शनिवार, 30 मई 2026

दलित पैंथर्स : इतिहास, भूमिका और दलितों पर प्रभाव

 

दलित पैंथर्स : इतिहास, भूमिका और दलितों पर प्रभाव

एस आर दारापुरी आई.पी.एस. (से.नि.)

The Black Panther Party: A Graphic Novel History by David F. Walker ...

(स्थापना दिवस 29 मई,1972 पर विशेष)

दलित पैंथर्स आधुनिक भारत के इतिहास में बीसवीं शताब्दी के सबसे क्रांतिकारी और प्रभावशाली जाति-विरोधी आंदोलनों में से एक थे। 1972 में महाराष्ट्र में उभरे इस आंदोलन ने दलित राजनीति, सामाजिक चेतना, साहित्य और जातिगत उत्पीड़न के विरुद्ध संघर्ष को एक नई दिशा प्रदान की। डॉ. भीमराव अम्बेडकर के क्रांतिकारी विचारों से प्रेरित तथा अमेरिका के ब्लैक पैंथर आंदोलन से प्रभावित दलित पैंथर्स ने भारत में सामाजिक न्याय की राजनीति की भाषा को बदल दिया। यद्यपि संगठन के रूप में यह आंदोलन कुछ वर्षों में कमजोर पड़ गया, फिर भी इसका वैचारिक और सांस्कृतिक प्रभाव आज भी भारतीय समाज और दलित समुदाय पर गहराई से विद्यमान है।

दलित पैंथर्स की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद की सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों में निहित थी। संविधान द्वारा समानता की गारंटी तथा अस्पृश्यता उन्मूलन के बावजूद दलितों के विरुद्ध भेदभाव और हिंसा जारी रही। डॉ. अम्बेडकर के नेतृत्व और संविधान से उत्पन्न आशाओं का स्थान धीरे-धीरे दलितों, विशेषकर शिक्षित युवाओं, में निराशा और असंतोष ने ले लिया। 1956 में डॉ. अम्बेडकर की मृत्यु के बाद रिपब्लिकन आंदोलन विखंडित और कमजोर हो गया। अनेक दलितों को यह महसूस होने लगा कि मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियाँ केवल वोट के लिए उनका उपयोग कर रही हैं, जबकि उनकी सामाजिक अपमान, आर्थिक शोषण और हिंसा की मूल समस्याएँ अनसुलझी बनी हुई हैं।

1960 और 1970 के दशक के दौरान महाराष्ट्र में दलितों पर अत्याचार की अनेक घटनाएँ सामने आईं। दूसरी ओर शहरीकरण, बेरोजगारी और गरीबी ने मुंबई जैसे नगरों में रहने वाले शिक्षित दलित युवाओं में गहरा आक्रोश पैदा कर दिया। इसी पृष्ठभूमि में नामदेव ढसाल, जे. वी. पवार, राजा ढाले तथा अन्य युवा लेखकों और कार्यकर्ताओं ने 29 मई, 1972 में दलित पैंथर्स की स्थापना की। ऐडवोकेट विमालसूर्य चिमनकर भी दलित पैन्थर्स के प्रसिद्ध नेता थे।  “पैंथर्स” नाम अमेरिका के ब्लैक पैंथर आंदोलन से प्रेरित था, जिसने अश्वेतों पर नस्लीय उत्पीड़न के विरुद्ध संघर्ष किया था। उसी प्रकार दलित पैंथर्स ने जातिगत उत्पीड़न का मुकाबला करने और दलितों की गरिमा की रक्षा के लिए संघर्ष का मार्ग अपनाया।

दलित पैंथर्स की विचारधारा का मूल आधार अम्बेडकरवाद था। वे समानता, मानव गरिमा, जाति उन्मूलन और सामाजिक परिवर्तन में विश्वास करते थे। साथ ही यह आंदोलन मार्क्सवाद, समाजवाद और अश्वेत मुक्ति आंदोलनों से भी प्रभावित था। पूर्ववर्ती दलित संगठनों की तुलना में, जो मुख्यतः संवैधानिक उपायों और चुनावी राजनीति पर निर्भर थे, दलित पैंथर्स ने अधिक आक्रामक और संघर्षशील शैली अपनाई। उनका मानना था कि जातिगत उत्पीड़न केवल सामाजिक समस्या नहीं, बल्कि आर्थिक शोषण और सांस्कृतिक वर्चस्व से जुड़ी एक संरचनात्मक व्यवस्था है।

