शुक्रवार, 15 मई 2026

भारत में आसन्न आर्थिक संकट की प्रकृति और इसके संभावित प्रभाव

 

भारत में आसन्न आर्थिक संकट की प्रकृति और इसके संभावित प्रभाव

एस आर दारापुरी आई.पी.एस. (से.नि.)

प्रस्तावना

वर्तमान समय में भारत को विश्व की सबसे तेज़ी से विकसित होती हुई प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में गिना जाता है। सरकारी वक्तव्यों, कॉरपोरेट रिपोर्टों तथा अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं द्वारा भारत की उच्च जीडीपी वृद्धि दर, विस्तृत डिजिटल अर्थव्यवस्था, आधारभूत संरचना में बढ़ते निवेश तथा वैश्विक प्रभाव को निरंतर रेखांकित किया जाता है। भारत को एक उभरती हुई आर्थिक महाशक्ति के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, जो भविष्य में चीन के विकल्प के रूप में वैश्विक विनिर्माण और निवेश का केंद्र बन सकता है।

किन्तु इस आशावादी परिदृश्य के पीछे अनेक गहरे संरचनात्मक अंतर्विरोध विद्यमान हैं, जो एक गंभीर आर्थिक संकट के उभरने की ओर संकेत करते हैं। भारत में आने वाला आर्थिक संकट श्रीलंका या अर्जेंटीना जैसे देशों की तरह अचानक वित्तीय पतन का रूप शायद न ले, क्योंकि भारत के पास पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार, विविधीकृत अर्थव्यवस्था तथा अपेक्षाकृत स्थिर बैंकिंग प्रणाली मौजूद है। फिर भी देश एक दीर्घकालिक और जटिल संरचनात्मक संकट की ओर बढ़ रहा है, जिसकी प्रमुख विशेषताएँ हैं—बेरोज़गारी, कृषि संकट, क्रय-शक्ति में गिरावट, बढ़ती असमानता, श्रम का असंगठितीकरण तथा वित्तीय दबाव।

इस संकट का मूल विरोधाभास यह है कि एक ओर अर्थव्यवस्था उच्च वृद्धि दर प्रदर्शित कर रही है, जबकि दूसरी ओर समाज के बड़े हिस्से की आर्थिक स्थिति लगातार असुरक्षित होती जा रही है। इसलिए यह संकट केवल अस्थायी या चक्रीय नहीं, बल्कि भारत के विकास मॉडल में निहित गहरी संरचनात्मक समस्याओं का परिणाम है। यदि इन समस्याओं का समाधान नहीं किया गया, तो भारत आर्थिक अस्थिरता, सामाजिक तनाव तथा राजनीतिक ध्रुवीकरण के लंबे दौर में प्रवेश कर सकता है।

उभरते आर्थिक संकट की प्रकृति

रोजगारविहीन विकास

भारतीय अर्थव्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक “रोजगारविहीन विकास” (Jobless Growth) है। यद्यपि भारत निरंतर उच्च जीडीपी वृद्धि दर दर्ज कर रहा है, परंतु इसके अनुरूप रोजगार सृजन नहीं हो रहा। आर्थिक विकास बड़ी संख्या में सुरक्षित और उत्पादक नौकरियाँ उत्पन्न करने में विफल रहा है, विशेषकर युवाओं के लिए।

भारत की विशाल श्रमशक्ति का अधिकांश भाग आज भी असंगठित क्षेत्र में कार्यरत है, जहाँ वेतन कम, रोजगार असुरक्षित तथा सामाजिक सुरक्षा का अभाव है। शिक्षित युवा भी बेरोज़गारी और अल्परोज़गारी की समस्या से जूझ रहे हैं। लाखों लोग अपनी योग्यता से असंबद्ध अस्थायी, संविदात्मक या कम वेतन वाली नौकरियाँ करने को विवश हैं।

डिजिटल प्लेटफॉर्म आधारित “गिग अर्थव्यवस्था” ने श्रम की अस्थिरता को और बढ़ा दिया है। इससे आर्थिक विकास और रोजगार के बीच गंभीर असंतुलन उत्पन्न हो गया है। यदि बढ़ती आकांक्षाओं वाले युवाओं को पर्याप्त अवसर नहीं मिलते, तो यह सामाजिक और राजनीतिक अस्थिरता का कारण बन सकता है।

