“कॉकरोच” से नागरिक तक: जंतर-मंतर और लोकतांत्रिक साहस की पुनर्प्राप्ति
एस आर दारापुरी आई.पी.एस.(सेवानिवृत)
प्रस्तावना
जंतर-मंतर की घटनाओं का महत्व उस तात्कालिक राजनीतिक विवाद से कहीं अधिक है, जिसके संदर्भ में वे सामने आईं। प्रारंभ में यह घटना एक छात्र-प्रदर्शन के रूप में दिखाई दी, लेकिन धीरे-धीरे यह लोकतांत्रिक नागरिकता के व्यापक दावे में परिवर्तित हो गई। इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित अपने लेख “‘Cockroaches’ have shown us what it means to be courageous citizens — not subjects” में प्रताप भानु मेहता इस घटना को ऐसे समय में राजनीतिक साहस की अभिव्यक्ति के रूप में देखते हैं, जब नागरिकों के भीतर सत्ता से प्रश्न करने का भय गहराता जा सकता है।
मेहता के तर्क के केंद्र में “नागरिक” और “प्रजा” के बीच का मौलिक अंतर है। प्रजा से अपेक्षा की जाती है कि वह सत्ता का पालन करे; इसके विपरीत नागरिक अधिकारों, राजनीतिक स्वायत्तता और सत्ता से प्रश्न करने की वैध क्षमता से संपन्न होता है। लोकतंत्र केवल चुनावों के माध्यम से जीवित नहीं रह सकता। उसके लिए ऐसे नागरिकों की आवश्यकता होती है जो सरकार और सत्ता-संस्थाओं से प्रश्न करने का साहस रखें और जब शासन अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों को पूरा करने में विफल हो, तब जवाबदेही की मांग करें।
इस दृष्टि से जंतर-मंतर का आंदोलन एक बुनियादी प्रश्न उठाता है:
जब नागरिक सत्ता से प्रश्न करने से डरने लगते हैं, तो लोकतंत्र का क्या होता है?
और इसके विपरीत—
जब नागरिक अपने भय पर विजय प्राप्त कर सत्ता को चुनौती देते हैं, तो लोकतंत्र में क्या नई संभावनाएँ पैदा होती हैं?
जंतर-मंतर आंदोलन का महत्व इसी लोकतांत्रिक साहस की पुनर्प्राप्ति में निहित है।
“कॉकरोच” की राजनीति
प्रदर्शनकारियों के संदर्भ में प्रयुक्त “कॉकरोच” शब्द ने एक विडंबनापूर्ण राजनीतिक अर्थ ग्रहण कर लिया। प्रदर्शनकारियों को छोटा, नगण्य या अपमानित दिखाने वाला यह शब्द अंततः उनके लिए एक राजनीतिक पहचान और प्रतिरोध के प्रतीक में बदल गया।
यह परिवर्तन राजनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। जिन्हें नगण्य समझा गया, उन्होंने यह सिद्ध किया कि वे लोकतांत्रिक नागरिकता के लिए आवश्यक गुणों से संपन्न हैं—साहस, एकजुटता, राजनीतिक चेतना और सत्ता से जवाब मांगने की क्षमता।
इस प्रकार यह रूपक उलट गया। कथित “कॉकरोच” राजनीतिक कर्ता बन गए। जिन्हें महत्वहीन और शक्तिहीन समझा गया था, उन्होंने सार्वजनिक स्थान पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई, अपनी शिकायतों को सार्वजनिक किया और सत्ता से जवाबदेही की मांग की।
लोकतांत्रिक राजनीति की यही एक महत्वपूर्ण विशेषता है। सत्ता अक्सर असहमति व्यक्त करने वालों को अविवेकी, विघटनकारी या अवैध बताने का प्रयास करती है। लेकिन लोकतंत्र का मूल सिद्धांत यह है कि असहमति लोकतंत्र के बाहर की चीज नहीं है; असहमति स्वयं लोकतांत्रिक राजनीति का अभिन्न अंग है।
नागरिक बनाम प्रजा
मेहता के तर्क में सबसे महत्वपूर्ण वैचारिक अंतर नागरिक और प्रजा का है।
