भारतीय
पुलिस को क्रूर, भ्रष्ट,
सांप्रदायिक, जातिवादी और मानवाधिकार
उल्लंघनकारी क्यों माना जाता है
एस आर दारापुरी
आई.पी.एस. (से. नि.)
प्रस्तावना
पुलिस आधुनिक राज्य की सबसे
प्रत्यक्ष और प्रभावशाली संस्थाओं में से एक है। किसी लोकतांत्रिक समाज में पुलिस
से अपेक्षा की जाती है कि वह नागरिकों की सुरक्षा करे, कानून और व्यवस्था बनाए रखे, अपराधों की रोकथाम करे तथा संविधानिक मूल्यों की रक्षा करे। आदर्श रूप में
पुलिस को न्याय की निष्पक्ष संरक्षक तथा मानवाधिकारों की रक्षक संस्था होना चाहिए।
किंतु भारत में पुलिस व्यवस्था को लंबे समय से क्रूरता, भ्रष्टाचार,
जातिगत पूर्वाग्रह, सांप्रदायिक पक्षपात,
निरंकुश व्यवहार तथा मानवाधिकार उल्लंघनों के लिए आलोचना का सामना
करना पड़ा है। हिरासत में यातना, फर्जी मुठभेड़ें, अवैध गिरफ्तारियाँ, विरोध प्रदर्शनों का दमन तथा
वंचित समुदायों के प्रति भेदभावपूर्ण व्यवहार जैसी घटनाएँ सार्वजनिक विमर्श का
नियमित हिस्सा बन चुकी हैं। मानवाधिकार संगठनों, न्यायिक
आयोगों, पत्रकारों तथा नागरिक समाज के कार्यकर्ताओं ने
बार-बार भारतीय पुलिस व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्न उठाए हैं।
इसके साथ ही यह भी स्वीकार
करना आवश्यक है कि भारतीय पुलिस अत्यंत कठिन परिस्थितियों में कार्य करती है।
पुलिसकर्मियों को लंबे कार्य-घंटों, अपर्याप्त संसाधनों, राजनीतिक दबावों, कर्मचारियों की कमी, मानसिक तनाव तथा जनता के
अविश्वास का सामना करना पड़ता है। इसलिए समस्या को केवल कुछ व्यक्तियों की नैतिक
विफलता के रूप में नहीं देखा जा सकता। इसके पीछे ऐतिहासिक, संरचनात्मक,
राजनीतिक तथा सामाजिक कारण मौजूद हैं, जिन्होंने
भारतीय पुलिस व्यवस्था को गहराई से प्रभावित किया है।
भारतीय पुलिस के चरित्र को
समझने के लिए उसके औपनिवेशिक मूल, भारतीय समाज
की जातीय-सामाजिक संरचना, राजनीतिक हस्तक्षेप, संस्थागत कमजोरियों, जवाबदेही की कमी तथा शासन में
बढ़ती अधिनायकवादी प्रवृत्तियों का विश्लेषण आवश्यक है। भारतीय पुलिस व्यवस्था का
संकट केवल संस्थागत विफलता नहीं बल्कि भारतीय लोकतंत्र के अंतर्विरोधों का भी
दर्पण है।
भारतीय
पुलिस व्यवस्था की औपनिवेशिक उत्पत्ति
भारतीय पुलिस व्यवस्था का
आधुनिक स्वरूप ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के दौरान विकसित हुआ। इसके बाद ब्रिटिश शासन
ने भारतीय जनता पर नियंत्रण मजबूत करने के लिए प्रशासनिक पुनर्गठन किया। इसी
संदर्भ में इंडियन पुलिस एक्ट-1861 लागू किया गया। इस कानून ने एक केंद्रीकृत और सैन्यीकृत पुलिस संरचना
स्थापित की, जिसका मुख्य उद्देश्य जनता की सेवा नहीं बल्कि
औपनिवेशिक शासन की रक्षा करना था।
