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शुक्रवार, 7 अगस्त 2026

जेन ज़ी का विद्रोह और उदारीकरणोत्तर सामाजिक अनुबंध का संकट

 

जेन ज़ी का विद्रोह और उदारीकरणोत्तर सामाजिक अनुबंध का संकट

 एस आर दारापुरी आई.पी.एस.(सेवानिवृत)

प्रताप भानु मेहता के लेख “Gen Z’s Parents Have to Answer for Their Politics Which Created This Crisis” का आलोचनात्मक पाठ

 

Dharmendra Pradhan resigns: Gen-Z protesters celebrate at Jantar Mantar ...

 

प्रस्तावना

जेनरेशन ज़ी (Gen Z) के हालिया विरोध-प्रदर्शनों का महत्व केवल छात्रों की परीक्षा, रोजगार, शिक्षा और संस्थागत विफलताओं से जुड़ी तत्काल शिकायतों तक सीमित नहीं है। द इंडियन एक्सप्रेस में 6 अगस्त 2026 को प्रकाशित अपने लेख “Gen Z’s Parents Have to Answer for Their Politics Which Created This Crisis” में प्रताप भानु मेहता ने इस घटना की एक महत्वपूर्ण और उकसाने वाली व्याख्या प्रस्तुत की है। उनका तर्क है कि युवाओं के आक्रोश को केवल किसी विशेष सरकार या राजनीतिक नेता के विरोध के रूप में नहीं समझा जा सकता। इसके बजाय, यह उस व्यापक राजनीतिक, आर्थिक और संस्थागत व्यवस्था के विरुद्ध गहरा असंतोष है, जिसे पिछली पीढ़ी ने निर्मित करने और वैधता प्रदान करने में भूमिका निभाई।

इस तर्क का महत्व इसलिए भी है कि यह ध्यान युवाओं के व्यवहार से हटाकर पिछली पीढ़ी की ऐतिहासिक जिम्मेदारी की ओर ले जाता है। जेन ज़ी  ऐसे भारत में प्रवेश कर रही है जहाँ उदारीकरण के बाद किए गए वादे—शिक्षा, योग्यता, पेशेवर उन्नति, रोजगार और व्यक्तिगत सामाजिक गतिशीलता—धीरे-धीरे अपनी विश्वसनीयता खोते दिखाई दे रहे हैं। जिन संस्थाओं से इन अवसरों की गारंटी की अपेक्षा की गई थी, वही संस्थाएँ आज अविश्वास का केंद्र बनती जा रही हैं।

लोकतंत्र, संवैधानिक नैतिकता और आंबेडकरवादी राजनीतिक चिंतन के परिप्रेक्ष्य में यह प्रश्न और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। वर्तमान संकट केवल बेरोजगारी या परीक्षा-व्यवस्था का संकट नहीं है। यह नागरिकों और संस्थाओं के बीच संबंध, व्यक्तिगत आकांक्षा और सामूहिक जिम्मेदारी तथा संवैधानिक लोकतंत्र और राजनीतिक समायोजन की संस्कृति के बीच संबंधों का संकट है। 

1. राजनीतिक निराशा से संस्थागत विद्रोह तक 

मेहता के तर्क की पहली महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि समकालीन छात्र आंदोलनों को सामान्य राजनीतिक आंदोलन मानकर खारिज नहीं किया जा सकता।

उनकी तात्कालिक माँगें भले ही सीमित दिखाई दें—निष्पक्ष परीक्षाएँ, रोजगार के अवसर, बेहतर शिक्षा, संस्थागत जवाबदेही और न्याय—लेकिन इनके भीतर एक कहीं अधिक बुनियादी प्रश्न छिपा है:

क्या नागरिक उन संस्थाओं पर भरोसा करते रह सकते हैं जो बार-बार अपने वादों को पूरा करने में विफल हो रही हैं?