प्रजा सत्ता के अधीन होती है। नागरिक संविधान द्वारा निर्मित ऐसी राजनीतिक व्यवस्था का हिस्सा होता है, जिसमें उसे अधिकार, गरिमा और राजनीतिक सहभागिता प्राप्त होती है। यह केवल शब्दों का अंतर नहीं है। यह व्यक्ति और राज्य के बीच संबंध की बुनियादी प्रकृति का प्रश्न है।
एक अधिनायकवादी राजनीतिक संस्कृति में नागरिक धीरे-धीरे प्रजा में बदल सकता है। उससे प्रश्न करने के बजाय आज्ञापालन की अपेक्षा की जाती है; सहभागिता के बजाय निष्क्रिय स्वीकृति की; और जवाबदेही की मांग करने के बजाय सरकारी निर्णयों को स्वीकार करने की अपेक्षा की जाती है।
संवैधानिक लोकतंत्र इसके ठीक विपरीत संबंध की मांग करता है।
नागरिक केवल सरकारी योजनाओं का लाभार्थी या प्रत्येक कुछ वर्षों में मतदान करने वाला व्यक्ति नहीं है। वह निरंतर सार्वजनिक जीवन में भाग लेने वाला राजनीतिक व्यक्ति है। नागरिक को यह पूछने का अधिकार है—
- यह निर्णय क्यों लिया गया?
- सरकारी विफलता के लिए कौन जिम्मेदार है?
- क्या सार्वजनिक संस्थाएँ स्वतंत्र रूप से कार्य कर रही हैं?
- क्या नागरिकों के मौलिक अधिकारों का सम्मान हो रहा है?
- क्या पुलिस अपनी शक्ति का प्रयोग कानून के अनुसार कर रही है?
- क्या सरकार जनता के प्रति जवाबदेह है?
मेहता के अनुसार, जंतर-मंतर के प्रदर्शनकारियों ने सक्रिय नागरिकता की इसी अवधारणा को पुनः स्थापित किया।
राजनीतिक साहस की पुनर्प्राप्ति
जंतर-मंतर आंदोलन का सबसे गहरा महत्व राजनीतिक साहस की पुनर्प्राप्ति में निहित है।
भय राजनीतिक सत्ता के सबसे प्रभावी साधनों में से एक है। किसी सरकार को प्रत्येक आलोचक को प्रत्यक्ष रूप से दंडित करने की आवश्यकता नहीं होती। वह ऐसा वातावरण पैदा कर सकती है जिसमें लोग स्वयं बोलने, विरोध करने और सत्ता से प्रश्न करने से बचने लगें। जब नागरिक बोलने के संभावित परिणामों से भयभीत होने लगते हैं, तब लोकतांत्रिक संस्थाएँ औपचारिक रूप से मौजूद रहते हुए भी भीतर से कमजोर हो सकती हैं।
राजनीतिक साहस इस मनोवैज्ञानिक तंत्र को चुनौती देता है।
इसलिए प्रदर्शनकारियों का महत्व केवल इस बात में नहीं था कि उन्होंने किसी विशेष मंत्री या नीति का विरोध किया। उनकी उपस्थिति ने यह प्रदर्शित किया कि नागरिक अभी भी सार्वजनिक स्थान पर एकत्रित होकर सत्ता से प्रश्न कर सकते हैं।
यही कारण है कि शांतिपूर्ण विरोध लोकतंत्र के लिए इतना महत्वपूर्ण है। विरोध सरकार को याद दिलाता है कि राजनीतिक सत्ता स्थायी नहीं होती और उसकी वैधता संवैधानिक सीमाओं तथा लोकतांत्रिक सहमति पर निर्भर करती है।
राज्य के पास दंडात्मक और प्रशासनिक शक्ति हो सकती है, लेकिन उसकी राजनीतिक वैधता अंततः नागरिकों के प्रति जवाबदेही से आती है।
मंत्री की जवाबदेही
शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा इस संदर्भ में विशेष महत्व रखता है।
संसदीय लोकतंत्र में मंत्री केवल राजनीतिक प्रतिनिधि नहीं होते। वे संवैधानिक पद धारण करते हैं और उनके साथ सार्वजनिक उत्तरदायित्व जुड़ा होता है। मंत्रिस्तरीय जवाबदेही का सिद्धांत यह अपेक्षा करता है कि मंत्री अपने विभाग के कामकाज और उसके क्षेत्र में होने वाली गंभीर विफलताओं के लिए उत्तरदायी हों।
इसलिए किसी मंत्री का इस्तीफा केवल किसी व्यक्ति के राजनीतिक भविष्य का प्रश्न नहीं है। यह इस बड़े सवाल से जुड़ा है कि क्या भारतीय लोकतांत्रिक शासन-व्यवस्था में राजनीतिक जवाबदेही आज भी एक सार्थक सिद्धांत है?
