रविवार, 8 सितंबर 2013

ऐ रहबर-ए-मुल्क-ओ-कौम बता ये किसका लहू है, कौन मरा- साहिर लुधियानवी



ऐ रहबर-ए-मुल्क-ओ-कौम बता
ये किसका लहू है, कौन मरा

ये कटते हुए तन किसके हैं
नफ़रत के अंधे तूफां में
लुटते हुए गुलशन किसके हैं
बदबख्त फिजाएं किसकी हैं
बर्बाद नशेमन किसके हैं
कुछ हम भी सुनें, हमको भी सुना


किस काम के हैं ये दीन धरम
जो शर्म का दामन चाक़ करे
किस तरह का है ये देश बता
जो बसते घरों को खाक़ करे
ये रूहें कैसी रूहें हैं
जो धरती को नापाक़ करे
आंखें तो उठा, नज़रें तो मिला


जिस राम के नाम पे खून बहे
उस राम की इज्ज़त क्या होगी
जिस दीन के हाथों लाज लुटे
उस दीन की क़ीमत क्या होगी
इंसान की इस जिल्लत से परे
शैतान की जिल्लत क्या होगी
ये वेद हटा, क़ुरान उठा

बुधवार, 28 अगस्त 2013

काजू भुने पलेट में, विस्की गिलास में ... ( अदम गोंडवी )






काजू भुने पलेट में, विस्की गिलास में
उतरा है रामराज विधायक निवास में

पक्के समाजवादी हैं, तस्कर हों या डकैत
इतना असर है ख़ादी के उजले लिबास में

आजादी का वो जश्न मनायें तो किस तरह
जो आ गए फुटपाथ पर घर की तलाश में

पैसे से आप चाहें तो सरकार गिरा दें
संसद बदल गयी है यहाँ की नख़ास में

जनता के पास एक ही चारा है बगावत
यह बात कह रहा हूँ मैं होशो-हवास में

शुक्रवार, 9 अगस्त 2013

कँवल भारती की गिरफ्तारी अभिव्यक्ति की स्वंतत्रता पर हमला

कँवल भारती की गिरफ्तारी अभिव्यक्ति की स्वंतत्रता पर हमला

6.8.2013: आज जिस तरह रामपुर में एक बिलकुल फर्जी केस में दलित लेखक और चिन्तक श्री कँवल भारती की गिरतारी की गयी वह सपा सरकार का अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सीधा हमला है जिस की आईपीएफ कड़ी निंदा करती है क्योंकि उनके विरुद्ध मुकदमे का कोई भी आधार नहीं बनता है.
आज सवेरे श्री कँवल भारती ने अपनी फेसबुक की वाल पर निम्नलिखित टिप्पणी दर्ज की थी:
“आरक्षण और दुर्गाशक्ति नागपाल इन दोनों ही मुद्दों पर अखिलेश यादव की समाजवादी सरकार पूरी तरह फेल हो गयी है. अखिलेश, शिवपाल यादव, आज़म खां और मुलायम सिंह (यू.पी. के ये चारों मुख्य मंत्री) इन मुद्दों पर अपनी या अपनी सरकार की पीठ कितनी ही ठोक लें, लेकिन जो हकीकत ये देख नहीं पा रहे हैं, (क्योंकि जनता से पूरी तरह कट गये हैं) वह यह है कि जनता में इनकी थू-थू हो रही है, और लोकतंत्र के लिए जनता इन्हें नाकारा समझ रही है. अपराधियों के हौसले बुलंद हैं और बेलगाम मंत्री इंसान से हैवान बन गये हैं. ये अपने पतन की पट कथा खुद लिख रहे हैं. सत्ता के मद में अंधे हो गये इन लोगों को समझाने का मतलब है भैस के आगे बीन बजाना.”

इस से पहले 2 अगस्त को कँवल भारती जी ने अपनी फेसबुक पर यह लिखा था:
“आपका "आज तक" कैसे सबसे तेज है? आपको तो यह ही नहीं पता कि रामपुर में सालों पुराना मदरसा बुलडोजर चलवा कर गिरा दिया गया और संचालक को विरोध करने पर जेल भेज दिया गया जो अभी भी जेल में ही है. अखिलेश की सरकार ने रामपुर में तो किसी भी अधिकारी को सस्पेंड नहीं किया. वह इसलिए कि रामपुर में आज़म खां का राज चलता है, अखिलेश का नहीं.”

