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रविवार, 14 जून 2020

कोरोना संकट के दौर में दलित-एस आर दारापुरी


कोरोना संकट के दौर में दलित
-एस आर दारापुरी आईपीएस (से.नि.), राष्ट्रीय  प्रवक्ता, आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट 

 
2011 की आर्थिक एवं जाति जनगणना के अनुसार भारत के कुल परिवारों में से 4.42 करोड़ परिवार अनुसूचित जाति (दलित) से सम्बन्ध रखते हैं. इन परिवारों में से केवल 23% अच्छे मकानों में, 2% रहने योग्य मकानों में और 12% जीर्ण शीर्ण मकानों में रहते हैं. इन परिवारों में से 24% परिवार घास फूस, पालीथीन और मिटटी के मकानों में रहते हैं. इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि अधिकतर दलितों के पास रहने योग्य घर भी नहीं है. काफी दलितों के घरों की ज़मीन भी उनकी अपनी नहीं है. यह भी सर्विदित है कि शहरों की मलिन बस्तियों तथा झुग्गी झोंपड़ियों में रहने वाले अधिकतर दलित एवं आदिवासी ही हैं. यह अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि इतने छोटे मकानों और झोंपड़ियों में कई कई लोगों के एक साथ रहने से कोरोना की रोकथाम के लिए फिज़िकल डिस्टेंसिंग कैसे संभव है. महाराष्ट्र का धार्वी स्लम इसकी सबसे बड़ी उदाहरण है जहाँ बड़ी तेजी से संक्रमण के मामले आ रहे हैं. ऐसी परिस्थिति में यदि ऐसी ही परिस्थिति रही तो इससे मरने वालों की संख्या का सहज अंदाजा लगाया जा सकता है.
उपरोक्त जनगणना के अनुसार केवल 3.95% दलित परिवारों के पास सरकारी नौकरी है. केवल 0.93% के पास राजकीय क्षेत्र तथा केवल 2.47% के पास निजी क्षेत्र का रोज़गार है. इससे स्पष्ट है कि दलित परिवार बेरोज़गारी का सबसे बड़ा शिकार हैं. वास्तव में आरक्षण के 70 साल लागू रहने पर भी सरकारी नौकरियों में दलित परिवारों का प्रतिनिधित्व केवल 3.95% ही क्यों है? क्या आरक्षण को लागू करने में हद दर्जे की बेईमानी नहीं बरती गयी है? क्या मेरिट के नाम पर दलित वर्गों के साथ खुला धोखा नहीं किया गया है और दलितों को उनके संवैधानिक अधिकार (हिस्सेदारी) से वंचित नहीं किया गया है? यदि  दलितों में मेरिट की कमी वाले वाले झूठे तर्क को मान भी लिया जाए तो फिर दलितों  में इतने वर्षों में मेरिट पैदा न होने देने के लिए कौन ज़िम्मेदार है
इसी जनगणना में यह उभर कर आया है कि देश में दलित परिवारों में से केवल 83.55% परिवारों की मासिक आय 5,000 से अधिक है.  केवल 11.74% परिवारों  की मासिक आय 5,000 से 10,000 के बीच है और केवल 4.67% परिवारों की आय 10,000 से अधिक है. सरकारी नौकरी से केवल 3.56% परिवारों की मासिक आय 5,000 से अधिक है. इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि गरीबी की रेखा के नीचे दलितों  का प्रतिश्त बहुत अधिक है जिस कारण दलित ही कुपोषण का सबसे अधिक शिकार हैं. 
इसी प्रकार उपरोक्त जनगणना के अनुसार ग्रामीण क्षेत्र में 56% परिवार भूमिहीन हैं. इन में से भूमिहीन दलितों का प्रतिशत 70 से 80% से भी अधिक हो सकता है. दलितों की भूमिहीनता की दशा उन की सबसे बड़ी कमज़ोरी है जिस कारण वे भूमिधारी जातियों पर पूरी तरह से आश्रित रहते हैं. इसी प्रकार देहात क्षेत्र में 51% परिवार हाथ का श्रम करने वाले हैं जिन में से दलितों का प्रतिशत 70 से 80% से अधिक हो सकता है. जनगणना के अनुसार  दलित परिवारों में से केवल 18.45% के पास असिंचित, 17.41% के पास सिंचित तथा 6.98% के पास अन्य भूमि है. इससे स्पष्ट है की दलितों की भूमिहीनता लगभग 91% है. दलित मजदूरों की कृषि मजदूरी पर सब से अधिक निर्भरता है. जनगणना के अनुसार देहात क्षेत्र में केवल 30% परिवारों को ही कृषि में रोज़गार मिल पाता है जिससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि इन में कितने दलितों को कृषि से रोज़गार मिल पाता  होगा. यही कारण है कि गाँव से शहरों को ओर पलायन करने वालों में सबसे अधिक दलित ही हैं. हाल में कोरोना संकट के समय शहरों से गाँव की ओर उल्टा पलायन करने वालों में भी बहुसंख्यक दलित ही हैं.
