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मंगलवार, 10 नवंबर 2020

उत्तर प्रदेश में मायावती राज और दलित उत्पीड़न

 

उत्तर प्रदेश में मायावती राज और दलित उत्पीड़न

-एस आर दारापुरी आई पी एस (से.नि.), राष्ट्रीय प्रवक्ता, आल इंडिया पीपुल्स फ्रन्ट

 

उत्तर प्रदेश में दलितों की सब से बड़ी आबादी है जो कि उत्तर प्रदेश की कुल आबादी का 21% है. उत्तर प्रदेश एक अति पिछड़ा प्रदेश है. उत्तर प्रदेश में सामंती सामाजिक व्यवस्था है और घोर छुआछुत और जातिवाद का शिकार है जिस के कारण उत्तर प्रदेश में दलितों पर पूरे भारत वर्ष में सब से अधिक अत्याचार होते हैं. यह स्थिति मायावती के मुख्य मंत्री बनने से पहले भी थी और उस के मुख्य मंत्री काल में भी रही तथा आज भी है. 2001 की जनगणना के अनुसार उत्तर प्रदेश के दलित विकास की दृष्टि से बिहार, ओडिस्सा और मध्य प्रदेश के दलितों को छोड़ कर देश के सभी राज्यों के दलितों से पिछड़े हुए हैं.

यह विदित है कि दलितों पर अत्याचार को प्रभावी ढंग से रोकने के लिए केन्द्रीय सरकार द्वारा 1989 में अनुसूचित जाती/ जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम तथा उस के बाद 1995  में इस सम्बन्धी नियमावली बनायीं गयी थी.

यह देखा गया है कि इस कानून को इमानदारी से लागू नहीं किया जाता है जिस कारण दलितों पर अत्याचार होते रहते हैं. आजादी के बाद बाबासाहेब के प्रभाव से दलितों में एक नयी चेतना का विकास हुआ है परन्तु जब भी वे अपने संवैधानिक अधिकारों की दावेदारी करते हैं तो उन्हें दबाने के लिए सवर्णों द्वारा उन पर अत्याचार किये जाते हैं. दूसरे पुलिस और प्रशासन में बैठे सवर्णों की मानसिकता भी दलित विरोधी रहती है जिस कारण वे छुआछूत एवं दलित उत्पीडन विरोधी कानून को जानबूझ कर लागू नहीं करते हैं. यह मुख्य रूप से दलित उत्पीडन के मुक़दमे दर्ज न करना, वादी को डराना धमकाना और समझौता करने के लिए विवश करना, मुकदमा दर्ज हो जाने पर तत्परता से विवेचना न करना, सही गवाही न लिखना, मुक़दमे की सही पैरवी न करना आदि के रूप में पेश आती है.  इस के इलावा अदालतों का दलित विरोधी नजरिया अधिकतर मामलों के छूट जाने और बहुत कम सजा होना आदि से प्रदर्शित होता है. गुजरात में तो छुआछूत के एक मामले में कोर्ट द्वारा अभियुक्त को केवल २५ रुपए का अर्थ दंड लगाया गया था.

दलित उत्पीडन के बराबर जारी रहने और इसे रोकने के लिए बने कानून को कड़ाई से लागू न करने का मुख्य कारण राजनीतिक तथा प्रशासनिक स्तर पर वांछित इच्छा शक्ति का अभाव एवं दलित विरोधी मानसिकता का व्यापक तौर पर प्रभावी होना तथा अदालतों का सवर्ण मानसिकता से ग्रस्त होना पाया गया है. इन्हीं कारणों से वर्तमान में सभी राज्यों में दलित उत्पीडन कम होने की बजाये बढ़ रहा है क्योंकि अब दलित भी जगह पर प्रतिकार कर रहे हैं.

