सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और भारतीय राजनीति का भविष्य : भाजपा की चुनावी रणनीति के प्रभाव का आकलन
एस आर दारापुरी आई.पी.एस. (से.नि.)
हाल के चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) द्वारा अपनाई गई साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति का भारत के भविष्य के राजनीतिक परिदृश्य पर गहरा और दूरगामी प्रभाव पड़ने की संभावना है। यह प्रभाव एकतरफा नहीं होगा। एक ओर यह बहुसंख्यकवादी राजनीति को मजबूत कर सकता है, वहीं दूसरी ओर इसके विरुद्ध सामाजिक प्रतिरोध, वैकल्पिक राजनीतिक गठबंधन तथा लोकतांत्रिक पुनर्संरचना की प्रक्रियाएँ भी तेज हो सकती हैं।
हाल के चुनावों ने संकेत दिया है कि धर्म अब भारतीय चुनावी राजनीति का केंद्रीय आधार बनता जा रहा है। विशेष रूप से असम, पश्चिम बंगाल और उत्तर भारत के अनेक क्षेत्रों में हिंदू-मुस्लिम मतदान विभाजन अधिक स्पष्ट दिखाई दिया है। इस प्रवृत्ति के भारत की लोकतांत्रिक संरचना, धर्मनिरपेक्षता तथा सामाजिक संबंधों पर व्यापक प्रभाव पड़ सकते हैं।
1. बहुसंख्यकवादी राष्ट्रवाद का सुदृढ़ीकरण
भाजपा ने हाल के वर्षों में कल्याणकारी योजनाओं, राष्ट्रवाद और हिंदुत्व की राजनीति को एक साथ जोड़कर एक व्यापक राजनीतिक विमर्श निर्मित किया है। इससे भारत को एक धर्मनिरपेक्ष गणराज्य के बजाय एक “हिंदू राष्ट्र-सभ्यता” के रूप में प्रस्तुत करने की प्रवृत्ति को वैचारिक वैधता मिल सकती है।
यदि यह प्रवृत्ति आगे बढ़ती है, तो—
- चुनावी राजनीति नीति-आधारित होने के बजाय पहचान-आधारित होती जाएगी;
- मंदिर, धार्मिक पहचान, जनसंख्या, धर्मांतरण और समान नागरिक संहिता जैसे मुद्दे चुनावी विमर्श पर हावी रहेंगे;
- राजनीतिक दलों की वैधता का निर्धारण उनके “हिंदू हितों” के प्रति कथित समर्पण से होने लगेगा।
इस प्रकार हिंदुत्व केवल चुनावी रणनीति नहीं बल्कि राज्य की दीर्घकालिक वैचारिक दिशा बन सकता है।
2. संवैधानिक धर्मनिरपेक्षता का क्षरण
भारतीय संविधान सभी नागरिकों के लिए समानता और धर्मनिरपेक्षता की गारंटी देता है। किंतु निरंतर साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण से—
- अल्पसंख्यकों का राज्य संस्थाओं पर विश्वास कम हो सकता है;
- सार्वजनिक विमर्श की निष्पक्षता कमजोर हो सकती है;
- तथा समान नागरिकता की अवधारणा प्रभावित हो सकती है।
कई राजनीतिक विश्लेषकों का मत है कि भारत “सहमति आधारित धर्मनिरपेक्षता” से “प्रतिस्पर्धी साम्प्रदायिकता” की ओर बढ़ रहा है, जहाँ विपक्षी दल भी बहुसंख्यकवादी भावनाओं के दबाव में अपनी राजनीति को ढालने लगते हैं।
इसके परिणामस्वरूप—
- अल्पसंख्यकों का प्रतीकात्मक बहिष्कार,
- मुस्लिम राजनीतिक प्रतिनिधित्व में कमी,
- तथा शिक्षा, आवास और रोजगार में सामाजिक पृथक्करण बढ़ सकता है।
3. विपक्षी शक्तियों की प्रतिरोधात्मक लामबंदी
साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण का एक दूसरा परिणाम प्रतिरोधी राजनीतिक गठबंधनों के रूप में भी सामने आ सकता है। 2024 के लोकसभा चुनावों ने संकेत दिया कि आक्रामक हिंदुत्व राजनीति की भी सीमाएँ हैं, विशेषकर वहाँ जहाँ बेरोजगारी, सामाजिक न्याय, कृषि संकट या क्षेत्रीय अस्मिता अधिक महत्वपूर्ण मुद्दे बन जाते हैं।
भविष्य में निम्नलिखित प्रवृत्तियाँ उभर सकती हैं—
- भाजपा विरोधी व्यापक गठबंधन,
- मंडल राजनीति और सामाजिक न्याय आंदोलनों का पुनरुत्थान,
- क्षेत्रीय दलों की भूमिका में वृद्धि,
- तथा दलित–पिछड़ा–अल्पसंख्यक राजनीतिक एकता का विस्तार।
विशेषकर उत्तर प्रदेश, बिहार, तमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों में जाति और सामाजिक न्याय की राजनीति साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण को चुनौती दे सकती है।