दलितों की भूमिहीनता और हाथ की मजदूरी की विवशता उनकी सब से बड़ी कमज़ोरी है. इसी कारण वे न तो कृषि मजदूरी की ऊँची दर की मांग कर सकते हैं और न ही अपने ऊपर प्रतिदिन होने वाले अत्याचार और उत्पीड़न का मजबूती से विरोध ही कर पाते हैं. अतः दलितों के लिए ज़मीन और रोज़गार उन की सब से बड़ी ज़रुरत है परन्तु इस के लिए मोदी सरकार का कोई भी एजेंडा नहीं है. इस के विपरीत मोदी सरकार भूमि अधिग्रहण करके दलितों को भूमिहीन बना रही है और कृषि क्षेत्र में कोई भी निवेश न करके इस क्षेत्र में रोज़गार के अवसरों को कम कर रही है. अन्य क्षेत्रों में भी सरकार रोज़गार पैदा करने में बुरी तरह से विफल रही है.
सरकारी उपक्रमों के निजीकरण के कारण दलितों को आरक्षण के माध्यम से मिलने वाले रोज़गार के अवसर भी लगातार कम हो रहे हैं. इसके विपरीत ठेकेदारी प्रथा से दलितों एवं अन्य मज़दूरों का खुला शोषण हो रहा है. मोदी सरकार ने श्रम कानूनों का शिथिलीकरण करके मजदूरों को श्रम कनूनों से मिलने वाली सुरक्षा को ख़त्म कर दिया है. इससे मजदूरों का खुला शोषण हो रहा है जिसका सबसे बड़ा शिकार दलित परिवार हैं. 
अमेरिका में वर्तमान कोरोना महामारी के अध्ययन से पाया गया है कि वहां पर संक्रमित/मृतक व्यक्तियों में गोरे लोगों की अपेक्षा काले लोगों की संख्या अधिक है. इसके चार मुख्य कारण बताये गए हैं: अधिक खराब सेहत और कम स्वास्थ्य सुविधाओं की उप्लब्धता एवं भेदभाव, अधिकतर काले अमरीकन लोगों का आवश्यक सेवाओं में लगे होना, अपर्याप्त जानकारी एवं छोटे घर. भारत में दलितों के मामले में तो इन सभी कारकों के इलावा सबसे बड़ा कारक सामाजिक भेदभाव है. इसी लिए यह स्वाभाविक है कि हमारे देश में भी काले अमरीकनों की तरह समाज के सबसे निचले पायदान पर दलित एवं आदिवासी ही कोरोना से सबसे अधिक प्रभावित होने की सम्भावना है. .  
वर्तमान कोरोना संकट से जो रोज़गार बंद हो गए हैं उसकी सबसे अधिक मार दलितों/ आदिवासियों पर ही पड़ने वाली है. हाल के अनुमान के अनुसार कोरोना की मार के फलस्वरूप भारत में लगभग 40 करोड़ लोगों के बेरोज़गारी का शिकार होने की सम्भावना है जिनमें अधिकतर दलित ही होंगे. इसके साथ ही आगे आने वाली जो मंदी है उसका भी सबसे बुरा प्रभाव दलितों एवं अन्य गरीब तबकों पर ही पड़ने वाला है. यह भी देखा गया है कि वर्तमान संकट के दौरान सरकार द्वारा राहत सम्बन्धी जो घोषणाएं की भी गयी हैं वे बिलकुल अपर्याप्त हैं और ऊंट के मुंह में जीरा के सामान ही हैं. इन योजनाओं में पात्रता को लेकर इतनी शर्तें लगा दी जाती हैं कि उनका लाभ आम आदमी को मिलना असंभव हो जा रहा है.