दलित पैंथर्स का एक अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान “दलित” शब्द के अर्थ का विस्तार करना था। 1973 के उनके प्रसिद्ध घोषणापत्र में दलित की परिभाषा में अनुसूचित जातियाँ, अनुसूचित जनजातियाँ, नव-बौद्ध, भूमिहीन मजदूर, गरीब किसान, महिलाएँ तथा सभी सामाजिक और आर्थिक रूप से शोषित वर्गों को शामिल किया गया। इस प्रकार “दलित” केवल एक जातिगत पहचान न रहकर समस्त उत्पीड़ित समुदायों की राजनीतिक पहचान बन गया। इस व्यापक दृष्टिकोण ने विभिन्न वंचित वर्गों के बीच एकता और संघर्ष की भावना को मजबूत किया।

जातिगत उत्पीड़न के विरुद्ध दलितों को संगठित करने में दलित पैंथर्स की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण थी। उन्होंने दलितों पर होने वाले अत्याचारों के विरुद्ध खुलकर संघर्ष किया और हिंसा तथा भेदभाव के खिलाफ व्यापक आंदोलन चलाए। अनेक स्थानों पर उन्होंने प्रत्यक्ष प्रतिरोध और सार्वजनिक प्रदर्शनों के माध्यम से प्रभुत्वशाली जातियों की दमनकारी प्रवृत्तियों को चुनौती दी। उनके संघर्षशील तेवर ने दलित युवाओं में आत्मविश्वास और साहस पैदा किया। दलित पैंथर्स ने दलितों को भय और अधीनता की मानसिकता से बाहर निकलकर अपने अधिकारों के लिए सम्मानपूर्वक संघर्ष करने की प्रेरणा दी।

दलित पैंथर्स की एक अन्य महत्वपूर्ण भूमिका नई पीढ़ी के बीच अम्बेडकरवादी राजनीति का पुनर्जीवन करना था। रिपब्लिकन आंदोलन के कमजोर पड़ने के बाद यह आशंका थी कि डॉ. अम्बेडकर के क्रांतिकारी विचार अप्रासंगिक हो जाएंगे। दलित पैंथर्स ने अम्बेडकर को केवल संविधान निर्माता के रूप में नहीं, बल्कि ब्राह्मणवाद, जाति व्यवस्था और सामाजिक अन्याय के विरुद्ध संघर्ष करने वाले क्रांतिकारी चिंतक के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने अम्बेडकरवाद को सामाजिक और आर्थिक न्याय के समकालीन संघर्षों से जोड़ा।

दलित पैंथर्स ने भारत में सांस्कृतिक और साहित्यिक क्रांति भी उत्पन्न की। विशेष रूप से मराठी दलित साहित्य को इस आंदोलन ने नई क्रांतिकारी आवाज प्रदान की। नामदेव ढसाल जैसे लेखकों ने कविता और गद्य के माध्यम से जातिगत हिंसा, गरीबी, शहरी झुग्गियों, यौन शोषण और मानवीय पीड़ा की कठोर वास्तविकताओं को अभिव्यक्त किया। दलित साहित्य ने मुख्यधारा के साहित्य में विद्यमान उच्च जातीय दृष्टिकोण और रोमानी प्रवृत्तियों को चुनौती दी तथा उत्पीड़ित समुदायों के वास्तविक अनुभवों को साहित्य और समाज के केंद्र में स्थापित किया। बाद में यह साहित्यिक आंदोलन हिंदी, तमिल, कन्नड़, पंजाबी और अन्य भारतीय भाषाओं में भी फैल गया।