मांग और क्रय-शक्ति का संकट

भारतीय अर्थव्यवस्था की दूसरी बड़ी समस्या घरेलू मांग का कमजोर होना है। किसी भी अर्थव्यवस्था का सतत विकास तभी संभव है, जब आम जनता की क्रय-शक्ति बढ़े। किंतु भारत में महँगाई, स्थिर वेतन, बेरोज़गारी तथा जीवन-यापन की बढ़ती लागत ने जनता की उपभोग क्षमता को कमजोर कर दिया है।

खाद्य पदार्थों, ईंधन, आवास, स्वास्थ्य, शिक्षा तथा परिवहन की लागत में तीव्र वृद्धि हुई है। इसके विपरीत मजदूरी और वेतन वृद्धि महँगाई की दर के अनुरूप नहीं हुई। ग्रामीण आय विशेष रूप से दबाव में है। परिणामस्वरूप बड़ी आबादी बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए संघर्ष कर रही है।

यह स्थिति एक दुष्चक्र को जन्म देती है। जब आम लोग कम खर्च करते हैं, तो उद्योगों की मांग घटती है। मांग घटने पर निवेश और रोजगार सृजन में कमी आती है, जिससे क्रय-शक्ति और अधिक कमजोर हो जाती है। इस प्रकार मांग का संकट आर्थिक मंदी का कारण भी बनता है और परिणाम भी।

कृषि संकट और ग्रामीण संकट

भारतीय कृषि क्षेत्र आज भी अर्थव्यवस्था का सबसे कमजोर पक्ष बना हुआ है। यद्यपि बड़ी आबादी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कृषि पर निर्भर है, फिर भी राष्ट्रीय आय में कृषि का योगदान लगातार घट रहा है। किसान कम लाभ, बढ़ते कर्ज, छोटी जोतों, जलवायु परिवर्तन और बाजार की अनिश्चितताओं से जूझ रहे हैं।

बीज, खाद, बिजली, सिंचाई और डीज़ल जैसी कृषि लागतों में निरंतर वृद्धि हुई है, जबकि किसानों को अपनी उपज का उचित मूल्य नहीं मिल पाता। जलवायु परिवर्तन ने सूखा, बाढ़, अनियमित मानसून और अत्यधिक तापमान जैसी समस्याओं को बढ़ा दिया है।

ग्रामीण संकट का व्यापक प्रभाव संपूर्ण अर्थव्यवस्था पर पड़ता है, क्योंकि ग्रामीण आय में गिरावट से उपभोग मांग घटती है और शहरों की ओर पलायन बढ़ता है। हाल के किसान आंदोलनों ने इस असंतोष की गहराई को स्पष्ट कर दिया है।

बाहरी निर्भरता और वैश्विक आर्थिक दबाव

भारतीय अर्थव्यवस्था वैश्विक आर्थिक परिवर्तनों और बाहरी झटकों के प्रति भी संवेदनशील है। भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए बड़े पैमाने पर आयातित कच्चे तेल पर निर्भर है। अतः अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों में वृद्धि सीधे महँगाई, परिवहन लागत और वित्तीय दबाव को बढ़ाती है।

पश्चिम एशिया में युद्ध या वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में व्यवधान भारत की अर्थव्यवस्था को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकते हैं। तेल कीमतों में वृद्धि व्यापार घाटे और रुपये पर दबाव को बढ़ाती है। मुद्रा का अवमूल्यन आयात को महँगा बनाता है और महँगाई को और तीव्र करता है।

वैश्विक मंदी भारतीय निर्यात, विदेशी निवेश तथा सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र को भी प्रभावित कर सकती है। चूँकि भारत अब वैश्विक पूँजीवादी अर्थव्यवस्था से गहराई से जुड़ चुका है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय संकटों का प्रभाव देश के भीतर तेजी से महसूस किया जाता है।

