गुरुवार, 21 अप्रैल 2016

मायावती को कन्हैया पर गुस्सा क्यों आता है?
-एस.आर. दारापुरी, राष्ट्रीय प्रवक्ता, आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट
हाल में 14 अप्रैल को लखनऊ में आंबेडकर जयंती के अवसर पर सर्वजन की रैली को संबोधित करते हुए मायावती ने जेएनयू के कन्हैया कुमार पर अपना गुस्सा दिखाया और दलितों को उस से सावधान रहने के लिए कहा. उस ने कन्हैया के बारे में मुख्यतया चार बातें कहीं: (1) कन्हैया दलित नहीं भूमिहार है (2) कन्हैया अम्बेडकरवादी नहीं कम्युनिस्ट है (3) कन्हैया लाल सलाम और नीला सलाम को मिला कर दलितों को धोखा देना चाहता है तथा (4) कन्हैया जय भीम का नारा लगा कर दलितों को गुमराह करना चाहता है. इससे स्पष्ट है कि मायावती को अपने को छोड़ कर किसी अन्य द्वारा दलितों की राजनीति करने या आंबेडकर के बारे में बातचीत करने या नारा लगाने पर सख्त आपत्ति है क्योंकि वह समझती है कि दलितों की राजनीति या आंबेडकर पर उस का ही एकाधिकार है और किसी दूसरे का इस क्षेत्र में प्रवेश बिलकुल वर्जित है.
इस से यह भी स्पष्ट है कि मायावती को कम्युनिस्टों से सखत नाराज़गी और खतरा है. मायावती की कम्युनिस्टों से यह नाराज़गी उस के गुरु कांशी राम की ही देन है क्योंकि उन्हें भी कम्युनिस्टों से बहुत एलर्जी थी. वह अपनी जनसभायों में खुले तौर पर कहा करते थे कि कम्युनिस्ट आस्तीन के सांप हैं और दलितों को इन से दूर रहना चाहिए. वर्ष 1995 में मायावती के उत्तर प्रदेश का मुख्य मंत्री बनने से पहले जब मैं एक बार कांशी राम जी से कम्युनिस्टों और दलितों के आपसी गठजोड़ के बारे में बातचीत कर रहा था तो कांशी राम जी ने कहा कि कम्युनिस्ट हमारे लड़कों को नक्सली बना कर मरवा देते हैं. मैंने जब उन से यह कहा कि जो भी नक्सली मरते हैं वे तो दलितों और किसानों की लडाई को लेकर ही मरते हैं अपने लिए नहीं. जब मैंने उन से यह पूछा कि जो नक्सली मरते हैं उन में से कितने दलित होते हैं और कितने गैर दलित? कांशी राम जी के पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं था. कांशी राम जी की कम्युनिस्टों के बारे में यह धारणा दरअसल दलितों के बीच डॉ. आंबेडकर के कम्युनिस्ट विरोधी होने के दुष्प्रचार पर आधारित थी जो कि बिलकुल सही नहीं है. सच्च तो यह है कि 1940 में डॉ. आंबेडकर ने कम्युनिस्टों के साथ मिल भारत की पहली सफल मजदूर हड़ताल बम्बई की काटन मिलों में की थी. बाद में तत्कालीन वामपंथियों द्वारा केवल वर्ग की बात करने और जाति को गौण स्थान देने के कारण डॉ. आंबेडकर कम्युनिस्टों से अलग हो गए थे परन्तु वे कभी भी कम्युनिस्ट विरोधी नहीं थे. वे तो रूस की क्रांति से इतने प्रभावित थे कि उन्होंने 1946 में संविधान के अपने मसौदे में सारी कृषि भूमि के राष्ट्रीयकरण कौर सामूहिक खेती की वकालत की थी जब कि आज तक भी भारतीय वामपंथी इस रैडिकल मांग को उठाने का साहस नहीं कर सके.
डॉ. आंबेडकर का वामपंथियों से कुछ मतभेद मार्क्सवाद के कुछ पह्लुयों को लेकर था. एक तो उनका मत था कि राज्य का कभी भी लोप नहीं होगा जैसा कि वामपंथी सोचते हैं. दूसरे बाबा साहेब सर्वहारा के अधिनायकवाद के पक्ष में नहीं थे क्योंकि वे लोकतंत्र में विश्वास रखते थे. तीसरे वे हिंसक क्रांति के पक्षधर नहीं थे जबकि इतिहास बताता है कि क्रांतियाँ प्राय हिंसक हो जाती हैं क्योंकि शासक वर्ग का आखिरी हथियार हिंसा ही होती है जिस के लिए शोषित वर्ग को आत्मरक्षा में हिंसा करनी पड़ती है. अभी तक लगभग सभी क्रांतियाँ हिंसक ही हुयी हैं. इस के इलावा बौद्ध धम्म जिस को बाबा साहेब ने अपनाया था भी मार्क्सवाद का विरोधी नहीं है. इस से स्पष्ट है कि बाबासाहेब के मार्क्सवाद से कुछ वैचारिक मतभेद थे परन्तु वे किसी भी तरह से कम्युनिस्ट विरोधी नहीं थे. वे समाजवाद के प्रबल पक्षधर थे जो कि मार्क्सवाद का एक अभिन्न अंग है.