उत्तर कोरोना काल में दलितों की दुर्दशा और भी बिगड़ने वाली है क्योंकि उसमें भयानक आर्थिक मंदी के कारण रोज़गार बिलकुल घट जाने वाले हैं. चूँकि दलितों के पास उत्पादन का अपना कोई साधन जैसे ज़मीन तथा व्यापर कारोबार आदि नहीं है, अतः मंदी के दुष्परिणामों का सबसे अधिक प्रभाव दलितों पर ही पड़ने वाला है. इसके लिए ज़रूरी है कि भोजन तथा शिक्षा के अधिकार की तरह रोज़गार को भी मौलिक अधिकार बनाया जाये और बेरोज़गारी भत्ते की व्यवस्था लागू की जाये. इसके साथ ही स्वास्थ्य सुरक्षा को भी मौलिक अधिकार बनाया जाये ताकि गरीब लोगों को भी स्वास्थ्य सुरक्षा मिल सके. इसके लिए ज़रूरी है कि हमारे विकास के वर्तमान पूंजीवादी माडल के स्थान पर जनवादी समाजवादी कल्याणकारी राज्य के माडल को अपनाया जाये. 
यह उल्लेखनीय है कि डा. आंबेडकर राजकीय समाजवाद (जनवादी समाजवाद) के प्रबल समर्थक और पूंजीवाद के कट्टर विरोधी थे. उन्होंने तो दलित रेलवे मजदूरों के सम्मलेन को संबोधित करते हुए कहा था कि “दलितों के दो बड़े दुश्मन हैं, एक ब्राह्मणवाद और दूसरा पूँजीवाद.वे मजदूर वर्ग की राजनीतिक सत्ता में हिस्सेदारी के बहुत बड़े पक्षधर थे. डॉ आंबेडकर के मस्तिष्क में समाजवाद की रूप-रेखा बहुत स्पष्ट थी। भारत के सामाजिक रूपान्तरण और आर्थिक विकास के लिए वे इसे अपरिहार्य मानते थे। उन्होंने भारत के भावी संविधान के अपने प्रारूप में इस रूप-रेखा को राष्ट्र के समक्ष प्रस्तुत भी किया था जो कि "स्टेट्स एंड माइनॉरिटीज अर्थात राज्य एवं अल्पसंख्यकनामक पुस्तक के रूप में उपलब्ध है। वे सभी प्रमुख एवं आधारभूत उद्योगों, बीमा, कृषि भूमि का राष्ट्रीयकरण एवं सामूहिक खेती के पक्षधर थे. वे कृषि को राजकीय उद्योग का दर्जा दिए जाने के पक्ष में थे. डा. आंबेडकर तो संपत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकार नहीं बनाना चाहते थे परन्तु यह उनके वश में नहीं था. 
वर्तमान कोरोना संकट ने यह सिद्ध कर दिया है कि अब तक भारत सहित अधिकतर देशों में विकास का जो पूँजीवाद माडल रहा है उसने शोषण एवं असमानता को ही बढ़ावा दिया है. यह आम जन की बुनियादी समस्यायों को हल करने में बुरी तरह से विफल रहा है. जबसे राजनीति का कारपोरेटीकरण एवं फाइनेंस कैपिटल का महत्त्व बढ़ा है, तब से लोकतंत्र की जगह अधिनायिकवाद और दक्षिणपंथ का पलड़ा भारी हुआ है. इस संकट से यह तथ्य भी उभर कर आया है कि इस संकट का सामना  केवल समाजवादी देश जैसे क्यूबा, चीन एवं वियतनाम आदि ही कर सके हैं. उनकी ही व्यवस्था मानव जाति के जीवन की रक्षा करने में सक्षम है। वरना आपने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प को तो सुना ही होगा जिसमें वह कहते हैं कि लगभग ढाई लाख अमरीकनों को तो कोरोना से मरना ही होगा और इसमें वह कुछ नहीं कर सकते। पूंजीवाद के सर्वोच्च माडल की यह त्रासद पुकार है जो दिखा रही है कि मुनाफे पर पलने वाली पूंजीवादी व्यवस्था पूर्णतया खोखली है। इसलिए दलितों के हितों की रक्षा भी जनवादी समाजवादी राज्य व्यवस्था में ही सम्भव है। बाबा साहब की परिकल्पना तभी साकार होगी जब दलित, पूंजीपतियों की सेवा में लगे बसपा, अठवाले, रामविलास जैसे लोगों से अलग होकर, रेडिकल एजेंडा (भूमि आवंटन, रोज़गार, स्वास्थ्य सुरक्षा, शिक्षा, एवं सामाजिक सम्मान आदि) पर आधारित जन राजनीति के साथ जुड़ेंगे। यही राजनीति एक कल्याणकारी राज्य की स्थापना करेगी जिसमें उत्तर कोरोना काल की चुनौतियों का जवाब होगा। आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट इसी दिशा में जनवादी समाजवादी राजनीति का एक प्रयास है।


बुधवार, 29 अप्रैल 2020

स्वास्थ्य कर्मियों और जनता के बीच टकराव क्यों?


