बुधवार, 20 मई 2026

भारतीय समाज में बढ़ती हिंसा: कारण, राजकीय दमन और लोकतंत्र का संकट

 

भारतीय समाज में बढ़ती हिंसा: कारण, राजकीय दमन और लोकतंत्र का संकट

एस आर दारापुरी आई.पी.एस. (से. नि.)

भारतीय समाज में हिंसा की बढ़ती प्रवृत्ति एक जटिल सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक प्रक्रिया का परिणाम है। आज हिंसा अनेक रूपों में दिखाई देती है—साम्प्रदायिक हिंसा, जातीय अत्याचार, महिलाओं के विरुद्ध हिंसा, माब लिंचिंग, घृणा-भाषण, राजनीतिक दमन, पुलिस अत्याचार, साइबर उत्पीड़न तथा गरीबी और वंचना से उत्पन्न संरचनात्मक हिंसा। इस समस्या को समझने के लिए केवल व्यक्तिगत अपराध या नैतिक पतन को जिम्मेदार मानना पर्याप्त नहीं है; इसके पीछे समाज और राज्य की व्यापक संरचनात्मक प्रक्रियाओं को समझना आवश्यक है।

1. हिंसा के सामाजिक और आर्थिक कारण

(क) बढ़ती आर्थिक असमानता

भारत में आर्थिक विकास तो हुआ है, किन्तु इसके साथ-साथ आर्थिक असमानता भी तेजी से बढ़ी है। एक छोटा-सा वर्ग अत्यधिक संपत्ति का मालिक बन गया है, जबकि बड़ी आबादी बेरोजगारी, महँगाई, कृषि संकट और असुरक्षा से जूझ रही है। ऐसी परिस्थितियाँ समाज में असंतोष, हताशा और आक्रोश को जन्म देती हैं।

जब लोकतांत्रिक संस्थाएँ जनता की समस्याओं का समाधान करने में असफल होती हैं, तब यह आक्रोश कमजोर समुदायों के विरुद्ध साम्प्रदायिक या जातीय हिंसा के रूप में व्यक्त हो सकता है।

(ख) बेरोजगारी और युवाओं में निराशा

भारत की विशाल युवा आबादी शिक्षा प्राप्त करने के बावजूद सम्मानजनक रोजगार से वंचित है। बेरोजगारी और अस्थायी रोजगार की स्थिति युवाओं में असुरक्षा और असंतोष उत्पन्न करती है। ऐसे युवाओं को राजनीतिक, धार्मिक या जातीय संगठन आसानी से हिंसक अभियानों में शामिल कर लेते हैं।

(ग) सामाजिक संबंधों का विघटन

तेजी से बढ़ते शहरीकरण, प्रवासन और पारंपरिक सामुदायिक संरचनाओं के कमजोर होने से समाज में आपसी संवाद और सामूहिकता कम हुई है। सोशल मीडिया ने प्रत्यक्ष मानवीय संबंधों की जगह ले ली है, जिसके कारण अफवाहें, नफ़रत और सामाजिक ध्रुवीकरण तेजी से फैलता है।

(घ) पितृसत्ता और जाति व्यवस्था

भारत में हिंसा का गहरा संबंध सामाजिक पदानुक्रम से है। महिलाओं, दलितों, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों के विरुद्ध हिंसा प्रायः प्रभुत्वशाली वर्गों द्वारा अपने सामाजिक वर्चस्व को बनाए रखने का माध्यम होती है। आनर किलिंग, जातीय अत्याचार और साम्प्रदायिक हमले केवल अपराध नहीं, बल्कि सामाजिक नियंत्रण के उपकरण भी हैं।

2. राजनीतिक कारण

(क) साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण

चुनावी राजनीति में धार्मिक पहचान के बढ़ते उपयोग ने सामाजिक तनाव को गहरा किया है। जब राजनीतिक शक्तियाँ अल्पसंख्यकों को “राष्ट्र”, “संस्कृति” या “सुरक्षा” के लिए खतरे के रूप में प्रस्तुत करती हैं, तब समाज में घृणा और अविश्वास बढ़ता है। इससे हिंसा को वैधता मिलने लगती है।

