सोमवार, 13 मार्च 2017

मायावती की अवसरवादी जातीय राजनीति के दुष्परिणाम - आनंद तेल्तुम्बडे

मायावती की अवसरवादी जातीय राजनीति के दुष्परिणाम - आनंद तेलतुंबड़े 




कुछ समझदार दलित बुद्धिजीवियों ने इस पर अफसोस जाहिर किया है कि बसपा ने दलितों के उत्थान के लिए कुछ नहीं किया है. लेकिन इस मामले की असल बात यह है कि इस खेल का तर्क बसपा को ऐसा करने की इजाजत नहीं देता है. जैसे कि शासक वर्गीय दलों के लिए यह बेहद जरूरी है कि वे जनसमुदाय को पिछड़ेपन और गरीबी में बनाए रखें, मायावती ने यही तरीका अख्तियार करते हुए उत्तर प्रदेश में दलितों को असुरक्षित स्थिति में बनाए रखा. वे भव्य स्मारक बना सकती थीं, दलित नायकों की प्रतिमाएं लगवा सकती थीं, चीजों के नाम उन नायकों के नाम पर रख सकती थीं और दलितों में अपनी पहचान पर गर्व करने का जहर भर सकती थीं लेकिन वे उनकी भौतिक हालत को बेहतर नहीं बना सकती थीं वरना ऐसे कदम से पैदा होने वाले अंतर्विरोध जाति की सोची-समझी बुनियाद को तहस नहस कर सकते थे. स्मारक वगैरह बसपा की जीत में योगदान करते रहे औऱ इस तरह उनकी घटक जातियों तथा समुदायों द्वारा हिचक के साथ वे कबूल कर लिए गए. लेकिन भेद पैदा करने वाला भौतिक लाभ समाज में ऐसी न पाटी जा सकने वाली खाई पैदा करता, जिसे राजनीतिक रूप से काबू में नहीं किया सकता. इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि एक दलित या गरीब परस्त एजेंडा नहीं बनाया जा सकता था. राजनीतिक सीमाओं के बावजूद वे दिखा सकती थीं कि एक ‘दलित की बेटी’ गरीब जनता के लिए क्या कर सकती है. लेकिन उन्होंने न केवल अवसरों को गंवाया बल्कि उन्होंने लोगों के भरोसे और समर्थन का अपने फायदे के लिए इस्तेमाल किया.
बाद में उनकी बढ़ी हुई महत्वाकांक्षाएं उन्हें बहुजन से सर्वजन तक ले गईं, जिसमें उन्होंने अपना रुख पलटते दिया और उनमें दलितों के लिए जो भी थोड़ा बहुत सरोकार बचा था, उसे और खत्म कर दिया. तब अनेक विश्लेषकों ने यह अंदाजा लगाया था कि दलित मतदाता बसपा से अलग हो जाएंगे, लेकिन दलित उन्हें हैरानी में डालते हुए मायावती के साथ पहले के मुकाबले अधिक मजबूती से खड़े हुए और उन्हें 2007 की अभूतपूर्व सफलता दिलाई. इसने केवल दलितों की असुरक्षा को ही उजागर किया. वे बसपा से दूर नहीं जा सकते, भले ही इसकी मुखिया चाहे जो कहें या करें, क्योंकि उन्हें डर था कि बसपा के सुरक्षात्मक कवच के बगैर उन्हें गांवों में सपा समर्थकों के हमले का सामना करना पड़ेगा. अगर मायावती इस पर गर्व करती हैं कि उनके दलित मतदाता अभी भी उनके प्रति आस्थावान हैं तो इसका श्रेय मायावती को ही जाता है कि उन्हें दलितों को इतना असुरक्षित बना दिया है कि वे इसके अलावा और कोई रास्ता नहीं अपना सकते. निश्चित रूप से इस बार भाजपा ने कुछ दलित जातियों को लुभाया है और वे संभवत: गोंड, धानुक, खटिक, रावत, बहेलिया, खरवार, कोल आदि हाशिए की जातियां होंगी जो दलित आबादी का 9.5 फीसदी हिस्सा हैं. मुसलमान भी ऐसे ही एक और असुरक्षित समुदाय हैं जिन्हें हमेशा अपने बचाव कवच के बारे में सोचना पड़ता है. इस बार बढ़ रही मोदी लहर और घटती हुई बसपा की संभावनाओं को देखते हुए वे सपा के इर्द-गिर्द जमा हुए थे उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ा. 