स्वास्थ्य कर्मियों और जनता के बीच टकराव क्यों?
लेखक - रौनक कुमार गुंजन | News18.com @Rounak_T
 (विश्वास की कमी, संक्रामक भय, क्या कानून कोविद -19 के दौरान डॉक्टरों पर हमला के पीछे सामाजिक और मनोवैज्ञानिक कारकों को रद्द कर सकता है?)
(अनुवादकीय नोट: कोरोना संकट के दौरान स्वास्थ्य कर्मियों (कोरोना वारियर्ज़ ) और जनता के बीच ल्गातार टकराव हो रहा है. सरकार ने इसे केवल कानून व्यवस्था का मुद्दा मान कर दा एपीडेमिक  डीजीज़ज़ एक्ट ( महामारी रोग अधिनियम )1897 में संशोधन करके पूर्व में केवल एक महीने की साधारण जेल तथा 200 रुo जुर्माना की सजा को बड़ा कर साधारण चोट के मामले में 3 महीने से लेकर 5 साल की सजा तथा 50 हजार से 2 लाख तक जुर्माना तथा गंभीर चोट के मामले में 6 महीने से लेकर 7 साल की सजा तथा 1 लाख से लेकर 5 लाख का जुर्माना  तथा इसके अतिरिक्त संपत्ति की क्षतिपूर्ती हेतु बाज़ार दर से दोगुना हर्जाना का प्राविधान कर दिया है जोकि बहुत ही अधिक कठोर है. देखने में तो यह एक सामान्य संशोधन है परन्तु इसकी बहुत सारी पेचीदगियां हैं जिनसे सभी को अवगत  तथा सतर्क होना ज़रूरी है . सभी अवगत हैं कि इस प्रकार के कड़े कानूनों में  अपराध की गंभीरता के अनुपात में बहुत अधिक सजा तथा उनके  दुरूपयोग की पूरी सम्भावना रहती है. यह भी ज्ञातव्य है की अधिकतर सरकारें संकट का इस्तेमाल कड़े कानून बना कर लोगों पर अपनी पकड मज़बूत करने के लिए करती हैं.  हाल में इस सम्बन्ध में यूएनओ ने भी मानवाधिकारों पर संकट के रूप में चेतावनी भी दी है. इस सम्बन्ध में व्यापक जन चर्चा की आवयकता है. इस विषय पर मैं  अलग से एक लेख भी लिख रहा हूँ.
यद्यपि यह लेख मूल रूप में अंग्रेजी में है परन्तु मैंने इसे पाठकों की सुविधा के लिए हिंदी में अनूदित किया है. - एस आर दारापुरी आईपीएस (से. नि.) राष्ट्रीय प्रवक्ता, आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट) - 
कानून लागू करते समय कानून को विषहर औषध  के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है, मूल मुद्दे को संबोधित करना स्वास्थ्य कर्मियों पर हिंसा के लिए आवश्यक वैक्सीन हो सकता है।
 कुछ अवांछनीय हमले, दुर्भावनापूर्ण आरोप, ब्लैक मेल या क्षति के लिए मुकदमा।"जर्नल ऑफ अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन में 129 साल पहले लिखा गया यह बयान भविष्यवाणी निकला है, विशेष रूप से जब भारत एक वैश्विक महामारी के दौरान अनियोजित मार्ग पर चल रहा है।
केंद्र ने पिछले हफ्ते डॉक्टरों की सुरक्षा के लिए एक अध्यादेश जारी किया था, जिसके तहत स्वास्थ्य कर्मियों  पर हमले के मामले गैर-जमानती होंगे। हालांकि, लांछन का पैमाना एक अधिक गहरी जड़ वाली सामाजिक समस्या की ओर इशारा करता है।
जब से भारत ने कोरोनोवायरस के प्रसार पर अंकुश लगाने के लिए देशव्यापी बंद का आह्वान किया है, डॉक्टरों को  अपने पड़ोसियों और मकान मालिकों से बहिष्कार का सामना करना पड़ा है, जब एक कोविद -19 मामले के संपर्कों का पता लगाते हुए और अमानवीय तरीके से पुलिस द्वारा पीटे जाने पर पथराव किया गया।
सामाजिक और नौकरी से प्रेरित जिम्मेदारी चौराहे पर थी जब 9 अप्रैल को, मध्य प्रदेश के भोपाल में दो डॉक्टरों पर खाकी में एक व्यक्ति द्वारा हमला किया गया था। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS, भोपाल) से दो निवासी डॉक्टर– डॉ. युवराज सिंह और डॉ. रितुपर्णा जाना अस्पताल में आपातकालीन ड्यूटी के बाद घर लौट रहे थे, जब एक पुलिस गश्ती दल ने न केवल उनके साथ मारपीट की, बल्कि उन्हें गाली भी दी और उन्हें कोरोनावायरस फैलाने के लिए दोषी ठहराया । जहां डॉ. सिंह का हाथ फ्रैक्चर हो गया, वहीं डॉ. रितुपर्णा के पैर में चोट लग गई।
मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न पिछले हफ्ते अपनी चरम सीमा पर पहुंच गया  जब चेन्नई में एक डॉक्टर  , जो कोरोनोवायरस से संक्रमित होने के बाद मर गया, को स्थानीय लोगों द्वारा कब्रिस्तान में विरोध करने पर उचित ढंग से दफनाने से इनकार कर दिया गया। जैसे ही भीड़ ने पथराव किया और एम्बुलेंस पर हमला किया, उसके सहयोगियों को उसे दफनाने के लिए नंगे हाथों से कब्र खोदनी पड़ी।
बढ़ती शिकायतों के मद्देनजर, कैबिनेट मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने पिछले बुधवार को कहा, "अध्यादेश के माध्यम से महामारी रोग अधिनियम में बदलाव को कैबिनेट द्वारा अनुमोदित किया गया है। अपराधों को गैर-जमानती और संज्ञेय बनाया जाएगा।"
केंद्र ने फैसला दिया कि 30 दिनों में जांच पूरी हो जाएगी। इसमें 2 लाख रुपये तक के जुर्माने सहित कठोर दंड होंगे। गंभीर मामलों में सात साल तक कारावास और 5 लाख रुपये तक का जुर्माना होगा।
जबकि अध्यादेश एक निवारक के रूप में कार्य कर सकता है, सड़ांध दूर तक पहुंची लगती है।
हेल्थकेयर सिस्टम में भरोसा में गिरावट :
यह देखते हुए कि भारत समाज में डॉक्टरों को बहुत उच्च स्थान देता है, उनके खिलाफ हिंसा की संभावना कम हो सकती है। लेकिन, इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के एक अध्ययन के अनुसार, 75 प्रतिशत से अधिक डॉक्टरों को काम पर हिंसा का सामना करना पड़ा है। देश भर के नागरिकों ने भी भारत की स्वास्थ्य प्रणाली में समय-समय पर अपना विश्वास कम होना व्यक्त किया है।
ईवाई और द फेडरेशन ऑफ इंडियन चैम्बर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के संयुक्त सर्वेक्षण के अनुसार, 'री-इंजीनियरिंग इंडियन हेल्थकेयर 2.0', 2019 में सर्वेक्षण में कम से कम 60 प्रतिशत रोगियों का मानना ​​है कि 2016 में 37% मरीजों के मामले में अस्पतालों ने उनके सर्वोत्तम हित में काम नहीं किया।
2018 में किए गए एक अलग सर्वेक्षण में परिणाम और भी खराब थे। 92 प्रतिशत से अधिक लोगों ने कहा कि वे भारत में स्वास्थ्य सेवा प्रणाली पर भरोसा नहीं करते हैं,  फिटनेस डीवाईस कम्पनी GOQ के वार्षिक सर्वेक्षण के अनुसार फार्मा और बीमा कंपनियां इसके बाद आती हैं. ।
हालांकि यह किसी भी तरह से डॉक्टरों पर हमलों को सही नहीं ठहराता, लेकिन इसके पीछे मानस को समझने में मदद करता है। यह निंदनीय परिघटना भी काफी वैश्विक है।
मध्य प्रदेश के इंदौर में एक स्थानीय समाचार रिपोर्टर ने क्षेत्र जिसके निवासियों ने डॉक्टरों के एक दल का पीछा किया गया था, जो एक सकारात्मक कोरोनावायरस रोगी के संपर्क का पता लगा रहे थे, का एक हफ्ते बाद दौरा किया था। उन्होंने News18 को उन निवासियों के साथ अपनी बातचीत के बारे में बताया जो हिंसा में शामिल नहीं थे, लेकिन वहां मौजूद थे-
"वहां के लोगों ने मुझे बताया कि वे डर गए थे। उन्हें लगा कि डॉक्टर उन सभी का परीक्षण और क्वारेन टाईन करेंगे। उनमें से कुछ ने यह भी माना कि उन्हें अलगाव केंद्रों में भेजा जाएगा, जहां वे किसी से मिलने या विस्तारित अवधि के लिए देखने में सक्षम नहीं होंगे। ब्रजेश ठाकुर ने कहा। उनमें चिकित्सा विशेषज्ञों में जानकारी और विश्वास की कमी स्पष्ट थी।
1 अप्रैल को, डॉक्टरों, आशा कार्यकर्ताओं और राजस्व अधिकारियों की एक टीम ने 65 वर्षीय व्यक्ति के परिवार के सदस्यों की पहचान करने के लिए क्षेत्र का दौरा किया था, जो कोरोनोवायरस से संक्रमित होने के बाद मर गया था। हमले में दो महिला डॉक्टर घायल हो गईं और उन्हें पुलिस द्वारा बचाया गया। शहर के रानीपुरा इलाके से स्थानीय लोगों द्वारा कथित तौर पर अधिकारियों पर थूकने और स्क्रीनिंग प्रक्रियाओं के दौरान उनके साथ दुर्व्यवहार करने के दो दिन बाद चौंकाने वाला हमला हुआ।
इसी घटना ने उस खतरे- “नकली समाचार” को भी प्रकाश में ला दिया जो संभवत: विषाणु जैसा ही शक्तिशाली है.