राजकोषीय संकट और सार्वजनिक ऋण

केंद्र और राज्य सरकारें दोनों ही बढ़ते वित्तीय दबाव का सामना कर रही हैं। आधारभूत संरचना परियोजनाओं, कल्याणकारी योजनाओं, सब्सिडी, रक्षा व्यय और ऋण भुगतान के कारण सरकारी खर्च बढ़ रहा है। दूसरी ओर बेरोज़गारी और धीमी आय वृद्धि के कारण कर-संग्रह अपेक्षित गति से नहीं बढ़ पा रहा।

कोविड-19 महामारी के बाद यह संकट और गहरा गया। महामारी के दौरान सरकारों को राहत और कल्याणकारी खर्च बढ़ाना पड़ा, जबकि आर्थिक गतिविधियाँ धीमी पड़ गईं। कई राज्य सरकारें आज भारी ऋण बोझ और सीमित वित्तीय क्षमता से जूझ रही हैं।

कॉरपोरेट क्षेत्र को दी गई कर छूटों और प्रोत्साहनों ने भी राजकोषीय दबाव बढ़ाया है। आलोचकों का मत है कि कॉरपोरेट लाभ बढ़ने के बावजूद रोजगार और मजदूरी में अपेक्षित वृद्धि नहीं हुई।

बढ़ती आर्थिक असमानता

भारतीय अर्थव्यवस्था की वर्तमान दिशा की सबसे गंभीर विशेषता तीव्र होती आर्थिक असमानता है। आर्थिक विकास का लाभ मुख्यतः बड़े कॉरपोरेट समूहों, वित्तीय पूँजी और उच्च आय वर्गों तक सीमित रहा है, जबकि विशाल श्रमिक वर्ग आर्थिक असुरक्षा का सामना कर रहा है।

एक छोटा सा वर्ग राष्ट्रीय संपत्ति के बड़े हिस्से पर नियंत्रण रखता है, जबकि करोड़ों लोग बेरोज़गारी, कम आय, कुपोषण, खराब स्वास्थ्य सेवाओं और निम्न शिक्षा स्तर जैसी समस्याओं से ग्रस्त हैं। क्षेत्रीय असमानताएँ भी बढ़ रही हैं।

अत्यधिक असमानता सामाजिक एकता और लोकतांत्रिक स्थिरता को कमजोर करती है। जब विकास का लाभ समाज के अधिकांश हिस्से तक नहीं पहुँचता, तो जनता का लोकतांत्रिक संस्थाओं पर विश्वास कमजोर होने लगता है।

संकट के संरचनात्मक कारण

कमजोर विनिर्माण आधार

भारत चीन, दक्षिण कोरिया या वियतनाम की तरह श्रम-प्रधान औद्योगिकीकरण विकसित नहीं कर पाया। विनिर्माण क्षेत्र पर्याप्त रोजगार उत्पन्न करने में विफल रहा है। अर्थव्यवस्था अत्यधिक सेवा-क्षेत्र पर निर्भर हो गई है, जबकि उच्च कौशल आधारित सेवाओं तक बड़ी आबादी की पहुँच नहीं है।

श्रम का असंगठितीकरण

भारत की अधिकांश श्रमशक्ति असंगठित क्षेत्र में कार्यरत है। श्रमिकों के पास नौकरी की सुरक्षा, सामाजिक सुरक्षा, पेंशन, स्वास्थ्य सुविधाएँ तथा सामूहिक सौदेबाजी का अधिकार नहीं है। इससे मजदूरी दबती है और आर्थिक स्थिरता कमजोर होती है।

नीतिगत झटके और आर्थिक कुप्रबंधन

नोटबंदी ने असंगठित क्षेत्र, छोटे व्यापारों और दिहाड़ी मजदूरों को गंभीर रूप से प्रभावित किया। इसी प्रकार वस्तु एवं सेवा कर (GST) के प्रारंभिक क्रियान्वयन ने छोटे और मध्यम उद्योगों को कठिनाइयों में डाल दिया। कोविड-19 लॉकडाउन ने बेरोज़गारी और गरीबी को और बढ़ाया।

