सोमवार, 14 अक्टूबर 2024

डाक्टर अम्बेडकर का दलितों के आर्थिक सशक्तिकरण का सपना अधूरा

 

डाक्टर अम्बेडकर का दलितों के आर्थिक सशक्तिकरण का सपना अधूरा

-दिनकर कपूर, प्रदेश महासचिव, आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट

दीक्षा दिवस (14 अक्तूबर) पर विशेष

14 अक्टूबर 1956 को डॉक्टर अंबेडकर ने हिंदू धर्म में मौजूद छुआछूत, जातीय और वर्णीय विभाजन के कारण नागपुर में धम्म परिवर्तन कर बौद्ध धर्म को ग्रहण किया था। इस दिन का महत्व उनके मानने वालों में उसी तरह है जैसे 14 अप्रैल उनके जन्म दिवस और 6 दिसम्बर उनके परिनिर्वाण दिवस का है। कुछ लोग इसे विजयादशमी यानी दशहरा वाले दिन भी मनाते हैं क्योंकि 1956 में इसी दिन दशहरा का दिन पड़ा। डॉक्टर अंबेडकर ने उससे से पहले कहा था कि वह हिंदू धर्म में पैदा हुए यह उनके वश में नहीं था लेकिन उनकी मृत्यु हिंदू धर्म में नहीं होगी।

डाक्टर अम्बेडकर का पूरा जीवन शोषित, उत्पीड़ित और वंचित वर्गों के उत्थान के लिए संघर्ष करने में व्यतीत हुआ। वह चाहते थे कि यह तबके भारत में नागरिक अधिकारों को पा सकें और सम्मानजनक जीवन जी सकें। इसीलिए उन्होंने आरक्षण की दोहरी नीति पर काम किया। पहला सामाजिक सहभागिता दूसरा आर्थिक सशक्तिकरण। सामाजिक सहभागिता में राजनीति, नौकरी और शिक्षा में आरक्षण, सम्मानजनक जीवन जैसे अधिकार शामिल रहे और आर्थिक सशक्तिकरण में बजट में एससी-एसटी का हिस्सा, जमीन का अधिकार, रोजगार, शिक्षा व स्वास्थ्य के सवाल शामिल रहे। आरक्षण से दलितों की सत्ता संचालन में कुछ भागीदारी हुई है पर आर्थिक सशक्तिकरण का सवाल अभी भी अधूरा है।

          2011 की जनगणना के अनुसार देश में अनुसूचित जाति की जनसंख्या 20 करोड़ है। जिसमें से मात्र 3.95 प्रतिशत दलित परिवारों के पास नौकरी है जिसमें 2.47 प्रतिशत परिवार निजी क्षेत्र में रोजगार करते हैं। 83 प्रतिशत दलित परिवार 5000 से कम आमदनी पर अपनी आजीविका को चलाते हैं। 11.74 प्रतिशत परिवार 5000 से 10000 के बीच में अपनी जीविका को चलाते हैं। 4.67 प्रतिशत परिवार 10,000 से ज्यादा कमाते हैं और 3.50 प्रतिशत परिवार ही 50,000 से ज्यादा की आमदनी पर अपनी जीविका चलाते हैं। यदि हम देखें तो दलित परिवारों में 42 प्रतिशत भूमिहीन और आदिवासियों में 35.30 प्रतिशत भूमिहीन परिवार हैं। 94 प्रतिशत दलित और 92 प्रतिशत आदिवासी मजदूरी व अन्य पेशों से अपनी जीविका चलाते हैं। दलित परिवारों के पास 18.5 प्रतिशत असिंचित, 17.41 प्रतिशत सिंचित और 6.98 प्रतिशत अन्य भूमि है। दलितों के विकास के लिए आजादी से पहले से ही सरकार के बजट में विशेष उपबंध किए गए थे। इसके बावजूद भी विकास का सवाल हल नहीं हुआ है।