 यही प्रश्न इन आंदोलनों को व्यापक राजनीतिक महत्व प्रदान करता है।

जेन ज़ी ऐसे भारत में पली-बढ़ी है जहाँ बार-बार यह विश्वास दिलाया गया कि शिक्षा और योग्यता सामाजिक उन्नति का रास्ता प्रदान करेंगी। छात्रों से कहा गया कि वे मेहनत करें, योग्यताएँ हासिल करें, परीक्षाओं में प्रतिस्पर्धा करें और पेशेवर क्षेत्र में प्रवेश करें। इसके पीछे एक अनकहा सामाजिक अनुबंध था:

शिक्षा से योग्यता मिलेगी; योग्यता से रोजगार मिलेगा; रोजगार से सम्मान और सुरक्षा प्राप्त होगी।

लेकिन यह अनुबंध धीरे-धीरे टूटता दिखाई दे रहा है।

प्रतियोगी परीक्षाएँ अत्यधिक अनिश्चित हो गई हैं। रोजगार के अवसर आकांक्षाओं की गति के अनुरूप नहीं बढ़े हैं। पेशेवर जीवन अधिक असुरक्षित हुआ है। उच्च शिक्षा महँगी और असमान होती जा रही है। जिन संस्थाओं से पारदर्शी नियमों के अनुसार काम करने की अपेक्षा थी, वे राजनीतिक प्रभाव, प्रशासनिक मनमानी अथवा अक्षमता के प्रति संवेदनशील दिखाई देने लगी हैं।

इसलिए युवाओं का आक्रोश केवल किसी एक परीक्षा या प्रशासनिक निर्णय के खिलाफ नहीं है। यह संचित संस्थागत अविश्वास की अभिव्यक्ति है।

2. उदारीकरणोत्तर वादे की विफलता

मेहता के तर्क का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पहलू उदारीकरणोत्तर पीढ़ी की राजनीतिक धारणाओं की आलोचना है।

आर्थिक उदारीकरण ने भारतीय समाज को गहराई से बदला। उपभोक्ता अवसरों का विस्तार हुआ, नए पेशेवर क्षेत्र विकसित हुए और एक नया आकांक्षी मध्यवर्ग उभरा। प्रमुख संदेश यह था कि शिक्षा, कौशल, प्रतिस्पर्धा और पेशेवर योग्यता के माध्यम से व्यक्ति अपनी सामाजिक स्थिति में सुधार कर सकता है।

राजनीतिक कल्पना धीरे-धीरे सामूहिक परिवर्तन से व्यक्तिगत गतिशीलता की ओर स्थानांतरित हो गई।

समाज को कैसे बदला जाए—इस प्रश्न की जगह यह प्रश्न अधिक महत्वपूर्ण होता गया:

मैं मौजूदा व्यवस्था में सफल कैसे हो सकता हूँ?”

यही वह दौर था जिसमें पेशेवर शिक्षा, कोचिंग संस्थान, तकनीकी प्रशिक्षण, प्रबंधन शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाएँ तेजी से बढ़ीं। व्यक्ति से अपेक्षा की गई कि वह बाजार और नौकरशाही में सफल होने के लिए स्वयं को अधिक से अधिक प्रतिस्पर्धी बनाए।

लेकिन इस मॉडल की एक बुनियादी कमजोरी थी। इसमें यह मान लिया गया कि संस्थाएँ पर्याप्त रूप से निष्पक्ष, सक्षम और स्वायत्त बनी रहेंगी।

जब संस्थाएँ कमजोर होने लगीं, तब व्यक्तिगत योग्यता भी व्यक्तिगत सफलता की गारंटी नहीं दे सकी।

एक प्रतिभाशाली छात्र भी विफल हो सकता है यदि परीक्षा प्रणाली दोषपूर्ण हो। योग्य स्नातक भी बेरोजगार रह सकता है यदि पर्याप्त रोजगार उपलब्ध न हो। किसी योग्य पेशेवर की उन्नति भी योग्यता के बजाय राजनीतिक संपर्क या संरक्षण पर निर्भर हो सकती है।

इस प्रकार जेन ज़ी के सामने खड़ा संकट आंशिक रूप से योग्यता-आधारित व्यवस्था के वादे के टूटने का संकट है। 

3. समायोजन की राजनीति 

मेहता का सबसे महत्वपूर्ण और विवादास्पद आरोप पिछली पीढ़ी पर है।

उनके अनुसार, पिछली पीढ़ी ने धीरे-धीरे समायोजन की राजनीति को स्वीकार कर लिया। संस्थाओं में सामूहिक परिवर्तन की माँग करने के बजाय लोगों ने उनमें व्यक्तिगत रूप से अपना रास्ता निकालना सीख लिया।