कॉरपोरेट केंद्रीकरण और वित्तीयकरण

आर्थिक उदारीकरण के बाद कुछ बड़े कॉरपोरेट समूहों के हाथों में आर्थिक शक्ति का केंद्रीकरण बढ़ा है। छोटे उद्योग पूँजी, ऋण और बाजार प्रतिस्पर्धा में पिछड़ते जा रहे हैं। अर्थव्यवस्था में वित्तीय सट्टेबाज़ी का महत्व बढ़ा है, जबकि रोजगार सृजनकारी निवेश अपेक्षाकृत कम हुआ है।

संकट का संभावित प्रभाव

बढ़ती बेरोज़गारी और सामाजिक असंतोष

युवा बेरोज़गारी भारत की सबसे विस्फोटक समस्या बन सकती है। शिक्षित बेरोज़गारी सामाजिक निराशा और असंतोष को जन्म देती है। यदि आकांक्षाएँ बढ़ती रहें और अवसर सीमित रहें, तो सामाजिक तनाव और राजनीतिक अस्थिरता बढ़ सकती है।

अस्थायी और असुरक्षित रोजगार का विस्तार

भविष्य में रोजगार बढ़ने पर भी अधिकांश नौकरियाँ अस्थायी, संविदात्मक और कम वेतन वाली हो सकती हैं। इससे मध्यवर्गीय स्थिरता कमजोर होगी और व्यापक आर्थिक असुरक्षा पैदा होगी।

महँगाई और जीवन स्तर में गिरावट

खाद्य पदार्थों, ईंधन और आवश्यक सेवाओं की बढ़ती कीमतें आम जनता की वास्तविक आय को कम करेंगी। गरीब और निम्न मध्यवर्ग सबसे अधिक प्रभावित होंगे।

राजनीतिक ध्रुवीकरण और अधिनायकवादी प्रवृत्तियाँ

आर्थिक संकट अक्सर पहचान-आधारित राजनीति, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और केंद्रीकृत सत्ता को बढ़ावा देता है। आर्थिक असंतोष को सामाजिक संघर्षों की ओर मोड़ा जा सकता है, जिससे लोकतांत्रिक संस्थाएँ कमजोर पड़ सकती हैं।

संघीय ढाँचे पर दबाव

राज्यों और केंद्र के बीच कर-वितरण, ऋण लेने की सीमाओं तथा कल्याणकारी व्यय को लेकर तनाव बढ़ सकता है। आर्थिक रूप से कमजोर राज्य अधिक गंभीर संकट का सामना करेंगे।

उपसंहार

भारत में उभरता हुआ आर्थिक संकट मूलतः असमान और बहिष्कारी विकास मॉडल का परिणाम है। उच्च जीडीपी वृद्धि और कॉरपोरेट लाभ के बावजूद अर्थव्यवस्था की बुनियादी समस्याएँ—बेरोज़गारी, कृषि संकट, कमजोर क्रय-शक्ति, श्रम असुरक्षा और बढ़ती असमानता—लगातार गहराती जा रही हैं।

भारत के पास विशाल घरेलू बाजार, विदेशी मुद्रा भंडार, तकनीकी क्षमता तथा विविधीकृत अर्थव्यवस्था जैसी महत्वपूर्ण शक्तियाँ मौजूद हैं। इसलिए तत्काल आर्थिक पतन की संभावना कम है। किंतु यदि आर्थिक विकास रोजगार, सामाजिक न्याय और जनकल्याण से कटकर चलता रहा, तो दीर्घकालिक स्थिरता संभव नहीं होगी।

भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल आर्थिक वृद्धि प्राप्त करना नहीं, बल्कि ऐसी समावेशी और न्यायपूर्ण विकास व्यवस्था स्थापित करना है, जो रोजगार सृजन करे, ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाए, श्रमिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करे और आर्थिक असमानता को कम करे।

यदि ऐसा नहीं हुआ, तो भारत “उच्च-वृद्धि अस्थिरता” (High-Growth Instability) के उस दौर में प्रवेश कर सकता है, जहाँ आर्थिक विकास के साथ-साथ सामाजिक संकट और राजनीतिक तनाव भी निरंतर बढ़ते रहेंगे।

 

मंगलवार, 12 मई 2026

भारत के वर्तमान आर्थिक संकट के लिए मोदी सरकार कितनी जिम्मेदार है?