2007 के चुनावों में उत्तर प्रदेश की सियासी दुनिया में फिर से दावेदारी जताने को बेकरार ब्राह्मणों समेत ये सभी जातियां बसपा की पीठ पर सवार हुईं और उन्होंने बसपा को एक भारी जीत दिलाई थी, लेकिन बसपा उनकी उम्मीदों पर खरी नहीं उतर सकी. तब वे उससे दूर जाने लगे जिसका नतीजा दो बरसों के भीतर, 2009 के आम चुनावों में दिखा जब बसपा की कुल वोटों में हिस्सेदारी 2007 के 30.46 फीसदी से गिरकर 2009 में 27.42 फीसदी रह गई. इस तरह 3.02 फीसदी वोटों का उसे नुकसान उठाना पड़ा. तीन बरसों में यह नुकसान 1.52 फीसदी और बढ़ा और 2012 के विधानसभा चुनावों में कुल वोटों की हिस्सेदारी गिरकर 25.90 पर आ गई. और अब 2014 में यह 19.60 फीसदी रह गई है जो कि 6.30 फीसदी की गिरावट है. यह साफ साफ दिखाता है कि दूसरी जातियां और अल्पसंख्यक तेजी से बसपा का साथ छोड़ रहे हैं और यह आने वाले दिनों की सूचना दे रहा है जब धीरे धीरे दलित भी उन्हीं के नक्शेकदम पर चलेंगे. असल में मायावती की आंखें इसी बात से खुल जानी चाहिए कि उनका राष्ट्रीय वोट प्रतिशत 2009 के 6.17 से गिर कर इस बार सिर्फ 4.1 फीसदी रह गया है.
जबकि जाटव-चमार वोट उनके साथ बने हुए दिख रहे हैं, तो यह सवाल पैदा होता है कि वे कब तक उनके साथ बने रहेंगे. मायावती उनकी असुरक्षा को बेधड़क इस्तेमाल कर रही हैं. न केवल वे बसपा के टिकट ऊंची बोली लगाने वालों को बेचती रही हैं, बल्कि उन्होंने एक ऐसा अहंकार भी विकसित कर लिया है कि वे दलित वोटों को किसी को भी हस्तांतरित कर सकती हैं. उन्होंने आंबेडकरी आंदोलन की विरासत को छोड़ कर 2002 के बाद के चुनावों में मोदी के लिए प्रचार किया जब पूरी दुनिया मुसलमानों के जनसंहार के लिए उन्हें गुनहगार ठहरा रही थी. उन्होंने अपने राजनीतिक गुरु कांशीराम के ‘तिलक तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार’ जैसे नारों को भी छोड़ दिया और मौकापरस्त तरीके से ‘हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा विष्णु महेश है’ जैसे नारे चलाए. लोगों को कुछ समय के लिए पहचान का जहर पिलाया जा सकता है लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वे बेवकूफ हैं. लोगों को मायावती की खोखली राजनीति का अहसास होने लगा है और वे धीरे धीरे बसपा से दूर जाने लगे हैं. उन्होंने मायावती को चार बार उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया लेकिन उन्होंने जनता को सिर्फ पिछड़ा बनाए रखने का काम किया और अपने शासनकालों में उन्हें और असुरक्षित बना कर रख दिया. उत्तर प्रदेश के दलित विकास के मानकों पर दूसरे राज्यों के दलितों से कहीं अधिक पिछड़े बने हुए हैं, बस बिहार, उड़ीसा, मध्य प्रदेश और राजस्थान के दलित ही उनसे ज्यादा पिछड़े हैं. मायावती ने भ्रष्टाचार और पतनशील सामंती संस्कृति को बढ़ाना देने में नए मुकाम हासिल किए हैं, जो कि बाबासाहेब आंबेडकर की राजनीति के उल्टा है जिनके नाम पर उन्होंने अपना पूरा कारोबार खड़ा किया है. उत्तर प्रदेश दलितों पर उत्पीड़न के मामले में नंबर एक राज्य बना हुआ है. यह मायावती ही थीं, जिनमें यह बेहद गैर कानूनी निर्देश जारी करने का अविवेक था कि बिना जिलाधिकारी की इजाजत के दलितों पर उत्पीड़न का कोई भी मामला उत्पीड़न अधिनियम के तहत दर्ज नहीं किया जाए. ऐसा करने वाली वे पहली मुख्यमंत्री थीं.
