मंगलवार, 6 अक्टूबर 2026

अगर गांधीजी आज ज़िंदा होते, तो आज के सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांप्रदायिक हालात पर उनकी क्या प्रतिक्रिया होती?

 

अगर गांधीजी आज ज़िंदा होते, तो आज के सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांप्रदायिक हालात पर उनकी क्या प्रतिक्रिया होती?

एस.आर. दारापुरी, आई.पी.एस. (रिटायर्ड)

(2 अक्तूबर, गांधी जयंती पर विशेष)

Mahatma Gandhi • Prendi un sorriso, regalalo a chi non l'ha mai avuto ...

"गांधीजी शायद आज के हालात से बहुत परेशान होते, हालांकि वे कुछ फायदों को भी मानते। वे अहिंसा, सत्य, सर्वोदय (सबका उत्थान), स्वदेशी/आत्मनिर्भरता, हिंदू-मुस्लिम एकता और भौतिकवाद व बहुसंख्यकवाद के दबाव को नकारने जैसे अपने पक्के सिद्धांतों पर चलते।"

यह बात अंदाज़े पर आधारित है। यह इस बात पर टिकी है कि गांधीजी ने असल में क्या लिखा, कहा और किया—न कि बाद में उनकी छवि का राजनीतिक इस्तेमाल कैसे किया गया। वे कोई व्यवस्थित विचारक या आधुनिक प्रगतिशील व्यक्ति नहीं थे; वे धर्म से जुड़े नैतिक व्यक्ति थे जो लक्ष्य से ज़्यादा साधनों, गांव-केंद्रित सादगी और व्यक्तिगत नैतिक बदलाव को अहमियत देते थे।

सामाजिक

वे छुआछूत के औपचारिक खात्मे, महिलाओं और निचली जातियों के लिए शिक्षा और कानूनी बराबरी के विस्तार, और उन चरम पारंपरिक रीति-रिवाजों के कम होने का स्वागत करते जिनका उन्होंने विरोध किया था। उन्होंने छुआछूत और बुनियादी सम्मान के लिए ज़ोरदार अभियान चलाया था।

वे व्यवहार में बनी हुई जाति-व्यवस्था, पुराने सामाजिक रिश्तों की जगह लेने वाले व्यावसायीकरण और रुतबे की चाहत, शहरी अलगाव, और सोशल मीडिया व सेलिब्रिटी कल्चर के दिखावे की आलोचना करते। गांधीजी का आदर्श गांवों में बसा हुआ, नैतिक रूप से अनुशासित सामुदायिक जीवन था, न कि ज़्यादा उपभोग वाला शहरी व्यक्तिवाद या पहचान की राजनीति जो समूहों की शिकायतों को और बढ़ाती है। वे आज की कई "तरक्की" को आध्यात्मिक रूप से खोखला मानते अगर उससे इच्छाएं बढ़तीं, भावना में असमानता आती, और शारीरिक श्रम व प्रकृति से दूरी बढ़ती।

धार्मिक

गांधीजी एक सच्चे हिंदू थे जो रोज़ गीता पढ़ते थे, फिर भी उनका मानना ​​था कि सभी धर्मों में सच्चाई है और किसी एक का उस पर एकाधिकार नहीं है। वे सभी धर्मों की मिली-जुली प्रार्थना करते थे, मुसलमानों के अपने धर्म का पालन करने के अधिकार का बचाव करते थे, और सांप्रदायिक सद्भाव के लिए बार-बार अपनी जान जोखिम में डालते थे। वे आक्रामक बहुसंख्यकवाद और अल्पसंख्यक अलगाववाद—दोनों को ही नकारते, क्योंकि ये दूसरे को हमेशा के लिए दुश्मन मानते हैं।