        इस वित्तीय वर्ष में सरकार द्वारा लाए एससी सब प्लान को देखें तो इस सब प्लान के बजट का बड़ा भाग कार्पोरेट मुनाफे के लिए खर्च किया गया है। वित्तीय वर्ष 2024-25 में भारत सरकार ने एससी सब प्लान बजट में 1,65,492.72 करोड़ रुपए का बजट आवंटित किया है जो पिछले वित्तीय वर्ष से 7,345 करोड़ रुपए ज्यादा है। बढ़ती हुई महंगाई को देखते हुए यह वृद्धि ऊंट के मुंह में जीरा के समान है। इसमें भी केंद्र सरकार ने काफी पैसा कॉर्पोरेट घरानों के लिए आवंटित किया है। अदानी द्वारा चलाए जा रहे जल जीवन मिशन में 15,435 करोड़ रुपए, अदानी के ही सोलर पावर ग्रिड में 895 करोड़ रूपया, सेमी कंडक्टर निर्माण और उसके डेवलपमेंट में 573 करोड़ रूपया, लिंक्ड इंसेंटिव स्कीम में 514 करोड़ रूपया,  टेलीकम्युनिकेशन 1,585 करोड़, यूरिया सब्सिडी में 10,510.98 करोड़ व न्यूट्रीएंट बेस्ड सब्सिडी में 3,844.70 करोड़ रूपया का आवंटन किया गया है।

        वहीं दूसरी तरफ यदि देखें तो दलितों के कल्याण की जो योजनाएं चल रही थीं उनमें भारी कटौती की गई है। कृषि और किसान वेलफेयर के नाम पर जो बजट आवंटित किया गया है उसमें प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में करीब 200 करोड़ रुपए की कटौती की गई है। नेचुरल फार्मिंग में 10 करोड़ रूपया, प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि में 300 करोड़ रूपया, देश में 10,000 किसानों के फार्मर प्रोड्यूसर ऑर्गेनाइजेशन (एफपीओ) में 80 करोड़ रूपया, राष्ट्रीय कृषि विकास योजना में 50 करोड़ रूपया, मॉडिफाइड इंटरेस्ट सब्वेंशन स्कीम केसीसी (किसान क्रेडिट कार्ड) में 500 करोड़ रूपए की कटौती की गई है।

    खाद्य व सार्वजनिक वितरण मंत्रालय का बजट जहां 2023-24 में 19,156.04 करोड़ था वहीं इस वित्तीय वर्ष में इसे घटाकर 18,742.80 करोड़ रूपए कर दिया गया है। दलितों के देशभर में किए जाने वाले सांस्कृतिक समारोह के बजट में 20 करोड़ रुपए की कटौती की गई है। प्रधानमंत्री उत्तर पूर्व क्षेत्र के विकास के लिए पहल में 10 करोड़ रूपए की बजट कटौती हुई है। जहां यह पहले 200 करोड़ था वहीं इस बार 190 करोड़ है। इस क्षेत्र के लिए स्पेशल विकास योजना में भी 10 करोड़ की कटौती हुई है।

         यूजीसी के अनुसूचित जाति छात्रों के बजट में 679.46 करोड़ की भारी कटौती की गई है। आईआईटी में अध्ययनरत दलित छात्रों पर खर्च किए जाने वाले बजट में 60 करोड़ रुपए कम किए गए हैं। देश के गरीबों का आयुष्मान भारत (पीएम जय योजना) से इलाज कराने का बड़ा दावा करने वाले प्रधानमंत्री मोदी के बजट में दलितों पर इसमें आने वाले खर्च में बेहद मामूली महज 37 करोड़ रुपए की वृद्धि की गई है। जो इस वर्ष की 70 वर्ष से ऊपर के सभी वृद्धजनों को इसमें शामिल करने की गई घोषणा की तुलना में और भी कम हो जाती है।