जब मंत्री और सरकारें अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करने से बचती हैं, तो लोकतांत्रिक संस्थाएँ कमजोर होती हैं। इसके विपरीत, जब राजनीतिक सत्ता को अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करने के लिए बाध्य होना पड़ता है, तो नागरिकों को यह महत्वपूर्ण संदेश मिलता है कि सार्वजनिक पद का अर्थ सार्वजनिक जवाबदेही भी है।
इस अर्थ में जंतर-मंतर की घटना केवल किसी नीति या प्रशासनिक निर्णय के विरुद्ध संघर्ष नहीं थी। यह राजनीतिक उत्तरदायित्व के अर्थ पर संघर्ष भी थी।
उच्च शिक्षा और संस्थागत विफलता
यह आंदोलन भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था की गहरी समस्याओं की ओर भी ध्यान आकर्षित करता है।
छात्र राज्य को किसी अमूर्त संवैधानिक संस्था के रूप में नहीं, बल्कि विश्वविद्यालयों, परीक्षाओं, भर्ती प्रक्रियाओं, प्रशासनिक तंत्र और नियामक संस्थाओं के माध्यम से अनुभव करते हैं। जब ये संस्थाएँ विफल होती हैं, तो उसका सीधा प्रभाव छात्रों पर पड़ता है।
परीक्षाओं से जुड़ी समस्याएँ, संस्थागत स्वायत्तता, प्रशासनिक केंद्रीकरण, भ्रष्टाचार, वैचारिक हस्तक्षेप और सार्वजनिक निवेश की कमी इसलिए केवल प्रशासनिक मुद्दे नहीं रह जाते। वे व्यापक राजनीतिक प्रश्नों में बदल सकते हैं।
महत्वपूर्ण बात यह है कि ऐसी समस्याओं को केवल अलग-अलग प्रशासनिक शिकायतों के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। वे नागरिकों और सार्वजनिक संस्थाओं के बीच संबंध में मौजूद संरचनात्मक कमजोरियों को भी प्रकट कर सकती हैं।
विश्वविद्यालय विशेष रूप से ऐसे स्थान होने चाहिए जहाँ सत्ता पर प्रश्न करना प्रोत्साहित किया जाए, दंडित नहीं। शिक्षा का उद्देश्य आलोचनात्मक चिंतन करने वाले स्वतंत्र नागरिकों का निर्माण करना है। यदि शैक्षणिक संस्थाएँ भय और अनुरूपता पैदा करने लगें, तो उसका प्रभाव केवल विश्वविद्यालय तक सीमित नहीं रहता; लोकतंत्र स्वयं कमजोर होता है।
जब संस्थाएँ विफल होती हैं, तो नागरिक सड़क पर आते हैं
जंतर-मंतर की घटना का एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष संस्थागत लोकतंत्र और सड़क के लोकतंत्र के संबंध से जुड़ा है।
एक स्वस्थ लोकतंत्र में नागरिकों के पास शिकायतों और मांगों को उठाने के अनेक माध्यम होने चाहिए—संसद, न्यायपालिका, विश्वविद्यालय, नियामक संस्थाएँ, राजनीतिक दल, नागरिक समाज, मीडिया और प्रशासनिक संस्थाएँ।
जब ये तंत्र प्रभावी ढंग से काम करते हैं, तो सार्वजनिक प्रदर्शन लोकतांत्रिक सहभागिता के अनेक साधनों में से केवल एक होता है।
लेकिन जब संस्थागत रास्ते बंद, निष्क्रिय, असंवेदनशील या अविश्वसनीय हो जाते हैं, तो नागरिक सड़क पर उतरते हैं।
