलिस बिना न्यायिक आदेश के किसी व्यक्ति को नजरबंद कर सकती है?

इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए कानून द्वारा अधिकृत वैध गिरफ्तारी या निवारक कार्रवाई और पुलिस द्वारा अनौपचारिक अथवा वास्तविक रूप से थोपी गई नजरबंदी के बीच अंतर करना आवश्यक है। भारतीय कानून पुलिस को यह सामान्य और असीमित शक्ति नहीं देता कि कोई पुलिस अधिकारी अपनी सुविधा या इच्छा से किसी नागरिक को घर में बंद कर दे, केवल इसलिए कि उसे आशंका है कि वह व्यक्ति किसी प्रदर्शन या राजनीतिक गतिविधि में भाग ले सकता है। व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर किसी भी गंभीर प्रतिबंध का स्पष्ट कानूनी आधार होना चाहिए और उसे संविधान की कसौटी पर खरा उतरना चाहिए।

नजरबंदी और व्यक्तिगत स्वतंत्रता

हाउस अरेस्ट या नजरबंदी का अर्थ है किसी व्यक्ति की आवाजाही की स्वतंत्रता को इस प्रकार सीमित कर देना कि वह अपना घर छोड़कर बाहर न जा सके। यद्यपि व्यक्ति तकनीकी रूप से जेल में नहीं होता और अपने ही घर में रहता है, लेकिन व्यावहारिक रूप से उसकी स्थिति हिरासत या नजरबंदी जैसी हो सकती है।

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करता है। इसके अनुसार किसी व्यक्ति को उसके जीवन या व्यक्तिगत स्वतंत्रता से केवल कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जा सकता है। इसी प्रकार अनुच्छेद 19(1)(d) प्रत्येक नागरिक को भारत में स्वतंत्र रूप से घूमने का अधिकार देता है, हालांकि अनुच्छेद 19(5) के तहत कानून द्वारा उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।

सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों, विशेषकर मेनका गांधी बनाम भारत संघ के बाद, अनुच्छेद 21 में उल्लिखित “कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया” को केवल औपचारिक कानूनी प्रक्रिया के रूप में नहीं देखा जा सकता। व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित करने वाली प्रक्रिया न्यायसंगत, उचित और गैर-मनमानी होनी चाहिए।

इसलिए केवल किसी पुलिस अधिकारी का यह कहना कि किसी व्यक्ति को घर से बाहर नहीं जाना है, अपने आप में पर्याप्त कानूनी अधिकार नहीं बन जाता।

पुलिस के पास “हाउस अरेस्ट” की कोई सामान्य शक्ति नहीं है

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) पुलिस को गिरफ्तारी, जाँच और निवारक कार्रवाई से संबंधित महत्वपूर्ण शक्तियाँ प्रदान करती है। लेकिन ये शक्तियाँ पुलिस को यह सामान्य अधिकार नहीं देतीं कि वह जब चाहे और जहाँ चाहे किसी व्यक्ति को घर में नजरबंद कर दे।

BNSS गिरफ्तारी के संबंध में कई सुरक्षा उपाय निर्धारित करता है। इनमें गिरफ्तारी के आधार की जानकारी देना, रिश्तेदारों या मित्रों को सूचना देना, गिरफ्तार व्यक्ति को उचित मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत करना तथा बिना न्यायिक अनुमति के हिरासत की अवधि पर सीमा जैसे प्रावधान शामिल हैं।

यहाँ एक महत्वपूर्ण सिद्धांत सामने आता है। पुलिस केवल “गिरफ्तारी” शब्द का इस्तेमाल न करके संवैधानिक सुरक्षा उपायों से बच नहीं सकती। यदि पुलिस की कार्रवाई का वास्तविक प्रभाव किसी व्यक्ति की आवाजाही की स्वतंत्रता छीनना और उसे घर से बाहर जाने से रोकना है, तो उस कार्रवाई की संवैधानिक प्रकृति केवल उसके नाम से तय नहीं होगी।

इसलिए प्रश्न केवल यह नहीं है:

क्या पुलिस ने व्यक्ति को औपचारिक रूप से गिरफ्तार किया?”