उन की उप्रोकर टिप्पणियों पर सिविल लाइन्स थाना रामपुर ने आज सुबह उन्हें कुछ लोगों की शिकायत पर साम्प्रदायिक सद्भाव बिगाड़ने तथा एक विशेष समुदाय की धार्मिक भावनाओं को आहत करने के आरोप में धारा 153 ए तथा धारा 295 ए भारतीय दंड विधान के अंतर्गत मुकदमा दर्ज करके गिरफ्तार कर लिया.
अब अगर कानून की दृष्टि से देखा जाये तो उन पर लगाये गए दोनों आरोप असत्य एवं निराधार हैं. भारतीय दंड विधान की धारा 153 ए के अनुसार यदि कोई व्यक्ति धर्म, मूलवंश, भाषा इत्यादी के आधारों पार विभिन्न समूहों के बीच शत्रुता का संप्रवर्तन और सौहार्द बनाए रखने के प्रतिकूल कार्य करता है तो वह इस धारा के अंतर्गत अपराध करने का दोषी है.
भारतीय दंड विधान की धारा 295 ए के अनुसार यदि कोई व्यक्ति विमशित और विदुएश्पूर्ण कार्य जो किसी वर्ग के धर्म या धार्मिक विश्वासों का अपमान करके उस की धार्मिक भावनाओं को आहत करने के आशय से करता है तो वह इस धारा का अपराध करता है.
अब अगर श्री कँवल भारती की उक्त टिप्पणियों को देखा जाए तो इस में न तो कोई साम्प्रदायिक सद्भाव बिगाड़ने और न ही किसी समुदाय की धार्मिक भावनाओं को आहत करने जैसी कोई बात लिखी गयी है. इस में केवल दो मुद्दों: दलितों का आरक्षण और दुर्गाशक्ति नागपाल के निलंबन को लेकर सरकार के रवैये की आलोचना की गयी जो कि पहले ही इतने व्यापक स्तर पर चौतरफा हो रही है.

हाँ! इतना ज़रूर है कि इन टिप्पणियों में अखिलेश यादव, शिवपाल यादव और मुलायम सिंह यादव के साथ आज़म खान का नाम भी है. अब यह बड़ी हैरानी की बात है कि केवल रामपुर, जो कि श्री आज़म खान का शहर है, में ही इस टिप्पणी से साम्प्रदायिक सद्भाव बिगड़ने और एक विशेष समुदाय की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुचने की बात कह कर मुकदमा दर्ज कराया गया और श्री कँवल भारती को गिरफ्तार कर लिया गया. यह अलग बात है न्यायालय द्वारा उन्हें ज़मानत दे दी गयी है.

क्या यह सपा सरकार के मंत्री आज़म खान द्वारा अपने गृह जनपद में अपनी आलोचना पर सभी प्रकार की पाबन्दी लगाने का प्रयास नहीं है? क्या लोगों को सरकार की विफलताओं की आलोचना करने का भी अधिकार नहीं है? क्या उत्तर प्रदेश में आपात काल लग गया है जिस में जनता के सभी मौलिक अधिकार निलंबित हो गए हैं? क्या राममनोहर लोहिया के समाजवाद का क्या यही वर्तमान स्वरूप है?

ऐसा प्रतीत होता है कि सपा की सरकार अपनी विफलताओं और चौतरफा आलोचनाओं से हताश हो गयी है और वह हर विरोध को कुचलने पर उतर आई है. दुर्गाशक्ति के निलंबन के मामले से उसकी जो छीछालेदर हुयी है उस से वह हडबडा गयी है और सत्ता के डंडे से आलोचनाओं पर काबू पाना चाहती है. श्री कँवल भारती की गिरफ्तारी इसी का ही दुष्परिणाम है. आईपीएफ सपा सरकार की इस कार्रवाही की कड़ी निंदा करती है.

एस. आर. दारापुरी,
राष्ट्रीय प्रवक्ता, आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट
मोबाइल: 9415164845

कँवल भारती की गिरफ्तारी अवैधानिक एवं विद्वेषपूर्ण


आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट (र)
प्रांतीय कार्यालय: 4 मॉल ऐवेन्यू, निकट फिरोज़ कोठी, लखनऊ.
कँवल भारती की गिरफ्तारी अवैधानिक एवं विद्वेषपूर्ण

अब तक यह स्पष्ट हो चुका है कि दिनांक 6/8/13 को प्रख्यात दलित लेखक श्री कँवल भारती की गिरफ्तारी उन द्वारा फेसबुक पर लिखी गयी जिन दो पोस्टों को लेकर की गयी है वास्तव में उन में साम्प्रदायिक सद्भाव बिगाड़ने और किसी समुदाय की धार्मिक भावनाओं को ठेस पंहुचाने जैसी कोई बात ही नहीं है. दरअसल जिस अपराध में उन्हें गिरफ्तार किया गया है यदि उसे सही भी मान लिया जाये तो भी इस अपराध में उनकी गिरफ्तारी की ही नहीं जा सकती थी क्योंकि इस की अधिकतम सजा 3 वर्ष है. पुलिस ने इस मामले में कोई भी तफ्तीश न करके सबसे पहले उन्हें गिरफ्तार करने का काम ही किया जो कि विवेचना की निर्धारित प्रक्रिया के विपरीत है. उनकी गिरफ्तारी में कानून के प्रावधानों का खुला उलंघन किया गया और उनकी गरिमा को ठेस पहुंचाई गयी. इस प्रकार उन की गिरफ्तारी पूर्णतया अवैधानिक एवं विद्वेषपूर्ण है जो कि निंदनीय भी है.