इसे स्वतः लोकतंत्र की विफलता नहीं कहा जाना चाहिए। शांतिपूर्ण सार्वजनिक विरोध वास्तव में इस बात का संकेत हो सकता है कि नागरिक लोकतांत्रिक जवाबदेही को पुनः स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं।
जब औपचारिक संस्थाएँ नागरिकों की शिकायतों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं करतीं, तब सड़क स्वयं एक लोकतांत्रिक मंच बन जाती है।
जंतर-मंतर भारतीय लोकतांत्रिक कल्पना में लंबे समय से इसी प्रकार के सार्वजनिक प्रतिरोध का प्रतीक रहा है। यह नागरिकों के उस अधिकार का प्रतीक है जिसके माध्यम से वे अपनी शिकायतों और मांगों को सार्वजनिक रूप से सामने ला सकते हैं।
पुलिस और असहमति का अधिकार
ऐसी परिस्थितियों में पुलिस की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है।
संवैधानिक लोकतंत्र में पुलिस का कार्य सरकार को राजनीतिक आलोचना से बचाना नहीं है। उसका दायित्व सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखते हुए नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करना है।
शांतिपूर्ण सभा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतांत्रिक व्यवस्था के केंद्रीय अधिकार हैं। सार्वजनिक व्यवस्था के वास्तविक और वैध कारणों से कुछ प्रतिबंध आवश्यक हो सकते हैं, लेकिन पुलिस शक्ति का प्रयोग कानूनसम्मत, आवश्यक और अनुपातिक होना चाहिए।
मूल प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि सरकार प्रदर्शनकारियों की मांगों से सहमत है या नहीं। मूल प्रश्न यह होना चाहिए कि प्रदर्शनकारियों के साथ संवैधानिक अधिकारों से संपन्न नागरिकों के रूप में व्यवहार किया जा रहा है या नहीं।
यदि शांतिपूर्ण असहमति का उत्तर अनावश्यक बल, भय या मनमाने प्रतिबंधों से दिया जाता है, तो नागरिक और प्रजा के बीच का अंतर धुंधला होने लगता है।
इस दृष्टि से जंतर-मंतर की घटनाएँ भारत में पुलिस शक्ति की प्रकृति और संवैधानिक लोकतंत्र के बीच संबंध पर एक बड़े विमर्श का हिस्सा बन जाती हैं।
एक आंबेडकरवादी व्याख्या
मेहता के तर्क का महत्व डॉ. बी. आर. आंबेडकर के विचारों के माध्यम से देखने पर और अधिक गहरा हो जाता है।
आंबेडकर के लिए लोकतंत्र केवल शासन की एक पद्धति नहीं था। वह मूलतः सामाजिक जीवन जीने की एक पद्धति था, जो स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व पर आधारित हो। केवल संवैधानिक संस्थाओं और कानूनी प्रावधानों से लोकतंत्र सुरक्षित नहीं रह सकता। उसके लिए लोकतांत्रिक चेतना से संपन्न नागरिकों और संस्थाओं की आवश्यकता होती है।
यहाँ आंबेडकर की संवैधानिक नैतिकता की अवधारणा विशेष रूप से प्रासंगिक हो जाती है।
संवैधानिक नैतिकता का अर्थ है कि नागरिक और संस्थाएँ संविधान द्वारा निर्धारित सीमाओं और मूल्यों का सम्मान करें। सरकारी पद पर बैठे व्यक्ति सरकारी शक्ति को अपनी निजी या दलगत संपत्ति नहीं समझ सकते। पुलिस नागरिकों को प्रजा नहीं मान सकती। मंत्री सार्वजनिक पद को असीमित राजनीतिक अधिकार नहीं समझ सकते। दूसरी ओर नागरिकों को भी असहमति के बावजूद दूसरों के अधिकारों और गरिमा का सम्मान करना चाहिए।