दलित पैंथर्स का दलित समुदाय पर प्रभाव अत्यंत व्यापक था। सामाजिक स्तर पर इस आंदोलन ने दलितों में आत्मसम्मान, संघर्ष और अधिकार चेतना का विकास किया। अनेक दलितों ने गाँवों, विद्यालयों, कार्यस्थलों और सार्वजनिक संस्थानों में जातिगत भेदभाव को खुलकर चुनौती देना शुरू किया। इस आंदोलन ने उत्पीड़ित समुदायों की मानसिकता को बदलते हुए भय के स्थान पर आत्मविश्वास और अधीनता के स्थान पर प्रतिरोध की भावना को जन्म दिया।

राजनीतिक स्तर पर दलित पैंथर्स ने भारत में दलित राजनीति की प्रकृति को बदल दिया। उन्होंने केवल कल्याणकारी योजनाओं और प्रतिनिधित्व की मांगों तक सीमित रहने के बजाय मानवाधिकार, गरिमा और सामाजिक परिवर्तन के व्यापक प्रश्नों को केंद्र में रखा। उनके संघर्षशील दृष्टिकोण ने बाद के अनेक दलित आंदोलनों, छात्र संगठनों और राजनीतिक दलों को प्रभावित किया। यद्यपि मूल संगठन कमजोर हो गया, फिर भी उसकी विचारधारा ने आने वाली पीढ़ियों के जाति-विरोधी आंदोलनों को प्रेरित किया।

सांस्कृतिक स्तर पर भी इस आंदोलन का प्रभाव अत्यंत गहरा था। दलित साहित्य भारतीय बौद्धिक जीवन की एक महत्वपूर्ण शक्ति बन गया और उसने इतिहास तथा समाज की प्रभुत्वशाली व्याख्याओं को चुनौती दी। दलित आत्मकथाओं, कविताओं और निबंधों ने जातिगत उत्पीड़न की कठोर सच्चाइयों को उजागर किया और भारतीय समाज को इन वास्तविकताओं का सामना करने के लिए बाध्य किया। विश्वविद्यालयों और अकादमिक संस्थानों में भी जाति व्यवस्था के आलोचनात्मक अध्ययन को नई गति मिली।

अपनी उपलब्धियों के बावजूद दलित पैंथर्स कई सीमाओं और चुनौतियों से भी घिरे रहे। वैचारिक मतभेदों ने संगठन को कमजोर किया। कुछ नेता मार्क्सवाद से प्रभावित थे, जबकि अन्य अम्बेडकरवादी पहचान की राजनीति पर बल देते थे। नेतृत्व संघर्ष और संगठनात्मक कमजोरियों ने भी आंदोलन को विभाजित किया। राज्य दमन, पुलिस कार्रवाई और राजनीतिक सह-अपनयन ने भी संगठन को कमजोर किया। 1970 के दशक के अंत तक मूल संगठन काफी हद तक विघटित हो गया, यद्यपि उसकी वैचारिक विरासत जीवित रही।

अंततः, दलित पैंथर्स भारतीय इतिहास का एक ऐतिहासिक आंदोलन था जिसने दलित चेतना और जाति-विरोधी राजनीति को गहराई से प्रभावित किया। इस आंदोलन ने उत्पीड़ित समुदायों के आक्रोश, आकांक्षाओं और आत्मसम्मान को आवाज दी तथा जातिगत वर्चस्व की संरचनाओं को अभूतपूर्व साहस के साथ चुनौती दी। संघर्षशील राजनीति, अम्बेडकरवादी विचारधारा और सांस्कृतिक विद्रोह के माध्यम से दलित पैंथर्स ने एक ऐसी विरासत निर्मित की जो आज भी समानता, न्याय और मानव गरिमा के संघर्षों को प्रेरित करती है। यद्यपि संगठन के रूप में इसका अस्तित्व अल्पकालिक रहा, फिर भी दलित राजनीति, साहित्य और सामाजिक चेतना पर इसका प्रभाव आधुनिक भारत के इतिहास का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय है।

शुक्रवार, 29 मई 2026

भारत में पुलिस जवाबदेही और झूठे मुकदमों में फँसाने की समस्या

 

भारत में पुलिस जवाबदेही और झूठे मुकदमों में फँसाने की समस्या

एस आर दारापुरी आई.पी.एस.(से.नि.)

