पेरियार और उत्पीड़ित वर्गों की मुक्ति
एस आर दारापुरी आई.पी.एस.(सेवानिवृत)
(रामासामी पेरियार की 147वीं जयंती के अवसर पर)
प्रस्तावना
ई. वी. रामासामी, जिन्हें लोकप्रिय रूप से पेरियार (1879–1973) के नाम से जाना जाता है, भारत में जातिगत उत्पीड़न, सामाजिक असमानता और ब्राह्मणवादी वर्चस्व के विरुद्ध संघर्ष के इतिहास में एक विशिष्ट और अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। आत्मसम्मान आंदोलन तथा व्यापक द्रविड़ सामाजिक आंदोलन के माध्यम से पेरियार ने केवल कुछ सामाजिक कुरीतियों में सुधार की मांग नहीं की, बल्कि उन सामाजिक संबंधों और वैचारिक संरचनाओं को बदलने का प्रयास किया जो असमानता को लगातार पुनरुत्पादित करती थीं। उनकी राजनीति का मूल प्रश्न था—जिस समाज में मनुष्यों को जन्म के आधार पर ऊँच-नीच में बाँटा जाता हो, क्या वह वास्तव में लोकतांत्रिक समाज हो सकता है?
पेरियार के योगदान को इसलिए केवल राजनीतिक सुधार के रूप में नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन की व्यापक परियोजना के रूप में समझना चाहिए। उन्होंने जाति-व्यवस्था की सांस्कृतिक, धार्मिक और संस्थागत बुनियादों को चुनौती दी। उन्होंने तर्कवाद, आत्मसम्मान, शिक्षा तक समान पहुँच, सामाजिक प्रतिनिधित्व, महिला मुक्ति और वंशानुगत विशेषाधिकार के विरोध को अपने आंदोलन के प्रमुख आधार बनाया। उनका लक्ष्य ऐसा समाज बनाना था जिसमें किसी व्यक्ति का सामाजिक सम्मान और अवसर उसके जन्म से निर्धारित न हो।
पेरियार के विचारों की तुलना डॉ. बी. आर. आंबेडकर के विचारों से भी महत्वपूर्ण ढंग से की जा सकती है। यद्यपि दोनों विचारकों के धर्म, राजनीतिक संगठन और सामाजिक परिवर्तन के तरीकों में महत्वपूर्ण अंतर थे, लेकिन दोनों एक बुनियादी बात पर सहमत थे—जाति केवल व्यक्तिगत पूर्वाग्रह नहीं, बल्कि सामाजिक सत्ता और असमानता की एक संरचनात्मक व्यवस्था है। दोनों ने इस धारणा को अस्वीकार किया कि गहरी सामाजिक असमानता के रहते केवल राजनीतिक लोकतंत्र ही पर्याप्त हो सकता है।
जाति एक संरचनात्मक असमानता के रूप में
पेरियार की जाति संबंधी समझ केवल अस्पृश्यता के प्रश्न तक सीमित नहीं थी। उन्होंने जाति को जन्म के आधार पर निर्धारित क्रमबद्ध सामाजिक पदानुक्रम के रूप में देखा। यह व्यवस्था शिक्षा, पेशे, विवाह, आवास, धार्मिक अधिकार, सार्वजनिक संस्थाओं और राजनीतिक प्रतिनिधित्व सहित जीवन के लगभग प्रत्येक क्षेत्र को प्रभावित करती थी।
पेरियार के अनुसार जाति इसलिए टिकाऊ बनी रही क्योंकि उसे केवल सामाजिक प्रथाओं का ही नहीं, बल्कि ऐसे विचारों और मान्यताओं का भी समर्थन प्राप्त था जो असमानता को स्वाभाविक अथवा पवित्र बताते थे। इसलिए केवल व्यक्तिगत सद्भावना या नैतिक अपील से जाति समाप्त नहीं हो सकती थी। उन संस्थाओं और विचारों को चुनौती देना आवश्यक था जो जातिगत वर्चस्व को पुनरुत्पादित करते थे।