औपनिवेशिक पुलिस जनता के
प्रति जवाबदेह नहीं थी। उसका प्रमुख कार्य राजनीतिक विरोध को दबाना, जनता पर निगरानी रखना और
साम्राज्यवादी व्यवस्था बनाए रखना था। दमन और हिंसा को प्रशासनिक उपकरण के रूप में
वैधता प्राप्त थी। परिणामस्वरूप पुलिस और जनता के बीच विश्वास के बजाय भय का संबंध
विकसित हुआ।
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद
भारत ने लोकतांत्रिक संविधान अपनाया, जिसमें मौलिक अधिकारों, समानता तथा नागरिक
स्वतंत्रताओं की गारंटी दी गई। किंतु पुलिस की औपनिवेशिक संरचना में मूलभूत
परिवर्तन नहीं किए गए। पुलिस का कार्य-संस्कार नियंत्रण और दमन पर आधारित ही बना
रहा। इसीलिए अनेक विद्वानों का मत है कि भारत ने राजनीतिक स्वतंत्रता तो प्राप्त
कर ली, परंतु पुलिस व्यवस्था का लोकतंत्रीकरण नहीं हो सका।
सामाजिक
संरचना और जाति-सांप्रदायिक प्रभाव
भारतीय पुलिस समाज से अलग कोई
स्वतंत्र इकाई नहीं है। पुलिसकर्मी उसी समाज से आते हैं जो जाति-व्यवस्था, पितृसत्ता, वर्गीय
असमानता और सांप्रदायिक विभाजन से प्रभावित है। इसलिए सामाजिक पूर्वाग्रह पुलिस
व्यवस्था में भी प्रवेश कर जाते हैं।
पुलिस
व्यवस्था में जातिगत पक्षपात
भारतीय पुलिस पर सबसे गंभीर
आरोपों में से एक दलितों, आदिवासियों
तथा अन्य वंचित समुदायों के प्रति भेदभावपूर्ण व्यवहार का है। अनेक अध्ययनों और
रिपोर्टों से पता चलता है कि उत्पीड़ित जातियों के लोगों को अक्सर अपमान, शिकायत दर्ज करने में बाधा, हिरासत में हिंसा तथा
पक्षपातपूर्ण जांच का सामना करना पड़ता है। जातिगत अत्याचारों के मामलों में पुलिस
पर अक्सर प्रभावशाली जातियों का पक्ष लेने के आरोप लगते रहे हैं।
कानून के क्रियान्वयन में भी
संस्थागत पक्षपात के अनेक उदाहरण सामने आए हैं। पीड़ितों की शिकायत रहती है कि
पुलिस प्राथमिकी दर्ज करने में टालमटोल करती है या आरोपों को कमजोर बना देती है।
इससे न्याय व्यवस्था में वंचित समुदायों का विश्वास कमजोर पड़ता है।
जातिगत पूर्वाग्रहों की जड़ें
भारतीय समाज की ऐतिहासिक संरचना में निहित हैं। जिस समाज ने लंबे समय तक जातीय
असमानता और अस्पृश्यता को सामान्य माना हो, वहाँ राज्य संस्थाओं का उससे मुक्त रह पाना कठिन होता है।
सांप्रदायिक
पक्षपात और बहुसंख्यकवाद
भारतीय राजनीति और समाज में
बढ़ते सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का प्रभाव पुलिस व्यवस्था पर भी पड़ा है। विभिन्न
सांप्रदायिक दंगों और धार्मिक हिंसा की घटनाओं में पुलिस पर पक्षपातपूर्ण भूमिका
निभाने के आरोप लगे हैं। विशेष रूप से मुस्लिम समुदाय के लोगों ने अक्सर पुलिस पर
चयनात्मक गिरफ्तारियों, पक्षपातपूर्ण
जांच तथा सुरक्षा प्रदान करने में विफलता के आरोप लगाए हैं।