श्री कँवल भारती ने के अनुसार उस दिन रामपुर पुलिस द्वारा उन्हें प्रातः 7.30 बजे उनके घर से बनियान और पजामा में गिरफ्तार करके थाने पर लाया गया और उन्हें केवल इतना बताया गया कि थाने पर उन के विरुद्ध एक शिकायत प्राप्त हुयी है. वहां उन्हें दोपहर तक बैठाये रखा गया परन्तु उन की गिरफतारी के कारण के बारे में उन्हें नहीं बताया गया. थाने पर उन्हें बिलकुल भूखे प्यासे रखा गया और उनके घर वालों को उनसे मिलने तक नहीं दिया गया. बाद में थाने पर ही उन्होंने अपने घर से मंगवा कर कपडे पहने.

यहां पर यह अंकित करना उचित होगा कि गिरफतारी सम्बन्धी वर्तमान आदेशों के अंतर्गत श्री. कँवल भारती को इस मामले में गिरफ्तार नहीं किया जा सकता था क्योंकि उस अपराध की जिन धाराओं ( धारा 153 ए और 295 आई. पी.सी.) में में केवल 3 वर्ष और 2 वर्ष की सजा का प्राविधान है. सुप्रीम कोर्ट के आदेशों में यह स्पष्ट कहा गया है कि जिन मामलों में 7 वर्ष से कम सजा है उनमे पुलिस अभियुक्त को गिरफ्तार नहीं कर सकती. दूसरे किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तार करते समय उसे गिरफ्तारी का कारण बताना ज़रूरी है जो कि इस मामले में नहीं बताया गया. गिरफ्तारी में व्यक्ति की गरिमा का भी पूरा ख्याल रखना आवश्यक है जो कि जान बुझ कर नहीं रखा गया क्योंकि पुलिस उन्हें बनियान और पजामे में घर से उठा कर ले गयी.

घर से गिरफ्तारी के समय पुलिस उन का कम्प्यूटर और मोडम भी गैर क़ानूनी ढंग से उठा कर ले गयी क्योंकि मौके पर कोई भी सीज़र मीमो तैयार नहीं किया गया जो कि क़ानूनी प्रक्रिया का उलंघन है. इसी कारण कल श्री. कँवल भारती ने न्यायालय में इस के बारे में एक शिकायती प्रार्थना पत्र भी दिया है.

इस के अतिरिक्त पुलिस में जो शिकायत दर्ज की गयी है उस में वादी ने श्री कँवल भारती की 2 अगस्त वाली पोस्ट में " आज़म खान रामपुर में कुछ भी कर सकते है क्योंकि यह उन का क्षेत्र है और खुदा भी उन्हें नहीं रोक सकता है" अपनी तरफ से जोड़ दिया है जब कि पोस्ट में यह वाक्य हैं ही नहीं. कँवल भारती की गिरफ्तारी करने से पहले पुलिस के लिए यह ज़रूरी था कि वह पोस्ट की सत्यता के बारे में जांच करती परन्तु जान बूझ कर ऐसा नहीं किया गया.

उपरोक्त तथ्यों से ऐसा प्रतीत होता है कि श्री कँवल भारती की पुलिस द्वारा गिरफ्तारी रामपुर के अति प्रभावशाली नेता श्री आज़म खान के इशारे पर सभी नियमों और कानून को ताक पर रख कर की गयी है जो कि अवैधानिक एवं विद्वेषपूर्ण है जिस की आईपीएफ निदा करती है. आईपीएफ यह भी मांग करती है कि कँवल भारती के विरुद्ध बनाये गए फर्जी मामले को तुरंत समाप्त किया जाये और विधि विरुद्ध कार्य करने वाले पुलिस अधिकारियों के विरुद्ध दंडात्मक कार्रवाही की जाये. यदि ऐसा नहीं किया गया तो आईपीएफ इस मांग को लेकर जनांदोलन करेगी और जनहित याचिका दायर करने पर भी विचार करेगी.
एस. आर. दारापुरी
राष्ट्रीय प्रवक्ता,
आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट उ.प्र..
लखनऊ.
मोबाइल: 9415164845

