शुक्रवार, 12 जून 2026

भारत को ‘निर्वाचित निरंकुशता’ के रूप में क्यों आंका गया है?

 

भारत को ‘निर्वाचित निरंकुशता’ के रूप में क्यों आंका गया है?

एस आर दारापुरी आईपीएस (से. नि.)

भारत को लंबे समय तक विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में सम्मान प्राप्त रहा है। 1947 में स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद से देश ने नियमित चुनावों, शांतिपूर्ण सत्ता-हस्तांतरण, सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार तथा लोकतांत्रिक सिद्धांतों पर आधारित संवैधानिक व्यवस्था को बनाए रखा है। किंतु हाल के वर्षों में कई अंतरराष्ट्रीय लोकतंत्र-अध्ययन संस्थाओं, विशेष रूप से Varieties of Democracy Institute (वी-डेम) ने भारत को “निर्वाचित निरंकुशता” (Electoral Autocracy) की श्रेणी में रखा है। इस आकलन ने भारत और विश्व स्तर पर व्यापक बहस को जन्म दिया है। जहाँ सरकार के समर्थक इस वर्गीकरण को पक्षपातपूर्ण और तथ्यहीन मानते हैं, वहीं आलोचकों का तर्क है कि यह भारतीय लोकतंत्र की गुणवत्ता में आई गिरावट को दर्शाता है।

निर्वाचित निरंकुशता ऐसी राजनीतिक व्यवस्था को कहा जाता है जिसमें चुनाव तो नियमित रूप से होते हैं और विपक्षी दलों को चुनाव लड़ने की अनुमति भी होती है, किंतु लोकतांत्रिक स्वतंत्रताओं तथा कार्यपालिका पर नियंत्रण रखने वाली संस्थाओं की प्रभावशीलता कमजोर हो जाती है। ऐसी व्यवस्था में केवल चुनावों का होना लोकतंत्र की गारंटी नहीं माना जाता, क्योंकि राजनीतिक वातावरण पूरी तरह स्वतंत्र और निष्पक्ष नहीं रह जाता। अतः भारत को निर्वाचित निरंकुशता कहने का अर्थ यह नहीं है कि यहाँ चुनाव नहीं होते, बल्कि यह लोकतंत्र के व्यापक वातावरण के बारे में चिंता व्यक्त करता है।

भारत के इस अवमूल्यन का एक प्रमुख कारण मीडिया की स्वतंत्रता में कथित गिरावट को माना जाता है। स्वतंत्र और निष्पक्ष मीडिया लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है, क्योंकि वह सरकार को जवाबदेह बनाता है और नागरिकों को विविध स्रोतों से जानकारी उपलब्ध कराता है। आलोचकों का कहना है कि पत्रकारों और मीडिया संस्थानों पर बढ़ते राजनीतिक तथा आर्थिक दबावों के कारण स्वतंत्र पत्रकारिता का दायरा सिकुड़ा है। मुख्यधारा के अनेक मीडिया संस्थानों को सरकार के प्रति सहानुभूतिपूर्ण माना जाता है, जबकि सरकार की आलोचना करने वाले कुछ पत्रकारों को कानूनी कार्रवाइयों, जांचों अथवा उत्पीड़न का सामना करना पड़ा है। प्रेस स्वतंत्रता की निगरानी करने वाले अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने भी इन कारणों से भारत की रैंकिंग में गिरावट दर्ज की है।

दूसरा महत्वपूर्ण कारण नागरिक समाज (Civil Society) के लिए उपलब्ध लोकतांत्रिक स्थान का सिकुड़ना है। गैर-सरकारी संगठन, मानवाधिकार समूह और सामाजिक संगठन लोकतंत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं क्योंकि वे वंचित वर्गों की आवाज़ को सामने लाते हैं और राज्य की गतिविधियों की निगरानी करते हैं। हाल के वर्षों में कई संगठनों को विदेशी वित्तपोषण, पंजीकरण और संचालन संबंधी प्रतिबंधों का सामना करना पड़ा है। आलोचकों का मत है कि इन कदमों ने नागरिक समाज की स्वतंत्र कार्यक्षमता को सीमित किया है और लोकतांत्रिक निगरानी की एक महत्वपूर्ण व्यवस्था को कमजोर किया है।

