शनिवार, 16 अगस्त 2014

दलित-भाजपा गठजोड़ से उपजे खतरे



दलित-भाजपा गठजोड़ से उपजे खतरे
एस. आर. दारापुरी
हाल का लोकसभा चुनाव कई मायनों में पिछले चुनावों से भिन्न रहा है. इस में जहाँ एक ओर बहुसंख्यक हिन्दुओं का ध्रुवीकरण हुआ है वहीँ पहली बार दलितों के एक बड़े हिस्से ने अपने वर्ग शत्रु भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को बड़ी संख्या में वोट दिया है. दलितों के भाजपा के नजदीक जाने से एक नया सामाजिक समीकरण बना है जिसकी प्रकृति साम्प्रदायिक है. अभी तक तो अधिकतर पिछड़ी जातियां ही जो कि अपने आप को कट्टर हिन्दू मानती हैं भाजपा के हिंदुत्व के पैदल सैनिक के रूप में काम करते रहे हैं. परन्तु अब तो उस में दलितों की एक फ़ौज भी शामिल हो गयी है. यह भी सर्वविदित है कि अधिकतर दलित जातियां भाजपा से राजनैतिक तौर पर एक दूरी बनाए रखती रही हैं.
वास्तव में दलित जातियों में काफी समय से दो विपरीत धाराएँ चल रही हैं- एक अहिन्दुकरण की और दूसरी हिन्दुकरण की. जो दलित डॉ. आंबेडकर की विचारधारा से प्रभावित हैं उनका काफी हद तक अहिन्दुकरण हुआ है. उन में से बड़ी संख्या में दलितों ने बौद्ध धम्म को अपनाया है जैसा कि 2001 की जनगणना से परिलक्षित हुआ है. इसके आंकड़ों के अनुसार 2001 में भारत में बौद्धों की जनसख्या लगभग 80 लाख थी जो कि कुल जनसँख्या का 0.8 प्रतिशत थी जबकि 1951 में यह जनसँख्या केवल 1.42 लाख अर्थात कुल जनसँख्या का केवल 0.04 प्रतिशत थी. 2011 की जनगणना में इस जनसँख्या में बहुत अधिक वृद्धि होने की सम्भावना है क्योंकि इस दशक में दलितों ने बहुत बड़ी संख्या में बौद्ध धम्म में प्रवेश किया है. काफी दलित तो इसे बौद्ध धम्म में वापसी के रूप में भी मानते हैं क्योंकि डा. आंबेडकर की स्थापना के अनुसार दलित (अछूत) पूर्व में बौद्ध ही थे और बाद में उन्हें बाध्य करके हिन्दू बनाया गया. इस परिवर्तन के सम्बन्ध में एक ख़ास बात यह रही है कि जहाँ दलितों की बड़ी उपजातियां जैसे महाराष्ट्र में महार, उत्तर प्रदेश में चमार और  आन्ध्र प्रदेश में माला आदि डॉ. आंबेडकर से प्रभावित हो कर बौद्ध धम्म की ओर आकर्षित हुयी हैं वहीँ दलितों की छोटी उपजातियां जैसे महाराष्ट्र में चम्भार, उत्तर प्रदेश में पासी,धोबी, खटीक और बाल्मीकि तथा आन्ध्र प्रदेश में मादिगा आदि हिन्दू धर्म की ओर गयी हैं. इस का एक कारण तो राजनैतिक प्रतिद्वंदिता रही है और दूसरा कारण इन जातियों में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आर.एस.एस) की घुसपैठ रही है जिस ने इन का निरंतर हिन्दूकरण किया है. जनसंघ और अब तक भाजपा इन उपजातियों को पकड़ कर इन्हें आरक्षित सीटों पर जिता कर अपने खेमे में बांधे रही है. कांग्रेस भी दलितों के उपजाति विभाजन का राजनीतिक इस्तेमाल करती रही है. पर इस बार भाजपा ने न केवल इन उपजातियों का ही ध्रुवीकरण किया है बल्कि पूर्व में भाजपा से दूर रहने वाली दलित उपजातियों के एक बड़े हिस्से को भी अपनी ओर आकर्षित किया है. दलितों के भाजपा की तरफ इस ध्रुवीकरण के बहुत दूरगामी परिणाम होने वाले हैं.
इस सन्दर्भ में दलितों के भाजपा की तरफ इस झुकाव के कारणों को तलाशना बहुत ज़रूरी है. इसे तलाशने के लिए वर्तमान  में तथाकथित दलित पार्टियों के कार्यकलाप का विश्लेषण करना बहुत ज़रूरी है. सब से पहले रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इंडिया (आरपीआई) को देखा जाये तो यह बहुत से गुटों में बटी हुयी है. इसके प्रमुख गुट आरपीआई अध्यक्ष गवई, आरपीआई (ए) अध्यक्ष रामदास अठावले, भारिप अध्यक्ष प्रकाश आंबेडकर और जोगिन्दर कवाडे गुट आदि हैं. ये सभी गुट अपने आप को असली आरपीआई के वारिस बताते हैं. ये सभी