4. चुनावी प्रतिस्पर्धा का रूपांतरण
भारतीय राजनीति अधिक स्पष्ट रूप से दो ध्रुवों में विभाजित हो सकती है—
- एक ओर हिंदुत्व समर्थक शक्तियाँ,
- दूसरी ओर बहुलतावादी और संवैधानिक राजनीति का समर्थन करने वाले दल।
इससे चुनावी राजनीति अधिक भावनात्मक, व्यक्तिनिष्ठ और मीडिया-निर्भर बन सकती है। चुनाव विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक असमानता जैसे प्रश्नों से हटकर सांस्कृतिक और धार्मिक संघर्षों पर केंद्रित हो सकते हैं।
5. सामाजिक विखंडन और लोकतांत्रिक तनाव
दीर्घकालिक दृष्टि से सबसे गंभीर प्रभाव सामाजिक अविश्वास का संस्थागत रूप ले लेना हो सकता है।
लगातार साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण से—
- समुदायों के बीच दूरी बढ़ सकती है,
- घृणा-आधारित डिजिटल प्रचार मजबूत हो सकता है,
- भीड़ हिंसा और सामाजिक बहिष्कार की घटनाएँ बढ़ सकती हैं,
- तथा शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में “गेट्टोकरण” (ghettoisation) तेज हो सकता है।
ऐसी परिस्थितियाँ लोकतांत्रिक संस्कृति को कमजोर कर सकती हैं, भले ही चुनाव नियमित रूप से होते रहें।
6. “प्रतिध्रुवीकरण” (Reverse Polarisation) की राजनीति
हाल के चुनावों में एक नई प्रवृत्ति यह भी दिखाई दी है कि—
- मुस्लिम मतदाता बड़े पैमाने पर भाजपा विरोधी दलों के पीछे संगठित हो रहे हैं,
- जबकि हिंदू मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग भाजपा के पक्ष में एकजुट हो रहा है।
यदि यह प्रवृत्ति और मजबूत होती है, तो भारत की चुनावी राजनीति जातीय या सांप्रदायिक मतदान प्रणाली जैसी बन सकती है, जहाँ नागरिकता की तुलना में धार्मिक पहचान अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है।
यह स्वतंत्रता-उत्तर भारतीय राजनीति के चरित्र में एक ऐतिहासिक परिवर्तन होगा।
7. ध्रुवीकरण की सीमाएँ
फिर भी यह मान लेना गलत होगा कि साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण सर्वशक्तिमान है।
भाजपा को समर्थन केवल धार्मिक मुद्दों के कारण नहीं मिलता। अनेक मतदाता—
- कल्याणकारी योजनाओं,
- मजबूत नेतृत्व की छवि,
- बुनियादी ढाँचे के विकास,
- राष्ट्रवाद,
- तथा राजनीतिक स्थिरता के कारण भी भाजपा का समर्थन करते हैं।
इसके अतिरिक्त—
- दक्षिण भारत के कई राज्यों में कठोर साम्प्रदायिक राजनीति की सीमाएँ हैं;
- जातीय और क्षेत्रीय पहचान अब भी अत्यंत प्रभावशाली हैं;
- तथा आर्थिक संकट कई बार धार्मिक ध्रुवीकरण पर भारी पड़ सकता है।
अतः भारत का राजनीतिक भविष्य पूर्णतः साम्प्रदायिक हो जाएगा, ऐसा निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी।
निष्कर्ष
भाजपा द्वारा बढ़ाए गए साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण का भारतीय राजनीति पर गहरा प्रभाव पड़ने की संभावना है। इससे—
बहुसंख्यकवादी राष्ट्रवाद मजबूत हो सकता है, धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक मूल्यों का क्षरण हो सकता है तथा धार्मिक आधार पर मतदान और सामाजिक विभाजन बढ़ सकते हैं।
किन्तु इसके साथ-साथ यह नई लोकतांत्रिक एकताओं, सामाजिक न्याय आधारित राजनीति, संघवाद, संवैधानिक मूल्यों और आर्थिक प्रश्नों पर आधारित वैकल्पिक राजनीतिक आंदोलनों को भी जन्म दे सकता है।
अंततः भारत के भविष्य का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह होगा कि क्या भारतीय राजनीति धार्मिक पहचान के इर्द-गिर्द ही घूमती रहेगी, या फिर संविधान, नागरिकता, सामाजिक न्याय और बहुलतावाद पर आधारित लोकतांत्रिक राजनीति स्वयं को पुनः स्थापित कर सकेगी।
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