 

भारत के वर्तमान आर्थिक संकट के लिए मोदी सरकार कितनी जिम्मेदार है?

एस आर दारापुरी आई.पी.एस.(से.नि.)

प्रस्तावना

हाल के वर्षों में भारतीय अर्थव्यवस्था अनेक गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही है। आर्थिक विकास की धीमी गति, बढ़ती बेरोज़गारी, महँगाई, उपभोग मांग में गिरावट, कृषि संकट तथा बढ़ती आर्थिक असमानता ने देश की आर्थिक स्थिति को चिंताजनक बना दिया है। यद्यपि भारत को अभी भी विश्व की सबसे तेज़ी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में गिना जाता है, फिर भी इस विकास की गुणवत्ता, स्थायित्व और समावेशिता को लेकर गंभीर प्रश्न उठ रहे हैं। हाल ही में सरकार द्वारा “मितव्ययिता” अथवा “सादगी” अपनाने की अपील ने इस बहस को और तीव्र कर दिया है कि वर्तमान आर्थिक संकट के लिए सरकार स्वयं कितनी जिम्मेदार है।

यह प्रश्न कि Narendra Modi की सरकार वर्तमान आर्थिक संकट के लिए कितनी उत्तरदायी है, अत्यंत जटिल और विवादास्पद है। किसी भी आर्थिक संकट के पीछे केवल एक कारण नहीं होता। वैश्विक महामारी, अंतरराष्ट्रीय युद्ध, व्यापारिक अस्थिरता और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों जैसी अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों ने भी भारत की अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया है। किंतु अनेक अर्थशास्त्रियों और राजनीतिक विश्लेषकों का मत है कि 2014 के बाद मोदी सरकार द्वारा अपनाई गई कई नीतियों ने भारतीय अर्थव्यवस्था की संरचनात्मक कमजोरियों को और अधिक गहरा कर दिया।

यह निबंध इसी प्रश्न का आलोचनात्मक विश्लेषण करता है कि वर्तमान आर्थिक संकट के लिए मोदी सरकार कितनी जिम्मेदार है। इसमें यह तर्क प्रस्तुत किया गया है कि यद्यपि वैश्विक परिस्थितियों की भूमिका महत्वपूर्ण रही है, फिर भी नोटबंदी, जीएसटी के दोषपूर्ण क्रियान्वयन, बढ़ती आर्थिक असमानता, रोजगार सृजन में विफलता, अप्रत्यक्ष करों पर अत्यधिक निर्भरता तथा आर्थिक निर्णयों के केंद्रीकरण जैसी नीतियों ने संकट को और गंभीर बना दिया है।

वैश्विक परिस्थितियाँ और बाहरी कारण

भारत की वर्तमान आर्थिक स्थिति का निष्पक्ष मूल्यांकन करने के लिए यह स्वीकार करना आवश्यक है कि विश्व अर्थव्यवस्था स्वयं लंबे समय से संकटग्रस्त रही है। कोविड-19 महामारी ने उत्पादन, व्यापार, रोजगार और आपूर्ति शृंखलाओं को गंभीर रूप से प्रभावित किया। लगभग सभी प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं को मंदी और महँगाई का सामना करना पड़ा।

इसके अतिरिक्त रूस–यूक्रेन युद्ध तथा पश्चिम एशिया में जारी तनाव ने ऊर्जा और खाद्यान्न कीमतों को बढ़ा दिया। भारत अपनी आवश्यकताओं का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों में वृद्धि का सीधा प्रभाव भारत के व्यापार घाटे, महँगाई और राजकोषीय स्थिति पर पड़ता है।

अतः यह कहना उचित नहीं होगा कि भारत की सभी आर्थिक समस्याएँ केवल मोदी सरकार की नीतियों का परिणाम हैं। वैश्विक परिस्थितियों ने भी गंभीर दबाव उत्पन्न किए हैं। किंतु मुख्य प्रश्न यह है कि क्या सरकार की नीतियों ने भारत की आर्थिक क्षमता को मजबूत किया या उसे और अधिक कमजोर बना दिया।

