रविवार, 26 अक्टूबर 2014

दलित बनाम बहुजन राजनीति





                                                दलित बनाम बहुजन राजनीति
                                               -एस.आर. दारापुरी राष्ट्रीय प्रवक्ता, आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट
            पिछले काफी समय से राजनीति में दलित की जगह बहुजन शब्द का इस्तेमाल हो रहा है. बहुजन अवधारणा  के प्रवर्तकों के अनुसार बहुजन में दलित और पिछड़ा वर्ग शामिल हैं. कांशी राम के अनुसार इस में मुसलमान भी शामिल हैं और इन की सख्या 85% है. उन की थ्योरी के अनुसार बहुजनों को एक जुट हो कर 15% सवर्णों से सत्ता छीन लेनी चाहिए. वैसे सुनने में तो यह सूत्र बहुत अच्छा लगता है और इस में बड़ी संभावनाएं भी लगती हैं. परन्तु देखने की बात यह है कि बहुजन को एकता  में बाँधने का सूत्र क्या है. क्या यह दलितों और पिछड़ों के अछूत और शुद्र होने का सूत्र है या कुछ और?  अछूत और शुद्र असंख्य जातियों में बटे हुए हैं और वे अलग दर्जे के जाति अभिमान से ग्रस्त हैं. वे ब्राह्मणवाद (श्रेष्ठतावाद) से उतने ही ग्रस्त है जितना कि वे सवर्णों को आरोपित करते हैं. उन के अन्दर कई तीव्र अंतर्विरोध हैं. पिछड़ी जातियां आपने आप को दलितों से ऊँचा मानती हैं और वैसा ही व्यवहार भी करती हैं. वर्तमान में दलितों पर अधिकतर अत्याचार उच्च जातियों की बजाये पिछड़ी संपन्न (कुलक) जातियों द्वारा ही  किये जा रहे हैं. अधिकतर दलित मजदूर हैं और इन नव धनाडय जातियों का आर्थिक हित मजदूरों से टकराता है. इसी लिए मजदूरी और बेगार को लेकर यह जातियां दलितों पर अत्याचार करती हैं. ऐसी स्थिति में दलितों और पिछड़ी जातियों में एकता किस आधार पर स्थापित  हो सकती है? एक ओर सामाजिक दूरी है तो दूसरी ओर आर्थिक हित का टकराव. अतः दलित और पिछड़ा या अछूत और शूद्र होना मात्र एकता का सूत्र नहीं हो सकता. यदि राजनीतिक स्वार्थ को लेकर कोई एकता बनती भी है तो वह स्थायी नहीं हो सकती जैसा कि व्यवहार में भी देखा गया है.
           अब अगर दलित और पिछड़ा  का वर्ग विश्लेषण किया जाये तो यह पाया जाता है कि  दलितों के अन्दर भी संपन्न औए गरीब वर्ग का निर्माण हुआ है. पिछड़ों के अन्दर तो अगड़ा पिछड़ा वर्ग  और अति पिछड़ा वर्ग का विभेद तो बहुत स्पष्ट है. पिछले  कुछ समय से  दलित और पिछड़े वर्ग के संपन्न वर्ग ने ही आर्थिक विकास का लाभ उठाया है और राजनीतिक सत्ता में हिस्सेदारी ही प्राप्त की है. इस के विपरीत दलित और पिछड़ा वर्ग का बहुसंख्यक हिस्सा आज भी बुरी तरह से पिछड़ा हुआ है. इसी विभाजन को लेकर अति-दलित और अति-पिछड़ा वर्ग की बात उठ रही है. इस से भी स्पष्ट है कि बहुजन की अवधारणा केवल हवाई अवधारणा है. इसी प्रकार मुसलमानों के अन्दर भी अशरफ, अज्लाफ़ और अरजाल का विभाजन है जो कि पसमांदा मुहाज (पिछड़े मुसलमान) के रूप में सामने आ रहा है.