यहीं पेरियार की सामाजिक विचारधारा का मूल क्रांतिकारी चरित्र सामने आता है। वे विशेषाधिकार प्राप्त समूहों से केवल अधिक उदार या दयालु बनने की अपील नहीं करते थे; वे सामाजिक संबंधों की बुनियादी संरचना में परिवर्तन चाहते थे। उनका लक्ष्य अधिक मानवीय जाति-व्यवस्था बनाना नहीं, बल्कि जातिगत पदानुक्रम का अंत करना था।
इस दृष्टि से पेरियार का विचार डॉ. आंबेडकर की जाति-आलोचना से निकटता रखता है। आंबेडकर ने जाति को ‘क्रमबद्ध असमानता’ की ऐसी व्यवस्था के रूप में समझाया जिसमें प्रत्येक समूह अपने से नीचे के समूह को हीन समझ सकता है, जबकि स्वयं अपने से ऊपर के समूह की श्रेष्ठता को स्वीकार करता है। पेरियार भी जाति को ऐसी सामाजिक व्यवस्था के रूप में देखते थे जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी असमान सामाजिक शक्ति को कायम रखती है।
आत्मसम्मान की राजनीति
1925 में प्रारंभ हुआ आत्मसम्मान आंदोलन पेरियार की मुक्ति-राजनीति का प्रमुख माध्यम बना। इसका केंद्रीय विचार सरल दिखाई देता है, लेकिन उसका सामाजिक अर्थ अत्यंत गहरा था—वास्तविक स्वतंत्रता के लिए मनुष्य में आत्मसम्मान होना आवश्यक है।
पेरियार के लिए आत्मसम्मान केवल व्यक्तिगत आत्मविश्वास नहीं था। यह उस सामाजिक धारणा का सामूहिक प्रतिरोध था जिसके अनुसार कुछ मनुष्य जन्म से श्रेष्ठ और कुछ जन्म से हीन होते हैं। उत्पीड़ित जातियों के व्यक्ति को केवल बाहरी भेदभाव से ही मुक्त नहीं होना था; उसे उस आंतरिकीकृत हीनता से भी मुक्त होना था जिसे जाति-व्यवस्था उसके भीतर पैदा करती थी।
इसलिए आत्मसम्मान आंदोलन ने जातिसूचक नामों, अनुष्ठानिक पदानुक्रम, वंशानुगत प्रतिष्ठा और ऐसी सामाजिक प्रथाओं को चुनौती दी जो असमानता को प्रतीकात्मक रूप से पुनरुत्पादित करती थीं। आंदोलन ऐसी सामाजिक चेतना का निर्माण करना चाहता था जिसमें व्यक्ति की पहचान उसके जन्म या जाति से नहीं, बल्कि उसकी मानवता से निर्धारित हो।
इस प्रकार पेरियार का आंदोलन उन सुधारवादी दृष्टिकोणों से अलग था जो केवल व्यक्तिगत व्यवहार में परिवर्तन चाहते थे लेकिन सामाजिक पदानुक्रम को यथावत रखते थे। पेरियार के लिए मुक्ति का अर्थ चेतना और संस्थाओं—दोनों का परिवर्तन था।
पेरियार और अस्पृश्यता-विरोधी संघर्ष
1920 के दशक में त्रावणकोर के वैक्कम सत्याग्रह में पेरियार की भागीदारी जातिगत बहिष्कार के विरुद्ध उनके संघर्ष का महत्वपूर्ण उदाहरण है। यह आंदोलन वैक्कम मंदिर के आसपास की सार्वजनिक सड़कों पर उन समुदायों के आवागमन के अधिकार से जुड़ा था जिन्हें जाति के आधार पर प्रतिबंधित किया गया था।
इस संघर्ष का महत्व केवल किसी सड़क तक पहुँच के अधिकार तक सीमित नहीं था। इसके पीछे लोकतांत्रिक नागरिकता का एक मूल प्रश्न था—क्या सार्वजनिक स्थानों पर किसी व्यक्ति का अधिकार उसके जन्म और जाति के आधार पर निर्धारित किया जा सकता है?
