बुधवार, 9 सितंबर 2026

इलाहाबाद उच्च न्यायालय की उत्तर प्रदेश की नौकरशाही पर टिप्पणी: संवैधानिक शासन के लिए एक स्पष्ट आह्वान

 

इलाहाबाद उच्च न्यायालय की उत्तर प्रदेश की नौकरशाही पर टिप्पणी: संवैधानिक शासन के लिए एक स्पष्ट आह्वान

एस आर दारापुरी आई.पी.एस.(सेवानिवृत)

Allahabad HC Permits Civil Judge (JD) Candidate Who Applied Under Wrong ...

इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा उत्तर प्रदेश की नौकरशाही की हालिया आलोचना को कुछ अधिकारियों के विरुद्ध की गई न्यायिक टिप्पणियों तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए। यह राज्य में शासन की प्रकृति से जुड़ा एक गंभीर प्रश्न उठाती है: जब स्थायी कार्यपालिका की निष्ठा संविधान और कानून के बजाय राजनीतिक सत्ता के प्रति होने लगे, तो लोकतांत्रिक शासन की संस्थाएं कितनी सुरक्षित रह जाती हैं? न्यायालय द्वारा “ऑरवेलियन डिस्टोपिया” की चेतावनी इसी व्यापक संकट की ओर संकेत करती है। यह केवल अधिकारियों की कार्यशैली पर टिप्पणी नहीं, बल्कि प्रशासनिक सत्ता के राजनीतिकरण और उसके नागरिक अधिकारों पर पड़ने वाले प्रभाव के बारे में चेतावनी है।

लोकतंत्र में सरकारें बदलती हैं, लेकिन नौकरशाही बनी रहती है। निर्वाचित सरकार नीति और राजनीतिक दिशा निर्धारित करती है; सिविल सेवा उन नीतियों को कानून के अनुसार लागू करती है और शासन में संस्थागत निरंतरता प्रदान करती है। इसलिए उसकी निष्ठा किसी व्यक्ति, मंत्री या राजनीतिक दल के प्रति नहीं, बल्कि संविधान और कानून के प्रति होनी चाहिए। इसका अर्थ निर्वाचित सरकार का विरोध करना नहीं है। इसका अर्थ है कि अधिकारी वैध निर्देशों को पूरी निष्ठा से लागू करें, लेकिन ऐसे निर्देशों पर प्रश्न उठाने या उन्हें अस्वीकार करने का साहस रखें जो कानून या नागरिक अधिकारों का उल्लंघन करते हों।

समस्या तब पैदा होती है जब प्रशासनिक कैरियर राजनीतिक कृपा पर निर्भर होने लगे। तब तबादले, पदस्थापन, पदोन्नति और महत्वपूर्ण नियुक्तियां प्रशासनिक आवश्यकता के बजाय राजनीतिक निष्ठा को पुरस्कृत करने के साधन बन सकती हैं। इसका सबसे खतरनाक परिणाम प्रत्यक्ष आदेश नहीं, बल्कि पूर्वानुमानित आज्ञापालन होता है। अधिकारी यह सोचकर निर्णय लेने लगते हैं कि कानून क्या कहता है से अधिक महत्वपूर्ण यह है कि सत्ता में बैठे लोग क्या चाहते हैं। इस स्थिति में राजनीतिक नियंत्रण प्रशासन के बाहर से थोपा हुआ दबाव नहीं रहता; वह प्रशासनिक संस्कृति का हिस्सा बन जाता है।

इसलिए तबादलों और पदस्थापनों का राजनीतिकरण केवल सेवा-संबंधी समस्या नहीं है। यह प्रशासनिक स्वतंत्रता को प्रभावित करता है। जो अधिकारी जानते हैं कि किसी असुविधाजनक निर्णय के बाद उनका कैरियर प्रभावित हो सकता है, वे स्वाभाविक रूप से जोखिम लेने से बचेंगे। इसके विपरीत, राजनीतिक अपेक्षाओं के अनुरूप चलने वाले अधिकारियों को पुरस्कृत किया जाता है तो पूरी व्यवस्था में गलत प्रोत्साहन पैदा होते हैं। परिणामतः पेशेवर सलाह, निष्पक्ष निर्णय और संस्थागत निरंतरता कमजोर पड़ती है।