जातीय राजनीति की कामयाबी ने बसपा को इस कदर अंधा कर दिया था कि वह समाज में हो रहे भारी बदलावों को महसूस नहीं कर पाई. नई पीढ़ी उस संकट की आग को महसूस कर ही है जिसे नवउदारवादी आर्थिक नीतियों ने उनके लिए पैदा की हैं. देश में बिना रोजगार पैदा किए वृद्धि हो रही है, और सेवा क्षेत्र में जो भी थोड़े बहुत रोजगार पैदा हो रहा है उन्हें बहुत कम वेतन वाले अनौपचारिक क्षेत्र में धकेल दिया जा रहा है. सार्वजनिक और सरकारी क्षेत्रों के सिकुड़ने से आरक्षण दिनों दिन अप्रासंगिक होते जा रहे हैं. दूसरी तरफ सूचनाओं में तेजी से हो रहे इजाफे के कारण नई पीढ़ी की उम्मीदें बढ़ती जा रही हैं. उन्हें जातिगत भेदभाव की वैसी आग नहीं झेलनी पड़ी है जैसी उनके मां-बाप ने झेली थी. इसलिए वे ऊंची जातियों के बारे में पेश की जाने वाली बुरी छवि को अपने अनुभवों के साथ जोड़ पाने में नाकाम रहते हैं. उनमें से अनेक बिना दिक्कत के ऊंची जातियों के अपने दोस्तों के साथ घुलमिल रहे हैं. हालांकि वे अपने समाज से रिश्ता नहीं तोड़ेंगे लेकिन जब कोई विकास के बारे में बात करेगा तो यह उन्हें अपनी तरफ खींचेगा. और यह खिंचाव पहचान संबंधी उन बातों से कहीं ज्यादा असरदार होगा जिसे वे सुनते आए हैं. दलित नौजवान उदारवादी संस्कृति से बचे नहीं रह सकते हैं, बल्कि उन्हें व्यक्तिवाद, उपभोक्तावाद, उपयोगवाद वगैरह उन पर असर डाल रहे हैं, इनकी गति हो सकता है कि धीमी हो. यहां तक कि गांवों में भीतर ही भीतर आए बदलावों ने निर्वाचन क्षेत्रों की जटिलता को बदल दिया है, जिसे हालिया अभियानों में भाजपा ने बड़ी महारत से इस्तेमाल किया जबकि बसपा और सपा अपनी पुरानी शैली की जातीय और सामुदायिक लफ्फाजी में फंसे रहे. बसपा का उत्तर प्रदेश के नौजवान दलित मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित नहीं कर पाना साफ साफ दिखाता है कि दलित वोटों में 1.61 करोड़ के कुल इजाफे में से केवल 9 लाख ने ही बसपा को वोट दिया.
भाजपा और आरएसएस ने मिल कर दलित और पिछड़ी जातियों के वोटों को हथियाने की जो आक्रामक रणनीति अपनाई, उसका असर भी बसपा के प्रदर्शन पर दिखा है. उत्तर प्रदेश में भाजपा के अभियान के संयोजक अमित शाह ने आरएसएस के कैडरों के साथ मिल कर विभिन्न जातीय नेताओं और संघों के साथ व्यापक बातचीत की कवायद की. शाह ने मुजफ्फरनगर सांप्रदायिक हमले का इस्तेमाल पिछड़ी जातियों को अपने पक्ष में लुभाने के लिए किया. उसने मोदी की जाति का इस्तेमाल ओबीसी वोटों को उत्साहित करने के लिए किया कि उनमें से ही एक इंसान भारत का प्रधानमंत्री बनने जा रहा है. इस रणनीति ने उन इलाकों की पिछड़ी जातियों में सपा की अपील को कमजोर किया, जो सपा का गढ़ मानी जाती थीं. इस रणनीति का एक हिस्सा बसपा के दलित आधार में से गैर-जाटव जातियों को अलग करना भी था. भाजपा ने जिस तरह से विकास पर जोर दिया और अपनी सुनियोजित प्रचार रणनीति के तहत बसपा की मौकापरस्त जातीय राजनीति को उजागर किया, उसने भी बसपा की हार में एक असरदार भूमिका अदा की. लेकिन किसी भी चीज से ज्यादा, बसपा की अपनी कारगुजारियां ही इसकी बदतरी की जिम्मेदार हैं. यह उम्मीद की जा सकती है कि इससे पहले कि बहुत देर हो जाए बसपा आत्मविश्लेषण करेगी और खुद में सुधार करेगी.