(ख) घृणा-भाषण का सामान्यीकरण

टीवी चैनलों, सोशल मीडिया और राजनीतिक भाषणों में आक्रामकता और घृणा की भाषा लगातार बढ़ी है। जब सार्वजनिक जीवन में नफरत फैलाने वाले वक्तव्यों पर कार्रवाई नहीं होती, तब समाज में यह संदेश जाता है कि हिंसक व्यवहार स्वीकार्य है।

(ग) लोकतांत्रिक संस्थाओं का कमजोर होना

न्यायपालिका, स्वतंत्र मीडिया, विश्वविद्यालय, नागरिक समाज और संवैधानिक संस्थाएँ लोकतंत्र की सुरक्षा करती हैं। यदि ये संस्थाएँ कमजोर या राजनीतिक रूप से नियंत्रित हो जाएँ, तो दण्डमुक्ति (impunity) बढ़ती है और हिंसा को रोकने की क्षमता घटती है।

जब जनता का कानून और न्याय व्यवस्था पर विश्वास कम होता है, तब भीड़तंत्र और प्रतिशोधात्मक हिंसा बढ़ सकती है।

3. क्या राज्य दमन और निरंकुश प्रवृत्तियाँ भी हिंसा के लिए जिम्मेदार हैं?

हाँ, अनेक विद्वानों और मानवाधिकार संगठनों का मत है कि राज्य दमन और अधिनायकवादी प्रवृत्तियाँ समाज में हिंसा को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।

(क) राज्य की दमनकारी शक्ति

आधुनिक राज्य के पास पुलिस, सेना, निगरानी तंत्र और कठोर कानूनों के रूप में व्यापक दमनकारी शक्ति होती है। जब इन शक्तियों का प्रयोग असमान, पक्षपातपूर्ण या अत्यधिक रूप में किया जाता है, तब समाज में भय और असंतोष बढ़ता है।

इसके उदाहरण हैं:

हिरासत में यातना, फर्जी मुठभेड़, मनमानी गिरफ्तारियाँ, असहमति रखने वालों पर कठोर कानूनों का प्रयोग, शांतिपूर्ण आंदोलनों का दमन, इंटरनेट बंदी एवं पुलिस बल का अत्यधिक प्रयोग।

ऐसी परिस्थितियों में समाज भी हिंसा को सामान्य मानने लगता है।

(ख) कानून के राज का क्षरण

यदि जनता को यह महसूस हो कि कानून का प्रयोग चुनिंदा लोगों के विरुद्ध किया जा रहा है, जबकि सत्ता से जुड़े लोगों को संरक्षण मिलता है, तो संविधान और न्याय व्यवस्था पर विश्वास कमजोर होता है। इससे लोग यह मानने लगते हैं कि न्याय का आधार कानून नहीं, बल्कि राजनीतिक शक्ति है।

(ग) अधिनायकवादी राजनीतिक संस्कृति

जब राजनीतिक संस्कृति में अंध-राष्ट्रवाद, नेता-पूजा और असहमति को “राष्ट्र-विरोध” या “धर्म-विरोध” के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, तब लोकतांत्रिक संवाद कमजोर होता है। इससे समाज में असहिष्णुता और आक्रामकता बढ़ती है।

(घ) राजनीति का अपराधीकरण और सैन्यीकरण

यदि राजनीतिक दल विरोधियों को दबाने के लिए हिंसा, धमकी, पुलिस शक्ति या गैर-कानूनी समूहों का उपयोग करते हैं, तो धीरे-धीरे राजनीति में हिंसा संस्थागत रूप ले लेती है। समाज भी यह मानने लगता है कि विवादों का समाधान संवाद नहीं, बल्कि शक्ति और बल से होता है।

4. संरचनात्मक हिंसा की अवधारणा

Johan Galtung ने प्रत्यक्ष हिंसा और संरचनात्मक हिंसा के बीच अंतर किया था। संरचनात्मक हिंसा वह स्थिति है जिसमें सामाजिक और आर्थिक व्यवस्थाएँ लोगों को समान अवसर, शिक्षा, स्वास्थ्य, सम्मान और जीवन की बुनियादी सुविधाओं से वंचित करती हैं।