डॉ. बी.आर. आंबेडकर की संवैधानिक नैतिकता इस समस्या को समझने का महत्वपूर्ण आधार प्रदान करती है। लोकतंत्र उनके लिए केवल चुनाव और बहुमत का शासन नहीं था; वह स्वतंत्रता, समानता और बंधुता पर आधारित ऐसी संस्थागत संस्कृति चाहते थे जिसमें सत्ता संवैधानिक सीमाओं में रहे। इसलिए सार्वजनिक अधिकारी नागरिकों को शासकीय कृपा के प्राप्तकर्ता नहीं, बल्कि अधिकार-संपन्न नागरिक के रूप में देखें—यही प्रशासनिक नैतिकता का मूल होना चाहिए।

यह प्रश्न उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य में विशेष महत्व रखता है, क्योंकि अधिकांश नागरिक राज्य से सीधे संविधान की किताब के माध्यम से नहीं, बल्कि थाने, तहसील, जिला कार्यालय, अस्पताल, जेल और कल्याणकारी संस्थाओं के माध्यम से मिलते हैं। किसी गरीब व्यक्ति की पेंशन, मजदूर की मजदूरी, दलित परिवार की सुरक्षा, छात्र का शांतिपूर्ण विरोध या किसी अल्पसंख्यक नागरिक की शिकायत—इन सबका वास्तविक अनुभव संबंधित अधिकारी और पुलिस के व्यवहार से तय होता है। इसलिए प्रशासन की निष्पक्षता का सबसे कठोर परीक्षण उस नागरिक के साथ होता है जिसके पास राजनीतिक संपर्क, धन और सामाजिक प्रभाव नहीं है।

यहीं प्रशासनिक जवाबदेही का प्रश्न सामाजिक न्याय से जुड़ जाता है। कानून के सामने औपचारिक समानता पर्याप्त नहीं है यदि राज्य तक पहुंच ही असमान हो। प्रभावशाली व्यक्ति यदि एक फोन पर प्रशासनिक कार्रवाई करा सकता है, जबकि गरीब दलित या आदिवासी नागरिक को अपनी शिकायत दर्ज कराने के लिए भी अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़े, तो समानता का संवैधानिक वादा व्यवहार में खोखला हो जाता है। प्रशासनिक विवेकाधिकार पर नियंत्रण इसलिए केवल दक्षता का प्रश्न नहीं, बल्कि सत्ता और सामाजिक असमानता के संबंध का प्रश्न है।

पुलिस व्यवस्था में इसका प्रभाव और गंभीर हो सकता है। गिरफ्तारी, हिरासत, जांच, निवारक कार्रवाई और सार्वजनिक व्यवस्था के नाम पर प्रतिबंध राज्य को व्यक्ति की स्वतंत्रता पर व्यापक शक्ति देते हैं। ऐसी शक्ति का औचित्य तभी है जब उसका प्रयोग कानून और प्रमाण के आधार पर हो। लोकतांत्रिक पुलिस को असहमति और हिंसा, आलोचना और अपराध तथा शांतिपूर्ण विरोध और सार्वजनिक अव्यवस्था के बीच अंतर करना होगा। सरकार की आलोचना को अपराध समझना लोकतांत्रिक शासन को कमजोर करता है।

निवारक हिरासत इस संदर्भ में विशेष चिंता का विषय है। यह असाधारण शक्ति है क्योंकि इसमें सामान्य आपराधिक मुकदमे से पहले ही व्यक्ति की स्वतंत्रता सीमित की जा सकती है। इसलिए इसका इस्तेमाल अत्यंत सीमित परिस्थितियों में और कठोर कानूनी सुरक्षा के साथ होना चाहिए। जब निवारक कानूनों का उपयोग सामान्य प्रशासनिक या राजनीतिक असुविधा से निपटने के साधन के रूप में होने लगे, तो राज्य की सुरक्षा और नागरिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन बिगड़ जाता है।