बुधवार, 31 जुलाई 2013

सफाई कर्मचारी दिवस -एस. आर. दारापुरी

सफाई कर्मचारी दिवस -एस. आर. दारापुरी
 31 जुलाई देश भर में "सफाई कर्मचारी दिवस" के रूप में मनाया जाता है. इस दिन दिल्ली, नागपुर और शिमला नगरपालिका में सफाई कर्मचारियों को छुट्टी होती है. इस दिन सफाई कर्मचारी इकठ्ठा हो कर अपनी समस्यायों पर विचार.विमर्श करते हैं और अपनी मांगें सामूहिक रूप से उठाते हैं.
 सफाई कर्मचारी दिवस का इतिहास यह है कि 29 जुलाई, 1957 को दिल्ली म्युनिसिपल कमेटी के सफाई कर्मचारियों ने अपने वेतन तथा कुछ काम सम्बन्धी सुविधायों की मांग को लेकर हड़ताल शुरू की थी. उसी दिन केन्द्रीय सरकार के कर्मचारियों की फेडरेशन ने भी हड़ताल करने की चेतावनी दी थी. पंडित नेहरु उस समय भारत के प्रधान मंत्री थे.  उन्होंने केन्द्रीय सरकार के कर्मचारियों तथा सभी हड़ताल करने वालों को कड़े शब्दों में चेतावनी दी कि उनकी हड़ताल को सख्ती से दबा दिया जायेगा.
 30 जुलाई को नई दिल्ली सफाई कर्मचारियों की हड़ताल शुरू हो गयी नगरपालिका ने हड़ताल को तोड़ने के लिए बाहर से लोगों को भर्ती करके काम चलाने की कोशिश की. उधर सफाई कर्मचारियों ने एक तरफ तो कूड़ा ले जाने वाली गाड़ियों को नए भर्ती हुए कर्मचारियों को काम करने के लिए जाने से रोका और दूसरी ओर काम करने वालों से जाति के नाम पर अपील की कि वे उनके संघर्ष को सफल बनायेंण् हुमायूँ रोड, काका नगर, निजामुद्दीन आदि के करीब हड़ताली तथा नए भर्ती सफाई कर्मचारियों की झडपें भी हुयीं. 31 जुलाई को दोपहर तीन बजे के करीब भंगी कालोनी रीडिंग रोड से नए भर्ती किये गए कर्मचारियों को लारियों में ले जाने की कोशिश की गयी. सफाई कर्मचारियों ने इसे रोकने की कोशिश की.  पुलिस की सहायता से एक लारी निकाल ली गयी. परंतु जब दूसरी लारी निकली जाने लगी तो हड़ताल करने वाले कर्मचारियों ने ज्यादा जोर से इस का विरोध किया. पुलिस ने टिमलू नाम के एक कर्मचारी को बुरी तरह से पीटना शुरू किया. उस पर भीड़ उतेजित हो गयी और किसी ने पुलिस पर पत्थर फेंके.  उस समय मौके पर मौजूद डिप्टी एस पी ने भीड़ पर गोली चलाने का आदेश दे दिया. बस्ती के लोगों का कहना है कि पुलिस ने बस्ती के अन्दर आ कर लोगों को मारा और गोलियां चलायीं. गोली चलाने के पहले न तो कोई लाठी चार्ज किया गया और न ही आंसू गैस ही छोड़ी गयी. कितनी गोलिया चलाई गयीं पता नहीं. पुलिस का कहना था कि 13 गोलिया चलायी गयीं.
 इस गोली कांड में भूप सिंह नाम का एक नवयुवक मारा गया जो कि सफाई कर्मचारी तो नहीं था परन्तु वहां पर मेहमानी में आया हुआ था. जो नगरपालिका सफाई कर्चारियों की 30 जुलाई तक कोई भी मांग मानने को तैयार नहीं थी,  हड़ताल शुरू होने के बाद मानने को तैयार हो गयी. हड़ताल के दौरान पुलिस द्वारा गोली चलाये जाने और एक आदमी की मौत हो जाने के कारण सफाई कर्मचारियों में गुस्सा और जोश बढ़ा जो भयानक रूप ले सकता था. बहुत से लोगों ने हमदर्दी जताई और आहिस्ता.आहिस्ता लोग इस घटना को भूलने लगे. 
 भंगी कालोनी में रहने वाले कर्मचारी नौकरी खो जाने के डर से किसी भी गैर कांग्रेसी राजनीतक पार्टी को नजदीक नहीं आने देते थे. उधर कर्मचारी इस इस घटना को भुलाना भी नहीं चाहते थे. वे गोली का शिकार हुए नौजवान भूप सिंह की मौत को अधिक महत्व देते थे. उस की मौत के कारणों को या शासकों के रवैये को नहीं. उनकी भावनायों को ध्यान में रखते हुए इस बस्ती में रहने वाले नेताओं ने भूप सिंह की बर्सी मनाने की प्रथा शुरू कर दी. 1957 के बाद हर वर्ष पंचकुयीआं रोड स्थित भंगी कालोनी में भूप सिंह शहीदी दिवस मनाया जाने लगा और भूप सिंह को इस आन्दोलन का हीरो बनाया जाने लगाण् भूप सिंह की बड़ी सी तस्वीर बाल्मीकि मंदिर से जुड़े कमरे में लगायी गयी. इस मीटिंग में हर वर्ष भूप सिंह को श्रदांजलि पेश की जाती है.
