रविवार, 18 अक्टूबर 2026

अमीरों पर टैक्स लगाओ और सभी को शिक्षा, स्वास्थ्य, एवं रोजगार की गारंटी दो : आर्थिक न्याय की वकालत

 

अमीरों पर टैक्स लगाओ और सभी को शिक्षा, स्वास्थ्य, एवं रोजगार की गारंटी दो : आर्थिक न्याय की वकालत

एस आर दारापुरी आई.पी.एस.(सेवानिवृत)

प्रस्तावना

भारत दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में से एक है, फिर भी आर्थिक समृद्धि का वितरण असमान है। जहाँ समाज के एक छोटे से वर्ग ने अपार धन इकट्ठा कर लिया है, वहीं लाखों लोग आज भी सम्मानजनक रोजगार, अच्छी शिक्षा, सस्ती स्वास्थ्य सेवा, रहने के लिए उचित घर और सामाजिक सुरक्षा पाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। यह विरोधाभास एक बुनियादी सवाल खड़ा करता है: क्या भारत खुद को सच में एक विकसित राष्ट्र कह सकता है, जब आर्थिक विकास से सभी को सम्मान और अवसर नहीं मिल पाते?

“अमीरों पर टैक्स लगाओ और सभी को शिक्षा, स्वास्थ्य, एवं रोजगार की गारंटी दो” का नारा इस विरोधाभास को दूर करने की जरूरत को दर्शाता है। इसके लिए एक अधिक निष्पक्ष कर प्रणाली और सार्वजनिक व्यय (सरकारी खर्च) की आवश्यकता है। इसका मतलब यह नहीं है कि सिर्फ अमीर होने की वजह से लोगों को दंडित किया जाए या उद्यमशीलता (बिजनेस करने की भावना) को हतोत्साहित किया जाए। बल्कि, यह मांग करता है कि जिनके पास सबसे अधिक आर्थिक संसाधन हैं, वे समाज, संस्थानों, बुनियादी ढांचे और कार्यबल (वर्कफोर्स) के विकास में आनुपातिक रूप से अधिक योगदान दें—क्योंकि इन्हीं चीजों की मदद से उनकी संपत्ति का निर्माण होता है।

धन की असमानता और इसके परिणाम

आर्थिक असमानता का मतलब केवल आय या उपभोग में अंतर होना नहीं है। जब समाज के एक छोटे से वर्ग के पास बहुत अधिक धन जमा हो जाता है, तो इससे शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, रोजगार के अवसरों, राजनीतिक प्रभाव और सार्वजनिक संस्थानों तक पहुँच में भी असमानता पैदा हो सकती है।

भारत में, ये असमानताएँ जाति, लिंग और सामाजिक बहिष्कार से जुड़ी ऐतिहासिक कमियों के साथ और भी गहरी हो जाती हैं। दलितों, आदिवासियों, कई पिछड़े समुदायों और आर्थिक रूप से कमजोर समूहों को आज भी समान अवसर पाने में बाधाओं का सामना करना पड़ता है। इन समुदायों के लिए, गरीबी के साथ-साथ भेदभाव और उत्पादक संसाधनों तक पहुँच की कमी उनकी मुश्किलों को और बढ़ा देती है।

भारत पर ऑक्सफैम (Oxfam) के शोध ने बार-बार इस बात को उजागर किया है कि धन का एक जगह जमा होना, अवसरों की असमानता और सार्वजनिक निवेश की कमी—ये सब आपस में जुड़े हुए हैं। प्रगतिशील कराधान (प्रोग्रेसिव टैक्सेशन) और प्रभावी सार्वजनिक व्यय के जरिए इन संरचनात्मक कमियों को दूर करने में मदद मिल सकती है।

केवल आर्थिक विकास से सामाजिक न्याय की गारंटी नहीं मिल सकती। अर्थव्यवस्था किस गति से बढ़ रही है, इसके साथ-साथ यह भी मायने रखता है कि उस विकास का लाभ लोगों के बीच किस तरह बांटा जा रहा है।

अमीरों को अधिक टैक्स क्यों देना चाहिए?

