शुक्रवार, 25 मार्च 2016

वर्तमान चुनौतियां और बहुजन समाज पार्टी

वर्तमान चुनौतियां और बहुजन समाज पार्टी
(कॅंवल भारती)
सच तो यह है कि जातिवादी पार्टियों के सामने कोई चुनौती नहीं होती है। वे हमेशा दर्शन-चिन्तन से दूर रहती हैं। उनके सामने सिर्फ राजनीतिक परिवर्तन का लक्ष्य रहता है, समाज को गतिशील और चेतनशील बनाने में वे यकीन नहीं करती हैं। उनके लिए इतिहास में ठहराव ही सब कुछ है, और वर्तमान चुनौतियां उनके लिए मायने ही नहीं रखती हैं। यह वस्तुतः दक्षिणपंथी राजनीति ही है, जिसके सिक्के के दो पहलू होते हैं, पहला धर्म और दूसरा जाति। ऐसी राजनीति निरन्तर इतिहास को धार देती है, और सारी समस्याओं का समाधान अतीत में ही देखती है। यही नहीं, दक्षिणपंथी राजनीति की तरह ही जातिवादी राजनीति भी पूंजीवादी व्यवस्था के लिए काम करती है।
बहुजन समाज पार्टी (बसपा), जिसका नेतृत्व वर्तमान में मायावती जी के हाथों में है, ऐसी ही जातिवादी पार्टी है, जिसका लक्ष्य जातीय समीकरणों के द्वारा सत्ता हासिल करना है। इन समीकरणों को साधने के लिए इसका नेतृत्व किसी भी हद से गुजरने के लिए तैयार रहता है। उदाहरण के लिए, मायावती जी ने उत्तर प्रदेश में अपने पिछले शासन में सवर्णों को सन्तुष्ट करने के लिए अनुसूचित जाति अत्याचार निवारण कानून को कमजोर करने के लिए पुलिस अधिकारियों को विशेष दिशा-निर्देश जारी किए थे। वे अपने जनाधार के लिए जातीय गौरव के उभार को ही पर्याप्त मानती हैं। अपने पहले शासन में मायावती जी ने दलित वर्गों के नायकों के स्मारक इसी मकसद से बनवाए थे। ये स्मारक हमेशा दलितों में जातीय गौरव की चेतना विकसित करते हैं।
लेकिन जातीय गौरव की यह राजनीति सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन की दिशा में कोई भूमिका नहीं निभा सकी, और न निभा सकती है, क्योंकि वह उसके एजेण्डे में नहीं है। जिस तरह पूंजीवादी व्यवस्था में दलित और कमजोर वर्ग एक लाभार्थी माने जाते हैं, जिन्हें सरकार के विशेष संरक्षण और प्रोत्साहन की आवश्यकता है, उसी तरह बसपा के लिए भी वे लाभार्थी ही हैं। वृद्धावस्था पेंशन, विधवा पेंशन, विकलांग पेंशन, छात्रवृत्ति, अनुदान, ऋण और आवास योजनाओं के लक्ष्य ऐसे ही संरक्षण और प्रोत्साहन हैं, जो उन्हें लाभान्वित करने के लिए हैं। और ये सारी योजनाएँ सीमित बजट के अन्तर्गत चलाई जाती हैं, जिससे सीमित लोग ही लाभान्वित होते हैं, और लाभार्थियों की संख्या दिन दूनी रात चैगुनी बढ़ती जाती है।
यही राजनीतिक विजन मायावती जी के पास भी है। इसलिए वे सांस्कृतिक और सामाजिक आन्दोलनों से हमेशा दूरी बनाए रहती हैं। जातीय उत्पीड़न के मामलों में भी, जो देश में लगातार बढ़ रहे हैं, उनकी पार्टी कभी आन्दोलन नहीं करती। ऐसे आन्दोलनों में, चूंकि, जेल जाने का खतरा रहता है, इसलिए, वे जोखिम-रहित सुरक्षित राजनीति पसन्द करती हैं। उनके लिए रोहित वेमुला की सांस्थानिक हत्या एक ऐसा मुद्दा हो सकता था, जहाँ से वे देश भर में अपनी रेडिकल राजनीति के लिए एक बड़ा सांस्कृतिक आन्दोलन आरम्भ कर सकती थीं। लेकिन, इस अहम मुद्दे पर, जहाँ देश भर के सामाजिक संगठन सड़कों पर धरना-प्रदर्शन कर रहे थे, वहाँ मायावती जी ने न स्वयं भाग लिया और न अपनी पार्टी को उसमें भाग लेने दिया। राष्ट्रवाद के प्रश्न पर भी, जो आज का सबसे ज्वलन्त प्रश्न है, वे दलित वर्गों को चेतनशील बनाने के कार्यक्रम चला सकती थीं, परन्तु उन्होंने यहाँ भी अपनी पार्टी का कोई कार्यक्रम तय नहीं किया।
