शुक्रवार, 22 जनवरी 2016

मायावती हैदराबाद क्यों नहीं गयी?



मायावती हैदराबाद क्यों नहीं गयी?
 -एस.आर.दारापुरी, राष्ट्रीय प्रवक्ता, आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट


हैदराबाद विश्वविद्यालय में पांच दलित छात्रों के अवैधानिक निलंबन एवं उत्पीड़न के कारण रोहित वेमुला को आत्महत्या करने के लिए मजबूर होना पड़ा. इस घटना को लेकर लगभग सभी राजनैतिक पार्टियों के बड़े नेता दलित छात्रों के साथ संवेदना व्यक्त करने के लिए गए जिस से यह मुद्दा राष्ट्रीय/अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उभरा परन्तु अपने आप को दलितों का मसीहा कहने वाली मायावती नहीं गयी. उसने इस मुद्दे पर केवल एक ब्यान और एक टीम भेज कर अपनी फ़र्ज़ अदायगी कर दी.  इस का मुख्य कारण  उसे दलितों की बजाये सवर्णों के वोट की अधिक चिंता है. वह दलितों को तो अपना जातिगत बंधुया मान कर चलती है जिसे बहुत से दलित अंध-भक्त बन कर स्वीकार भी कर लेते हैं.
अब यह विचारणीय बिंदु है कि क्या मायावाती समयाभाव के कारण हैदराबाद नहीं गयीं या फिर इस के पीछे कोई बड़ी राजनैतिक मजबूरी है. इस का एक मुख्य कारण मायावती का भाजपा प्रेम है. यह ज्ञातव्य है कि इस से पहले मायावती ने उत्तर प्रदेश में तीन बार भाजपा से गठजोड़ कर मुख्य मंत्री की कुर्सी हथियाई थी और आगे भी यदि ज़रुरत पड़ी तो मायावती को भाजपा से हाथ मिलाने में कोई गुरेज़ नहीं होगा. यह भी उल्लेखनीय है मायावती ने जब उत्तर प्रदेश में भाजपा से हाथ मिलाया था तो उसने भाजपा के नेताओं को राखी बाँधी थी. अटल विहारी वाजपयी ने उसे अपनी बेटी कहा था. इतना ही नहीं 2002 में मायावती ने गुजरात जा कर मोदी के पक्ष में चुनाव प्रचार भी किया था.
मायावती के दिखावटी दलित प्रेम के कुछ मुख्य उदहारण भी विचारणीय हैं. जब मायावती उत्तर प्रदेश की मुख्य मंत्री थी तो उसने सवर्णों के दबाव में पेरियार मेला रद्द कर दिया था और उत्तर प्रदेश में कहीं भी पेरियार की मूर्ती नहीं लगायी. इतना ही नहीं मायावती ने उत्तर प्रदेश में पेरियार की पुस्तक "सच्ची रामायण" पर प्रतिबंध लगा दिया था. इस से आगे बढ़ कर मायावती ने कांशी राम द्वारा बामसेफ के माध्यम से बनवाई गयी "तीसरी आज़ादी" फिल्म भी प्रतिबंधित कर दी थी. मायावती के दलित प्रेम की सब से दुखद परिघटना मायावती द्वारा दलितों की रक्षा के लिए बनाये गए "अनुसूचित जाति/जन जाति अत्याचार निवारण अधिनियम" के लागू करने पर रोक लगा देनी थी जिसे बाद में उच्च न्यायालय के आदेश पर रद्द करना पड़ा.
क्या आज दलितों को मायावती सहित सभी दलित नेताओं से यह नहीं पूछना चाहिए कि जब दलित मारे जा रहे हैं या आत्म हत्याएं कर रहे हैं तो उनकी क्या भूमिका है? कया उनके लिए दलित रोहित के आत्म हत्या नोट के अनुरूप केवल "वोट बैंक" हैं या इस से कुछ और अधिक भी? दलित कब तक आंबेडकर के नाम पर इन स्वार्थी नेताओं द्वारा बेवकूफ बनते रहेंगे? ज़रा डॉ. आंबेडकर की व्यक्ति पूजा और अंध भक्ति की चेतावनी पर मनन कीजिये और सोचिये कि इन नेताओं ने दलित राजनीति और दलित आन्दोलन को किस गर्त में पहुंचा दिया है. मेरे विचार में यही रोहित की शाहदत को सच्ची श्रद्धांजली होगी.