प्रगतिशील कराधान (प्रोग्रेसिव टैक्सेशन) का सिद्धांत बहुत सीधा है: जिन लोगों की आय और आर्थिक क्षमता अधिक है, उन्हें सार्वजनिक वित्त (सरकारी खजाने) में अपने संसाधनों का एक बड़ा हिस्सा योगदान के रूप में देना चाहिए।

संपत्ति का निर्माण अकेले नहीं होता। व्यवसाय सार्वजनिक बुनियादी ढांचे, शिक्षित कर्मचारियों, कानूनी संस्थानों, वित्तीय प्रणालियों और एक स्थिर सामाजिक माहौल पर निर्भर करते हैं। उद्यमी और निवेशक आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं, लेकिन उनके इस योगदान को संभव बनाने में सामूहिक संसाधनों और सार्वजनिक संस्थानों की अहम भूमिका होती है।

इसलिए, यह उम्मीद करना उचित है कि अमीर व्यक्ति और मुनाफ़ा कमाने वाली कंपनियाँ अपनी कर (टैक्स) संबंधी ज़िम्मेदारियों को ईमानदारी से निभाएँ। एक बेहतर ढंग से तैयार की गई कर प्रणाली ऐसी होनी चाहिए जो आर्थिक विशेषाधिकारों के संचय को सामाजिक ज़िम्मेदारियों से बचने का ज़रिया न बनने दे।

भारत को कई उपायों को एक साथ लागू करने पर विचार करना चाहिए, जिनमें शामिल हैं: उच्च आय और पूंजीगत लाभ (कैपिटल गेन्स) पर प्रभावी कराधान, अनुचित कर छूटों में कटौती, कर चोरी के खिलाफ सख्त कार्रवाई, और बड़ी विरासत (इनहेरिटेंस) पर उचित कर लगाना। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने भी संपत्ति कर के विश्लेषण में इस बात पर ज़ोर दिया है कि कर कानूनों की कमियों (लूपहोल्स) को दूर किया जाए और पूंजी से होने वाली आय पर करों को मज़बूत किया जाए। साथ ही, यह भी माना गया है कि जमा संपत्ति पर कर लगाने में प्रशासनिक चुनौतियाँ आ सकती हैं।

हमारा लक्ष्य एक निष्पक्ष, पारदर्शी और लागू करने योग्य कर प्रणाली होना चाहिए—न कि अंधाधुंध कर लगाना या निजी संपत्ति को मनमाने ढंग से ज़ब्त करना।

कर से प्राप्त राजस्व का उपयोग जनता के हित में होना चाहिए

अमीरों पर कर लगाने का तभी कोई अर्थ है, जब उससे प्राप्त राजस्व का उपयोग पारदर्शी और प्रभावी ढंग से जन कल्याण के लिए किया जाए। इसका मुख्य उद्देश्य आम नागरिकों के जीवन स्तर और उनके अवसरों में सुधार करना होना चाहिए।

अतिरिक्त सार्वजनिक संसाधनों का उपयोग निम्नलिखित क्षेत्रों को मज़बूत करने के लिए किया जाना चाहिए:

·         शिक्षा: गुणवत्तापूर्ण सरकारी स्कूल, सस्ती उच्च शिक्षा, छात्रवृत्तियाँ, और ऐसे संस्थान जो वंचित छात्रों को पुरानी बाधाओं को पार करने में मदद करें।

·         स्वास्थ्य सेवा: सुलभ प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा, पर्याप्त स्टाफ वाले सरकारी अस्पताल, सस्ती दवाएँ, और चिकित्सा आपात स्थितियों के दौरान वित्तीय सुरक्षा।

·         रोज़गार: उत्पादक रोज़गार का सृजन, व्यावसायिक प्रशिक्षण, छोटे उद्यमों को समर्थन, और काम की बेहतर स्थितियाँ।

·         सामाजिक सुरक्षा: पेंशन, विकलांगता सहायता, मातृत्व लाभ, और असंगठित या असुरक्षित कामगारों के लिए सुरक्षा।

·         ग्रामीण विकास: सिंचाई, कृषि संबंधी बुनियादी ढाँचा, पीने का पानी, स्वच्छता, और विश्वसनीय सार्वजनिक सेवाएँ।

·         सामाजिक न्याय: संवैधानिक सुरक्षा उपायों को प्रभावी ढंग से लागू करना, और जाति-आधारित भेदभाव तथा अन्य संरचनात्मक कमियों को दूर करने वाले कार्यक्रमों को चलाना।

इस तरह के निवेश केवल तत्काल राहत ही नहीं देते, बल्कि ये मानवीय क्षमताओं का विस्तार करते हैं, उत्पादकता बढ़ाते हैं, सामाजिक गतिशीलता को मजबूत करते हैं और अधिक लोगों को आर्थिक विकास में भागीदार बनने का अवसर देते हैं।

