भारत को ‘निर्वाचित निरंकुशता’ के रूप में क्यों आंका गया है?
एस आर दारापुरी आईपीएस (से. नि.)
भारत को लंबे समय तक विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में सम्मान प्राप्त रहा है। 1947 में स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद से देश ने नियमित चुनावों, शांतिपूर्ण सत्ता-हस्तांतरण, सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार तथा लोकतांत्रिक सिद्धांतों पर आधारित संवैधानिक व्यवस्था को बनाए रखा है। किंतु हाल के वर्षों में कई अंतरराष्ट्रीय लोकतंत्र-अध्ययन संस्थाओं, विशेष रूप से Varieties of Democracy Institute (वी-डेम) ने भारत को “निर्वाचित निरंकुशता” (Electoral Autocracy) की श्रेणी में रखा है। इस आकलन ने भारत और विश्व स्तर पर व्यापक बहस को जन्म दिया है। जहाँ सरकार के समर्थक इस वर्गीकरण को पक्षपातपूर्ण और तथ्यहीन मानते हैं, वहीं आलोचकों का तर्क है कि यह भारतीय लोकतंत्र की गुणवत्ता में आई गिरावट को दर्शाता है।
निर्वाचित निरंकुशता ऐसी राजनीतिक व्यवस्था को कहा जाता है जिसमें चुनाव तो नियमित रूप से होते हैं और विपक्षी दलों को चुनाव लड़ने की अनुमति भी होती है, किंतु लोकतांत्रिक स्वतंत्रताओं तथा कार्यपालिका पर नियंत्रण रखने वाली संस्थाओं की प्रभावशीलता कमजोर हो जाती है। ऐसी व्यवस्था में केवल चुनावों का होना लोकतंत्र की गारंटी नहीं माना जाता, क्योंकि राजनीतिक वातावरण पूरी तरह स्वतंत्र और निष्पक्ष नहीं रह जाता। अतः भारत को निर्वाचित निरंकुशता कहने का अर्थ यह नहीं है कि यहाँ चुनाव नहीं होते, बल्कि यह लोकतंत्र के व्यापक वातावरण के बारे में चिंता व्यक्त करता है।
भारत के इस अवमूल्यन का एक प्रमुख कारण मीडिया की स्वतंत्रता में कथित गिरावट को माना जाता है। स्वतंत्र और निष्पक्ष मीडिया लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है, क्योंकि वह सरकार को जवाबदेह बनाता है और नागरिकों को विविध स्रोतों से जानकारी उपलब्ध कराता है। आलोचकों का कहना है कि पत्रकारों और मीडिया संस्थानों पर बढ़ते राजनीतिक तथा आर्थिक दबावों के कारण स्वतंत्र पत्रकारिता का दायरा सिकुड़ा है। मुख्यधारा के अनेक मीडिया संस्थानों को सरकार के प्रति सहानुभूतिपूर्ण माना जाता है, जबकि सरकार की आलोचना करने वाले कुछ पत्रकारों को कानूनी कार्रवाइयों, जांचों अथवा उत्पीड़न का सामना करना पड़ा है। प्रेस स्वतंत्रता की निगरानी करने वाले अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने भी इन कारणों से भारत की रैंकिंग में गिरावट दर्ज की है।
दूसरा महत्वपूर्ण कारण नागरिक समाज (Civil Society) के लिए उपलब्ध लोकतांत्रिक स्थान का सिकुड़ना है। गैर-सरकारी संगठन, मानवाधिकार समूह और सामाजिक संगठन लोकतंत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं क्योंकि वे वंचित वर्गों की आवाज़ को सामने लाते हैं और राज्य की गतिविधियों की निगरानी करते हैं। हाल के वर्षों में कई संगठनों को विदेशी वित्तपोषण, पंजीकरण और संचालन संबंधी प्रतिबंधों का सामना करना पड़ा है। आलोचकों का मत है कि इन कदमों ने नागरिक समाज की स्वतंत्र कार्यक्षमता को सीमित किया है और लोकतांत्रिक निगरानी की एक महत्वपूर्ण व्यवस्था को कमजोर किया है।
राजनीतिक विपक्ष और असहमति के प्रति व्यवहार भी चिंता का विषय रहा है। लोकतंत्र केवल विपक्षी दलों के अस्तित्व तक सीमित नहीं होता, बल्कि उनके स्वतंत्र और प्रभावी ढंग से कार्य करने की क्षमता पर भी निर्भर करता है। आलोचकों का आरोप है कि जांच एजेंसियों और कुछ कानूनी प्रावधानों का उपयोग विपक्षी नेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और आंदोलनकारियों के विरुद्ध बढ़ा है। राष्ट्रीय सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था और मानहानि से संबंधित कानूनों के उपयोग को भी असहमति पर अंकुश लगाने के रूप में देखा गया है। यद्यपि सरकारें इन कार्रवाइयों को कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक बताती हैं, किंतु आलोचक इन्हें राजनीतिक प्रतिस्पर्धा को असमान बनाने वाला मानते हैं।