         अनुसूचित जाति के श्रमिकों और रोजगार के लिए जो बजट दिया गया है वह भी बहुत कम है। असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों के डाटा निर्मित करने के बजट में 23 करोड़ रुपए की कटौती की गई है। बड़े जोर शोर से शुरू की गई प्रधानमंत्री श्रम योगी मानधन योजना में 30 करोड़ की कटौती की गई है और प्रधानमंत्री कर्मयोगी मानधन योजना में तो इस वर्ष कोई बजट ही आवंटित नहीं किया गया है। आत्मनिर्भर भारत रोजगार योजना जिसे कुछ दिनों पहले सरकार ने बड़े प्रोपेगैंडा के साथ प्रारंभ किया था में 2023-24 में आवंटित 384.24 करोड़  रुपए को घटाकर 24.90 करोड़ रुपए कर दिया गया है। एमएसएमई का बजट जो 2022-23 में 4,534.58 करोड़ था, 2023-24 में 3,755.01 करोड़ और इस बार 3,630.30 करोड़ रुपए कर दिया गया है। इमरजेंसी क्रेडिट लोन जो छोटे और लघु उद्योग के लिए लोग लेते हैं उसमें 800 करोड़ रुपए की कमी इस सरकार ने की है।

      सोशल असिस्टेंटस का जो प्रोग्राम था उसका एक भी पैसा पिछले वित्तीय वर्ष की तुलना में बढ़ाया नहीं गया है। वृद्धा पेंशन, विधवा पेंशन, विकलांग पेंशन में जो बजट 2023-24 में 1,735.37 करोड़ था वही इस बार भी आवंटित किया गया है। मनरेगा के बजट में 2,250 करोड़ रुपए की कटौती की गई है वर्ष 2023-24 में दलितों के लिए मनरेगा में 13,250 करोड़ रुपए आवंटित किया गया था जो इस बार 11,000 करोड़ रूपया है। प्रधानमंत्री आवास योजना की बड़ी चर्चा होती है परंतु  इसमें भी सरकार ने 700 करोड़  रुपए घटाने का काम किया है। पोस्ट मैट्रिक स्कॉलरशिप में 10 करोड़ रूपया की कमी और प्री मैट्रिक स्कॉलरशिप में कोई भी बजट वृद्धि नहीं की गई है।

प्रधानमंत्री अनुसूचित जाति अभ्युदय योजना (पीएमअजय) में 100 करोड़ रुपए की वृद्धि की गई है जो बेहद कम है। सामर्थ्य योजना जिसमें शक्ति सदन, स्वाधार, उज्ज्वला, विधवा गृह, कामकाजी महिला छात्रावास, उनके बच्चों की देखभाल के लिए पालना गृह, प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना उसका बजट 297.52 करोड़ रूपए पिछले बजट के बराबर ही रखा गया है। दलित लड़कियों के छात्रावास के लिए महज 20 लाख रुपए आवंटित किए गए हैं।

उपरोक्त आंकड़ों  से स्पष्ट है कि मोदी सरकार की मंशा दलितों के विकास और उनके उत्थान की नहीं है। यह भी स्पष्ट है कि यदि दलितों के सशक्तिकरण की दिशा में काम नहीं हुआ तो उनकी सामाजिक सहभागिता भी सम्भव नहीं होगी। आगरा में दिए अपने अंतिम भाषण में डाक्टर अम्बेडकर ने कहा था कि मैं भूमिहीनों की दुख तकलीफों को नजरन्दाज नहीं कर पा रहा हूँ। उनकी तबाहियों का मुख्य कारण उनका भूमिहीन होना है। इसलिए वे अत्याचार और अपमान के शिकार होते रहते हैं और वे अपना उत्थान नहीं कर पाते। मैं इसके लिये संघर्ष करूंगा। डॉक्टर अंबेडकर का यह संकल्प आज भी प्रासंगिक है जिसे पूरा करना दलित राजनीति का लक्ष्य होना चाहिए।

 

शनिवार, 5 अक्टूबर 2024

न्यायालय ने जेलों में जाति-आधारित भेदभाव को फटकार लगाई

 

न्यायालय ने जेलों में जाति-आधारित भेदभाव को फटकार लगाई

द्वारा विकास पराश्रम मेश्राम

05/10/2024

(मूल अंग्रेजी से हिन्दी अनुवाद: एस आर दारापुरी, राष्ट्रीय अध्यक्ष, आल इंडिया पीपुल्स फ्रन्ट)