            अब प्रश्न पैदा होता है इन वर्गों के अन्दर एकता का वास्तविक सूत्र क्या हो सकता है? उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि दलितों, पिछड़ों और मुसलमानों के अन्दर अगड़े पिछड़े दो वर्ग हैं जिन के अलग अलग आर्थिक और राजनीतिक हित हैं और इन में तीखे अन्तर्विरोध तथा टकराव भी है. अब तक इन वर्गों का प्रभुत्वशाली तबका जाति और धर्म के नाम पर पूरी जाति/वर्ग और सम्प्रदाय का नेतृत्व करता आ रहा है और इसी तबके ने ही  विकास का जो भी आर्थिक और राजनीतिक लाभ हुआ है उसे  उठाया है. इस से इन के अन्दर जाति/वर्ग विभाजन और टकराव तेज हुआ है. विभिन्न राजनीतिक पार्टियाँ इस जाति/वर्ग विभाजन का लाभ उठाती रही हैं परन्तु किसी भी पार्टी ने न तो इन के वास्तविक मुद्दों को चिन्हित किया है और न ही इन के उत्थान के लिए कुछ किया है. हाल में भाजपा ने इन्हें हिन्दू के नाम पर इकट्ठा करके इन का वोट बटोरा है. अगर देखा जाये तो यह वर्ग सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक तौर पर पिछड़ा हुआ है. इन वर्गों का वास्तविक उत्थान उन के पिछड़ेपन से जुड़े हुए मुद्दों को उठाकर और उन को हल करने की नीतियाँ बना कर ही किया जा सकता है. अतः इन की वास्तविक एकता इन मुद्दों को लेकर ही बन सकती है न कि जाति और मज़हब को लेकर. यदि आर्थिक और राजनीतिक हितों की दृष्टि से देखा जाये तो यह वर्ग प्राकृतिक दोस्त हैं क्योंकि इन की समस्यायें एक समान हैं और उन की मुक्ति का संघर्ष भी एक समान ही है. बहुजन के छाते के नीचे अति पिछड़े तबके के मुद्दे और हित दब जाते हैं.
           अतः इन अति पिछडे तबकों की मजबूत एकता स्थापित करने के लिए जाति/मज़हब पर आधारित बहुजन की कृत्रिम अवधारणा के स्थान पर इन के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक पिछड़ेपन से जुड़े मुद्दे उठाये जाने चाहिए. जाती और धर्म की राजनीति हिंदुत्व को ही मज़बूत करती है. इसी ध्येय से आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट (आइपीएफ़) ने अपने एजंडे में सामाजिक न्याय के अंतर्गत:
          (1) पिछड़े मुसलमानों का कोटा अन्य पिछड़े वर्ग से अलग किए जाने, धारा 341 में संशोधन कर दलित मुसलमानों व ईसाइयों को अनुसूचित जाति में शामिल किए जाने. सच्चर कमेटी व रंगनाथ मिश्रा कमेटी की सिफारिशों को लागू किए जाने; (2) अति पिछड़ी जातियों को अन्य पिछड़े वर्ग में से अलग आरक्षण कोटा दिए जाने; (3) पदोन्नति में आरक्षण की व्यवस्था को जल्दी से जल्दी बहाल किए जाने ; (4) एससी/एसटी के कोटे के रिक्त सरकारी पदों को विशेष अभियान चला कर भरे जाने; (5) निजी क्षेत्र में भी दलितों, आदिवासियों, अन्य पिछड़ा वर्ग व अति पिछड़ा वर्ग को आरक्षण दिए जाने; (6) उ0 प्र0 की कोल जैसी आदिवासी जातियों को जनजाति का दर्जा दिए जाने; (7) वनाधिकार कानून को सख्ती से लागू करने तथा (8) रोज़गार को मौलिक अधिकार बनाने आदि के मुद्दे शामिल किये हैं. इसके अतिरिक्त  साम्प्रदायिकता पर रोक लगाने के लिए कड़ा कानून बनाकर कड़ी कार्रवाई किये जाने और आतंकवाद/ साम्प्रदायिकता के मामलों की सुनवाई फास्ट ट्रैक कोर्ट द्वारा किये जाने की मांग भी उठाई है. इन तबकों को प्रतिनिधित्व देने के ध्येय से  पार्टी ने अपने संविधान में दलित,पिछड़े, अल्पसंख्यक और महिलायों के लिए 75% पद आरक्षित किये हैं.