पेरियार का उत्तर स्पष्ट था—सार्वजनिक संस्थाएँ और सार्वजनिक स्थान समान नागरिकता के आधार पर सभी के लिए उपलब्ध होने चाहिए।
यह सिद्धांत आज भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि जातिगत भेदभाव अक्सर रोजमर्रा के सामाजिक जीवन में सार्वजनिक स्थानों, विद्यालयों, जलस्रोतों, मंदिरों, आवासीय क्षेत्रों और स्थानीय संस्थाओं तक असमान पहुँच के रूप में प्रकट होता है। कानून द्वारा समानता की घोषणा तभी सार्थक होती है जब वह वास्तविक सामाजिक जीवन में समान पहुँच और सम्मान में बदलती है।
तर्कवाद और धार्मिक सत्ता की आलोचना
पेरियार की राजनीति की सबसे विशिष्ट विशेषताओं में से एक उनका कट्टर तर्कवाद था। वे उन धार्मिक परंपराओं और सामाजिक मान्यताओं पर प्रश्न उठाते थे जिनका इस्तेमाल सामाजिक असमानता को उचित ठहराने के लिए किया जाता था।
उनकी आलोचना विशेष रूप से उस सामाजिक व्यवस्था पर केंद्रित थी जिसे वे ब्राह्मणवादी वर्चस्व और जातिगत पदानुक्रम का वैचारिक आधार मानते थे। उनका तर्क था कि किसी धार्मिक परंपरा या सामाजिक प्रथा को केवल इसलिए स्वीकार नहीं किया जा सकता कि वह पुरानी है। उसे तर्क, मानव गरिमा और समानता की कसौटी पर परखा जाना चाहिए।
यह दृष्टिकोण पेरियार को अनेक अन्य सामाजिक सुधारकों से अलग करता है। उन्होंने धार्मिक परंपराओं की केवल पुनर्व्याख्या करने के बजाय उन धार्मिक दावों की वैधता पर ही प्रश्न उठाया जिन्हें वे जातिगत असमानता को बनाए रखने वाला मानते थे।
इस संदर्भ में उनका दृष्टिकोण आंबेडकर से भिन्न था। आंबेडकर ने हिंदू सामाजिक व्यवस्था की कठोर आलोचना की, लेकिन अंततः उन्होंने बौद्ध धर्म में एक वैकल्पिक नैतिक और सामाजिक आधार की तलाश की। पेरियार इसके विपरीत तर्कवाद और नास्तिकता की ओर अधिक निर्णायक रूप से आगे बढ़े।
फिर भी दोनों के बीच एक महत्वपूर्ण समानता थी—कोई भी धार्मिक या सांस्कृतिक सत्ता मानव गरिमा और समानता से ऊपर नहीं हो सकती।
शिक्षा मुक्ति का साधन
पेरियार के लिए शिक्षा मुक्ति का एक महत्वपूर्ण साधन थी, क्योंकि अज्ञानता inherited authority ( वंशागत सत्ता) और सामाजिक रूढ़ियों को चुनौती देने की क्षमता को सीमित करती है। लेकिन उनकी दृष्टि में शिक्षा केवल साक्षरता या रोजगार प्राप्त करने का माध्यम नहीं थी। शिक्षा को व्यक्ति में तर्क करने, प्रश्न उठाने और रूढ़ सामाजिक मान्यताओं को चुनौती देने की क्षमता विकसित करनी चाहिए।
उत्पीड़ित समुदायों के लिए शिक्षा विशेष रूप से महत्वपूर्ण थी, क्योंकि शिक्षा से ऐतिहासिक बहिष्कार ने उन्हें प्रशासन, पेशे और राजनीतिक सत्ता से भी दूर रखा था। इसलिए वंचित समुदायों के लिए शिक्षा के द्वार खोलना केवल कल्याणकारी नीति नहीं था; यह सामाजिक सत्ता के पुनर्वितरण का माध्यम था।
इस संदर्भ में पेरियार की शिक्षा संबंधी सोच आंबेडकर की उस धारणा से जुड़ती है जिसमें शिक्षा को सामाजिक मुक्ति की पहली शर्तों में माना गया। दोनों विचारकों के लिए ज्ञान केवल व्यक्तिगत उन्नति का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक शक्ति प्राप्त करने का माध्यम था।
प्रतिनिधित्व और सामाजिक न्याय
पेरियार ने यह समझ लिया था कि यदि सार्वजनिक संस्थाओं पर ऐतिहासिक रूप से विशेषाधिकार प्राप्त समूहों का वर्चस्व बना रहे, तो सामाजिक असमानता समाप्त नहीं हो सकती। इसलिए उन्होंने सामुदायिक प्रतिनिधित्व और ऐसी नीतियों का समर्थन किया जिनसे वंचित समुदायों की शिक्षा तथा सरकारी रोजगार में भागीदारी बढ़े।