अब यह सामान्य अपेक्षा है कि जिस राज्य में सवर्ण मुख्य मंत्री के स्थान पर कोई दलित मुख्य मंत्री बनेगा वह दलित उत्पीडन को रोकने के लिए वांछित इच्छा शक्ति दिखायेगा और अनुसूचित जाति/जनजाति अत्याचार निवारण कानून को प्रभावी ढंग से लागू कराएगा ताकि दलित उत्पीड़न कम हो सके. पर क्या वास्तव में ऐसा होता है?

इस का जवाब न में ही है. इस का सब से बड़ा उदाहरण उत्तर प्रदेश है. यह सर्वविदित है उत्तर प्रदेश में 1995 से लेकर 2012 तक की अवधि में मायावती एक दलित मुख्य मंत्री के रूप में सरकार की मुखिया बनी. क्या उसके शासन काल में दलित उत्पीडन रोकने सम्बन्धी कानून प्रभावी ढंग से लागू हुआ? क्या उस के शासन काल में दलित उत्पीडन कम हुआ? ज़मीनी हकीकत तो यही दर्शाती है उक्त कानून न तो प्रभावी ढंग से लागू हुआ और न ही दलित उत्पीडन के मामलों में कोई ख़ास कमी आई. हाँ इतना ज़रूर है कि1995 में जब मायावती पहली वार मुख्य मंत्री बनी थी तो इस कानून का कुछ डर महसूस किया गया था क्योंकि उस समय तक सरकार पर दलित कार्यकर्ताओं का कुछ प्रभाव था जो बाद में बिलकुल समाप्त हो गया और मायावती स्वछंद हो गयी.

2001 वाले मुख्य मंत्री काल में जब मायावती ने सोशल इंजीनियरिंग का फार्मूला अपना कर बहुजन को त्याग कर सर्वजन का पल्ला पकड़ा तो उस समय मायावती ने सर्वजन को खुश करने के लिए सब से पहला ऐतिहासिक काम अनुसूचित जाति/जन जाति अत्याचार निवारण अधिनियम को शासनादेश द्वारा करके रद्द करने का किया जिस से दलित हित पर कुठाराघात हुआ. ऐसा करने के पीछे यह कारण बताया गया कि कुछ लोग इस का दुरुपयोग कर रहे हैं जिसे रोकने के लिए ऐसा करना जरूरी है. यह केवल दलितों पर अत्याचार करने वाले सर्वजन समर्थकों को कानून के डंडे से बचाने के लिए बहाना मात्र था. यदि इस बहाने में कुछ सच्चाई  भी हो तो भी मायावती को इसे रद्द करने का कोई अधिकार नहीं था क्योंकि यह एक केन्द्रीय कानून है जिस में पार्लियामेंट ही कोई संशोधन कर सकती है. दूसरे मैं पुलिस विभाग में रहा हूँ. मैं अच्छी तरह से जानता हूँ कि दलितों के विरुद्ध ही कितने कानूनों का दुरुपयोग होता है और किस तरह से उन्हें निर्दोष होते हुये भी फंसाया जाता है परन्तु मायामती ने उन कानूनों को रद्द करने की हिम्मत नहीं दिखाई. सरकार ने जोर दिखाया तो दलितों के कानून पर ही दिखाया. पंजाबी में एक कहावत है, माड़ी धाड़ चमारली पर" अर्थात कमज़ोर से कमज़ोर आदमी भी चमारों पर ही जोर दिखाता है. वही बात इस मामले में भी लागू होती है.

जहाँ तक उक्त कानून के दुरुपयोग की बात है इस में कुछ सच्चाई है कि कुछ दलित या तो स्वयं अथवा सवर्णों के चढ़ाने इस एक्ट के झूठे मुकदमे लिखा देते हैं परन्तु इस के लिए कानून पर रोक लगाना गलत है. कानून में पहले से यह प्रावधान है कि यदि कोई व्यक्ति किसी के विरुद्ध झूठा केस लिखाता है और विवेचना से ऐसा सिद्ध हो जाता है तो उसके विरुद्ध धरा 182 आईपीसी का केस दर्ज करके दण्डित किया जा सकता है. परन्तु मायावती द्वारा ऐसा न करके केवल अपने सर्वजन को इस कानून की मार से बचाने के लिए उक्त कानून के लागू करने पर ही रोक लगा दी गयी जिससे दलितों हितों पर न केवल कुठाराघात ही हुआ बल्कि अत्याचारियों के हौसले भी बुलंद हो गए.

