मायावती के अवसरवादी गठबंधनों ने बीजेपी–हिंदुत्व को कैसे पुनः सशक्त किया और दलितों को कैसे भ्रमित किया
एस आर दारापुरी, राष्ट्रीय अध्यक्ष, आल इंडिया पीपुल्स फ्रन्ट
मायावती का राजनीतिक सफ़र दलित राजनीति में एक साथ उपलब्धि और विरोधाभास का प्रतीक है। एक दलित महिला का बार-बार मुख्यमंत्री बनना ऐतिहासिक राजनीतिक सशक्तिकरण का प्रतीक था। किंतु उनके अवसरवादी गठबंधनों—विशेषकर BJP के साथ—ने दीर्घकालिक वैचारिक परिणाम उत्पन्न किए, जिनसे हिंदुत्व की राजनीति सशक्त हुई और दलित राजनीतिक चेतना दिशाहीन हुई।
इन गठबंधनों को अक्सर व्यावहारिक या रणनीतिक मजबूरी बताकर उचित ठहराया गया, लेकिन वस्तुतः उन्होंने दलित नेतृत्व और उस राजनीतिक विचारधारा के बीच सहयोग को सामान्य बना दिया जो मूलतः आंबेडकरवादी मूल्यों के प्रतिकूल है। यह आलेख तर्क देता है कि मायावती की गठबंधन राजनीति ने अप्रत्यक्ष रूप से BJP–हिंदुत्व को वैधता दी, वैचारिक प्रतिरोध को कमजोर किया, दलित एकता को खंडित किया और दलित मुक्ति की नैतिक दिशा को भ्रमित किया।
1. बीजेपी को “स्वीकार्य राजनीतिक साझेदार” के रूप में स्थापित करना
1.1 आंबेडकरवादी नैतिक सीमा का उल्लंघन
आंबेडकरवादी राजनीति ऐतिहासिक रूप से ब्राह्मणवाद और हिंदू बहुसंख्यकवाद को दलित मुक्ति का संरचनात्मक शत्रु मानती रही है। उत्तर प्रदेश में मायावती द्वारा बीजेपी के साथ किए गए बार-बार के गठबंधनों (1995, 1997, 2002) ने इस नैतिक सीमा को तोड़ दिया।
जब BJP को वैचारिक विरोधी के बजाय एक सौदेबाज़ सहयोगी के रूप में प्रस्तुत किया गया, तो: हिंदुत्व दलित राजनीतिक कल्पना में सामान्यीकृत हो गया, जाति-विरोधी संघर्ष सत्ता-साझेदारी तक सीमित हो गया तथा बीजेपी को दलित समाज के कुछ वर्गों में वैधता मिली। यह हिंदुत्व के लिए एक बड़ा वैचारिक लाभ था, वह भी बिना अपने मूल सिद्धांत बदले।
1.2 हिंदुत्व की “नैतिक धुलाई” (Moral Laundering)
दलित नेतृत्व वाली पार्टी के साथ सरकार बनाने से बीजेपी को स्वयं को: समावेशी, सामाजिक न्याय समर्थक एवं दलित आकांक्षाओं के अनुकूल दिखाने का अवसर मिला। यह एक प्रकार की नैतिक धुलाई थी, जिससे बीजेपी की मनुस्मृति-संलग्न और जाति-आधारित वैचारिक जड़ों पर पर्दा पड़ गया। दलित नेतृत्व के सहयोग ने हिंदुत्व को ऊँची जातियों की परियोजना के रूप में चुनौती देने की क्षमता को कमजोर किया।
2. हिंदुत्व के विरुद्ध वैचारिक प्रतिरोध का क्षय
2.1 मौन ही सहमति बन गया
गठबंधन काल में BSP ने: हिंदू बहुसंख्यकवाद, आरएसएस की विचारधारा, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण एवं सांस्कृतिक एकरूपता जैसे मुद्दों पर आलोचना को सीमित कर दिया। यह मौन दलित–अल्पसंख्यक एकता को कमजोर करता गया और हिंदुत्व को वैचारिक विस्तार के लिए खुली जगह मिलती गई। हिंदुत्व केवल समर्थन से नहीं, बल्कि सिद्धांतहीन चुप्पी से भी मजबूत होता है।
2.2 आंबेडकर की कट्टर धार्मिक आलोचना का पतन
डॉ. आंबेडकर की राजनीति हिंदू धर्म और जाति व्यवस्था की तीखी आलोचना पर आधारित थी। किंतु गठबंधन की मजबूरियों ने इस आलोचना को नरम और अप्रासंगिक बना दिया।
फलस्वरूप: आंबेडकर को केवल संविधान निर्माता के रूप में प्रस्तुत किया गया, उनके बौद्ध धर्मांतरण को हाशिए पर रखा गया एवं ब्राह्मणवाद-विरोधी दर्शन को विमुद्रीकृत कर दिया गया। इस वैचारिक पतन ने हिंदुत्व की सांस्कृतिक प्रभुत्व को अप्रत्यक्ष रूप से मजबूत किया।
3. दलित समाज में भ्रम और विखंडन
3.1 परस्पर विरोधी राजनीतिक संदेश
दलित समाज को एक साथ यह बताया गया कि: बीजेपी उच्च जातीय वर्चस्व की प्रतिनिधि है, बीजेपी एक आवश्यक शासन-साझेदार है एवं बीजेपी पर रणनीतिक रूप से भरोसा किया जा सकता है। इन विरोधाभासी संदेशों ने दलित राजनीतिक चेतना को भ्रमित किया, विशेषकर युवा पीढ़ी में। राजनीति नैतिक संघर्ष के बजाय सौदेबाज़ी प्रतीत होने लगी।