नोटबंदी और असंगठित क्षेत्र का विनाश

मोदी सरकार का सबसे विवादास्पद आर्थिक निर्णय 2016 की नोटबंदी थी। नवंबर 2016 में सरकार ने अचानक ₹500 और ₹1000 के नोटों को अमान्य घोषित कर दिया, जो उस समय प्रचलित मुद्रा का लगभग 86 प्रतिशत थे।

सरकार ने इसके उद्देश्य बताए:

  • काले धन का उन्मूलन,
  • नकली मुद्रा पर रोक,
  • भ्रष्टाचार समाप्त करना,
  • तथा डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देना।

किन्तु इस निर्णय ने भारतीय अर्थव्यवस्था, विशेषकर असंगठित क्षेत्र, को गंभीर रूप से प्रभावित किया। भारत की विशाल आबादी नकद लेन-देन पर निर्भर थी। छोटे व्यापारी, किसान, मजदूर, कुटीर उद्योग और दैनिक श्रमिक अचानक नकदी संकट में फँस गए।

परिणामस्वरूप:

  • छोटे उद्योग बंद हुए,
  • रोजगार घटा,
  • ग्रामीण बाजार कमजोर पड़े,
  • और उपभोग मांग में गिरावट आई।

निर्माण, खुदरा व्यापार, परिवहन और छोटे उद्योगों को विशेष नुकसान हुआ। बाद में Reserve Bank of India की रिपोर्ट में यह सामने आया कि लगभग पूरी मुद्रा बैंकिंग प्रणाली में वापस लौट आई। इससे यह प्रश्न उठा कि यदि अधिकांश धन वापस आ गया, तो काला धन समाप्त करने का उद्देश्य कहाँ तक सफल हुआ।

अनेक अर्थशास्त्रियों ने नोटबंदी को आर्थिक दृष्टि से अविवेकपूर्ण बताया क्योंकि इससे भारी सामाजिक और आर्थिक नुकसान हुआ, जबकि घोषित उद्देश्यों की प्राप्ति नहीं हो सकी।

जीएसटी के क्रियान्वयन की समस्याएँ

2017 में वस्तु एवं सेवा कर (GST) लागू किया गया। सिद्धांततः इसका उद्देश्य देश में एक समान कर प्रणाली स्थापित करना था। परंतु इसके क्रियान्वयन में अनेक गंभीर समस्याएँ सामने आईं।

मुख्य समस्याएँ थीं:

  • अनेक कर दरें,
  • बार-बार नियमों में परिवर्तन,
  • तकनीकी कठिनाइयाँ,
  • जटिल ऑनलाइन प्रक्रियाएँ,
  • तथा छोटे व्यापारियों पर अनुपालन का बोझ।

विशेष रूप से लघु एवं मध्यम उद्योगों (SMEs) को भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। कई छोटे व्यापारी डिजिटल प्रणाली और लेखांकन व्यवस्था के लिए तैयार नहीं थे।

हालाँकि समय के साथ जीएसटी संग्रह में वृद्धि हुई, लेकिन प्रारंभिक वर्षों में इसने व्यापारिक गतिविधियों को गंभीर रूप से प्रभावित किया। आलोचकों का मत है कि जीएसटी ने राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता को भी कमजोर किया और आर्थिक शक्ति का केंद्रीकरण बढ़ाया।

नोटबंदी और जीएसटी के संयुक्त प्रभाव ने असंगठित क्षेत्र को भारी नुकसान पहुँचाया, जो भारत में रोजगार का सबसे बड़ा स्रोत है।

बेरोज़गारी का संकट

मोदी सरकार के दौर में बेरोज़गारी सबसे गंभीर आर्थिक समस्याओं में से एक बनकर उभरी है। यद्यपि कुछ वर्षों में GDP वृद्धि दर ऊँची रही, फिर भी रोजगार सृजन पर्याप्त नहीं हो सका। इसलिए कई अर्थशास्त्री इसे “रोजगार-विहीन विकास” (Jobless Growth) कहते हैं।

