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गुरुवार, 10 अप्रैल 2025

क्या डा. अंबेडकर को भारत के संविधान को बनाने में पूरी आज़ादी थी?

क्या डा. अंबेडकर को भारत के संविधान को बनाने में पूरी आज़ादी थी?

एस आर दारापुरी, राष्ट्रीय अध्यक्ष, आल इंडिया पीपुल्स फ्रन्ट

 बी.आर. अंबेडकर, जिन्हें अक्सर "भारतीय संविधान के जनक" के रूप में जाना जाता है, ने इसके प्रारूपण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, लेकिन उन्हें पूरी तरह से स्वतंत्र हाथ नहीं मिला। उनका प्रभाव गहरा था, फिर भी प्रक्रिया की सहयोगी प्रकृति, राजनीतिक गतिशीलता और औपनिवेशिक शासन से स्वतंत्रता तक भारत के संक्रमण के व्यापक संदर्भ से विवश था। 07 अप्रैल, 2025 तक, ऐतिहासिक विद्वत्ता और प्राथमिक अभिलेख उनके योगदान और उनके सामने आने वाली सीमाओं की स्पष्ट तस्वीर प्रदान करते हैं। अंबेडकर की भूमिका और नियुक्ति अंबेडकर को 29 अगस्त, 1947 को संविधान सभा की प्रारूप समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया गया था, जिसे स्वतंत्रता के बाद भारत के संविधान को तैयार करने का काम सौंपा गया था। उनका चयन स्वचालित नहीं था; यह गहन राजनीतिक पैंतरेबाज़ी के बाद हुआ था। शुरुआत में, अंबेडकर मुस्लिम लीग के समर्थन से बंगाल से संविधान सभा के लिए चुने गए थे, लेकिन विभाजन के कारण उन्हें अपनी सीट गंवानी पड़ी। जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल ने उनकी कानूनी सूझबूझ और हाशिए पर पड़े समूहों के लिए वकालत को पहचानते हुए, कांग्रेस के वोटों के समर्थन से बॉम्बे से उनकी पुनः वापसी सुनिश्चित की। यह नियुक्ति उनकी क्षमताओं में विश्वास को दर्शाती है - जो उनकी कोलंबिया और लंदन की शिक्षा, बार योग्यता और *द एनीहिलेशन ऑफ कास्ट* जैसी रचनाओं के लेखक होने से स्पष्ट है - लेकिन यह जाति और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व को संतुलित करने के लिए एक रणनीतिक कदम भी था।

आंबेडकर, अल्लादी कृष्णस्वामी अय्यर, एन. गोपालस्वामी अयंगर और अन्य सहित सात सदस्यीय पैनल, संविधान सभा के तहत कई उप-समितियों में से एक थी, जिसमें 389 सदस्य थे (बाद में विभाजन के बाद 299 तक कम हो गए)। अंबेडकर की भूमिका इन समितियों, विधानसभा की बहसों और बाहरी प्रभावों से इनपुट को एक सुसंगत मसौदे में संश्लेषित करना था, न कि इसे एकतरफा रूप से लिखना।

प्रभाव की सीमा

अम्बेडकर की छाप प्रमुख क्षेत्रों में निर्विवाद है:

- मौलिक अधिकार: उन्होंने अनुच्छेद 14-18 का समर्थन किया, कानून के समक्ष समानता सुनिश्चित की, अस्पृश्यता का उन्मूलन किया और गैर-भेदभाव किया, जो जाति उत्पीड़न के खिलाफ उनके आजीवन संघर्ष को दर्शाता है।

- निर्देशक सिद्धांत: उन्होंने राज्य के नेतृत्व वाले सामाजिक कल्याण (अनुच्छेद 36-51) का समर्थन किया, जो उनके समाजवादी झुकाव और आयरिश संविधान से प्रेरित था।

- संघीय संरचना: उन्होंने यू.एस. और ब्रिटिश प्रणालियों के अपने अध्ययन से भारत के विखंडन को रोकने के लिए एक मजबूत संघ की वकालत की।