यदि कोई संस्था भ्रष्ट थी, तो उसमें जीवित रहने का तरीका खोज लिया गया।

यदि रोजगार कम था, तो व्यक्तिगत रूप से नौकरी सुरक्षित करने की कोशिश की गई।

यदि सार्वजनिक संस्थाएँ कमजोर थीं, तो निजी विकल्प तलाश लिए गए।

यदि राजनीति अधिक अधिनायकवादी होती गई, तो टकराव से बचा गया।

यदि पेशेवर संस्थाओं की स्वायत्तता कमजोर हुई, तो व्यक्तियों ने अपने करियर को सुरक्षित रखने पर ध्यान केंद्रित किया।

इस प्रकार सामूहिक प्रतिरोध की जगह व्यक्तिगत अनुकूलन ने ले ली।

इसके गहरे परिणाम हुए। जब व्यक्ति संस्थागत कमजोरियों के साथ स्वयं को समायोजित कर लेते हैं, तो समाज कुछ समय तक चलता रह सकता है। लेकिन संस्थाएँ स्वयं धीरे-धीरे कमजोर होती जाती हैं, क्योंकि उनके सुधार के लिए पर्याप्त सामूहिक दबाव नहीं बनता।

इस अर्थ में कैरियरवाद राजनीतिक रूप से रूढ़िवादी भूमिका निभा सकता है, भले ही उससे जुड़े व्यक्ति स्वयं को उदार या प्रगतिशील मानते हों।

विडंबना यह है कि एक पीढ़ी व्यक्तिगत सफलता प्राप्त कर सकती है, लेकिन उसी प्रक्रिया में उन संस्थाओं को कमजोर कर सकती है जिन पर अगली पीढ़ी का भविष्य निर्भर करता है। 

4. जेन ज़ी और भय को अस्वीकार करना 

वर्तमान पीढ़ी की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि वह भय को राजनीतिक जीवन की सामान्य स्थिति के रूप में स्वीकार करने को तैयार नहीं दिखाई देती।

युवा यह मानने को तैयार नहीं हैं कि राजनीतिक सत्ता का केवल पालन किया जाना चाहिए, संस्थागत अन्याय को सहन किया जाना चाहिए अथवा संभावित करियर-हानि के डर से नागरिकों को चुप रहना चाहिए।

लोकतंत्र के लिए यह अत्यंत महत्वपूर्ण है।

लोकतंत्र केवल समय-समय पर मतदान करने की प्रक्रिया नहीं है। इसके लिए ऐसे नागरिकों की आवश्यकता होती है जो सत्ता से प्रश्न पूछ सकें।

जिस समाज में नागरिक लगातार संस्थाओं से भयभीत रहें, वहाँ चुनाव होते रहने के बावजूद सार्थक लोकतंत्र का विकास कठिन हो जाता है।

इसलिए छात्र आंदोलन को एक मनोवैज्ञानिक परिवर्तन के रूप में भी देखा जा सकता है।

युवा वस्तुतः कह रहे हैं:

हमें कहा गया था कि मेहनत करो और निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा करो। यदि नियम ही निष्पक्ष नहीं हैं, तो हम चुप क्यों रहें?”

यह प्रश्न छात्र राजनीति से कहीं आगे तक जाता है। 

5. संस्थाओं का संकट 

वर्तमान संकट के केंद्र में संस्थागत विश्वसनीयता का क्षरण है।

विश्वविद्यालय, परीक्षा संस्थाएँ, लोक सेवा आयोग, न्यायालय, नियामक संस्थाएँ, समाचार माध्यम, नौकरशाही और पेशेवर संस्थाएँ अलग-अलग भूमिकाएँ निभाती हैं, लेकिन उन सभी की एक मूलभूत जिम्मेदारी है:

उन्हें राजनीतिक अथवा निजी हितों से स्वतंत्र होकर अपने मानकों और नियमों की रक्षा करनी चाहिए।

जब ये संस्थाएँ कमजोर या समझौताग्रस्त होती हैं, तो नागरिकों का विश्वास केवल किसी एक संस्था से नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था से उठने लगता है।