कार्यकर्ता आकृति चौधरी की हिरासत के मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की कड़ी प्रतिक्रिया इसी चिंता को रेखांकित करती है। हिरासत को निरस्त करने और मुआवजा देने का निर्णय इस सिद्धांत को मजबूत करता है कि राज्य द्वारा प्रयोग की गई दमनकारी शक्ति की वैधानिकता की जिम्मेदारी अंततः राज्य की ही है। नागरिक को मनमानी कार्रवाई का नुकसान उठाना पड़े और जिम्मेदार अधिकारी बिना सार्थक जवाबदेही के बच जाए, यह प्रशासनिक न्याय के अनुकूल नहीं है।

यहीं से नौकरशाही की दंडमुक्ति का प्रश्न सामने आता है। प्रशासनिक निर्णय अक्सर फाइलों, समितियों और अधिकार की अनेक परतों से होकर गुजरते हैं। इससे गलत निर्णय की जिम्मेदारी आसानी से बिखर जाती है। नागरिक को न्यायिक राहत मिल भी जाए, तो संबंधित अधिकारी के लिए कोई व्यक्तिगत परिणाम न हो, ऐसी स्थिति प्रशासन में संयम की प्रेरणा को कमजोर करती है।

इसका समाधान हर गलती के लिए दंड नहीं है। सद्भावना से की गई प्रशासनिक भूल और जानबूझकर या दुर्भावनापूर्ण कानून उल्लंघन के बीच स्पष्ट अंतर होना चाहिए। ईमानदारी से काम करने वाले अधिकारियों को संरक्षण मिलना चाहिए, लेकिन जानबूझकर, लापरवाहीपूर्ण या दुर्भावनापूर्ण उल्लंघनों को संस्थागत गुमनामी के पीछे नहीं छिपाया जा सकता।

इसी के साथ वरिष्ठ अधिकारियों की जवाबदेही भी सुनिश्चित करनी होगी। यदि किसी विभाग या पुलिस इकाई में गैरकानूनी व्यवहार लगातार चलता है और वरिष्ठ अधिकारियों को उसकी जानकारी है—या परिस्थितियों के कारण उन्हें उसकी जानकारी होनी चाहिए—तो केवल अधीनस्थ अधिकारी को दोषी ठहराकर मामला समाप्त नहीं किया जा सकता। व्यवस्था की विफलता की जिम्मेदारी ऊपर तक जानी चाहिए। यही सिद्धांत हिरासत में हिंसा, अवैध गिरफ्तारी, झूठे मुकदमों और शिकायतों की जानबूझकर उपेक्षा जैसे मामलों पर भी लागू होना चाहिए।

ऑरवेलियन डिस्टोपिया” की चेतावनी को इसी क्रमिक संस्थागत क्षरण के संदर्भ में समझना चाहिए। कोई लोकतांत्रिक व्यवस्था एक दिन में अधिनायकवादी नहीं बनती। पहले असाधारण शक्तियों का सामान्यीकरण होता है, फिर असहमति संदेहास्पद बनने लगती है, उसके बाद नागरिक अधिकारियों को चुनौती देने से डरते हैं और अंततः प्रशासन राजनीतिक अपेक्षाओं को कानूनी दायित्व से ऊपर रखने लगता है। इस प्रक्रिया का सबसे गंभीर परिणाम भय की संस्कृति है।

जब नागरिक बोलने से, अधिकारी असहमति व्यक्त करने से और पुलिसकर्मी अनुचित आदेश का विरोध करने से डरने लगें, तो लोकतंत्र की औपचारिक संस्थाएं बची रहकर भी उसकी आत्मा कमजोर हो सकती है। चुनाव इस स्थिति का समाधान नहीं हैं। चुनाव सरकार को शासन का अधिकार देते हैं, लेकिन संविधान की सीमाओं से मुक्त नहीं करते। लोकतंत्र बहुमत का शासन है, लेकिन संवैधानिक सीमाओं के भीतर।