लोकतांत्रिक संस्थाओं की कार्यप्रणाली को लेकर भी प्रश्न उठाए गए हैं। न्यायपालिका, निर्वाचन आयोग, संसद और अन्य नियामक संस्थाओं का उद्देश्य कार्यपालिका की शक्ति पर नियंत्रण बनाए रखना होता है। कुछ विद्वानों और लोकतंत्र-अध्ययन संस्थाओं का मत है कि इन संस्थाओं की स्वतंत्रता और प्रभावशीलता में कमी आई है। संसद में सीमित बहस, कार्यपालिका की बढ़ती शक्तियाँ और कुछ संस्थाओं द्वारा सरकारी निर्णयों को चुनौती देने में कथित हिचकिचाहट को इस संदर्भ में उद्धृत किया जाता है। इन कारणों ने भी भारत की लोकतांत्रिक रैंकिंग को प्रभावित किया है।
अल्पसंख्यक अधिकारों और सामाजिक बहुलतावाद का प्रश्न भी इस बहस का महत्वपूर्ण पक्ष है। भारत एक बहुधार्मिक, बहुभाषी और बहुजातीय समाज है। आलोचकों का तर्क है कि बढ़ती बहुसंख्यकवादी राजनीति ने धार्मिक और सामाजिक अल्पसंख्यकों के समक्ष नई चुनौतियाँ खड़ी की हैं, जिससे सामाजिक ध्रुवीकरण बढ़ा है। सांप्रदायिक तनाव, घृणा-भाषण और भेदभाव की घटनाओं को लोकतांत्रिक समावेशन में कमी के संकेत के रूप में देखा जाता है। लोकतंत्र के अनेक विद्वानों के अनुसार अल्पसंख्यकों के अधिकारों की सुरक्षा लोकतंत्र का मूल तत्व है और इसमें किसी भी प्रकार की कमी लोकतांत्रिक गुणवत्ता को प्रभावित करती है।
हालाँकि भारत को निर्वाचित निरंकुशता कहे जाने का तीव्र विरोध भी होता है। सरकार के समर्थकों का तर्क है कि भारत में आज भी नियमित, विशाल और अत्यंत प्रतिस्पर्धी चुनाव होते हैं जिनमें करोड़ों मतदाता भाग लेते हैं। विपक्षी दल अनेक राज्यों में सत्ता में हैं और महत्वपूर्ण चुनावों में विजय भी प्राप्त करते हैं। वे यह भी इंगित करते हैं कि न्यायालय नियमित रूप से सरकारी निर्णयों की समीक्षा करते हैं और नागरिकों को सरकार की आलोचना करने की पर्याप्त स्वतंत्रता प्राप्त है। इसके अतिरिक्त, लोकतंत्र सूचकांकों की आलोचना करने वाले विद्वानों का कहना है कि ऐसे आकलन अक्सर विशेषज्ञों की व्यक्तिपरक धारणाओं पर आधारित होते हैं और उनमें वैचारिक पक्षपात की संभावना रहती है।
जो लोग इस वर्गीकरण को अस्वीकार करते हैं, वे भारत की संघीय संरचना, सक्रिय राजनीतिक प्रतिस्पर्धा, न्यायपालिका की स्वतंत्रता और व्यापक जनभागीदारी को लोकतंत्र की मजबूती का प्रमाण मानते हैं। उनका तर्क है कि जिस देश में सत्तारूढ़ दल राज्यों में चुनाव हार सकते हैं और जहाँ सरकारों को न्यायिक तथा राजनीतिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, उसे निरंकुश कहना उचित नहीं है।
निष्कर्ष
भारत को निर्वाचित निरंकुशता के रूप में वर्गीकृत करने पर चल रही बहस वास्तव में भारतीय लोकतंत्र की स्थिति के विभिन्न आकलनों को प्रतिबिंबित करती है। जहाँ अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षक मीडिया की स्वतंत्रता, नागरिक समाज, संस्थागत स्वायत्तता, राजनीतिक असहमति और अल्पसंख्यक अधिकारों से संबंधित चिंताओं को रेखांकित करते हैं, वहीं सरकार के समर्थक चुनावों की निरंतरता, राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की मजबूती पर बल देते हैं।
अंततः यह विवाद लोकतंत्र की दो अवधारणाओं के बीच अंतर को उजागर करता है—एक ओर लोकतंत्र केवल चुनावों की व्यवस्था है, जबकि दूसरी ओर वह नागरिक स्वतंत्रताओं, संस्थागत नियंत्रणों, राजनीतिक बहुलतावाद और कानून के शासन पर आधारित व्यापक व्यवस्था है। भारतीय लोकतंत्र का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि इन लोकतांत्रिक मूल्यों और संस्थाओं को किस सीमा तक संरक्षित और सुदृढ़ किया जाता है।
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