 बाबा साहेब आंबेडकर की बड़ी इच्छा थी कि समूचे भारत के सफाई कर्मचारियों को एक मंच पर इकठ्ठा किया जाये. उनकी एक देशव्यापी संस्था बनायीं जाये जो उनके उत्थान और प्रगति के लिए संघर्ष करे और उन्हें गंदे पेशे तथा गुलामी से निकाल सके. उन्होंने 1942 से 1946 तक जब वे वाईसराय की एग्जीक्यूटिव कोंसिल के श्रम सदस्य थेए सफाई मजदूरों की समस्याओं के अध्ययन के लिए एक समिति भी बनायीं थी. दरअसल बाबा साहेब भंगियों से झाड़ू छुड़वाना चाहते थे और इसी लिए उन्होंने "भंगी झाड़ू छोडो" का नारा भी दिया था. 
 सफाई कर्मचारियों पर सब से अधिक प्रभाव गाँधी जी, कांग्रेस और हिन्दू राजनेताओं और धार्मिक नेताओं का रहा है. उन्होंने एक ओर तो सफाई कर्मचारियों को बाबा साहेब के स्वतंत्र आन्दोलन से दूर रखा और दूसरी ओर उन्हें अनपढ़, पिछड़ा, निर्धन और असंगठित रखने का प्रयास किया है ताकि वे सदा के लिए हिंदुयों पर निर्भर रहें, असंगठित रहें और पखाना साफ़ करने और कूड़ा ढोने का काम करते रहें. दूसरी ओर उनकी संस्थाओं को स्वंतत्र और मज़बूत बनने से रोका. उनकी लगाम हमेशा कांग्रेसी हिन्दुओं के हाथ में रही है.
 सफाई कर्मचारियों में हमेशा से संगठन का अभाव रहा है क्योंकि बाल्मीकि या सुपच के नाम से समूचे भारत के सफाई कर्मचारियों को एक मंच पर इकट्ठा नहीं किया जा सकता. ऐसा करने से उन में जातिगत टकराहट का भय रहता है. अतः सफाई कर्मचारियों को बतौर ""सफाई कर्मचारी" संगठित करना ज़रूरी है. इसी उद्देश्य से "अम्बेडकर मिशन सोसाइटी" जिस की स्थापना श्री भगवान दास जी ने की थी, ने 1964 में यह तय किया कि मजदूर दिवस की तरह दिल्ली में भी "सफाई कर्मचारी दिवस" मनाया जायेगा ताकि उस दिन सफाई कर्मचारी अपनी समस्याओं और मांगों पर विचार विमर्श कर सकें और उन्हें संगठित रूप से उठा सकें.
 धीरे धीरे भारत के अन्य शहरों में भी 31 जुलाई को स्वीपर. डे अथवा सफाई कर्मचारी दिवस के नाम से मनाया जाने लगा. दिल्ली के बाद नागपुर पहला शहर है जहाँ पर 1978 के बाद से बाकायदा हर वर्ष स्वीपर.डे पब्लिक जलसे के तौर पर मनाया जाता है. इस दिन वहां पर अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने, दुर्घटनाओं तथा अपनी सेवाकाल के दौरान मरने वाले सफाई कर्मचारियों को श्रदांजलि पेश की जाती है और अन्य समस्याओं के समाधान के लिए विचार विमर्श किया जाता है. प्रस्ताव पास करके सरकार को भेजे जाते है और सफाई कर्मचारियों की उन्नति और प्रगति के लिए प्रोग्राम बनाये जाते हैं.
 भगवान दास जी ने अपनी पुस्तक "सफाई कर्मचारी दिवस 31, जुलाई" में "सफाई दिवस कैसे मनाएं?" में इसे सार्थक रूप से मनाने पर चर्चा में कहा है कि इसे बाल दिवस, शिक्षक दिवस और मजदूर दिवस की तरह मनाया जाना चाहिए. उन्होंने आगे कहा है कि इस दिन जलसे में उनकी व्यवसायिक, आर्थिक तथा सामाजिक व्यवस्था और शिक्षा आदि समस्याओं पर चर्चा करना उचित होगा. शिक्षा के प्रसार खास करके लड़कियों तथा महिलायों की शिक्षा पर जोर दिया जाना चाहिए. शिक्षा में सहायता के ज़रूरतमंद छात्र-छात्राओं को पुरुस्कार, संगीत तथा चित्रकारी, मूर्ति कला तथा खेलों को प्रोत्साहन देने तथा छोटे परिवार, स्वास्थ्य और नशा उन्मूलन पर जोर दिया जाना चाहिए.  इस जलसे में मंत्रियों और बाहरी नेतायों नहीं बुलाया जाना चाहिए. बाबा साहेब तथा अन्य महापुरुषों के जीवन संघर्ष आदि से लोगों को परिचित कराया जाना चाहिए ताकि उन्हें इस से प्रेरणा मिले और उनमे साहस एवं उत्साह बढ़े और वे खुद आगे की ओर बढ़ने की कोशिश करें.
 वास्तव में सफाई कर्मचारी दिवस को कर्मचारियों में संगठन, जागृति, शिक्षा और उत्थान के लिए पूरी तरह से उपयोगी त्योहार के रूप में मनाया जाना चाहिए क्योंकि वे ही सब से अधिक शोषित, घृणित और पिछड़ा मजदूर वर्ग है.