नेता अपने अपने स्वार्थ के लिए किसी भी पार्टी के साथ गठजोड़ करते रहते हैं. इस में विचारधारा की कोई अड़चन नहीं है. इस चुनाव में गवई व कवाडे गुट कांग्रेस, अठावले गुट शिवसेना, और प्रकाश आंबेडकर गुट छोटी पार्टियों के गठजोड़ से चुनाव लड़ा था परन्तु किसी को कोई भी सीट नहीं मिली. रामदास अठावले किसी तरह से शिवसेना भाजपा की सहायता से राज्य सभा के सदस्य बन सके हैं. इन नेतायों की सिद्धान्तहीन और स्वार्थी सौदेबाजी से तंग आकर दलितों का काफी हिस्सा भाजपा और शिवसेना की तरफ चला गया है.
उत्तर भारत में दलितों की प्रमुख पार्टी बहुजन समाज पार्टी (बसपा) जो कि दलितों की एक मजबूत पार्टी के रूप में उभरी थी, से भी दलितों का मोहभंग हुआ है जिस के कारण दलितों की न केवल हिंदूवादी उपजातियां जैसे पासी, धोबी, खटीक और बाल्मीकि बल्कि बसपा की सब से पक्की वोट बैंक कहे जाने वाली जाति चमार/जाटव आदि के बड़े हिस्से ने भी भाजपा को वोट दिया है. इस का मुख्य कारण यह है कि मायावती के चार बार के शासन से दलितों को कोई भी भौतिक लाभ नहीं हुआ. इस का नतीजा यह है कि उत्तर प्रदेश के दलित विकास के मापदंड जैसे महिला पुरुष अनुपात, शिक्षा दर और नियमित रोज़गार दर आदि पर बिहार, ओड़िसा और मध्य प्रदेश के दलितों को छोड़ कर शेष सभी राज्यों के दलितों से पिछड़े हुए हैं. इस के अतिरिक्त मायावती के  व्यक्तिगत भ्रष्टाचार, सिद्धान्तहीन सौदेबाज़ी और गुंडों, माफियाओं और पूंजीपतियों के पार्टी में प्रवेश से दलित बहुत नाराज़ थे. मायावती ने कुर्सी हथियाने के लिए दलितों की घोर विरोधी पार्टी भाजपा से तीन बार समझौता किया जिस के परिणाम स्वरूप दलितों के लिए दोस्त और दुश्मन में पहचान करना मुश्किल हो गया. दरअसल मायावती ने दलित राजनीति को उन्हीं गुंडों, माफियाओं और पूंजीपतियों के हाथों बेच दिया जिन से दलितों की लडाई थी. दलितों ने मायावती से अपनी नाराज़गी पहले 2012 के विधान सभा चुनाव में दिखाई थी और फिर 2014 के लोकसभा चुनाव में यह अलगाव और भी प्रखर हो गया जिस कारण इस चुनाव में बसपा का पूरा सफाया हो गया. इस में कोई शक नहीं कि इस चुनाव में भाजपा न केवल हिंदूवादी दलित उपजातियों बल्कि बसपा को समर्पित उपजाति चमार/जाटव को भी अपनी ओर आकर्षित करने में सफल हुयी है. उत्तर प्रदेश में निकट भविष्य में होने वाले उपचुनावों में बसपा द्वारा किसी भी सीट पर चुनाव न लड़ने के फैसले का लाभ भी भाजपा को ही जाएगा क्योंकि इस में दलित बाध्य होकर भाजपा को ही वोट देंगे.
दलितों की कुछ अन्य पार्टियां जैसे राम विलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी और राम राज की इंडियन जस्टिस पार्टी की दलितों के अन्दर कोई बहुत पकड़ नहीं है. राम विलास पासवान को तो गठजोड़ का चाणक्य कहा जाता है. वह तो किसी भी पार्टी से सौदा कर लेते हैं. इस बार भाजपा के साथ उन का सौदा अच्छा पट गया है. राम राज भी सांसद बनने के लिए बहुत हाथ पैर मारते रहे हैं. इस बार भाजपा के सहयोग से उनकी मनोकामना पूरी हो पाई है. इस गठजोड़ से इन नेताओं को तो सत्तासुख मिल गया है परन्तु आम दलित को कोई लाभ नहीं हुआ है.
उपरोक्त संक्षिप्त विश्लेषण से सपष्ट है कि पिछले लोक सभा चुनाव में दलितों का काफी बड़ा हिस्सा दलित पार्टियों से मोहभंग हो जाने के कारण दलितों की घोर विरोधी हिन्दुत्ववादी पार्टी भाजपा की तरफ चला गया है. यह दलित राजनीति की सब से बड़ी विफलता है और दलितों के लिए आत्मघाती है. इस से हिन्दुत्ववादी ताकतों का बहुसंख्यकवाद और साम्प्रदायिकता ही मज़बूत होगी. भाजपा दलितों का इस्तेमाल पिछड़ी जातियों की तरह हिंदुत्व के पैदल सैनिकों के रूप में करेगी इस की शुरुआत उत्तर प्रदेश में हो चुकी है. इंडियन एक्सप्रेस द्वारा किये गए सर्वेक्षण के अनुसार उत्तर प्रदेश में लोक सभा चुनाव के बाद अब तक हुयी 605 साम्प्रदायिक घटनाओं में से 67 दलित और मुसलमान टकराव की थीं. इन घटनाओं में यह बात उभर कर आई है कि जहाँ कहीं भी दलितों और मुसलामानों के बीच कोई मामला होता है वहां पर आर.