- आरक्षण: उन्होंने अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए सकारात्मक कार्रवाई (अनुच्छेद 15(4), 16(4)) सुनिश्चित की, जो कांग्रेस नेताओं के साथ उनकी बातचीत में निहित एक कठिन रियायत थी।

21 फरवरी, 1948 को प्रस्तुत उनके पहले मसौदे में 243 लेख थे, जिसमें संसदीय लोकतंत्र को सामाजिक न्याय के साथ मिश्रित किया गया था - एक ऐसा दृष्टिकोण जिसे उन्होंने 25 नवंबर, 1949 के अपने भाषणों में व्यक्त किया, जिसमें असमानता लोकतंत्र को कमजोर करने के खिलाफ चेतावनी दी गई थी। विधानसभा की बहसों के दौरान 7,635 से अधिक संशोधन प्रस्तावित किए गए, जिनमें से 2,473 को अपनाया गया, जिससे पता चलता है कि उनका मसौदा एक शुरुआती बिंदु था, न कि अंतिम शब्द।

बाधाएं और समझौते

अंबेडकर ने महत्वपूर्ण सीमाओं के भीतर काम किया:

1.     कांग्रेस का प्रभुत्व: कांग्रेस पार्टी, जिसने विधानसभा की 80% से अधिक सीटों पर कब्जा कर रखा था, ने संविधान की दिशा को आकार दिया। नेहरू और पटेल एक केंद्रीकृत राज्य और धर्मनिरपेक्ष ढांचे के पक्षधर थे, जो कभी-कभी अंबेडकर के अधिक कट्टरपंथी सामाजिक सुधारों से टकराते थे। उदाहरण के लिए, एक मजबूत समाजवादी एजेंडे (जैसे, भूमि का राष्ट्रीयकरण) के लिए उनका जोर नरम निर्देशक सिद्धांतों के पक्ष में कमजोर हो गया, जिन्हें अदालतों द्वारा लागू नहीं किया जा सकता था।

2.      गांधी का प्रभाव: महात्मा गांधी की ग्राम-केंद्रित शासन (जैसे, पंचायती राज) की वकालत अंबेडकर की शहरी, राज्य-संचालित दृष्टि से टकराती थी। अंबेडकर ने गांधी के ग्राम रोमांटिकवाद की आलोचना की, लेकिन गांधीवादी गुटों को खुश करने के लिए अनुच्छेद 40 (ग्राम पंचायतों को बढ़ावा देना) जैसे समझौते शामिल किए गए।

3.      समिति सहयोग: मसौदा समिति ने संवैधानिक सलाहकार बी.एन. राव जैसे विशेषज्ञों के साथ मिलकर काम किया, जिन्होंने वैश्विक संविधानों का अध्ययन करने के बाद एक प्रारंभिक रूपरेखा तैयार की। राव के 1946 के मसौदे ने अंबेडकर को बहुत प्रभावित किया, और अय्यर (एक कानूनी विद्वान) जैसे सदस्यों के इनपुट ने तकनीकी पहलुओं को परिष्कृत किया।

4. हिंदू कोड बिल की निराशा: सामाजिक सुधार के लिए अंबेडकर की व्यापक दृष्टि - विशेष रूप से जाति और लिंग पर - प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। विवाह और संपत्ति कानूनों में सुधार करने के उद्देश्य से उनके महत्वाकांक्षी हिंदू कोड बिल को रूढ़िवादी विधानसभा सदस्यों ने रोक दिया और बाद में 1951 में इसे छोड़ दिया, जिससे उन्हें कानून मंत्री के रूप में इस्तीफा देना पड़ा। यह दर्शाता है कि मसौदा समिति के बाहर उनके संवैधानिक प्रभाव को कैसे कम किया गया।

5. समय का दबाव: 1947 में स्वतंत्रता और विभाजन की अराजकता के साथ, विधानसभा को 26 जनवरी, 1950 तक संविधान को अंतिम रूप देने की तत्काल आवश्यकता का सामना करना पड़ा। इसने कट्टरपंथी प्रयोग को सीमित कर दिया, जिससे अंबेडकर को व्यक्तिगत आदर्शों पर आम सहमति को प्राथमिकता देने के लिए मजबूर होना पड़ा।