           आइपीएफ बहुजन की जाति आधारित राजनीति के स्थान पर मुद्दा आधारित राजनीति को बढ़ाने के लिए प्रयत्नशील है जैसा कि बाबा साहेब का भी निर्देश था.
          नोट: कृपया आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए www.aipfr.org पर देखें.
 


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शनिवार, 30 अगस्त 2014

हमारा गणराज्य कितना धर्म निरपेक्ष?



(इतिहास के झरोखे से)
हमारा गणराज्य कितना धर्म  निरपेक्ष?
एस. आर. दारापुरी आई. पी. एस. (से.नि.)
हम लोग अवगत हैं कि हमारे देश के संविधान के अनुसार हमारा गणराज्य धर्म निरपेक्ष गणराज्य है जिस का अर्थ है कि राज्य का कोई भी धर्म नहीं है. इस कारण राज्य के काम काज में धर्म का कोई दखल नहीं होगा. इस  से अपेक्षा की जाति है कि राज्य का काम करने वाली विधायका, कार्यपालिका और न्याय पालिका भी धर्म निरपेक्ष होगी और इन में कार्यरत्त व्यक्ति भी पूर्णतया धर्म निरपेक्ष आचरण करेगे.  परन्तु अब तक गणराज्य के व्यवहार से ऐसा होना नहीं पाया गया है. इस के कुछ ऐतहासिक उदहारण निम्न हैं:-
1.       14 अगस्त, 1947 की रात को 12 बजे जब आज़ादी का झंडा फहराया गया था उस से तीन घंटा पहले नेहरु और उन के साथी दिल्ली में एक पवित्र अग्नि के इर्द गिर्द बैठे थे और इस कर्मकांड के लिए तंजौर से खास तौर पर बुलाये गए पुजारियों ने मन्त्र पढ़े थे और उन के ऊपर पवित्र जल छिड़का था. महिलाओं के माथे पर संधूर का तिलक लगाया गया था. इस के तीन घंटे बाद हिन्दू ज्योतिशियों द्वारा निर्धारित दिन और समय पर मध्य रात्रि में नेहरु ने राष्ट्र ध्वज फहरा कर ब्रोडकास्ट द्वारा देशवासियों को बताया था कि उन की भाग्य के साथ पूर्व निश्चित भेंट हो गयी है और भारत गणराज्य का जन्म हो गया है. ( सन्दर्भ: दा इंडियन आइडियोलॉजी – पैरी एंडरसन , पृष्ठ 103)
2.       भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद बहुत धर्म भीरु हिन्दू थे. दुर्भाग्य से कायस्थ होने के कारण वे शूद्र वर्ग में आते थे. इस कारण उन का सामाजिक दर्जा निम्न था जिस के उच्चीकरण के लिए उन्हें काशी की विद्वत जन सभा से आशीर्वाद प्राप्त करना ज़रूरी था. अतः 1950 में राष्ट्रपति बनने के तुरंत बाद वे काशी गए. वहां पर उन्होंने विद्वत जनसभा के 200 ब्राह्मण सदस्यों के चरण धोये और उन्हें दक्षिणा दी.