बल्कि अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न है:

क्या राज्य ने वास्तव में उस व्यक्ति की स्वतंत्रता छीन ली?”

निवारक कार्रवाई और मनमानी नजरबंदी में अंतर

पुलिस को कानून द्वारा कुछ निवारक शक्तियाँ अवश्य प्राप्त हैं। जहाँ किसी व्यक्ति द्वारा संज्ञेय अपराध किए जाने या गंभीर रूप से सार्वजनिक व्यवस्था भंग होने की वास्तविक और कानूनसम्मत आशंका हो, वहाँ पुलिस उचित निवारक कार्रवाई कर सकती है।

ऐसी शक्तियाँ किसी भी लोकतांत्रिक राज्य में आवश्यक हैं। पुलिस से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह हिंसा होने के बाद ही कार्रवाई करे। लेकिन निवारक पुलिस कार्रवाई भी कानून की सीमाओं के भीतर ही होनी चाहिए।

किसी व्यक्ति को किसी विशिष्ट और आसन्न अपराध को करने से रोकना और केवल इस आशंका के कारण उसे राजनीतिक प्रदर्शन में भाग लेने से रोकना कि वह प्रदर्शन में शामिल हो सकता है—दो बिल्कुल अलग बातें हैं।

यदि विश्वसनीय प्रमाण हो कि कोई व्यक्ति हिंसा करने, संपत्ति नष्ट करने या लोगों को धमकाने की तैयारी कर रहा है, तो निवारक कार्रवाई उचित हो सकती है। लेकिन केवल किसी विपक्षी दल, राजनीतिक संगठन, छात्र समूह, दलित संगठन, ट्रेड यूनियन या नागरिक अधिकार संगठन से जुड़े होने के कारण किसी व्यक्ति को घर में बंद करना अपने आप में पर्याप्त आधार नहीं हो सकता।

निवारक पुलिसिंग को निवारक राजनीतिक नियंत्रण में परिवर्तित नहीं किया जा सकता।

न्यायालय द्वारा आदेशित हाउस अरेस्ट

भारतीय कानून में हाउस अरेस्ट की अवधारणा पूरी तरह अज्ञात नहीं है। उपयुक्त परिस्थितियों में न्यायालय ने इस संभावना को स्वीकार किया है कि किसी व्यक्ति को पारंपरिक जेल या पुलिस हिरासत के बजाय उसके घर में ही न्यायिक आदेश के तहत रखा जा सकता है।

सर्वोच्च न्यायालय ने हाउस अरेस्ट को हिरासत के एक संभावित रूप के रूप में स्वीकार किया है और संकेत दिया है कि न्यायालय व्यक्ति की आयु, स्वास्थ्य, पूर्व आपराधिक रिकॉर्ड, आरोप की प्रकृति, अन्य प्रकार की हिरासत की आवश्यकता तथा हाउस अरेस्ट की शर्तों को लागू करने की व्यवहारिक संभावना जैसे कारकों पर विचार कर सकता है।

इससे न्यायालय द्वारा आदेशित हाउस अरेस्ट और पुलिस द्वारा एकतरफा नजरबंदी के बीच महत्वपूर्ण अंतर स्पष्ट होता है।

यदि सक्षम न्यायालय कानून के अनुसार हाउस अरेस्ट का आदेश देता है, तो वह न्यायिक निगरानी के अधीन होता है और उसके विरुद्ध उचित कानूनी उपाय उपलब्ध रहते हैं। इसके विपरीत, यदि पुलिस अधिकारी बिना पर्याप्त वैधानिक अधिकार या न्यायिक निगरानी के स्वयं तय कर लें कि किसी नागरिक को उसके घर से बाहर नहीं निकलने दिया जाएगा, तो संवैधानिक स्थिति पूरी तरह अलग होगी।