विभिन्न दंगा-जांच आयोगों ने
प्रशासनिक विफलताओं के साथ-साथ कई मामलों में पुलिस की मिलीभगत की ओर भी संकेत
किया है। आलोचकों का मत है कि जब राजनीतिक विमर्श बहुसंख्यकवादी हो जाता है, तब राज्य संस्थाएँ भी उसी विचारधारा
से प्रभावित होने लगती हैं।
सांप्रदायिक पुलिसिंग
धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र को कमजोर करती है, क्योंकि इससे समान नागरिकता का सिद्धांत प्रभावित होता है। जब नागरिक
पुलिस को किसी विशेष धार्मिक समुदाय या राजनीतिक विचारधारा के पक्ष में देखते हैं,
तो कानून के शासन पर उनका विश्वास कम हो जाता है।
राजनीतिक
हस्तक्षेप और पुलिस का राजनीतिकरण
भारतीय पुलिस व्यवस्था की
सबसे गंभीर समस्याओं में से एक राजनीतिक हस्तक्षेप है। आदर्श स्थिति में पुलिस को
संविधान और कानून के अनुसार निष्पक्ष रूप से कार्य करना चाहिए। किंतु व्यवहार में
तबादलों, नियुक्तियों,
पदोन्नतियों और जांचों पर राजनीतिक प्रभाव व्यापक रूप से देखा जाता
है।
इससे पुलिस में कानून के
प्रति निष्ठा के बजाय सत्ताधारी दल के प्रति निष्ठा विकसित होती है। परिणामस्वरूप
पुलिस का उपयोग राजनीतिक विरोधियों को दबाने, आलोचकों को परेशान करने, चयनात्मक कार्रवाई करने तथा
प्रभावशाली लोगों को बचाने के लिए किया जाता है।
इस समस्या को देखते हुए Supreme Court of India ने 2006
के प्रकाश सिंह मामले
में महत्वपूर्ण पुलिस सुधारों के निर्देश दिए थे। न्यायालय ने वरिष्ठ अधिकारियों
के लिए निश्चित कार्यकाल, स्वतंत्र शिकायत प्राधिकरण तथा
राजनीतिक हस्तक्षेप को सीमित करने जैसे उपाय सुझाए। किंतु अधिकांश राज्यों में इन
सुधारों का प्रभावी क्रियान्वयन अब भी अधूरा है।
क्रूरता, यातना और “थर्ड डिग्री” संस्कृति
पुलिस क्रूरता भारतीय
लोकतंत्र के सामने एक गंभीर चुनौती है। हिरासत में यातना, अवैध निरोध, जबरन
स्वीकारोक्ति तथा फर्जी मुठभेड़ों की घटनाएँ लगातार सामने आती रही हैं।
“थर्ड डिग्री”
यानी शारीरिक और मानसिक यातना का प्रयोग अनेक पुलिस थानों में सामान्यीकृत हो चुका
है। इसके पीछे कई कारण हैं:
मामलों को जल्दी सुलझाने का
दबाव, वैज्ञानिक जांच सुविधाओं की कमी, कमज़ोर फोरेंसिक ढाँचा, कम दोषसिद्धि दर तथा
परिणाम-केंद्रित प्रशासनिक संस्कृति।
कई बार साक्ष्य-आधारित जांच
के बजाय हिंसा और दबाव का सहारा लिया जाता है। गरीब, दलित, आदिवासी और राजनीतिक रूप से कमजोर लोग अक्सर
इसका सबसे अधिक शिकार बनते हैं।
यातना की निरंतरता का एक कारण
दंडहीनता भी है। पुलिस अत्याचारों के मामलों में अभियोजन दुर्लभ होता है तथा
आंतरिक जांच प्रायः निष्पक्ष नहीं मानी जाती। पीड़ित प्रतिशोध के भय से शिकायत
दर्ज कराने से भी डरते हैं।
