क्या बौद्ध धम्म हिन्दू धर्म का अंश है?
डॉ. अमृतपाल कौर
बुद्ध धम्म को हिन्दूधर्म का ही एक अंश बताया जाता है जो कि सरासर निराधार है। कोई भी धर्म अपनी शाखा व अंश के प्रति उस तरह से अपशब्दों का प्रयोग नहीं करता जिस तरह से हिन्दूधर्म के ग्रंथों ने बुद्धधम्म के प्रति किया है। वाल्मीकीय रामायण में आता है :-
" जैसे चोर दण्डनीय होता है, उसी प्रकार (वेद विरोद्धी) बुद्ध (बौद्धमतावलंबी) भी दंडनीय है। तथागत और नास्तिक को भी यहां इसी कोटि में समझना चाहिए। इसलिए प्रजा पर अनुग्रह करने के लिए राजा द्वारा जिस नास्तिक को दण्ड दिलाया जा सके, उसे तो चोर के समान दण्ड दिलाया ही जाए; परंतु जो वश के बाहर हो, उस नास्तिक के प्रति विद्वान ब्राह्मण कभी उन्मुख न हो - उससे वार्तालाप न करे। " (श्रीमद् वाल्मीकीय रामायण, गीता प्रेस, गोरखपुर, पृ ३०३)
अशोकावदान ग्रंथ से पता चलता है कि पुष्यमित्र शुंग नामक ब्राह्मण ने मौर्यवंश के अंतिम सम्राट बृहद्रथ की हत्या करके सत्ता अपने हाथों में लेकर बुद्धइज़्म के विरुद्ध प्रतिक्रांति के एजंडे के अधीन बौधों की हत्याएं की, बुद्धविहारों को जलाकर खाक किया और साकल (स्यालकोट) पहुंचकर यह घोषणा की कि जो एक बौद्ध का सिर लाकर देगा, मैं उसे एक सौ दीनार दूंगा। यही कारण है कि चीनी बौद्ध साहित्य में पुष्यमित्र का नाम बिना अभिशाप के नहीं लिया जाता। वहां सिर्फ़ पुष्यमित्र न कह कर "पुष्यमित्र, नाश हो उसका," ऐसा कहते हैं।
रेने ग्राउसैट अपनी पुस्तक 'इन द फुटस्टेप्स आफ़ बुद्धा' में लिखते हैं कि चीनी यात्री युवां च्वांग ने लिखा है कि कश्मीर के राजा मिहिरकुल ने बौद्ध स्तूपों को गिरा दिया और मठों को नष्ट करके सैंकड़ों बौद्धों को मार डाला। वाटर्स, युवां च्वांग्स ट्रैवेल्स, भाग-२ के अनुसार चीनी यात्री ने यह भी लिखा है कि राजा शशांक ने बोधिवृक्ष कटवा दिया, बुद्ध की मूर्ति के स्थान पर महेश्वर की मूर्ति रख दी और बुद्ध के धर्म को तबाह किया।
'शंकर दिग्विजय' में राजा सुधन्वा द्वारा बौद्धों को हिन्दु धर्म के आचार्य कुमारिल भट्ट की आज्ञानुसार कतल किए जाने का स्पष्ट वर्णन मिलता है -
" तब राजा ने वेदविरोधी बौद्धों की हत्यायें करने का आदेश जारी करते हुए कहा कि हिमालय से लेकर रामेश्वर तक के सारे भूभाग में जो भी बौद्ध मिले, चाहे वह बच्चा हो या बूढ़ा, उसे कतल कर दो। जो ऐसा नहीं करेगा, उसे मैं कतल कर दूंगा। " (१/९२-९३)
कुमारिल भट्ट ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ 'तंत्रवार्तिक' में बुद्ध के अंहिसा आदि के उपदेशों को कुत्ते की खाल पर पड़े दूध के समान गन्दे, निकम्मे व त्यागने के योग्य कह दिया। इनके बाद आर्चाय शंकर ने अपने ब्रह्मसूत्र भाष्य में बुद्ध को 'अनाप शनाप बकने वाला दुनिया का दुश्मन' (३-२-३२) कहा।
ईसा से पूर्व द्वितीय शताब्दी में हुए वैयाकरण पतंजलि को अपने महाभाष्य में पाणिनि के एक सूत्र (२-४-९) की व्याख्या करते हुए जब ऐसे लोगों का एक उदाहरण देना पड़ा जिन का सदा से विरोध चला आ रहा हो तो उसने बौद्धों और ब्राह्मणों का उल्लेख किया जिनके आपसी विरोधाभास की बिल्ली और चूहे और सांप तथा न्योले के संबधों से तुलना की गई।
सम्राट अशोक ने शिलालेखों पर बुद्ध वचन खुदवाए जो ब्राह्मणों को बहुत अखरता था। अशोक को खलनायक बनाने के लिए इन्हीं ब्राह्मणों व उनके वैयाकरणों ने व्याकरण के नियम तक बदल दिए। शिलालेख में सम्राट अपने नाम के आगे 'देवानां प्रिय' शब्द लगाते हैं जिसका अर्थ है - देवताओं का प्यारा, परन्तु ब्राहणों के व्याकरण में एक विशेष नया नियम जोड़ कर घोषणा कर दी कि देवानां प्रिय का अर्थ मूर्ख है। कात्यायन ने १५० ई.पू. के आस पास इन शब्दों का अर्थ मूर्ख बताया।
संस्कृत के प्राचीन नाटकों में अनेक स्थानों पर बौद्ध भिक्खुओं को पिटते हुए पाते हैं, उनका मज़ाक उड़ाया जाता है और खुल कर निन्दा भी की जाती है। ऐसा ही एक प्राचीन व प्रसिद्ध संस्कृत नाटक है 'मृच्छकटिकम्' जिसके सातवें अंक में नायक चारुदत्त नायिका वसंतसेना से मिलने के लिए निकलता है और रास्ते में उसे एक बौद्ध भिक्खु दिख जाता है। वह कहता है -
"अरे यह पहले ही अशुभ बौद्ध भिक्खु का दर्शन क्यों हो गया?"
इतना ही नहीं, बुद्धधम्म के प्रति लोगों को सावधान करते हुए विभिन्न पुराणग्रन्थों ने भी बुद्ध और उनके धम्म की निन्दा की। ब्रह्मपुराण का कहना है कि विष्णु ने बुद्ध का अवतार धारण करके शाक्य लोगों के धर्म को नष्ट कर दिया और नकलीमाल अर्थात बुद्धइज़म थमा दिया। भविष्यपुराण कहता है कि बुद्ध ने देवधर्म का पालन करने वाले ब्राह्मणों, क्षत्रियों व वैश्यों को वेदों से विमुख करके सर्वत्र अज्ञान व अंधकार फैलाया।
बौद्ध धम्म के खिलाफ़ यह अंधविश्वास जानबूझ कर फैलाया गया ताकि लोग बौद्धों को देखने से भी परहेज़ करने लगें। ऐसे में उनके विचार कौन सुनना चाहेगा। यह बहिष्कार का अस्त्र था और अंधविश्वास साधन। अपशब्दों की इतनी भारी बौछार अथवा निंदा कोई अपने ही धर्म की शाखा पर कैसे कर सकता है? ऐसा तो कोई धर्म तभी कर सकता है जब किसी प्रतिद्वन्द्धी से उसे कठोर चुनौती मिल रही हो...!!!!

