बुधवार, 14 नवंबर 2012

धर्मापुरी में दलितों पर आक्रमण के निहितार्थ
एस आर दारापुरी
आई पी एस (सेवा निवृत)

दलितों के विरुद्ध 7 नवंबर को तमिलनाडु के धर्मापुरी जिले के नैकान्कोटी गाँव के तीन मजरे नाथम , अन्ना नगर और कोंदम्पति में दलितों पर हुए आक्रमण ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि हमारे समाज में जाति पूर्वाग्रह आज भी कितने मजबूत हैं और जाति सम्मान जाति पहचान से कितनी मजबूती से जुड़ा हुआ है। धर्मापुरी मे पिछड़ी जाति

के वानियार समाज के 500 लोगों ने आदिद्रवड़ जाति के दलितों के 300 घरों पर हमला करके उन्हें लूटा और बुरी तरह से तबाह किया।
समाचार पत्रों में छपी ख़बरों के अनुसार दलितों पर हमले का मुख्य कारण पिछड़ी जाति (वानियर ) की दिव्या नाम की 20 वर्ष की लड़की का दलित जाति (आदिद्रवड़ ) के 23 वर्षीय लड़के इलावर्सन के साथ एक माह पहले प्रेम विवाह था। लड़की के परिवार वाले पुलिस के पास गए और पुलिस ने दोनों पार्टियों को समझाया था कि विवाह वैध है। इस बीच 30 गाँव के वानियारों ने मीटिंग करके इस मुद्दे पर विचार किया. उन्होंने बुद्धवार को एक "कंगारू अदालत" लगायी और लड़के के घर वालों को लड़की को उसके माँ बाप को वापस करने को कहा परन्तु लड़की ने घर वापस जाने से मना कर दिया। धर्मापुरी के पुलिस कप्तान को इस की पूरी जानकारी थी। इस लिए उन्होंने उक्त अदालत में आदेश देने वालों की तलाश शुरू कर दी थी। इसे सामाजिक अपमान मानते हुए 6 नवम्बर को लड़की के पिता जी नागराजन ने आत्महत्या कर ली। इस पर 7 नवम्बर को वानियर जाति के लोगों ने बड़ी संख्या में एकत्र हो कर गाँव की तीन बस्तियों पर धावा बोल दिया। उन्होंने पेड़ काट कर सड़क पर डाल दिए ताकि पुलिस और आग बुझाने वाली गाड़ियाँ आसानी से न पहुँच सकें। दलित बस्तियों में लगभग 5-30 घंटे लूट पाट और आगजनी चलती रही और लगभग 300 दलित घर जल कर स्वाह हो गए। शुक्र है कि दलित बस्तियों पर इस हमले में कोई जान नहीं गयी क्योंकि दलित हमले से पहले ही अपने घर छोड़ कार जंगल की तरफ भाग गये थे। जले, लुटे और तबाह हुए दलित घरों की 300 की संख्या इस हमले की व्यापकता और तीव्रता को दर्शाती है। पुलिस ने अब तक 90 लोगों को गिरफ्तार किया है और 500 अन्य अज्ञात लोगों के विरुद्ध मुकदमा कायम किया है। यह उल्लेखनीय है कि घटना के समय गाँव में लगभग 300 पुलिस कर्मचारी मौजूद थे परन्तु उन्होंने हमलावरों को रोकने के लिए कुछ भी नहीं किया। उन्होंने इस का कारण हमलावरों के मुकाबले अपनी संख्या कम होने का बहाना बनाया है।
तमिलनाडु जो कि एक उन्नत प्रदेश कहा जाता है दलितों पर इस प्रकार के हमलों और उत्पीडन के लिए कुख्यात है। यद्यपि संख्या में ये हमले कम हैं परन्तु गंभीरता और व्यापकता में ये काफी बड़े हैं।
इस से पहले भी 1968 में किलवेनमेनी गाँव में इसी प्रकार एक दलित बस्ती पर हमला हुआ था जिस में 44 दलित, जिन में अधिकतर औरतें और बच्चे, थे मौत का शिकार हो गए थे।
उपरोक्त घटना के विश्लेषण से निम्नलिखित बातें उभर कर आती हैं:-
1. हमारे समाज में आज भी जाति भेद बहुत उग्र रूप में व्याप्त है। आज भी जाति- सम्मान जाति- पहचान से बहुत गहराई से जुड़ा हुआ है। जैसे ही इस को कोई ठेस पहुंचती है तो उस पर हिंसक प्रतिक्रिया देखने को मिलती है।