रविवार, 11 अक्टूबर 2015

क्या आरक्षण पर पुनर्विचार अथवा उसका आधार बदलने की ज़रुरत है?



क्या आरक्षण पर पुनर्विचार अथवा उसका आधार बदलने की ज़रुरत है?
-एस.आर. दारापुरी राष्ट्रीय प्रवक्ता, आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट   
बिहार में चुनाव प्रचार के दौरान मायावती ने एक बार फिर सवर्ण तबके के गरीब लोगों के लिए आर्थिक आधार पर आरक्षण की वकालत की है. इस से पहले जब मायावती उत्तर प्रदेश की मुख्य मंत्री थीं तो उन्होंने गरीब सवर्णों के लिए आर्थिक आधार पर 10% आरक्षण देने की घोषणा की थी. यद्यपि मायावती की यह घोषणा सर्वजन के फार्मूले के अंतर्गत सवर्ण वोटों को आकर्षित करने का प्रयास है परन्तु इससे भाजपा व् अन्य आरक्षण विरोधियों की आरक्षण के आधार को जाति के स्थान पर आर्थिक किये जाने की मांग को बल मिलता है जो कि दलितों/पिछड़ों के हित के खिलाफ है.
आरक्षण के बारे में एक भ्रम यह भी फैलाया गया है कि आरक्षण की समय सीमा केवल दस वर्ष थी. यह केवल अर्ध सत्य है. संविधान में दस वर्ष की समय सीमा केवल राजनैतिक आरक्षण की है जो कि समय समय पर बढ़ाई जाती रही है. सरकारी सेवाओं तथा शिक्षा के क्षेत्र में आरक्षण की कोई समय सीमा नहीं है क्योंकि इन को पूरा करने में बहुत लम्बा समय लगने की सम्भावना है. शिक्षा के क्षेत्र में प्रवेश में आरक्षण के बारे में यह भी भ्रान्ति है कि इस में अंकों के प्रतिशत की कोई सीमा नहीं है. इस बारे में सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट निर्देश है कि आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों का अंकों का प्रतिशत सामान्य जातियों के कट आफ प्रतिशत से किसी भी तरह 10% से अधिक नहीं होगा. यहाँ यह भी स्पष्ट करना है कि आरक्षित वर्ग के विद्यार्थियों को केवल प्रवेश स्तर पर ही अंकों में ढील मिलती है न कि परीक्षा पास करने में.   
यह सर्वविदित है कि हमारे संविधान में आरक्षण का आधार सामाजिक एवं शैक्षिक पिछड़ापन तथा सरकारी सेवाओं में अपर्याप्त प्रतिनिधित्व है. यह आरक्षण दलितों तथा इन क्षेत्रों में पिछड़े समूहों जिन में पिछड़ी जातियां शामिल हैं को दिया गया है. इस में कहीं भी आर्थिक आधार की बात नहीं है. इसी लिए जब जब किसी भी पार्टी की केन्द्रीय सरकार या प्रांतीय सरकार ने आर्थिक आधार पर आरक्षण देने का प्रयास किया है वह सुप्रीम कोर्ट द्वारा रद्द किया जाता रहा है. हाल में राजस्थान में भाजपा की सरकार ने आर्थिक आधार पर 14% आरक्षण देने की घोषणा तो कर दी है परन्तु इसका हाई कोर्ट अथवा सुप्रीम कोर्ट द्वारा रद्द किया जाना निश्चित है.