एस.एस के लोग तुरंत दखल देते हैं और उस मामले को साम्प्रदायिक रंग दे देते हैं. मुरादाबाद के कांठ में जाटवों के रविदास मंदिर में लाउड स्पीकर वाला मामला इस का ठोस उदाहरण है. इसी तरह अन्य मामले जैसे दलित लड़की और मुसलमान लड़का या मुसलमान लड़की और दलित लड़का में भी संप्रदायीकरण करके दलित और मुसलामानों को लड़ाया जा रहा है. वैसे भी यह विदित ही है कि मुरादाबाद और मेरठ में बाल्मीकि तथा कानपुर में खटीक ही हिन्दू मुस्लिम दंगे में अगुआ होते हैं. आर.एस.एस. बहुत होशियारी से दलितों की इन उपजातियों का इस्तेमाल मुसलामानों के खिलाफ करती आई है. परन्तु अब तो वह इस को बहुत व्यापक रूप देने जा रही है.
दलित राजनैतिक पार्टियों के नेतायों की सिद्धान्तहीन, स्वार्थी और अवसरवादी राजनीति से उपजे मोहभंग से दलितों के एक बड़े हिस्से का भाजपा की तरफ चले जाना एक बहुत खतरनाक परिघटना है जो कि न केवल लोकतंत्र बल्कि दलितों के लिए भी बहुत हानिकारक है. इस से न केवल बहुसंख्यकवाद और साम्प्रदायिकता मज़बूत होगी बल्कि दलितों और अल्पसंख्यकों को आपस में लड़ा कर उन पर शासन करने की साजिश भी सफल हो जाएगी. इस से हिंदुत्व की फासीवादी ताकतें मज़बूत होंगी और लोकतंत्र और धर्म निरपेक्षता के लिए बहुत बड़ा खतरा पैदा हो जायेगा.
अतः उस दलित राजनीति और उन स्वार्थी नेताओं के कार्यकलापों की निर्मम समीक्षा की जानी चाहिए जिन के कारण दलित अपनी घोर विरोधी पार्टी से समझौता करने के लिए मजबूर हुए हैं. दरअसल असली ज़रूरत ऐसी पार्टियों और नेताओं को नकारने की है और एक नयी अम्बेडकरवादी, प्रगतिशील और जनवादी राजनीति की आवश्यकता है. कुछ लोग हिन्दुत्ववादी ताकतों का सामना करने के लिए मायावती-मुलायम तथा लालू-नितीश के गठजोड़ की बात कर रहे हैं. परन्तु इन जातिवादी अवसरवादी गठजोड़ों से कुछ होने वाला नहीं है क्योंकि ये सब इसी व्यवस्था की उपज हैं और इस के पोषक हैं. यह भी सर्विदित है कि जाति की राजनीति साम्प्रदायिकता को ही मज़बूत करती है और इस में जनता के मुद्दे गौण हो जाते हैं. व्यक्ति पूजा और अवसरवादिता संघर्ष और जन आन्दोलन का स्थान ले लेते हैं इसी लिए डॉ. आंबेडकर ने शिक्षित करने और संघर्ष के माध्यम से संघठित करने पर बल दिया था.
इस दिशा में हम लोगों ने एक नया विकल्प देने के लिए ठोस कदम उठाया है. पिछले चार साल के लम्बे देशव्यापी चिंतन मनन के बाद हम लोगों ने आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट (आइपीएफ) नाम के नए राजनैतिक दल का गठन किया है जो सही अर्थों में एक प्रगतिशील और धर्मनिरपेक्ष पार्टी है. यह पार्टी समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के आधार पर देश और सभी देशवासियों का उत्थान करना चाहती है. यह पार्टी डॉ. आंबेडकर के “शिक्षित करो, संघर्ष करो और संगठित करो” के सन्देश का अनुसरण करती है. यह पार्टी पूर्णतया लोकतान्त्रिक है और इस के संगठन में 75 प्रतिशत पद दलितों, महिलायों और अल्प संख्यकों के लिए आरक्षित किये गए हैं. यह पार्टी सामाजिक न्याय के मुद्दे पर डॉ. आंबेडकर की विचारधारा और आदर्शों का इमानदारी से अनुसरण करती है. अतः सभी अम्बेडकरवादी, जनवादी और प्रगतिशील साथियों से अनुरोध है कि वे इस राजनीतिक विकल्प पर गंभीरता से विचार करें और यदि इस के सिद्धांतों और एजंडा से सहमत हों तो इस से ज़रूर जुड़ें.       
         