2. वर्तमान में दलितों का अधिकतर टकराव ऊँची जातियों के स्थान पर पिछड़ी जातियों के साथ हो रहा हैं क्योंकि यह जातियां नव ब्राह्मणवादी एवं नव धनाड्य बनी हैं। वास्तव में इन जातियों का जाति- हित और वर्ग- हित भी दलितों से टकराता है। ऐसी परिस्थिति में कुछ दलित बुद्धिजीवियों द्वारा बहु प्रचारित दलित- बहुजन (दलित और पिछड़े) एकता की अवधारणा पर भी प्रशन चिन्ह लग जाता है।
3. तमिलनाडु में रामा स्वामी नायकर पेरियार द्वारा ब्राह्मण विरोधी "आत्म सम्मान" आदोलन से आर्थिक एवं राजनितिक- सत्ता ब्राह्मणों के हाथ से निकल कर पिछड़ी जातियों के हाथ में आ गयी है जो कि एक प्रभुत्वशाली नव ब्राह्मणवादी वर्ग बन गया है और उन का दलितों के प्रति नजरिया और व्यवहार पूरी तरह से जातिवादी है।
4. खाप पंचायतें और इस मामले में कंगारू अदालतें सामाजिक न्याय और मानवाधिकारों के खिलाफ फतवे देकर संविधान और कानून का मजाक उड़ाती हैं परन्तु कोई भी सरकार या राजनीतिक पार्टी उन के विरुद्ध न तो कोई कार्रवाही करती है और न ही उनके फरमानों के खिलाफ कोई आवाज़ उठाती है। वर्तमान में जाति वोट बैंक की राजनीति ऐसी गैर संविधानिक संस्थायों को बढावा देती है जो कि लोकतंत्र के लिए सब से बड़ा खतरा है।
5 तमिलनाडु के ब्राह्मण विरोध आन्दोलन से यह भी स्पष्ट है कि केवल ब्राह्मण विरोध से जाति सत्ता में दलितों के पक्ष में कोई लाभकारी परिवर्तन होने की आशा नहीं की जा सकती क्योंकि इस से नव ब्राह्मणवादियों का उद्गम हो जाता है। अतः सम्पूर्ण जाति विनाश से ही जाति- भेद और जाति- उत्पीडन से निजात संभव हो सकती है। इस के लिए दलितों को ही आगे आना होगा जैसा कि डॉ आंबेडकर ने अपेक्षा की थी। वर्तमान में दलित ही जाति - भेद और जाति-उत्पीडन का सब से बड़ा शिकार हैं।
6. दलित राजनीति को भी जाति और जाति -पहचान की राजनीती से बाहर निकल कर दलितों के मूल मुद्दों पर राजनीति करनी होगी क्योंकि इस से दलित नेताओं को जाति के नाम पर दलितों के मुद्दों के समाधान के लिए कुछ भी न करके दलितों का केवल भावनात्मक शोषण करके व्यक्तिगत लाभ कमाने का मौका मिल जाता है।
7. दलित अपनी सुरक्षा के लिए सरकार अथवा पुलिस पर आश्रित रह कर उत्पीडन से नहीं बच सकते। इस मामले में भी घटना के दिन उक्त क्षेत्र में लगभग पुलिस के 300 कर्मचारी मौजूद थे परन्तु उन्होंने उपद्रवियों को रोकने के लिए कुछ भी नहीं किया। यह सर्व विदित है पुलिस का नजरिया भी अधिकतर जातिवादी और दलित विरोधी होता है। अतः दलितों को अपनी रक्षा खुद करने के लिए आत्मरक्षा- दल बनाने पर विचार करना होगा। डॉ आंबेडकर ने इसी ध्येय से "समता सैनिक दल" की स्थापना की थी जो आज भी कमज़ोर स्थिति में मौजूद है। उसे पुनर्जीवित कर मज़बूत करने की ज़रूरत है। बाबा साहेब का "शिक्षित करो, संघर्ष करो और संघटित करो" का नारा आज और भी प्रासंगिक है। बाबा साहेब ने यह भी कहा था," सिद्धांत अहिंसा का होना चाहिए परन्तु अगर ज़रूरत हो तो हिंसा ज़रूर होनी चाहिए।" यह भी सर्वविदित है कि आत्मरक्षा में की गयी हिंसा हिंसा नहीं होती।
8. दलितों को जाति संघटनों से बाहर निकल कर वर्ग आधारित उत्पीडित वर्गों के साथ मिल कर संघटन बनाने पर विचार करना होगा क्योंकि जाति जोड़ने की नहीं तोड़ने की प्रक्रिया है। इस से जाती टूटने के स्थान पर मजबूत होती है। यह डॉ आंबेडकर के जाति एवं वर्ग विहीन समाज की स्थापना के लक्ष्य के भी प्रतिकूल है। इसी कारण से दलितों के मज़बूत संघटन नहीं बन पा रहे हैं।
उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि दलितों के विरुद्ध हो रहे आक्रमण और उत्पीडन की घटनाओं का विस्तार और तीव्रता लगातार बढ़ रही है जिस के परिपेक्ष्य में दलितों को आत्म रक्षा और संघटन निर्माण पर नए सिरे से सोचना होगा। दलित राजनीति को भी जाति के मकडजाल से निकाल कर वर्ग राजनीति में परिवर्तित होना होगा ताकि वे अन्य समान हित वाले वर्गों को साथ लेकर शक्तिशाली संघटन बना सकें और मुद्दा आधारित राजनीति के माध्यम से सत्ता में हिस्सेदारी पा सकें।

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श्रमिक कल्याण में डॉ. अंबेडकर की ऐतिहासिक भूमिका एस.आर. दारापुरी, राष्ट्रीय अध्यक्ष, अखिल भारतीय पीपुल्स फ्रंट (आज 1 मई को अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस पर विशेष) भीमराव रामजी अंबेडकर ने आधुनिक भारत में श्रम कल्याण नीति को आकार देने में एक बुनियादी और अक्सर कम सराही गई भूमिका निभाई। उनका योगदान केवल संवैधानिक आदर्शों तक ही सीमित नहीं था, बल्कि वायसराय की कार्यकारी परिषद (1942–1946) में 'श्रम सदस्य' के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने व्यावहारिक श्रम सुधारों में भी गहरी भूमिका निभाई। उनके काम ने कई ऐसे अधिकारों और सुरक्षा उपायों की नींव रखी, जिनसे भारतीय श्रमिकों को आज भी लाभ मिल रहा है। 1. संस्थागत और नीतिगत नेतृत्व ब्रिटिश भारत के तहत 'श्रम सदस्य' के रूप में, अंबेडकर असल में 'श्रम मंत्री' ही थे। इस भूमिका में, उन्होंने श्रम प्रशासन को एक औपनिवेशिक, शोषणकारी ढांचे से बदलकर अधिक कल्याण-उन्मुख प्रणाली में बदल दिया। उन्होंने श्रमिकों को अनियंत्रित पूंजीवाद से बचाने के लिए राज्य के हस्तक्षेप की आवश्यकता पर ज़ोर दिया। उन्होंने भारत के भीतर अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के ढांचे को मज़बूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिससे भारतीय श्रम नीतियां अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप हो गईं। 2. काम के घंटों में कमी अंबेडकर की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक भारत में '8 घंटे के कार्यदिवस' की शुरुआत करना था। इस सुधार से पहले, औद्योगिक श्रमिक अक्सर कठोर परिस्थितियों में दिन में 12–14 घंटे काम करते थे। इस सुधार ने भारत को वैश्विक श्रम मानकों के बराबर ला खड़ा किया और मानवीय कार्य परिस्थितियों की दिशा में एक बड़ा बदलाव लाया। 3. सामाजिक सुरक्षा उपाय अंबेडकर का दृढ़ विश्वास था कि राजनीतिक लोकतंत्र के साथ-साथ आर्थिक सुरक्षा भी होनी चाहिए। उन्होंने कई सामाजिक सुरक्षा उपायों की वकालत की और उन्हें शुरू किया, जिनमें शामिल हैं: महिला श्रमिकों के लिए मातृत्व लाभ, कार्यस्थल पर चोट लगने पर मुआवज़ा, और भविष्य निधि (Provident fund) योजनाएं इन उपायों ने बाद में 'कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम, 1948' और 'कर्मचारी भविष्य निधि और विविध प्रावधान अधिनियम, 1952' जैसे कानूनों को प्रभावित किया। 