क्षेत्र के एक निवासी ने बाद में एक समाचार रिपोर्ट में खुलासा किया कि नकली वीडियो के बाद निवासियों को स्वास्थ्य कर्मियों पर संदेह हुआ। वीडियो में दावा किया गया कि स्वस्थ मुसलमानों ले जाया गया और उन्हें वायरस का इंजेक्शन लगाया गया।
दोष का एक बड़ा हिस्सा समाचार मीडिया उद्योग द्वारा भी वहन किया जाना चाहिए:
इंडियन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स के राष्ट्रीय अध्यक्ष दिगंत शास्त्री द्वारा पिछले साल प्रकाशित एक शोध पत्र में डॉक्टरों पर हमले के प्रमुख कारणों के रूप में "मीडिया द्वारा सनसनीखेज" बताया गया है। मुख्यधारा के मीडिया के पास मानवीय संकट के दौरान रिपोर्टिंग की बहुत नींव है।
"एक काल्पनिक उदाहरण के रूप में, दिल्ली के एक अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक पर चिल्लाते हुए एक टेलीविजन रिपोर्टर ने डेंगू के रोगियों के भार के तहत चिल्लाते हुए कहा कि क्यों डेंगू से मरने वाले मरीज को एंटीमाइलेरीअल नहीं दिया गया। यह 'ज्ञान' की एक हवा के साथ किया जाता है। द व्यूअर्स द्वारा प्रकाशित शोध पत्र में मेडिकोस लीगल एक्शन ग्रुप, योग्य डॉक्टरों का एक पंजीकृत ट्रस्ट, नीरज नागपाल, संयोजक नीरज नागपाल, ने लिखा, "दर्शकों को यह विश्वास हो जाएगा कि सदमे में डेंगू के मरीज को एंटीमैलेरियल्स नहीं देना," उच्चतम आदेश की चिकित्सा लापरवाही थी। नेशनल मेडिकल जर्नल ऑफ इंडिया।
इसके अलावा, कुछ को छोड़कर, कोई भी प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल समाचार आउटलेट नकली समाचारों को नष्ट करने में योगदान नहीं करते हैं।
सरकारी अस्पतालों में रोगियों का खेदजनक इलाज:
भारत में डॉक्टरों के खिलाफ हिंसा के अन्य कारणों में सरकारी अस्पतालों में रोगियों का इलाज किया जाता है।
पिछले महीने, आगरा की एक महिला ने तब सुर्खियाँ बटोरीं, जब उसने सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधा में अलग-थलग होने के विकल्प का विरोध किया, भले ही उसके पति कोविद -19 लक्षण दिखाने लगे। टाइम्स ऑफ इंडिया के अखबार ने बताया, '' शौचालय की अनचाही स्थिति को देखते हुए उसने उसे पीछे कर दिया।
घटना एकांत नहीं थी। 9 मार्च को, मंगलुरु में एक सरकारी अस्पताल के आइसोलेशन वार्ड से एक कोरोनवायरस संदिग्ध बच गया, उसने तर्क दिया कि वह निजी उपचार लेना चाहता है। मानेसर में, जहां भारतीय सेना एक संगरोध सुविधा चलाती है, मरीजों ने बेहतर सुविधाओं के लिए एक अलार्म उठाया, जिसके परिणामस्वरूप पुलिस को स्थिति को नियंत्रित करने के लिए बुलाया गया।
कई रोगियों ने कॉकरोच -19 अस्पतालों में कॉकरोच, गंदे शौचालय और उचित भोजन की कमी की शिकायत की। इससे परीक्षण के लिए डॉक्टरों द्वारा संपर्क करने वालों में डर पैदा हो जाता है, जिसके परिणामस्वरूप व्यवहार को अभी भी उचित नहीं ठहराया जा सकता है।
व्यवहारिक प्रतिरक्षा प्रणाली: मनोवैज्ञानिक प्रतिक्रिया
