आंबेडकरवादी
राजनीतिक–सैद्धांतिक परिप्रेक्ष्य में संत कबीर: नैतिक विद्रोह से सामाजिक मुक्ति
की राजनीति तक
एस आर दारापुरी आई.पी.एस.(रिटायर्ड)

संत कबीर (लगभग पंद्रहवीं शताब्दी) भारतीय
बौद्धिक एवं सामाजिक इतिहास के उन विरल चिंतकों में हैं, जिनका स्थान अद्वितीय है। सामान्यतः उन्हें
भक्ति आंदोलन के प्रमुख संत-कवि के रूप में स्मरण किया जाता है, किंतु यह प्रस्तुति प्रायः उनके चिंतन की
क्रांतिकारी सामाजिक अंतर्वस्तु को गौण कर देती है। कबीर केवल आध्यात्मिक मुक्ति
के साधक नहीं थे; वे जाति-व्यवस्था, धार्मिक रूढ़िवाद, पुरोहितवादी प्रभुत्व तथा ज्ञान पर एकाधिकार के निर्भीक आलोचक थे। उनकी
वाणी मध्यकालीन भारतीय समाज की वैचारिक और सामाजिक संरचनाओं के विरुद्ध एक सशक्त
बौद्धिक हस्तक्षेप थी।
समकालीन अनुसंधान ने यह स्पष्ट किया है कि कबीर
का महत्व केवल भक्तिकाव्य तक सीमित नहीं है। उनका चिंतन ब्राह्मणवाद और सामाजिक
असमानता की प्रारंभिक नैतिक आलोचनाओं में से एक है। तथापि, उनकी विचारधारा मुख्यतः नैतिक एवं आध्यात्मिक
प्रतिरोध तक सीमित रही; वह सामाजिक परिवर्तन के लिए
किसी संगठित राजनीतिक कार्यक्रम का रूप ग्रहण नहीं कर सकी।
कबीर के चिंतन का वास्तविक राजनीतिक महत्व तब
अधिक स्पष्ट होता है, जब उसका अध्ययन डॉ. भीमराव
रामजी आंबेडकर द्वारा विकसित राजनीतिक–सैद्धांतिक दृष्टिकोण के आलोक में किया जाता
है। डॉ. आंबेडकर ने जाति को केवल नैतिक बुराई नहीं माना, बल्कि उसे धर्म, अर्थव्यवस्था, राजनीति और संस्कृति में
निहित "श्रेणीबद्ध असमानता" (Graded
Inequality) की एक संगठित व्यवस्था के रूप
में विश्लेषित किया। उनका मत था कि जाति का उन्मूलन केवल नैतिक उपदेशों से नहीं, बल्कि संवैधानिक लोकतंत्र, सामाजिक आंदोलनों, शिक्षा, विधिक सुधार तथा राजनीतिक
संगठन के माध्यम से ही संभव है।
इस दृष्टि से देखा जाए तो कबीर आधुनिक
जाति-विरोधी चिंतन के अग्रदूत के रूप में सामने आते हैं। ब्राह्मणवादी सत्ता की
उनकी आलोचना, श्रम की प्रतिष्ठा, शास्त्रीय वर्चस्व का निषेध तथा मानवीय समानता
का उनका आग्रह उन मूलभूत सिद्धांतों का पूर्वाभास कराते हैं, जिन्हें आंबेडकर ने आगे चलकर एक सुव्यवस्थित
राजनीतिक दर्शन का रूप दिया। फिर भी दोनों के बीच एक महत्वपूर्ण अंतर विद्यमान है।
कबीर ने आध्यात्मिक जागरण के माध्यम से नैतिक परिवर्तन का मार्ग प्रस्तावित किया, जबकि आंबेडकर ने राजनीतिक संगठन, संवैधानिक अधिकारों और लोकतांत्रिक
संस्थाओं के माध्यम से सामाजिक मुक्ति का कार्यक्रम प्रस्तुत किया।
अतः इस निबंध का तर्क है कि कबीर को न तो केवल
एक रहस्यवादी संत के रूप में सीमित किया जाना चाहिए और न ही उन्हें आधुनिक
राजनीतिक चिंतक घोषित किया जाना चाहिए। उन्हें बहुजन प्रतिरोध की उस दीर्घ
ऐतिहासिक परंपरा के एक आधारभूत विचारक के रूप में समझना अधिक उपयुक्त होगा, जिसके नैतिक विद्रोह ने आगे चलकर डॉ. आंबेडकर की "जाति के
उन्मूलन" की आधुनिक परियोजना के लिए
वैचारिक भूमि तैयार की।
सामाजिक अवस्थिति और ज्ञान की
राजनीति
कबीर की सामाजिक पृष्ठभूमि उनके दर्शन को समझने