यह विचार सकारात्मक भेदभाव के एक महत्वपूर्ण सिद्धांत की ओर संकेत करता है—औपचारिक समानता अपने आप वास्तविक समानता सुनिश्चित नहीं करती।
यदि एक समुदाय को पीढ़ियों तक शिक्षा और सरकारी रोजगार तक विशेष पहुँच मिली हो और दूसरे समुदायों को व्यवस्थित रूप से इससे वंचित रखा गया हो, तो दोनों को समान प्रतियोगिता में खड़ा कर देना ऐतिहासिक असमानता को समाप्त नहीं करता।
इसलिए प्रतिनिधित्व का प्रश्न केवल नौकरियों या शैक्षणिक अवसरों के वितरण का प्रश्न नहीं था। यह इस बात का प्रश्न था कि राज्य की संस्थाओं में किसकी उपस्थिति और किसकी आवाज़ होगी।
आज आरक्षण और सामाजिक न्याय की बहस में पेरियार का यह दृष्टिकोण विशेष रूप से प्रासंगिक है। आरक्षण को केवल सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक सीटों के वितरण तक सीमित करके देखना उसके व्यापक सामाजिक अर्थ को कम कर देता है। इसके मूल में शिक्षा, प्रशासन और निर्णय लेने वाली संस्थाओं में ऐतिहासिक रूप से वंचित समुदायों की भागीदारी का प्रश्न है।
पेरियार और महिला मुक्ति
पेरियार की सामाजिक मुक्ति की अवधारणा में महिला मुक्ति केंद्रीय स्थान रखती थी। वे समझते थे कि जाति-व्यवस्था केवल सामाजिक और धार्मिक संस्थाओं के माध्यम से नहीं, बल्कि विवाह, परिवार और लैंगिक संबंधों के माध्यम से भी पुनरुत्पादित होती है।
जाति की निरंतरता के लिए जातीय सीमाओं के भीतर विवाह अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसलिए महिलाओं के विवाह, यौनिकता और पारिवारिक जीवन पर नियंत्रण जाति-व्यवस्था के पुनरुत्पादन का महत्वपूर्ण माध्यम बन जाता है।
पेरियार ने बाल विवाह, दहेज, विधवा-उत्पीड़न, महिलाओं की शिक्षा पर प्रतिबंध और विवाह में पितृसत्तात्मक नियंत्रण का विरोध किया। वे महिलाओं की शिक्षा, संपत्ति, आर्थिक स्वतंत्रता और जीवनसाथी चुनने की स्वतंत्रता के समर्थक थे।
आत्मसम्मान विवाह इस विचार का व्यावहारिक रूप था। ऐसे विवाहों में ब्राह्मण पुरोहित की अनिवार्य भूमिका को अस्वीकार करते हुए विवाह में स्त्री-पुरुष की समानता और सहमति को महत्व दिया गया।
इस प्रकार पेरियार के लिए महिला मुक्ति जाति-विरोधी संघर्ष से अलग कोई स्वतंत्र मुद्दा नहीं थी। वे समझते थे कि जब तक परिवार और विवाह की पितृसत्तात्मक संरचनाएँ कायम रहेंगी, तब तक जाति की सामाजिक पुनरुत्पत्ति को पूरी तरह चुनौती नहीं दी जा सकती।
सामाजिक सत्ता का लोकतंत्रीकरण
पेरियार की राजनीति का गहरा अर्थ सामाजिक सत्ता के लोकतंत्रीकरण में निहित था। वे समझते थे कि यदि सामाजिक पदानुक्रम कायम रहे तो राजनीतिक लोकतंत्र गहरी असमानता के साथ सह-अस्तित्व में रह सकता है।
किसी व्यक्ति को मतदान का अधिकार प्राप्त हो सकता है, लेकिन सामाजिक जीवन में उसे हीन समझा जा सकता है। संविधान समानता की गारंटी दे सकता है, लेकिन शिक्षा और प्रशासन में पुराने विशेषाधिकार जारी रह सकते हैं। सरकार चुनाव के माध्यम से बन सकती है, लेकिन सत्ता और संसाधनों का सामाजिक वितरण असमान बना रह सकता है।
इसलिए पेरियार लोकतंत्र को केवल चुनावी व्यवस्था के रूप में नहीं देखते थे। लोकतंत्र को सामाजिक संबंधों को संगठित करने का सिद्धांत भी बनना चाहिए।