युवा लोगों के लिए यह संकट विशेष रूप से गंभीर है, क्योंकि उनके भविष्य का एक बड़ा हिस्सा इन्हीं संस्थाओं पर निर्भर करता है।

वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करने वाला छात्र केवल एक परीक्षा की तैयारी नहीं कर रहा होता। वह इस विश्वास के साथ तैयारी कर रहा होता है कि राज्य नागरिकों का मूल्यांकन सार्वजनिक रूप से निर्धारित और अपेक्षाकृत निष्पक्ष नियमों के आधार पर करेगा।

जब यह विश्वास टूटता है, तो नुकसान केवल भौतिक नहीं होता; उसका मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी होता है।

यह संदेश जाता है कि:

मेहनत जरूरी हो सकती है, लेकिन न्याय की गारंटी नहीं है।”

किसी भी लोकतंत्र के लिए यह अत्यंत खतरनाक संदेश है। 

6. माता-पिता की पीढ़ी और ऐतिहासिक जिम्मेदारी 

मेहता के लेख का शीर्षक जानबूझकर माता-पिता की पीढ़ी को जिम्मेदार ठहराता है।

इसका अर्थ यह नहीं है कि प्रत्येक माता-पिता ने व्यक्तिगत रूप से वर्तमान संकट पैदा किया है। यह एक व्यापक राजनीतिक पीढ़ी की आलोचना है।

पिछली पीढ़ी को कई मामलों में अपेक्षाकृत मजबूत संस्थाओं का लाभ मिला, लेकिन उसी समय उसने उन संस्थाओं के कमजोर होने की प्रक्रिया को भी स्वीकार किया।

उसने व्यावहारिकता के नाम पर समझौते स्वीकार किए।

स्थिरता के नाम पर राजनीतिक समायोजन स्वीकार किया।

करियर की सुरक्षा के नाम पर पेशेवर समझौते स्वीकार किए।

व्यक्तिगत रूप से रास्ता निकाल पाने के कारण संस्थागत पतन को सहन किया।

लेकिन जो स्थिति एक पीढ़ी के लिए सहनीय थी, वह अगली पीढ़ी के लिए अस्तित्वगत संकट बन गई।

इसीलिए जेन ज़ी का आंदोलन एक प्रकार का पीढ़ीगत अभियोग भी है।

युवा अपनी पिछली पीढ़ी से पूछ रहे हैं:

आप हमारे लिए कैसा समाज छोड़कर गए हैं?”

संस्थाएँ इतनी अविश्वसनीय क्यों हो गई हैं?”

शिक्षा अब रोजगार का सुरक्षित रास्ता क्यों नहीं रही?”

सार्वजनिक संस्थाओं ने अपनी विश्वसनीयता क्यों खो दी है?”

जिस चीज को आपने समझौते के रूप में स्वीकार किया, हम उसे सामान्य क्यों मानें?”

ये केवल आर्थिक प्रश्न नहीं हैं। ये राजनीतिक नैतिकता के प्रश्न हैं। 

7. एक आंबेडकरवादी व्याख्या 

मेहता के तर्क को डॉ. भीमराव आंबेडकर के विचारों के संदर्भ में देखें तो इसकी प्रासंगिकता और बढ़ जाती है।

आंबेडकर के लिए लोकतंत्र केवल संवैधानिक संस्थाओं की व्यवस्था नहीं था। वह मूलतः स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व पर आधारित जीवन-पद्धति था।

संस्थाएँ केवल इसलिए लोकतांत्रिक नहीं हो जातीं कि उनके नाम लोकतांत्रिक हैं। उनके कामकाज में संवैधानिक मूल्यों का प्रतिबिंब होना आवश्यक है।

यही संवैधानिक नैतिकता का महत्व है।

संवैधानिक नैतिकता का अर्थ है कि नागरिक और संस्थाएँ संविधान के मूल सिद्धांतों का सम्मान करें, भले ही ऐसा करना सत्ता में बैठे लोगों के लिए असुविधाजनक क्यों न हो।

इस दृष्टि से जेन ज़ी का संकट केवल रोजगार या परीक्षा का संकट नहीं है। यह संस्थागत न्याय का संकट है।