आमतौर पर एक पीढ़ी के लिए महामारी अभूतपूर्व होती है। वे गंभीर टोल लेते हैं, आम जनता के लिए, ज्यादातर दिमाग पर। साथ ही, समाजीकरण के लिए मानव मन का विकास किया जाता है। समय की विस्तारित अवधि के लिए संगरोध पर कोई भी प्रयास व्यक्तियों को ग्रिड से दूर कर सकता है। इसलिए, यह समझना महत्वपूर्ण है कि अचानक, लंबे समय तक लॉकडाउन जैसी घटनाएं अपने अंत की स्पष्टता के साथ नहीं, मानसिक रूप से मनुष्यों को प्रभावित करती हैं।
ब्रिटिश कोलंबिया विश्वविद्यालय के मनोविज्ञान विभाग के मार्क स्कॉलर ने लिखा है कि मनुष्य ने अचेतन मनोवैज्ञानिक प्रतिक्रियाओं का एक सेट विकसित किया है - जिसे उन्होंने "व्यवहार प्रतिरक्षा प्रणाली" कहा है - एक के दौरान संभावित रोगजनकों के साथ संपर्क को कम करने के लिए रक्षा की पहली पंक्ति के रूप में कार्य करना। सर्वव्यापी महामारी।
घृणा प्रतिक्रिया व्यवहार प्रतिरक्षा प्रणाली के सबसे स्पष्ट घटकों में से एक है। उदाहरण के लिए, जब लोग उन चीजों से परहेज करते हैं जो खराब या भोजन को गंध करती हैं जिन्हें वे अशुद्ध मानते हैं, तो वे सहज रूप से संभावित छूत को साफ करने की कोशिश कर रहे हैं।
लोगों के साथ बातचीत में व्यवहार को समान रूप से चित्रित किया गया है। किसी भी संदिग्ध या संभावित वाहक को बीमारी के प्रसार को कम करने के लिए स्वचालित रूप से टाला जाता है, जिससे एक तरह की सहज सामाजिक गड़बड़ी पैदा होती है। हालांकि, यह कई बार काफी कच्चा हो सकता है। इसका अर्थ है कि प्रतिक्रियाएँ अक्सर गलत होती हैं, और अप्रासंगिक सूचनाओं से उत्पन्न हो सकती हैं।
यह बताती है कि गुजरात के सूरत में 6 अप्रैल को हुई घटना। डॉ। संजीवनी पाणिग्रही को केवल डॉक्टर होने और कोविद -19 रोगियों का इलाज करने के लिए अनजाने में परेशान किया गया था। शहर के सरकारी अस्पताल में काम करते हुए, उसे अपने पड़ोसियों द्वारा कोरोनोवायरस के वाहक के रूप में उपहास किया गया था। जब उसने कोई ध्यान नहीं दिया, तो उसके पड़ोसी ने अश्लीलता का आरोप लगाते हुए उसे अपने ही घर में घुसने से रोक दिया। 34 वर्षीय ने दो वीडियो डाले जिसमें स्पष्ट रूप से उत्पीड़न का चित्रण किया गया था।
मैकगिल यूनिवर्सिटी के नात्सुमी सवादा के एक अध्ययन में पाया गया है कि जब लोग संक्रमण का खतरा महसूस करते हैं तो लोग बाहरी लोगों का डर पैदा करते हैं।
अध्ययन ने देश भर में रिपोर्ट किए गए कई मामलों में व्यावहारिक चित्रण स्थापित किया जहां स्वास्थ्य पेशेवरों ने अपने पड़ोसियों और जमींदारों से बढ़ते कलंक का वर्णन किया, जिसके परिणामस्वरूप कई लोगों ने टैक्सियों से इनकार कर दिया, अपने घरों से बैरिकेड किया, या बेघर हो गए।
मदद पाने के लिए, 24 मार्च को अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के रेजिडेंट डॉक्टर्स एसोसिएशन ने सरकार को लिखा। उन्होंने कहा, "कई डॉक्टर अपने पूरे सामान के साथ सड़कों पर फंसे हुए हैं, देश भर में कहीं नहीं जाते हैं," उन्होंने पत्र में कहा। दिल्ली और पश्चिम बंगाल दोनों में, सरकार ने अब स्वास्थ्य कर्मियों को बेदखल करने की धमकी देने वाले के खिलाफ कार्रवाई का आदेश दिया है।
अस्पतालों में निजी महिला के रूप में काम करने वाली कई महिलाओं ने यह भी बताया कि उन्हें या तो अपने किराए के आवास खाली करने के लिए कहा गया है या फिर समुदाय से दूर रहने के लिए कहा गया है।