लगभग सभी राजनैतिक पार्टियाँ समय समय पर सवर्ण गरीबों को आर्थिक आधार पर आरक्षण देने का वादा अथवा घोषणा करके वोट लेने की कोशिश करती रही हैं जबकि वर्तमान संवैधानिक व्यवस्था के अंतर्गत ऐसा करना बिलकुल संभव नहीं है. फिर भी राजनैतिक पार्टिया जान बूझ कर आम लोगों को इस प्रकार का झांसा देती रहती हैं. आरक्षण के बारे में एक बात स्पष्ट तौर पर समझ लेनी चाहिए कि आरक्षण गरीबी उन्मूलन प्रोग्राम नहीं है. यह तो सदियों से हिंदुयों की सामाजिक व्यवस्था द्वारा वंचित किये गए तबकों की प्रशासनिक, शैक्षिक एवं राजनीतिक सत्ता में हिस्सेदारी और प्रतिनिधित्व देने का प्रयास मात्र है. संविधान निर्माण के समय आरक्षण के आधार के बारे में यही राष्ट्रीय सहमती बनी थी. हाँ यह बात सही है कि सवर्ण जातियों में भी गरीब लोग हैं. परन्तु उन की गरीबी दलितों और पिछड़ों पर सदियों से थोपे गए सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक पिछड़ेपन के मुकाबले में बहुत तुच्छ है. क्योंकि वर्तमान संवैधानिक व्यवस्था के अंतर्गत उन्हें आर्थिक आधार पर आरक्षण देना संभव नहीं है अतः उन्हें छात्रवृति तथा सस्ता क़र्ज़ आदि देकर शिक्षा के क्षेत्र में आगे बढ़ने के अवसर उपलब्ध कराए जाने चाहिए.
आज कल घुमा फिरा कर आरक्षण पर कोई भी बहस इस पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता पर आ जाती है. इसी लिए सब से पहले यह देखना उचित होगा कि क्या आरक्षण का उद्देश्य पूरा हो गया है? समाज के जिन तबकों को आरक्षण दिया गया था क्या वे राष्ट्रीय स्तर पर सभी क्षेत्रों जैसे सामाजिक, शैक्षिक, आर्थिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक में अन्य वर्गों के समतुल्य स्थान प्राप्त कर गए हैं? अभी तक का मूल्यांकन तो यह दर्शाता है कि उन की हालत में बहुत मामूली सुधार हुआ है. यदि दलितों को केन्द्रीय सरकार की सरकारी सेवाओं में 65 वर्षों में प्राप्त हुए प्रतिनिधित्व को देखा जाये तो वह प्रथम श्रेणी की सेवाओं में 22-1/2% आरक्षण के विरुद्ध मुश्किल से 15% तक पहुंचा है. इस के मुकाबले में 24 वर्षों में इस वर्ग की सेवाओं में पिछड़े वर्ग के 27% आरक्षण के विरुद्ध उनका प्रतिनिधित्व केवल 4% तक ही पहुंचा है. इसी तरह अगर शिक्षा के क्षेत्र में देखा जाये तो देश भर के विश्वविद्यालयों में दलित वर्ग के प्रोफेसरों का प्रतिनिधित्व मुश्किल से 2% भी नहीं है. यह भी देखा जाना चाहिए कि इतने वर्षों के बाद भी तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र में इन का कोटा पूरा क्यों नहीं हो पाता है? अतः यदि आरक्षण पर किसी पुनर्विचार की ज़रुरत है तो वह इस की निम्न उपलब्धि के कारणों के बारे में गहन विचार करने की है न कि इसे समाप्त करने अथवा इस का आधार बदलने के बारे में. यह भी याद रहना चाहिए कि आरक्षण व्यवस्था का लक्ष्य दलितों और पिछड़े वर्गों को विशेष अवसर देकर राष्ट्र निर्माण में उनकी भागीदारी सुनिश्चित करना भी है.  