भारत में जाति, वर्ग, लिंग और धर्म पर आधारित असमानताएँ ऐसी संरचनात्मक हिंसा को जन्म देती हैं, जो आगे चलकर प्रत्यक्ष हिंसा का रूप धारण कर सकती है।

इसी प्रकार B. R. Ambedkar ने चेतावनी दी थी कि सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र के बिना राजनीतिक लोकतंत्र टिक नहीं सकता। यदि समाज में गहरी असमानता बनी रहती है, तो हिंसा और तनाव बढ़ना स्वाभाविक है।

5. मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म की भूमिका

सोशल मीडिया ने अफवाहों, फर्जी खबरों और घृणा-प्रचार को अत्यंत तेज़ बना दिया है। कई बार झूठी सूचनाएँ कुछ ही घंटों में भीड़ हिंसा को जन्म दे देती हैं। टीवी मीडिया का एक हिस्सा भी सनसनीखेज और ध्रुवीकरणकारी बहसों के माध्यम से सामाजिक विभाजन को गहरा करता है।

6. मनोवैज्ञानिक और सांस्कृतिक पहलू

लगातार असुरक्षा, आक्रामक राजनीतिक भाषा और उपभोक्तावादी प्रतिस्पर्धा समाज में तनाव और क्रोध को बढ़ाती है। जब समाज में:

आक्रामकता का महिमामंडन होने लगे, सहानुभूति कम हो जाए, असहमति को देशद्रोह माना जाए एवं हिंसक व्यवहार पर कठोर दंड न मिले।

तब हिंसा धीरे-धीरे सामान्य सामाजिक व्यवहार का हिस्सा बन जाती है।

7. सकारात्मक पक्ष

फिर भी भारत की स्थिति पूरी तरह निराशाजनक नहीं है। आज भी देश में:

स्वतंत्र न्यायपालिका, संवैधानिक अधिकार, नागरिक अधिकार आंदोलन, मानवाधिकार संगठन, स्वतंत्र पत्रकार, छात्र आंदोलन, श्रमिक संघर्ष और लोकतांत्रिक चुनावी प्रक्रिया

मौजूद हैं, जो लोकतंत्र और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

निष्कर्ष

भारतीय समाज में हिंसा की बढ़ती प्रवृत्ति किसी एक कारण का परिणाम नहीं है। इसके पीछे आर्थिक असमानता, बेरोजगारी, जातीय और साम्प्रदायिक तनाव, राजनीतिक ध्रुवीकरण, संस्थागत कमजोरी, मीडिया की भूमिका और सामाजिक असुरक्षा जैसे अनेक कारण कार्य कर रहे हैं।

राज्य दमन और अधिनायकवादी प्रवृत्तियाँ भी हिंसा को बढ़ाने में योगदान दे सकती हैं, विशेषकर तब जब सत्ता का प्रयोग पक्षपातपूर्ण ढंग से हो, असहमति को दबाया जाए और संवैधानिक संस्थाएँ कमजोर हों। ऐसी स्थिति में समाज में भी हिंसा और असहिष्णुता सामान्य होती जाती है।

दीर्घकालिक समाधान केवल कठोर पुलिस व्यवस्था में नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, आर्थिक समानता, संवैधानिक मूल्यों, लोकतांत्रिक संस्थाओं की मजबूती तथा संवाद और सहिष्णुता की संस्कृति के विकास में निहित है। जैसा कि B. R. Ambedkar ने कहा था, लोकतंत्र केवल शासन प्रणाली नहीं, बल्कि “सह-अस्तित्व और बंधुत्व पर आधारित जीवन-पद्धति” है।

सोमवार, 18 मई 2026

क्या जाति, छुआछूत और कुपोषण के बीच कोई संबंध है? दो प्रोफेसरों की यह रिसर्च आपको हैरान कर देगी!

