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मंगलवार, 23 जनवरी 2018

भाजपा शासित राज्यों में दलित उत्पीड़न अधिक

भाजपा शासित राज्यों में दलित उत्पीड़न अधिक
-एस.आर.दारापुरी, आई.पी.एस. (से.नि.) एवं संयोजक, जनमंच उत्तर प्रदेश
राष्ट्रीय अपराध अनुसन्धान ब्यूरो (एनसीआरबी) द्वारा हाल में जारी की गयी क्राईम इन इंडिया2016 रिपोर्ट से एक बात पुनः उभर कर आई है कि भाजपा शासित राज्य दलित उत्पीड़न के मामले में देश के अन्य राज्यों से काफी आगे हैं. लगभग यही स्थिति वर्ष 2015 में भी थी. वर्तमान में भाजपा शासित राज्य गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, हरियाणा, छत्तीसगढ़, गोवा तथा झारखण्ड हैं जिनमे दलित उत्पीड़न के अपराध दूसरे राज्यों की अपेक्षा काफी अधिक हैं. यह स्थिति मोदी जी की दलितों के बारे में दिखाई गयी सहानुभूति तथा उनके दलित प्रेम की पोल खोलती है. इनके इलावा कुछ अन्य राज्य जैसे उड़ीसा, आन्ध्र प्रदेश, तेलन्गाना, उत्तर प्रदेश और बिहार हैं जिन में दलित उत्पीड़न के मामले राष्ट्रीय दर (प्रति एक लाख दलित आबादी पर) से ज्यादा हैं.
दलितों पर 2016 में कुल घटित अपराध:  इस वर्ष यह संख्या 40,801 है जो कि वर्ष 2015 की संख्या 38,670 से 2,131 अधिक है. इस प्रकार 2016 में पिछले वर्ष की अपेक्षा 5.5% की वृद्धि हुयी है. इस वर्ष प्रति एक लाख दलित आबादी पर घटित अपराध की राष्ट्रीय दर 20.3 रही है. इन अपराधों में दलित महिलाओं के शील भंग के कुल मामले 3,172 थे जो कि दलितों पर कुल घटित अपराध का 7.7% थे. इसी प्रकार बलात्कार के कुल मामले 2,541 थे जो कि कुल अपराध का 6.2% थे. इसी प्रकार उक्त अवधि में जनजाति वर्ग के विरुद्ध 6,568 अपराध घटित हुए जो कि 2015 की अपेक्षा में 4.7 % अधिक थे.
जनजाति वर्ग की महिलाओं पर बलात्कार के 974 मामले घटित हुए जो कि उन पर घटित कुल अपराध का 14.8% हैं. उन पर शील भंग के 835 मामले हुए जो कुल अपराध का 12.7% थे. इससे स्पष्ट है कि भाजपा राज में दलित महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं.
दलितों पर वर्ष 2016 में घटित अपराध की दृष्टि से भाजपा शासित राज्यों की स्थिति देखी जाये तो मध्य प्रदेश प्रथम स्थान पर है जिसमे 4,922 अपराध घटित हुए तथा अपराध की दर 43.4 रही जो कि राष्ट्रीय दर 20.3 से दुगनी है. इसी प्रकार राजस्थान दलित अपराध में देश में दूसरे नंबर पर है जहाँ 5,134 अपराध तथा उसकी दर 42.0 रही जो कि राष्ट्रीय दर (20.3) से दुगनी है. इसमें गोवा तीसरे स्थान पर है जहाँ अपराध दर 36.7 है. इसमें गुजरात 5वें स्थान पर है जहाँ अपराध दर 32.2 है जो कि राष्ट्रीय दर 20.3 से लगभग डेढ़ गुना है. इससे स्पष्ट है कि अधिकतर भाजपा शासित राज्यों में दलितों पर अपराध राष्ट्रीय औसत से काफी अधिक हैं.
अपराध वार राज्यों की स्थिति निम्न प्रकार है:-