यह सर्विदित है की मार्क्सवाद का समाजवाद की स्थापना का मार्ग संघर्ष और जनांदोलन का रास्ता है जब कि कांशी राम केवल जोड़तोड़ की राजनीति के पक्षधर थे. उनका जनांदोलन में कोई विशवास नहीं था क्योंकि आन्दोलन का रास्ता कठिन रास्ता होता है. वर्ष 1995 में जब मैंने कांशी राम जी से जनांदोलन की आवश्यकता के बारे में चर्चा करते हुए कहा कि हरेक राजनैतिक पार्टी किसी मुद्दे को ले कर जनांदोलन करती है जिस से पार्टी कार्यकर्ताओं का मुद्दे के प्रति लगाव बढ़ता है और पुलिस का डंडा खा कर वे मज़बूत हो जाते हैं और आत्मरक्षा करना भी सीख जाते हैं पर आप ने आज तक किसी भी दलित मुद्दे को लेकर कोई जनांदोलन क्यों नहीं किया है. इस पर कांशी राम जी ने मुझे जो जवाब दिया मैं उस से चकित रह गया. उन्होंने कहा कि दारापुरी जी! दलित बहुत कमज़ोर लोग हैं वे पुलिस का डंडा नहीं झेल पाएंगे. इस पर मैंने उन्हें कहा कि कांशी राम जी! मैं पुलिस वाला हूँ, मैं जानता हूँ कि जब तक दलित पुलिस का डंडा नहीं खायेंगे वे तब तक कमज़ोर ही बने रहेंगे और कभी भी अपनी आत्मरक्षा नहीं कर पायेंगे. इसी का परिणाम है कि बसपा पार्टी आज भी किसी भी मुद्दे को लेकर जनांदोलन नहीं करती और न ही दलित अपनी आत्मरक्षा कर पाते हैं क्योंकि उन्हें इस के लिए प्रशिक्षित ही नहीं किया गया. उन्होंने दलित उत्पीडन रोकने के लिए कभी कोई प्रयास भी नहीं किया. यह भी एक ऐतहासिक चमत्कार ही है कि बसपा ही ऐसी पार्टी है जो कि बिना कोई जनांदोलन किये सत्ता में आ गयी. इसी लिए मायावती को भी वामपंथियों के आन्दोलन और संघर्ष के रास्ते से डर लगता है और कन्हैया दलितों और वामपंथियों को मुक्ति आन्दोलन में एक साथ लाने की बात करता है तो उसे कन्हैया पर गुस्सा आना स्वाभाविक है क्योंकि अब तो वह दलितों को समरसता की घुट्टी पिला रही है.
मायावती जी को कन्हैया के भूमिहार हो कर आंबेडकर और दलितों की बात करने पर भी सख्त एतराज़ है क्योंकि उस का कहना है कि दलित और आंबेडकर तो मायावती की जागीर है उस पर कोई गैर दलित अधिकार जमाने का प्रयास क्यों करे. मायावती यह भूल जाती है कि अब बसपा बहुजन के हाथ से निकल कर सर्वजन के हाथ में चली गयी है और अब बसपा ने “हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा, विष्णु महेश है” के प्रवचन को स्वीकार कर लिया है. जब मायावती को सतीश चंद मिश्रा जैसे घोर ब्राह्मणवादी नेता को अपना सब से बड़ा विश्वास पात्र बनाने में कोई आपत्ति नहीं है तो फिर कन्हैया के भूमिहार होने पर आपत्ति क्यों है? वह कम से कम दलितों और आंबेडकर की बात तो करता है जब कि सतीश चंद मिश्रा तो ब्राह्मण सम्मान को पुनर्स्थापित करने की बात करता है. जब मायावती अपनी पार्टी के टिकट किसी भी गुंडे बदमाश, माफिया और दलित विरोधी को ऊँचे दामों में बेच कर उन्हें अपनी पार्टी में स्वीकार कर सकती है तो फिर उसे कन्हैया की जाति पर आपत्ति क्यों है? मायावती ने तो अब तक जाति और सत्ता की राजनीति ही की है जब कि बाबासाहेब तो जाति-उच्छेद और मुद्दा आधारित राजनीति के पक्षधर थे. कन्हैया कम से कम जाति से ऊपर उठ कर मुद्दों की राजनीति की बात तो करता है जो आज तक मायावती ने नहीं की है और न करेगी.