विशेष रूप से युवाओं में बेरोज़गारी चिंताजनक स्तर तक पहुँच गई है। शिक्षित युवाओं, इंजीनियरों और स्नातकों को भी स्थायी रोजगार नहीं मिल पा रहा।

सरकार ने “मेक इन इंडिया” जैसी योजनाएँ शुरू कीं, जिनका उद्देश्य विनिर्माण क्षेत्र का विस्तार और रोजगार सृजन था। किंतु विनिर्माण क्षेत्र अपेक्षित स्तर पर विकसित नहीं हो सका।

आलोचकों का मत है कि सरकार ने:

  • बड़े कॉरपोरेट निवेश,
  • आधारभूत संरचना परियोजनाओं,
  • और पूँजी-प्रधान विकास

पर अत्यधिक ध्यान दिया, जबकि श्रम-प्रधान उद्योगों और व्यापक रोजगार सृजन की उपेक्षा की गई।

बेरोज़गारी केवल आर्थिक समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक अस्थिरता और लोकतांत्रिक असंतोष का भी कारण बनती है।

बढ़ती आर्थिक असमानता

मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों की सबसे बड़ी आलोचनाओं में से एक बढ़ती आर्थिक असमानता है। पिछले दशक में भारत में संपत्ति और आय का केंद्रीकरण तेजी से बढ़ा है।

Oxfam International तथा World Inequality Lab जैसी संस्थाओं की रिपोर्टों ने यह दिखाया है कि आर्थिक विकास का लाभ मुख्यतः धनी वर्गों और बड़े कॉरपोरेट समूहों को मिला है।

इसके पीछे कई कारण बताए जाते हैं:

  • कॉरपोरेट करों में कमी,
  • निजीकरण,
  • अप्रत्यक्ष करों पर निर्भरता,
  • तथा कल्याणकारी व्यय में अपेक्षित वृद्धि का अभाव

दूसरी ओर आम जनता को:

  • महँगाई,
  • कम वेतन,
  • स्वास्थ्य और शिक्षा की बढ़ती लागत,
  • तथा रोजगार असुरक्षा

का सामना करना पड़ा।

अर्थशास्त्रियों का मानना है कि अत्यधिक असमानता दीर्घकालीन आर्थिक विकास को भी कमजोर करती है क्योंकि इससे व्यापक जनसंख्या की क्रय शक्ति घटती है।

अप्रत्यक्ष करों पर अत्यधिक निर्भरता

मोदी सरकार ने राजस्व बढ़ाने के लिए GST और पेट्रोल-डीजल पर करों जैसे अप्रत्यक्ष करों पर अत्यधिक निर्भरता दिखाई। अप्रत्यक्ष करों का बोझ गरीब और अमीर दोनों पर समान रूप से पड़ता है।

क्योंकि गरीब लोग अपनी आय का बड़ा हिस्सा उपभोग पर खर्च करते हैं, इसलिए अप्रत्यक्ष कर उनके लिए अधिक बोझिल सिद्ध होते हैं।

विशेष रूप से पेट्रोल और डीज़ल पर उच्च उत्पाद शुल्क ने:

  • महँगाई,
  • परिवहन लागत,
  • कृषि लागत,
  • तथा आवश्यक वस्तुओं की कीमतों

को बढ़ाया।

इसका प्रत्यक्ष प्रभाव आम नागरिकों के जीवन स्तर पर पड़ा।

उपभोग मांग में गिरावट

भारतीय अर्थव्यवस्था की एक गंभीर समस्या घरेलू उपभोग मांग में कमी है। जब लोगों की आय घटती है या महँगाई बढ़ती है, तब वे खर्च कम करते हैं। इससे उद्योगों की बिक्री घटती है और निवेश भी कम हो जाता है।

हाल के वर्षों में:

  • ग्रामीण मांग कमजोर हुई,
  • वास्तविक मजदूरी स्थिर रही,
  • घरेलू बचत में कमी आई,
  • तथा घरेलू ऋण बढ़ा।

अनेक अर्थशास्त्रियों ने चेतावनी दी है कि केवल आधारभूत संरचना निर्माण से अर्थव्यवस्था को स्थायी गति नहीं मिल सकती, जब तक आम जनता की क्रय शक्ति नहीं बढ़े।