राजनीतिक विपक्ष और असहमति के प्रति व्यवहार भी चिंता का विषय रहा है। लोकतंत्र केवल विपक्षी दलों के अस्तित्व तक सीमित नहीं होता, बल्कि उनके स्वतंत्र और प्रभावी ढंग से कार्य करने की क्षमता पर भी निर्भर करता है। आलोचकों का आरोप है कि जांच एजेंसियों और कुछ कानूनी प्रावधानों का उपयोग विपक्षी नेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और आंदोलनकारियों के विरुद्ध बढ़ा है। राष्ट्रीय सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था और मानहानि से संबंधित कानूनों के उपयोग को भी असहमति पर अंकुश लगाने के रूप में देखा गया है। यद्यपि सरकारें इन कार्रवाइयों को कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक बताती हैं, किंतु आलोचक इन्हें राजनीतिक प्रतिस्पर्धा को असमान बनाने वाला मानते हैं।

लोकतांत्रिक संस्थाओं की कार्यप्रणाली को लेकर भी प्रश्न उठाए गए हैं। न्यायपालिका, निर्वाचन आयोग, संसद और अन्य नियामक संस्थाओं का उद्देश्य कार्यपालिका की शक्ति पर नियंत्रण बनाए रखना होता है। कुछ विद्वानों और लोकतंत्र-अध्ययन संस्थाओं का मत है कि इन संस्थाओं की स्वतंत्रता और प्रभावशीलता में कमी आई है। संसद में सीमित बहस, कार्यपालिका की बढ़ती शक्तियाँ और कुछ संस्थाओं द्वारा सरकारी निर्णयों को चुनौती देने में कथित हिचकिचाहट को इस संदर्भ में उद्धृत किया जाता है। इन कारणों ने भी भारत की लोकतांत्रिक रैंकिंग को प्रभावित किया है।

अल्पसंख्यक अधिकारों और सामाजिक बहुलतावाद का प्रश्न भी इस बहस का महत्वपूर्ण पक्ष है। भारत एक बहुधार्मिक, बहुभाषी और बहुजातीय समाज है। आलोचकों का तर्क है कि बढ़ती बहुसंख्यकवादी राजनीति ने धार्मिक और सामाजिक अल्पसंख्यकों के समक्ष नई चुनौतियाँ खड़ी की हैं, जिससे सामाजिक ध्रुवीकरण बढ़ा है। सांप्रदायिक तनाव, घृणा-भाषण और भेदभाव की घटनाओं को लोकतांत्रिक समावेशन में कमी के संकेत के रूप में देखा जाता है। लोकतंत्र के अनेक विद्वानों के अनुसार अल्पसंख्यकों के अधिकारों की सुरक्षा लोकतंत्र का मूल तत्व है और इसमें किसी भी प्रकार की कमी लोकतांत्रिक गुणवत्ता को प्रभावित करती है।

हालाँकि भारत को निर्वाचित निरंकुशता कहे जाने का तीव्र विरोध भी होता है। सरकार के समर्थकों का तर्क है कि भारत में आज भी नियमित, विशाल और अत्यंत प्रतिस्पर्धी चुनाव होते हैं जिनमें करोड़ों मतदाता भाग लेते हैं। विपक्षी दल अनेक राज्यों में सत्ता में हैं और महत्वपूर्ण चुनावों में विजय भी प्राप्त करते हैं। वे यह भी इंगित करते हैं कि न्यायालय नियमित रूप से सरकारी निर्णयों की समीक्षा करते हैं और नागरिकों को सरकार की आलोचना करने की पर्याप्त स्वतंत्रता प्राप्त है। इसके अतिरिक्त, लोकतंत्र सूचकांकों की आलोचना करने वाले विद्वानों का कहना है कि ऐसे आकलन अक्सर विशेषज्ञों की व्यक्तिपरक धारणाओं पर आधारित होते हैं और उनमें वैचारिक पक्षपात की संभावना रहती है।