डॉ. राजेद्र प्रसाद के इस कृत्य से दुखी हो कर डॉ. राम मनोहर लोहिया ने अपनी पुस्तक “ डा कास्ट सिस्टम “ के प्रारंभ में ही लिखा था, “भारतीय लोग इस पृथ्वी के सब से अधिक उदास लोग हैं........भारत गणराज्य के राष्ट्रपति ने बनारस शहर में शरेआम दो सौ ब्राह्मणों के चरण धोये. शरेआम दुसरे  के चरण धोना भोंडापन है, इसे केवल ब्राह्मणों तक ही सीमित रखना एक दंडनीय अपराध होना चाहिए. इस विशेषाधिकार प्राप्त जाति में केवल ब्राह्मणों को बिना विद्वता और चरित्र का भेदभाव किये शामिल करना पूरी तरह से विवेकहीनता है और यह जाति व्यवस्था और पागलपन का पोषक है.
राष्ट्रपति का ऐसे भद्दे प्रदर्शन में शामिल होना मेरे जैसे लोगों के लिए निर्मम अभ्यारोपण है जो केवल दांत पीसने के सिवाय कुछ नहीं कर सकते.” ( The Caste System- Lohia, page 1 & 2)
3. (क )    डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने जब राष्ट्रपति के रूप में राष्ट्रपति में प्रवेश किया तो उन्होंने सब से पहले राष्ट्रपति भवन में कार्यरत सभी मुस्लिन खानसामों (रसोईयों) को हटा दिया. नेहरु इस से बहुत नाराज़ हुए.  इस पर उन्होंने आदेश दिया कि सभी मुस्लिम खानसामों को हिन्दू खानसामों की जगह प्रधान मंत्री के निवास पर लगा दिया जाये जब कि इस से सुरक्षा अधिकारी नाखुश थे.
3.(ख) डॉ. राजेन्द्र प्रसाद की एक अन्य हरकत से नेहरु बहुत नाराज़ थे जब वह राष्ट्रपति के रूप में सोमनाथ मंदिर जिस का जीर्णोद्धार किया गया था में शिवलिंग की स्थापना समारोह में भाग लेने गए थे. नेहरु को यह पता चला था कि खाद्य और कृषि मंत्री ने सरदार पटेल से मिल कर चीनी का मूल्य बढाया था और उस बढ़ी कीमत में से आधा पैसा चीनी मिल वालों ने रख लिया था और आधा पैसा सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार में लगाया गया था. नेहरु को यह सूचना काफी देर से मिली थी जबकि इस सम्बन्ध में कुछ भी करना संभव नहीं था. यह भी ज्ञातव्य है कि नेहरु ने राजेन्द्र प्रसाद जी को वहां पर जाने से लिखित रूप में जाने से मना किया था परन्तु वह नहीं माने. (सन्दर्भ: Reminiscences of the Nehru Age – M.O.Mathai , p- 71))

4.डॉ. राजेन्द्र प्रसाद हनुमान भक्त थे. इसी लिए जब वे राष्ट्रपति भवन पहुंचे तो उन्होंने राष्ट्रपति भवन में कई लंगूर रख लिए जिन्हें वे अपने हाथ से खिलाते थे. जल्दी ही इन लंगूरों की जन संख्या में काफी वृद्धि हो गयी. ये लंगूर आस पास के रिहाइशी इलाकों के घरों में घुस कर सामान उठा लाते थे और नार्थ ब्लाक तथा सायूथ बलाक  में घुस कर पत्रावलियां  तथा टिफिन आदि उठा लाते थे परन्तु इन के उत्पात के विरुद्ध कुछ भी करना संभव नहीं था. राष्ट्रपति भवन के पास रहने वाले लोगों तथा सचिवालय के कर्मचारियों को तब राहत मिली जब राजेन्द्र प्रसाद जी राष्ट्रपति के पद से मुक्त हो गए और वे सभी लंगूर पकड़ कर दिल्ली के चिड़िया घर में पहुंचा दिए गए.