बुधवार, 24 जुलाई 2013

सारनाथ धम्म्चकक महोत्सव - 2013

सारनाथ धम्म्चकक महोत्सव - 2013- एस आर. दारापुरी
 भारत के बौद्ध धम्म के इतिहास में पहली बार दिनांक 21, 22 व् 23 जुलाई को मूलगंध कुटी विहार, सारनाथ, वाराणसी में धम्मचक्क महोत्सव का आयोजन किया गया. इस में देश के विभिन्न बौद्ध विहारों के भिक्षुओं, बौद्ध उपासकों और उपासिकाओं ने भारीसंख्या में भाग लिया. सम्मलेन के प्रथम दिन धम्मेक स्तूप पर पूजा पाठ किया गया और “धम्म्देसना-धम्म की अपरिहारियता अर्थात धम्म विहीन जीवन की निरर्थकता” पर प्रवचन किया गया.
 आषाढ़ पूर्णिमा (22, जुलाई ) का दिन बौद्ध धम्म के इतिहास में एक एतिहासिक दिवस है जो कि धम्म चक्र परिवर्तन दिवस के रूप में मनाया जाता है क्योंकि आज से 2600 वर्ष पहले इसी दिन भगवान बुद्ध ने इसी स्थान पर जो कि "इस्सिपत्तन" के नाम से जाना जाता है, पांच शिष्यों को प्रथम उपदेश दिया था. इसी एतिहासिक दिवस के उपलक्ष्य में महाबोधि मंदिर के प्रांगन में धम्मचक्क महोत्सव के आयोजन के अंतर्गत 200 से अधिक श्रामनेरों को प्रव्रजित किया गया और इस सम्मलेन में पहली बार भारतीय भिक्खुओं के लिए चीवर का रंग निर्धारित किया गया जिस से भारतीय बौद्ध भिक्षुओं को एक अलग पहचान मिली है. 
इसी दिन अपरान्ह में "बुद्ध धम्म के प्रचार-प्रसार में हमारी भूमिका" विषयक विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया जिस में देश तथा विदेश के बौद्ध उपासकों और बौद्ध धम्म के विद्वानों ने भाग लिया. इस में वर्तमान में बौद्ध धम्म के प्रचार प्रसार की स्थिति, समस्याएं और भविष्य की कार्यनीति पर विस्तृत चर्चा की गयी. इस विचार गोष्ठी में डॉ. आंबेडकर द्वारा 21वीं सदी में धम्म चक्क पवत्तन, उन द्वारा भारत में बौद्ध धम्म के प्रचार प्रसार के लिए तैयार की गयी रूपरेखा पर प्रकाश डाला गया. अब आशा की जाति कि इस सम्मलेन से भारत में बौद्ध धम्म के प्रचार प्रसार को एक नई दिशा मिलेगी. इस अवसर पर एक अति सुन्दर " धम्म्चकक महोत्सव-2013 समारिका" का विमोचन भी किया गया. 
 महोत्सव के तीसरे दिन बुद्ध्मय भारत के निर्माण का संकल्प लिया गया और उत्तर प्रदेश में बौद्ध धम्म की सेवा में अपना महत्वपूर्ण योगदान देने वाले वरिष्ठ उपासक एवं उपासिकाओं को सम्मानित किया गया तथा उनका उद्भोधन भी हुआ. इसी महोत्सव में प्रव्रजित हुए श्रामनेरों का 21 जुलाई से 27 जुलाई तक श्रामनेर शिविर भी चलेगा . इस पूरे महोत्सव का आयोजन भारतीय बौद्ध भिक्खुओं, उपासक और उपासिकाओं द्वारा किया गया. इस में महाबोधि सोसाइटी आफ इंडिया, सारनाथ केंद्र के प्रभारी भिक्षु पी. शिवली का बहुत महत्वपूर्ण योगदान और दिशा निर्देशन रहा है. इस के साथ ही विभिन्न बौद्ध विहारों के भिक्खुओं ने इसे सफल बनाने के लिए बहुत परिश्रम किया. विभिन्न बौद्ध संस्थाओं, उपासक और उपासिकाओं ने भी तन, मन, धन से सहयोग देकर इस एतिहासिक महोत्सव को सफल बनाया. वे सभी बहुत बहुत साधुवाद के पात्र हैं.
 इस महोत्सव का यह एतिहासिक महत्व है कि यह आषाढ़ पूर्णिमा के दिन आयोजित किया गया जिस दिन हिन्दू लोग गुरु पूर्णिमा मानते हैं. ऐसा प्रतीत होता है कि शायद हिदुओं का गुरु पूर्णिमा दिवस धम्म चक्र परिवर्तन दिवस से ही लिया गया है क्योंकि इस दिन ही बुद्ध ने अपने पंचवग्गीय भिक्षुओं को प्रथम उपदेश दिया था और यह उन शिष्यों की अपने शास्ता के प्रति कृतिग्यता प्रकट करने का दिवस है.
 बहरहाल सारनाथ में धम्मचक्क परिवर्तन दिवस और महोत्सव का मनाया जाना यह दर्शाता है कि भारत में अब बौद्ध धम्म का पौदा जड़ पकड़ चुका है जिसे बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर ने 14,अक्तूबर, 1956 को रोपित किया था. अब उम्मीद की जा सकती है कि भारत जल्दी ही बौद्ध्मय हो जायेगा जो कि बाबा साहेब का सपना था.