इस आंबेडकरवादी दृष्टिकोण से जंतर-मंतर का आंदोलन संवैधानिक नागरिकता की अभिव्यक्ति के रूप में देखा जा सकता है।
प्रदर्शनकारी केवल किसी प्रशासनिक निर्णय में परिवर्तन की मांग नहीं कर रहे थे। वे एक व्यापक सिद्धांत स्थापित कर रहे थे:
जनता उन लोगों की प्रजा नहीं है जो अस्थायी रूप से सरकारी पदों पर बैठे हैं। सत्ता का प्रयोग संविधान की सीमाओं के भीतर होना चाहिए और सरकार अंततः जनता के प्रति जवाबदेह है।
लोकतंत्र के लिए बंधुत्व आवश्यक है
मेहता के तर्क का एक और महत्वपूर्ण आंबेडकरवादी आयाम बंधुत्व है।
राजनीतिक लोकतंत्र लंबे समय तक ऐसी सामाजिक व्यवस्था में जीवित नहीं रह सकता जहाँ नागरिकों को शासक और शासित, श्रेष्ठ और हीन, शक्तिशाली और कमजोर जैसी श्रेणियों में बाँट दिया जाए।
बंधुत्व का अर्थ है कि प्रत्येक नागरिक दूसरे नागरिक की समान मानवीय और नागरिक गरिमा को स्वीकार करे।
प्रदर्शनकारियों के लिए अपमानजनक या अमानवीय भाषा का प्रयोग इसी कारण गंभीर महत्व रखता है। किसी नागरिक को उसकी राजनीतिक असहमति के कारण अमानवीय बनाना लोकतांत्रिक समानता के सिद्धांत को कमजोर करता है।
लोकतंत्र में असहमति हो सकती है, लेकिन असहमति का अर्थ अमानवीकरण नहीं हो सकता।
राजनीतिक विरोधियों की आलोचना की जा सकती है, उन्हें चुनौती दी जा सकती है और चुनाव में पराजित किया जा सकता है, लेकिन उनकी नागरिक गरिमा समाप्त नहीं की जा सकती।
इस दृष्टि से “कॉकरोच” शब्द का राजनीतिक रूपांतरण एक व्यापक लोकतांत्रिक शिक्षा देता है:
जिन्हें राजनीतिक रूप से हाशिये पर धकेला जाता है, वे लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के संघर्ष में केंद्रीय भूमिका निभा सकते हैं।
एक आंदोलन की सीमाएँ
फिर भी जंतर-मंतर की घटना का रोमानीकरण नहीं किया जाना चाहिए।
किसी मंत्री का इस्तीफा, किसी आंदोलन की तात्कालिक सफलता या सरकार का अस्थायी रूप से पीछे हटना अपने आप में लोकतांत्रिक संस्थाओं को पुनर्जीवित नहीं करता। जिन गहरी समस्याओं ने आंदोलन को जन्म दिया, वे बनी रह सकती हैं।
लोकतंत्र की वास्तविक परीक्षा इस बात में है कि क्या इसके बाद संस्थाएँ अधिक जवाबदेह, पारदर्शी और संवेदनशील बनती हैं।
यह खतरा भी रहता है कि सरकारें संरचनात्मक समस्याओं का समाधान किए बिना अलग-अलग आंदोलनों को अस्थायी रूप से शांत कर दें। इसलिए लोकतांत्रिक आंदोलन को तत्काल राजनीतिक विजय से आगे बढ़कर यह प्रश्न उठाना चाहिए कि क्या संस्थागत व्यवस्था स्वयं अधिक लोकतांत्रिक बन रही है।
प्रश्न केवल यह नहीं है— “क्या प्रदर्शनकारी जीत गए?”
बड़ा प्रश्न यह है— “क्या नागरिकों के विरोध के परिणामस्वरूप संस्थाएँ अधिक लोकतांत्रिक बनीं?”