मायावती द्वारा उक्त एक्ट पर रोक लगाने के विरुद्ध इंडियन जस्टिस पार्टी और कुछ अन्य सामाजिक संगठनों द्वारा उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर की गयी जिस पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इसे असंवैधानिक पाए जाने के कारण रद्द कर दिया. इस पर मजबूर होकर मायावती को 2003 में उक्त रोक को वापस लेना पड़ा परन्तु शासनादेश में रोक हटाने के साथ साथ यह भी लिख दिया गया कि यद्यपि यह रोक हटाई जा रही है परन्तु इस कानून का किसी भी दशा में दुरुपयोग नहीं होने देना चाहिए. इस का परोक्ष से वही आशय था जो रोक का था.2007 में भी मुख्य मंत्री बनने पर भी मायावती ने सभी अधिकारियों को इसी प्रकार के लिखित व मौखिक आदेश दिए थे.

मायावती के दलितों के खिलाफ सर्वजन को खुश करने और उन्हें सजा से बचाने के इस कुकृत्य का खामियाजा उत्तर प्रदेश के दलितों को भुगतना पड़ा. उस के मुख्य मंत्री काल में एक तो दलितों के हत्या , बलात्कार, आगजनी और मारपीट के मुक़दमे नहीं लिखे गए जो कि अब भी नहीं लिखे जा रहे हैं. इस कारण न तो पीड़ित दलितों को कानून का कोई संरक्षण मिला और न ही दोषियों को कोई सजा ही मिली बल्कि उनके हौसले बुलंद रहे.

दलित उत्पीड़न के बहुत से मामले बसपा कार्यकर्ताओं द्वारा इसी लिए भी नहीं लिखवाने दिए गए कि दलित उत्पीड़न के केस दर्ज करने से मायावती की बदनामी होगी जिस कारण वह प्रधान मंत्री नहीं बन पाएंगी.

दूसरे मायावती के इस कृत्य से जहाँ दलितों के मुकदमे दर्ज न किये जाने से उन्हें कानून का संरक्षण नहीं मिला वही उन्हें इस कानून के अंतर्गत मिलने वाली राहत धन- राशि भी नहीं मिली क्योंकि वह केस दर्ज होने पर ही मिलती है. इस प्रकार उत्तर प्रदेश में दलितों को दोहरी मार झेलनी पड़ी.

अब तक मायावती के चार वार मुख्य मंत्री रहने पर उत्तर प्रदेश के दलितों को वह सब कुछ झेलना पड़ा जो शायद उन्होंने पहले नहीं झेला था. अब अगर वह देश की प्रधान मंत्री बन जाती हैं तो खुदा खैर करे.

नोट: फिलहाल मायावती के प्रधान मंत्री की कोई संभावना नहीं है।

 

मंगलवार, 6 अक्टूबर 2020

उत्तर प्रदेश में कितनी सुरक्षित हैं दलित महिलायें?

उत्तर प्रदेश में कितनी सुरक्षित हैं दलित महिलायें?