आज लोकतंत्र की गुणवत्ता का प्रश्न केवल चुनावों के संचालन से निर्धारित नहीं होता। शिक्षा, रोजगार, प्रतिनिधित्व, सामाजिक सम्मान, न्याय तक पहुँच और सार्वजनिक संस्थाओं में समान भागीदारी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की वास्तविक गुणवत्ता के महत्वपूर्ण संकेतक हैं।
पेरियार और द्रविड़ आंदोलन
पेरियार के विचारों ने तमिलनाडु के द्रविड़ आंदोलन के विकास पर गहरा प्रभाव डाला। इस आंदोलन ने सामाजिक न्याय की मांग को जाति-विरोध, भाषाई अधिकार, शिक्षा, प्रतिनिधित्व और सामाजिक समानता के प्रश्नों के साथ जोड़ा।
बाद के दशकों में द्रविड़ राजनीति ने तमिलनाडु में आरक्षण, शिक्षा और सामाजिक प्रतिनिधित्व से संबंधित नीतियों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हालांकि पेरियार की मूल सामाजिक-क्रांतिकारी विचारधारा और बाद में विकसित हुई चुनावी द्रविड़ राजनीति को पूरी तरह एक ही मान लेना उचित नहीं होगा। सामाजिक आंदोलनों और सत्ता में आने वाली राजनीतिक पार्टियों की कार्यशैली और सीमाएँ अलग होती हैं।
फिर भी तमिलनाडु में सामाजिक न्याय की राजनीति को समझने के लिए पेरियार की वैचारिक विरासत केंद्रीय महत्व रखती है।
पेरियार और आंबेडकर: मुक्ति के दो मार्ग
पेरियार और डॉ. आंबेडकर की तुलना भारत की आधुनिक जाति-विरोधी परंपरा को समझने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है।
दोनों ने जाति को अस्वीकार किया। दोनों ने वंशानुगत विशेषाधिकार का विरोध किया। दोनों ने शिक्षा और सामूहिक संगठन को महत्व दिया। दोनों ने वंचित समुदायों के प्रतिनिधित्व और संस्थागत भागीदारी को आवश्यक माना। दोनों के लिए महिला समानता सामाजिक परिवर्तन का महत्वपूर्ण हिस्सा थी।
फिर भी दोनों के बीच महत्वपूर्ण अंतर थे।
आंबेडकर ने संवैधानिक लोकतंत्र, मौलिक अधिकारों, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, विधि के शासन और संस्थागत सुरक्षा पर विशेष बल दिया। उनका बौद्ध धर्म की ओर जाना स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व पर आधारित एक वैकल्पिक नैतिक-सामाजिक व्यवस्था की खोज के रूप में समझा जा सकता है।
पेरियार ने दूसरी ओर तर्कवाद, आत्मसम्मान और धार्मिक-सांस्कृतिक सत्ता की आलोचना को अधिक केंद्रीय स्थान दिया। उनका जोर सामाजिक चेतना और पारंपरिक सत्ता-संरचनाओं के आमूल परिवर्तन पर था।
इसलिए दोनों की विचारधाराओं को समान मानने के बजाय उन्हें भारतीय सामाजिक मुक्ति की दो महत्वपूर्ण और परस्पर संवाद करती हुई धाराओं के रूप में देखना अधिक उपयोगी है। आंबेडकर संवैधानिक और राजनीतिक लोकतंत्र का सशक्त ढाँचा प्रदान करते हैं, जबकि पेरियार सामाजिक पदानुक्रम, सांस्कृतिक वर्चस्व और आंतरिकीकृत हीनता को चुनौती देने का अधिक उग्र सामाजिक कार्यक्रम प्रस्तुत करते हैं।
समकालीन संदर्भ में पेरियार की प्रासंगिकता
पेरियार के विचार आज भी प्रासंगिक हैं क्योंकि अस्पृश्यता के कानूनी उन्मूलन और संवैधानिक समानता के बावजूद जातिगत सामाजिक संबंध पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं। विवाह, सामाजिक नेटवर्क, संसाधनों तक पहुँच, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सामाजिक प्रतिष्ठा में जाति की भूमिका अभी भी दिखाई देती है।