 

क्या जाति, छुआछूत और कुपोषण के बीच कोई संबंध है? दो प्रोफेसरों की यह रिसर्च आपको हैरान कर देगी!

गीता सुनील पिल्लई

(मूल अंग्रेजी से हिन्दी अनुवाद: एस आर दारापुरी आई.पी.एस. (से. नि.)

रिसर्च में पाया गया कि विंध्याचल पहाड़ों के दक्षिण में रहने वाले अनुसूचित जाति के बच्चे, औसतन, विंध्याचल पहाड़ों के उत्तर में रहने वाले अपने समकक्षों की तुलना में 0.24 स्टैंडर्ड डेविएशन ज़्यादा लंबे होते हैं। साथ ही, उनमें 'स्टंटिंग' (उम्र के हिसाब से कम लंबाई) का जोखिम 7 से 8 प्रतिशत अंक कम होता है; यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण और सांख्यिकीय रूप से सिद्ध अंतर है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि विंध्याचल पहाड़ों के उत्तर और दक्षिण में रहने वाले उच्च जाति के हिंदू बच्चों के बीच ऐसा कोई तुलनात्मक अंतर नहीं पाया गया।

नई दिल्ली—भारत में बच्चों में कुपोषण की समस्या केवल गरीबी या खराब स्वास्थ्य सेवाओं तक ही सीमित नहीं है; इसकी जड़ें सदियों पुरानी जाति व्यवस्था और छुआछूत जैसी सामाजिक बुराइयों में भी गहरी जमी हुई हैं। यह चौंकाने वाला निष्कर्ष अशोक यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर अश्विनी देशपांडे और मोनाश यूनिवर्सिटी मलेशिया के प्रोफेसर राजेश रामचंद्रन के हालिया अध्ययन से सामने आया है। यह रिसर्च पेपर वर्ष 2025 में प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय जर्नल 'जर्नल ऑफ़ इकोनॉमिक बिहेवियर एंड ऑर्गनाइज़ेशन' में प्रकाशित हुआ था। अशोक यूनिवर्सिटी के 'सेंटर फॉर इकोनॉमिक एंड डेटा एनालिसिस' ने हाल ही में इस विषय पर एक लेख प्रकाशित किया है।

शोधकर्ताओं ने अपने अध्ययन का आधार भारत सरकार के 'राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण' (NFHS-4) 2015-16 के आंकड़ों को बनाया। यह सर्वेक्षण पाँच वर्ष से कम आयु के 230,898 बच्चों के शारीरिक माप और जाति संबंधी जानकारी प्रदान करता है। इस अध्ययन में विशेष रूप से 0 से 59 महीने की आयु के 45,924 अनुसूचित जाति (SC) और 29,132 उच्च जाति के हिंदू (UC-Hindu) बच्चों की तुलना की गई।

रिसर्च के अनुसार, 'स्टंटिंग'—यानी उम्र के हिसाब से बहुत कम लंबाई होना—दीर्घकालिक कुपोषण का सबसे स्पष्ट संकेत है। यह स्थिति बच्चे के मस्तिष्क के विकास, शैक्षिक क्षमता और वयस्क जीवन में मिलने वाले आर्थिक अवसरों पर गहरा प्रभाव डालती है। भारत में पाँच वर्ष से कम आयु के लगभग एक-तिहाई बच्चे 'स्टंटिंग' से पीड़ित हैं; यह एक ऐसी स्थिति है जिसके मानव पूंजी विकास पर दूरगामी और गंभीर परिणाम होते हैं।

रिसर्च के निष्कर्ष स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं कि अनुसूचित जाति के बच्चों में 'स्टंटिंग' की दर, उच्च जाति के हिंदू बच्चों की तुलना में लगभग 50 प्रतिशत अधिक है। डेटा के अनुसार, जहाँ SC बच्चों में स्टंटिंग (उम्र के हिसाब से कम कद) की दर 43 प्रतिशत है, वहीं ऊँची जाति के हिंदू बच्चों में यह केवल 29 प्रतिशत है। यह अंतर कद के पैमाने पर भी साफ़ दिखाई देता है – UC-हिंदू बच्चों का औसत 'उम्र के हिसाब से कद' का Z-स्कोर -1.12 है, जबकि SC बच्चों का -1.64 है। इसका मतलब है कि SC बच्चे, औसतन, अपनी ऊँची जाति के समकक्षों की तुलना में आधे स्टैंडर्ड डेविएशन से भी ज़्यादा छोटे होते हैं। यह अंतर बच्चे की उम्र के हर महीने, 0 से 60 महीने तक बना रहता है।