-एस.आर. दारापुरी,  राष्ट्रीय प्रवक्ता, आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट

हाल में राष्ट्रीय अपराध अनुसंधान ब्यूरो द्वारा क्राईम इन इंडिया- 2019 रिपोर्ट जारी की गयी है. इस रिपोर्ट में वर्ष 2019 में पूरे देश में दलित उत्पीड़न के अपराध के जो आंकड़े छपे हैं उनसे यह उभर कर आया है कि इसमें उत्तर प्रदेश काफी आगे है. उत्तर प्रदेश की दलित आबादी देश में सब से अधिक आबादी है जो कि उत्तर प्रदेश की आबादी का 20.7% प्रतिशत है. रिपोर्ट के अनुसार देश में वर्ष 2019 में दलितों के विरुद्ध उत्पीड़न के कुल 45,935 अपराध घटित हुए जिन में से उत्तर प्रदेश में 11,829 अपराध घटित हुए जो कि राष्ट्रीय स्तर पर कुल घटित अपराध का 25.8 प्रतिशत है जोकि राष्ट्रीय स्तर पर दलितों की 20.7% प्रतिशत है तथा 5% अधिक है.  इस अवधि में राष्ट्रीय स्तर पर प्रति एक लाख दलित आबादी पर घटित अपराध की दर 22.8 रही जबकि उत्तर प्रदेश की यह दर 28.6 रही जोकि राष्ट्रीय दर से 6% अधिक है.  इस प्रकार राष्ट्रीय स्तर पर दलित उत्पीडन के मामलों में उत्तर प्रदेश का 7वां स्थान है. यह भी उल्लेखनीय है कि 2016 की राष्ट्रीय दर 20.3 के मुकाबले में यह काफी अधिक है. इन आंकड़ों से एक बात उभर कर आई है कि उत्तर प्रदेश में दलित एवं दलित महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं क्योंकि दलित महिलाओं पर अत्याचार के मामलों की संख्या और दर राष्ट्रीय दर से काफी ऊँची है.

अब अगर दलितों पर राष्ट्र तथा उत्तर प्रदेश में घटित अपराधों के श्रेणीवार आंकड़ों का विश्लेषण किया जाये तो स्थिति निम्न प्रकार है:-

एससी/एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम(आईपीसी सहित) के अपराध: वर्ष 2019 में पूरे देश में इस अधिनियम के अंतर्गत 41,793 अपराध घटित हुए जबकि इसमें से अकेले उत्तर प्रदेश में 9,451 अपराध घटित हुए. इन अपराधों की राष्ट्रीय दर (प्रति 1 लाख आबादी पर) 20.8 थी जबकि उत्तर प्रदेश की यह दर 22.9 थी जोकि राष्ट्रीय स्तर पर घटित कुल अपराध का लगभग 22.6% है. इस प्रकार राष्ट्रीय स्तर पर इन अपराधों के मामलों में उत्तर प्रदेश का 6वां स्थान है जोकि काफी ऊँचा है.

एससी/एसटी एक्ट के मामले (आईपीसी के बिना): इस शीर्षक के अंतर्गत पूरे देश में 4129 मामले घटित हुए जबकि अकेले उत्तर प्रदेश में 2378 मामले रहे जोकि राष्ट्रीय स्तर पर घटित अपराध का लगभग 58%है. इस अपराध में राष्ट्रीय स्तर पर उत्तर प्रदेश चौथे स्थान पर है. इस अपराध की राष्ट्रीय दर 2.1 थी जबकि उत्तर प्रदेश की यह दर 5.7 रही जो राष्ट्रीय दर से काफी ऊँची है. इससे स्पष्ट है कि उत्तर प्रदेश में दलित कितने सुरक्षित हैं.

एससी/एसटी एक्ट के मामले (अन्य अपराध): इस शीर्षक के अंतर्गत पूरे देश में 2042 मामले घटित हुए जबकि अकेले उत्तर प्रदेश में 1281 मामले रहे जोकि राष्ट्रीय स्तर पर घटित अपराध का लगभग 63%है. इस अपराध में राष्ट्रीय स्तर पर उत्तर प्रदेश दूसरे स्थान पर है. इस अपराध की राष्ट्रीय दर 1.0 थी जबकि उत्तर प्रदेश की यह दर 3.1 रही जो राष्ट्रीय दर से काफी ऊँची है. इससे स्पष्ट है कि उत्तर प्रदेश में दलित कितने सुरक्षित हैं.