1 हत्या : उक्त अवधि में देश में दलितों की हत्या के 786 अपराध हुए तथा प्रति लाख दर 0.4 रही. इसमें गुजरात के 32 मामलों में 35 दलितों की हत्याएं हुयीं और 0.8 की दर के कारण पूरे देश में प्रथम स्थान रहा. इसके बाद मध्य प्रदेश 81, हरियाणा 34 तथा उत्तर प्रदेश 271 मामलों में 274 हत्याएं एवं 0.7 की दर के साथ दूसरे स्थान पर रहे, राजस्थान 66 मामलों में 67 हत्याएं तथा 0.5 की दर के साथ पांचवें स्थान पर रहा. इससे स्पष्ट है कि हत्या के मामले में भाजपा शासित राज्यों की स्थिति बहुत बुरी है.
2. हत्या का प्रयास: उक्त अवधि में पूरे देश में 732 अपराध घटित हुए तथा अपराध की प्रति लाख दर 0.4 रही. इस अपराध में राजस्थान 106 और गुजरात 35 तथा अपराध की दर 0.9 जो कि राष्ट्रीय दर की दुगनी से भी अधिक है, के साथ प्रथम स्थान पर रहे. महाराष्ट्र में 60 मामले जिसमे 71 व्यक्ति प्रभावित हुए तथा दर 0.5 रही. यह भी राष्ट्रीय दर से अधिक है. इससे स्पष्ट है अधिकतर भाजपा शासित राज्यों में दलित सुरक्षित नहीं हैं.  
3. गंभीर चोट: इस अपराध के अंतर्गत पूरे देश में 1,070 मामले हुए जिनमें 1,148 व्यक्ति घायल हुए तथा राष्ट्रीय औसत दर 0.5 रही. इस अपराध की दर गुजरात में 1.6, बिहार में 1.5, उड़ीसा में 1.3, केरल में 1.0, मध्य प्रदेश में 0.8 रही जो कि राष्ट्रीय दर से काफी अधिक है.
4.  दलित महिलाओं के शील भंग के प्रयास का अपराध: उपरोक्त अवधि में पूरे देश में दलित महिलाओं के शील भंग के प्रयास के 3,172 अपराध तथा राष्ट्रीय अपराध दर 1.6 रही. इस अपराध की दर मध्य प्रदेश में 6.0, आन्ध्र प्रदेश में 3.6, महारष्ट्र में 2.7,  हरियाणा में 2.0 तथा गुजरात में 1.8 रही जो कि राष्ट्रीय औसत दर 1.6 से काफी अधिक है.
5. शील भंग: इस अपराध के अंतर्गत 2016 में कुल 1,268 अपराध हुए तथा राष्ट्रीय दर 0.6 रही. इस अपराध की दर मध्य प्रदेश में 3.6, छत्तीसगढ़ में 1.1, महाराष्ट्र में 1.3, राजस्थान में 0.8, हरियाणा में 0.7 तथा  गुजरात में 0.6 रही जो कि राष्ट्रीय दर 0.6 से काफी अधिक है.
6. बलात्कार : इस अपराध के अंतर्गत पूरे देश में 2,536 मामले हुए जिनमें 2,540 दलित महिलाएं बलात्कार का शिकार हुयीं तथा अपराध की राष्ट्रीय दर 1.3 रही. इस अपराध की दर केरल में 4.7, मध्य प्रदेश में 3.9, छत्तीसगढ़ में 2.9, राजस्थान में 2.7, हरियाणा में 1.9, गुजरात तथा महाराष्ट्र में 1.7 रही जो कि राष्ट्रीय दर 1.3 से बहुत अधिक है. इससे स्पष्ट है कि अधिकतर भाजपा शासित राज्यों में दलित महिलाएं असुरक्षित हैं. वास्तव में दलित महिलायों पर बलात्कार को दलितों का मनोबल  गिराने के लिए हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है.
7. अनुसूचित जाति/जन जाति अत्याचार निवारण एक्ट के अंतर्गत अपराध: इस श्रेणी के अंतर्गत पूरे देश में 35,676 अपराध घटित हुए जिनमें 36,855 व्यक्ति पीड़ित हुए तथा अपराध की राष्ट्रीय दर 18.0 प्रति एक लाख व्यक्ति रही. इस अपराध की दर मध्य प्रदेश में 43.4, राजस्थान में 41.1, बिहार में 32.9, गुजरात में 28.4, ओड़िसा में 25.0, केरल में 23.7, उत्तर प्रदेश में 22.6 रही जो कि राष्ट्रीय दर 18.0 से बहुत अधिक है.
  
उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि अधिकतर भाजपा शासित राज्य दलित उत्पीड़न में दूसरे राज्यों से काफी आगे हैं. यह आंकड़े मोदी जी द्वारा दलित उत्पीड़न को ले कर दिखाई गयी हमदर्दी तथा उनके “सब का साथ, सब का विकास” के नारे की भी पोल खोलती है. हाल में कोरगांव में दलितों पर हुआ हमला भी भाजपा की करनी और कथनी के अंतर को बेपर्दा करता है.   

 




शनिवार, 7 मार्च 2015

कैथर कलां की औरतें - गोरख पाण्डेय

 

कैथर कलां की औरतें - गोरख पाण्डेय

तीज - ब्रत रखती
 धान  पिसान करती थीं
गरीब की बीवी
गाँव भर की भाभी होती थीं
कैथर कला की औरतें

गाली - मार खून पीकर सहती थीं
काला अक्षर
भैंस बराबर समझती थीं
लाल पगड़ी देखकर घर में
छिप जाती थीं
चूड़ियाँ पहनती थीं
होंठ सी कर रहती थीं
कैथर कला की औरतें .

जुल्म बढ़ रहा थागरीब - गुरबा एकजुट हो रहे थे
बगावत की लहर आ गई थी
इसी बीच एक दिन
नक्सलियों की धर- पकड़ करने आई
पुलिस से भिड़ गईं
कैथर कला की औरतें

अरे , क्या हुआ ? क्या हुआ ? 
इतनी सीधी थीं गऊ जैसी
इस कदर अबला थीं
कैसे बंदूकें छीन लीं
पुलिस को भगा दिया कैसे ?क्या से क्या हो गईं
कैथर कला की औरतें ?

 यह तो बगावत है
राम - राम , घोर कलिजुग आ गया
औरत और लड़ाई ? 
उसी देश में जहाँ भरी सभा में
द्रौपदी का चीर खींच लिया गया
सारे महारथी चुप रहे
उसी देश में
मर्द की शान के खिलाफ यह जुर्रत ?
 खैर , यह जो अभी - अभी
कैथर कला में छोटा सा महाभारत
लड़ा गया और जिसमे
गरीब मर्दों के कंधे से कन्धा
मिला कर
लड़ी थीं कैथर कला की औरतें.

इसे याद रखें
वे जो इतिहास को बदलना चाहते हैं
और वे भी
जो इसे पीछे मोड़ना चाहते हों
इसे याद रखें
क्योंकि आने वाले समय में
जब किसी पर जोर - जबरदस्ती नहीं
की जा सकेगी
और जब सब लोग आज़ाद होंगे
और खुशहाल होंगेतब सम्मानित
किया जायेगा जिन्हें
स्वतंत्रता की ओर से
उनकी पहली कतार में होंगी
कैथर कला की औरतें |

