शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2026

स्वतंत्र भारत में “बहुसंख्यक अत्याचार” की डॉ. बी.आर. अम्बेडकर की आशंका: एक मूल्यांकन

 

       स्वतंत्र भारत में “बहुसंख्यक अत्याचार” की डॉ. बी.आर. अम्बेडकर की आशंका: एक मूल्यांकन

-          एस आर दारापुरी, राष्ट्रीय अध्यक्ष, अल इंडिया पीपुल्स फ्रन्ट

डा. बी आर अंबेडकर आधुनिक भारत के प्रमुख निर्माताओं में से एक थे—केवल संविधान-निर्माण समिति के अध्यक्ष के रूप में ही नहीं, बल्कि उसके सबसे गहन चिंतक और नैतिक प्रहरी के रूप में भी। उनकी स्थायी चेतावनियों में से एक यह थी कि भारत में राजनीतिक लोकतंत्र “बहुसंख्यक अत्याचार” (tyranny of the majority) में परिवर्तित हो सकता है। उनकी यह आशंका न तो अलंकारिक थी और न ही सैद्धांतिक कल्पना मात्र; यह भारतीय समाज की जाति, धर्म और सत्ता-संरचना की उनकी समाजशास्त्रीय समझ पर आधारित थी। स्वतंत्रता के सात दशकों से अधिक समय बाद यह मूल्यांकन करना प्रासंगिक है कि उनकी यह चेतावनी किस हद तक सच सिद्ध हुई है।

अम्बेडकर की चिंता का सैद्धांतिक आधार

अम्बेडकर की बहुसंख्यक अत्याचार संबंधी चिंता को राजनीतिक लोकतंत्र और सामाजिक लोकतंत्र के बीच उनके भेद के संदर्भ में समझना चाहिए। राजनीतिक लोकतंत्र का न्यूनतम अर्थ है—सर्वजन मताधिकार, आवधिक चुनाव और प्रतिनिधिक संस्थाएँ। किंतु सामाजिक लोकतंत्र का तात्पर्य है—स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व को सामाजिक जीवन के जीवंत सिद्धांतों के रूप में स्वीकार करना। अम्बेडकर ने बार-बार कहा कि 1950 में भारत ने राजनीतिक लोकतंत्र तो प्राप्त कर लिया, परंतु जातिगत पदानुक्रम और सांप्रदायिक विभाजन के कारण सामाजिक लोकतंत्र अभी दूर है।

संविधान सभा में अपने भाषणों तथा Annihilation of Caste और States and Minorities जैसी रचनाओं में उन्होंने चेताया कि जाति और धार्मिक बहुसंख्यक संरचना वाले समाज में लोकतंत्र आसानी से ऐसा तंत्र बन सकता है जिसके माध्यम से सामाजिक रूप से प्रभुत्वशाली वर्ग अपनी संख्यात्मक शक्ति को राजनीतिक वर्चस्व में बदल दे। भारत में बहुसंख्यक केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सांप्रदायिक और जातिगत इकाई भी है। यदि इसे संवैधानिक नैतिकता और संस्थागत संतुलन द्वारा नियंत्रित न किया जाए, तो यह अल्पसंख्यकों को हाशिए पर धकेल सकता है, भले ही चुनावी वैधता का आवरण बना रहे।

संवैधानिक सुरक्षा-उपाय

अम्बेडकर का समाधान संस्थागत था। उन्होंने मौलिक अधिकारों को न्यायालय द्वारा लागू कराने योग्य बनाने, अल्पसंख्यकों के सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकारों की रक्षा, अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षण, संघीय ढाँचे तथा स्वतंत्र न्यायपालिका पर बल दिया। ये प्रावधान किसी दया-भाव से नहीं, बल्कि बहुसंख्यक प्रभुत्व को संतुलित करने के संरचनात्मक उपाय थे।

स्वतंत्रता के पश्चात कई दशकों तक भारतीय गणराज्य इस संवैधानिक ढाँचे के भीतर अपेक्षाकृत स्थिर रहा। धर्मनिरपेक्षता, यद्यपि अपूर्ण थी, पर मार्गदर्शक सिद्धांत बनी रही; गठबंधन राजनीति और संघीय व्यवस्थाओं ने केंद्रीकरण को सीमित किया; और न्यायपालिका ने समय-समय पर अपनी स्वतंत्रता का प्रदर्शन किया। इससे प्रतीत हुआ कि अम्बेडकर की आशंकाओं को आंशिक रूप से संस्थागत संतुलन ने नियंत्रित किया है।