बुधवार, 6 अगस्त 2014

आस्था की तिजारत :: बर्बरता के विरुद्ध

आस्था की तिजारत :: बर्बरता के विरुद्ध

मोदी कितने धर्म निरपेक्ष ?

मोदी कितने धर्म निरपेक्ष ?
एस. आर. दारापुरी
हमारे देश के प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल की नेपाल यात्रा के दौरान काठमांडू के पशुपतिनाथ मंदिर में न केवल घंटों पूजा ही की बल्कि उक्त हिन्दू मंदिर को जनता के पैसे से 25 करोड़ का दान भी दिया. प्रशन यह है क्या उन्होंने ऐसा एक धर्म निरपेक्ष देश या एक हिन्दू देश के प्रधान मंत्री के रूप में किया है? क्या उन्हें अपने धर्म से जुड़े मंदिर को जनता के पैसे से उक्त धनराशी दान में देने का अधिकार है? क्या यह राजनीतिक नैतिकता और संवैधानिक मर्यादा के विपरीत नहीं है? यदि हरेक मंत्री विदेश में जा कर या अपने देश में ही अपनी अपनी धर्म परायणता दिखने लगे तो फिर क्या होगा?
किसी देश को विकास के लिए सहायता देना एक अलग बात है परन्तु अपने धर्म के मंदिर को जनता का पैसा दान देना बिलकुल गलत है.वैसे तो यह किसी से छुपा नहीं है कि हमारे राजनेताओं और सरकारों का आचरण कितना धर्म निरपेक्ष है.
इस मौके पर नेहरु जी का धर्म निरपेक्ष आचरण उल्लेखनीय है. उन्होंने सरदार पटेल के इस प्रस्ताव को रद्द कर दिया था जिस में सोमनाथ मंदिर का सरकारी पैसे से जीर्णोधार प्रस्तावित किया गया था. इसी प्रकार नेहरु ने तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद जो बहुत हिन्दू धर्म परायण थे और जिन्होंने राष्ट्रपति बनने के बाद काशी जा कर 101 ब्राह्मणों के चरण धोये थे, को सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन समारोह में भाग नहीं लेने दिया था.
डॉ. राजेन्द्र प्रसाद द्वारा ब्राह्मणों के चरण धोने के बारे में लोहिया ने अपनी पुस्तक "भारत में जाति" में लिखा है, " इस दुनिया में भारतीय सब से अधिक अभिशप्त हैं क्योंकि उन के देश का प्रथम नागरिक ( राष्ट्रपति) 101 ब्राह्मणों के चरण धोता है." उन्होंने इसे पूरे राष्ट्र का अपमान भी कहा था.