वे धर्म के राजनीतिकरण, मंदिर-मस्जिद विवादों के स्थायी लामबंदी के औजार बनने, और किसी भी ऐसी विचारधारा से चिंतित होते जो दूसरे समुदाय के प्रति हिंसा या अपमान को सही ठहराती हो। साथ ही, वह आधुनिक पश्चिमी अर्थों में धर्मनिरपेक्षतावादी नहीं थे; वह चाहते थे कि धर्म सार्वजनिक नैतिकता में घुला-मिला रहे, लेकिन किसी पर थोपा न जाए। आक्रामक नास्तिकता या धार्मिक अभिव्यक्ति के प्रति राज्य की दुश्मनी भी उन्हें परेशान करती।

आर्थिक

गांधी औद्योगिक पूंजीवाद, बड़े पैमाने पर मशीनीकरण जिससे मज़दूरों का रोज़गार छिन जाता था, और कभी न खत्म होने वाली भौतिक तरक्की की होड़ के कड़े आलोचक थे। उनका रचनात्मक कार्यक्रम खादी, ग्रामीण उद्योगों, ट्रस्टीशिप (संपत्ति को समाज के लिए एक ट्रस्ट के तौर पर रखना) और आत्मनिर्भर ग्रामीण अर्थव्यवस्थाओं पर केंद्रित था। आज के तेज़ी से बढ़ते, उपभोग पर आधारित और शहरों पर केंद्रित मॉडल को—जिसमें बहुत ज़्यादा संपत्ति का जमावड़ा, पर्यावरण को नुकसान और दूर के बाज़ारों पर निर्भरता है—वह नैतिक और व्यावहारिक रूप से विफल मानते, भले ही वह पूर्ण गरीबी में कमी और स्वास्थ्य व संचार में तकनीकी तरक्की को स्वीकार करते।

वह विकेंद्रीकरण, स्थानीय उत्पादन, ज़रूरतों पर संयम और ऐसी आर्थिक व्यवस्थाओं का समर्थन करते जो इंसानों या प्रकृति को सिर्फ़ 'इनपुट' (उत्पादन के साधन) न मानें। कॉरपोरेट ताकत, सट्टेबाज़ी वाला फाइनेंस और दिखावे के लिए उपभोग उनकी आलोचना के निशाने पर होते।

राजनीतिक

गांधी ने आज़ादी के बाद संसदीय लोकतंत्र को भले ही अपूर्ण लेकिन काम करने लायक माना, फिर भी उन्हें राज्य की केंद्रित शक्ति, पार्टी मशीनरी और इस सोच पर भरोसा नहीं था कि राजनीति का मुख्य मकसद राज्य पर कब्ज़ा करना है। उन्होंने नैतिक तरीकों, स्वेच्छा से सहयोग और नागरिक समाज व व्यक्ति की अंतरात्मा की प्रधानता पर ज़ोर दिया।

वे भ्रष्टाचार, परिवार-आधारित राजनीति, बहुमत की दादागिरी और नफ़रत या गलत जानकारी को राजनीतिक हथियार बनाने की निंदा करते—चाहे कोई भी पक्ष ऐसा क्यों न करता। उनके लिए बोलने की आज़ादी और असहमति का अधिकार महत्वपूर्ण था; वे सरकार की मनमानी और भीड़ की धौंस-धमकी, दोनों का विरोध करते। ऐसी ध्रुवीकरण की राजनीति, जो साथी नागरिकों को हमेशा के लिए दुश्मन बना देती है, उन्हें आज़ादी की लड़ाई के नैतिक मूल्यों के साथ धोखा लगती।

सांप्रदायिक मुद्दे

यह वह क्षेत्र है जहाँ उनकी सोच में सबसे ज़्यादा निरंतरता दिखती है। गांधीजी के जीवन के आखिरी साल बंटवारे की हिंसा की त्रासदी से जूझते हुए बीते। उन्होंने उपवास किए, दंगा प्रभावित इलाकों का दौरा किया और इस बात पर ज़ोर दिया कि हिंदुओं और मुसलमानों को बराबरी के साथ मिल-जुलकर रहना चाहिए, वरना आज़ादी की लड़ाई ही खोखली साबित होगी। वे किसी भी ऐसी सोच को खारिज कर देते—चाहे वह हिंदू हो या मुस्लिम—जो दूसरे समुदाय को जन्मजात रूप से गद्दार या आबादी के लिहाज़ से ऐसा खतरा मानती हो जिसके कारण हमेशा दुश्मनी बनाए रखी जाए।