बातचीत और तनाव

कांग्रेस नेताओं के साथ अंबेडकर के रिश्ते जटिल थे। राज्य की शक्तियों को लेकर वे पटेल से और समाजवाद की सीमा को लेकर नेहरू से भिड़ गए, फिर भी उन्होंने अपनी व्यावहारिकता के लिए उनका सम्मान अर्जित किया। अस्पृश्यता को समाप्त करने (अनुच्छेद 17) पर उनके आग्रह को बहुत कम विरोध का सामना करना पड़ा, लेकिन दलितों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र जैसे प्रस्ताव - जिन्हें 1932 के पूना समझौते के बाद छोड़ दिया गया था - 1947 तक विचाराधीन नहीं रहे। धार्मिक व्यक्तिगत कानूनों पर बहस में भी समझौता हुआ: अंबेडकर एक समान नागरिक संहिता (अनुच्छेद 44, एक निर्देशक सिद्धांत) के पक्षधर थे, लेकिन मुस्लिम और हिंदू रूढ़िवादी दबाव ने इसे अनिवार्य नहीं, बल्कि आकांक्षापूर्ण बनाए रखा।

ऐतिहासिक मूल्यांकन

 ग्रानविले ऑस्टिन (*द इंडियन कॉन्स्टिट्यूशन: कॉर्नरस्टोन ऑफ ए नेशन*) जैसे विद्वान अंबेडकर को सामाजिक न्याय की दिशा में दस्तावेज़ को आगे बढ़ाने का श्रेय देते हैं, लेकिन असेंबली के सामूहिक स्वामित्व पर ध्यान देते हैं। नेहरू ने इसे "टीम प्रयास" कहा, जबकि अंबेडकर ने खुद 1949 में स्वीकार किया कि उन्होंने असेंबली के "निर्देशों" के तहत काम किया, अकेले लेखक होने को कम करके आंका। 1956 में उनका बौद्ध धर्म में धर्मांतरण और हिंदू धर्म की आलोचना से पता चलता है कि उन्हें लगा कि संविधान उनके परिवर्तनकारी दृष्टिकोण से कम है।

निष्कर्ष

अंबेडकर को भारत के संविधान को बनाने में पूरी आज़ादी नहीं थी। वे एक महान व्यक्ति थे - इसके समतावादी मूल को आकार देने और दलितों के अधिकारों की रक्षा करने वाले - लेकिन उन्होंने एक सहयोगी, कांग्रेस-प्रधान ढांचे के भीतर काम किया, अपने आदर्शों को राजनीतिक वास्तविकताओं के साथ संतुलित किया। उनकी प्रतिभा इन बाधाओं को पार करके एक ऐसा दस्तावेज़ तैयार करने में निहित थी, जो पूरी तरह से उनके कट्टरपंथ को प्रतिबिंबित नहीं करता था, लेकिन लोकतांत्रिक समावेशिता के लिए एक वैश्विक बेंचमार्क बना हुआ है। उनका हाथ निर्देशित था, बिना बंधे नहीं, जिससे उनकी उपलब्धि और भी उल्लेखनीय हो गई।

साभार: Grok 3

 

बुधवार, 23 अगस्त 2023

डा. अंबेडकर ने पिछड़ी जातियों के लिए क्या किया?

डॉ. आंबेडकर और पिछड़ी जातियां

डा. अंबेडकर ने पिछड़ी जातियों के लिए क्या किया?

-     एस. आर. दारापुरी, राष्ट्रीय अध्यक्ष, आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट

 

 