लोकतांत्रिक समाज में आपराधिक न्याय व्यवस्था से अपेक्षा की जाती है कि वह नागरिकों की सुरक्षा करे, संवैधानिक मूल्यों की रक्षा करे तथा बिना किसी भय या भेदभाव के न्याय सुनिश्चित करे। राज्य की सबसे प्रत्यक्ष संस्थाओं में से एक होने के कारण पुलिस कानून-व्यवस्था बनाए रखने और अपराधों की जाँच करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। किंतु जब पुलिस अधिकारी अपने अधिकारों का दुरुपयोग करते हुए निर्दोष व्यक्तियों को झूठे और मनगढ़ंत आपराधिक मामलों में फँसाते हैं, तब विधि के शासन की बुनियाद ही कमजोर होने लगती है। भारत में झूठे मुकदमों में फँसाने की समस्या एक गंभीर चिंता का विषय बन चुकी है, जिसने पुलिस जवाबदेही, सत्ता के दुरुपयोग, मानवाधिकारों तथा लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं। इसी कारण अनेक विधिवेत्ताओं, नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं और सेवानिवृत्त न्यायाधीशों ने यह मांग की है कि निर्दोष व्यक्तियों को जानबूझकर फँसाने वाले पुलिस अधिकारियों के विरुद्ध आपराधिक मुकदमे चलाए जाएँ और उन्हें कठोर दंड दिया जाए।

भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को मौलिक अधिकार प्रदान करता है, जिनमें अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार अत्यंत महत्वपूर्ण है। ये अधिकार केवल कानूनी औपचारिकताएँ नहीं हैं, बल्कि लोकतांत्रिक राज्य की नैतिक आधारशिला हैं। जब निर्दोष व्यक्तियों को झूठे साक्ष्यों के आधार पर गिरफ्तार किया जाता है, प्रताड़ित किया जाता है या जेल भेजा जाता है, तब संविधान द्वारा प्रदत्त न्याय की अवधारणा का प्रत्यक्ष उल्लंघन होता है। झूठे मुकदमों में फँसाया जाना केवल व्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन नहीं करता, बल्कि उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा, आर्थिक सुरक्षा, मानसिक स्वास्थ्य और पारिवारिक जीवन को भी नष्ट कर देता है। कई बार अदालत से बरी हो जाने के बाद भी अपराधी होने का कलंक व्यक्ति का पीछा नहीं छोड़ता।

भारत में झूठे आपराधिक मुकदमों की समस्या कोई अपवाद या आकस्मिक घटना नहीं है। इसके पीछे पुलिस व्यवस्था की गहरी संरचनात्मक और संस्थागत समस्याएँ हैं। राजनीतिक हस्तक्षेप इसका सबसे महत्वपूर्ण कारण है। पुलिस अधिकारियों पर अक्सर सत्ताधारी दलों, स्थानीय नेताओं या प्रभावशाली समूहों का दबाव होता है कि वे राजनीतिक विरोधियों को निशाना बनाएँ, असहमति को दबाएँ या शक्तिशाली हितों की रक्षा करें। ऐसी परिस्थितियों में आपराधिक कानून न्याय का माध्यम न रहकर राजनीतिक नियंत्रण का उपकरण बन जाता है।

भ्रष्टाचार भी झूठे मुकदमों का एक महत्वपूर्ण कारण है। यह आरोप बार-बार सामने आते रहे हैं कि कुछ मामलों में रिश्वत, व्यक्तिगत लाभ या वास्तविक अपराधियों को बचाने के लिए निर्दोष लोगों को फँसाया जाता है। इसके अतिरिक्त जाति, धर्म, वर्ग और समुदाय आधारित पूर्वाग्रह भी पुलिस के व्यवहार को प्रभावित करते हैं। दलित, आदिवासी, धार्मिक अल्पसंख्यक, प्रवासी मजदूर, गरीब श्रमिक और राजनीतिक कार्यकर्ता जैसे हाशिए पर स्थित समूह अधिक असुरक्षित माने जाते हैं क्योंकि उनके पास कानूनी संसाधनों और राजनीतिक संरक्षण का अभाव होता है।