बुधवार, 8 मार्च 2017

नानक- अल्लामा इक़बाल

नानक - अल्लामा इक़बाल

क़ौम ने पैग़ाम-ए-गौतम की ज़रा परवाह  न की
कद्र पहचानी न अपने गौहर-ए-यक-दाना की 
आह बद-क़िस्मत रहे आवाज़-ए-हक़ से बे-ख़बर
ग़ाफ़िल अपने फल की शीरीनी से होता है शजर 
आश्कार उस ने किया जो ज़िंदगी का राज़ था
हिन्द को लेकिन ख़याली फ़ल्सफ़ा पर नाज़ था 
शम-ए-हक़ से जो मुनव्वर हो ये वो महफ़िल न थी
बारिश-ए-रहमत हुई लेकिन ज़मीं क़ाबिल न थी
आह शूद्र  के लिए हिन्दोस्ताँ ग़म-ख़ाना है
दर्द-ए-इंसानी से इस बस्ती का दिल बेगाना है
बरहमन सरशार है अब तक मय-ए-पिंदार में 
शम-ए-गौतम जल रही है महफ़िल-ए-अग़्यार में 
बुत-कदा फिर बाद मुद्दत के मगर रौशन हुआ 
नूर-ए-इब्राहीम से आजार का घर रौशन हुआ 
फिर उठी आख़िर सदा तौहीद की पंजाब से
हिन्द को इक मर्द-ए-कामिल ने जगाया ख़्वाब से 

बुद्ध - हरिवंश राय बच्चन

बुद्ध  - हरिवंश राय बच्चन 



जब ईश्वर-अल्ल्ह की नहीं गली दाल
वहाँ बुद्ध की क्या चलती चाल
वे थे मूर्ति के खिलफ उसने उन्ही की बनायीं मूर्ति 

वे थे पूजा के विरुद्ध उसने उन्ही को दिया पूज
उन्हें ईश्वर में था अविश्वास उसने उन्ही को कह दिया भगवान
वे तो आये थे फ़ैलाने को वैराग
मिटाने को श्रृंगार पटार उसने उन्ही को बना दिया श्रृंगार
बनाया उनका सुन्दर आकार
उनका बेल-मुंड था शीश उसने लगाये बाल घुँगरदार
मिट्टी,लकड़ी,लोहा,पीतल,तांबा,सोना,चाँदी,मूंगा,पन्ना,हाथी दाँत
सब के अंदर इन्हे डाल, तराश, खराद बना दिया इन्हे बाजार में बिकने का सामान
बुद्ध भगवान अमीरों के ड्राइंग रूम, रईसों के मकान
तुम्हारे चित्र, तुम्हारी मूर्ति से शोभायमान
पर वे हैं तुम्हारे दर्शन से अनभिज्ञ
तुम्हरे विचारों से अनजान
सपने में भी इन सब को नहीं आता ध्यान
इसीलिए क्या की थी आसमान जमीन एक
और आज देखता हूँ तुमको जहाँ
एक ओर है तुम्हारी प्रतिमा दूसरी ओर है डांसिंग हॉल
हे पशुओं पर दया के प्रचारक
अहिंसा के अवतार परम विरक्त संयम साकार
मची तुम्हारे सामने रूप यौवन की ठेल-पेल
इच्छा और वासना खुल कर कर रही है खेल
हर तरफ है हिंसा, हर तरफ है चोरी, मक्कारी.