की कुंजी है। परंपरा के अनुसार वे एक जुलाहा (बुनकर) परिवार में पले-बढ़े। इस
परंपरा की ऐतिहासिक प्रामाणिकता से अधिक महत्वपूर्ण इसका समाजशास्त्रीय अर्थ है।
कबीर ब्राह्मणवादी शास्त्रीय अभिजात वर्ग से नहीं, बल्कि श्रमशील उत्पादक समुदाय से आए थे।
इसी सामाजिक स्थिति ने उनके ज्ञान-दर्शन को आकार
दिया। ब्राह्मणवादी समाज में ज्ञान पर अधिकार जाति द्वारा नियंत्रित था। संस्कृत
और शास्त्रों का अध्ययन उच्च जातियों तक सीमित था, जबकि श्रमजीवी वर्गों को बौद्धिक अधिकार से वंचित रखा गया। कबीर ने संस्कृत
की बजाय लोकभाषाओं में रचना करके इस ज्ञान-एकाधिकार को चुनौती दी। उनकी भाषा स्वयं
सामाजिक लोकतंत्रीकरण का माध्यम बन गई।
डॉ. आंबेडकर ने आगे चलकर इसी तथ्य को सैद्धांतिक
रूप दिया कि जाति केवल श्रम का विभाजन नहीं, बल्कि "श्रमिकों का विभाजन" है, जिसे वैचारिक नियंत्रण द्वारा
बनाए रखा जाता है। इस प्रकार कबीर ब्राह्मणवादी ज्ञान-सत्ता के विरुद्ध प्रारंभिक
प्रतिरोध का प्रतिनिधित्व करते हैं।
जाति और धार्मिक सत्ता की
आलोचना
कबीर के चिंतन का केंद्रीय विषय जाति और धार्मिक
पदानुक्रम का विरोध है। उन्होंने बार-बार ब्राह्मणवादी पवित्रता और जन्माधारित
श्रेष्ठता के दावों को चुनौती दी तथा प्रश्न उठाया कि जब सभी मनुष्य समान जैविक
प्रक्रिया से जन्म लेते हैं, तब जन्म
किसी की आध्यात्मिक श्रेष्ठता का आधार कैसे हो सकता है।
उनकी आलोचना केवल हिंदू धर्म तक सीमित नहीं थी।
उन्होंने मूर्तिपूजा, तीर्थयात्रा, पुरोहितवाद, कर्मकांड, रोज़ा, नमाज़ और धार्मिक
औपचारिकताओं—सभी की आलोचना की, जब वे नैतिक
जीवन और मानवीय करुणा का स्थान लेने लगती हैं। उनका विरोध धर्म से नहीं, बल्कि धर्म के संस्थागत दुरुपयोग से था।
डॉ. आंबेडकर ने बाद में इसी समस्या का
संरचनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि जाति धार्मिक ग्रंथों
और सामाजिक परंपराओं से वैधता प्राप्त करती है। जहाँ कबीर ने इस व्यवस्था की नैतिक
विसंगतियों को उजागर किया, वहीं आंबेडकर ने उसके
राजनीतिक और संवैधानिक उन्मूलन का कार्यक्रम प्रस्तुत किया।
निर्गुण भक्ति और श्रेणीबद्ध
समाज का निषेध
कबीर की निर्गुण भक्ति उनके दर्शन का केंद्रीय
तत्व है। मंदिर, मूर्ति और पुरोहित से परे
स्थित निर्गुण ईश्वर धार्मिक सत्ता की उस संरचना को ध्वस्त करता है, जिस पर जाति-व्यवस्था टिकी हुई है।
निर्गुण ईश्वर किसी विशेष
जाति का नहीं हो सकता, किसी
पुरोहित के नियंत्रण में नहीं रह सकता और किसी धार्मिक संस्था का निजी अधिकार नहीं बन सकता।
आंबेडकरवादी दृष्टि से यह अवधारणा गहरे
लोकतांत्रिक निहितार्थ रखती है। यह धार्मिक असमानता की वैचारिक नींव को चुनौती
देती है। किंतु जहाँ कबीर आध्यात्मिक समानता तक सीमित रहते हैं, वहीं आंबेडकर राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक समानता की संस्थागत स्थापना
पर बल देते हैं।
श्रम, नैतिकता और मानवीय गरिमा
मध्यकालीन संत परंपरा में जहाँ अनेक संत संन्यास
को आदर्श मानते थे, वहीं कबीर ने गृहस्थ जीवन और
श्रम को आध्यात्मिक जीवन का आधार माना। उन्होंने स्वयं जीवनभर बुनकर का कार्य किया
और श्रम को गरिमा प्रदान की।
