सोमवार, 2 मार्च 2026

एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तकों से मुगल काल को हटाने के निहितार्थ: इतिहास, स्मृति और लोकतांत्रिक शिक्षा

 

एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तकों से मुगल काल को हटाने के निहितार्थ: इतिहास, स्मृति और लोकतांत्रिक शिक्षा

-    एस आर दारापुरी आईपीएस (से.नि.)

National Council of Educational Research and Training (एनसीईआरटी) द्वारा प्रकाशित विद्यालयी इतिहास की पुस्तकों से मुगल काल को हटाने या उसके महत्त्व को अत्यधिक कम करने का प्रश्न केवल पाठ्यक्रम-संशोधन का विषय नहीं है। यह इतिहास-लेखन की प्रकृति, राष्ट्रीय पहचान के निर्माण, और भारत में लोकतांत्रिक नागरिकता के भविष्य से जुड़ा एक गहन बौद्धिक और राजनीतिक प्रश्न है। भारत जैसे देश में, जहाँ करोड़ों विद्यार्थियों की ऐतिहासिक चेतना विद्यालयी पाठ्यक्रमों के माध्यम से निर्मित होती है, अतीत का चयनात्मक संपादन व्यापक सामाजिक परिणाम उत्पन्न करता है। मुगल काल, जो लगभग सोलहवीं से अठारहवीं शताब्दी तक फैला हुआ था, आधुनिक भारत के निर्माण की प्रक्रिया में एक केंद्रीय ऐतिहासिक चरण माना जाता रहा है। इसलिए उसका हटाया जाना या सीमित किया जाना बहुआयामी निहितार्थ रखता है।

मुगल साम्राज्य की स्थापना 1526 में Babur द्वारा हुई और उसका प्रशासनिक व क्षेत्रीय सुदृढ़ीकरण Akbar के शासन में हुआ। लगभग तीन शताब्दियों तक मुगल शासन ने प्रशासनिक संरचना, आर्थिक तंत्र, सांस्कृतिक जीवन और राज्य-व्यवस्था को गहराई से प्रभावित किया। मनसबदारी प्रणाली, भू-राजस्व व्यवस्था, और केंद्रीकृत प्रशासनिक ढाँचा भारतीय राज्य-व्यवस्था के विकास में महत्वपूर्ण रहे। कृषि उत्पादन, राजस्व का मौद्रीकरण और व्यापारिक नेटवर्क के विस्तार ने भारत को एशियाई और वैश्विक वाणिज्यिक संरचनाओं से जोड़ा। आगरा, दिल्ली और लाहौर जैसे नगर वाणिज्य, कला और बौद्धिक आदान-प्रदान के केंद्र बने।

मुगल काल को हटाना ऐतिहासिक निरंतरता को बाधित करता है। भारतीय इतिहास किसी एकरूप सभ्यता का सरल क्रम नहीं, बल्कि विविध अंतःक्रियाओं, संघर्षों और समन्वयों की सतत प्रक्रिया है। मुगल युग प्राचीन और मध्यकालीन व्यवस्थाओं से औपनिवेशिक आधुनिकता तक की यात्रा में एक महत्वपूर्ण सेतु है। इसके बिना इतिहास की काल-रेखा खंडित प्रतीत होती है और मध्यकालीन भारत एक “अंतराल” के रूप में दिखने लगता है, न कि एक विकासशील ऐतिहासिक चरण के रूप में। इससे विद्यार्थियों की विश्लेषणात्मक समझ कमजोर हो सकती है।

धर्मनिरपेक्ष और बहुलतावादी दृष्टिकोण पर इसका प्रभाव विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। मुगल काल शक्ति और विविधता के बीच जटिल संतुलन का उदाहरण प्रस्तुत करता है। Akbar की सुलह-ए-कुल (सार्वभौमिक शांति) की नीति, धार्मिक सहिष्णुता और प्रशासनिक समावेशन की दिशा में एक प्रयोग थी। विभिन्न धार्मिक समुदायों के साथ संवाद और सहयोग ने साम्राज्य को स्थायित्व प्रदान किया। बाद के शासकों, जैसे Aurangzeb, के शासनकाल को लेकर इतिहासकारों में मतभेद हैं, परंतु यह भी सत्य है कि साम्राज्य विविध सामाजिक समूहों के साथ व्यवहारिक गठबंधनों पर आधारित था। इस जटिलता को हटाकर एकरेखीय चित्र प्रस्तुत करना सामुदायिक ध्रुवीकरण को बढ़ावा दे सकता है।