इसी प्रकार लैंगिक असमानता जाति और वर्ग के साथ जुड़कर अनेक रूपों में सामने आती है। शिक्षा के विस्तार के बावजूद गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक समान पहुँच सुनिश्चित नहीं हुई है। राजनीतिक समानता के बावजूद संस्थागत सत्ता पर सामाजिक समूहों की समान पकड़ का प्रश्न बना हुआ है।
इस परिस्थिति में पेरियार का आत्मसम्मान का विचार विशेष महत्व रखता है। उत्पीड़ित समुदायों की मुक्ति के लिए केवल कानूनी सुरक्षा पर्याप्त नहीं है। उन्हें सामूहिक आत्मविश्वास, आलोचनात्मक चेतना, संगठन और संस्थागत शक्ति भी प्राप्त करनी होगी।
पेरियार का तर्कवाद भी समकालीन लोकतंत्र के लिए महत्वपूर्ण प्रश्न उठाता है। जब कोई परंपरा सामाजिक असमानता को उचित ठहराने लगे, तो क्या केवल उसकी प्राचीनता उसे वैध बना देती है? पेरियार का उत्तर था—नहीं। किसी भी परंपरा को मानव गरिमा, समानता और तर्क की कसौटी पर परखा जाना चाहिए।
निष्कर्ष
पेरियार का योगदान उत्पीड़ित वर्गों की मुक्ति के इतिहास में इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उन्होंने मुक्ति को केवल राजनीतिक अधिकारों या सीमित सामाजिक सुधारों का प्रश्न नहीं माना। उनके लिए मुक्ति का अर्थ उन सामाजिक संरचनाओं, विचारों और संस्थाओं का परिवर्तन था जो जन्म-आधारित असमानता को पुनरुत्पादित करती थीं।
आत्मसम्मान आंदोलन ने उत्पीड़ित समुदायों में नई सामाजिक चेतना विकसित करने का प्रयास किया। तर्कवाद ने उन धार्मिक और सांस्कृतिक अधिकारों को चुनौती दी जो असमानता को वैधता प्रदान करते थे। सामुदायिक प्रतिनिधित्व ने शिक्षा और प्रशासन में सामाजिक सत्ता के लोकतंत्रीकरण की दिशा दिखाई। महिला मुक्ति के कार्यक्रम ने यह स्पष्ट किया कि जाति और पितृसत्ता एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। अस्पृश्यता-विरोधी संघर्षों ने समान नागरिकता और सार्वजनिक स्थानों पर समान अधिकार के प्रश्न को सामने रखा।
पेरियार की सबसे स्थायी देन यह आग्रह है कि सामाजिक समानता के बिना राजनीतिक लोकतंत्र अधूरा है। उत्पीड़ित लोगों को केवल मौजूदा व्यवस्था में शामिल कर देना पर्याप्त नहीं है, यदि वही व्यवस्था उनकी अधीनता को लगातार पुनरुत्पादित करती रहे। मुक्ति के लिए उन्हें शिक्षा, आत्मसम्मान, संगठन और संस्थागत शक्ति हासिल करनी होगी।
इस अर्थ में पेरियार आधुनिक भारत की व्यापक जाति-विरोधी और मुक्ति की परंपरा—जोतिराव फुले, सावित्रीबाई फुले, नारायण गुरु और डॉ. आंबेडकर सहित—के एक महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। इन सभी के तरीके और दार्शनिक दृष्टिकोण समान नहीं थे, लेकिन उनकी मूल चिंता एक साझा लोकतांत्रिक सिद्धांत से जुड़ती है:
मनुष्य का मूल्य, सम्मान और अधिकार उसके जन्म से निर्धारित नहीं हो सकते।
पेरियार की विरासत इसलिए केवल तमिलनाडु के इतिहास का विषय नहीं है। वह हर उस सामाजिक व्यवस्था के सामने एक चुनौती है जो जन्म, जाति, लिंग या परंपरा के आधार पर मनुष्यों की असमानता को सामान्य या वैध मानती है। उनकी मुक्ति-दृष्टि का मूल आग्रह था कि केवल उत्पीड़ित व्यक्ति की स्थिति में सुधार नहीं, बल्कि उत्पीड़न को जन्म देने वाली सामाजिक व्यवस्था का लोकतांत्रिक रूपांतरण आवश्यक है।
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