शुक्रवार, 1 अगस्त 2014

गेस्ट हाउस काण्ड का सच्च और मायावती की राजनीति



गेस्ट हाउस काण्ड का सच्च और मायावती की राजनीति
-एस. आर. दारापुरी
दरअसल दो जून, 1995 की घटना वैसी नहीं थी जैसा कि प्रचारित किया गया है. इस की असली कहानी यह थी कि कांशी राम मुलायम सिंह से पैसे की अपेक्षा कर रहे थे क्योंकि उन को मालूम था कि हरेक मुख्य मंत्री को काफी अच्छी आमदनी होती है. यह कहा जाता है कि मुख्य मंत्री को कुछ विभागों जैसे पी.डव्लयू.डी. सिंचाई, ऊर्जा और कुछ अन्य विभागों से बंधी बंधाई रकम मिलती है. 1993 में सपा और बसपा की मिलीजुली सरकार थी. अतः कांशी राम मुलायम सिंह से इस में हिस्सेदारी चाहते थे. कांशी राम मुलायम सिंह से सीधे पैसे न मांग कर बाहर उस की आलोचना करते थे. जब मुलायम सिंह उन्हें कुछ दे देते थे तो वह यह कह कर दिल्ली चले जाते थे कि अब मुलायम सिंह समझ गए हैं और वह ठीक काम करेंगें. यह सिलसिला कई महीनों तक चलता रहा परन्तु कांशी राम के ब्लैकमेल करने के तौर तरीके में कोई अंतर नहीं आया. वैसे अकलमंदी की बात तो यह थी कि गठबंधन की सरकार में उन्हें मुलायम सिंह से अन्दर बैठ कर हिस्सा पत्ती तै कर लेनी चाहिए थी परन्तु तजुर्बे की कमी की वजह से उन्होंने ऐसा नहीं किया. मुलायम सिंह जो कि राजनीति के पुराने खिलाड़ी थे ने सोचा कि क्यों न कांशी राम का "खाने और गुर्राने" का खेल ही खत्म कर दिया जाये. उस ने बसपा के विधायकों को तोड़ना और खरीदना शुरू कर दिया और बसपा के 69 विधायकों में से लगभग 40 विधायकों  को तोड़ लिया.
29 मई, 1995 को कांशी राम लखनऊ आये तो उन्होंने अपनी पार्टी के विधायकों की मीरा बाई मार्ग स्थित अतिथि गृह में मीटिंग बुलायी पर उस में बड़ी संख्या में विधायक हाज़िर नहीं हुए. जांच पड़ताल करने पर कांशी राम को पता चला कि मुलायम सिंह ने उन की पार्टी के लगभग 40 विधायकों को तोड़ लिया है और वह सरकार गिरा कर नयी सरकार बना लेंगे.
इस पर कांशी राम तुरंत दिल्ली वापस गए और उन्होंने भाजपा के नेताओं से बातचीत की कि अगर वह बसपा को समर्थन देने को तैयार हों तो वह मुलायम सिंह की सरकार गिरा देंगे और मायावती को मुख्य मंत्री बनाया जायेगा. उस समय भाजपा मुलायम सिंह से बहुत त्रस्त थी और वह किसी भी तरह से दलित-मुस्लिम-पिछड़ा गठबंधन को तोड़ना चाहती थी. यह ज्ञातव्य है कि 1993 में जिस शाम गवर्नर हाउस में सपा-बसपा सरकार का शपथ ग्रहण हुआ था उस रात वहां पर “मिले मुलायम कांशी राम, हवा में उड़ गया जय श्रीराम” के नारे लगे थे और राजनीती में दलितों, पिछड़ों और मुसलमानों के गठबंधन की नयी शुरआत हुयी थी. इस से इन वर्गों में एक नए उत्साह का सृजन हुआ था और सवर्ण जातियों के लिए एक बड़ी चुनौती पैदा हुयी थी. पूरे देश में इस गठबंधन की ओर बड़ी आशा से देखा जा रहा था. परन्तु पैसे के झगडे ने इस समीकरण को तहस नहस कर दिया. भाजपा ने कांशी राम का प्रस्ताव सहर्ष स्वीकार कर लिया.