एक ऐतिहासिक निर्णय में, सर्वोच्च न्यायालय ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को जेलों में जाति-आधारित भेदभाव और श्रम के पृथक्करण को रोकने के लिए जेल नियमों में तत्काल संशोधन करने का निर्देश दिया है। न्यायालय ने कहा कि यह संविधान के अनुच्छेद 15 का उल्लंघन है। इसने कहा कि जाति के आधार पर खाना पकाने और सफाई जैसे कार्यों को विभाजित करना अनुचित है। सर्वोच्च न्यायालय की तीन न्यायाधीशों की पीठ ने इस बात पर प्रकाश डाला कि जेल नियम जाति के आधार पर काम के आवंटन में भेदभाव करते हैं। उच्च जातियों के कैदियों को खाना पकाने का काम और निचली जातियों के कैदियों को सफाई का काम सौंपना संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन है, जो जेलों के भीतर जाति-आधारित भेदभाव को बढ़ावा देता है।

न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि जाति के आधार पर काम का पृथक्करण एक औपनिवेशिक मानसिकता को दर्शाता है जो स्वतंत्र भारत में जारी नहीं रह सकता। सर्वोच्च न्यायालय ने जेल के काम में जाति-आधारित भेदभाव को असंवैधानिक घोषित किया। इस फैसले ने मद्रास उच्च न्यायालय के उस फैसले को पलट दिया, जिसमें जाति के आधार पर कैदियों को अलग करने की प्रथा को अनुमति दी गई थी। यह फैसला पत्रकार सुकन्या शांता द्वारा दायर एक जनहित याचिका (पीआईएल) की सुनवाई के दौरान आया, जिन्होंने 17 राज्यों की जेलों में जाति-आधारित भेदभाव को उजागर किया था। *सी. अरुल बनाम सरकार के सचिव (2014)* का मामला इसके केंद्र में था, जहां याचिका में जेलों में जाति-आधारित भेदभाव को रोकने और पलायमकोट्टई जेल से कैदियों को रिहा करने की मांग की गई थी। हालांकि, उच्च न्यायालय ने पहले याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया था। सी. अरुल मामले में अपना फैसला सुनाते हुए, अदालत ने राज्य के इस तर्क को ध्यान में रखा कि तिरुनेलवेली और तूतीकोरिन जैसे जिलों में सांप्रदायिक संघर्षों को रोकने के लिए कैदियों को जाति के आधार पर अलग किया जाता है। मुख्य न्यायाधीश डॉ. डी.वाई. चंद्रचूड़ के नेतृत्व में सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और मनोज मिश्रा के साथ इस औचित्य को खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया कि जाति-आधारित अलगाव जैसे चरम उपायों का सहारा लिए बिना जेल में अनुशासन और व्यवस्था बनाए रखना राज्य की जिम्मेदारी है। न्यायालय ने राजस्थान जेल मैनुअल के दो प्रमुख नियमों, नियम 37 और नियम 67 का हवाला दिया, जिसमें जेल के कामों के लिए जाति-आधारित प्रावधानों का उल्लेख है। उदाहरण के लिए, नियम 67 में निर्दिष्ट किया गया है कि रसोइया उच्च जाति का होना चाहिए, जैसे कि ब्राह्मण या उच्च जाति का हिंदू। ये नियम भारतीय समाज में जाति-आधारित विभाजन की वास्तविकता को दर्शाते हैं, जहाँ समुदाय जाति के आधार पर काम करते हैं। न्यायालय ने आगे कहा कि जेल के काम में जाति-आधारित भेदभाव को "बौद्धिक भेदभाव" या "उचित वर्गीकरण" नहीं माना जा सकता। यह सीधे तौर पर अनुच्छेद 15 का उल्लंघन करता है, जो धर्म, नस्ल, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव को रोकता है, साथ ही अनुच्छेद 14, जो कानून के समक्ष समानता सुनिश्चित करता है। "बौद्धिक भेदभाव" की अवधारणा इस विचार पर आधारित है कि लोगों के एक विशिष्ट समूह में सामान्य विशेषताएँ होती हैं, जो कुछ वर्गीकरणों को उचित ठहराती हैं। उदाहरण के लिए, 1961 का मातृत्व लाभ अधिनियम केवल कामकाजी महिलाओं पर लागू होता है, क्योंकि उन्हें अपने अपेक्षित बच्चे की देखभाल के लिए विशेष सुरक्षा की आवश्यकता होती है, जो ऐसे कानूनों के तार्किक आधार को उजागर करता है। भारत में, जहाँ सामाजिक विभाजन बहुत गहराई से जड़ जमाए हुए हैं, वहाँ कानून विभिन्न समुदायों द्वारा सामना की जाने वाली सामाजिक असमानताओं और चुनौतियों को संबोधित करने के लक्ष्य के साथ बनाए जाते हैं। इन विभाजनों को बनाए रखने के बजाय, कानूनों का उद्देश्य उन लोगों को अवसर प्रदान करना होना चाहिए जो हाशिए पर हैं और जिन्हें अतिरिक्त सुरक्षा की आवश्यकता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जेल नियम स्पष्ट रूप से भेदभाव करते हैं, और नियमों में जाति का कोई भी उल्लेख असंवैधानिक है। कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को ऐसे भेदभावपूर्ण प्रावधानों को हटाने के लिए अपने जेल मैनुअल में तुरंत संशोधन करने का निर्देश दिया है। राज्यों को कोर्ट में अनुपालन रिपोर्ट भी जमा करनी होगी। मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने पत्रकार सुकन्या शांता द्वारा इस मुद्दे को प्रकाश में लाने के बाद यह निर्णय लिया। उन्होंने तर्क दिया था कि 17 राज्यों की जेलों में जाति आधारित भेदभाव प्रचलित है। दिसंबर 2023 में, उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की। कोर्ट ने अब राज्यों को अपने आदेश का पालन करने के लिए तीन महीने का समय दिया है। उल्लेखनीय है कि मामले की पहली सुनवाई जनवरी 2024 में हुई थी और सुप्रीम कोर्ट ने 17 राज्यों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था। छह महीने के भीतर, केवल उत्तर प्रदेश, झारखंड, ओडिशा, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल ने ही अदालत को जवाब दिया। 2020 में, सुकन्या ने राजस्थान सहित तीन प्रमुख राज्यों के उदाहरणों का हवाला देते हुए एक शोध रिपोर्ट प्रकाशित की थी, जहाँ कैदियों को जाति के आधार पर काम सौंपा जाता था, जैसे कि नाई बाल काटते थे, ब्राह्मण खाना बनाते थे और वाल्मीकि सफाई करते थे। 1941 के उत्तर प्रदेश जेल मैनुअल में भी जातिगत पूर्वाग्रहों को दर्शाने वाले प्रावधान थे।

