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बुधवार, 16 सितंबर 2026

गांधी और अंबेडकर: छुआछूत के ख़िलाफ़ संघर्ष के दो रास्ते

 

गांधी और अंबेडकर: छुआछूत के ख़िलाफ़ संघर्ष के दो रास्ते

पोन चंद्रन 14/09/2026

(मूल अंग्रेजी से हिन्दी अनुवाद : एस आर दारापुरी आई.पी.एस.(सेवानिवृत)

(आगामी पूना पैकट दिवस (24 सितंबर) के अवसर पर) 

महात्मा गांधी और बी.आर. अंबेडकर के बीच बौद्धिक और राजनीतिक संवाद आधुनिक भारतीय राजनीतिक सोच में सबसे अहम बहसों में से एक है। उनके मतभेद सिर्फ़ व्यक्तित्व या राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता का मामला नहीं थे। ये मतभेद जाति, सामाजिक सुधार, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, धर्म और असमान समाज को बदलने के तरीकों के बारे में उनकी बुनियादी तौर पर अलग-अलग समझ से पैदा हुए थे।

दोनों ने छुआछूत का विरोध किया, लेकिन समस्या को देखने का उनका नज़रिया अलग-अलग था। गांधी ने नैतिक बदलाव और सामाजिक सोच में बदलाव पर काफ़ी ज़ोर दिया, जबकि अंबेडकर ने राजनीतिक अधिकारों, संवैधानिक सुरक्षा और जाति की संस्थागत नींव को खत्म करने पर ज़्यादा ज़ोर दिया।

जाति, वर्ण और सामाजिक सुधार का सवाल

गांधी छुआछूत को एक गंभीर नैतिक बुराई मानते थे और इसे खत्म करना चाहते थे। हालाँकि, पारंपरिक वर्ण व्यवस्था पर उनका शुरुआती नज़रिया अंबेडकर से काफ़ी अलग था। गांधी वर्ण को सामाजिक श्रम के एक संभावित कार्यात्मक विभाजन के रूप में देखते थे और मानते थे कि नैतिक और आध्यात्मिक जागृति के ज़रिए इसमें सुधार किया जा सकता है।

अंबेडकर ने जाति के मुद्दे को ज़्यादा बुनियादी स्तर पर देखा। उनके लिए, जाति सिर्फ़ एक बिगड़ी हुई सामाजिक प्रथा नहीं थी जिसे व्यक्तिगत सोच में बदलाव से ठीक किया जा सके। उन्होंने जाति के पूरी तरह उन्मूलन की वकालत की और कहा कि जातिगत असमानता की जड़ें हिंदू धार्मिक और सामाजिक संरचनाओं में गहराई से जमी हुई हैं। इसलिए, सुधार को सिर्फ़ उन लोगों की अंतरात्मा को झकझोरने तक सीमित नहीं रखा जा सकता था जिन्हें मौजूदा व्यवस्था से फ़ायदा होता था।

इसी अंतर ने दोनों नेताओं के बीच बाद के लगभग हर मतभेद को आकार दिया।

गांधी का तरीका मुख्य रूप से अंतरात्मा की आवाज़, अहिंसा, आत्म-शुद्धि और ऊंची जातियों के लोगों से छुआछूत के अन्याय को पहचानने और अपना व्यवहार बदलने की अपील करने पर आधारित था। अंबेडकर का भरोसा संस्थागत तंत्रों पर ज़्यादा था: जैसे कानूनी अधिकार, संवैधानिक गारंटी, कानून बनाना और दबे-कुचले समुदायों का राजनीतिक सशक्तिकरण।

यह अंतर महत्वपूर्ण था। एक तरीका नैतिक चेतना में बदलाव के ज़रिए समाज को बदलना चाहता था; दूसरा तरीका दबे-कुचले लोगों को उनके अधिकार हासिल करने के साधन देना चाहता था, चाहे समाज पर हावी लोगों में वैसा नैतिक बदलाव आए या न आए।

आधुनिकता और गाँव

उनके मतभेद आधुनिक भारत के बारे में उनकी समझ तक भी फैले हुए थे।

गांधी औद्योगीकरण और पश्चिमी आधुनिकता के पहलुओं के घोर आलोचक थे। 'ग्राम स्वराज' का उनका विज़न विकेंद्रीकृत, आत्मनिर्भर ग्रामीण समुदायों पर केंद्रित था। पारंपरिक गाँव के बारे में अंबेडकर की राय काफी आलोचनात्मक थी। वे गाँव के समाज को वहाँ की गहरी पैठी स्थानीय ऊँच-नीच और सामाजिक असमानता को बनाए रखने वाली व्यवस्था से जोड़कर देखते थे। इसलिए, उनकी राजनीतिक सोच आधुनिक संवैधानिक व्यवस्था, औद्योगिक विकास और शहरीकरण से ज़्यादा जुड़ी हुई थी।