वे हिंसा के लिए ज़िम्मेदारी तय करने की मांग करते, चाहे वह किसी भी पक्ष ने शुरू की हो या उसे सही ठहराया हो; वे चुनावी फायदे के लिए इतिहास और पवित्र स्थलों के इस्तेमाल का विरोध करते और एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ में खुद को पीड़ित बताने के बजाय साझा नागरिकता पर ज़ोर देते। साथ ही, वे जायज़ सांस्कृतिक या धार्मिक पहचान के दावे को खत्म करने को स्वीकार नहीं करते; उनकी एकता की सोच नैतिक और व्यावहारिक थी, न कि ऐसी मांग कि हिंदू अपनी सभ्यतागत पहचान छोड़ दें।

कुल मिलाकर नज़रिया

गांधीजी लगभग निश्चित रूप से अपने तरीकों को ही अपनाते: सार्वजनिक उपवास, रचनात्मक कार्य, व्यक्तिगत उदाहरण और लगातार नैतिक आलोचना—न कि पार्टी की राजनीति या सरकारी सत्ता। वे भारत के लोकतंत्र के रूप में बने रहने और नागरिकों की औपचारिक समानता का स्वागत करते, साथ ही गहरी नाकामियों को आध्यात्मिक और नैतिक मानते—जैसे लालच, डर, नफ़रत और सच्चाई व संयम की जगह ताकत या चालाकी का इस्तेमाल।

वे भावुक अर्थों में नरम या काल्पनिक आदर्शवादी नहीं थे; जो लोग अहिंसा या सच्चाई से धोखा करते दिखते, उनके प्रति वे सख्त हो सकते थे। आधुनिक भारत उन्हें ऐसी सख्ती दिखाने के कई मौके देता, ठीक वैसे ही जैसे आम लोगों की मज़बूती और लोकतांत्रिक ढांचे के बने रहने से उन्हें उम्मीद भी मिलती। कोई भी यह दावा करे कि "गांधीजी पूरी तरह मेरे पक्ष का समर्थन करते," तो यह लगभग हमेशा समय के संदर्भ से हटकर की गई गलत कल्पना ही होती है।

क्या डॉ. बी. आर. अम्बेडकर ने सनातन धर्म की उस अवधारणा को स्वीकार किया था जिसका दावा रूढ़िवादी हिन्दू करते हैं?

 

क्या डॉ. बी. आर. अम्बेडकर ने सनातन धर्म की उस अवधारणा को स्वीकार किया था जिसका दावा रूढ़िवादी हिन्दू करते हैं?

एस आर दारापुरी आई.पी.एस.(सेवानिवृत)

प्रस्तावना

आधुनिक भारत के बौद्धिक इतिहास में डॉ. भीमराव रामजी अम्बेडकर के सनातन धर्म  संबंधी विचारों पर जितनी व्यापक बहस हुई है, उतनी कम ही विषयों पर हुई है। समकालीन सार्वजनिक विमर्श में एक ओर यह दावा किया जाता है कि डॉ. अम्बेडकर ने सनातन धर्म को स्वीकार किया था क्योंकि उन्होंने हिन्दू दर्शन के कुछ नैतिक सिद्धांतों की सराहना की थी। दूसरी ओर यह भी कहा जाता है कि उन्होंने सनातन धर्म को पूरी तरह अस्वीकार कर दिया था। किंतु डॉ. अम्बेडकर के मूल लेखन का सावधानीपूर्वक अध्ययन करने पर एक अधिक संतुलित और ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित निष्कर्ष सामने आता है। उन्होंने उस सनातन धर्म को स्वीकार नहीं किया जिसे उनके समय के रूढ़िवादी हिन्दू विद्वान और धर्मशास्त्री प्रतिपादित करते थे। उनकी आलोचना का मुख्य लक्ष्य सनातन धर्म की वह ब्राह्मणवादी व्याख्या थी, जो जाति-व्यवस्था, जन्म-आधारित असमानता, अस्पृश्यता तथा हिन्दू धर्मग्रंथों की निर्विवाद सर्वोच्चता को धार्मिक वैधता प्रदान करती थी। साथ ही, अम्बेडकर ने धर्म को नैतिकता का स्रोत और सामाजिक दमन के साधन के रूप में स्पष्ट रूप से अलग-अलग माना। इसलिए उनका विरोध आध्यात्मिकता या धर्म से नहीं, बल्कि उस धार्मिक व्यवस्था से था जो उनके अनुसार सामाजिक अन्याय को स्थायी बनाती थी।