मंगलवार, 9 जुलाई 2013


बोधगया में बम विस्फोट और साम्प्रदायिक राजनीति
एस. आर. दारापुरी
बोधगया में महाबोधि बौद्ध मंदिर परिसर में 7 जुलाई को प्रातः 9 बम विस्फोट हुए हैं जिन्हें सरकार ने आतंकी घटना माना हैण् यह देश में किसी बौद्ध स्थल पर पहली आतंकी घटना हैण् इस से आतंकी घटनाओं  का एक नया क्षेत्र सामने आया हैण् इस में दो बौद्ध भिक्षुओं को चोटें आई हैं जिन में  से एक की चोटें काफी गंभीर हैं परन्तु वह खतरे से बाहर हैण् 
इस घटना की जांच एनआईए ;राष्ट्रीय जाँच एजंसी द्वारा शुरू की गयी हैण् अब तक की विवेचना से कोई खास सुराग नहीं मिले हैंण् पुलिस ने अब तक विनोद मिस्त्री नाम के एक व्यक्ति को गिरफ्तार किया है जिस से पूछताछ चल रही हैण् घटना स्थल से उसका एक बैग भी बरामद हुआ है जिस में एक भिक्षु वाला चीवरए एक कागज़ पर कुछ टेलीफोन नंबरए दवाई का पर्चा और विनोद का वोटर पहचान पत्र बरामद हुआ हैण्
यद्यपि विवेचना से अभी तक इस आतंकी घटना को अंजाम देने वाले व्यक्तियों के बारे में कोई भी  ठोस सुराग नहीं मिला है फिर भी हमेशा की तरह शक की सुई इंडियन मुजाहिदीन की ओर मोड़ दी गयी हैण् मीडिया और कुछ  राजनीतिक पार्टियों ने बर्मा में बौद्धों और रोहंगीय मुसलमानों के बीच चल रहे साम्प्रदायिक झगडे से जोड़ कर मुस्लिम आतंकियों द्वारा किये जाने का संदेह व्यक्त करना शुरू कर दिया हैण् केन्द्रीय सरकार ने यह भी कहा है कि बौद्ध स्थलों पर मुस्लिम आतंकवादियों द्वारा संभावित हमले के बारे में आई बी द्वारा बिहार पुलिस को पहले ही सूचना दी गयी थीण् यह भी कहा जा रहा है कि इस  मामले में सुरक्षा व्यवस्था में चूक हुयी हैण् यद्यपि मौके पर लगे सी सी टी वी कैमरों से कुछ तस्वीरें मिली हैं परन्तु वे स्पष्ट नहीं हैंण्
अब अगर देखा जाये तो जहाँ तक आई बी द्वारा दी गयी सूचना का सम्बन्ध है वर्तमान में उस की विश्वसनीयता संदिग्ध कही जा रही है क्योंकि इस से पहले गुजरात में बम्ब विस्फोटों के मामले में उस की साम्प्रदायिक भूमिका और फर्जी मुठभेड़ों की साजिश में उस की संलिप्तता से उस की साख को काफी बट्टा लग चुका हैण् अब तक यह भी सिद्ध हो चुका है कि किस प्रकार आई बी के कुछ अधिकारियों ने सम्प्रदायिक भूमिका निभाते हुए बेक़सूर मुस्लिम नौजवानों को बम विस्फोट के मामलों में फंसवाया था जब कि बाद में उन घटनाओं के लिए हिन्दुत्ववादी संघठन के लोग जिम्मेवार गए थेण् अतः इस मामले में भी आई बी द्वारा मुस्लिम संघटनों के शामिल होने के बारे में दी गयी सूचना को भी इस के प्रत्यक्ष मूल्य पर स्वीकार नहीं किया जा सकताण्
 अब तक यह भी स्पष्ट हो चुका है कि आई बी के इजराइल की खुफिया एजंसी मौसाद से बहुत निकट  के सम्बन्ध हैं और वह भारत की पुलिस और आई बी के अधिकारियों को प्रशिक्षित भी कर चुकी हैण् इतना ही नहीं मौसाद कश्मीर में भारतीय सेना को भी प्रशिक्षित कर चुकी हैण् केंद्र में एनडीए सरकार के दौरान भाजपा  के इजराइल से बहुत अच्छे संबंध रहे हैं और वर्तमान कांग्रेस सरकार के  भी बहुत अच्छे सम्बन्ध हैंण्  उस से उत्तर प्रदेश में वर्तमान  सपा सरकार के भी बहुत अच्छे सम्बन्ध हैण् इस सरकार के मंत्री शिवपाल सिंह यादव कुछ समय पहले ही इजराइल की सरकारी यात्रा भी करके आये हैंण् भारत में इजराइल की मुख्य दिलचस्पी अपने हथियार बेचने की है और अब तक उसने भारी मात्रा में पुलिस के लिए छोटे और स्वचालित हथियार बेचे भी हैंण्  अब तक की विवेचना से मौसाद के हिन्दुत्ववादी संगठन श्अभिनव भारतष् से बहुत निकट के सम्बन्ध होने की बात भी सिद्ध हो चुकीं हैण् अतः बोधगया की घटना में मौसाद की दिलचस्पी से भी इनकार नहीं किया जा सकताण् भारत में आतंकी घटनायों से बिगड़े माहौल से ही तो इजराइल के हथियारों की मांग बढ़ेगीण्