डॉ. आंबेडकर को प्रायः दलितों के उद्धारक के रूप में पहचाना जाता है जबकि वे सभी पददलित वर्गों दलितों और पिछड़ों के अधिकारों के लिए लड़े थे. परन्तु वर्ण व्यवस्था के कारण पिछड़ी जातियां जो कि शूद्र हैं, अपने आप को अछूतों (दलितों) से सामाजिक सोपान पर ऊँचा मानती हैं. एक परिभाषा के अनुसार पिछड़ी जातियां शूद्र हैं तो दलित जातियां अति शूद्र हैं. अंतर केवल इतना है कि पिछड़ी जातियां सछूत और दलित जातियां अछूत मानी जाती हैं. यह भी एक ऐतिहासिक सच्चाई है कि सछूत  होने के कारण पिछड़ी जातियों का कुछ क्षेत्रों में अछूतों से अधिक शोषण हुआ है. यह भी उल्लेखनीय है कि पिछड़ी जातियां कट्टर हिन्दूवाद के चंगुल में फंसी रही हैं जबकि दलित हिन्दू धर्म के खिलाफ निरंतर विद्रोह करते रहे हैं. सामाजिक श्रेष्ठता के भ्रम के कारण पिछड़ी जातियां डॉ. आंबेडकर को अपना नेता न मान कर दलितों का नेता ही मानती आई हैं. यह इसी लिए भी है क्योंकि अधिकतर पिछड़ी जातियां सवर्ण हिन्दुओं के प्रभाव में रही हैं और उन्हें डॉ. आंबेडकर के बारे में बराबर भ्रमित किया जाता रहा है ताकि वे डॉ. आंबेडकर की विचारधारा से प्रभावित होकर दलितों के साथ एकता स्थापित न कर लें और सवर्णों के लिए बड़ी चुनौती पैदा न कर दें. पिछड़ों और दलितों में इस दूरी के लिए दलित और पिछड़ों के नेता भी काफी हद तक जिम्मेवार हैं जो कि जाति की राजनीति करके अपनी रोटी सेंकते रहे हैं.

अब अगर ऐतिहासिक परिपेक्ष्य में देखा जाये तो डॉ. आंबेडकर ने जहाँ पददलित जातियों के अधिकारों के लिए जीवन भर संघर्ष किया वहीँ उन्होंने पिछड़ी जातियों के अधिकारों के लिए भी निरंतर संघर्ष किया. इस तथ्य की पुष्टि निम्नलिखित तथ्यों से होती है:-

1.       डॉ. आंबेडकर की उच्च शिक्षा में बड़ौदा के महाराजा सायाजी राव गायकवाड जो कि पिछड़ी जाति के थे और उन्होंने उन्हें अमेरिका में पढ़ने के लिए छात्रवृति दी थी, का बहुत बड़ा योगदान था.

2. 1.        डॉ. आंबेडकर को सहायता और योगदान देने वाले पिछड़ी जाति के दूसरे व्यक्ति छत्रपति साहू जी महाराज थे.

3. 2.       डॉ. आंबेडकर के रामास्वामी नायकर जो दक्षिण भारत के गैर ब्राह्मण आन्दोलन के अगुवा थे, से सम्बन्ध बहुत अच्छे थे.

4. 3.       डॉ. आंबेडकर पिछड़ी जाति के समाज सुधारक ज्योति राव फुले की सामाजिक विचारधारा से बहुत प्रभावित थे. 

5.  4.     डॉ. आंबेडकर ने ट्रावनकोर (केरल) में इज़ावा जो कि पिछड़ी जाति है, के समानता के आन्दोलन का समर्थन किया था. 

6.5.   डॉ.आंबेडकर ने ही 1928 में साईमन कमीशन के सामने भारत के भावी संविधान में पिछड़ी जातियों के लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण की वकालत की थी.  

7. 6.       डॉ. आंबेडकर ने संविधान निर्मात्री सभा के अध्यक्ष के रूप में सरकारी नौकरियों में आरक्षण के सम्बन्ध में संविधान की धारा 15 (4) में “बैकवर्ड” शब्द का समावेश करवाया था जो बाद में सामाजिक और शैक्षिक तौर से पिछड़ी जातियों के लिया आरक्षण का आधार बना.

8.  7.        डॉ. आंबेडकर के प्रयास से ही संविधान की धारा 340 में पिछड़ी जातियों की पहचान करने के लिए आयोग की स्थापना किये जाने का प्रावधान किया गया.

9.   8.     डॉ. आंबेडकर ने 1942 में शैडयूल्ड कास्ट्स फेडरेशन नाम से जो राजनैतिक पार्टी बनाई थी उस की नीति में यह उल्लिखित था कि पार्टी पिछड़ी जातियों और जन जातियों का प्रतिनिधित्व करने वाली पार्टियों के साथ गठजोड़ को प्राथमिकता देगी और अगर ज़रूरत पड़ी तो पार्टी अन्य पिछड़ा वर्ग का प्रतिनिधित्व करने के लिए अपना नाम बदल कर “बैकवर्ड क्लासेज़ फेडरेशन” कर लेगी. अतः पार्टी ने उस समय सोशलिस्ट पार्टी से भी चुनावी गठजोड़ किया था.