3.2 वैचारिक शिक्षा का पतन
मायावती काल में दलित राजनीतिक लामबंदी मुख्यतः चुनावी अपील, कल्याणकारी योजनाओं एवं प्रतीकात्मक राजनीति पर आधारित रही, जबकि: आंबेडकरवादी वैचारिक शिक्षा, राजनीतिक साक्षरता एवं कैडर प्रशिक्षण उपेक्षित किया गया। वैचारिक आधार के अभाव में अनेक दलित बीजेपी की कल्याणकारी राजनीति, हिंदुत्व के सांस्कृतिक प्रतीक एवं पहचान-आधारित सह-अधिग्रहण के प्रति संवेदनशील हो गए।
3.3 राजनीतिक निराशा और विमुखता
बीजेपी के साथ कभी विरोध, कभी सहयोग की नीति ने दलित मतदाताओं में: निराशा,संशय एवं राजनीतिक थकान को जन्म दिया। इससे आंबेडकरवादी राजनीति के प्रति दीर्घकालिक निष्ठा कमजोर हुई और BJP की सीधी पहुँच आसान हो गई।
4. बीजेपी–हिंदुत्व के लिए रणनीतिक लाभ
4.1 विस्तार के लिए समय और वैधता
मायावती के गठबंधनों ने बीजेपी को: प्रशासनिक वैधता, राजनीतिक श्वास-काल एवं दलित समाज में पैठ बनाने का समय प्रदान किया। इस दौरान बीजेपी ने: दलित मोर्चों का विस्तार किया, आंबेडकर के प्रतीकों का अधिग्रहण किया, कल्याणकारी पहुँच बढ़ाई तथा स्वतंत्र शक्ति प्राप्त करने के बाद BJP को बीजेपी की आवश्यकता नहीं रही।
बीएसपी-बीजेपी गठबंधनों ने उत्तर प्रदेश में दलित–मुस्लिम राजनीतिक एकता को कमजोर किया। इससे बीजेपी के “पैन-हिंदू” नैरेटिव को बल मिला और बहुसंख्यकवादी राजनीति को मजबूती मिली।
4.2 दलित-अल्पसंख्यक एकता का कमजोर होना
बीजेपी–हिंदुत्व गठबंधन ने दलित-मुस्लिम राजनीतिक एकजुटता को तोड़ दिया, जो उत्तर प्रदेश में ऐतिहासिक रूप से बहुत ज़रूरी थी। इस बिखराव ने बीजेपी के पैन-हिंदू नैरेटिव को बढ़ावा दिया और बहुसंख्यकवाद विरोधी गठबंधनों को कमजोर किया।
दलित नेतृत्व के साथ सहयोग ने बीजेपी को: व्यवहारिक, विकासोन्मुख, एवं जाति-पार दिखाने में मदद की। यह छवि उसके राष्ट्रीय विस्तार के लिए निर्णायक सिद्ध हुई।
5. दलित राजनीति पर दीर्घकालिक प्रभाव
5.1 वैचारिक निरस्त्रीकरण
अवसरवादी गठबंधनों ने दलित राजनीति की नैतिक स्पष्टता को क्षीण किया। आंबेडकरवाद: चुनावी प्रतीक, व्यक्ति पूजा एवं कल्याणकारी सौदेबाज़ी तक सीमित होता गया। हिंदुत्व के विरुद्ध प्रतिरोध कमजोर और असंगत हो गया।
5.2 बीजेपी का वैचारिक विकल्प के रूप में पतन
जब बीएसपी का चुनावी पतन हुआ, तो उसके पास: वैचारिक संस्थाएँ नहीं थीं, जन-आधारित सामाजिक आंदोलन नहीं थे तथा हिंदुत्व के विरुद्ध कोई सुसंगत वैकल्पिक दृष्टि नहीं थी। इस रिक्तता को बीजेपी ने शीघ्र भर दिया।
5.3 दलित युवाओं का विमुख होना
निराश दलित युवा: छात्र आंदोलनों, अधिकार-आधारित संघर्षों तथा नए आंबेडकरवादी संगठनों की ओर मुड़ गए, जो बीएसपी की गठबंधन राजनीति की खुलकर आलोचना करते हैं।
निष्कर्ष
मायावती के अवसरवादी गठबंधनों—विशेषकर बीजेपी के साथ—के परिणाम अल्पकालिक सत्ता से कहीं आगे तक गए। हिंदुत्व को राजनीतिक साझेदार के रूप में सामान्यीकृत करके, आंबेडकरवादी आलोचना को कमजोर करके और दलित राजनीतिक चेतना को भ्रमित करके, इन गठबंधनों ने BJP–हिंदुत्व को अप्रत्यक्ष रूप से पुनः सशक्त किया।
डॉ. आंबेडकर ने चेतावनी दी थी कि वैचारिक स्वतंत्रता के बिना प्राप्त राजनीतिक सत्ता अंततः अधीनता में बदल जाती है। मायावती की गठबंधन राजनीति ने इस चेतावनी को सत्य सिद्ध किया। दलित मुक्ति की राजनीति को पुनः सिद्धांत, विचारधारा और जाति–हिंदुत्व प्रभुत्व के नैतिक प्रतिरोध पर आधारित होना होगा—न कि अवसरवादी अंकगणित पर।
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