वे वस्तुतः राजनीतिक के तौर पर सिर्फ कभी कभार प्रेस वार्ता तक, अथवा राज्यसभा में बोलने तक सीमित रहती हैं। राज्यसभा में भी वे अपने लिखित भाषण में उन मुद्दों पर बोलती हैं, जिन पर वे समझती हैं कि उसका उन्हें राजनीतिक लाभ मिलेगा। किन्तु, हकीकत यह है कि उन मुद्दों पर बोलकर वे जातीय धुव्रीकरण की राजनीति करना चाहती हैं, और उसकी भी वे सिर्फ भ्रामक कल्पना करती हैं। उदाहरण के तौर पर, उन्होंने रोहित वेमुला के मुद्दे पर केवल यह सवाल पूछा था कि सरकार ने जाँच समिति में किसी दलित को रखा है या नहीं? वे इतने से ही सन्तुष्ट हो गईं कि समिति में दलित को रखा गया है। हैरानी की बात तो यह है कि उनके इस सवाल पर उनके दलित अनुयायी भी उनसे खुश हैं, जबकि इससे उन्हें कोई लेनादेना नहीं कि वह सदस्य भाजपा का हो, या भापजा के कोटे का हो।
यह दुखद अनुभव है कि अतीत में बसपा प्रमुख मायावती जी तीन बार भाजपा से हाथ मिलाकर सत्ता हासिल कर चुकी हैं। 2017 के उत्तर प्रदेश विधान सभा के आम चुनावों में उसकी पुनरावृत्ति नहीं होगी, इसका दावा अब भी कोई नहीं कर सकता। इस पर परदा डालते हुए यह कहा जाता है कि मायावती जी के शासन में कानून-व्यवस्था दुरस्त थी, और गुण्डागर्दी नहीं थी। पर ऐसा कहने वाले यह भूल जाते हैं कि मायावती के उसी शासन में भाजपा और संघ का सांस्कृतिक ऐजेण्डा मजबूत हुआ था और शिक्षण संस्थाओं तथा सहकारी मिलों का निजीकरण हुआ था। माना कि कानून-व्यवस्था दुरस्त थी, और गुण्डागर्दी नहीं थी, परन्तु लूट तो थी। लूट का बादशाह यादव सिंह उन्हीं के राज में पैदा हुआ था, और आलम यह था कि अधिकारियों से लेकर बसपा के छुटभैए नेता तक लूट का ऐसा तन्त्र चलाए हुए थे, कि चपरासी तक की नौकरी के लिए भारी लूट मची हुई थी। क्या लूट को सुशासन कहा जा सकता है?
अगर जातीय गौरव मायने रखता, तो उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनावों में सपा पांच और बसपा शून्य पर नहीं सिमटी होती। वे कौन-से कारक थे, जिसने भाजपा को भारी बहुमत से जिताया? निस्सन्देह, वे रोजी-रोटी और अच्छे दिनों के सपने थे, जो नरेंन्द्र मोदी ने जनता को दिखाए थे। दलित वर्गों ने भी इन्हीं सपनों को देखते हुए भाजपा के कमल को खिलाने में दिलचस्पी दिखाई थी। कहने का तात्पर्य यह है कि जातीय गौरव से पेट नहीं भरता, शिक्षा, स्वास्थ्य और आवास की समस्याएं हल नहीं होती। बिहार में इसीलिए भाजपा को कामयाबी नहीं मिली, क्योंकि जनता ने साल भर में ही मोदी जी के जुमलों की वास्तविकता को समझ लिया था। पर, इसके लिए भी बिहार में एक बड़े भाजपा-विरोधी गठबन्धन ने काम किया था। इस महा गठबन्धन ने साम्प्रदायिक शक्तियों को बिहार में जरूर रोक दिया है, परन्तु, अगर जनता की रोजी-रोटी, शिक्षा, स्वास्थ्य और आवास की समस्याएं हल नहीं हुईं, तो धर्मनिरपेक्ष राजनीति भी ज्यादा समय तक टिकने वाली नहीं है।