सांस्कृतिक दृष्टि से मुगल काल की विरासत आज भी भारत की भौतिक और सांस्कृतिक संरचना में विद्यमान है। Shah Jahan के शासनकाल में निर्मित Taj Mahal भारतीय विरासत का वैश्विक प्रतीक है। Red Fort और Jama Masjid न केवल ऐतिहासिक स्मारक हैं, बल्कि राष्ट्रीय जीवन के जीवंत प्रतीक भी हैं—विशेषतः लाल किले से प्रतिवर्ष स्वतंत्रता दिवस का संबोधन। भाषा, साहित्य, संगीत, चित्रकला, स्थापत्य और खान-पान की परंपराएँ इस काल की सांस्कृतिक अंतःक्रियाओं का परिणाम हैं। इस ऐतिहासिक संदर्भ को हटाना विद्यार्थियों को उनकी जीवित सांस्कृतिक विरासत से अलग कर देता है।

लोकतांत्रिक शिक्षा के संदर्भ में भी यह प्रश्न गंभीर है। पाठ्यपुस्तकें केवल तथ्यों का संकलन नहीं होतीं; वे नागरिक चेतना का निर्माण करती हैं। यदि इतिहास को इस प्रकार संपादित किया जाए कि किसी विशेष समुदाय या कालखंड को हाशिए पर रखा जाए, तो राष्ट्रीय पहचान संकुचित हो सकती है। लोकतंत्र की मजबूती आलोचनात्मक सोच और ऐतिहासिक जटिलताओं की समझ पर निर्भर करती है। एकरूप और सरल कथाएँ नागरिक विवेक को सीमित कर सकती हैं।

यह स्वीकार करना आवश्यक है कि पाठ्यक्रम-संशोधन स्वाभाविक और कभी-कभी आवश्यक प्रक्रिया है। इतिहास-लेखन समय के साथ विकसित होता है। किंतु संशोधन की विश्वसनीयता इस बात पर निर्भर करती है कि वह शैक्षिक और शोध-आधारित मानकों पर आधारित हो, न कि वैचारिक प्राथमिकताओं पर। यदि मुगल काल को घटाया जाता है और अन्य कालखंडों को असंतुलित रूप से बढ़ाया जाता है, तो यह चयनात्मक स्मृति का संकेत देता है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मुगल साम्राज्य को प्रारंभिक आधुनिक “बारूद साम्राज्यों” में से एक माना जाता है, जिनकी तुलना उस्मानी और सफ़वीद साम्राज्यों से की जाती है। तुलनात्मक वैश्विक इतिहास में मुगल भारत एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। इसे हटाने से भारतीय विद्यार्थियों की वैश्विक ऐतिहासिक विमर्श में भागीदारी सीमित हो सकती है।

स्मृति की राजनीति भी यहाँ महत्वपूर्ण है। ऐतिहासिक विरासत केवल पुस्तकों में नहीं, बल्कि स्मारकों, शब्दावली, सांस्कृतिक प्रतीकों और दैनिक जीवन में विद्यमान रहती है। जब आधिकारिक इतिहास इन विरासतों का संदर्भ कम कर देता है, तो सामाजिक स्मृति और शैक्षिक ज्ञान के बीच विसंगति उत्पन्न होती है। इससे मिथकीय या सरलीकृत व्याख्याओं को बढ़ावा मिल सकता है।

दीर्घकाल में ऐसी शैक्षिक संकीर्णता सामाजिक ध्रुवीकरण को गहरा कर सकती है। जो पीढ़ी अपने अतीत की जटिलताओं से परिचित नहीं होगी, वह राजनीतिक या वैचारिक सरलीकरणों के प्रति अधिक संवेदनशील हो सकती है। इसके विपरीत, ऐतिहासिक रूप से सजग नागरिक लोकतांत्रिक संवाद में अधिक विवेकपूर्ण भागीदारी कर सकते हैं।