अपराधों को शीघ्र सुलझाने का दबाव भी इस समस्या को बढ़ाता है। भारत की पुलिस व्यवस्था कर्मचारियों की कमी, अत्यधिक कार्यभार, अपर्याप्त फॉरेंसिक सुविधाओं, कमजोर प्रशिक्षण और पुरानी जाँच पद्धतियों जैसी समस्याओं से जूझ रही है। चर्चित मामलों में त्वरित गिरफ्तारी का सार्वजनिक और राजनीतिक दबाव कई बार पुलिस को सच्ची जाँच करने के बजाय सुविधाजनक “अभियुक्त” खोजने, झूठे साक्ष्य गढ़ने या जबरन स्वीकारोक्ति कराने की ओर प्रेरित करता है। इससे भले ही अस्थायी रूप से दक्षता का भ्रम पैदा हो, किंतु दीर्घकाल में न्याय व्यवस्था पर जनता का विश्वास कमजोर हो जाता है।

झूठे मुकदमों के परिणाम अत्यंत विनाशकारी होते हैं। निर्दोष व्यक्ति वर्षों तक मुकदमे की सुनवाई पूरी होने की प्रतीक्षा में जेलों में बंद रहते हैं। उनके परिवार आर्थिक बर्बादी, सामाजिक बहिष्कार और मानसिक आघात का सामना करते हैं। कई मामलों में लंबे कारावास के बाद बरी हुए व्यक्तियों को न तो पर्याप्त मुआवजा मिलता है और न ही सामाजिक पुनर्वास। इसके अतिरिक्त वास्तविक अपराधी भी बच निकलते हैं क्योंकि जाँच निर्दोष लोगों पर केंद्रित हो जाती है। इस प्रकार झूठे मुकदमे न केवल व्यक्तिगत अधिकारों का उल्लंघन करते हैं, बल्कि आपराधिक न्याय व्यवस्था की प्रभावशीलता को भी कमजोर करते हैं।

भारतीय कानून में ऐसे प्रावधान मौजूद हैं जिनके अंतर्गत दोषी पुलिस अधिकारियों के विरुद्ध कार्रवाई की जा सकती है। गलत तरीके से हिरासत में रखने, झूठे साक्ष्य गढ़ने, दुर्भावनापूर्ण अभियोजन, हिरासत में हिंसा तथा अधिकारों के दुरुपयोग से संबंधित प्रावधान आपराधिक कानूनों में उपलब्ध हैं। न्यायपालिका ने भी समय-समय पर पुलिस जवाबदेही के महत्व पर बल दिया है। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने कई महत्वपूर्ण निर्णयों में पुलिस सुधार, स्वतंत्र जाँच तथा नागरिक स्वतंत्रताओं की सुरक्षा की आवश्यकता को रेखांकित किया है।

पुलिस सुधार से संबंधित सबसे महत्वपूर्ण हस्तक्षेपों में से एक प्रकाश सिंह मामले में सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय था, जिसमें राजनीतिक हस्तक्षेप कम करने और पुलिस की संस्थागत जवाबदेही बढ़ाने के लिए अनेक निर्देश दिए गए थे। मानवाधिकार संगठनों और नागरिक समाज समूहों ने भी बार-बार कहा है कि पुलिस दंडमुक्ति लोकतंत्र और संवैधानिक शासन के लिए गंभीर खतरा है। इसके बावजूद झूठे मुकदमों के लिए पुलिस अधिकारियों के विरुद्ध अभियोजन की घटनाएँ अत्यंत कम हैं।