हत्या: वर्ष 2019 में पूरे देश में दलितों की हत्यायों की संख्या 923 थी जिन में अकेले उत्तर प्रदेश में 219 हत्याएं हुयीं. इस अपराध की राष्ट्रीय दर 0.4 के विपरीत उत्तर प्रदेश की दर 0.5 रही जो कि राष्ट्रीय स्तर पर घटित कुल अपराध का लगभग 24% है. राष्ट्रीय स्तर पर उत्तर प्रदेश का चौथा  स्थान है. इससे स्पष्ट है कि दलित हत्यायों के मामले में उत्तर प्रदेश काफी आगे है.  

हत्या का प्रयास (धारा 307 आईपीसी): 2019 में पूरे देश में दलितों की हत्या के प्रयास की संख्या 780 थी जिन में अकेले उत्तर प्रदेश में 110 थी. इस अपराध की राष्ट्रीय दर 0.4 के विपरीत उत्तर प्रदेश की दर 0.3 रही जो कि राष्ट्रीय स्तर पर घटित अपराध का 14% है. इससे स्पष्ट है कि दलित हत्या के प्रयास के मामले में भी उत्तर प्रदेश काफी आगे है.

गंभीर चोट: उपरोक्त अवधि में पूरे देश में गंभीर चोट के 1,050 मामले दर्ज हुए जिन में से अकेले उत्तर प्रदेश में 281 मामले घटित हुए. इसकी राष्ट्रीय दर 0.5 रही जबकि उत्तर प्रदेश की यह दर 0.7 रही जो कि राष्ट्रीय दर से काफी अधिक है.

अपराधिक अभित्रास (506 आईपीसी): इस अपराध के अंतर्गत पूरे देश में 3083 मामले घटित हुए जबकि अकेले उत्तर प्रदेश में 1109 मामले रहे जोकि राष्ट्रीय स्तर पर घटित अपराध का 36%है. इस अपराध में राष्ट्रीय स्तर पर उत्तर प्रदेश 5वें स्थान पर है. इस अपराध की राष्ट्रीय दर 1.5 थी जबकि उत्तर प्रदेश की यह दर 2.7 रही जो राष्ट्रीय दर से काफी ऊँची है. इससे स्पष्ट है कि उत्तर प्रदेश में दलित कितने सुरक्षित हैं.

अन्य आईपीसी अपराध: इस अपराध के अंतर्गत पूरे देश में 13135 मामले घटित हुए जबकि अकेले उत्तर प्रदेश में 4057 मामले रहे जोकि राष्ट्रीय स्तर पर घटित अपराध का 31%है. इस अपराध में राष्ट्रीय स्तर पर उत्तर प्रदेश चौथे स्थान पर है. इस अपराध की राष्ट्रीय दर 6.5 थी जबकि उत्तर प्रदेश की यह दर 9.8 रही जो राष्ट्रीय दर से काफी ऊँची है. इससे स्पष्ट है कि उत्तर प्रदेश में दलित कितने सुरक्षित हैं.

इरादतन प्रकोपित अथवा अपमानित करने का अपराध: इस शीर्षक के अंतर्गत पूरे देश में 2011 मामले घटित हुए जबकि अकेले उत्तर प्रदेश में 1076 मामले रहे जोकि राष्ट्रीय स्तर पर घटित अपराध का लगभग 54%है. इस अपराध में राष्ट्रीय स्तर पर उत्तर प्रदेश चौथे स्थान पर है. इस अपराध की राष्ट्रीय दर 1.0 थी जबकि उत्तर प्रदेश की यह दर 2.6 रही जो राष्ट्रीय दर से काफी ऊँची है. इससे स्पष्ट है कि उत्तर प्रदेश में दलित कितने सुरक्षित हैं.