शोधकर्ताओं ने देश भर के 585 ज़िलों के डेटा का विश्लेषण किया। SC बच्चों के लिए 467 ज़िलों और UC-हिंदू बच्चों के लिए 369 ज़िलों के डेटा का अध्ययन किया गया। इस विश्लेषण से पता चला कि SC बच्चों में स्टंटिंग की दर 55 प्रतिशत ज़िलों में 40 प्रतिशत से ज़्यादा थी, जबकि UC-हिंदू बच्चों में स्टंटिंग की दर केवल 15 प्रतिशत ज़िलों में 40 प्रतिशत से ज़्यादा थी। इसके विपरीत, SC बच्चों में स्टंटिंग की दर केवल 15 प्रतिशत ज़िलों में 30 प्रतिशत से कम थी, जबकि UC-हिंदू बच्चों में स्टंटिंग की दर 54 प्रतिशत ज़िलों में 30 प्रतिशत से कम थी।

शोध में पाया गया कि स्थिति बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में सबसे गंभीर है, जिन्हें सामूहिक रूप से "BIMARU" क्षेत्र के रूप में जाना जाता है। इस क्षेत्र में कुल सर्वेक्षण नमूने का 50.8 प्रतिशत हिस्सा शामिल है। इस क्षेत्र के 220 ज़िलों में से 180 ज़िलों में, या 82 प्रतिशत ज़िलों में, SC बच्चों में स्टंटिंग की दर 40 प्रतिशत से ज़्यादा थी। 99 ज़िलों में, या 45 प्रतिशत ज़िलों में, आधे से ज़्यादा SC बच्चे स्टंटिंग से प्रभावित हैं। दूसरी ओर, इसी क्षेत्र में, UC-हिंदू बच्चों में स्टंटिंग केवल 20 प्रतिशत ज़िलों में 40 प्रतिशत से ज़्यादा है। दक्षिण भारत में स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर है, जहाँ केवल 24 प्रतिशत ज़िलों में SC बच्चों में स्टंटिंग की दर 40 प्रतिशत से ज़्यादा है।

विंध्याचल पर्वत: एक ऐतिहासिक और सामाजिक विभाजन

प्रोफेसर देशपांडे और प्रोफेसर रामचंद्रन ने विंध्याचल पर्वत श्रृंखला को अपने शोध का सबसे महत्वपूर्ण और बुनियादी पहलू बनाया। शोधकर्ताओं के अनुसार, ऐतिहासिक रूप से विंध्याचल के उत्तर का क्षेत्र "आर्यावर्त" के नाम से जाना जाता था, जिसे मनुस्मृति (2.22) में हिमालय और विंध्य के बीच की भूमि के रूप में परिभाषित किया गया है। यह क्षेत्र वैदिक काल (लगभग 1500-600 ईसा पूर्व) से ही हिंदू धर्म और जाति व्यवस्था का एक सांस्कृतिक केंद्र रहा है। विंध्य पर्वत ऐतिहासिक रूप से आर्य-प्रभावित क्षेत्रों और गैर-आर्य क्षेत्रों के बीच एक सीमा का काम करते थे। यही कारण है कि उत्तर में अस्पृश्यता और जाति-आधारित भेदभाव अधिक गहराई से जड़ जमाए हुए हैं।