4. महिला श्रमिकों की सुरक्षा अंबेडकर श्रम क्षेत्र में लैंगिक न्याय के प्रबल समर्थक थे। उन्होंने ऐसी नीतियां पेश कीं जिनसे यह सुनिश्चित हो सके: सवेतन मातृत्व अवकाश, खदानों में महिलाओं के लिए भूमिगत काम पर प्रतिबंध, और समान वेतन तथा बेहतर कार्य-स्थितियां। उस समय के हिसाब से उनका दृष्टिकोण प्रगतिशील था और सामाजिक न्याय के उनके व्यापक दृष्टिकोण के अनुरूप था। 5. ट्रेड यूनियन अधिकार और औद्योगिक संबंध अंबेडकर ने सामूहिक सौदेबाजी के महत्व को पहचाना और ट्रेड यूनियनों के विकास का समर्थन किया। उन्होंने इन लक्ष्यों की दिशा में काम किया: ट्रेड यूनियनों को कानूनी मान्यता, औद्योगिक विवादों के समाधान के लिए तंत्र, और त्रिपक्षीय श्रम सम्मेलनों (सरकार, नियोक्ता, श्रमिक) को बढ़ावा देना उनके प्रयासों ने संवाद को संस्थागत बनाने और औद्योगिक संघर्ष को कम करने में मदद की। 6. न्यूनतम वेतन और उचित स्थितियां हालांकि न्यूनतम वेतन अधिनियम, 1948 स्वतंत्रता के बाद लागू किया गया था, लेकिन अंबेडकर के विचारों ने इसके ढांचे को काफी हद तक प्रभावित किया। उन्होंने लगातार यह तर्क दिया कि श्रम कोई वस्तु नहीं है, और एक गरिमापूर्ण जीवन सुनिश्चित करने के लिए श्रमिकों को उचित पारिश्रमिक मिलना चाहिए। 7. श्रमिक कल्याण कोष और आवास अंबेडकर ने श्रमिकों के आवास, स्वास्थ्य और शिक्षा में सहायता के लिए कल्याण कोष की वकालत की। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि औद्योगिक विकास में कार्यस्थल से परे श्रमिकों की भलाई के लिए भी प्रावधान शामिल होने चाहिए। 8. श्रमिक कल्याण के लिए संवैधानिक दृष्टिकोण भारतीय संविधान की प्रारूप समिति के अध्यक्ष के रूप में, अंबेडकर ने श्रमिक कल्याण को 'राज्य के नीति निदेशक तत्वों' (अनुच्छेद: 39, 41, 42 और 43) में शामिल किया, जिसमें ये अधिकार शामिल हैं: काम का अधिकार, काम की न्यायसंगत और मानवीय स्थितियां, जीवन-निर्वाह योग्य वेतन, और बेरोजगारी, बीमारी तथा वृद्धावस्था की स्थिति में सार्वजनिक सहायता ये सिद्धांत उनके इस विश्वास को दर्शाते हैं कि लोकतंत्र को सामाजिक और आर्थिक न्याय सुनिश्चित करना ही चाहिए। 9. व्यापक दार्शनिक योगदान अंबेडकर का श्रम दर्शन गरिमा, समानता और सामाजिक न्याय पर आधारित था। कार्ल मार्क्स जैसे विचारकों से प्रभावित होने के बावजूद, उनका दृष्टिकोण उनसे भिन्न था; उन्होंने हिंसक क्रांति को अस्वीकार कर दिया और इसके बजाय श्रमिक अधिकारों को प्राप्त करने के लिए संवैधानिक तरीकों की वकालत की। निष्कर्ष श्रमिक कल्याण के क्षेत्र में डॉ. अंबेडकर का योगदान अत्यंत परिवर्तनकारी था। उन्होंने केवल आर्थिक उत्पादकता पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय, मानव गरिमा और सामाजिक न्याय को केंद्र में ला दिया। समकालीन भारत में श्रमिकों को प्राप्त कई सुरक्षात्मक उपाय और अधिकार, उन्हीं के दृष्टिकोण और नीतिगत पहलों से प्रेरित हैं। डा. अंबेडकर मजदूरों को न केवल अपने अधिकारों के लिए ही लड़ने के लिए संगठित होने बल्कि राजनीतिक सत्ता प्राप्त करने के लिए भी प्रेरित किया। उनका कार्य हमें यह याद दिलाता है कि श्रमिक कल्याण केवल एक आर्थिक मुद्दा नहीं है, बल्कि एक नैतिक और संवैधानिक अनिवार्यता है, जो एक न्यायपूर्ण समाज के लिए अत्यंत केंद्रीय महत्व रखती है।

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