मनोवैज्ञानिक कारणों को सूचीबद्ध करने के बाद, यह याद रखना महत्वपूर्ण है कि लोगों के पास हमेशा ये गहरे जड़ें थीं। बीमारी का बढ़ता खतरा बस उनकी स्थिति को कठिन बना देता है।
डेविड जे ले, न्यू मैक्सिको में एक नैदानिक ​​मनोवैज्ञानिक भी, लेखन की सीमा तक जाता है, "महामारी के जवाब में ज़ेनोफ़ोबिया (दुख की बात है) सामान्य है।"
क्या कानूनी कार्रवाई पर्याप्त है?:
राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद ने पिछले बुधवार को कोविद -19 जैसे स्वास्थ्य संकटों के दौरान हिंसा के खिलाफ स्वास्थ्य पेशेवरों की रक्षा करने के उद्देश्य से महामारी रोग (संशोधन) अध्यादेश, 2020 को मंजूरी दे दी।
अनुमोदन न केवल स्वास्थ्य कर्मियों पर हमला करता है, बल्कि उनकी संपत्ति पर भी, जिसमें उनके रहने और काम करने का स्थान, संज्ञेय, गैर-जमानती अपराध शामिल हैं।
यह सवाल कि क्या कानून सामाजिक और मनोवैज्ञानिक झुकाव को बदलने के लिए पर्याप्त है, विश्लेषण किया जाना बाकी है।
गहरी जड़ें अंतर्निहित कारणों से होने वाले सामाजिक व्यवहारों को बदलने के लिए अधिकांश कानून सक्षम नहीं हैं। उदाहरण के लिए, अमेरिका में नस्लीय भेदभाव को समाप्त करने के लिए कई कानून पारित किए गए हैं। इन के बावजूद, एयरबीएनबी  ग्राहकों के बीच एक अध्ययन में, हार्वर्ड बिजनेस स्कूल के शोधकर्ताओं ने पाया कि अफ्रीकी अमेरिकियों को काकेशियन की तुलना में मेहमानों के रूप में स्वीकार किए जाने की संभावना 16 प्रतिशत कम थी। इस दृष्टिकोण को समझाने के लिए अध्ययन दौड़ से परे कोई भी चर नहीं पा सका।
एक व्यवहार परिवर्तन को लागू करने के लिए एक कानून को लागू करने के तर्क के पीछे सजा का डर सबसे महत्वपूर्ण कारक हो सकता है। यह परिभाषित किया जा सकता है कि जब किसी को दंड या कारावास की आड़ में विरोध का सामना करना पड़ता है, तो लोग कानूनों को तोड़ने से बचते हैं।
हालांकि, सार्वजनिक व्यवहार के प्रबंधन के उद्देश्य से कानूनों को हस्तक्षेप के अन्य रूपों की आवश्यकता है। डॉ। शास्त्री ने अपने पेपर में कुछ इस मामले में प्रकाश डाला।
मौजूदा आर्थिक प्रणाली और स्वास्थ्य सेवा प्रणाली का पूर्ण रूप से विकास होना चाहिए। अखबार ने कहा, "हमारे देश का स्वास्थ्य बजट खर्च पश्चिमी देशों की तुलना में अल्प (लगभग 2 प्रतिशत) है। गरीब चिकित्सक-जनसंख्या अनुपात की समस्या को दूर करने के लिए बजट बढ़ाना समय की आवश्यकता है।"
इस बीच, यह निष्कर्ष निकालना गलत हो सकता है कि कानून सामाजिक परिवर्तन लाने में हमेशा विफल रहे हैं।
धूम्रपान को रोकने के लिए स्वास्थ्य चेतावनी सहित कई उपायों का इस्तेमाल किया गया। लेकिन एक कारक जिसने धूम्रपान में निरंतर गिरावट में योगदान किया है, वह सार्वजनिक स्थानों पर इस पर प्रतिबंध था। सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान पर अंकुश लगाने के लिए कानून के पहले टुकड़ों में से एक, 1999 में वापस केरल उच्च न्यायालय के एक आदेश का पालन किया गया।
केवल यह कहना सुरक्षित है कि जबकि कानून एंटीडोट्स के रूप में कार्य कर सकते हैं, मुख्य मुद्दे को संबोधित करना बहुत आवश्यक टीका हो सकता है।

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