विडंबना यह है कि राजनीतिक रूप से आज्ञाकारी नौकरशाही अंततः उसी सरकार को भी कमजोर करती है जिसकी सेवा करने का दावा करती है। जब अधिकारी केवल वही सूचना देते हैं जो राजनीतिक नेतृत्व सुनना चाहता है, गलत निर्णयों पर सवाल नहीं उठाते और गैरकानूनी निर्देशों का पालन करते हैं, तो सरकार वास्तविक प्रशासनिक स्थिति से कट जाती है। उसे ईमानदार सलाह के बजाय अनुकूलित सूचना मिलने लगती है। इससे शासन की गुणवत्ता गिरती है।

इसलिए मजबूत सरकार को कमजोर नहीं, बल्कि पेशेवर और स्वतंत्र नौकरशाही चाहिए। प्रशासनिक स्वतंत्रता का अर्थ सरकार के प्रति असहयोग नहीं है। इसका अर्थ है—वैध नीति को पूरी क्षमता से लागू करना और गैरकानूनी निर्देश का प्रतिरोध करना। एक सक्षम अधिकारी वह नहीं जो हर आदेश पर “हां” कहे, बल्कि वह है जो वैध आदेश पर दृढ़ता से “हां” और गैरकानूनी आदेश पर संस्थागत आधार के साथ “नहीं” कह सके।

इसके लिए राजनीतिक नेतृत्व की भूमिका निर्णायक है। नौकरशाही का राजनीतिकरण केवल अधिकारियों की कमजोरी का परिणाम नहीं होता; वह राजनीतिक प्रोत्साहनों से भी पैदा होता है। यदि स्वतंत्र निर्णय लेने वाले अधिकारी दंडित और राजनीतिक निष्ठा दिखाने वाले अधिकारी पुरस्कृत होंगे, तो व्यवस्था उसी दिशा में विकसित होगी। इसलिए राजनीतिक कार्यपालिका को संस्थागत स्वायत्तता और पेशेवर असहमति को लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, उसकी शक्ति समझना होगा।

उत्तर प्रदेश में सुधार भी इसी आधार पर होने चाहिए। तबादलों और पदस्थापनों के लिए पारदर्शी नियम तथा न्यूनतम कार्यकाल सुनिश्चित किए जाएं। सिविल सेवा बोर्ड प्रभावी ढंग से कार्य करें। सिद्ध जिम्मेदारी के मामलों में गैरकानूनी कार्रवाई के वास्तविक परिणाम हों। वरिष्ठ अधिकारियों को व्यवस्थागत विफलताओं के लिए जवाबदेह बनाया जाए। निवारक हिरासत को वास्तव में असाधारण उपाय रखा जाए। पुलिस शिकायत तंत्र स्वतंत्र और सुलभ हो। अधिकारियों को मानवाधिकार, संवैधानिक अधिकार, जातिगत भेदभाव और दमनकारी शक्तियों की कानूनी सीमाओं का निरंतर प्रशिक्षण दिया जाए। सबसे बढ़कर, नागरिकों को प्रशासनिक दुरुपयोग के विरुद्ध ऐसी सुलभ शिकायत व्यवस्था मिले जिसमें न्याय पाने के लिए उन्हें हर बार उच्च न्यायालय तक न जाना पड़े।

न्यायपालिका इन संस्थागत कमियों को उजागर और सुधार सकती है, लेकिन वह प्रशासन का स्थायी विकल्प नहीं हो सकती। यदि बुनियादी प्रशासनिक न्याय पाने के लिए नागरिकों को बार-बार उच्च न्यायालय का सहारा लेना पड़े, तो यह न्यायपालिका की सक्रियता से अधिक प्रशासनिक संस्थाओं की विफलता का संकेत है। न्यायिक हस्तक्षेप का उद्देश्य अंततः ऐसी प्रशासनिक संस्कृति बनाना होना चाहिए जिसमें हर नागरिक को न्याय पाने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाने की आवश्यकता न पड़े।

इसलिए उत्तर प्रदेश के सामने चुनौती नौकरशाही को कमजोर करने की नहीं, बल्कि उसे पेशेवर, निष्पक्ष और जवाबदेह बनाने की है। प्रशासन को शासक-केंद्रित मानसिकता से नागरिक-केंद्रित व्यवस्था की ओर ले जाना होगा।

शासक-केंद्रित प्रशासन पूछता है: सरकार क्या चाहती है?”