मायावती को कन्हैया के लाल सलाम और नीला सलाम को मिलाने और जय भीम कहने पर भी आपत्ति है. उसे डर है कि इससे दलित उस के हाथ से निकल कर वामपंथियों से न जा मिलें. मायावती को शायद मालूम नहीं है कि 1962 और 1967 में जब उत्तर प्रदेश में डॉ. आंबेडकर द्वारा स्थापित पार्टी रिपब्लिकन पार्टी आफ इंडिया (आरपीआई) अपने शिखर पर थी तो उस समय डॉ. छेदी लाल जी ने कम्युनिस्टों और मुसलामानों के साथ हाथ मिलाया था. उस समय कहा जाता था कि उत्तर प्रदेश में नीली टोपी और लाल झंडा एक हो गए हैं. यह सर्वविदित है कि भारत के कम्युनिस्टों द्वारा वर्ग के चक्कर में जाति को महत्त्व न देने की बहुत बड़ी भूल की गयी जिस कारण जन्मजात सर्वहारा दलित वर्ग उन के साथ उतनी संख्या में नहीं जुड़ सका. परन्तु इधर कम्युनिस्टों ने अपनी इस ऐतहासिक भूल को सुधारा है ख़ास करके सीपीआई(एम) और सीपीआई (एम-एल) गुटों ने. इतिहास यह भी दर्शाता है कि कम्युनिस्ट कभी भी दलित विरोधी नहीं रहे हैं और न हैं. वैसे भी दलितों के कुदरती दोस्त कम्युनिस्ट ही हो सकते हैं जो मजदूर और किसान की मुक्ति की लडाई की बात करते हैं कोई दूसरा नहीं. ऐसी परिस्थिति में दलितों और कम्युनिस्टों को हाथ मिलाने में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए. इस में कन्हैया और उस के साथियों की भूमिका बहुत सहायक हो सकती है जो अम्बेडकरवाद और मार्क्सवाद की मिलीजुली विचारधारा को लेकर चलने का प्रयास कर रहे हैं.
इधर कम्युनिस्टों ने डॉ. आंबेडकर के जाति उन्मूलन कार्यक्रम को भी काफी हद तक स्वीकार किया है. वर्तमान में दलित उत्पीड़न के मामलों में कम्युनिस्ट ही आगे आ रहे हैं मायावती, पासवान, उदित राज या अठावले नहीं, चाहे वह तमिलनाडु हो या हरियाणा हो. कांशी राम और मायावती ने तो दलित उत्पीड़न पर कभी मुंह ही नहीं खोला. कांशी राम का तो कहना था कि जितना दलित उत्पीड़न बढ़ेगा उतना ही हमारा वोट बैंक बढ़ेगा. यह भी सर्विदित है कि वर्तमान कारपोरेट परस्त राजनीति के विरोध में कम्युनिस्ट और दलित ही खड़े हो सकते हैं, भाजपा, कांग्रेस, बसपा और सपा नहीं क्योंकि इन सब की राजनीति और पॉलिसी कारपोरेट परस्त ही है. इन में केवल नाम का अंतर है नीति और कार्यक्रम में कोई अंतर नहीं. इसी लिए तो उत्तर प्रदेश में मायावती के चार बार मुख्यमंत्री रहने के बावजूद भी दलितों की हालत में कोई अंतर नहीं आया है जैसा कि विकास के मापदंडों सम्बन्धी आंकड़ों से स्पष्ट है. मायावती ने तो दलित राजनीति को उन्हीं गुंडे, बदमाशों और मफियायों के हाथों बेच दिया जिन से उनकी लड़ाई थी.
उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट है कि मायावती का कन्हैया पर गुस्सा आंबेडकर और दलितों के नाम पर चलाई जा रही जातिवादी, अवसरवादी, भ्रष्ट, स्वार्थी, कारपोरेट परस्त और लम्पट राजनीति के लिए खड़े होने वाले खतरे को लेकर है. मायावती अभी भी यह भ्रम पाले हुए है कि दलितों का बहुत बड़ा हिस्सा अभी भी उसके प्रभाव में है परन्तु पिछले दो चुनाव इस के विपरीत इशारा करते हैं. दलितों के चमार/जाटव समुदाय को छोड़ कर शेष सभी छोटी उपजातियों का बड़ा हिस्सा भाजपा, सपा तथा कांग्रेस के साथ जा चुका है. अब इन्हें कन्हैया पर गुस्सा दिखा कर नहीं बल्कि डॉ. आंबेडकर की जाति उच्छेद और मुद्दा आधारित कारपोरेट विरोधी राजनीति और नीतियाँ अपना कर ही वापस जीता जा सकता है. परन्तु वर्तमान दलित राजनेताओं से इस की उम्मीद नहीं की जा सकती है क्योंकि वे भी वर्तमान कारपोरेट परस्त मुख्य धारा की राजनीति के ही पोषक हैं. अतः वर्तमान दलित राजनीति को एक रैडिकल वैकल्पिक राजनीति की ज़रुरत है जिस की पूर्ती के लिए आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट की स्थापना की गयी है.

5 टिप्‍पणियां:

  1. very good article, correct understanding of the emerging movement from youth-students and exposes Mayawati's opportunist agenda.

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  2. very good article, correct understanding of the emerging movement from youth-students and exposes Mayawati's opportunist agenda.

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  4. वर्तमान परिपेक्ष्य में मायावती पर की गयी टिप्पड़ी सही है
    परुन्तु मायावती को इतना अधिकार नही देना चाइये की वो समाज के साथ विश्वाश घात न कर सकें।क्योकि बाबा साहेब ने कहा था की अपने नेता को भी देखते रहें यदि वह ट्रैक(रास्ते)से भटक जाये तो उसे रस्ते पर लाना चाइये।

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श्रमिक कल्याण में डॉ. अंबेडकर की ऐतिहासिक भूमिका एस.आर. दारापुरी, राष्ट्रीय अध्यक्ष, अखिल भारतीय पीपुल्स फ्रंट (आज 1 मई को अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस पर विशेष) भीमराव रामजी अंबेडकर ने आधुनिक भारत में श्रम कल्याण नीति को आकार देने में एक बुनियादी और अक्सर कम सराही गई भूमिका निभाई। उनका योगदान केवल संवैधानिक आदर्शों तक ही सीमित नहीं था, बल्कि वायसराय की कार्यकारी परिषद (1942–1946) में 'श्रम सदस्य' के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने व्यावहारिक श्रम सुधारों में भी गहरी भूमिका निभाई। उनके काम ने कई ऐसे अधिकारों और सुरक्षा उपायों की नींव रखी, जिनसे भारतीय श्रमिकों को आज भी लाभ मिल रहा है। 1. संस्थागत और नीतिगत नेतृत्व ब्रिटिश भारत के तहत 'श्रम सदस्य' के रूप में, अंबेडकर असल में 'श्रम मंत्री' ही थे। इस भूमिका में, उन्होंने श्रम प्रशासन को एक औपनिवेशिक, शोषणकारी ढांचे से बदलकर अधिक कल्याण-उन्मुख प्रणाली में बदल दिया। उन्होंने श्रमिकों को अनियंत्रित पूंजीवाद से बचाने के लिए राज्य के हस्तक्षेप की आवश्यकता पर ज़ोर दिया। उन्होंने भारत के भीतर अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के ढांचे को मज़बूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिससे भारतीय श्रम नीतियां अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप हो गईं। 2. काम के घंटों में कमी अंबेडकर की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक भारत में '8 घंटे के कार्यदिवस' की शुरुआत करना था। इस सुधार से पहले, औद्योगिक श्रमिक अक्सर कठोर परिस्थितियों में दिन में 12–14 घंटे काम करते थे। इस सुधार ने भारत को वैश्विक श्रम मानकों के बराबर ला खड़ा किया और मानवीय कार्य परिस्थितियों की दिशा में एक बड़ा बदलाव लाया। 