खड़क सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य का महत्व

पुलिस निगरानी और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से संबंधित सर्वोच्च न्यायालय के शुरुआती महत्वपूर्ण फैसलों में खड़क सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य प्रमुख है।

इस मामले में पुलिस निगरानी के अंतर्गत व्यक्ति के घर की गुप्त निगरानी तथा रात में उसके घर पर पुलिस की आवाजाही जैसे उपाय शामिल थे। सर्वोच्च न्यायालय ने इन कार्रवाइयों की जाँच संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 के संदर्भ में की।

यद्यपि फैसले में विभिन्न निगरानी प्रावधानों के संबंध में न्यायाधीशों के दृष्टिकोण में कुछ अंतर था, फिर भी इसका व्यापक संवैधानिक महत्व बना हुआ है। इसने यह स्पष्ट किया कि पुलिस की निगरानी और किसी व्यक्ति के निजी जीवन में हस्तक्षेप को संविधान से बाहर की गतिविधि नहीं माना जा सकता।

संवैधानिक लोकतंत्र में व्यक्ति के घर का विशेष महत्व है। घर वह निजी स्थान है जहाँ नागरिक सामान्यतः राज्य के निरंतर हस्तक्षेप से मुक्त होकर अपनी स्वतंत्रता का उपभोग करता है। इसलिए जब पुलिस किसी व्यक्ति के घर को घेरकर उसे बाहर जाने से रोकती है, तो मामला केवल सामान्य पुलिसिंग का नहीं रह जाता। यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता, निजता और नागरिक तथा राज्य के बीच संबंध का संवैधानिक प्रश्न बन जाता है।

जोगिंदर कुमार और गिरफ्तारी के अधिकार का सिद्धांत

सर्वोच्च न्यायालय का जोगिंदर कुमार बनाम उत्तर प्रदेश राज्य का फैसला भी इस संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि पुलिस के पास किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करने की शक्ति होना और उस शक्ति का प्रयोग करने का उचित कारण होना एक ही बात नहीं है।

यह शक्ति और उसके औचित्य” के बीच महत्वपूर्ण अंतर है।

पुलिस की शक्तियाँ समाज की सुरक्षा के लिए प्रदान की गई हैं, न कि नागरिकों पर असीमित नियंत्रण स्थापित करने के लिए। इसलिए प्रत्येक दमनकारी पुलिस कार्रवाई का वैध कानूनी और तथ्यात्मक आधार होना चाहिए।

निवारक कार्रवाई के मामलों में यह सिद्धांत और भी महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि वहाँ किसी व्यक्ति पर पहले से किए गए अपराध के बजाय भविष्य में संभावित कार्रवाई के आधार पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है।

राजनीतिक प्रदर्शन और असहमति की स्वतंत्रता

जब हाउस अरेस्ट किसी राजनीतिक कार्यकर्ता या प्रदर्शनकारी के मामले में किया जाता है, तब संवैधानिक प्रश्न और अधिक गंभीर हो जाता है।

शांतिपूर्ण राजनीतिक प्रदर्शन लोकतंत्र का आवश्यक अंग है। संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा अनुच्छेद 19(1)(b) शांतिपूर्ण और निरस्त्र सभा करने का अधिकार प्रदान करता है। इन अधिकारों पर संविधान द्वारा अनुमत उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।

राज्य को सार्वजनिक व्यवस्था, सुरक्षा और अन्य नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए प्रदर्शनों को नियंत्रित करने का अधिकार है। वह प्रदर्शन के स्थान, समय, मार्ग और भीड़-प्रबंधन के संबंध में उचित शर्तें निर्धारित कर सकता है। हिंसा या अन्य आपराधिक गतिविधियों के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई भी की जा सकती है।

लेकिन प्रदर्शन को नियंत्रित करने और राजनीतिक असहमति को ही रोक देने में मौलिक अंतर है।