यह फ़र्क इस बात से साफ़ झलकता था कि वे आज़ादी कहाँ हासिल हो सकती है, इस बारे में अलग-अलग राय रखते थे। गांधीजी समुदाय के जीवन को ज़मीनी स्तर से फिर से बनाने पर बहुत ज़ोर देते थे। अंबेडकर को चिंता थी कि पारंपरिक सामुदायिक ढाँचे ही लोगों को अलग-थलग करने और उन पर हावी होने का ज़रिया बन सकते हैं।

राजनीतिक प्रतिनिधित्व और पूना पैक्ट

गांधीजी और अंबेडकर के बीच सबसे तीखा राजनीतिक टकराव 1932 में 'दबे-कुचले वर्गों' (Depressed Classes) के लिए अलग चुनाव क्षेत्रों (separate electorates) के मुद्दे पर हुआ।

ब्रिटिश 'कम्युनल अवार्ड' में दलितों के लिए अलग चुनाव क्षेत्रों का प्रस्ताव था। अंबेडकर का मानना ​​था कि दबे-कुचले लोगों की राजनीतिक सक्रियता के लिए सवर्णों के नियंत्रण से आज़ाद राजनीतिक प्रतिनिधित्व ज़रूरी है। गांधीजी ने इस प्रस्ताव का विरोध किया क्योंकि उन्हें डर था कि अलग चुनाव क्षेत्रों से हिंदू समाज हमेशा के लिए बँट जाएगा।

यरवदा जेल में बंद रहने के दौरान, गांधीजी ने इस प्रावधान के विरोध में आमरण अनशन शुरू कर दिया। भारी जन-दबाव और गांधीजी की जान को लेकर चिंता के बीच अंबेडकर एक मुश्किल राजनीतिक और नैतिक स्थिति में फँस गए। इस टकराव का नतीजा आखिरकार 'पूना पैक्ट'  (24 सितंबर,1932) के रूप में निकला।

इस समझौते के तहत, अलग चुनाव क्षेत्रों के विचार को छोड़ दिया गया और इसके बजाय संयुक्त चुनाव क्षेत्रों में दबे-कुचले वर्गों के लिए ज़्यादा आरक्षित सीटें तय की गईं। इस समझौते से तात्कालिक राजनीतिक संकट तो टल गया, लेकिन बाद में अंबेडकर ने इसे एक ऐसा समझौता माना जिसने दलितों के स्वतंत्र राजनीतिक प्रतिनिधित्व की संभावना को कमज़ोर कर दिया।

यह घटना दोनों नेताओं के बीच मतभेद की गहराई को दिखाती है। गांधीजी एक एकजुट राजनीतिक समुदाय को बनाए रखने के पक्ष में थे, जबकि अंबेडकर की प्राथमिकता यह सुनिश्चित करना था कि ऐतिहासिक रूप से दबे-कुचले लोगों के पास ऐसी राजनीतिक शक्ति हो जिसे सामाजिक रूप से प्रभावशाली समूह आसानी से नियंत्रित न कर सकें।

संरक्षक की भूमिका और राजनीतिक सक्रियता

अस्पृश्यता से निपटने के तरीकों और भाषा में भी उनके बीच अंतर साफ़ दिखता था।

गांधीजी ने दलितों के लिए "हरिजन" शब्द का इस्तेमाल किया और ऊंची जातियों की सोच बदलने और अस्पृश्यता का विरोध करने के अपने अभियान के तहत 'हरिजन सेवक संघ' की स्थापना की।

अंबेडकर ने इस नज़रिए को खारिज कर दिया। उन्हें उन वर्णनों पर आपत्ति थी जो, उनकी नज़र में, दलितों को दूसरों की सहानुभूति या दया पर निर्भर बनाते थे। इसके बजाय, उन्होंने आत्मनिर्भरता, शिक्षा, संगठन और राजनीतिक दावेदारी पर ज़ोर दिया।

यह अंतर अंबेडकर के नज़रिए को समझने के लिए बहुत ज़रूरी है। मुद्दा सिर्फ़ यह नहीं था कि प्रभावशाली जातियों के लोग ज़्यादा दयालु बनें या नहीं। मुद्दा यह था कि क्या दलितों के पास अपना भविष्य तय करने के लिए ज़रूरी सामाजिक, राजनीतिक और कानूनी शक्ति होगी या नहीं।

धर्म और समानता की खोज

धर्म भी मतभेद का एक और अहम पहलू था।

गांधीजी का नैतिक नज़रिया हिंदू धर्म की समावेशी व्याख्या पर आधारित था और वे धार्मिक सह-अस्तित्व और अलग-अलग धर्मों के सम्मान के प्रति प्रतिबद्ध थे।

अंबेडकर के अनुभव और विश्लेषण ने उन्हें एक अलग नतीजे पर पहुँचाया। उनका मानना ​​था कि जाति व्यवस्था पर आधारित हिंदू धर्म दलितों को समान सम्मान और दर्जा नहीं दे सकता। इसलिए, हिंदू धर्म छोड़ने का उनका फ़ैसला समानता पर आधारित सामाजिक और नैतिक व्यवस्था की उनकी खोज से गहराई से जुड़ा था।