सनातन धर्म की रूढ़िवादी हिन्दू अवधारणा

सनातन धर्म का शाब्दिक अर्थ है—"शाश्वत धर्म" या "सनातन नियम"। परंपरागत रूप से अनेक हिन्दू इसे उस शाश्वत नैतिक एवं आध्यात्मिक व्यवस्था के रूप में देखते हैं जो सम्पूर्ण सृष्टि और मानव जीवन का संचालन करती है। रूढ़िवादी व्याख्याओं में यह वेदों, स्मृतियों, धर्मशास्त्रों तथा उनसे निर्मित वर्णाश्रम व्यवस्था की धार्मिक वैधता से जुड़ा हुआ माना गया है।

यद्यपि आधुनिक काल में अनेक हिन्दू दार्शनिक और सुधारवादी विचारक सनातन धर्म को सत्य, करुणा, अहिंसा, आत्मसंयम और आत्मबोध जैसे सार्वभौमिक नैतिक मूल्यों का पर्याय मानते हैं, डॉ. अम्बेडकर की आलोचना मुख्यतः उस ऐतिहासिक सामाजिक व्यवस्था की ओर निर्देशित थी जिसमें सनातन धर्म का उपयोग जाति-व्यवस्था और सामाजिक असमानता को उचित ठहराने के लिए किया जाता था।

अम्बेडकर द्वारा सनातन धर्म की आलोचना

डॉ. अम्बेडकर का मत था कि व्यवहार में प्रचलित हिन्दू धर्म जाति-व्यवस्था से अविभाज्य हो चुका था। उनके अनुसार सनातन धर्म के नाम पर पाँच प्रमुख संस्थाओं को धार्मिक वैधता प्रदान की गई थी— वर्ण व्यवस्था, जाति (जाति-प्रथा), वंशानुगत व्यवसाय, अस्पृश्यता, तथा शास्त्रों की सर्वोच्चता।

अम्बेडकर का तर्क था कि इन व्यवस्थाओं को केवल सामाजिक परंपरा नहीं, बल्कि ईश्वर-प्रदत्त और शाश्वत व्यवस्था माना गया। परिणामस्वरूप इनके विरुद्ध सुधार का कोई भी प्रयास धर्म-विरोधी घोषित कर दिया जाता था।

अपनी प्रसिद्ध कृति जाति का विनाश (Annihilation of Caste) में उन्होंने लिखा— "जो धर्म अपने अनुयायियों के बीच भेदभाव करता है, जो एक वर्ग को विशेषाधिकार देता है और दूसरे वर्ग पर निर्योग्यताएँ थोपता है, वह धर्म नहीं है।" इसी ग्रंथ में उन्होंने आगे लिखा— "आप जाति की नींव पर न राष्ट्र का निर्माण कर सकते हैं, न नैतिकता का और न ही लोकतंत्र का।"

ये कथन स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं कि अम्बेडकर ने जाति को धार्मिक आधार प्रदान करने वाली सनातन धर्म की रूढ़िवादी अवधारणा को अस्वीकार कर दिया था।

'सनातन' या 'शाश्वत' होने के दावे का खंडन

डॉ. अम्बेडकर का मानना था कि कोई भी सामाजिक व्यवस्था शाश्वत नहीं हो सकती। समाज निरंतर परिवर्तनशील है और उसकी संस्थाओं का मूल्यांकन उनके नैतिक परिणामों के आधार पर होना चाहिए, न कि उनकी प्राचीनता के आधार पर।