जो लोग इस वर्गीकरण को अस्वीकार करते हैं, वे भारत की संघीय संरचना, सक्रिय राजनीतिक प्रतिस्पर्धा, न्यायपालिका की स्वतंत्रता और व्यापक जनभागीदारी को लोकतंत्र की मजबूती का प्रमाण मानते हैं। उनका तर्क है कि जिस देश में सत्तारूढ़ दल राज्यों में चुनाव हार सकते हैं और जहाँ सरकारों को न्यायिक तथा राजनीतिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, उसे निरंकुश कहना उचित नहीं है।

निष्कर्ष

भारत को निर्वाचित निरंकुशता के रूप में वर्गीकृत करने पर चल रही बहस वास्तव में भारतीय लोकतंत्र की स्थिति के विभिन्न आकलनों को प्रतिबिंबित करती है। जहाँ अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षक मीडिया की स्वतंत्रता, नागरिक समाज, संस्थागत स्वायत्तता, राजनीतिक असहमति और अल्पसंख्यक अधिकारों से संबंधित चिंताओं को रेखांकित करते हैं, वहीं सरकार के समर्थक चुनावों की निरंतरता, राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की मजबूती पर बल देते हैं।

अंततः यह विवाद लोकतंत्र की दो अवधारणाओं के बीच अंतर को उजागर करता है—एक ओर लोकतंत्र केवल चुनावों की व्यवस्था है, जबकि दूसरी ओर वह नागरिक स्वतंत्रताओं, संस्थागत नियंत्रणों, राजनीतिक बहुलतावाद और कानून के शासन पर आधारित व्यापक व्यवस्था है। भारतीय लोकतंत्र का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि इन लोकतांत्रिक मूल्यों और संस्थाओं को किस सीमा तक संरक्षित और सुदृढ़ किया जाता है।

 

सोमवार, 8 जून 2026

महाराष्ट्र धर्म स्वतंत्रता विधेयक, 2026 का महाराष्ट्र के दलितों पर संभावित प्रभाव

महाराष्ट्र धर्म स्वतंत्रता विधेयक, 2026 का महाराष्ट्र के दलितों पर संभावित प्रभाव

एस आर दारापुरी आईपीएस (से. नि.)

महाराष्ट्र धर्म स्वतंत्रता विधेयक, 2026 ने व्यापक बहस को जन्म दिया है क्योंकि यह धार्मिक परिवर्तन (धर्मांतरण) जैसे अत्यंत संवेदनशील विषय से संबंधित है, जिसका महाराष्ट्र के दलित समुदायों के सामाजिक और ऐतिहासिक जीवन से गहरा संबंध रहा है। महाराष्ट्र में बड़ी संख्या में नवबौद्ध रहते हैं, जिनकी धार्मिक पहचान का आधार डॉ. भीमराव आंबेडकर के नेतृत्व में 1956 में हुए ऐतिहासिक बौद्ध धर्मांतरण आंदोलन में निहित है। इसलिए धर्मांतरण को नियंत्रित करने वाला कोई भी कानून दलित समुदायों पर विशेष प्रभाव डाल सकता है।

प्रस्तावना

विधेयक का उद्देश्य बल, प्रलोभन, धोखाधड़ी, दबाव, मिथ्या प्रस्तुतीकरण अथवा विवाह के माध्यम से किए जाने वाले धर्मांतरण को रोकना बताया गया है। इसके अंतर्गत ऐसे धर्मांतरण के लिए कठोर दंड, कारावास तथा आर्थिक जुर्माने का प्रावधान किया गया है। विधेयक धर्म परिवर्तन से पूर्व सरकारी अधिकारियों को सूचना देने की व्यवस्था भी करता है तथा कुछ परिस्थितियों में यह साबित करने का दायित्व आरोपित व्यक्ति पर डालता है कि धर्मांतरण अवैध नहीं था। महिलाओं, नाबालिगों, अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों के लिए विशेष संरक्षण की व्यवस्था भी प्रस्तावित की गई है।