जहाँ तक बर्मा में बौद्धों और रोहंगिया मुसलमानों के बीच साम्प्रदायिक झगडे का सम्बन्ध है उस के बारे में भारत के मुसलमानों में कोई खास प्रतिक्रिया नहीं देखी गयी है सिवाय तब के जब इंटरनेट पर इस सम्बन्ध में कुछ झूठी और भड़कायू तस्वीरें डाल दी गयी थींण् इस को लेकर लखनऊ में कुछ मुसलमानों द्वारा  बुद्धा पार्क में बुद्ध की मूर्ति को लेकर जो हरकत की गयी थी उसकी स्वयं मुस्लिम संघठनों द्वारा कड़ी निंदा की गयी थीण् इस पर भारत के बौद्धों जिन में अधिकतर दलित हैं ने भी कोई खास प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की थीण् बौद्ध गया की वर्तमान घटना पर भी भारत के बौद्धों ने इस की निंदा तो ज़रूर कि है और गहराई से जाँच की मांग की है परन्तु मुसलमानों के प्रति किसी प्रकार का आक्रोश नहीं व्यक्त किया हैण् दलाई लामा और अन्य बौद्ध धम्म गुरुयों ने भी शांति बनाये रखने का ही सन्देश दिया हैण्
अब महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि इस घटना से सीधा लाभ किस को मिल सकता हैण् यह भाजपा और अन्य हिन्दुत्ववादी संघठनों द्वारा पूरे देश में अपने साम्प्रदायिक एजंडे के अंतर्गत मुसलमानों को निशाना बना कर वोटों के ध्रुवीकरण की राजनीती की कोशिश भीहो सकती हैण् इस घटना के पीछे अब तक सौहार्दपूर्ण ढंग से रह रहे दलितए बौद्ध और मुसलमानों को  आपस में लड़ाने की कोशिश भी हो सकती हैण्  एक अन्य महत्वपूर्ण बिंदु यह भी है कि इस समय गुजरात में इशरत जहाँ के मामले को लेकर मोदी और भाजपा के अन्य नेता बुरी तरह से घिरे हुए हैंण् बोधगया की घटना से उस मुद्दे से फ़िलहाल ध्यान दूसरी ओर मुड़ गया है और भाजपा को नितीश और केन्द्रीय सरकार को सुरक्षा में ढिलाई के नाम पर घेरने का मौका  भी मिल गया हैण्
अतः बोधगया की घटना के बारे में वर्तमान में भाजपा द्वारा साम्प्रदायिक राजनीती को भड़काने का जो प्रयास किया जा रहा है उस से सभी खास करके दलितों और नव बौद्धों को सावधान रहने की ज़रुरत हैण् उन्हें इस से उत्तेजित नहीं होना चाहिएण् राष्ट्रीय  जांच एजंसी इस की गहराई से जांच कर रही है और उम्मीद की जानी चाहिए कि वह जल्दी ही असली दोषी व्यक्तियों को पकड़ने में कामयाब होगीण् साथ ही केन्द्रीय सरकार को भी इस सम्बन्ध में स्पष्ट बात करनी चाहिएण् बीच बीच में वह भी बिना किसी सबूत के इंडियन मुजाहिदीन आदि की लिप्तता की बात करने लगती है जिस से भाजपा और हिन्दुत्ववादी  मीडिया के दुष्प्रचार को बल मिलता हैण् हमें इस मामले में धैर्यपूर्वक जांच के परिणाम की प्रतीक्षा करनी चाहिए और अगले चुनाव में साम्प्रदायिकता की राजनीती को नहीं पनपने देना चाहिएण्     

नवी पिल्ले की संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में जाति-आधारित भेदभाव पर टिप्पणियाँ और भारत पर इनका असर

  नवी पिल्ले की संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में जाति-आधारित भेदभाव पर टिप्पणियाँ और भारत पर इनका असर एस.आर. दारापुरी , आई.पी.एस. ...