सोमवार, 6 मार्च 2017

मायावती ने उत्तर प्रदेश के दलितों का क्या किया ?

मायावती ने उत्तर प्रदेश के दलितों का क्या किया ?
-एस. आर. दारापुरी आई. पी. एस. (से. नि. ) तथा राष्ट्रीय प्रवक्ता, आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट
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(नोट: यद्यपि यह लेख 2008में लिखा गया था परन्तु आज भी उत्तर प्रदेश के दलितों की स्थिति में कोई गुणात्मक परिवर्तन नहीं हुआ है)

भारतवर्ष में उत्तर प्रदेश कई मायनों में अपना एक स्थान रखता है. राजनीतिक दृष्टि से यह पहला राज्य है जहाँ प़र एक दलित महिला चौथी बार मुख्य मंत्री की कुर्सी पर आसीन हुई है. उ. प्र. की आबादी भारत के सभी राज्यों से अधिक है. यहाँ दलितों की सबसे बड़ी आबादी ( ३.५१ करोढ़ ) है जो कि प्रदेश की कुल आबादी का २१.१ प्रतिशत है. दुखदाई बात यह है कि यहीं दलितों पर सब से अधिक उत्पीडन की घटनाएँ घटित होती हैं. यहीं सबसे अधिक बच्चे एवं महिलाएं कुपोषण का शिकार हैं. इसी प्रदेश में पोलिओ के सबसे अधिक मामले पाए जाते हैं. अब यह देखना होगा की विकास कि दृष्टि से उत्तर प्रदेश के दलित अन्य प्रदेशों के दलितों की अपेक्षा कहाँ ठहरते हैं. इस का सही मूल्याँकन करने हेतु विकास के निम्नलिखित पहलुओं पर दलितों की स्थिति का अध्ययन करना उचित होगा:-
स्त्री- पुरुष अनुपात
उत्तर प्रदेश के दलितों में महिलायों और पुरुषों का लिंग अनुपात ९०० प्रति हज़ार है जबकि राष्ट्रीय स्तर पर दलितों का यह अनुपात ९३६ है. इसी प्रकार ०-६ वर्ष की आयु वर्ग के बच्चों का यह अनुपात ९३० है जबकि राष्टीय स्तर पर यह अनुपात ९३८ है.
उपरोक्त विवरण से यह स्पष्ट है कि यहाँ के दलित देश के अन्य प्रान्तों के दलितों से इस अनुपात में काफी पीछे हैं जो कि दलित महिलायों और बच्चों की निम्न स्थिति का प्रतीक है इसका मुख्य कारण न केवल लड़कों की वरीयता के कारण है कन्यायों की भ्रूण हत्या है बल्कि महिलायों एवं बालिकाओं के साथ नियोजित भेदभाव एवं कुपोषण भी है.
वर्ष २००५-२००६ में किये गए राष्ट्रीय परिवार एवं स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार उत्तर प्रदेश में ४७ प्रतिशत महिलाएं कुपोषण का शिकार हैं. इसी सर्वेक्षण में पाया गया था कि उत्तर प्रदेश में ४७ प्रतिशत बच्चे भी कुपोषण से ग्रस्त होने के कारण कम वज़न वाले थे जिनमें से १३ प्रतिशत बच्चे मृत्यु का शिकार हो गए और ४६ प्रतिशत बच्चों की शारीरिक बढोतरी बाधित हो चुकी थी. इस सर्वेक्षण से यह भी प्रकट हुआ था कि उत्तर प्रदेश में १००० जीवित प्रसवों में से ७३ मृत प्रसव थे जो कि ९ वर्ष पूर्व के राष्ट्रीय औसत ६७.६ से काफी अधिक थे. हाल में CRY संस्था दुआरा कराए गए सर्वेक्षण से पाया गया कि उत्तर प्रदेश में ७० प्रतिशत दलित बच्चे कुपोषण का शिकार हैं.