न्यायालय ने सुनवाई पूरी करने में दस महीने का समय लिया, जिसकी अंतिम सुनवाई 10 जुलाई को हुई। इस सुनवाई के दौरान न्यायालय ने उत्तर प्रदेश जेल मैनुअल के प्रावधानों की आलोचना की। कुछ नियमों को पढ़ने के बाद न्यायालय ने राज्य सरकार को फटकार लगाते हुए कहा कि ये नियम बहुत दर्दनाक हैं। गृह मंत्रालय ने फरवरी में ही एक नोटिस जारी कर इस तरह के जाति-आधारित भेदभाव को अवैध घोषित कर दिया था। न्यायालय ने राज्यों और केंद्र सरकार को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि उनके जेल नियमों में कोई भेदभावपूर्ण प्रावधान न हो और कैदियों के बीच कटुता को बढ़ावा देने से बचने के लिए जेल अधिकारी कैदियों के साथ मानवीय व्यवहार करें।

सुप्रीम कोर्ट ने इस जाति-आधारित भेदभाव को औपनिवेशिक अवशेष बताया है जिसे तुरंत खत्म किया जाना चाहिए, क्योंकि हर कैदी को सम्मान के साथ जीने का अधिकार है।

विकास पराशराम मेश्राम एक सामाजिक कार्यकर्ता और आदिवासी और हाशिए के समुदायों के अधिकारों के लिए काम करने वाले कार्यकर्ता हैं। ईमेल: vikasmeshram04@gmail.com

साभार: countercurrents.org

इलाहाबाद उच्च न्यायालय की उत्तर प्रदेश की नौकरशाही पर टिप्पणी: संवैधानिक शासन के लिए एक स्पष्ट आह्वान

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