उनके अनुसार यदि जाति और सामाजिक असमानता को "सनातन" घोषित कर दिया जाए, तो सामाजिक सुधार की सारी संभावनाएँ समाप्त हो जाती हैं। इसलिए उन्होंने जन्म-आधारित ऊँच-नीच को किसी भी प्रकार की शाश्वत या दैवी व्यवस्था मानने से स्पष्ट इनकार किया।

धर्मग्रंथों की सर्वोच्चता की आलोचना

डॉ. अम्बेडकर ने मनुस्मृति तथा अन्य धर्मशास्त्रों का गहन अध्ययन किया और निष्कर्ष निकाला कि उनमें विभिन्न जातियों के लिए अलग-अलग अधिकार, कर्तव्य और दंड निर्धारित किए गए हैं। उनके अनुसार इन ग्रंथों ने "क्रमबद्ध असमानता" (Graded Inequality) को संस्थागत रूप दिया।

1927 में महाड़ में मनुस्मृति का सार्वजनिक दहन इसी वैचारिक असहमति का प्रतीक था। उनका उद्देश्य किसी पुस्तक का अपमान करना नहीं था, बल्कि उस सामाजिक दर्शन का प्रतिरोध करना था जो जन्म के आधार पर मनुष्य की गरिमा और अधिकारों का निर्धारण करता था।

धर्म : नैतिकता का आधार, सामाजिक नियंत्रण का नहीं

यद्यपि अम्बेडकर ने रूढ़िवादी हिन्दू धर्म की कठोर आलोचना की, उन्होंने धर्म की अवधारणा को अस्वीकार नहीं किया।

उनका विश्वास था कि धर्म का उद्देश्य मनुष्य के नैतिक विकास में सहायक होना चाहिए, न कि उसे जन्म-आधारित बंधनों में जकड़ना। उन्होंने स्पष्ट लिखा— "धर्म मुख्यतः सिद्धांतों का विषय होना चाहिए, नियमों का नहीं।"

उनकी दृष्टि में सच्चा धर्म वही है जो न्याय, करुणा, विवेक, समानता और मानव गरिमा को बढ़ावा दे। कोई भी धर्म यदि मनुष्यों के बीच भेदभाव को वैध ठहराता है, तो वह अपने वास्तविक उद्देश्य से भटक जाता है।

क्या अम्बेडकर ने सनातन धर्म के प्रत्येक अर्थ को अस्वीकार किया?

इस प्रश्न का उत्तर सावधानीपूर्वक देना आवश्यक है।

डॉ. अम्बेडकर ने "सनातन धर्म" की प्रत्येक दार्शनिक व्याख्या का अलग-अलग विश्लेषण नहीं किया। आज अनेक हिन्दू विद्वान सनातन धर्म को सत्य, अहिंसा, करुणा और आत्मज्ञान पर आधारित सार्वभौमिक नैतिक दर्शन के रूप में प्रस्तुत करते हैं। अम्बेडकर ने इस अमूर्त दार्शनिक अवधारणा पर विस्तृत चर्चा नहीं की।

उनकी आलोचना उस ऐतिहासिक वास्तविकता की थी जिसमें सनातन धर्म का प्रयोग जाति-व्यवस्था, अस्पृश्यता और जन्म-आधारित असमानता को धार्मिक आधार प्रदान करने के लिए किया जाता था।

इसलिए यह कहना कि अम्बेडकर ने रूढ़िवादी हिन्दू अवधारणा के अनुसार सनातन धर्म को स्वीकार किया था, ऐतिहासिक तथ्यों के विपरीत होगा। साथ ही यह कहना भी उचित नहीं होगा कि उन्होंने सनातन धर्म की प्रत्येक संभावित दार्शनिक व्याख्या का पृथक-पृथक खंडन किया था। उनका लक्ष्य मुख्यतः उस सामाजिक-धार्मिक व्यवस्था की आलोचना करना था जो व्यवहार में विद्यमान थी।

