नव-बौद्धों को जाति जनगणना 2027 में अपनी जाति क्यों पंजीकृत करानी चाहिए?
एस आर दारापुरी आईपीएस (से. नि.)
भारत में नव-बौद्धों (Neo-Buddhists) से यह अपेक्षा की जा रही है कि वे प्रस्तावित जाति जनगणना 2027 में अपनी धर्म पहचान “बौद्ध” के साथ-साथ अपनी मूल अनुसूचित जाति (SC) पहचान भी दर्ज कराएँ, ताकि उन्हें अनुसूचित जातियों को प्राप्त संवैधानिक आरक्षण और अन्य रियायतों का लाभ मिलता रहे।
यह प्रश्न विशेष रूप से उन दलित समुदायों से जुड़ा है जिन्होंने डॉ. B. R. Ambedkar के नेतृत्व में 1956 के बाद बौद्ध धर्म स्वीकार किया था।
1. अनुसूचित जाति के लाभ संविधान से जुड़े हैं
भारत के संविधान के अंतर्गत “अनुसूचित जाति” की मान्यता केवल सामाजिक उत्पीड़न के इतिहास पर आधारित नहीं है, बल्कि यह एक कानूनी और संवैधानिक श्रेणी भी है।
1950 के राष्ट्रपति आदेश (Constitution Scheduled Castes Order, 1950) में प्रारम्भ में केवल हिन्दुओं को अनुसूचित जाति का दर्जा दिया गया था। बाद में यह दर्जा 1956 में सिखों को तथा 1990 में बौद्धों को भी प्रदान किया गया।
इस प्रकार जो दलित समुदाय बौद्ध बने, वे अनुसूचित जाति के संवैधानिक अधिकारों से वंचित नहीं हुए।
इसलिए नव-बौद्धों को अपनी मूल अनुसूचित जाति की पहचान बनाए रखना आवश्यक माना जाता है, क्योंकि आरक्षण और अन्य सुविधाएँ उसी आधार पर प्रदान की जाती हैं।
2. केवल “बौद्ध” लिख देने से आरक्षण संबंधी समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं
यदि कोई व्यक्ति जनगणना में केवल “बौद्ध” लिखे और अपनी मूल जाति का उल्लेख न करे, तो सरकारी अभिलेखों में उसे सामान्य बौद्ध समुदाय के रूप में दर्ज किया जा सकता है।
इससे निम्न क्षेत्रों में कठिनाइयाँ उत्पन्न हो सकती हैं:
आरक्षण, छात्रवृत्तियाँ, सरकारी नौकरियों में प्रतिनिधित्व, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, कल्याणकारी योजनाएँ तथा बजटीय आवंटन।
इसी कारण अनेक आंबेडकरवादी संगठनों का मत है कि नव-बौद्धों को धर्म के रूप में “बौद्ध” तथा सामाजिक श्रेणी के रूप में अपनी मूल अनुसूचित जाति दोनों दर्ज करनी चाहिए।
3. जाति जनगणना भविष्य की नीतियों को प्रभावित करती है
जाति जनगणना केवल सांख्यिकीय अभ्यास नहीं होती, बल्कि उसके आधार पर भविष्य की नीतियाँ निर्धारित होती हैं। उदाहरण के लिए:
आरक्षण का स्वरूप, सामाजिक न्याय योजनाएँ, राजनीतिक प्रतिनिधित्व तथा कल्याणकारी कार्यक्रमों का वितरण।
यदि नव-बौद्ध अनुसूचित जाति के रूप में दर्ज नहीं होंगे, तो अनुसूचित जातियों की वास्तविक जनसंख्या कम दिखाई दे सकती है। इससे भविष्य में उनके अधिकारों और हिस्सेदारी पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
4. बौद्ध दर्शन और संवैधानिक व्यवस्था का अंतर्विरोध
यह स्थिति एक गहरे वैचारिक विरोधाभास को भी प्रकट करती है।
बौद्ध धर्म जाति व्यवस्था को अस्वीकार करता है। डॉ. आंबेडकर ने भी बौद्ध धर्म को इसलिए स्वीकार किया था ताकि दलित समाज जातिगत अपमान और असमानता से मुक्त हो सके।
किन्तु भारतीय राज्य की आरक्षण व्यवस्था अभी भी जाति-आधारित ऐतिहासिक उत्पीड़न को आधार बनाकर चलती है। इसलिए नव-बौद्धों के सामने एक द्वंद्व उपस्थित होता है:
आध्यात्मिक रूप से जाति का त्याग किन्तु संवैधानिक अधिकारों की रक्षा हेतु कानूनी रूप से जाति पहचान बनाए रखना।
अनेक आंबेडकरवादी विचारकों के अनुसार:
जाति एक सामाजिक बुराई है लेकिन सामाजिक न्याय के लिए जाति-आधारित संवैधानिक संरक्षण अभी भी आवश्यक है।
5. 2027 की जाति जनगणना के संदर्भ में यह प्रश्न क्यों महत्वपूर्ण हुआ?
प्रस्तावित 2027 की जनगणना में विस्तृत जातीय आँकड़े शामिल किए जाने की संभावना है। इसके कारण यह बहस पुनः तीव्र हो गई है कि:
धर्म परिवर्तन के बाद दलित पहचान का स्वरूप क्या होगा तथा आरक्षण संबंधी अधिकार कैसे सुरक्षित रहेंगे।
नव-बौद्ध समुदायों की चिंता यह है कि यदि इस जनगणना में उनकी अनुसूचित जाति पहचान स्पष्ट रूप से दर्ज नहीं हुई, तो भविष्य में उनके संवैधानिक अधिकारों पर प्रश्नचिह्न खड़े किए जा सकते हैं।
निष्कर्ष
अतः नव-बौद्धों से जाति जनगणना 2027 में अपनी जाति दर्ज कराने की अपेक्षा इसलिए की जा रही है क्योंकि भारत की वर्तमान संवैधानिक और आरक्षण व्यवस्था अभी भी अनुसूचित जाति की कानूनी पहचान पर आधारित है।
यह बौद्ध धर्म द्वारा जाति की स्वीकृति नहीं है, बल्कि सामाजिक न्याय और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए एक व्यावहारिक आवश्यकता मानी जा रही है।
इस प्रकार नव-बौद्ध समुदाय नैतिक और आध्यात्मिक स्तर पर जाति का विरोध करता है किन्तु संवैधानिक सुरक्षा के लिए कानूनी रूप से अपनी जातिगत पहचान बनाए रखने को बाध्य है।
यही आधुनिक भारत की सामाजिक न्याय व्यवस्था का एक गम्भीर और ऐतिहासिक विरोधाभास है।
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