आर्थिक निर्णयों का केंद्रीकरण

मोदी सरकार पर यह आरोप भी लगाया जाता है कि आर्थिक निर्णय लेने की प्रक्रिया अत्यधिक केंद्रीकृत हो गई है। कई महत्वपूर्ण आर्थिक निर्णय प्रधानमंत्री कार्यालय के स्तर पर केंद्रित दिखाई दिए।

आलोचकों का मत है कि इससे:

  • संस्थागत स्वायत्तता कमजोर हुई,
  • स्वतंत्र आर्थिक बहस घटी,
  • तथा नीति निर्माण में विविध विचारों की भूमिका कम हुई।

बेरोज़गारी के आँकड़ों, GDP की गणना तथा सरकारी आँकड़ों की पारदर्शिता को लेकर भी प्रश्न उठे।

सरकार का पक्ष

मोदी सरकार के समर्थक इन आलोचनाओं को पूरी तरह स्वीकार नहीं करते। उनका तर्क है कि कठिन वैश्विक परिस्थितियों के बावजूद भारत विश्व की सबसे तेज़ी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में बना हुआ है।

वे निम्न उपलब्धियों की ओर संकेत करते हैं:

  • आधारभूत संरचना का विस्तार,
  • डिजिटल भुगतान प्रणाली (UPI) की सफलता,
  • प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण,
  • कर अनुपालन में वृद्धि,
  • तथा भारत की वैश्विक आर्थिक प्रतिष्ठा में वृद्धि।

सरकार का यह भी दावा है कि GST और डिजिटलीकरण जैसे सुधार दीर्घकालिक संरचनात्मक परिवर्तन हैं, जिनके सकारात्मक परिणाम धीरे-धीरे सामने आएँगे।

निष्कर्ष

भारत की वर्तमान आर्थिक समस्याएँ केवल वैश्विक परिस्थितियों का परिणाम नहीं हैं, बल्कि घरेलू नीतिगत निर्णयों से भी गहराई से जुड़ी हुई हैं। महामारी, युद्ध, तेल कीमतों में वृद्धि और वैश्विक मंदी जैसे बाहरी कारणों ने अवश्य दबाव पैदा किया, किंतु मोदी सरकार की कई नीतियों ने इन संकटों को और गंभीर बना दिया।

नोटबंदी ने असंगठित क्षेत्र को कमजोर किया, GST के दोषपूर्ण क्रियान्वयन ने छोटे व्यापारों को प्रभावित किया, बेरोज़गारी लगातार बढ़ी, आर्थिक असमानता गहरी हुई तथा अप्रत्यक्ष करों के बोझ ने आम जनता की क्रय शक्ति को कमजोर किया।

यद्यपि सरकार ने आधारभूत संरचना, डिजिटल तकनीक और प्रशासनिक क्षमता में कुछ उल्लेखनीय उपलब्धियाँ हासिल की हैं, फिर भी वह रोजगार, ग्रामीण संकट, असमानता और व्यापक जनकल्याण जैसे मूलभूत प्रश्नों का संतोषजनक समाधान नहीं कर सकी।

अतः यह कहा जा सकता है कि वर्तमान आर्थिक संकट के लिए मोदी सरकार अकेले जिम्मेदार नहीं है, किंतु उसकी नीतियाँ इस संकट को गहरा करने और भारतीय अर्थव्यवस्था की संरचनात्मक कमजोरियों को बढ़ाने के लिए काफी हद तक उत्तरदायी रही हैं।

भारत के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती केवल आर्थिक विकास प्राप्त करना नहीं, बल्कि ऐसा विकास सुनिश्चित करना है जो न्यायपूर्ण, रोजगारोन्मुख, लोकतांत्रिक और समाज के व्यापक वर्गों के हित में हो।

भारत में आसन्न आर्थिक संकट की प्रकृति और इसके संभावित प्रभाव

  भारत में आसन्न आर्थिक संकट की प्रकृति और इसके संभावित प्रभाव एस आर दारापुरी आई.पी.एस. (से.नि.) प्रस्तावना वर्तमान समय में भारत को ...