यद्यपि उपरोक्त आंकड़े सभी महिलायों और बच्चों कि स्थिति दार्शाते हैं परन्तु इनमें दलित महिलायों और बच्चों की स्थिति औ़र भी दयनीय है. इसी कारण इस राज्य में महिलायों और पुरुषों का लिंग अनुपात चिंतनीय है. सामान्य वर्ग और दलित महिलायों और बच्चों की उपरोक्त दुर्दशा के लिए महिला एवं बाल कल्याण सम्बन्धी योजनाओं जैसे समग्र बाल विकास योजना, मध्यान्ह भोजन योजना एवं सार्वजानिक खाद्यान्न वितरण प्रणाली में व्याप्त भ्रष्टाचार एवं सरकारी मशीनरी द्वारा बरती जा रही उदासीनता जिम्मेवार है.
शिक्षा का स्तर
सन २००१ की जनगणना के अनुसार उत्तर प्रदेश में दलितों की साक्षरता दर ४६.३ प्रतिशत है जबकि दलितों का राष्ट्रीय स्तर पर शिक्षा दर ५४.७ प्रतिशत है. पुरुषों एवं, महिलायों की शिक्षा दर क्रमश ६०.३ और ३०.५ प्रतिशत है जबकि राष्ट्रीय स्तर पर दलितों की यह दर क्रमश: ६६.६ और ४१.९ प्रतिशत है. इस प्रकार उत्तर प्रदेश के दलित पुरुष एवं महिलाएं साक्षरता दर में भारत के अन्य प्रान्तों के दलितों से काफी पीछे हैं. उत्तर प्रदेश के साक्षर दलितों में से ३८ प्रतिशत ऐसे हैं जिनका शिक्षा का कोई भी स्तर नहीं है. यहाँ अधिकांश दलित बहुत कम पड़े लिखे हैं . प्राईमरी और मिडल स्तर तक शिक्षा प्राप्त करने वाले दलितों का प्रतिशत क्रमश: २७.१ और १८.५ प्रतिशत है. मैट्रिक, हायर सेकंडरी और स्नातक स्तर तक शिक्षा पाने वाले दलितों का प्रतिशत: केवल ०.१ प्रतिशत है. सेकंडरी से आगे साक्षरों का प्रतिशत दर मिडल पास से लगभग आधा है तथा उससे ऊपर शिक्षितों का अनुपात मैट्रिक पास (८.५ प्रतिशत ) का १/३ है.
वर्ष २००१ की जनगणना के अनुसार उत्तर पदेश में ५ से १४ वर्ष आयु के १ करोढ़ ३३ लाख दलित बच्चों में से केवल ५३.३ लाख यानिकि ५६.४ प्रतिशत बच्चे स्कूल जा ही नहीं रहे थे. इसके विपरीत सरकारी दावा है कि सभी बच्चे स्कूल जा रहे हैं.
स्कूल छोड़ने की दर
बेसिक शिक्षा निदेशालय, उत्तर पदेश दुआरा जारी आंकड़ों के अनुसार १९९१ में बच्चों द्वारा प्राईमरी स्तर पर स्कूल छोड़ने का दर ४५.०२ प्रतिशत है. इस प्रकार हरेक दूसरा बच्चा प्राईमरी शिक्षा पूरी होने से पहले स्कूल छोड़ देता है. लड़कियों की स्कूल छोड़ने की दर ४६.२५ प्रतिशत है जो कि लड़कों की दर से थोड़ी ऊँची है. यह सर्वविदित है कि विभिन्न कारणों से दलित बच्चों की स्कूल छोड़ने की दर सामान्य जातियों के बच्चों से अधिक होती है जिसका सीधा असर दलितों की साक्षरता दर पर पड़ता है. वर्तमान में भी दलित बच्चों का स्कूल छोड़ने की दर सबसे अधिक है.
स्कूलों में छुआछुत