महिलाओं पर लज्जाभंग के इरादे से हमला:  इस अपराध के अंतर्गत पूरे देश में 3375 मामले घटित हुए जबकि अकेले उत्तर प्रदेश में 776 मामले रहे जोकि राष्ट्रीय स्तर पर घटित अपराध का 23%है. इस अपराध की राष्ट्रीय दर 1.7 थी जबकि उत्तर प्रदेश की यह दर 1.9 रही जो राष्ट्रीय दर से काफी ऊँची है.

महिलाओं को परेशान करने के इरादे से हमला (धारा 354 ए) : इसके अंतर्गत पूरे देश में 976 अपराध घटित हुए जबकि अकेले उत्तर प्रदेश में 226 मामले रहे जोकि कुल अपराध का 23% है.  इस अपराध की राष्ट्रीय दर 0.3 थी जबकि उत्तर प्रदेश की यह दर 0.5 रही जो राष्ट्रीय दर से काफी ऊँची है.

महिलाओं को वस्तरहीन करने के इरादे से बलप्रयोग (धारा 354 बी): इस शीर्षक अंतर्गत पूरे देश में 266 अपराध घटित हुए जबकि अकेले उत्तर प्रदेश में 104 मामले रहे जोकि कुल अपराध का 39% रहा. इस अपराध की राष्ट्रीय दर 0.1 थी जबकि उत्तर प्रदेश की यह दर 0.3 रही जो राष्ट्रीय दर से काफी ऊँची है.

बच्चों पर पोक्सो का अपराध: इस शीर्षक अंतर्गत पूरे देश में 429 अपराध घटित हुए जबकि अकेले उत्तर प्रदेश में 90 मामले रहे जोकि कुल अपराध का 20.9% रहा. इस अपराध की राष्ट्रीय दर 0.2 थी जबकि उत्तर प्रदेश की यह दर 0.2 रही जो राष्ट्रीय दर के बराबर है.

महिलाओं को अपहरण धारा 363,........369): इस शीर्षक अंतर्गत पूरे देश में 916 अपराध घटित हुए जबकि अकेले उत्तर प्रदेश में 449 मामले रहे जोकि देश में कुल अपराध का 49% है . इस अपराध की राष्ट्रीय दर 0.5 थी जबकि उत्तर प्रदेश की यह दर 1.1 रही जो राष्ट्रीय दर से बहुत ऊँची है.

महिलाओं को अपहरण (धारा 363): इसके शीर्षक अंतर्गत पूरे देश में 392 अपराध घटित हुए जबकि अकेले उत्तर प्रदेश में 196 मामले रहे जोकि देश में कुल अपराध का 49.5% है. इस अपराध की राष्ट्रीय दर 0.2 थी जबकि उत्तर प्रदेश की यह दर 0.5 रही जो राष्ट्रीय दर से बहुत ऊँची है.

अन्य अपहरण ; इस शीर्षक अंतर्गत पूरे देश में 313 अपराध घटित हुए जबकि अकेले उत्तर प्रदेश में 176 मामले रहे जोकि देश में कुल अपराध का 56% है. इस अपराध की राष्ट्रीय दर 0.2 थी जबकि उत्तर प्रदेश की यह दर 0.4 रही जो राष्ट्रीय दर से बहुत ऊँची है.

महिलाओं का विवाह के लिए अपहरण (366) : वर्ष 2019 में पूरे देश में विवाह के लिए अपहरण के कुल 357 मामले घटित हुए जिन में से अकेले उत्तर प्रदेश में 243 अपराध घटित हुए जोकि देश में कुल अपराध का 68% है. इस अपराध की राष्ट्रीय दर 0.2 के विपरीत उत्तर प्रदेश की यह दर 0.6 रही जो कि पूरे देश में सब से ऊँची है.