यदि किसी नागरिक को केवल इसलिए घर में बंद कर दिया जाता है कि पुलिस को आशंका है कि वह शांतिपूर्ण प्रदर्शन में भाग लेगा, तो राज्य को इसके लिए कहीं अधिक ठोस कानूनी आधार प्रस्तुत करना होगा।

अन्यथा निवारक पुलिस कार्रवाई असहमति को दबाने का साधन बन सकती है।

अनौपचारिक या वास्तविक हाउस अरेस्ट की समस्या

व्यवहार में सबसे कठिन मामले वे हो सकते हैं जहाँ पुलिस कोई औपचारिक आदेश जारी ही नहीं करती।

पुलिसकर्मी किसी व्यक्ति के घर पहुँचकर कह सकते हैं:

आज आप घर से बाहर नहीं निकलेंगे।”

या पुलिस घर के बाहर तैनात हो सकती है, व्यक्ति के बाहर निकलने पर उसका पीछा कर सकती है अथवा उसे शारीरिक रूप से बाहर जाने से रोक सकती है।

इसके बाद पुलिस यह दावा कर सकती है कि व्यक्ति को गिरफ्तार नहीं किया गया था।

ऐसा अंतर कई परिस्थितियों में कृत्रिम हो सकता है।

यदि किसी व्यक्ति को वास्तव में उसके घर से बाहर निकलने से रोक दिया गया है, तो राज्य ने उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर गंभीर प्रतिबंध लगाया है। इसलिए संवैधानिक कानून को कार्रवाई के वास्तविक प्रभाव को देखना चाहिए, केवल पुलिस द्वारा इस्तेमाल किए गए शब्दों को नहीं।

ऐसी स्थिति में पुलिस को यह बताने में सक्षम होना चाहिए कि वह किस कानूनी अधिकार के तहत यह प्रतिबंध लगा रही है।

नागरिक यह पूछने का अधिकार रखता है:

  1. मुझे बाहर जाने से किस कानून के तहत रोका जा रहा है?
  2. क्या मुझे गिरफ्तार या हिरासत में लिया गया है?
  3. आदेश किसने जारी किया है?
  4. क्या कोई लिखित आदेश है?
  5. किस अपराध या खतरे का आरोप है?
  6. प्रतिबंध का तथ्यात्मक आधार क्या है?
  7. प्रतिबंध कितने समय तक चलेगा?
  8. इतनी कठोर कार्रवाई क्यों आवश्यक है?
  9. कम प्रतिबंधात्मक उपाय क्यों पर्याप्त नहीं होंगे?
  10. इस आदेश को चुनौती देने का कानूनी उपाय क्या है?

ये प्रश्न वैध पुलिस कार्रवाई में बाधा डालने के लिए नहीं, बल्कि संवैधानिक जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक हैं।

24 घंटे का नियम और न्यायिक निगरानी

संविधान का अनुच्छेद 22 गिरफ्तार व्यक्तियों को महत्वपूर्ण सुरक्षा प्रदान करता है। गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी के आधार की जानकारी दी जानी चाहिए और सामान्यतः उसे 24 घंटे के भीतर निकटतम मजिस्ट्रेट के सामने प्रस्तुत किया जाना चाहिए, यात्रा के लिए आवश्यक समय को छोड़कर।

BNSS में भी गिरफ्तारी और हिरासत से संबंधित सुरक्षा उपाय मौजूद हैं।

इन प्रावधानों का उद्देश्य मनमानी पुलिस हिरासत को रोकना है।

इसलिए पुलिस को केवल औपचारिक गिरफ्तारी की जगह अनौपचारिक नजरबंदी का रूप देकर संवैधानिक सुरक्षा उपायों से बचने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।

किसी कार्रवाई को “सुरक्षा”, “निवारक कार्रवाई”, “नजरबंदी” या किसी अन्य नाम से पुकारना अपने आप में उसकी संवैधानिक वैधता सुनिश्चित नहीं करता।

जब राज्य किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता को वास्तविक रूप से छीनता है, तो कानूनी आधार और संवैधानिक जवाबदेही दोनों आवश्यक होते हैं।