दरअसल वर्तमान में आरक्षण विरोध का मुख्य कारण सवर्ण तबकों में बढ़ती हुयी बेरोज़गारी है. यह सर्विदित है कि सरकारी उपक्रमों के निजीकरण के कारण सरकारी क्षेत्र में नौकरियां बराबर कम हो रही हैं और सरकार अपना खर्चा कम करने के लिए नयी नौकरियां नहीं दे रही है. केंद्र में वर्तमान भाजपा सरकार ने अपना खर्चा घटाने के इरादे से एक साल तक कोई भी भर्ती न करने की घोषणा की है. 1991 में नई आर्थिक नीति लागू करते समय निजीकरण तथा भूमंडलीकरण के माध्यम से रोज़गार के अवसरों के असीमित बढ़ने के सपने दिखाए गए थे परन्तु परिणाम बिलकुल उल्टा निकला है. रोज़गार के अवसरों में बढ़ोतरी के स्थान पर कमी हुयी है. भाजपा की वर्तमान सरकार ने भी चुनाव में हर बेरोजगार को काम देने का वादा किया था परन्तु अभी तक इस दिशा में कोई भी उपलब्धि दिखाई नहीं दी है. दूसरी तरफ निजी क्षेत्र जिसे मोदी हर तरह की सुविधा/छूट दे रहे हैं, लाभ कमा  कर मालामाल हो रहा है परन्तु सरकार उन पर रोज़गार के अवसर पैदा करने के लिए कोई भी दबाव नहीं डाल रही है.
अतः यह वांछनीय है कि सभी राजनैतिक पार्टियां बेरोजगार युवाओं को आरक्षण का झुनझुना पकड़ा कर बरगलाने की जगह वर्तमान सरकार पर रोज़गार के अवसर पैदा करने का दबाव डालें. इस का सब से कारगर उपाय तो रोज़गार को मौलिक अधिकार घोषित करने का ही है जिसके लिए व्यापक जनांदोलन की ज़रुरत है.  यदि रोज़गार मौलिक अधिकार बन जाता है तो फिर सरकार को अपनी कार्पोरेट परस्त नीतियाँ बदलनी पड़ेंगी. फिर सरकार या तो सभी बेरोजगारों को रोज़गार देगी या फिर सब को बेरोज़गारी भत्ता देगी. ऐसा हो जाने पर चाहे वह भागवत हों या मायावती , किसी को भी युवाओं को आरक्षण का झुनझुना दिखा कर बरगलाने का मौका नहीं मिलेगा और न ही आरक्षण के नाम पर बेरोज़गारी से ध्यान बटाने का. रोज़गार को मौलिक अधिकार बनाने की मांग को लेकर गत वर्ष आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट के राष्ट्रीय संयोजक, अखिलेन्द्र प्रताप सिंह ने जंतर मंतर पर 10 दिन का अनशन किया था. इसी मुद्दे को लेकर “उत्तर प्रदेश बचाओ अभियान” के अंतर्गत 28 अक्तूबर, 2015 को गंगा प्रसाद मेमोरियल हाल, अमीनाबाद, लखनऊ में “युवा संकल्प सभा” का आयोजन किया गया है जिस में पूरे प्रदेश से भारी संख्या में युवा भाग लेंगे.     
   