10.9.   1951 में जब डॉ. आंबेडकर ने हिन्दू कोड बिल को लेकर कानून मंत्री के पद से इस्तीफा दिया था तो उस में उन्होंने कहा था, “मैं एक दूसरा मामला संदर्भित  करना चाहूँगा जो मेरे इस सरकार से असंतोष का कारण है. यह पिछड़ी जातियों और अनुसूचित जातियों के साथ इस सरकार द्वारा किये गए बर्ताव के बारे में है. मुझे इस बात का दुःख है की संविधान में पिछड़ी जातियों के लिए कोई भी संरक्षण नहीं किया गया है. इसे राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किये जाने वाले आयोग की संस्तुतियों के आधार पर सरकारी आदेश पर छोड़ दिया गया है. हमें संविधान पारित किये एक वर्ष से अधिक हो गया है परन्तु सरकार ने अभी तक आयोग नियुक्त करने का सोचा भी नहीं है.” इस से आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि डॉ. आंबेडकर पिछड़े वर्गों के हित के बारे में कितने चिंतित थे.

1110. .    कानून मंत्री के पद से इस्तीफा देने के बाद लखनऊ विश्वविद्यालय के छात्रों को संबोधित करते हुए पिछड़ी जातियों की उपेक्षा के बारे में चेतावनी देते हुए डॉ. आंबेडकर ने कहा था,” अगर वे अपने समानता का दर्जा पाने के प्रयासों में मायूस हुए तो “शैडयूल्ड कास्ट्स फेडरेशन” कम्युनिस्ट व्यवस्था को तरजीह देगी और देश का भाग्य डूब जायेगा.” इस से भी अंदाज़ा लगाया जा सकता है की डॉ. आंबेडकर पिछड़े वर्गों के हित के बारे में कितने प्रयत्नशील थे.  पिछड़े वर्गों के हितों की उपेक्षा की बात उन्होंने बम्बई के नारे पार्क में एक बड़ी जन सभा में भी दोहराई थी.

1211. .    डॉ. आंबेडकर द्वारा पिछड़ी जातियों के मुद्दे को लेकर पैदा किये गए दबाव के कारण ही नेहरु सरकार को 1951 में काका कालेलकर की अध्यक्षता में प्रथम पिछड़ा वर्ग आयोग नियुक्त करना पड़ा. यह बात अलग है कि सरकार ने इस आयोग की संस्तुतियों को नहीं माना बल्कि आयोग के अध्यक्ष को ही आयोग की संस्तुतियों ( आरक्षण का जातिगत आधार) के विपरीत मंतव्य देने के लिए बाध्य कर दिया गया. 

13.12.     डॉ. छेदी लाल साथी जो कि सत्तर के दशक में रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इंडिया, उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष थे, ने मुझे बताया था कि 1951 में मंत्री  पद से त्याग पत्र देने के बाद  बाबासाहेब बहुत मायूस थे. उस समय पिछड़े  वर्ग के नेता रामलखन चंदापुरी, एस.डी.सिंह चौरसिया और अन्य लोगों ने उन्हें कहा कि आप घबराएं  नहीं हम सब आप के साथ हैं. इसी ध्येय से उन्होंने पटना में पिछड़ा वर्ग की एक रैली का आयोजन किया था जिस में बहुत बड़ी भीड़ जुटी थी. इस से बाबासाहेब बहुत प्रभावित हुए थे और वे फिर दलितों और पिछड़ों की राजनीति में सक्रिय हुए.