जवाबदेही के अभाव के पीछे कई कारण हैं। विभागीय जाँच प्रायः पुलिस तंत्र के भीतर ही होती है, जिससे निष्पक्षता प्रभावित होती है। पीड़ित व्यक्ति पुलिस प्रतिशोध के भय से शिकायत दर्ज कराने से डरते हैं। गवाहों को धमकाया जा सकता है और लंबी न्यायिक प्रक्रिया शिकायतकर्ताओं को हतोत्साहित करती है। कई बार राजनीतिक शक्तियाँ प्रभावशाली पुलिस अधिकारियों को संरक्षण प्रदान करती हैं। परिणामस्वरूप वर्षों तक जेल में रहने के बाद निर्दोष सिद्ध हुए व्यक्तियों के मामले में भी जिम्मेदार अधिकारी दंड से बच जाते हैं।

इन परिस्थितियों में अनेक विद्वानों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने व्यापक पुलिस सुधारों की मांग की है। राज्य और जिला स्तर पर स्वतंत्र पुलिस शिकायत प्राधिकरणों की स्थापना एक महत्वपूर्ण सुझाव है, ताकि पुलिस अत्याचार की शिकायतों की निष्पक्ष जाँच हो सके। जानबूझकर झूठे साक्ष्य गढ़ने या दुर्भावनापूर्ण जाँच करने वाले अधिकारियों के विरुद्ध अनिवार्य आपराधिक मुकदमे चलाने की भी मांग की गई है।

झूठे मुकदमों के पीड़ितों के लिए मुआवजा और पुनर्वास भी अत्यंत आवश्यक है। लोकतांत्रिक राज्य का नैतिक और संवैधानिक दायित्व है कि वह राज्य शक्ति के दुरुपयोग से नष्ट हुए व्यक्तियों की गरिमा और आजीविका की पुनर्स्थापना करे। आधुनिक फॉरेंसिक तकनीकों का उपयोग, पुलिस थानों में सीसीटीवी निगरानी, बॉडी कैमरे और पूछताछ प्रक्रियाओं में पारदर्शिता जैसे उपाय भी पुलिस दुरुपयोग को कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण माने जाते हैं।

साथ ही यह भी आवश्यक है कि पुलिस व्यवस्था की संरचनात्मक समस्याओं को समझा जाए। पुलिसकर्मी अक्सर अपर्याप्त संसाधनों, राजनीतिक दबाव, लंबे कार्यघंटों और पेशेवर स्वायत्तता की कमी जैसी कठिन परिस्थितियों में काम करते हैं। इसलिए जवाबदेही केवल व्यक्तिगत अधिकारियों को दंडित करने तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि पुलिस संस्कृति और संस्थागत ढाँचे के व्यापक सुधार का हिस्सा होनी चाहिए।

इस पूरे प्रश्न का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष नागरिक और राज्य के बीच संबंध है। यदि नागरिक पुलिस को न्याय के रक्षक के बजाय भय, दमन और राजनीतिक नियंत्रण के साधन के रूप में देखने लगें, तो लोकतांत्रिक संस्थाओं में जनता का विश्वास कमजोर हो जाता है। विधि का शासन उस स्थिति में जीवित नहीं रह सकता जहाँ निर्दोष लोगों को लगातार झूठे मामलों में फँसाया जाए और जिम्मेदार अधिकारियों को कोई दंड न मिले।

निष्कर्षतः, निर्दोष व्यक्तियों को झूठे मामलों में फँसाने वाले पुलिस अधिकारियों के विरुद्ध अभियोजन चलाना संवैधानिक अधिकारों, मानव गरिमा और लोकतांत्रिक जवाबदेही की रक्षा के लिए अत्यंत आवश्यक है। झूठे मुकदमे केवल पुलिस शक्ति का दुरुपयोग नहीं हैं, बल्कि न्याय के मूल सिद्धांतों के साथ विश्वासघात भी हैं। इसलिए स्वतंत्र निगरानी तंत्र, न्यायिक सुधार, पारदर्शिता और संस्थागत पुनर्गठन के माध्यम से पुलिस जवाबदेही को मजबूत करना न केवल व्यक्तिगत स्वतंत्रताओं की रक्षा के लिए आवश्यक है, बल्कि भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था की वैधता और विश्वसनीयता को बनाए रखने के लिए भी अनिवार्य है।

 

दलित पैंथर्स : इतिहास, भूमिका और दलितों पर प्रभाव

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