लेकिन उत्तर प्रदेश में भाजपा के विरुद्ध न कोई महागठबन्धन अभी बना है, और न मायावती जी ऐसे किसी गठबन्धन में, अगर बनता है, (तो) शामिल होने वाली हैं। वे अकेले ही सभी सीटों पर लड़ने की घोषणा कर चुकी हैं। जातीय समकरणों की स्थिति यह है कि चमार और जाटव के सिवाए अन्य दलित जातियां बसपा के साथ नहीं हैं। उनमें अधिकांश भाजपा के साथ हैं, तो कुछ सपा के साथ हैं। जहाँ तक मुसलमानों और पिछड़ी जातियों का सवाल है, तो बसपा के पक्ष में न मुसलमान हैं, और न पिछड़ी जातियां हैं। उनमें अधिकांश मुसलमान और यादव सपा के वोटर हैं, जबकि अधिकांश पिछड़ी जातियों पर हिन्दुत्व का भगवा रंग चढ़ चुका है। ऐसी स्थिति में बसपा, जिसकी वर्तमान चुनौतियों से निपटने की कोई तैयारी नहीं है, सत्ता में वापसी का स्वप्न देख रही है, तो हो सकता है, वह किसी चमत्कार के सहारे हो।
(12 मार्च 2016)

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श्रमिक कल्याण में डॉ. अंबेडकर की ऐतिहासिक भूमिका एस.आर. दारापुरी, राष्ट्रीय अध्यक्ष, अखिल भारतीय पीपुल्स फ्रंट (आज 1 मई को अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस पर विशेष) भीमराव रामजी अंबेडकर ने आधुनिक भारत में श्रम कल्याण नीति को आकार देने में एक बुनियादी और अक्सर कम सराही गई भूमिका निभाई। उनका योगदान केवल संवैधानिक आदर्शों तक ही सीमित नहीं था, बल्कि वायसराय की कार्यकारी परिषद (1942–1946) में 'श्रम सदस्य' के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने व्यावहारिक श्रम सुधारों में भी गहरी भूमिका निभाई। उनके काम ने कई ऐसे अधिकारों और सुरक्षा उपायों की नींव रखी, जिनसे भारतीय श्रमिकों को आज भी लाभ मिल रहा है। 1. संस्थागत और नीतिगत नेतृत्व ब्रिटिश भारत के तहत 'श्रम सदस्य' के रूप में, अंबेडकर असल में 'श्रम मंत्री' ही थे। इस भूमिका में, उन्होंने श्रम प्रशासन को एक औपनिवेशिक, शोषणकारी ढांचे से बदलकर अधिक कल्याण-उन्मुख प्रणाली में बदल दिया। उन्होंने श्रमिकों को अनियंत्रित पूंजीवाद से बचाने के लिए राज्य के हस्तक्षेप की आवश्यकता पर ज़ोर दिया। उन्होंने भारत के भीतर अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के ढांचे को मज़बूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिससे भारतीय श्रम नीतियां अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप हो गईं। 2. काम के घंटों में कमी अंबेडकर की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक भारत में '8 घंटे के कार्यदिवस' की शुरुआत करना था। इस सुधार से पहले, औद्योगिक श्रमिक अक्सर कठोर परिस्थितियों में दिन में 12–14 घंटे काम करते थे। इस सुधार ने भारत को वैश्विक श्रम मानकों के बराबर ला खड़ा किया और मानवीय कार्य परिस्थितियों की दिशा में एक बड़ा बदलाव लाया। 3. सामाजिक सुरक्षा उपाय अंबेडकर का दृढ़ विश्वास था कि राजनीतिक लोकतंत्र के साथ-साथ आर्थिक सुरक्षा भी होनी चाहिए। उन्होंने कई सामाजिक सुरक्षा उपायों की वकालत की और उन्हें शुरू किया, जिनमें शामिल हैं: महिला श्रमिकों के लिए मातृत्व लाभ, कार्यस्थल पर चोट लगने पर मुआवज़ा, और भविष्य निधि (Provident fund) योजनाएं इन उपायों ने बाद में 'कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम, 1948' और 'कर्मचारी भविष्य निधि और विविध प्रावधान अधिनियम, 1952' जैसे कानूनों को प्रभावित किया। 