अंततः प्रश्न यह नहीं है कि मुगल काल की प्रशंसा की जाए या आलोचना; प्रश्न यह है कि क्या उसे पढ़ाया जाना चाहिए। हर ऐतिहासिक युग की तरह इसमें भी उपलब्धियाँ और सीमाएँ दोनों थीं। किंतु भारत के ऐतिहासिक विकास को समझने के लिए यह एक अनिवार्य अध्याय है। इसे हटाना केवल पाठ्यक्रम-संशोधन नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्मृति के पुनर्निर्माण का प्रयास है।

एक परिपक्व लोकतंत्र अपने अतीत की जटिलताओं से नहीं डरता। वह स्वीकार करता है कि राष्ट्रीय पहचान बहुस्तरीय विरासतों से निर्मित होती है। मुगल काल का अध्ययन विश्लेषणात्मक क्षमता, सांस्कृतिक समझ और नागरिक परिपक्वता को सुदृढ़ करता है। इसलिए इस विषय पर बहस वास्तव में इस बात पर बहस है कि भारत किस प्रकार का गणराज्य बनना चाहता है—चयनात्मक स्मृति पर आधारित या समग्र ऐतिहासिक विवेक पर आधारित।

 

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श्रमिक कल्याण में डॉ. अंबेडकर की ऐतिहासिक भूमिका एस.आर. दारापुरी, राष्ट्रीय अध्यक्ष, अखिल भारतीय पीपुल्स फ्रंट (आज 1 मई को अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस पर विशेष) भीमराव रामजी अंबेडकर ने आधुनिक भारत में श्रम कल्याण नीति को आकार देने में एक बुनियादी और अक्सर कम सराही गई भूमिका निभाई। उनका योगदान केवल संवैधानिक आदर्शों तक ही सीमित नहीं था, बल्कि वायसराय की कार्यकारी परिषद (1942–1946) में 'श्रम सदस्य' के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने व्यावहारिक श्रम सुधारों में भी गहरी भूमिका निभाई। उनके काम ने कई ऐसे अधिकारों और सुरक्षा उपायों की नींव रखी, जिनसे भारतीय श्रमिकों को आज भी लाभ मिल रहा है। 1. संस्थागत और नीतिगत नेतृत्व ब्रिटिश भारत के तहत 'श्रम सदस्य' के रूप में, अंबेडकर असल में 'श्रम मंत्री' ही थे। इस भूमिका में, उन्होंने श्रम प्रशासन को एक औपनिवेशिक, शोषणकारी ढांचे से बदलकर अधिक कल्याण-उन्मुख प्रणाली में बदल दिया। उन्होंने श्रमिकों को अनियंत्रित पूंजीवाद से बचाने के लिए राज्य के हस्तक्षेप की आवश्यकता पर ज़ोर दिया। उन्होंने भारत के भीतर अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के ढांचे को मज़बूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिससे भारतीय श्रम नीतियां अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप हो गईं। 2. काम के घंटों में कमी अंबेडकर की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक भारत में '8 घंटे के कार्यदिवस' की शुरुआत करना था। इस सुधार से पहले, औद्योगिक श्रमिक अक्सर कठोर परिस्थितियों में दिन में 12–14 घंटे काम करते थे। इस सुधार ने भारत को वैश्विक श्रम मानकों के बराबर ला खड़ा किया और मानवीय कार्य परिस्थितियों की दिशा में एक बड़ा बदलाव लाया। 3. सामाजिक सुरक्षा उपाय अंबेडकर का दृढ़ विश्वास था कि राजनीतिक लोकतंत्र के साथ-साथ आर्थिक सुरक्षा भी होनी चाहिए। उन्होंने कई सामाजिक सुरक्षा उपायों की वकालत की और उन्हें शुरू किया, जिनमें शामिल हैं: महिला श्रमिकों के लिए मातृत्व लाभ, कार्यस्थल पर चोट लगने पर मुआवज़ा, और भविष्य निधि (Provident fund) योजनाएं इन उपायों ने बाद में 'कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम, 1948' और 'कर्मचारी भविष्य निधि और विविध प्रावधान अधिनियम, 1952' जैसे कानूनों को प्रभावित किया। 