शनिवार, 12 सितंबर 2015

महात्मा बनाम महात्मा - प्रो. गेल ओम्वेट



महात्मा बनाम महात्मा
-प्रो. गेल ओम्वेट


नोट: गेल ओम्वेट का यह लेख गांधीवाद और फुले विमर्श का एक बहुत सटीक विवेचन है. - एस. आर. दारापुरी 

जोतिबा फूले के दिल में वंचित तबकों के प्रति करुणा भाव देख कर उन्हें भी गाँधी की तरह ही “महात्मा” की उपाधि से नवाज़ा गया है. लेकिन इस उपाधि की समानता को अपवाद माना जाये तो वे हरेक रूप में प्रसिद्ध “महात्मा” के बिलकुल विपरीत थे. महात्मा गाँधी जहाँ धार्मिक श्रद्धा से भरा संभ्रांत वर्ग का प्रतिनिधित्व करने वाले एक ऐसे व्यक्ति थे, जो स्वतंत्रता आन्दोलन के लिए धार्मिक भावनाओं का भरपूर इस्तेमाल किया करते थे, तो वहीँ दूसरी ओर फूले ऐसे महात्मा थे, जो मूर्तिभंजक (अंध विशवास) विरोधी थे और जनसमुदाय से निकले हुए एक ऐसे बुद्धिजीवी, जिन्होंने जातिवाद और अन्य तमाम असमानताओं के खिलाफ उस संभ्रांत तबके का विरोध किया जो गाँधी जी का समर्थक था. भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए भी इन दोनों के प्रतीक भी एकदम भिन्न थे. गाँधी ने “राम राज”का नारा दिया तो फूले ने “बलि राज” का. मतलब इन दोनों के बीच बहुत गहरे विरोधाभास हैं.
गाँधी के लिए “राम राज” प्रतीक का अर्थ देश के लिए महज़ धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान नहीं थी बल्कि इस में उनकी धर्म और पुराण पर आधारित भावनात्मक संतुष्टि भी जुडी हुयी थी. शायद इसी लिए उन्होंने भारत की अपार सांस्कृतिक-धार्मिक संपदा के चुनाव में सब से विवादस्पद प्रतीक का ही चुनाव किया.
राम की कहानी में पुरूषवाद, सामंतवाद और जातिवाद की तीव्र बदबू है. इस में आदर्श परिवार का मतलब – एक श्रद्धालु भाई, भरोसेमंद पत्नी, विश्वसनीय सेवक जैसे लुभावने प्रतीक, जो एक हिन्दू महिला का आदर्श निर्माण करता है किन्तु ये आदर्श विषमता यानि उंच-नीच पर आधारित हैं.
फिर हम कैसे भूल सकते हैं कि “राम राज” में खुद राम के द्वारा एक शूद्र सन्यासी शम्बूक की हत्या को जायज़ ठहराया गया है. हालाँकि गाँधी जी तमाम राम भक्तों की तरह अपने राम को शांतिप्रिय और सही बताना चाहते थे. पर राम की कहानी में इस मान्यता का स्पष्ट विरोध दिखाई देता है. मुस्लिम आक्रमण जो सबसे प्रभावी रूप में तुर्कों के आगमन के साथ हुआ उसकी तीव्र प्रतिक्रिया राम की कथा में दिखती है. राम स्पष्ट रूप से हिन्दुवाद का संरक्षक और दानवी घुसपैठियों का विरोधी था पर गाँधी इसमें हिन्दू-मुस्लिम एकता को शामिल करना चाहते थे. वे बेशक अपने इस प्रयास के लिए ताउम्र लड़ते भी रहे, परन्तु यह हास्यस्पद  विरोधाभास है कि उनका इसके लिए हिन्दू और मुस्लिम समुदायों को जोड़ना इन दोनों समुदायों में और साम्प्रदायिकता भरने में कारगर सिद्ध हुआ और अंतत इन दोनों समुदायों ने ही एक दूसरे के लिए कट्टरता भर ली.
सच्चाई यह है कि “राम राज” महज भारत को आज़ाद कराने से अधिक की सोच थी. राम राज दरअसल धार्मिक रूप से परिभाषित एक ऐसा यूटोपिया था, जिसने किसी भी भारतीय परम्परा पर सवाल उठाने की जहमत नहीं उठाई. यह आदर्श भारतीय ग्राम समाज की परिकल्पना थी, जो मानव को आधुनिकता से बिलकुल दूर रखती थी. हिन्दू परम्परा के प्रति गाँधी जी की सोच भी कभी आलोचनात्मक नहीं थी. वे उसमें से किसी एक बात का भी विवेचन करने में विश्वास नहीं रखते थे. इसी लिए वे गीता जैसी युद्ध शिक्षा की किताब को भी अहिंसा के पाठ में शामिल करने से नहीं हिचकते थे. गाँधी हिन्दू परम्पराओं में शामिल असमानता के तत्व को भी हरदम नज़रंदाज़ करते हुए इनके विरोध का भी दावा किया करते थे.