मंगलवार, 3 जून 2014

बलातकार और जाति



 बलातकार और जाति
एस आर दारापुरी
हाल में उत्तर प्रदेश के बदायूं जनपद में अति पिछड़ी जाति की दो नाबालिग बच्चियों के साथ बलातकार और हत्या की घटना ने कई सवाल खड़े किये हैं. इस में एक तो पुलिस की लापरवाही और संलिप्तता और दूसरे अधिकतर बलात्कारों में दलित और समाज के कमज़ोर तबकों की महिलायों और लड़कियों को ही शिकार बनाया जाना है. इस में एक ओर जहाँ पुलिस की भूमिका पर प्रशन उठ रहे हैं वहीँ दूसरी ओर ऐसे अपराधों में हमारे समाज की जाति संरचना भी काफी हद तक जिम्मेवार दिखाई देती है.
इस घटना में पुलिस की लापरवाही और संलिप्तता के साथ साथ पुलिस का जाति विशेष के प्रति पूर्वाग्रह भी दिखाई देता है. इसके लिए पुलिस का जातिकरण और राजनीतिकरण भी काफी हद तक जिम्मेवार है. जैसा कि अब तक उभर कर आया है कि जब मृतक लड़की का पिता पुलिस के पास लड़कियों को अगवा किये जाने की शिकायत लेकर गया तो सब से पहले पुलिस वालों ने उसकी जात पूछी. जब उस ने अपनी जाति बताई तो पुलिस वालों ने उस का अपमान किया और उसका मज़ाक उड़ाया तथा उस की शिकायत पर कोई कार्रवाई नहीं की जिस का नतीजा यह हुआ कि दोनों लड़कियों का बलात्कार करके उन्हें पेड़ पर लटका दिया गया.
पुलिस के इस व्यवहार से यह उभर कर आया है कि थाने पर पुलिस का व्यवहार समाज के सभी वर्गों के प्रति समान नहीं है. वहां पर भी समाज के कमज़ोर तबकों के साथ जातिभेद किया जाता है. काफी लोगों का कहना है कि थाने पर जाति देख कर कार्रवाई की जाती है. इस का मुख्य कारण यह है कि हमारी पुलिस की संरचना भी जाति तथा सम्प्रदाय निरपेक्ष नहीं है. इस के इलावा पुलिस अधिकारियों और कर्मचारियों के व्यक्तिगत जाति तथा सम्प्रदाय के पूराग्रह भी काफी हद तक उनकी कार्यप्रणाली को प्रभावित करते हैं. अतः यह ज़रूरी है कि एक तो पुलिस में सभी जातियों और सम्प्रदायों का उचित प्रतिनिधित्व होना चाहिए और दूसरे पुलिस कर्मचारियों को इन वर्गों और महिलायों के प्रति अधिक संवेदनशील बनाने के लिए प्रभावी प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए. इस सम्बन्ध में जानबूझकर गलती करने वालों को अनुकरणीय दंड दिया जाना चाहिए. इस के अतिरिक्त पुलिस को बाहरी दबावों से मुक्त करने के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा आदेशित पुलिस सुधार लागू करने के लिए जन दबाव पैदा किया जाना चाहिए.
दलित और कमज़ोर वर्गों की महिलायों पर सब से अधिक बलात्कार ग्रामीण क्षेत्र में होते हैं. यह इस लिए है कि हमारी ग्रामीण समाज व्यवस्था आज भी सामंती और जाति आधारित है. ग्रामीण क्षेत्र में आज़ादी के बाद पुराने सामंतों की जगह नए सामंत पैदा हो गए हैं जो न केवल आर्थिक तौर पर मज़बूत हैं बल्कि उन्हें राजनैतिक और प्रशासनिक सत्ता का भी पूरा सहयोग रहता है. गाँव में यह सामंत पूरी तरह स्वेच्छाचारी आचरण करने के लिए स्वतन्त्र हैं. इसी लिए वे दलित और कमज़ोर वर्ग की औरतों और लड़कियों का निडर हो कर यौन शोषण करते हैं क्योंकि इन वर्गों की शिकायतों की पर थाने पर अथवा अन्यत्र वैसी सुनवाई नहीं होती जैसी कि कानून के अनुसार अपेक्षित है. दलित और अन्य कमज़ोर वर्ग के लोग इन सामंतों की ज्यादितियों का उचित प्रतिरोध इसी लिए भी नहीं कर पाते क्योंकि वे सामाजिक, आर्थिक और राजनितिक तौर पर कमज़ोर हैं और उन्ही सामंतों पर काफी हद तक आश्रित भी हैं.
गाँव में होने वाले बलात्कार के मामलों के विश्लेषण से यह भी पाया गया है कि ऐसी घटनाएँ अधिकतर उस समय होती हैं जब महिलाएं शाम/रात को शौच निवृति के लिए जाती हैं. यह बहुत शर्म की बात है कि हमारे देश में लगभग 50% घरों में शौचालय ही नहीं हैं जिस के लिए औरतों को घर के बाहर जाना पड़ता है जहाँ पर इस प्रकार की घटनाओं की अधिक सम्भावना रहती है. अतः अगर हम अपने आप को एक सभ्य देश कहलाना चाहते हैं तो हमें हरेक घर में शौचालय की व्यवस्था करनी चाहिए. मेरे विचार में नयी सरकार को इस काम को राष्ट्रीय अभियान के तौर पर चलाना चाहिए और आगामी बजट में इस के लिए विशेष प्रावधान करना चाहिए.
अतः दलित और समाज के कमज़ोर तबकों की महिलायों का यौन शोषण और उन पर होने वाले  अत्याचारों को रोकने के लिए यह ज़रूरी है कि इन वर्गों को उचित कानूनी संरक्षण मिले. पुलिस को सामंतों और राजनेताओं की तरफदारी करने की बजाये जनता के प्रति उत्तरदायी बनाया जाये जिस के लिए पुलिस सुधारों का लागू होना बहुत ज़रूरी है. इस के साथ साथ दलित और समाज के अन्य कमज़ोर तबकों का सशक्तिकरण किया जाये ताकि उन की सामंतों पर निर्भरता ख़तम हो सके. इस के लिए भूमि सुधारों का लागू होना बहुत ज़रूरी है. इस के लिए हमें डॉ. आंबेडकर के “जातिविहीन एवं वर्गविहीन समाज की स्थापना” के लक्ष्य को साकार करना होगा.   
  

श्रमिक कल्याण में डॉ. अंबेडकर की ऐतिहासिक भूमिका

श्रमिक कल्याण में डॉ. अंबेडकर की ऐतिहासिक भूमिका एस.आर. दारापुरी , राष्ट्रीय अध्यक्ष , अखिल भारतीय पीपुल्स फ्रंट (आज 1 मई को अंतर्राष्...