भाजपा से समर्थन मिल जाने पर पहली जून को मायावती लखनऊ पहुंची और दो जून को उस ने बसपा के विधायकों की मीराबाई मार्ग स्थित अतिथि गृह के कामन हाल में मीटिंग बुलाई और सभी विधायकों को अपने अपने इस्तीफे पर हस्ताक्षर करके देने को कहा. इसी बीच मुलायम सिंह के खेमे में यह खबर पहुँच गयी कि बसपा समर्थन वापस लेकर सरकार गिराने जा रही है और अहमदाबाद जहाँ उस समय भाजपा की सरकार थी, से एक हवाई जहाज़ लखनऊ आ रहा है जो बसपा के विधायकों को अहमदाबाद ले जायेगा. इस पर मुलायम सिंह के समर्थकों ने मुलायम सिंह को समझाया कि चिंता करने की कोई बात नहीं क्योंकि हम बसपा के विधायकों जिन के साथ पहले ही सौदा पट चुका था को गेस्ट हाउस से उठा ले आयेंगे. इस पर वे गाड़ियाँ ले कर मीराबाई मार्ग गेस्ट हाउस पहुंचे और कामन हाल में से उन विधायकों को उठा कर गाड़ियों में बैठाने लगे. उस समय मायावती गेस्ट हाउस के कमरा नंबर एक में कुछ विधायकों के साथ बैठी थी और बाहर हल्ला गुल्ला सुनकर उस ने अपने कमरे का दरवाज़ा बंद कर लिया. उस समय वहां पर आई.टी.बी.पी. की सुरक्षा गार्द लगी हुयी थी. बाद में जब मैं ने उस समय वहां पर तैनात पुलिस अधिकारियों  से घटना के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि वहां पर एकत्र हुयी भीड़ ने मायावती के बारे में कुछ अपशब्द तो ज़रूर कहे थे परन्तु उन पर किसी प्रकार का कोई हमला नहीं किया गया था जैसा कि मायावती द्वारा प्रचारित किया गया. उन्होंने मुझे बताया था कि वहां पर तैनात गार्ड ने किसी को भी मायावती के कमरे तक नहीं जाने दिया था.
उसी समय पूर्व योजना के अंतर्गत भाजपा ने गेस्ट हाउस की घटना को लेकर राज्यपाल के कार्यालय पर धरना दे दिया जिस के फलस्वरूप मुलायम सिंह की सरकार बर्खास्त कर दी गयी और भाजपा  के समर्थन से मायावती मुख्य मंत्री बन गयी. इन तथ्यों से स्पष्ट है कि मायावती पर गेस्ट हाउस पर उस पर जानलेवा हमला किये जाने की बात बिलकुल गलत है और यह केवल मामले को तूल देने के लिए कही गयी थी.  