बलात्कार (धारा 376) : वर्ष 2019 में पूरे देश में दलित महिलाओं के बलात्कार के 3,486 अपराध घटित हुए जिन में से अकेले उत्तर प्रदेश में 537 बलात्कार के मामले दर्ज हुए जोकि राष्ट्रीय स्तर पर घटित कुल अपराध का 15.4% है. यद्यपि इस अपराध की राष्ट्रीय दर 1.7 के विपरीत उत्तर प्रदेश की दर 1.3 रही है परन्तु यह भी सर्वविदित है कि पुलिस में ऊँची जातियों के खिलाफ बलात्कार का मामला दर्ज कराना कितना मुश्किल होता है जैसा कि हाल की हाथरस की घटना से स्पष्ट है. अतः बलात्कार के बहुत से मामले या तो लिखे ही नहीं जाते हैं या उनको अन्य हलकी धाराओं में दर्ज किया जाता है.  

18 वर्ष से ऊपर की दलित महिलाओं पर बलात्कार (धारा 376) : वर्ष 2019 में पूरे देश में दलित महिलाओं के बलात्कार के 2369 अपराध घटित हुए जिन में से अकेले उत्तर प्रदेश में बलात्कार के  466 मामले दर्ज हुए जोकि राष्ट्रीय स्तर पर कुल अपराध का 19.6% है. इस अपराध में राष्ट्रीय स्तर पर उत्तर प्रदेश का 7वां स्थान है. यद्यपि इस अपराध की राष्ट्रीय दर 1.2 के विपरीत उत्तर प्रदेश की दर 1.1 रही परन्तु यह भी सर्वविदित है कि पुलिस में ऊँची जातियों के खिलाफ बलात्कार का मामला दर्ज कराना कितना मुश्किल होता है. अतः बलात्कार के बहुत से मामले या तो लिखे ही नहीं जाते हैं या उनको अन्य हलकी धाराओं में दर्ज किया जाता है.  

बलवा: वर्ष 2019 में पूरे देश में दलितों के विरुद्ध बलवे के 1,293 मामले दर्ज हुये जिन में से अकेले उत्तर प्रदेश में 338 मामले घटित हुए जोकि देश में कुल अपराध का 26% है. इस अपराध की राष्ट्रीय दर 0.6 थी जबकि उत्तर प्रदेश की यह दर 0.8 रही जो कि काफी अधिक है.

न्यायालय में सजा की दर : राष्ट्रीय स्तर पर न्यायालय में निस्तारित दलित उत्पीडन के मामलों की सजा की दर 32.1% के विपरीत उत्तर प्रदेश की यह दर 66.1% रही और इसका राष्ट्रीय स्तर पर दूसरा स्थान रहा. यद्यपि यह दर गुजरात की 1.8% की दर की अपेक्षा बहुत अच्छी कही जा सकती है परन्तु वर्ष के अंत तक विवेचना हेतु लंबित मामलों (50,776) की दर 95.4% है जोकि राष्ट्रीय दर 93.8% से ऊँची है, इस उपलब्धि को धूमिल कर देती है.

उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि वर्ष 2019 में उत्तर प्रदेश में दलितों के विरुद्ध घटित कुल अपराध की दर राष्ट्रीय दर से बहुत अधिक है. इसमें दलितों के विरुद्ध गंभीर अपराध जैसे हत्या, लज्जाभंग/प्रयास, यौन उत्पीड़न, बलात्कार, अपहरण और विवाह के लिए अपहरण, गंभीर चोट, बलवा और एससी/एसटी एक्ट के अंतर्गत घटित अपराधों की दर राष्ट्रीय दर से काफी अधिक रही. इन आंकड़ों से एक बात उभर कर सामने आई है कि उत्तर प्रदेश में दलित महिलाओं के विरुद्ध अपराध जैसे बलात्कार, लज्जाभंग का प्रयास, अपहरण, यौन उत्पीड़न तथा विवाह के लिए अपहरण आदि की संख्या एवं दर राष्ट्रीय दर से काफी अधिक है. इससे यह स्पष्ट है कि उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार में दलित महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं.