इस ऐतिहासिक सबूत को आज के डेटा से भी समर्थन मिलता है। 2011-12 के भारतीय मानव विकास सर्वेक्षण (IHDS-II) के डेटा के विश्लेषण से पता चलता है कि मध्य भारत और उत्तर-मध्य मैदानों में क्रमशः 49 प्रतिशत और 40 प्रतिशत परिवार यह मानते हैं कि वे छुआछूत का पालन करते हैं। इसके विपरीत, दक्षिणी राज्यों में केवल 17 प्रतिशत परिवार ही ऐसा करते हैं।

शाह और अन्य (2006) द्वारा किए गए एक अध्ययन में बताया गया कि ग्रामीण भारत में सर्वेक्षण किए गए 348 गांवों में से 74 गांवों में दलितों को निजी स्वास्थ्य क्लीनिकों में जाने से रोका गया। 30-40 प्रतिशत गांवों में, सार्वजनिक स्वास्थ्य कर्मचारियों ने दलित बस्तियों में जाने से मना कर दिया, और 15-20 प्रतिशत गांवों में, दलितों को सार्वजनिक स्वास्थ्य केंद्रों में जाने से रोका गया।

शोधकर्ताओं ने एक अच्छी तरह से स्थापित सांख्यिकीय विधि—डिफरेंस-इन-डिफरेंसेस (DID)—का उपयोग करके विंध्याचल पर्वतमाला के 100 किलोमीटर उत्तर और 100 किलोमीटर दक्षिण में रहने वाले SC और UC-हिंदू बच्चों की तुलना की। यह विधि इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह एक ही राज्य के भीतर तुलना करती है, जिससे आर्थिक, भौगोलिक और प्रशासनिक कारकों के प्रभाव को अलग करके देखा जा सकता है।

इसके परिणाम अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। विंध्याचल पर्वतमाला के 100 किलोमीटर के दायरे में रहने वाले SC बच्चों में, UC-हिंदू बच्चों की तुलना में, कद छोटा (stunted) होने की संभावना 21 प्रतिशत अंक, या लगभग 70 प्रतिशत अधिक होती है। हालाँकि, सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि विंध्याचल पर्वतमाला के दक्षिण में रहने वाले SC बच्चों में, विंध्याचल पर्वतमाला के उत्तर में रहने वाले SC बच्चों की तुलना में, कद छोटा होने की संभावना लगभग 8 प्रतिशत अंक कम होती है। यह अंतर सांख्यिकीय और आर्थिक, दोनों ही दृष्टियों से महत्वपूर्ण है। कद के मामले में, विंध्याचल पर्वतमाला के दक्षिण में रहने वाले SC बच्चे, औसतन, उत्तर में रहने वाले अपने समकक्षों की तुलना में 0.24 मानक विचलन (standard deviations), या लगभग 30 प्रतिशत अधिक लंबे होते हैं।

दूसरी ओर, UC-हिंदू बच्चों के लिए, विंध्याचल क्षेत्र के उत्तर या दक्षिण में रहने से कोई सांख्यिकीय अंतर नहीं पड़ता है। इसका अर्थ है कि भौगोलिक स्थिति का यह लाभ सार्वभौमिक नहीं है, बल्कि केवल SC बच्चों तक ही सीमित है; यह इस बात का संकेत है कि जाति-आधारित भेदभाव ही इस अंतर का मूल कारण है।

छुआछूत और बच्चों के स्वास्थ्य के बीच सीधा संबंध

इस शोध में छुआछूत की प्रथा और बच्चों के कद के बीच के सीधे संबंध का भी विश्लेषण किया गया। राज्य-स्तर के डेटा का इस्तेमाल करते हुए, शोधकर्ताओं ने पाया कि जिन राज्यों में छुआछूत की प्रथा ज़्यादा प्रचलित है, वहाँ SC बच्चों की उम्र के हिसाब से लंबाई के Z-स्कोर ज़्यादा तेज़ी से गिरते हैं और स्टंटिंग (बौनापन) बढ़ जाती है। इसके विपरीत, UC-हिंदू बच्चों पर ऐसा कोई असर नहीं दिखता।

