सोमवार, 19 दिसंबर 2011

चाँद है जेरे कदम सूरज खिलौना हो गया

चाँद है जेरे कदम सूरज खिलौना हो गया
हाँ, मगर दौर में किरदार बौना हो गया
शहर के दंगों में जब भी मुफलिसों के घर जले
कोथिओं कि लान का मंज़र सलोना हो गया
ढो रहा है आदमी कंधे पे खुद अपनी सलीब
ज़िन्दगी का फलसफा जब भोज ढोना हो गया
यूँ तो अदम के बदन पर भी था पत्तों का लिबास
रूह उरियां क्या हुई मौसम घिनौना हो गया
अब किसी लैला को भी इकरारे-महबूबी नहीं
इस अहद में प्यार का सिम्बल तिकोना हो गया
अदम गोंडवी

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

दलित प्रतिरोध, न्यायिक हस्तक्षेप और राज्य शक्ति

  दलित प्रतिरोध , न्यायिक हस्तक्षेप और राज्य शक्ति: अनुसूचित जाति/जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम पर सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय और 2 अप्...