यह देखा गया है कि उत्तर प्रदेश में हमेशा से दलितों पर होने वाले अत्याचार राष्ट्रीय दर से अधिक रहे हैं चाहे सरकार किसी की भी रही हो. इसका एक मुख्य कारण यह है कि उत्तर प्रदेश की सामाजिक राजनीतिक एवं आर्थिक संरचना सामंती रही है जिसमें इन वर्गों पर अत्याचार होना स्वाभाविक है. इस कारण यहाँ की प्रशासनिक व्यवस्था भी सामंती ही रही है जो हमेशा सत्ताधारियों के हुकम की गुलाम रहती है. आज़ादी के बाद भी उत्तर प्रदेश की सामाजिक, राजनीतिक  तथा अर्थव्यवस्था का लोकतंत्रीकरण नहीं हो सका है. इसके विपरीत आज़ादी के बाद विकास की प्रक्रिया के अंतर्गत पूँजी का जो निवेश हुआ है उसने नये माफिया को जन्म दिया है जिसने सामंती ताकतों से गठजोड़ करके राजनीतिक सत्ता में अपना दखल बढ़ा लिया है. यह सर्विदित है कि सामंती माफिया पूँजी के गठजोड़ की उपस्थिति सभी राजनीतिक दलों में रहती है और वे ज़रुरत के मुताबिक दल भी बदलते रहते हैं. इसी लिए सरकार बदलने के बाद भी उनकी राजनीतिक पकड़/पहुँच कमज़ोर नहीं होती. यही तत्व दलितों तथा अन्य कमज़ोर वर्गों एवं महिलाओं पर अत्याचार के लिए ज़िम्मेदार होते हैं.

उत्तर प्रदेश की यह भी त्रासदी है कि यहाँ पर सामंती-माफिया-पूँजी गठजोड़ के विरुद्ध बिहार की तरह (नक्सली तथा किसान आन्दोलन) ज़मीनी स्तर पर कोई भी प्रतिरोधी आन्दोलन नहीं हुआ है जिस कारण इन तत्वों को कोई चुनौती नहीं मिल सकी है. उत्तर प्रदेश की दलित राजनीति भी इन्हीं सामन्ती/पूँजी मफियायों का सहारा लेकर सत्ता का भोग करती रही है जिस कारण इन तत्वों की सत्ता पर कभी भी पकड कमज़ोर नहीं हुयी है. अतः उत्तर प्रदेश की राजनीति पर सामन्ती-माफिया-पूँजी की निरंतर बनी रहने वाली पकड जो भाजपा सरकार के अधिनायक्वादी चरित्र के कारण और भी मज़बूत हो गयी है, दलितों पर राष्ट्रीय स्तर पर अधिक अत्याचार के लिए ज़िम्मेदार है.

 अतः उत्तर प्रदेश में दलितों पर होने वाले अत्याचार को रोकने के लिए राजनीति पर सामन्ती-माफिया-पूँजी गठजोड़ को तोड़ने के लिए जनवादी आंदोलनों को तेज़ करना होगा. यह काम केवल वाम-जनवादी लोकतान्त्रिक ताकतों ही कर सकती हैं न कि सत्ता की राजनीति करने वाली कांग्रेस, समाजवादी, भीम आर्मी और बहुजन समाज पार्टी एवं उनके नेता.  

 

 

 

डॉ. बी. आर. अंबेडकर की कम्यूनिज़्म की आलोचना और कम्युनिस्टों के साथ उनके संबंध

  डॉ. बी. आर. अंबेडकर की कम्यूनिज़्म की आलोचना और कम्युनिस्टों के साथ उनके संबंध एस आर दारापुरी आई.पी.एस.(सेवानिवृत) परिचय आधुनिक भ...