5. पंडित मदन मोहन मालवीय एक कट्टर सनातनी हिन्दू थे जो मुसलमानों, ईसाईयों और विदेशियों को अछूत मानते थे. वह जब भी इंगलैंड जाते थे तो अपने गंगा जल के कई लोटे ले जाते थे. वहां पर जब भी कोई अँगरेज़ या निम्न जाति का हिन्दू उन के कमरे में मिलने के लिए आता था तो वह उस के जाने के बाद कमरे को गंगा जल छिड़क कर पवित्र करते थे. कट्टर हिन्दू आज भी पञ्च गव्या; गाय का पेशाब, गोबर, मक्खन और दूध का मिश्रण बना कर मंदिर और तालाब का शुद्धिकरण करते हैं. (सन्दर्भ: Thus Spoke Ambedkar Vol. IV pages 101 & 102)
6. डॉ. राजेन्द्र प्रसाद कट्टर सनातनी हिन्दू थे. जब डॉ. आंबेडकर ने कानून मंत्री के रूप में नेहरु जी की सहमती से लोक सभा हिन्दू कोड बिल पेश किया था तो डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने हिन्दू कोड बिल का विरोध किया था जैसा कि अन्य कट्टर हिन्दू सदस्य और संगठन कर रहे थे. परिणाम स्वरूप हिन्दू कोड बिल पास नहीं हो सका और इस से नाराज़ हो कर डॉ. आंबेडकर ने नेहरु मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया था.

...........जारी है   










बुधवार, 27 अगस्त 2014

मायावती के भ्रष्टाचार की दलित राजनीति पर काली छाया



मायावती के भ्रष्टाचार की दलित राजनीति पर काली छाया
-एस. आर. दारापुरी, राष्ट्रीय प्रवक्ता, आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट
आज लगभग सभी समाचार पत्रों में मायावती के विरुद्ध आय से ज्यादा संपत्ति के मामले को लेकर समाचार छपे हैं. इस में यह बताया गया है कि लखनऊ के एक व्यक्ति कमलेश कुमार वर्मा की सुप्रीम कोर्ट में दाखिल जनहित याचिका जिस में यह कहा गया है कि मायावती के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति रखने के मामले में सी.बी.आई. को मायावती के विरुद्ध नयी प्रथम सूचना दर्ज करने का आदेश दिया जाये. इस पर कोर्ट ने मायावती को जवाब दाखिल करने के लिए ततीन सप्ताह का समय दिया है.
पूर्व में सी.बी.आई. द्वारा ताज कोरिडोर के मामले की जांच के दौरान मायावती के विरुद्ध मामला दर्ज करके विवेचना उपरांत सुप्रीम कोर्ट में रिपोर्ट दाखिल करने पर कोर्ट द्वारा इसे तकनीकि आधार पर रद्द कर दिया गया था. 2012 में कोर्ट ने ताज कोरिडोर मामले में सम्बंधित अधिकारियों की संपत्तियों की जांच करने के आदेश दिए थे. इसी आदेश के अंतर्गत  मायावती की संपत्तियों की जांच भी की गयी थी. जांच से मायावती की संपत्तियां उस की ज्ञात आय से बहुत अधिक पायी गयी थीं. इस पर सी.बी.आई. ने अपनी तरफ से प्रथम सूचना दर्ज न करके ताज कोरिडोर के मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश को आधार बना कर प्रथम सूचना दर्ज की थी जिसे सुप्रीम कोर्ट ने यह कह कर रद्द कर दिया था कि उस ने सी.बी.आई. को ऐसा आदेश नहीं दिया था. सुप्रीम कोर्ट ने यह ज़रूर कहा था कि अगर सी.बी.आई. चाहे तो अपनी तरफ से प्रथम सूचना दर्ज करके अग्रिम कार्रवाही कर सकती है परन्तु अज्ञात कारणों से सी.बी.आई. ने ऐसा नहीं किया. कुछ लोगों का कहना है कि सी.बी.आई. ने ऐसा तत्कालीन सत्तारूढ़ पार्टी (कांग्रेस) के राजनीतिक दबावव के कारण नहीं किया था क्योंकि मायावती यूपीए की सरकार को समर्थन दे रही थी. वर्तमान जनहित याचिका में सुप्रीम कोर्ट ने सी.बी.आई. से भी प्रथम सूचना दर्ज न करने का कारण पूछा है. जनहित याचिका की पैरवी कर रहे वकील शांति भूषण का कहना है कि इस मामले में सी.बी.आई. पहले ही पर्याप्त सबूत इकठ्ठा कर चुकी है और मायावती के विरुद्ध चार्ज शीट भी तैयार कर चुकी है.