धार्मिक बहुसंख्यकवाद का उदय

बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन आया। Ram Janmabhoomi आंदोलन और 1992 में Babri Masjid के विध्वंस ने हिंदू बहुसंख्यक राजनीति के सुदृढ़ीकरण का निर्णायक क्षण निर्मित किया। इसके पश्चात बहुसंख्यक विमर्शों पर आधारित चुनावी सफलताओं ने राजनीतिक भाषा और नीति-निर्माण को प्रभावित किया।

हाल के वर्षों में नागरिकता कानूनों पर बहस, कई राज्यों में धर्म-परिवर्तन विरोधी कानून, तथा सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की बढ़ती वाणी ने अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और समानता के प्रश्नों को तीव्र किया है। यद्यपि भारत में नियमित चुनाव होते हैं और लोकतांत्रिक संस्थाएँ औपचारिक रूप से कार्यरत हैं, आलोचकों का मत है कि सार्वजनिक विमर्श और राज्य-नीति में बहुसंख्यक संवेदनाएँ अधिक प्रभावी होती जा रही हैं।

जातिगत असमानता की निरंतरता

अम्बेडकर की चेतावनी केवल धार्मिक बहुसंख्यकवाद तक सीमित नहीं थी; उसका मूल केंद्र जाति-प्रथा था। आरक्षण और भेदभाव-विरोधी कानूनों के बावजूद जाति-आधारित असमानता सामाजिक और आर्थिक रूप से विद्यमान है। दलितों के विरुद्ध अत्याचार आज भी घटित होते हैं, और उच्च शिक्षा तथा प्रभावशाली संस्थानों में प्रतिनिधित्व असमान है।

राजनीतिक लोकतंत्र ने दलितों को प्रतिनिधित्व का अवसर दिया है, किंतु सामाजिक भेदभाव और संरचनात्मक विषमता अब भी गहरी है। राजनीतिक अधिकारों और सामाजिक समानता के बीच यह अंतर अम्बेडकर की उस आशंका को पुष्ट करता है कि लोकतंत्र एक ऐसे समाज पर खड़ा है जो भीतर से अभी भी असमान है।

संस्थागत दबाव और सत्ता का केंद्रीकरण

अम्बेडकर ने “संवैधानिक नैतिकता” पर विशेष बल दिया—अर्थात संविधान की आत्मा के प्रति निष्ठा। समकालीन विमर्शों में कार्यपालिका के बढ़ते केंद्रीकरण, संसदीय विमर्श की घटती भूमिका, स्वतंत्र संस्थाओं पर दबाव और प्रेस की स्वतंत्रता से जुड़े प्रश्नों ने लोकतांत्रिक संतुलन पर चिंता उत्पन्न की है।

फिर भी यह उल्लेखनीय है कि भारत में न्यायपालिका कार्यरत है, चुनाव प्रतिस्पर्धात्मक हैं, और कई राज्यों में विपक्षी दल सत्ता में हैं। नागरिक समाज और सामाजिक आंदोलनों की उपस्थिति भी लोकतंत्र को जीवंत बनाए हुए है। भारत पूर्णतः अधिनायकवादी राज्य में परिवर्तित नहीं हुआ है, बल्कि वह तनावों से जूझता हुआ लोकतंत्र है।

क्या भविष्यवाणी सच हुई?

यदि “बहुसंख्यक अत्याचार” का अर्थ है लोकतांत्रिक संस्थाओं का पूर्ण विघटन और अल्पसंख्यकों का राजनीतिक बहिष्कार, तो ऐसा नहीं हुआ है। परंतु यदि इसका अर्थ है बहुसंख्यक सांस्कृतिक वर्चस्व का सामान्यीकरण, अल्पसंख्यकों की आशंकाओं की उपेक्षा, और जातिगत प्रभुत्व का लोकतांत्रिक आवरण में बने रहना, तो अम्बेडकर की आशंका आंशिक रूप से सत्य प्रतीत होती है।

निष्कर्ष

अम्बेडकर की चेतावनी कोई निराशावादी भविष्यवाणी नहीं थी, बल्कि एक नैतिक सावधानी थी। उनका विश्वास था कि संविधान तभी टिकेगा जब नागरिक और शासक संवैधानिक नैतिकता का पालन करेंगे और सामाजिक प्रभुत्व की प्रवृत्तियों को अस्वीकार करेंगे।

पचहत्तर वर्ष बाद भारत एक सक्रिय लोकतंत्र है, किंतु गहरी असमानताओं और बढ़ते बहुसंख्यक आग्रहों से घिरा हुआ है। इस प्रकार, अम्बेडकर की आशंका न तो पूर्णतः असत्य सिद्ध हुई है और न ही पूरी तरह साकार हुई है। वह आज भी भारतीय गणराज्य के समक्ष एक जीवित प्रश्न के रूप में उपस्थित है—क्या भारत स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व को सुदृढ़ करेगा, या संख्यात्मक शक्ति को संवैधानिक न्याय पर हावी होने देगा?