भारत ने United Nations Convention Against Torture पर हस्ताक्षर तो किए हैं, किंतु अभी तक इसे पूर्ण
रूप से घरेलू कानून का हिस्सा नहीं बनाया गया है। इसलिए मानवाधिकार कार्यकर्ता
कठोर प्रतिरोधी कानूनों की मांग करते रहे हैं।
पुलिस
व्यवस्था में भ्रष्टाचार
भ्रष्टाचार भारतीय पुलिस
व्यवस्था की एक अन्य गंभीर समस्या है। रिश्वतखोरी, जबरन वसूली, जांचों में हेरफेर तथा अपराधियों से
सांठगांठ जैसी शिकायतें व्यापक हैं। इसके पीछे कई कारण हैं:
राजनीतिक संरक्षण, कमजोर जवाबदेही, पारदर्शिता का अभाव, रिश्वतखोरी की सामाजिक
स्वीकृति तथा संस्थागत आर्थिक दबाव।
भ्रष्टाचार प्राथमिकी दर्ज
करने से लेकर जांच, यातायात
नियंत्रण, भूमि विवादों तथा नियुक्तियों तक अनेक स्तरों पर
दिखाई देता है। कई बार लाभकारी पदों की नियुक्तियाँ अनौपचारिक राजनीतिक-आर्थिक
नेटवर्क का हिस्सा बन जाती हैं। इससे कानून का शासन कमजोर होता है और जनता का
विश्वास समाप्त होता है।
जवाबदेही की
कमजोरी
लोकतांत्रिक पुलिस व्यवस्था
के लिए प्रभावी जवाबदेही आवश्यक है। किंतु भारत में पुलिस के विरुद्ध शिकायतों की
जांच की व्यवस्था अक्सर कमजोर और अप्रभावी होती है।
आंतरिक विभागीय जांच स्वतंत्र
नहीं मानी जाती। पीड़ित प्रतिशोध के भय से शिकायत दर्ज नहीं कराते। न्यायिक
प्रक्रिया धीमी और महंगी है। राजनीतिक संरक्षण भी कई मामलों में दोषी अधिकारियों
को बचा लेता है।
यद्यपि मानवाधिकार आयोगों और
न्यायालयों ने समय-समय पर हस्तक्षेप किया है, फिर भी जवाबदेही की एक मजबूत और निरंतर प्रणाली विकसित नहीं हो सकी है।
परिणामस्वरूप दंडहीनता की संस्कृति विकसित होती है।
पुलिसकर्मियों
की कार्य-स्थितियाँ और संस्थागत तनाव
विडंबना यह है कि स्वयं
पुलिसकर्मी भी अत्यंत कठिन परिस्थितियों में काम करते हैं। उन्हें लंबे
कार्य-घंटों, अवकाश की कमी,
अपर्याप्त आवास, मानसिक तनाव, कर्मचारियों की कमी तथा खराब संसाधनों का सामना करना पड़ता है।
निम्न स्तर के पुलिसकर्मियों
को विभागीय पदानुक्रम में भी कठोर व्यवहार झेलना पड़ता है। ऐसी परिस्थितियाँ उनमें
निराशा, आक्रामकता और
असंवेदनशीलता उत्पन्न कर सकती हैं।
पुलिस प्रशिक्षण में भी
लोकतांत्रिक मूल्यों, मानवाधिकारों,
लैंगिक संवेदनशीलता तथा संवैधानिक नैतिकता पर पर्याप्त बल नहीं दिया
जाता। प्रशिक्षण मुख्यतः अनुशासन, नियंत्रण और बल-प्रयोग पर
केंद्रित रहता है।
सैन्यीकरण
और अधिनायकवादी शासन
जहाँ आंतरिक सुरक्षा
चुनौतियाँ अधिक होती हैं, वहाँ पुलिस
व्यवस्था का सैन्यीकरण बढ़ जाता है। आतंकवाद, उग्रवाद,
अलगाववाद या सांप्रदायिक तनाव के नाम पर राज्य को असाधारण शक्तियाँ
प्रदान की जाती हैं। इससे नागरिक स्वतंत्रताओं पर प्रभाव पड़ता है।