विधेयक के समर्थकों का तर्क है कि यह कमजोर वर्गों को धोखे और शोषण से बचाने के लिए आवश्यक है। दूसरी ओर आलोचकों का कहना है कि इसकी कुछ धाराएँ इतनी व्यापक हैं कि वे व्यक्ति की धार्मिक स्वतंत्रता और संविधान प्रदत्त अधिकारों को प्रभावित कर सकती हैं।

दलितों के लिए धर्मांतरण का ऐतिहासिक महत्व

दलित समुदायों के लिए धर्मांतरण केवल धार्मिक आस्था का प्रश्न नहीं रहा है, बल्कि यह सामाजिक सम्मान, समानता और जातिगत उत्पीड़न के विरुद्ध प्रतिरोध का माध्यम भी रहा है। 14 अक्टूबर 1956 को नागपुर में डॉ. आंबेडकर द्वारा लाखों अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म स्वीकार करना आधुनिक भारत के सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक आंदोलनों में से एक था।

इस आंदोलन का उद्देश्य केवल धर्म बदलना नहीं था, बल्कि उस जाति-व्यवस्था का अस्वीकार करना था जिसने सदियों तक दलितों को सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से वंचित रखा। इसलिए धर्मांतरण को नियंत्रित करने वाले किसी भी कानून को अनेक दलित संगठन आंबेडकरवादी दृष्टिकोण से देखते हैं।

दलितों पर संभावित सकारात्मक प्रभाव

1. जबरन धर्मांतरण से सुरक्षा

विधेयक के समर्थकों का मानना है कि दलितों सहित सभी कमजोर समुदायों को बलपूर्वक अथवा धोखे से किए जाने वाले धर्मांतरण से सुरक्षा मिलनी चाहिए। अनुसूचित जातियों और जनजातियों से संबंधित मामलों में कठोर दंड का प्रावधान संभावित शोषण को रोकने में सहायक हो सकता है।

2. धर्मांतरण प्रक्रिया में पारदर्शिता

सरकारी निगरानी और निर्धारित प्रक्रिया के माध्यम से यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया गया है कि धर्मांतरण व्यक्ति की स्वतंत्र इच्छा से हो रहा है या नहीं। समर्थकों के अनुसार इससे अवैध गतिविधियों पर अंकुश लग सकता है।

3. कमजोर वर्गों की विशेष सुरक्षा

विधेयक में अनुसूचित जातियों और जनजातियों को विशेष रूप से संरक्षित वर्ग के रूप में चिन्हित किया गया है। इससे यह स्वीकार किया गया है कि ये समुदाय ऐतिहासिक रूप से भेदभाव और शोषण का सामना करते रहे हैं।

दलितों पर संभावित नकारात्मक प्रभाव

1. धार्मिक स्वतंत्रता पर संभावित प्रतिबंध

कई दलित और मानवाधिकार संगठनों का मत है कि विधेयक व्यक्ति की अंतरात्मा की स्वतंत्रता तथा अपनी पसंद का धर्म अपनाने के अधिकार को सीमित कर सकता है। धर्म परिवर्तन से पूर्व सरकारी अधिकारियों को सूचना देने की अनिवार्यता व्यक्तिगत धार्मिक निर्णयों को राज्य के नियंत्रण के दायरे में ला सकती है।

2. आंबेडकरवादी बौद्ध आंदोलन पर प्रभाव

महाराष्ट्र में सामूहिक बौद्ध धर्मांतरण आज भी सामाजिक न्याय और आत्मसम्मान के आंदोलन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। विधेयक के कारण ऐसे आयोजनों पर अतिरिक्त प्रशासनिक और कानूनी बाधाएँ उत्पन्न हो सकती हैं, जिससे उनकी गति प्रभावित हो सकती है।

3. उत्पीड़न और मुकदमेबाजी की आशंका

आलोचकों का कहना है कि विधेयक की कुछ व्यवस्थाओं का दुरुपयोग करके उन व्यक्तियों और संगठनों के विरुद्ध शिकायतें दर्ज कराई जा सकती हैं जो स्वेच्छा से धर्म परिवर्तन करना चाहते हैं। इससे अनावश्यक कानूनी विवाद और प्रशासनिक उत्पीड़न की संभावना बढ़ सकती है।

4. प्रमाण का भार (Burden of Proof)