आनुपातिकता का सिद्धांत

आधुनिक संवैधानिक न्यायशास्त्र यह अपेक्षा करता है कि मौलिक अधिकारों पर प्रतिबंध केवल वैध उद्देश्य के आधार पर ही नहीं, बल्कि उस उद्देश्य के अनुपात में भी होना चाहिए।

मान लीजिए पुलिस को वास्तविक आशंका है कि किसी प्रदर्शन में हिंसा हो सकती है। तब कई उपाय उपलब्ध हो सकते हैं:

  • प्रदर्शन के स्थान को विनियमित करना;
  • उचित शर्तें निर्धारित करना;
  • पर्याप्त पुलिस बल तैनात करना;
  • कानून के अनुसार आयोजकों से आवश्यक आश्वासन लेना;
  • विशेष गैरकानूनी गतिविधियों पर रोक लगाना;
  • विशिष्ट व्यक्तियों के विरुद्ध प्रमाण होने पर कानूनी कार्रवाई करना।

किसी व्यक्ति को पूरी तरह उसके घर में बंद कर देना उपलब्ध सबसे कठोर उपायों में से एक है।

इसलिए राज्य को यह स्पष्ट करना चाहिए कि कम प्रतिबंधात्मक उपाय पर्याप्त क्यों नहीं हैं।

यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है जब किसी व्यक्ति को किसी सिद्ध अपराध के कारण नहीं, बल्कि उसकी संभावित राजनीतिक गतिविधि के आधार पर रोका जा रहा हो।

विपक्षी नेताओं और कार्यकर्ताओं की नजरबंदी

 

प्रदर्शन से पहले विपक्षी नेताओं, राजनीतिक कार्यकर्ताओं या आंदोलन के नेताओं को घर से बाहर निकलने से रोकने की प्रथा गंभीर लोकतांत्रिक चिंता पैदा करती है।

एक स्वस्थ संवैधानिक लोकतंत्र में पुलिस से राजनीतिक निष्पक्षता की अपेक्षा की जाती है। उसका दायित्व कानून लागू करना, सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखना और नागरिकों की सुरक्षा करना है—चाहे नागरिक के राजनीतिक विचार कुछ भी हों।

पुलिस को यह तय नहीं करना चाहिए कि कौन-सा राजनीतिक विचार व्यक्त किया जा सकता है, कौन-सा सरकार-विरोधी आंदोलन स्वीकार्य है या किन नागरिकों को शांतिपूर्ण राजनीतिक गतिविधि में भाग लेने से रोका जाना चाहिए।

यदि पुलिस कार्रवाई केवल विपक्षी दलों या सरकार की आलोचना करने वाले समूहों के विरुद्ध की जाती है, जबकि समान गतिविधियाँ करने वाले सरकार-समर्थक समूहों के प्रति अलग रवैया अपनाया जाता है, तो मामला केवल पुलिस की ज्यादती का नहीं रह जाता। यह कानून के समक्ष समानता और संवैधानिक शासन का प्रश्न बन जाता है।

संविधान का अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता और कानूनों के समान संरक्षण की गारंटी देता है। इसलिए पुलिस द्वारा चयनात्मक कार्रवाई गंभीर संवैधानिक प्रश्न पैदा कर सकती है।

औपनिवेशिक पुलिसिंग से संवैधानिक पुलिसिंग की ओर

इस समस्या को ऐतिहासिक संदर्भ में भी समझना आवश्यक है।

भारत ने ऐसी पुलिस व्यवस्था विरासत में प्राप्त की थी जिसका विकास मुख्यतः औपनिवेशिक शासन को बनाए रखने के लिए हुआ था। औपनिवेशिक पुलिस का प्रमुख उद्देश्य नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करने की अपेक्षा सरकारी सत्ता को बनाए रखना और राजनीतिक विरोध को नियंत्रित करना था।