इस जनहित याचिका के सम्बन्ध में कानून जानने वालों का कहना है अब मायावती के लिए बचना शायद उतना आसान नहीं होगा जितना कि पहले था. अब क्योंकि सी.बी.आई पहले ही मायावती की आय से अधिक संपत्ति के बारे में सारे सुबूत इकट्ठे कर के आरोप पत्र तक तैयार कर चुकी है अतः अब उस के लिए प्रथम सूचना दर्ज न करने का कोई बहाना नहीं चलेगा. इस समय मायावती के लिए भी अपने निर्दोष होने के बारे में कोई सफाई देना संभव नहीं होगा. परिणामस्वरूप अगर सुप्रीम कोर्ट सी.बी.आई. को मायावती के विरुद्ध प्रथम सूचना दर्ज करके विवेचना करने का आदेश दे देती है तो यह मायावती के लिए काफी भारी पड़ सकता है. यह भी उल्लेखनीय है कि मायावती के विरुद्ध उक्त मामला 1995 से 2003 तक का है परन्तु  अगर सी.बी.आई. चाहे तो वह इस के बाद की अवधि की संपत्ति की जांच भी कर सकती है क्योंक इस दौर में भी मायावती की संपत्ति में अप्रत्याशित वृद्धि हुयी है. कानून में “लगातार अपराध” की विवेचना का भी प्रावधान है.
मायावती के आय से अधिक संपत्ति के मामले में अंतिम परिणाम क्या होगा यह तो समय ही बताएगा परन्तु मायावती के भ्रष्टाचार का दलित राजनीति पर बहुत बुरा असर हुआ है. इस पार्टी के संस्थापक कांशी राम ने बाबा साहेब का मिशन पूरा करने के नारे के साथ राजनीति में कदम रखा था. अतः इस पार्टी के खास करके इस की कर्ताधर्ता मायावती के कार्य कलापों को बाबा साहेब की विचारधारा पर ही जांचना उचित होगा.
अब अगर मायावती के भ्रष्टाचार की बात की जाये तो इस सम्बन्ध में डॉ. आंबेडकर की टिप्पणी बहुत प्रासंगिक है. इस में बाबा साहेब ने एक बार किसी सन्दर्भ में कहा था, “मेरे विरोधी मेरे ऊपर तमाम आरोप लगाते रहे हैं परन्तु आज तक मेरे ऊपर कोई भी दो आरोप नहीं लगा सका. एक मेरे चरित्र के बारे में और दूसरा मेरी ईमानदारी के बारे में.” क्या मायावती इस प्रकार का दावा कर सकती है? बाबा साहेब की ईमानदारी की दूसरीं मिसाल यह है कि जब बाबा साहेब नेहरु मंत्रिमंडल में श्रम मंत्री थे तो कुछ उद्योगपति दिल्ली में उनके बेटे यशवंत राव से आ कर मिले और उन्होंने उसे अपने पिता जी से अपना काम करा देने के लिए कहा. इस के बारे में जब बाबा साहेब को पता चला तो उन्होंने तुरंत उस का बोरिया बिस्तर बंधवा कर दिल्ली से बम्बई भिजवा दिया.   