1956 में, अंबेडकर ने बौद्ध धर्म अपनाया और बड़े पैमाने पर लोगों को 'नवयान बौद्ध धर्म' में शामिल होने के लिए प्रेरित किया। बौद्ध धर्म के बारे में उनकी समझ आज़ादी, समानता और तर्कसंगत नैतिक सिद्धांतों पर ज़ोर देती थी।

धर्म को लेकर गांधीजी और अंबेडकर के बीच का अंतर सामाजिक बदलाव के प्रति उनके व्यापक नज़रिए को भी दिखाता है। गांधीजी नैतिक और आध्यात्मिक बदलाव के ज़रिए हिंदू समाज को बदलना चाहते थे। अंबेडकर का मानना ​​था कि आज़ादी के लिए उस धार्मिक और सामाजिक ढांचे से बाहर निकलना ज़रूरी है जो जाति-आधारित ऊंच-नीच को बनाए रखता है।

राष्ट्रीय आज़ादी और सामाजिक आज़ादी

गांधीजी और अंबेडकर के बीच के मतभेदों के बावजूद, इस बात को नज़रअंदाज़ नहीं किया जाना चाहिए कि दोनों ने अपने-अपने तरीके से आज़ादी के सवाल पर काम किया।

राष्ट्रीय आंदोलन में गांधीजी का योगदान मुख्य रूप से लोगों को बड़े पैमाने पर एकजुट करने और अहिंसा की नैतिक भाषा पर आधारित था। छुआछूत के ख़िलाफ़ उनके अभियान ने जातिगत भेदभाव के मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक चर्चा का मुख्य विषय बना दिया।

अंबेडकर ने आज़ादी के संस्थागत आधार पर ध्यान केंद्रित किया। उनके काम ने ऐतिहासिक भेदभाव का शिकार रहे समुदायों के लिए संवैधानिक सुरक्षा, मौलिक अधिकार और बचाव के उपाय स्थापित करने में मदद की।

इसलिए, उनके नज़रिए लोकतांत्रिक बदलाव के दो पहलुओं को उजागर करते हैं। औपनिवेशिक शासन से राजनीतिक आज़ादी मिलने का मतलब यह नहीं है कि समाज के भीतर सामाजिक वर्चस्व अपने-आप खत्म हो जाएगा। साथ ही, अगर कानूनी प्रावधानों को रोज़मर्रा की ज़िंदगी में सार्थक बनाना है, तो इसके लिए सामाजिक आंदोलनों और लोगों की सोच में बदलाव की ज़रूरत होती है।

नतीजतन, गांधी और अंबेडकर के बीच की बहस उन खास विवादों से कहीं ज़्यादा अहम बनी हुई है जिनमें वे आमने-सामने आए थे। उनके मतभेद नैतिक सुधार और संरचनात्मक बदलाव के बीच के रिश्ते पर एक निरंतर सवाल उठाते हैं।

सामाजिक समानता के लिए सोच में बदलाव की ज़रूरत होती है, लेकिन सिर्फ़ सोच से अधिकारों की गारंटी नहीं मिल सकती। कानून और संवैधानिक सुरक्षा भेदभाव को रोक सकते हैं, लेकिन संस्थाएँ भी ऐसे समाज पर निर्भर करती हैं जो उन लोगों की गरिमा को पहचानने को तैयार हो जिनकी रक्षा के लिए वे संस्थाएँ बनाई गई हैं।

इसलिए, गांधी और अंबेडकर के बीच के ऐतिहासिक संवाद को सामाजिक बदलाव के दो अलग-अलग लेकिन एक-दूसरे से जुड़े नज़रियों के तौर पर समझा जा सकता है। गांधी ने नैतिक उत्थान और सामाजिक चेतना में बदलाव पर ज़्यादा भरोसा किया। अंबेडकर ने अधिकारों, प्रतिनिधित्व, संस्थागत सुरक्षा और असमानता को बढ़ावा देने वाली संरचनाओं को खत्म करने पर ज़ोर दिया।

भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में दोनों ही नज़रियों के तत्व मौजूद हैं। छुआछूत और जातिगत भेदभाव के ख़िलाफ़ संघर्ष को सिर्फ़ व्यक्तिगत नैतिकता या सिर्फ़ संवैधानिक प्रावधानों की भाषा में नहीं समझा जा सकता। इसमें सामाजिक सोच और राजनीतिक संस्थाओं, व्यक्तिगत बदलाव और सामूहिक शक्ति, तथा राष्ट्रीय आज़ादी की चाहत और सामाजिक समानता की माँग के बीच का रिश्ता शामिल है।

पोन चंद्रन कोयंबटूर में 'पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज़' (PUCL) से जुड़े हैं और नागरिक स्वतंत्रता, सामाजिक न्याय, लोकतंत्र और मानवाधिकारों के मुद्दों पर लिखते हैं।

सौजन्य: countercurrents.org

अंग्रेजी लेख का लिंक: https://countercurrents.org/2026/09/gandhi-and-ambedkar-two-paths-to-the-struggle-against-untouchability/

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