स्वतंत्र भारत ने स्वतंत्रता, समानता, गरिमा और लोकतांत्रिक भागीदारी पर आधारित संविधान अपनाया। लेकिन पुरानी आदेश-आधारित और नियंत्रण-केंद्रित पुलिस संस्कृति की अनेक विशेषताएँ आज भी बनी हुई हैं।

अनौपचारिक निवारक हिरासत, अत्यधिक राजनीतिक हस्तक्षेप, वीआईपी पुलिसिंग और असहमति पर नियंत्रण इसी अधूरे परिवर्तन को दर्शाते हैं।

भारत को औपनिवेशिक पुलिसिंग से संवैधानिक पुलिसिंग की ओर वास्तविक संक्रमण की आवश्यकता है।

संवैधानिक पुलिसिंग का अर्थ है कि पुलिस नागरिक को मुख्यतः संभावित अपराधी या व्यवस्था के लिए खतरे के रूप में न देखे। नागरिक को संवैधानिक अधिकारों से संपन्न व्यक्ति माना जाए, जिसकी स्वतंत्रता की रक्षा करना स्वयं पुलिस का दायित्व है।

यदि पुलिस किसी व्यक्ति को घर में नजरबंद करे तो क्या करना चाहिए?

यदि पुलिस किसी व्यक्ति को बिना स्पष्ट कानूनी आधार के घर से बाहर निकलने से रोकने का प्रयास करती है, तो व्यक्ति को शारीरिक टकराव से बचते हुए तुरंत कानूनी सहायता लेनी चाहिए।

उसे यथासंभव:

  • पुलिस से प्रतिबंध का कानूनी आधार पूछना चाहिए;
  • किसी लिखित आदेश की प्रति माँगनी चाहिए;
  • पुलिस अधिकारियों के नाम और पद दर्ज करने चाहिए;
  • यह दर्ज करना चाहिए कि किस समय से आवाजाही प्रतिबंधित की गई;
  • सीसीटीवी फुटेज और अन्य साक्ष्य सुरक्षित रखने चाहिए;
  • परिवार और वकील को सूचित करना चाहिए;
  • उपयुक्त न्यायिक राहत के लिए तुरंत संपर्क करना चाहिए।

परिस्थितियों के अनुसार संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालय अथवा अनुच्छेद 32 के तहत सर्वोच्च न्यायालय में संवैधानिक उपचार उपलब्ध हो सकते हैं। उच्च न्यायालय यह जाँच सकता है कि कार्यपालिका या पुलिस की कार्रवाई मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती है या नहीं तथा प्रतिबंध का पर्याप्त कानूनी आधार है या नहीं।

इसलिए गैरकानूनी पुलिस प्रतिबंध का उचित उत्तर सामान्यतः शारीरिक प्रतिरोध नहीं, बल्कि कानूनी चुनौती और न्यायिक हस्तक्षेप है।

अंबेडकरवादी दृष्टिकोण

अंबेडकरवादी दृष्टिकोण से यह केवल पुलिस की तकनीकी शक्तियों का प्रश्न नहीं है।

डॉ. बी.आर. अंबेडकर संवैधानिक शासन को ऐसी व्यवस्था के रूप में देखते थे जिसमें स्वयं राज्य भी कानून के अधीन हो। राजनीतिक लोकतंत्र उस समय तक सुरक्षित नहीं रह सकता जब तक राज्य की दमनकारी शक्तियों को नागरिकों के विरुद्ध मनमाने ढंग से इस्तेमाल करने से रोका न जाए।

पुलिस के पास अत्यधिक बल-प्रयोग की शक्तियाँ हैं। वह गिरफ्तार कर सकती है, तलाशी ले सकती है, जाँच कर सकती है, सभाओं को नियंत्रित कर सकती है और परिस्थितियों में बल का प्रयोग कर सकती है। इसी कारण पुलिस शक्ति को संवैधानिक नैतिकता, कानून, जवाबदेही और समानता के अधीन रखना आवश्यक है।