इस घटना से लाभ उठा कर मायावती मुख्य मंत्री तो बन गयी परन्तु देश की राजनीती में पहली बार दलितों, पिछड़ों और मुसलमानों का उभरा गठबंधन हमेशा हमेशा के लिए टूट गया. मायावती ने इस घटना को खूब प्रचारित किया और दलितों और पिछड़ों के बीच एक ऐसी खाई पैदा कर दी जिसे पाटना बहुत मुश्किल हो रहा है. भाजपा ने इस मौके का पूरा फायदा उठाया और मायावती की कुर्सी और पैसे की भूख के कारण तीन बार गठबंधन कर के उत्तर प्रदेश में अपने को पुनर जीवित कर लिया. यदि देखा जाये तो उत्तर प्रदेश में भाजपा को पुनर जीवित करने का सारा श्रेय बसपा को ही जाता है. मायावती ने तो 2001 में गुजरात जा कर मोदी के पक्ष में चुनाव प्रचार भी किया था. अब भी मायावायी भाजपा सरकार को समर्थन दे रही है.
1995 में दलितों, पिछड़ों और मुसलामानों का गठबंधन टूटने से इन वर्गों का बहुत नुक्सान हुआ. 1996 के लोकसभा चुनाव में कुछ लोगों ने सपा और बसपा को पुनः एक साथ लाने की कोशिश की. मुलायम सिंह ने कुछ दलित विधायकों और सांसदों को यह कह कर दिल्ली भेजा कि अगर कांशी राम तैयार हों तो वह उन से पुनः हाथ मिलाने को तैयार हैं. जब उन लोगों ने दिल्ली जा कर कांशी राम से बात की तो वह इस के लिए तैयार हो गए और उन्होंने इस सम्बन्ध में शाम को दिल्ली में बयान भी दे दिया. उस दिन मायावती लखनऊ में ही थी. इस ब्यान के आने पर मायावती ने अगले दिन ही “इसका सवाल ही पैदा नहीं होता” कह कर कांशी राम के बयान को काट दिया और यह गठबंधन होते होते रह गया. उस समय तक मायावती बीजेपी के चंगुल में पूरी तरह फंस चुकी थी. अटल बिहारी वाजपयी ने उसे अपनी दत्तक पुत्री और लालजी टंडन और मुरलीमनोहर जोशी ने उसे अपनी राखीबंध बहन बना लिया था.
गठबंधन टूटने के बाद माया-मुलायम की व्यक्तिगत दुश्मनी इस हद तक बढ़ी कि उस ने दलितों और पिछड़ों को दो दुश्मन जातियों के खेमों में बाँट दिया. मुलायम सिंह ने भी दूरदर्शाता का परिचय नहीं दिया. उस ने भी सभी दलितों को मायावती का बंधुया मान कर उन के साथ शत्रुता का व्यवहार किया और पदोन्नति में आरक्षण तक के विरोध की सीमा तक चले गए.
सपा-बसपा के झगड़े में दो बंदरों की रोटी की लडाई और बिल्ली वाली कहानी बिलकुल सही चरितार्थ हुयी है. अब बिल्ली गद्दी पर बैठी है और बन्दर मन मसोस कर एक दूसरे को कोस रहे हैं. माया-मुलायम दोनों ने ही जातिवादी राजनीति और जातियों की शत्रुता का सहारा लेकर कई बार गद्दी तो हथियाई परन्तु इस से दलितों, पिछड़ों और मुसलमानों का कोई भला नहीं हुआ. मायावती और मुलायम सिंह ने सत्ता में रह कर काफी धन दौलत कमा ली है और दोनों ही सी.बी.आई. के चंगुल में फंसे हैं. अतः अब ज़रुरत है कि दलित, पिछड़े और मुसलमान माया-मुलायम की जातिवादी और जाति दुश्मनी की राजनीति से मुक्त हो कर अपने हित के मुद्दों पर एकजुट हों और देश में उभरती हिंदुत्व की कार्पोरेटी राजनीति का सामना करने के लिए लामबंद होकर जनवादी और प्रगतिशील राजनीति करने वाली पार्टियों का साथ दें.          