मायावती के भ्रष्टाचार के बारे प्रो. तुलसी राम ने “दलित-जातिवादी राजनीती और हिंदुत्व” लेख में जो लिखा है वह बहुत स्टिक है. उन्होंने लिखा है, “उन्हें आम सभाओं में चांदी-सोने के ताज पहनाए जाते थे और उनके हर जन्म दिवस पर लाखों रुपए की भारी-भरकम माला भी पहनाई जाती थी। 1951 में मुंबई के दलितों ने बड़ी मुश्किल से दो सौ चौवन रुपए की एक थैली डॉ. आंबेडकर को उनके जन्मदिन पर भेंट की थी, जिस पर नाराज होकर उन्होंने चेतावनी दी थी कि अगर कहीं भी ऐसा दोबारा किया तो वे ऐसे समारोहों का बहिष्कार करेंगे। 
पिछली दफा राज्यसभा का परचा दाखिल करते हुए मायावती ने आमदनी वाले कॉलम में एक सौ तेईस करोड़ रुपए की संपत्ति दिखाई थी। हकीकत यह थी कि मायावती के गैर-जनतांत्रिक व्यवहार के चलते बसपा में भ्रष्ट और अपराधी तत्त्वों की भरमार हो गई थी, जिसके कारण पूरा दलित समाज न सिर्फ बदनाम हुआ, बल्कि इस से दलित विरोधी भावनाएं भी समाज में खूब विकसित हुर्इं। एक तरह से मायावती दलित वोटों का व्यापार करने लगी थीं। पिछले अनेक वर्षों में चमार और जाटव समाज के लोग उत्तर प्रदेश में भेड़ की तरह मायावती के पीछे चलने लगे थे। इसलिए वे भ्रष्टाचारियों और अपराधियों को चुन कर विधानसभा और संसद में भेजने लगे थे। “ इस से स्पष्ट है मायावती के भ्रष्टाचार का दलित राजनीति पर कितना दुष्प्रभाव पड़ा है.
मायावती के भ्रष्टाचार का सब से बुरा असर बसपा काडर के आचरण पर पड़ा है जिस के कारण बहुत से नेता और कार्यकर्त्ता भी भ्रष्ट हो गए जिन में से काफी जेल में हैं और बाकियों के खिलाफ जांचें चल रही हैं. जब मायावती ऊँचे दामों पर विधान सभा, लोक सभा और जिला परिषद के टिकट बेचने लगी तो टिकट खरीद कर चुनाव लड़ने वाले पूंजीपति, माफिया और दबंग लोग चुनाव में कार्यकर्ताओं को पैसा बाँट कर वोट खरीदने लगे. इस से राजनीतिक क्षेत्र में भ्रष्टाचार बहुत व्यापक हो गया. मायावती का दलित वोटों के बारे में यह कहना कि यह हस्तान्तरणीय है पूरे दलित समाज के लिए अपमानजनक था. जब मायावती ने ट्रांसफर पोस्टिंग में पैसा लेना शुरू किया तो इस का सब से बुरा प्रभाव समाज के कमज़ोर तबकों खास कर दलितों पर पड़ा. यह स्वाभाविक है जो अधिकारी पैसा देकर पोस्टिंग पाते थे वे फील्ड में जा कर भ्रष्टाचार करते थे. इस का नतीजा यह था कि वे विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं जैसे मनरेगा, राशन वितरण, पेंशन तथा अन्य योजनाओं में भ्रष्टाचार करते थे और लाभार्थी अधिकतर दलित उन के लाभ से वंचित रह जाते थे. और तो और मायावती ने दलित महापुरुषों की मूर्तियों में जो पत्थर लगवाये उन में भी बड़े स्तर पर भ्रष्टाचार हुआ. वैसे भी यह सर्वविदित है कि भ्रष्टाचार गरीब विरोधी होता है. अतः मायावती के भ्रष्टाचार का सब से बड़ा खामियाजा दलितों को ही भुगतना पड़ा.