1413.  .   इस सम्बन्ध में डॉ. छेदी लाल साथी ने अपनी पुस्तक " दलितों व् पिछड़ी जातियों की स्थिति" के पृष्ठ 113 पर लिखा है, पटना से वापस आने के बाद बाबासाहेब ने अपने साथियों से विचार विमर्श करके शैडयूल्ड कास्ट्स फेडरेशन ऑफ़ इंडिया को भंग करके उसके स्थान पर रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इंडिया के गठन का फैसला लिया क्योंकि सन 1952 और 1954 में दो बार चुनाव हारने के बाद बाबासाहेब ने महसूस किया कि अनुसूचित जातियों की आबादी तो केवल 20% ही है और जब तक उनको 52% पिछड़े वर्ग का समर्थन नहीं मिलेगा, वह चुनाव में नहीं जीत पाएंगे. अतः; बाबासाहेब ने पिछड़े वर्ग के नेतायों, विशेष करके शिवदयाल सिंह चौरसिया आदि से मशवरा करके रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इंडिया में 20% दलित वर्ग के आलावा 52% पिछड़े वर्ग के लोगों तथा 12% आबादी वाले मुसलमान, ईसाई और सिखों को भी सम्मिलित करने का निर्णय लिया. एक साल से अधिक समय रिपब्लिकन पार्टी का संविधान बनाने और सलाह मशविरा में निकल गया."
14.   इस दृष्टि से पटना की यह रैली ऐतिहासिक थी क्योंकि इस में दलितों और पिछड़ों की एकता की नींव डली थी. बाबासाहेब ने नागपुर में 15 अक्तूबर, 1956 को शैडयूल्ड कास्ट्स फेडरेशन ऑफ़ इंडिया को भंग करके उसके स्थान पर रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इंडिया की स्थापना करने की घोषणा की थी. 1957 से 1967 तक इन वर्गों की एकता पर आधारित रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इंडिया एक बड़ी राजनैतिक ताकत के रूप में उभरी थी परन्तु बाद में कांग्रेस जिस के लिए यह पार्टी सब से बड़ा खतरा बन गयी थी, ने दलित नेताओं की कमजोरियों का फायदा उठा कर उन्हें खरीद लिया और यह पार्टी कई टुकड़ों में बंट गयी. बाद में उभरी बसपा जैसी पार्टी ने भी इस गठबंधन को तहस नहस कर दिया.

15.15.    अपने जीवन के अंतिम वर्षों में बाबासाहेब ने दलितों और पिछड़ों की एकता स्थापित करने के लिए पिछड़े वर्गों के नेता राम मनोहर लोहिया आदि से संपर्क स्थापित भी किया और उन के बीच पत्राचार भी हुआ था. परन्तु दुर्भाग्य से जल्दी ही बाबासाहेब का परिनिर्वाण हो गया और वह गठबंधन नहीं बन सका.

उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि डॉ. आंबेडकर ने न केवल दलितों हितों के लिए ही संघर्ष किया बल्कि वे जीवन भर पिछड़े वर्ग के हितों के लिए भी प्रयासरत रहे. उन के प्रयास से ही संविधान में पिछड़े वर्गों के लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण का प्रावधान हो सका और उन द्वारा पैदा किये गए दबाव के कारण ही प्रथम पिछड़ा वर्ग आयोग गठित हुआ. बाद में मंडल आयोग गठित हुआ और पिछड़े वर्ग को सरकारी नौकरियों और शिक्षा में आरक्षण मिला जिस के लिए  पिछड़े वर्ग को बाबासाहेब का अहसानमंद होना चाहिए.

अतः पिछड़े वर्ग को उन के उत्थान के लिए बाबासाहेब के योगदान को स्वीकार करना चाहिए. वर्तमान की  नयी चुनौतियों के परिपेक्ष्य में इन वर्गों की एकता को पुनर स्थापित करने की ज़रूरत है. यह बात भी सही है कि दलितों और पिछड़ों में कुछ वर्गीय अन्तर्विरोध हैं जिन्हें हल किये बिना आगे नहीं बढ़ा जा सकता.  यह सर्विदित है कि दलित, अति पिछड़े (हिदू, ईसाई और मुसलमान) कुदरती दोस्त हैं. यह समीकरण जातिगत न होकर साझे मुद्दों पर ही आधारित हो सकता है जो कि देश में बहुसंख्यकवाद और हिन्दुत्ववादी राजनीति का सामना कर सकता है.

 

 

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