रविवार, 13 जुलाई 2014

पटेल प्रतिमा बनाम पुस्तकालय

पटेल प्रतिमा  बनाम पुस्तकालय
-एस.आर. दारापुरी  

हाल में पेश किये गए बजट में सरकार ने सरदार पटेल की मूर्ती की स्थापना के लिए 200 करोड़ का प्रावधान किया है. इस सम्बन्ध में एक प्रशन यह पैदा होता है कि भाजपा ने चुनाव के दौरान पटेल की मूर्ती के बहाने पूरे देश से जो लोहा इकठ्ठा किया था उस का क्या हुआ ? इसी प्रकार भाजपा ने अयोध्या में राम मंदिर के नाम पर हरेक घर से एक राम शिला (ईंट) और अरबों रुपए का जो चंदा इकठ्ठा किया था उस का क्या हुआ? क्या सरकार को यह अधिकार है कि वह अपने इष्ट (सरदार पटेल) की मूर्ती की स्थापना के लिए जनता के धन की इतनी बेरहमी से बर्बादी करे जब कि वह धन जन समस्यायों को हल करने में लगाया जाना चाहिए. यदि भाजपा अपने इष्ट सरदार पटेल की मूर्ती लगाना ही चाहती है तो वह अपने पार्टी फण्ड से लगाये न कि जनता के पैसे से.
यहाँ पर यह भी बताना उचित होगा कि सरदार पटेल दलितों और डॉ. आंबेडकर के घोर विरोधी थे. संविधान निर्माण के समय उन्होंने पूना पैक्ट का तिरस्कार करते हुए दलितों को किसी भी प्रकार का आरक्षण देने से मन कर दिया था. इस पर संविधान सभा के सभी दलित सदस्य डॉ. आंबेडकर जो उस समय संविधान निर्मात्री सभा के अध्यक्ष बन चुके थे, के पास गए और पटेल के आरक्षण के बारे में फैसले की बात बताई. इस पर डॉ. आंबेडकर ने कहा कि आप सब लोग गाँधी जी के पास जाइये और उन्हें पूना पैक्ट की याद दिलाइये. डॉ. आंबेडकर की सलाह के अनुसार वे गाँधी जी के पास गए और सरदार पटेल द्वारा दलितों के आरक्षण को नकारने वाली बात बताई. इस पर गाँधी जी ने सरदार पटेल को पूना पैक्ट का सम्मान करने और दलितों को आरक्षण देने की बात कही. तब कहीं जाकर संविधान में दलितों के आरक्षण का प्राविधान हो सका. इसी प्रकार सरदार पटेल ने मुसलामानों और सिखों को आज़ादी के पूर्व मिल रहे आरक्षण को भी नकार दिया था था. बाद में बड़ी मुश्किल से दलित सिखों को काफी जद्दोजहद के बाद 1956 में आरक्षण मिला और दलित मुसलामानों को तो आज तक नहीं मिला.
सरदार पटेल डॉ. आंबेडकर के भी घोर विरोधी थे. उन्होंने जान बूझ कर डॉ. आंबेडकर को संविधान निर्माण हेतु सब से महत्त्व पूर्ण समिति "Fundamental Rights Committee" (मौलिक अधिकार समिति) में नहीं रखा था. डॉ. आंबेडकर और सरदार पटेल के बीच सम्बन्ध इतने कडवे थे कि एक बार गुस्से में डॉ. आंबेडकर ने संविधान निर्माण सम्बन्धी एक पत्रावली उठा कर यह कहते हुए फेंक दी थी कि "जाओ पटेल को कह दो कि मैं संविधान नहीं बनायूंगा जिस से बनवाना चाहे बनवा लें."
हमारा यह भी सुझाव है कि यदि भाजपा वास्तव में सरदार पटेल के नाम पर कुछ जनउपयोगी कार्य करना ही चाहती है तो वह इस 200 करोड़ रुपये से पूरे देश में सरदार पटेल के नाम पर अच्छे पुस्तकालय बनवा दे ताकि जनता उन से कुछ ज्ञान अर्जन कर सके. काश ! मायावती ने भी मूर्तियों पर हजारों करोड़ बर्बाद न करके उस पैसे से पुस्तकालय और विद्यालय बनवा दिए होते.
मूर्तियों के बारे में डॉ. आंबेडकर के विचार भी बहुत समीचीन हैं जैसा कि निम्नलिखित से स्पष्ट है:
1916 में जब डॉ आंबेडकर कोलंबिया विश्व विद्यालय में पढ़ रहे थे तो उस समय उन्होंने "Bombay Chronicle" समाचार पत्र में यह समाचार पढ़ा कि बॉम्बे की तत्कालीन सरकार दादा भाई नौरोजी और गोपाल कृष्ण गोखले जो कांग्रेस के अध्यक्ष रहे थे और एक वर्ष पूर्व उन का देहांत हो गया था का स्मारक बनाना चाहती है. इस सम्बन्ध में यह निर्णय लिया गया है कि दादा भाई नौरोजी की एक मूर्ती बॉम्बे नगरपालिका कार्यालय के प्रांगण में लगवा दी जाये और गोपाल कृष्ण गोखले जी की "सर्वेन्ट्स आफ इंडिया" संस्था की शाखाएं हरेक जिले में स्थापित कर दी जाएँ. इस पर डॉ. आंबेडकर ने अपनी प्रतिक्रिया प्रकट करते हुए बाम्बे क्रानिकल के सम्पादक को जो पत्र लिखा उस में उन्होंने कहा कि "गोखले जी की संस्था की शाखाओं की हरेक जिले में स्थापना किया जाना तो उचित है परन्तु क्या दादा भाई नौरोजी की मूर्ती की जगह उन के नाम पर एक अच्छे पुस्तकालय की स्थापना नहीं की जा सकती ? हमारा दुर्भाग्य है कि हमारे देश के लोगों ने समाज के विकास में पुस्तकालयों की भूमिका को नहीं समझा है."
क्या डॉ. आंबेडकर के मूर्तियों के सम्बन्ध में उक्त विचार आज भी प्रासंगिक नहीं हैं?

अगर गांधीजी आज ज़िंदा होते, तो आज के सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांप्रदायिक हालात पर उनकी क्या प्रतिक्रिया होती?

  अगर गांधीजी आज ज़िंदा होते , तो आज के सामाजिक , धार्मिक , आर्थिक , राजनीतिक और सांप्रदायिक हालात पर उनकी क्या प्रतिक्रिया होती ? एस.आर...