यह दृष्टि जाति-व्यवस्था के उस मूल सिद्धांत का
प्रतिवाद थी, जो उत्पादक श्रम को हीन मानती
थी। डॉ. आंबेडकर ने इसी विचार को आगे बढ़ाते हुए कहा कि जाति-व्यवस्था श्रम को
नहीं, बल्कि श्रमिकों को अपमानित
करती है। इस प्रकार श्रम की कबीर की नैतिक प्रतिष्ठा आधुनिक सामाजिक न्याय के
सिद्धांत की पूर्वपीठिका बन जाती है।
नैतिक विद्रोह से राजनीतिक
परिवर्तन तक
कबीर और आंबेडकर के बीच सबसे महत्वपूर्ण अंतर
उनके ऐतिहासिक संदर्भ और परिवर्तन की रणनीति में है।
कबीर का प्रतिरोध मुख्यतः नैतिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक था। उन्होंने कविता, संवाद और आत्मचेतना के माध्यम से सामाजिक
परिवर्तन का प्रयास किया, किंतु उन्होंने राजनीतिक
संगठन या संस्थागत परिवर्तन का कोई कार्यक्रम प्रस्तुत नहीं किया।
इसके विपरीत डॉ. आंबेडकर ने यह स्पष्ट किया कि
केवल नैतिक उपदेशों से जाति का विनाश संभव नहीं है। उन्होंने शिक्षा, संगठन, संघर्ष, संवैधानिक अधिकार, प्रतिनिधित्व, राज्यसत्ता और नवयान बौद्ध धर्म के माध्यम से सामाजिक मुक्ति की ठोस
राजनीतिक परियोजना प्रस्तुत की।
अतः कबीर से आंबेडकर तक की यात्रा नैतिक प्रतिरोध से लोकतांत्रिक राजनीतिक क्रांति की यात्रा है।
बहुजन बौद्धिक परंपरा में
कबीर
कबीर को रैदास, तुकाराम, महात्मा जोतिराव फुले, पेरियार ई.वी. रामासामी, नारायण गुरु और डॉ. बी.आर. आंबेडकर की बहुजन
बौद्धिक परंपरा में देखा जाना चाहिए। यद्यपि इन सभी का ऐतिहासिक संदर्भ अलग-अलग है, फिर भी इनका साझा लक्ष्य ब्राह्मणवादी वर्चस्व
का प्रतिरोध, श्रम की प्रतिष्ठा और
समानतामूलक समाज की स्थापना है।
कबीर ने कविता और नैतिक आलोचना का मार्ग अपनाया; फुले ने इतिहास और शिक्षा का; पेरियार ने तर्कवाद और आत्मसम्मान का; जबकि आंबेडकर ने इन सभी परंपराओं को आधुनिक
लोकतांत्रिक दर्शन, संवैधानिक नैतिकता तथा
सामाजिक न्याय के व्यापक कार्यक्रम में रूपांतरित किया।
उपसंहार
आंबेडकरवादी राजनीतिक–सैद्धांतिक परिप्रेक्ष्य
में संत कबीर का पुनर्पाठ हमें उन्हें भारतीय जाति-विरोधी परंपरा के प्रथम
महत्त्वपूर्ण वैचारिक स्तंभों में देखने की दृष्टि प्रदान करता है। जाति, धार्मिक रूढ़िवाद, पुरोहितवाद और ज्ञान के एकाधिकार के विरुद्ध उनका प्रतिरोध ब्राह्मणवादी
सामाजिक व्यवस्था के विरुद्ध एक ऐतिहासिक नैतिक विद्रोह था।
फिर भी उनकी परियोजना मुख्यतः नैतिक और
आध्यात्मिक आलोचना तक सीमित रही। डॉ. भीमराव आंबेडकर ने इसी नैतिक विरासत को
आधुनिक राजनीतिक दर्शन में रूपांतरित करते हुए जाति-उन्मूलन, संवैधानिक लोकतंत्र, सामाजिक न्याय और मानवाधिकारों पर आधारित एक
व्यापक मुक्ति-दर्शन का निर्माण किया।
इस प्रकार कबीर और आंबेडकर समान विचारक नहीं, बल्कि भारतीय समानतावादी परंपरा के दो ऐतिहासिक
चरण हैं। कबीर ने उत्पीड़ित समाज की नैतिक चेतना को जागृत किया, जबकि आंबेडकर ने उसकी मुक्ति के लिए राजनीतिक
दर्शन, संवैधानिक संरचना और
लोकतांत्रिक कार्यक्रम प्रदान किया। भारतीय इतिहास में सामाजिक न्याय और समानता की
यह परंपरा आज भी लोकतांत्रिक भारत के लिए प्रेरणा और दिशा का महत्वपूर्ण स्रोत बनी
हुई है।