4. महिला श्रमिकों की सुरक्षा अंबेडकर श्रम क्षेत्र में लैंगिक न्याय के प्रबल समर्थक थे। उन्होंने ऐसी नीतियां पेश कीं जिनसे यह सुनिश्चित हो सके: सवेतन मातृत्व अवकाश, खदानों में महिलाओं के लिए भूमिगत काम पर प्रतिबंध, और समान वेतन तथा बेहतर कार्य-स्थितियां। उस समय के हिसाब से उनका दृष्टिकोण प्रगतिशील था और सामाजिक न्याय के उनके व्यापक दृष्टिकोण के अनुरूप था। 5. ट्रेड यूनियन अधिकार और औद्योगिक संबंध अंबेडकर ने सामूहिक सौदेबाजी के महत्व को पहचाना और ट्रेड यूनियनों के विकास का समर्थन किया। उन्होंने इन लक्ष्यों की दिशा में काम किया: ट्रेड यूनियनों को कानूनी मान्यता, औद्योगिक विवादों के समाधान के लिए तंत्र, और त्रिपक्षीय श्रम सम्मेलनों (सरकार, नियोक्ता, श्रमिक) को बढ़ावा देना उनके प्रयासों ने संवाद को संस्थागत बनाने और औद्योगिक संघर्ष को कम करने में मदद की। 6. न्यूनतम वेतन और उचित स्थितियां हालांकि न्यूनतम वेतन अधिनियम, 1948 स्वतंत्रता के बाद लागू किया गया था, लेकिन अंबेडकर के विचारों ने इसके ढांचे को काफी हद तक प्रभावित किया। उन्होंने लगातार यह तर्क दिया कि श्रम कोई वस्तु नहीं है, और एक गरिमापूर्ण जीवन सुनिश्चित करने के लिए श्रमिकों को उचित पारिश्रमिक मिलना चाहिए। 7. श्रमिक कल्याण कोष और आवास अंबेडकर ने श्रमिकों के आवास, स्वास्थ्य और शिक्षा में सहायता के लिए कल्याण कोष की वकालत की। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि औद्योगिक विकास में कार्यस्थल से परे श्रमिकों की भलाई के लिए भी प्रावधान शामिल होने चाहिए। 8. श्रमिक कल्याण के लिए संवैधानिक दृष्टिकोण भारतीय संविधान की प्रारूप समिति के अध्यक्ष के रूप में, अंबेडकर ने श्रमिक कल्याण को 'राज्य के नीति निदेशक तत्वों' (अनुच्छेद: 39, 41, 42 और 43) में शामिल किया, जिसमें ये अधिकार शामिल हैं: काम का अधिकार, काम की न्यायसंगत और मानवीय स्थितियां, जीवन-निर्वाह योग्य वेतन, और बेरोजगारी, बीमारी तथा वृद्धावस्था की स्थिति में सार्वजनिक सहायता ये सिद्धांत उनके इस विश्वास को दर्शाते हैं कि लोकतंत्र को सामाजिक और आर्थिक न्याय सुनिश्चित करना ही चाहिए। 9. व्यापक दार्शनिक योगदान अंबेडकर का श्रम दर्शन गरिमा, समानता और सामाजिक न्याय पर आधारित था। कार्ल मार्क्स जैसे विचारकों से प्रभावित होने के बावजूद, उनका दृष्टिकोण उनसे भिन्न था; उन्होंने हिंसक क्रांति को अस्वीकार कर दिया और इसके बजाय श्रमिक अधिकारों को प्राप्त करने के लिए संवैधानिक तरीकों की वकालत की। निष्कर्ष श्रमिक कल्याण के क्षेत्र में डॉ. अंबेडकर का योगदान अत्यंत परिवर्तनकारी था। उन्होंने केवल आर्थिक उत्पादकता पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय, मानव गरिमा और सामाजिक न्याय को केंद्र में ला दिया। समकालीन भारत में श्रमिकों को प्राप्त कई सुरक्षात्मक उपाय और अधिकार, उन्हीं के दृष्टिकोण और नीतिगत पहलों से प्रेरित हैं। डा. अंबेडकर मजदूरों को न केवल अपने अधिकारों के लिए ही लड़ने के लिए संगठित होने बल्कि राजनीतिक सत्ता प्राप्त करने के लिए भी प्रेरित किया। उनका कार्य हमें यह याद दिलाता है कि श्रमिक कल्याण केवल एक आर्थिक मुद्दा नहीं है, बल्कि एक नैतिक और संवैधानिक अनिवार्यता है, जो एक न्यायपूर्ण समाज के लिए अत्यंत केंद्रीय महत्व रखती है।

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