बौद्ध धर्म को स्वीकार करना

डॉ. अम्बेडकर अंततः इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि रूढ़िवादी हिन्दू धर्म के भीतर रहते हुए जाति-व्यवस्था का उन्मूलन संभव नहीं है।

1935 के येवला सम्मेलन में उन्होंने ऐतिहासिक घोषणा की— "मैं हिन्दू के रूप में जन्मा हूँ, परन्तु हिन्दू के रूप में मरूँगा नहीं।" 14 अक्टूबर 1956 को नागपुर में उन्होंने लाखों अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म स्वीकार किया।

उनके द्वारा प्रतिपादित नवयान बौद्ध धर्म विवेक, करुणा, समानता, नैतिकता और सामाजिक न्याय पर आधारित था। उनके अनुसार यही धर्म लोकतंत्र और भारतीय संविधान के मूल्यों—स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व—के साथ पूर्णतः संगत है।

समकालीन प्रासंगिकता

डॉ. अम्बेडकर की सनातन धर्म संबंधी आलोचना आज भी भारतीय समाज में धर्म, जाति, सामाजिक न्याय और संवैधानिक नैतिकता पर होने वाली बहसों का एक महत्वपूर्ण आधार बनी हुई है। अम्बेडकरवादी विद्वानों का मत है कि जब तक जातिगत भेदभाव और सामाजिक बहिष्कार पूरी तरह समाप्त नहीं हो जाते, तब तक उनकी आलोचना की प्रासंगिकता बनी रहेगी।

दूसरी ओर अनेक हिन्दू विद्वान यह तर्क देते हैं कि सनातन धर्म का वास्तविक स्वरूप जाति-व्यवस्था नहीं, बल्कि सार्वभौमिक नैतिकता, आध्यात्मिकता और आत्मोन्नति है, तथा जाति-प्रथा उसकी मूल शिक्षा नहीं बल्कि ऐतिहासिक विकृति है। यह मतभेद दर्शाता है कि आधुनिक भारत में सनातन धर्म की अवधारणा अब भी गहन वैचारिक विमर्श का विषय बनी हुई है।

निष्कर्ष

डॉ. भीमराव अम्बेडकर के मूल लेखन का गंभीर अध्ययन यह स्पष्ट करता है कि उन्होंने उस सनातन धर्म को स्वीकार नहीं किया जिसे उनके समय के रूढ़िवादी हिन्दू जाति-व्यवस्था, वर्ण-व्यवस्था, अस्पृश्यता और जन्म-आधारित विशेषाधिकारों की धार्मिक वैधता के रूप में प्रस्तुत करते थे। उन्होंने ऐसी किसी भी धार्मिक व्यवस्था को अस्वीकार किया जो मनुष्य की समान गरिमा और स्वतंत्रता का निषेध करती हो।

साथ ही, उन्होंने धर्म का पूर्ण निषेध नहीं किया। उनका मानना था कि धर्म का आधार नैतिकता, विवेक, समानता, स्वतंत्रता, बंधुत्व और मानव गरिमा होना चाहिए। यही कारण था कि उन्होंने अंततः बौद्ध धर्म को अपनाया, जिसे वे इन आदर्शों की सर्वोत्तम अभिव्यक्ति मानते थे।

अतः डॉ. अम्बेडकर की स्थिति को धर्म-विरोध के रूप में नहीं, बल्कि उस धार्मिक विचारधारा के विरोध के रूप में समझना चाहिए जो सामाजिक असमानता को पवित्र और शाश्वत घोषित करती है। उनका चिंतन आज भी भारतीय लोकतंत्र, सामाजिक न्याय और संवैधानिक नैतिकता की समझ के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बना हुआ है।

 

अगर गांधीजी आज ज़िंदा होते, तो आज के सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांप्रदायिक हालात पर उनकी क्या प्रतिक्रिया होती?

  अगर गांधीजी आज ज़िंदा होते , तो आज के सामाजिक , धार्मिक , आर्थिक , राजनीतिक और सांप्रदायिक हालात पर उनकी क्या प्रतिक्रिया होती ? एस.आर...