यह शोध स्वास्थ्य सेवाओं में भेदभाव के भी मज़बूत सबूत देता है। शाह और अन्य (2006) के एक अध्ययन में बताया गया कि ग्रामीण भारत के 348 गाँवों में से 74 में दलितों को निजी स्वास्थ्य क्लीनिकों में जाने से रोका गया। 30-40 प्रतिशत गाँवों में, सार्वजनिक स्वास्थ्य कर्मचारियों ने दलित बस्तियों में जाने से मना कर दिया, और 15-20 प्रतिशत गाँवों में दलितों को सार्वजनिक स्वास्थ्य केंद्रों में जाने से रोका गया। गुजरात और राजस्थान के 200 दलित बच्चों पर आचार्य (2010) के अध्ययन के अनुसार, 91 प्रतिशत दलित बच्चों को दवाएँ लेने में भेदभाव का सामना करना पड़ा, 94 प्रतिशत ने बताया कि ANM ने उनके घरों में आने से मना कर दिया, और 93 प्रतिशत ने कहा कि स्वास्थ्य कर्मचारी दवाएँ देते समय दलित बच्चों को छूने से बचते थे।

जाति, न कि आर्थिक कारक, ही असली वजह है: सत्यापन परीक्षण

शोधकर्ताओं ने यह पक्का करने के लिए कई सत्यापन अभ्यास किए कि देखे गए अंतर केवल आर्थिक असमानता का नतीजा नहीं थे। जब पारिवारिक संपत्ति सूचकांक और "विंध्याचल के दक्षिण में रहना" के बीच के आपसी संबंध का परीक्षण किया गया, तो यह सांख्यिकीय रूप से नगण्य पाया गया। इसका मतलब है कि आर्थिक स्थिति इस उत्तर-दक्षिण विभाजन की व्याख्या नहीं कर सकती। SC और "विंध्याचल के दक्षिण में" के बीच का आपसी प्रभाव बड़ा और सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण बना रहा।

इसके अलावा, अनुसूचित जनजाति (ST) के बच्चों पर किए गए एक परीक्षण में पाया गया कि ST बच्चे भी SC बच्चों जितने ही आर्थिक रूप से वंचित हैं, लेकिन विंध्याचल के उत्तर या दक्षिण में उनके स्थान का कोई सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण प्रभाव नहीं पड़ता, क्योंकि ST लोगों को पारंपरिक रूप से जाति-आधारित भेदभाव का सामना नहीं करना पड़ा है। इसी तरह, UC-मुसलमानों के लिए भी कोई महत्वपूर्ण उत्तर-दक्षिण प्रभाव नहीं पाया गया। हालाँकि, SC-मुसलमानों के लिए एक सकारात्मक प्रभाव देखा गया, जिसकी उम्मीद थी, क्योंकि SC-मुसलमान अक्सर हिंदू धर्म से धर्मांतरित हुए पूर्व SC लोग होते हैं और उन्हें अभी भी जाति-आधारित कलंक का सामना करना पड़ता है।

शोधकर्ताओं ने एक और महत्वपूर्ण परीक्षण किया: विंध्याचल पर्वतमाला को कृत्रिम रूप से उत्तर या दक्षिण की ओर खिसकाकर यह देखने की कोशिश की कि क्या वहाँ भी वैसा ही प्रभाव देखने को मिलता है। जब विंध्याचल के पूरी तरह उत्तर में रहने और उसके पूरी तरह दक्षिण में रहने की तुलना की गई, तो दोनों ही मामलों में कोई सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण प्रभाव नहीं पाया गया। इससे यह सिद्ध होता है कि जो प्रभाव देखा गया है, वह किसी मनमाने भौगोलिक विभाजन के कारण नहीं, बल्कि विंध्याचल पर्वतमाला की विशिष्ट ऐतिहासिक और सामाजिक सीमाओं के कारण है।