वैसे तो बसपा में पैसा लेकर टिकट देने का धंधा काफी पहले ही शुरू हो गया था. 1994 में जब बसपा ने राज्य सभा में एक सांसद भेजा था वह कोई दलित नहीं था. बल्कि वह एक उद्योगपति जयंत मल्होत्रा था जिस को लेकर  दलितों में काफी प्रतिक्रिया और नाराज़गी थी. इस नाराज़गी के सम्बन्ध में मैंने जब कांशी राम से चर्चा की तो उन्होंने मुझे स्पष्ट बताया कि “पार्टी को चलाने के लिए पैसे की ज़रुरत होती है और मल्होत्रा ने हमारी पार्टी को पैसा दिया है.” इस पर मैंने उन्हें कहा था कि अगर पैसा ही सब कुछ हो जायेगा तो फिर आप की पार्टी के गरीब मिशनरी कार्यकर्ताओं का नंबर कब आएगा. पैसे देकर विधान सभा का टिकट पाने वालों  में मेरे अपने सगे समधी छोटे लाल भी थे. वह जहाँ से टिकट चाहते थे उन्हें वहां का टिकट न देकर दूसरी जगह का टिकट दे दिया गया और वह चुनाव हार गए तथा बर्बाद हो गए. बाद में तो विधान सभा और लोकसभा के टिकट बोली लगा कर बिकने लगे जिस से गुंडों, माफियाओं और पूँजीपतियों की पार्टी में भरमार हो गयी और पार्टी के समर्पित कार्यकर्त्ता हाशिये पर चले गए.
वैसे तो आज कल राजनीतिक क्षेत्र में ईमानदारी एक दुर्लभ वस्तु है. फिर भी यह आशा की जाती है कि जो वर्ग भ्रष्टाचार का सब से अधिक शिकार रहा हो अगर वह सत्ता में आता है तो वह भ्रष्टाचार को रोकने और कम करने की कोशिश ज़रूर करेगा. मायावती जो भ्रष्टाचार के सब से बड़े शिकार लोग दलितों की प्रतिनिधि के तौर पर सत्ता में आई थी, इस अपेक्षा पर सही नहीं उतरी इस के विपरीत उस ने उसी भ्रष्ट व्यवस्था को अपनाया और उसे मज़बूत किया जिस का खामियाजा उत्तर प्रदेश के दलितों को भुगतना पड़ा. केवल इतना ही नहीं मायावती ने अपने अनुयायियों की सोच को भी भ्रष्ट कर दिया है. मायावती के भ्रष्टाचार को वह यह कह कर उचित ठहरा देते हैं कि जब अधिकतर नेता भ्रष्ट हैं तो मायावती के भी भ्रष्ट होने में क्या बुरा है. कुछ तो यह भी कहते हैं कि चूँकि कि मायावती दलित है इस लिए उस के भ्रष्टाचार की आलोचना की जाती है. पता नहीं कि ऐसा कह कर वे दलित नेतायों के लिए भ्रष्टाचार में आरक्षण या छूट की वकालत कर रहे हैं या कुछ और. वैसे तो दलितों के और नेता भी दूध के धुले नहीं हैं परन्तु अब तक उन के भ्रष्टाचार का सीमित असर है परन्तु मायावती के भ्रष्टाचार का एक व्यापक असर हुआ है जिस ने दलित राजनीति को बिकायू और भ्रष्ट बना दिया है. मायावती का यह कहना कि हमारा वोट बैंक हस्तान्तरणीय है पूरे दलित समाज के लिए बहुत अपमानजनक रहा है. दरअसल मायावती ने दलित राजनीति को उन्हीं गुंडों, बदमाशों, माफिययों और पूंजीपतियों के हाथों बेच दिया जिन से उनकी लडाई थी और जिन के चंगुल से उन्हें मुक्त होना था. इस से सारा दलित आन्दोलन और दलित  राजनीति वर्षों पीछे चली गई है और इसे फिर आगे बढ़ाने में काफी समय और मेहनत लगेगी.

अगर गांधीजी आज ज़िंदा होते, तो आज के सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांप्रदायिक हालात पर उनकी क्या प्रतिक्रिया होती?

  अगर गांधीजी आज ज़िंदा होते , तो आज के सामाजिक , धार्मिक , आर्थिक , राजनीतिक और सांप्रदायिक हालात पर उनकी क्या प्रतिक्रिया होती ? एस.आर...