इसलिए, कराधान (taxation) का उद्देश्य केवल सरकारी राजस्व जुटाने तक सीमित नहीं होना चाहिए। इसका लक्ष्य एक ऐसे समाज का निर्माण करना भी होना चाहिए, जहाँ अवसर मुख्य रूप से विरासत में मिली संपत्ति या सामाजिक पृष्ठभूमि से तय न हों।

आर्थिक न्याय पर एक अंबेडकरवादी दृष्टिकोण

डॉ. बी.आर. अंबेडकर का राजनीतिक और सामाजिक दर्शन, आर्थिक असमानता और लोकतंत्र के बीच के संबंध को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण आधार प्रदान करता है। उनका तर्क था कि सामाजिक लोकतंत्र के बिना राजनीतिक लोकतंत्र सुरक्षित नहीं रह सकता; और सामाजिक एवं आर्थिक लोकतंत्र स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के सिद्धांतों पर टिका होता है।

कानून के समक्ष औपचारिक समानता होने मात्र से ही वे असमान सामाजिक और आर्थिक स्थितियाँ अपने आप खत्म नहीं हो जातीं, जिनमें लोग रहते हैं। जिस व्यक्ति के पास शिक्षा, सुरक्षित रोजगार, स्वास्थ्य सेवा या आर्थिक स्वतंत्रता तक पहुँच नहीं है, उसके पास संवैधानिक अधिकार तो हो सकते हैं, लेकिन उन अधिकारों का प्रभावी ढंग से उपयोग करने के लिए आवश्यक भौतिक संसाधन नहीं होते।

अंबेडकरवादी दृष्टिकोण से, प्रगतिशील कराधान (progressive taxation) को इन असमानताओं को कम करने और लोकतंत्र के सामाजिक आधार को मजबूत करने के एक साधन के रूप में देखा जा सकता है। सार्वजनिक निवेश ऐसा होना चाहिए जिससे ऐतिहासिक रूप से वंचित समुदायों को शिक्षा, रोजगार, प्रतिनिधित्व और आर्थिक स्वतंत्रता मिल सके।

हालाँकि, केवल कराधान के माध्यम से जाति-प्रथा या भेदभाव को पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सकता। इन लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए संवैधानिक अधिकारों का प्रभावी क्रियान्वयन, सार्वजनिक संस्थानों तक समान पहुँच, सामाजिक सुधार, और अवसरों तथा सत्ता का पुनर्वितरण भी आवश्यक है।

आर्थिक नीति की असली कसौटी यह है कि क्या वह केवल कुल राष्ट्रीय संपत्ति बढ़ाने के बजाय, वास्तविक और ठोस समानता को आगे बढ़ाती है।

चुनौतियाँ और जिम्मेदार सुधार की आवश्यकता

प्रगतिशील कराधान की रूपरेखा बहुत सावधानी से तैयार की जानी चाहिए। यदि संपत्ति कर (wealth tax) ठीक से नहीं बनाए गए हैं, तो इससे संपत्ति के मूल्यांकन में कठिनाइयाँ आ सकती हैं, कर चोरी को बढ़ावा मिल सकता है, और प्रशासनिक लागत बहुत अधिक हो सकती है। अत्यधिक या अनिश्चित कराधान उत्पादक निवेश को भी हतोत्साहित कर सकता है।

इन चिंताओं का मतलब यह नहीं है कि कर सुधार की आवश्यकता नहीं है; बल्कि ये एक बेहतर और सुदृढ़ नीति बनाने के महत्व को दर्शाती हैं।

भारत को कर प्रशासन को मजबूत करना चाहिए, संपत्ति के स्वामित्व में पारदर्शिता लानी चाहिए, अवैध वित्तीय प्रवाह पर रोक लगानी चाहिए, और कर चोरी से निपटने के लिए अन्य देशों के साथ समन्वय करना चाहिए। कर नीतियों में उत्पादक निवेश और कर चोरी, भ्रष्टाचार, एकाधिकार या सार्वजनिक संसाधनों तक विशेष पहुँच के जरिए संपत्ति जमा करने के बीच स्पष्ट अंतर किया जाना चाहिए।

इसके साथ ही, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि सार्वजनिक धन कैसे खर्च किया जाता है, इसके लिए सरकार जवाबदेह हो। स्वतंत्र ऑडिट, पारदर्शी बजट, प्रभावी संसदीय निगरानी और जनभागीदारी यह सुनिश्चित करने में मदद कर सकते हैं कि कर से प्राप्त राजस्व सही लाभार्थियों तक पहुँचे।