नागरिक-केंद्रित प्रशासन पूछता है: कानून क्या कहता है और सरकार के वैध उद्देश्यों को कानून के भीतर कैसे पूरा किया जा सकता है?”

पहला आज्ञापालन पैदा करता है। दूसरा सुशासन।

पहला नागरिक को सत्ता के अधीन रखता है। दूसरा उसे अधिकार-संपन्न नागरिक मानता है।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय की आलोचना को इसलिए नौकरशाही पर हमले के रूप में नहीं, बल्कि नौकरशाही के राजनीतिक कब्जे के विरुद्ध चेतावनी के रूप में समझना चाहिए। इसका लक्ष्य ऐसी प्रशासनिक व्यवस्था होना चाहिए जिसमें अधिकारी सरकार की वैध नीतियों के प्रति उत्तरदायी हों, लेकिन अपनी अंतिम निष्ठा संविधान, कानून और नागरिक के अधिकारों के प्रति रखें।

इसका सबसे सरल सिद्धांत है: सार्वजनिक शक्ति किसी अधिकारी या सरकार की निजी संपत्ति नहीं, बल्कि जनता की ओर से सौंपा गया न्यास है। जिलाधिकारी जिले का मालिक नहीं है; पुलिस अधिकारी गिरफ्तारी की शक्ति का मालिक नहीं है; नौकरशाह सरकारी कार्यालय का मालिक नहीं है। ये सभी सार्वजनिक शक्तियों के अस्थायी न्यासी हैं।

यही आंबेडकर की संवैधानिक दृष्टि का प्रशासनिक अर्थ भी है। संविधान की सफलता केवल उसके प्रावधानों में नहीं, बल्कि उन संस्थाओं और अधिकारियों के आचरण में है जो उन प्रावधानों को नागरिक के जीवन में लागू करते हैं। स्वतंत्रता, समानता, बंधुता और व्यक्ति की गरिमा तभी सार्थक हैं जब राज्य की शक्ति निष्पक्ष और जवाबदेह हो।

अंततः प्रशासन की सफलता इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि वह नागरिकों से कितनी आसानी से आज्ञापालन करा सकता है, बल्कि इससे कि वह न्याय, स्वतंत्रता और समान गरिमा की कितनी प्रभावी रक्षा करता है।

इसलिए सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है: जब एक साधारण नागरिक राज्य के सामने खड़ा होता है, तो उसे कानून का शासन दिखाई देता है—या शासक की इच्छा?

उत्तर प्रदेश में लोकतंत्र की वास्तविक गुणवत्ता इसी प्रश्न के उत्तर से तय होगी।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय की चेतावनी इसलिए संवैधानिक पुनर्नवीकरण का स्पष्ट आह्वान है—राजनीतिक कार्यपालिका के लिए संस्थागत संयम का, नौकरशाही के लिए पेशेवर स्वतंत्रता का, पुलिस के लिए जवाबदेही का और पूरे प्रशासन के लिए नागरिक को सत्ता के विषय के बजाय अधिकार-संपन्न नागरिक मानने का।

सिविल सेवक शासक का सेवक नहीं है। पुलिस अधिकारी किसी राजनीतिक दल का उपकरण नहीं है। नौकरशाही सत्तारूढ़ प्रतिष्ठान का विस्तार नहीं है। सभी लोक अधिकारी संवैधानिक शक्ति के न्यासी हैं और कानून तथा जनता के प्रति जवाबदेह हैं।

यही सिद्धांत उत्तर प्रदेश के प्रशासनिक शासन के केंद्र में पुनः स्थापित करना होगा।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय की उत्तर प्रदेश की नौकरशाही पर टिप्पणी: संवैधानिक शासन के लिए एक स्पष्ट आह्वान

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