यदि अवसर औपचारिक रूप से खुले हों लेकिन व्यवहार में असमान हों, तो समानता खोखली हो जाती है।

यदि संस्थाएँ स्थापित नियमों के बजाय मनमानी सत्ता के आधार पर काम करें, तो कानून का शासन कमजोर होता है।

यदि नागरिक बिना भय के सत्ता से प्रश्न नहीं पूछ सकते, तो स्वतंत्रता कमजोर होती है।

यदि सामाजिक समूह सामूहिक जिम्मेदारी के बजाय व्यक्तिगत अस्तित्व की लड़ाई में सिमट जाते हैं, तो बंधुत्व कमजोर होता है।

इस प्रकार जेन ज़ी का विद्रोह लोकतंत्र के वास्तविक अर्थ को पुनर्स्थापित करने की माँग के रूप में देखा जा सकता है। 

8. व्यक्तिगत गतिशीलता से सामूहिक कार्रवाई की ओर 

वर्तमान संकट का शायद सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक सबक यह है कि व्यक्तिगत सामाजिक उन्नति संस्थागत सुधार का विकल्प नहीं हो सकती।

यदि लाखों लोग कुछ हजार नौकरियों के लिए प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं, तो समाधान केवल यह नहीं हो सकता कि व्यक्तियों को और अधिक प्रतिस्पर्धी बनाया जाए।

यदि परीक्षा-प्रणाली अविश्वसनीय है, तो समाधान केवल छात्रों को और अधिक मेहनत करने की सलाह देना नहीं हो सकता।

यदि सार्वजनिक संस्थाएँ राजनीतिक प्रभाव से कमजोर हो रही हैं, तो समाधान केवल निजी विकल्प तलाशना नहीं हो सकता।

संरचनात्मक समस्याओं के लिए संरचनात्मक समाधान आवश्यक हैं।

उदारीकरणोत्तर मॉडल ने लोगों को मुख्यतः ऐसे व्यक्तियों के रूप में देखने के लिए प्रेरित किया जो व्यक्तिगत उन्नति की तलाश में हैं। जेन ज़ी के आंदोलन शायद इस विचार की ओर वापसी का संकेत हैं कि व्यक्तिगत भविष्य सामूहिक संस्थाओं पर निर्भर करता है।

इसलिए परीक्षा की अनियमितता के खिलाफ संघर्ष करने वाला छात्र केवल अपने निजी हित की रक्षा नहीं कर रहा। वह इस सिद्धांत की रक्षा भी कर रहा है कि सार्वजनिक संस्थाएँ निष्पक्ष ढंग से काम करें। 

9. समकालीन लोकतांत्रिक विरोधों से संबंध 

यह दृष्टिकोण जंतर-मंतर जैसे स्थानों पर होने वाले समकालीन विरोध-प्रदर्शनों को समझने में भी उपयोगी है।

ऐसे आंदोलनों का महत्व केवल प्रदर्शनकारियों की तत्काल माँगों या राजनीतिक नेताओं के व्यक्तित्व तक सीमित नहीं किया जा सकता। वे असहमति के अधिकार, शांतिपूर्ण सभा की स्वतंत्रता, पुलिस जवाबदेही और नागरिकों तथा राज्य के बीच संवैधानिक संबंधों से जुड़े व्यापक प्रश्न उठाते हैं।

जब नागरिक सरकारी या संस्थागत कार्रवाई को चुनौती देने के लिए शांतिपूर्ण रूप से एकत्रित होते हैं, तो लोकतांत्रिक प्रतिक्रिया उन्हें असुविधा मानकर दबाने की नहीं होनी चाहिए।

राज्य को असहमति को लोकतांत्रिक जीवन के आवश्यक अंग के रूप में स्वीकार करना चाहिए।

जो संस्था आलोचना सहन नहीं कर सकती, वह धीरे-धीरे जवाबदेही से मुक्त होने लगती है। और जवाबदेही से मुक्त संस्था अंततः उन नागरिकों के प्रति असंवेदनशील हो सकती है जिनकी सेवा करना उसका दायित्व है।

इसलिए चुनौती केवल सरकार बदलने की नहीं है, बल्कि संस्थागत जवाबदेही को पुनर्स्थापित करने की है। 