विधेयक का एक विवादास्पद पक्ष यह है कि कुछ मामलों में यह साबित करने का दायित्व आरोपित व्यक्ति पर डाला जाता है कि धर्मांतरण वैध था। नागरिक स्वतंत्रता के पक्षधर इसे आपराधिक न्याय के सामान्य सिद्धांतों के विपरीत मानते हैं।

5. सामाजिक परिवर्तन आंदोलनों पर प्रतिकूल प्रभाव

दलित आंदोलनों ने लंबे समय से धर्मांतरण को जातिगत उत्पीड़न के विरुद्ध प्रतिरोध और सामाजिक परिवर्तन के साधन के रूप में उपयोग किया है। यदि धर्मांतरण से संबंधित कानूनी प्रक्रियाएँ जटिल और दंडात्मक बन जाती हैं, तो इससे भविष्य में ऐसे आंदोलनों की प्रभावशीलता कम हो सकती है।

संवैधानिक और राजनीतिक विमर्श

इस विधेयक के संबंध में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या यह बलपूर्वक धर्मांतरण को रोकने और संविधान के अनुच्छेद 25 के अंतर्गत प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता के बीच उचित संतुलन स्थापित करता है। समर्थक सर्वोच्च न्यायालय के उन निर्णयों का हवाला देते हैं जिनमें बल, प्रलोभन या धोखे से धर्मांतरण को वैध धार्मिक प्रचार का हिस्सा नहीं माना गया है। वहीं आलोचकों का तर्क है कि “प्रलोभन” और “प्रेरणा” जैसी अवधारणाओं की व्यापक व्याख्या राज्य को व्यक्ति के धार्मिक निर्णयों में अत्यधिक हस्तक्षेप का अवसर दे सकती है।

निष्कर्ष

महाराष्ट्र धर्म स्वतंत्रता विधेयक, 2026 का महाराष्ट्र के दलितों पर प्रभाव बहुआयामी और विवादास्पद होने की संभावना है। एक ओर इसे कमजोर वर्गों को जबरन अथवा धोखे से किए जाने वाले धर्मांतरण से सुरक्षा प्रदान करने वाला कानून बताया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर अनेक दलित और मानवाधिकार संगठन इसे धार्मिक स्वतंत्रता तथा आंबेडकरवादी सामाजिक मुक्ति आंदोलन के लिए चुनौती के रूप में देख रहे हैं।

दलित समुदाय के लिए धर्मांतरण केवल धार्मिक परिवर्तन नहीं, बल्कि सामाजिक समानता, आत्मसम्मान और जाति-आधारित भेदभाव के विरुद्ध संघर्ष का ऐतिहासिक साधन रहा है। इसलिए इस विधेयक का वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि इसका क्रियान्वयन किस प्रकार किया जाता है, न्यायालय इसकी व्याख्या कैसे करते हैं, और प्रशासन इसे किस भावना से लागू करता है। यदि इसका उपयोग केवल बलपूर्वक और धोखाधड़ीपूर्ण धर्मांतरण को रोकने तक सीमित रहता है तो इसका प्रभाव अलग होगा; लेकिन यदि इसका प्रयोग स्वैच्छिक धर्मांतरण और सामाजिक न्याय आंदोलनों को नियंत्रित करने के लिए किया जाता है, तो यह दलितों की धार्मिक स्वतंत्रता और सामाजिक मुक्ति की प्रक्रिया पर दूरगामी प्रभाव डाल सकता है।

जिन दूसरे राज्यों में ऐसे कानून पास किए गए हैं, वहां की रिपोर्टों से पता चलता है कि इससे दलितों का बौद्ध धर्म में धर्मांतरण रुक गया है, जिससे वे निचली जाति के हिंदू बने रहने को मजबूर हो गए हैं; और यही RSS का घोषित मकसद भी है।

 

भारत को ‘निर्वाचित निरंकुशता’ के रूप में क्यों आंका गया है?

  भारत को ‘निर्वाचित निरंकुशता’   के रूप में क्यों आंका गया है ? एस आर दारापुरी आईपीएस (से. नि.) भारत को लंबे समय तक विश्व के सबसे बड़...