मंगलवार, 24 फ़रवरी 2026

भारत में कमजोर हो रहे लोकतंत्र पर चिंताएं

 

भारत में कमजोर हो रहे लोकतंत्र पर चिंताएं

एस आर दारापुरी, राष्ट्रीय अध्यक्ष, आल इंडिया पीपुल्स फ्रन्ट

हाल के वर्षों में भारत में लोकतंत्र के स्वास्थ्य को लेकर बहस तेज़ हुई है। स्वस्थ लोकतांत्रिक परंपराओं के क्षरण संबंधी चिंताएँ न तो हाशिए की हैं और न ही केवल दलगत दृष्टिकोण का परिणाम; वे अनुभवजन्य शोध, तुलनात्मक लोकतांत्रिक सूचकांकों और गंभीर शैक्षणिक विमर्श पर आधारित हैं। साथ ही, यह दावा कि भारतीय लोकतंत्र पतन की अंतिम अवस्था में है, अभी भी विवादित है। संतुलित आकलन के लिए चुनावी लोकतंत्र, उदार संवैधानिकता तथा उन व्यापक लोकतांत्रिक संस्कृतियों के बीच भेद करना आवश्यक है जो संस्थाओं को दीर्घकाल तक जीवित रखती हैं।

भारत को लंबे समय से विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में सराहा जाता रहा है। यह प्रतिष्ठा सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार, नियमित चुनावों, शांतिपूर्ण सत्ता-हस्तांतरण और अधिकारों के प्रति संवैधानिक प्रतिबद्धता पर आधारित है। 1947 में स्वतंत्रता के बाद से लोकतांत्रिक निरंतरता गणराज्य की उल्लेखनीय उपलब्धियों में से एक रही है। तथापि, समकालीन अध्येताओं और निगरानी संस्थाओं, जैसे Varieties of Democracy Institute (V-Dem) तथा Economist Intelligence Unit, ने लोकतांत्रिक गुणवत्ता के कुछ संकेतकों में मापनीय गिरावट दर्ज की है। इनमें नागरिक स्वतंत्रताओं में कमी, कार्यपालिका पर नियंत्रण के क्षरण तथा विचार-विमर्शात्मक लोकतंत्र के घटक तत्वों में गिरावट शामिल हैं। V-Dem ने कुछ अवधियों में भारत को “इलेक्टोरल ऑटोक्रेसी” (चुनावी निरंकुशता) के रूप में वर्गीकृत किया है, जबकि Economist Intelligence Unit ने इसे “फ्लॉड डेमोक्रेसी” (त्रुटिपूर्ण लोकतंत्र) कहा है। इन वर्गीकरणों का अर्थ चुनावों का अभाव नहीं है, बल्कि उदार-लोकतांत्रिक सुरक्षा उपायों में कमी की ओर संकेत है।

आलोचकों द्वारा उठाई गई एक प्रमुख चिंता संस्थागत स्वायत्तता के कमजोर होने से संबंधित है। स्वस्थ लोकतांत्रिक परंपराएँ केवल आवधिक चुनावों पर निर्भर नहीं करतीं; वे स्वतंत्र न्यायपालिका, चुनाव आयोग, नियामक निकायों और जाँच एजेंसियों जैसी संस्थाओं पर आधारित होती हैं, जो कार्यपालिका से स्वतंत्र होकर कार्य करें। विद्वानों का तर्क है कि जब ये संस्थाएँ कम स्वतंत्र दिखाई देती हैं या उन पर सत्तारूढ़ नेतृत्व के निकट होने का आरोप लगता है, तब क्षैतिज उत्तरदायित्व (horizontal accountability) कमजोर पड़ता है। दीर्घकाल में इससे सत्ता का केंद्रीकरण बढ़ सकता है और असहमति तथा प्रभावी विपक्ष के लिए स्थान संकुचित हो सकता है।