3. सामाजिक सुरक्षा उपाय अंबेडकर का दृढ़ विश्वास था कि राजनीतिक लोकतंत्र के साथ-साथ आर्थिक सुरक्षा भी होनी चाहिए। उन्होंने कई सामाजिक सुरक्षा उपायों की वकालत की और उन्हें शुरू किया, जिनमें शामिल हैं: महिला श्रमिकों के लिए मातृत्व लाभ, कार्यस्थल पर चोट लगने पर मुआवज़ा, और भविष्य निधि (Provident fund) योजनाएं इन उपायों ने बाद में 'कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम, 1948' और 'कर्मचारी भविष्य निधि और विविध प्रावधान अधिनियम, 1952' जैसे कानूनों को प्रभावित किया। 4. महिला श्रमिकों की सुरक्षा अंबेडकर श्रम क्षेत्र में लैंगिक न्याय के प्रबल समर्थक थे। उन्होंने ऐसी नीतियां पेश कीं जिनसे यह सुनिश्चित हो सके: सवेतन मातृत्व अवकाश, खदानों में महिलाओं के लिए भूमिगत काम पर प्रतिबंध, और समान वेतन तथा बेहतर कार्य-स्थितियां। उस समय के हिसाब से उनका दृष्टिकोण प्रगतिशील था और सामाजिक न्याय के उनके व्यापक दृष्टिकोण के अनुरूप था। 5. ट्रेड यूनियन अधिकार और औद्योगिक संबंध अंबेडकर ने सामूहिक सौदेबाजी के महत्व को पहचाना और ट्रेड यूनियनों के विकास का समर्थन किया। उन्होंने इन लक्ष्यों की दिशा में काम किया: ट्रेड यूनियनों को कानूनी मान्यता, औद्योगिक विवादों के समाधान के लिए तंत्र, और त्रिपक्षीय श्रम सम्मेलनों (सरकार, नियोक्ता, श्रमिक) को बढ़ावा देना उनके प्रयासों ने संवाद को संस्थागत बनाने और औद्योगिक संघर्ष को कम करने में मदद की। 6. न्यूनतम वेतन और उचित स्थितियां हालांकि न्यूनतम वेतन अधिनियम, 1948 स्वतंत्रता के बाद लागू किया गया था, लेकिन अंबेडकर के विचारों ने इसके ढांचे को काफी हद तक प्रभावित किया। उन्होंने लगातार यह तर्क दिया कि श्रम कोई वस्तु नहीं है, और एक गरिमापूर्ण जीवन सुनिश्चित करने के लिए श्रमिकों को उचित पारिश्रमिक मिलना चाहिए। 7. श्रमिक कल्याण कोष और आवास अंबेडकर ने श्रमिकों के आवास, स्वास्थ्य और शिक्षा में सहायता के लिए कल्याण कोष की वकालत की। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि औद्योगिक विकास में कार्यस्थल से परे श्रमिकों की भलाई के लिए भी प्रावधान शामिल होने चाहिए। 8. श्रमिक कल्याण के लिए संवैधानिक दृष्टिकोण भारतीय संविधान की प्रारूप समिति के अध्यक्ष के रूप में, अंबेडकर ने श्रमिक कल्याण को 'राज्य के नीति निदेशक तत्वों' (अनुच्छेद: 39, 41, 42 और 43) में शामिल किया, जिसमें ये अधिकार शामिल हैं: काम का अधिकार, काम की न्यायसंगत और मानवीय स्थितियां, जीवन-निर्वाह योग्य वेतन, और बेरोजगारी, बीमारी तथा वृद्धावस्था की स्थिति में सार्वजनिक सहायता ये सिद्धांत उनके इस विश्वास को दर्शाते हैं कि लोकतंत्र को सामाजिक और आर्थिक न्याय सुनिश्चित करना ही चाहिए। 9. व्यापक दार्शनिक योगदान अंबेडकर का श्रम दर्शन गरिमा, समानता और सामाजिक न्याय पर आधारित था। कार्ल मार्क्स जैसे विचारकों से प्रभावित होने के बावजूद, उनका दृष्टिकोण उनसे भिन्न था; उन्होंने हिंसक क्रांति को अस्वीकार कर दिया और इसके बजाय श्रमिक अधिकारों को प्राप्त करने के लिए संवैधानिक तरीकों की वकालत की। निष्कर्ष श्रमिक कल्याण के क्षेत्र में डॉ. अंबेडकर का योगदान अत्यंत परिवर्तनकारी था। उन्होंने केवल आर्थिक उत्पादकता पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय, मानव गरिमा और सामाजिक न्याय को केंद्र में ला दिया। समकालीन भारत में श्रमिकों को प्राप्त कई सुरक्षात्मक उपाय और अधिकार, उन्हीं के दृष्टिकोण और नीतिगत पहलों से प्रेरित हैं। डा. अंबेडकर मजदूरों को न केवल अपने अधिकारों के लिए ही लड़ने के लिए संगठित होने बल्कि राजनीतिक सत्ता प्राप्त करने के लिए भी प्रेरित किया। उनका कार्य हमें यह याद दिलाता है कि श्रमिक कल्याण केवल एक आर्थिक मुद्दा नहीं है, बल्कि एक नैतिक और संवैधानिक अनिवार्यता है, जो एक न्यायपूर्ण समाज के लिए अत्यंत केंद्रीय महत्व रखती है।

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