10. केवल राजनीतिक परिवर्तन की सीमाएँ 

मेहता का तर्क इस धारणा के विरुद्ध भी एक महत्वपूर्ण चेतावनी है कि पूरे संकट को केवल किसी एक राजनीतिक दल या सरकार के संदर्भ में समझा जाए।

विशेष परिस्थितियों में राजनीतिक नेतृत्व में परिवर्तन आवश्यक हो सकता है, लेकिन इससे अपने-आप संस्थाएँ ठीक नहीं हो जातीं।

गहरी समस्या संस्थागत स्वायत्तता और पेशेवर नैतिकता के क्रमिक क्षरण की है।

विश्वविद्यालयों को अकादमिक स्वायत्तता चाहिए।

नौकरशाही को पेशेवर स्वतंत्रता चाहिए।

परीक्षा संस्थाओं को विश्वसनीयता चाहिए।

न्यायपालिका को संस्थागत अखंडता चाहिए।

नियामक संस्थाओं को स्वतंत्रता चाहिए।

मीडिया को संपादकीय स्वायत्तता चाहिए।

पेशेवर संस्थाओं को नैतिक मानकों की आवश्यकता है।

इन संस्थागत सुरक्षा-व्यवस्थाओं के बिना लोकतंत्र उन लोगों की सद्भावना पर अत्यधिक निर्भर हो जाता है जो अस्थायी रूप से सत्ता में हैं।

यह खतरनाक है, क्योंकि लोकतंत्र को ऐसी संस्थाओं की आवश्यकता होती है जो सत्ता पर नियंत्रण रख सकें, न कि केवल ऐसी संस्थाओं की जो सत्ता का प्रयोग करें। 

11. जेन ज़ी के विद्रोह का वास्तविक अर्थ 

इसलिए जेन ज़ी का आंदोलन केवल पीढ़ियों के बीच संघर्ष नहीं है।

यह दो राजनीतिक दर्शन के बीच टकराव है।

पहला दर्शन कहता है:

व्यवस्था के साथ समायोजन करो, अपना करियर सुरक्षित करो और अपने व्यक्तिगत हितों की रक्षा करो।

दूसरा कहता है:

यदि व्यवस्था अन्यायपूर्ण या अक्षम है, तो उसे बदलो।

पहले दर्शन ने कुछ लोगों के लिए स्थिरता पैदा की, लेकिन उसी के साथ संस्थागत क्षरण को भी संभव बनाया।

दूसरा दर्शन अधिक अस्थिरकारी हो सकता है, लेकिन उसमें लोकतांत्रिक पुनर्जागरण की संभावना निहित है।

इसलिए इन आंदोलनों को केवल युवाओं की अधीरता या राजनीतिक हेरफेर के रूप में खारिज करना उचित नहीं होगा।

वे एक नई राजनीतिक चेतना के उदय का संकेत हो सकते हैं—ऐसी चेतना जो समायोजन की विरासत द्वारा निर्धारित सीमाओं को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है। 

12. लोकतांत्रिक पुनर्निर्माण की दिशा 

अब चुनौती यह है कि युवा आक्रोश को रचनात्मक लोकतांत्रिक राजनीति में बदला जाए।

केवल विरोध संस्थाओं का पुनर्निर्माण नहीं कर सकता। उसे अंततः संस्थागत सुधार का कार्यक्रम भी विकसित करना होगा।

ऐसे कार्यक्रम में निम्नलिखित तत्व शामिल हो सकते हैं:

  1. परीक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही।
  2. विश्वविद्यालयों और सार्वजनिक संस्थाओं की अधिक स्वायत्तता।
  3. राजनीतिक हस्तक्षेप से पेशेवर मानकों की रक्षा।
  4. सम्मानजनक और पर्याप्त रोजगार के अवसरों का विस्तार।
  5. सार्वजनिक शिक्षा को मजबूत करना।
  6. सरकारी भर्ती और नियुक्तियों में अधिक पारदर्शिता।
  7. शांतिपूर्ण सभा और असहमति के अधिकार की रक्षा।
  8. सार्वजनिक अधिकारियों की जवाबदेही के स्वतंत्र तंत्र।
  9. लोक प्रशासन में संवैधानिक नैतिकता की पुनर्स्थापना।
  10. समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व पर नए सिरे से जोर।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि युवाओं को करियर और नागरिकता के बीच चुनाव करने के लिए बाध्य नहीं किया जाना चाहिए।