ऐतिहासिक रूप से वंचित समुदायों के लिए यह प्रश्न और भी महत्वपूर्ण है। मनमानी पुलिस शक्तियों का प्रभाव दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों, मजदूरों, छात्रों और राजनीतिक रूप से हाशिए पर स्थित समूहों पर असमान रूप से पड़ सकता है।

इस प्रकार एक अधिनायकवादी पुलिस संस्कृति सामाजिक असमानता को स्वतंत्रता तक असमान पहुँच में बदल सकती है।

अंबेडकरवादी दृष्टिकोण से कानून का राज केवल कानूनों के अस्तित्व का नाम नहीं है। इसका अर्थ है कि शक्तिशाली और कमजोर, सरकार और उसके विरोधी, बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक—सभी पर कानून समान रूप से लागू हो।

निष्कर्ष

भारतीय पुलिस को गिरफ्तारी और निवारक कार्रवाई की महत्वपूर्ण शक्तियाँ प्राप्त हैं। हिंसा और गंभीर सार्वजनिक अव्यवस्था को रोकने के लिए लोकतांत्रिक राज्य के पास ऐसी शक्तियाँ होना आवश्यक है। लेकिन ये शक्तियाँ असीमित नहीं हैं।

भारतीय पुलिस के पास कोई ऐसी सामान्य और स्वतंत्र शक्ति नहीं है जिसके आधार पर कोई पुलिस अधिकारी केवल अपनी आशंका के कारण किसी नागरिक को घर में नजरबंद कर दे कि वह किसी प्रदर्शन या राजनीतिक कार्यक्रम में भाग ले सकता है।

हाउस अरेस्ट तब वैध हो सकता है जब उसे सक्षम न्यायालय द्वारा कानून के अनुसार आदेशित किया गया हो या वैध निवारक निरोध कानून के अंतर्गत उसका स्पष्ट आधार मौजूद हो और संवैधानिक सुरक्षा उपायों का पालन किया जाए। लेकिन स्पष्ट कानूनी अधिकार, पर्याप्त औचित्य, उचित प्रक्रिया और प्रभावी जवाबदेही के बिना पुलिस द्वारा अनौपचारिक रूप से किसी व्यक्ति को घर में बंद रखना गंभीर रूप से संवैधानिक रूप से संदिग्ध होगा।

मूल सिद्धांत सरल होना चाहिए:

पुलिस केवल कानून के अनुसार ही किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता सीमित कर सकती है। वह किसी प्रतिबंध को नया नाम देकर हिरासत का नया रूप पैदा नहीं कर सकती।

लोकतांत्रिक पुलिस व्यवस्था की वास्तविक कसौटी यह नहीं है कि पुलिस नागरिकों को प्रदर्शन करने से कितनी प्रभावी ढंग से रोक सकती है। वास्तविक कसौटी यह है कि वह सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखते हुए नागरिक की स्वतंत्रता, गरिमा, राजनीतिक भागीदारी और शांतिपूर्ण असहमति के संवैधानिक अधिकारों की कितनी प्रभावी ढंग से रक्षा करती है।

ऐसा लोकतंत्र जिसमें नागरिक केवल तब स्वतंत्र हों जब वे सरकार से सहमत हों, वास्तविक संवैधानिक लोकतंत्र नहीं हो सकता। कानून के राज की असली परीक्षा यही है कि राज्य उन लोगों के साथ कैसा व्यवहार करता है जो उसकी आलोचना करते हैं, उसका विरोध करते हैं या उससे जवाबदेही की माँग करते हैं।

यदि आप को हाउस एरेस्ट किया जाता है तो आप इस सम्बंध में थाने पर FIR दर्ज करा सकते हैं । यदि थाने पर FIR दर्ज नहीं होती तो आप SP से मिल सकते हैं l यदि फिर भी FIR दर्ज नहीं होती तो आप कोर्ट जा सकते हैंl अगर फिर भी FIR दर्ज नहीं होती तो हाई कोर्ट में रिट दायर कर सकते हैं l

 

 


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