जब शासन नागरिकों को
अधिकार-संपन्न व्यक्तियों के बजाय संभावित “खतरे” के रूप में देखने लगता है, तब मनमानी गिरफ्तारियाँ, निगरानी और बल-प्रयोग सामान्य हो जाते हैं।
अधिनायकवादी राजनीतिक
संस्कृति भी इस प्रवृत्ति को मजबूत करती है। “मजबूत राज्य” और “आंतरिक दुश्मन”
जैसी अवधारणाएँ आक्रामक पुलिसिंग को वैधता प्रदान करती हैं।
जनता की
मानसिकता और पुलिस हिंसा की स्वीकृति
एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है
कि समाज का एक हिस्सा स्वयं कठोर पुलिस कार्रवाई का समर्थन करता है। लोग पुलिस
भ्रष्टाचार और हिंसा की आलोचना तो करते हैं, किंतु साथ ही “तुरंत न्याय” और “सख्त कार्रवाई” की मांग भी करते हैं।
मीडिया भी कई बार मुठभेड़ों और आक्रामक पुलिसिंग का महिमामंडन करता है।
ऐसी सामाजिक मानसिकता पुलिस
को कानूनसम्मत प्रक्रिया के बजाय कठोरता प्रदर्शित करने के लिए प्रेरित करती है।
इस प्रकार पुलिस निरंकुशता केवल राज्य की समस्या नहीं बल्कि व्यापक सामाजिक चेतना
का भी प्रतिबिंब है।
लोकतंत्र और
मानवाधिकारों पर प्रभाव
जब पुलिस सांप्रदायिक, जातिवादी, भ्रष्ट
या राजनीतिक रूप से पक्षपाती हो जाती है, तब लोकतंत्र कमजोर
होने लगता है। कानून का शासन प्रभावित होता है, वंचित
समुदायों का राज्य पर विश्वास समाप्त होता है, असहमति का
अपराधीकरण होने लगता है तथा नागरिक स्वतंत्रताएँ सिकुड़ने लगती हैं।
लोकतंत्र केवल चुनावों से
नहीं चलता; उसे ऐसी
संस्थाओं की आवश्यकता होती है जो संविधान, समानता और मानव
गरिमा के प्रति प्रतिबद्ध हों। इसलिए पुलिस सुधार लोकतंत्र की रक्षा के लिए
अनिवार्य है।
निष्कर्ष
भारतीय पुलिस व्यवस्था की
समस्याएँ इतिहास, राजनीति और
समाज में गहराई से निहित हैं। औपनिवेशिक विरासत, जातिगत
असमानता, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण, राजनीतिक
हस्तक्षेप, कमजोर जवाबदेही, भ्रष्टाचार
तथा संस्थागत तनाव ने मिलकर ऐसी पुलिस संस्कृति को जन्म दिया है जिसे अक्सर क्रूर
और अलोकतांत्रिक माना जाता है।
फिर भी सुधार संभव हैं। पुलिस
को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त करना, स्वतंत्र शिकायत प्राधिकरण स्थापित करना, मानवाधिकार
प्रशिक्षण को मजबूत करना, वैज्ञानिक जांच पद्धतियों को
बढ़ावा देना, कार्य-स्थितियों में सुधार करना तथा संवैधानिक
मूल्यों को संस्थागत संस्कृति का हिस्सा बनाना आवश्यक है।
अंततः पुलिस उसी समाज और
राज्य का प्रतिबिंब होती है जिसकी वह सेवा करती है। इसलिए एक मानवीय, लोकतांत्रिक और संवैधानिक पुलिस
व्यवस्था तभी विकसित हो सकती है जब समाज स्वयं लोकतांत्रिक मूल्यों, समानता और न्याय के प्रति अधिक प्रतिबद्ध बने।