एक अन्य चिंता नागरिक स्वतंत्रताओं और सार्वजनिक विमर्श से जुड़ी है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शैक्षणिक स्वतंत्रता और मीडिया की स्वतंत्रता लोकतांत्रिक जीवंतता के मूल स्तंभ हैं। आलोचकों का मत है कि पत्रकारों, नागरिक समाज संगठनों और विश्वविद्यालयों पर बढ़ते दबाव से आत्म-सेंसरशिप का वातावरण बन सकता है। अंतरराष्ट्रीय निगरानी संस्थाओं ने ऐसे कानूनी और प्रशासनिक उपायों की ओर संकेत किया है जो गैर-सरकारी संगठनों और कार्यकर्ताओं की गतिविधियों को सीमित कर सकते हैं। यह प्रश्न अभी भी विवादित है कि क्या ये प्रवृत्तियाँ प्रणालीगत दमन का संकेत हैं या एक विशाल और विविधतापूर्ण लोकतंत्र में समय-समय पर उत्पन्न होने वाले तनावों का परिणाम; किंतु नागरिक क्षेत्र के सिमटने की धारणा शैक्षणिक चर्चाओं में बार-बार उभरती रही है।

इसके साथ ही, लोकतंत्र की स्थायी शक्तियों को भी स्वीकार करना आवश्यक है। भारत में अब भी व्यापक पैमाने पर प्रतिस्पर्धी चुनाव होते हैं और मतदाता सहभागिता उल्लेखनीय रूप से उच्च रहती है। विपक्षी दल नियमित रूप से विभिन्न राज्यों में चुनाव जीतते हैं, और चुनावी परिणाम अनिश्चित तथा प्रतिस्पर्धात्मक बने रहते हैं। राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर शांतिपूर्ण सत्ता-हस्तांतरण की परंपरा कायम है। न्यायपालिका समय-समय पर ऐसे निर्णय देती है जो कार्यपालिका की कार्रवाइयों को चुनौती देते हैं। संघीय ढाँचा सत्ता के अनेक केंद्रों को सुनिश्चित करता है, जिससे राजनीतिक शक्ति का पूर्ण एकाधिकार संभव नहीं हो पाता। ये सभी तत्व संकेत करते हैं कि लोकतांत्रिक तंत्र अभी भी कार्यरत है, भले ही वह दबाव में क्यों न हो।

इस प्रकार, बहस का प्रश्न यह नहीं है कि भारत औपचारिक रूप से लोकतंत्र है या नहीं, बल्कि यह है कि उस लोकतंत्र की गुणवत्ता और गहराई क्या है। कुछ अध्येता इसे पतन नहीं, बल्कि परिवर्तन के रूप में देखते हैं—ऐसा परिवर्तन जो चुनावी ढाँचे के भीतर अधिक बहुसंख्यकवादी या केंद्रीकृत शासन की ओर संकेत करता है। अन्य विद्वान यह मानते हैं कि भारत की सामाजिक बहुलता और संघीय संरचना उसे स्थायी निरंकुशता की ओर जाने से रोकेगी। इस दृष्टि से, विरोध-प्रदर्शनों, न्यायिक संघर्षों और चुनावी प्रतिस्पर्धा में दिखाई देने वाला लोकतांत्रिक संघर्ष स्वयं लोकतांत्रिक जीवन की निरंतरता का प्रमाण है।

अंततः कहा जा सकता है कि भारत में स्वस्थ लोकतांत्रिक परंपराओं के क्षरण संबंधी चिंताएँ इस अर्थ में वैध हैं कि वे अनुभवजन्य संकेतकों और गंभीर शैक्षणिक विश्लेषण पर आधारित हैं। किंतु इन चिंताओं के साथ-साथ लोकतांत्रिक निरंतरता और लचीलेपन के प्रमाण भी मौजूद हैं। आज का भारत एक जटिल लोकतांत्रिक परिदृश्य प्रस्तुत करता है—मजबूत चुनावी सहभागिता के साथ उदार संस्थागत सुरक्षा उपायों पर बहस; संस्थागत निरंतरता के साथ स्वायत्तता को लेकर प्रश्न; और सक्रिय राजनीतिक भागीदारी के साथ नागरिक स्वतंत्रताओं पर चिंता। वर्तमान प्रवृत्तियाँ अस्थायी दबाव का संकेत हैं या दीर्घकालीन संरचनात्मक परिवर्तन का—यह प्रश्न अभी खुला है, जिसका उत्तर अंततः नागरिकों, संस्थाओं और गणराज्य की विकसित होती राजनीतिक संस्कृति द्वारा निर्धारित होगा।

साभार: ChatGPT

स्वतंत्र भारत में “बहुसंख्यक अत्याचार” की डॉ. बी.आर. अम्बेडकर की आशंका: एक मूल्यांकन

         स्वतंत्र भारत में “बहुसंख्यक अत्याचार” की डॉ. बी.आर. अम्बेडकर की आशंका: एक मूल्यांकन -           एस आर दारापुरी, राष्ट्रीय अध्य...