एक स्वस्थ लोकतंत्र को व्यक्ति को पेशेवर सफलता प्राप्त करने के साथ-साथ समाज को बेहतर बनाने के सामूहिक प्रयासों में भाग लेने की स्वतंत्रता देनी चाहिए। 

निष्कर्ष: अपने भविष्य को वापस माँगती एक पीढ़ी 

जेन ज़ी के आंदोलनों का मूल प्रश्न पिछली पीढ़ी के सामने यह है:

हम आने वाली पीढ़ियों के लिए कैसा लोकतंत्र, कैसी अर्थव्यवस्था और कैसी संस्थागत व्यवस्था छोड़कर जा रहे हैं?”

युवा आवश्यक रूप से वर्तमान व्यवस्था को नष्ट करने की माँग नहीं कर रहे हैं। अनेक मामलों में वे केवल यह माँग कर रहे हैं कि व्यवस्था अपने ही वादों को गंभीरता से ले।

उन्हें शिक्षा का वादा किया गया था—वे निष्पक्ष शिक्षा संस्थान चाहते हैं।

उन्हें योग्यता-आधारित व्यवस्था का वादा किया गया था—वे निष्पक्ष परीक्षाएँ चाहते हैं।

उन्हें रोजगार का वादा किया गया था—वे सम्मानजनक रोजगार के अवसर चाहते हैं।

उन्हें लोकतंत्र का वादा किया गया था—वे असहमति के अधिकार की माँग करते हैं।

उन्हें संवैधानिक समानता का वादा किया गया था—वे ऐसी संस्थाओं की माँग करते हैं जो वास्तव में समानता को लागू करें।

विडंबना यह है कि जिस पीढ़ी ने यह व्यवस्था विरासत में पाई, उसे व्यक्तिगत समायोजन को सफलता का सबसे सुरक्षित मार्ग बताया गया। लेकिन जेन ज़ी अब उस समझौते को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं दिखाई देती।

उसका संदेश अत्यंत महत्वपूर्ण हो सकता है:

हम केवल यह नहीं सीखना चाहते कि कमजोर और अविश्वसनीय संस्थाओं के भीतर कैसे जीवित रहा जाए; हम ऐसी संस्थाएँ चाहते हैं जिन पर भरोसा किया जा सके।”

आंबेडकरवादी दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह केवल पीढ़ीगत विद्रोह नहीं है। यह लोकतंत्र के अर्थ और भविष्य को लेकर संघर्ष है।

आंबेडकर ने चेतावनी दी थी कि राजनीतिक लोकतंत्र सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र के बिना स्थायी नहीं रह सकता। वर्तमान संकट इस चेतावनी में एक और आयाम जोड़ता है:

संवैधानिक लोकतंत्र तब तक जीवंत नहीं रह सकता जब तक नागरिक उन संस्थाओं पर विश्वास नहीं कर सकते जिनके माध्यम से संवैधानिक मूल्यों को व्यवहार में उतारा जाना है।

इसलिए जिम्मेदारी केवल युवा प्रदर्शनकारियों की या वर्तमान सरकार की नहीं है। यह पूरी एक राजनीतिक पीढ़ी की जिम्मेदारी है।

वास्तविक चुनौती है—

आक्रोश को लोकतांत्रिक पुनर्निर्माण में,
विरोध को संस्थागत सुधार में,
और पीढ़ीगत संघर्ष को एक नए सामाजिक अनुबंध में बदलना।

इस अर्थ में जेन ज़ी का विद्रोह शायद अतीत के विरुद्ध विद्रोह से अधिक भारत के लोकतांत्रिक भविष्य को स्वयं आकार देने के अधिकार की माँग है।

 

जेन ज़ी का विद्रोह और उदारीकरणोत्तर सामाजिक अनुबंध का संकट

  जेन ज़ी का विद्रोह और उदारीकरणोत्तर सामाजिक अनुबंध का संकट   एस आर दारापुरी आई.पी.एस.(सेवानिवृत) प्रताप भानु मेहता के लेख “ Gen Z’s Par...