गणराज्य की पुनर्प्राप्ति
इस अर्थ में जंतर-मंतर आंदोलन को गणराज्य की पुनर्प्राप्ति के व्यापक संघर्ष के रूप में देखा जा सकता है।
भारतीय संविधान की प्रस्तावना “हम भारत के लोग” से शुरू होती है। संवैधानिक लोकतंत्र में संप्रभुता केवल वर्तमान सरकार की निजी संपत्ति नहीं होती। सरकार संविधान की सीमाओं के भीतर जनता से प्राप्त अधिकार का प्रयोग करती है।
यह अंतर अत्यंत महत्वपूर्ण है।
चुनाव सरकार को शासन करने का अधिकार देते हैं, लेकिन असीमित अधिकार नहीं। लोकतांत्रिक वैधता लगातार जवाबदेही, पारदर्शिता, न्यायिक समीक्षा, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सार्वजनिक आलोचना और नागरिक सहभागिता के माध्यम से परखी जाती है।
इसलिए चुनावों के बीच भी नागरिक राजनीतिक रूप से प्रासंगिक बने रहते हैं।
यही कारण है कि सार्वजनिक विरोध महत्वपूर्ण है।
जब नागरिक शांतिपूर्ण ढंग से सरकार की नीतियों या कार्यप्रणाली को चुनौती देते हैं, तो वे आवश्यक रूप से गणराज्य को कमजोर नहीं कर रहे होते। वे संभवतः गणराज्य को उसकी संवैधानिक बुनियाद की याद दिला रहे होते हैं।
निष्कर्ष
प्रताप भानु मेहता की जंतर-मंतर की व्याख्या समकालीन भारतीय लोकतंत्र को समझने का एक महत्वपूर्ण दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है। इस आंदोलन का महत्व केवल किसी मंत्री, नीति या प्रशासनिक विफलता के विवाद में नहीं है। इसका गहरा महत्व उन नागरिकों के उभरने में है जिन्होंने चुप रहने से इनकार किया।
“कॉकरोच” से “साहसी नागरिक” बनने का रूपांतरण एक व्यापक लोकतांत्रिक परिवर्तन का प्रतीक है। जिन्हें नगण्य समझा गया, उन्होंने अपनी राजनीतिक क्षमता प्रदर्शित की। जो भयभीत होकर चुप रह सकते थे, वे सार्वजनिक स्थान पर आए। जो सरकारी सत्ता को स्वीकार कर सकते थे, उन्होंने जवाबदेही की मांग की।
इसलिए नागरिक और प्रजा के बीच का अंतर इस पूरे प्रसंग का केंद्रीय सबक है।
प्रजा पूछती है—शासक क्या अनुमति देता है।
नागरिक पूछता है—संविधान मुझे क्या अधिकार देता है।
प्रजा सत्ता से डरती है।
नागरिक सत्ता को जवाबदेह बनाता है।
प्रजा आज्ञापालन करती है।
नागरिक लोकतांत्रिक सहभागिता करता है।
भारतीय लोकतंत्र का भविष्य काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगा कि इन दोनों राजनीतिक पहचानों में से कौन-सी अधिक प्रभावशाली बनती है।
इस दृष्टि से जंतर-मंतर केवल एक विरोध-प्रदर्शन नहीं है। यह नागरिकता के अर्थ को लेकर चल रहे संघर्ष का प्रतीक है। इसकी सबसे स्थायी देन शायद यह स्मरण है कि लोकतंत्र के लिए केवल वैधता का दावा करने वाली सरकारें पर्याप्त नहीं हैं। लोकतंत्र के लिए ऐसे नागरिक भी आवश्यक हैं जो सरकारों को संविधान के प्रति जवाबदेह बनाए रखने का साहस रखते हों।
आंबेडकरवादी दृष्टि से देखा जाए तो ऐसा साहस लोकतंत्र के विरुद्ध विद्रोह नहीं है।
वह स्वयं लोकतंत्र की एक आवश्यक शर्त है।
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