इस रिसर्च में यह भी देखा गया कि क्या माँ की शिक्षा, स्वास्थ्य, घर की आर्थिक स्थिति, खुले में शौच, पीने के पानी की गुणवत्ता और दूसरे सामाजिक कारण इस उत्तर-दक्षिण के अंतर को समझा सकते हैं। जब इन सभी कारणों को एक साथ देखा गया, तो SC और UC-हिंदू बच्चों के बीच औसत अंतर 23 प्रतिशत अंकों से घटकर 11 प्रतिशत अंक रह गया। माँ की लंबाई, एनीमिया की स्थिति, शिक्षा के साल, घर की संपत्ति और खुले में शौच जैसे कारण कुपोषण से काफ़ी हद तक जुड़े हुए पाए गए। हालाँकि, इन सभी कारणों को ध्यान में रखने के बाद भी, “SC × विंध्याचल के दक्षिण” का DID प्रभाव केवल 7.7 प्रतिशत अंकों से घटकर 5 प्रतिशत अंक रह गया, और यह बदलाव सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण नहीं था। इसका मतलब है कि जहाँ सामाजिक-आर्थिक और सार्वजनिक स्वास्थ्य कारण इस अंतर को कुछ हद तक कम करते हैं, वहीं वे इस लगातार बने रहने वाले उत्तर-दक्षिण के अंतर को पूरी तरह से नहीं समझा पाते। गुजरात और राजस्थान के 200 दलित बच्चों पर आचार्य (2010) के अध्ययन के अनुसार, 91 प्रतिशत दलित बच्चों को दवाएँ लेने में भेदभाव का सामना करना पड़ा, 94 प्रतिशत ने बताया कि ANM ने उनके घरों पर आने से मना कर दिया, और 93 प्रतिशत ने कहा कि स्वास्थ्य कर्मचारी दवाएँ देते समय दलित बच्चों को छूने से बचते थे।

इस रिसर्च में यह भी देखा गया कि क्या आँगनवाड़ी/ICDS सेवाओं तक पहुँच, प्रसव-पूर्व जाँच, संस्थागत प्रसव, स्तनपान की अवधि, बच्चों का आहार (अंडे, फल, दही) और टीकाकरण के कार्यक्रम इस अंतर को समझाते हैं। नतीजे साफ़ थे—इन सभी सेवाओं को ध्यान में रखने के बाद भी, “SC × विंध्याचल के दक्षिण” का प्रभाव न केवल बना रहा, बल्कि कुछ मामलों में थोड़ा और मज़बूत हो गया।

सारांश

रिसर्च करने वालों ने इन नतीजों को संयुक्त राज्य अमेरिका में नस्लीय स्वास्थ्य असमानताओं से जोड़ा है। जिस तरह संयुक्त राज्य अमेरिका में अश्वेत और श्वेत समुदायों के बीच सामाजिक-आर्थिक समानता होने के बावजूद स्वास्थ्य असमानताएँ बनी रहती हैं, उसी तरह भारत में SC समुदायों के बच्चों के स्वास्थ्य पर जाति-आधारित भेदभाव, सामाजिक बहिष्कार और मनोवैज्ञानिक तनाव का असर लगातार बना हुआ है। रिसर्च करने वालों के अनुसार, ये नतीजे यह भी दिखाते हैं कि बच्चों का कद छोटा रह जाना (stunting)—जो लगभग आधे SC बच्चों को प्रभावित करता है—उनके वयस्क जीवन में उनकी संज्ञानात्मक, शैक्षिक, स्वास्थ्य और आर्थिक संभावनाओं पर गहरा नकारात्मक असर डालता है, और यह असर पीढ़ियों तक बना रहता है।

रिसर्च करने वाले ऐसी बहुआयामी नीतिगत पहलों की माँग करते हैं जो न केवल भौतिक असमानताओं को, बल्कि गहरी सामाजिक संरचनाओं को भी लक्षित करें। बच्चों के कुपोषण से लड़ने के लिए माँ के स्वास्थ्य और शिक्षा में निवेश, बेहतर स्वच्छता बुनियादी ढाँचा और जाति-आधारित भेदभाव विरोधी कानूनों को प्रभावी ढंग से लागू करना—ये सभी ज़रूरी हैं।


सौजन्य: हिंदी न्यूज़,  justicenews

 

भारतीय समाज में बढ़ती हिंसा: कारण, राजकीय दमन और लोकतंत्र का संकट

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