आर्थिक न्याय की ज़िम्मेदारी केवल अमीर व्यक्तियों पर ही नहीं होती। यह राज्य की भी ज़िम्मेदारी है, जिसे यह सुनिश्चित करना चाहिए कि सार्वजनिक संसाधनों का कुशलतापूर्वक उपयोग हो और आर्थिक नीतियां व्यापक जनहित में काम करें।

निष्कर्ष: एक अधिक समानता वाला भारत ही एक मज़बूत भारत है।

भारत के सामने सवाल यह नहीं है कि धन-सृजन को बढ़ावा दिया जाना चाहिए या उस पर दंड लगाया जाना चाहिए। सवाल यह है कि आर्थिक विकास का लाभ अधिक निष्पक्ष तरीके से कैसे बाँटा जाए और क्या हर नागरिक को सम्मान के साथ जीने का सार्थक अवसर मिलना चाहिए।

कोई भी राष्ट्र अपनी पूरी क्षमता तब तक हासिल नहीं कर सकता, जब तक कि लाखों लोग अच्छी शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, सम्मानजनक रोज़गार और आर्थिक सुरक्षा से वंचित रहें, जबकि धन और अवसर कुछ ही हाथों में सिमटते जाएँ। साथ ही, लोकतंत्र भी तब तक लंबे समय तक नहीं पनप सकता, जब तक कि आर्थिक विशेषाधिकार सार्वजनिक निर्णयों पर अनुचित प्रभाव डालते रहें।

इसलिए, "अमीरों पर कर लगाओ और सभी को शिक्षा, स्वास्थ्य एवं रोजगार गारंटी दो" (Tax the Rich and guarantee  education, healthcare, and employment for all) का नारा, धन, सार्वजनिक ज़िम्मेदारी और लोकतांत्रिक नागरिकता के बीच के संबंधों पर पुनर्विचार करने का आह्वान है। यह एक ऐसी व्यवस्था की वकालत करता है, जिसमें अधिक आर्थिक क्षमता वाले लोग उचित योगदान दें, सार्वजनिक संसाधनों से ज़रूरी सेवाओं को मज़बूत किया जाए, और ऐतिहासिक रूप से पिछड़े समुदायों को आगे बढ़ने के वास्तविक अवसर मिलें।

एक विकसित भारत का पैमाना केवल उसकी अर्थव्यवस्था के आकार, अरबपतियों की संख्या या वित्तीय बाजारों के मूल्य तक सीमित नहीं होना चाहिए। इसमें सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता, अस्पतालों तक लोगों की पहुँच, कामगारों की सुरक्षा और समाज के सबसे वंचित नागरिकों को मिलने वाला सम्मान भी शामिल होना चाहिए।

एक निष्पक्ष कर प्रणाली हर समस्या का समाधान तो नहीं कर सकती, लेकिन यह एक अधिक समान समाज के निर्माण के लिए जरूरी भौतिक परिस्थितियाँ तैयार करने में मदद कर सकती है।

इसका उद्देश्य अमीरों को गरीब बनाना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि कुछ लोगों की समृद्धि की कीमत लाखों लोगों को गरीबी, अभाव और सामाजिक बहिष्कार के रूप में न चुकानी पड़े।

आल इंडिया पीपुल्स फ्रन्ट पिछले काफी समय से “रोजगार-सामाजिक अधिकार अभियान” के अंतर्गत अन्य मांगों के साथ साथ “कारपोरेट संपत्ति पर टैक्स लगे : रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, पेंशन की गारंटी हो” की मांग को उठा रहा है। इसी संबंध में “नई पीढ़ी संवाद” के अंतर्गत 20 नवंबर को शास्त्री घाट वाराणसी में एक कार्यक्रम भी रखा गया परंतु इसे पुलिस द्वारा अनुमति नहीं दी गई थी जिसके विरुद्ध इलाहाबाद हाई कोर्ट में रिट भी दायर की गई है।   

 


अमीरों पर टैक्स लगाओ और सभी को शिक्षा, स्वास्थ्य, एवं रोजगार की गारंटी दो : आर्थिक न्याय की वकालत

  अमीरों पर टैक्स लगाओ और सभी को शिक्षा, स्वास्थ्य, एवं रोजगार की गारंटी दो : आर्थिक न्याय की वकालत एस आर दारापुरी आई.पी.एस.(सेवानिवृत) ...