4. महिला श्रमिकों की सुरक्षा अंबेडकर श्रम क्षेत्र में लैंगिक न्याय के प्रबल समर्थक थे। उन्होंने ऐसी नीतियां पेश कीं जिनसे यह सुनिश्चित हो सके: सवेतन मातृत्व अवकाश, खदानों में महिलाओं के लिए भूमिगत काम पर प्रतिबंध, और समान वेतन तथा बेहतर कार्य-स्थितियां। उस समय के हिसाब से उनका दृष्टिकोण प्रगतिशील था और सामाजिक न्याय के उनके व्यापक दृष्टिकोण के अनुरूप था। 5. ट्रेड यूनियन अधिकार और औद्योगिक संबंध अंबेडकर ने सामूहिक सौदेबाजी के महत्व को पहचाना और ट्रेड यूनियनों के विकास का समर्थन किया। उन्होंने इन लक्ष्यों की दिशा में काम किया: ट्रेड यूनियनों को कानूनी मान्यता, औद्योगिक विवादों के समाधान के लिए तंत्र, और त्रिपक्षीय श्रम सम्मेलनों (सरकार, नियोक्ता, श्रमिक) को बढ़ावा देना उनके प्रयासों ने संवाद को संस्थागत बनाने और औद्योगिक संघर्ष को कम करने में मदद की। 6. न्यूनतम वेतन और उचित स्थितियां हालांकि न्यूनतम वेतन अधिनियम, 1948 स्वतंत्रता के बाद लागू किया गया था, लेकिन अंबेडकर के विचारों ने इसके ढांचे को काफी हद तक प्रभावित किया। उन्होंने लगातार यह तर्क दिया कि श्रम कोई वस्तु नहीं है, और एक गरिमापूर्ण जीवन सुनिश्चित करने के लिए श्रमिकों को उचित पारिश्रमिक मिलना चाहिए। 7. श्रमिक कल्याण कोष और आवास अंबेडकर ने श्रमिकों के आवास, स्वास्थ्य और शिक्षा में सहायता के लिए कल्याण कोष की वकालत की। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि औद्योगिक विकास में कार्यस्थल से परे श्रमिकों की भलाई के लिए भी प्रावधान शामिल होने चाहिए। 8. श्रमिक कल्याण के लिए संवैधानिक दृष्टिकोण भारतीय संविधान की प्रारूप समिति के अध्यक्ष के रूप में, अंबेडकर ने श्रमिक कल्याण को 'राज्य के नीति निदेशक तत्वों' (अनुच्छेद: 39, 41, 42 और 43) में शामिल किया, जिसमें ये अधिकार शामिल हैं: काम का अधिकार, काम की न्यायसंगत और मानवीय स्थितियां, जीवन-निर्वाह योग्य वेतन, और बेरोजगारी, बीमारी तथा वृद्धावस्था की स्थिति में सार्वजनिक सहायता ये सिद्धांत उनके इस विश्वास को दर्शाते हैं कि लोकतंत्र को सामाजिक और आर्थिक न्याय सुनिश्चित करना ही चाहिए। 9. व्यापक दार्शनिक योगदान अंबेडकर का श्रम दर्शन गरिमा, समानता और सामाजिक न्याय पर आधारित था। कार्ल मार्क्स जैसे विचारकों से प्रभावित होने के बावजूद, उनका दृष्टिकोण उनसे भिन्न था; उन्होंने हिंसक क्रांति को अस्वीकार कर दिया और इसके बजाय श्रमिक अधिकारों को प्राप्त करने के लिए संवैधानिक तरीकों की वकालत की। निष्कर्ष श्रमिक कल्याण के क्षेत्र में डॉ. अंबेडकर का योगदान अत्यंत परिवर्तनकारी था। उन्होंने केवल आर्थिक उत्पादकता पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय, मानव गरिमा और सामाजिक न्याय को केंद्र में ला दिया। समकालीन भारत में श्रमिकों को प्राप्त कई सुरक्षात्मक उपाय और अधिकार, उन्हीं के दृष्टिकोण और नीतिगत पहलों से प्रेरित हैं। डा. अंबेडकर मजदूरों को न केवल अपने अधिकारों के लिए ही लड़ने के लिए संगठित होने बल्कि राजनीतिक सत्ता प्राप्त करने के लिए भी प्रेरित किया। उनका कार्य हमें यह याद दिलाता है कि श्रमिक कल्याण केवल एक आर्थिक मुद्दा नहीं है, बल्कि एक नैतिक और संवैधानिक अनिवार्यता है, जो एक न्यायपूर्ण समाज के लिए अत्यंत केंद्रीय महत्व रखती है।

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