दूसरी ओर फूले द्वारा “बलि राज” के प्रतीक का प्रयोग बिलकुल ही अलग था. उन्होंने “बलि” को सीधे किसी परम्परा या मान्यता से नहीं उठाया था, बल्कि उसका पुनरविवेचन किया था. उन्होंने “आर्य सिद्धांत” को पलटकर स्पष्ट किया कि उन्होंने गैर-आर्य, जो भारत के मूलनिवासी थे और आर्यों से युद्ध में हार गए थे.
पारम्परिक मान्यता के अनुसार बलि एक राक्षस था, जिसे ब्राह्मण अवतार वामन ने सीधा नरक में पहुँचा दिया था. लेकिन इस के विपरीत फूले के द्वारा प्रस्तुत पुनरविवेचन प्रचलित किसान-परम्परा पर आधारित था. आज भी महाराष्ट्र के किसान बलि को एक आदर्श राजा के रूप में याद करते हैं, जिस की पुष्टि उनकी लोकोक्ति “ इड़ा पीड़ा हर जाये बलि राजा वापस आए” से होती है. केरल के ओणम त्यौहार में यह माना जाता है कि आदर्श राजा बलि वापस पृथ्वी पर आये हैं. बलि के चुनाव में फूले ब्राह्मणवादी परम्परा के ऐतहासिक आर्य-अनार्य संघर्ष को उभार कर चुनौती दे रहे थे.
वहीँ गाँधी राम पर विश्वास रखते थे और उनका राम पर विश्वास इस हद तक था कि उन्होंने उस के महिला विरोधी, और जातपांत से भरे काम को नज़रंदाज़ कर एक आदर्श राजा के रूप में माना. लेकिन फूले ने बलि के चुनाव में उन्हें इस रूप में नहीं माना. उनकी अपनी सत्य शोधक वृति आस्था और विशवास से परे थी. उन्होंने इतिहास में जाकर एक आदर्शवादी यूटोपिया की खोज की. इस तरह बलि के राज “बलिस्थान” के निर्माण के पीछे कोई कल्पना लोक नहीं, बल्कि एक राज्य को स्थापित करने की आशा थी, जिसमे शिक्षा, संघर्ष और उपलब्धि हो.
जहाँ गाँधी का “राम राज” एक आदर्श गाँव था जहाँ शांति, मधुरता, स्थायित्व परन्तु उद्योगों का विरोध था. उन्होंने मानव को बिना कारण भावना और लोभ में झूलते देखा था. वे उनकी ज़रूरतों को नियंत्रित करना चाहते थे, ताकि वे भक्तों की तरह रहें. गाँधी का चरखा न सिर्फ आत्मनिर्भरता का प्रतीक था, बल्कि यह एक किस्म की आत्म-आश्रितता का भी प्रतीक था जो अमानवीय मशीनों के विरुद्ध औद्योगीकरण का विरोध कर रहा था. यह फूले की मानवतावादी दृष्टि की कल्पना, निर्माता, शोधार्थी, उद्यमी और परिवर्तनशीलता से विपरीत था. फूले ने मानव और पशु के बीच मूल अंतर यह पाया कि मानव में प्रयास से निरंतर परिवर्तन संभव है. इस मामले में फूले और उनके बाद बाबा साहेब डा. आंबेडकर दोनों ही  मार्क्स से मेल खाते थे कि मानव इतिहास में चाहे जो भी जीते, शोषण हो, प्रताड़ना हो, वह जिस हद तक उत्पादन की ताकत है, वह मानव क्षमता का भी विकास करेगी ही. औद्योगीकरण एक उपलब्धि है जिसने ख़ुशी लायी, यह किसी किस्म की गुलामी नहीं है. गाँधी आजाद भारत के स्वपन को परिभाषित करने में उस धर्म की स्तुति करने बैठ गए थे, जो मुस्लिम विरोधी और दलित विरोधी है. यह उन्हें मान्यता प्रदान करता है, जो राम को देशभक्ति का प्रतिरूप मानते हैं, जबकि इस पिछड़ेपन के विपरीत फूले का ऐतहासिक मूल्यांकन जो बलि रजा को गाथायों से निकाल कर एक नया अर्थ देता है, उन्हें देश के बहुसंख्यक पीड़ितों से जोड़ता है और वास्तव में भारत के भविष्य का एक नया आधार तय करता है.
 (मूक्वक्ता से साभार)


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