विभिन्न सर्वेक्षणों से यह पाया गया है कि उत्तर प्रदेश में "छुआछुत और जातिगत भेदभाव" बुरी तरह से व्यापत है. इसका प्रकोप प्राईमरी और मिडिल विद्यालयों में मिड-डे मील में भी स्पष्ट दिखाई देता है.सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों के अनुसार भोजन पकाने हेतु दलित रसोइओं की वरीयता के अनुसार नियुक्ति करने के आदेश थे परन्तु २००७ में एक सर्वेक्षण में यह पाया गया कि उत्तर प्रदेश में केवल १७ प्रतिशत स्कूलों में ही दलित रसोइओं की नियुक्ति की गयी थी. सरकार दुआरा अपने ही आदेशों को लागू करने में बरती जा रही उदासीनता के कारण काफी स्कूलों में सवर्ण जाति के बच्चों दुआरा दलित रसोइओं द्वारा बनाये गए भोजन का बहिष्कार किया गया. इस परिस्थिति में सरकार से यह अपेक्षा की जाती थी की वह ऐसे मामलों में सखत कार्रवाही करके दलित रसोइओं की नियुक्ति को लागू करवाती परन्तु ऐसा न करके मायावती ने उन की नियुक्ति सम्बन्धी आदेश को ही वापस ले लिया. इस का परिणाम यह है की अधिकतर स्कूलों में दलित रसोइओं को निकाल दिया गया. इस से उत्तर प्रदेश में छुअछुता को खुला बढ़ावा मिला है.
कार्य सहभागिता
वर्ष २००१ की जनगणना के अनुसार उत्तर प्रदेश में दलितों की कार्य सहभागिता दर ३४.७ प्रतिशत है जब कि राष्ट्रीय स्तर पर दलितों कि कार्य सहभागिता दर (४०.४०) प्रतिशत है जो कि उत्तर प्रदेश में दलितों में व्यापक बेरोज़गारी और गरीबी को दर्शाता है. कार्य सहभागिता का अर्थ नियमित रोज़गार से है.
दलित मजदूरों की श्रेणी
वर्ष २००१ की जनगणना के अनुसार उत्तर प्रदेश के दलितों में कुल मजदूरों का ४२.५ प्रतिशत भाग कृषि मजदूरों का है जब कि पूरे भारत में दलितों की यह औसत ४५.६ प्रतिशत है. अन्य मजदूरों की श्रेणी में दलितों की औसत दर ३०.५ प्रतिशत के मुकाबले में उत्तर प्रदेश की यह दर २२.२ प्रतिशत है. उत्तर प्रदेश में घरेलू उद्योग से जुड़े दलितों का प्रतिशत ४.३ प्रतिशत है जबकि राष्ट्रीय स्तर पर यह औसत ३.९ प्रतिशत है. इस से स्पष्ट है कि उत्तर प्रदेश में रोज़गार की बहुत कमी है.
गरीबी रेखा के नीचे दलित
वर्ष २००४-०५ के आंकड़ों के अनुसार उत्तर प्रदेश में गरीबी रेखा के नीचे लोगों का प्रतिशत ३२.८ प्रतिशत है जबकि पूरे भारत में यह दर केवल २७.५ प्रतिशत है. इन में दलितों का प्रतिशत अन्य वर्गों की अपेक्षा काफी अधिक है. एन. एस. एस. ओ. के वर्ष १९९०-२००० के सर्वेक्षण के अनुसार उत्तर प्रदेश में ४४ प्रतिशत दलित गरीबी की रेखा के नीचे जी रहे थे. वास्तव में दलितों के गरीबी रेखा से नीचे जीने वालों का औसत ६० प्रतिशत से कम नहीं है.
आर्थिक स्थिति
उत्त प्रदेश कृषि प्रधान प्रदेश है और ८७.७ प्रतिशत दलित ग्रामीण क्षेत्र में रहते हैं. उनमे से ७५ प्रतिशत कृषि मजदूर अथवा सीमांत एवं लघु कृषक के रूप में खेती से जुड़े हुए हैं. पशिचम उत्तर प्रदेश को छोड़ कर शेष क्षेत्र में कृषि का विकास नगण्य है जिसका असर किसानों के साथ साथ कृषि मजदूरों पर भी पड़ रहा है. इसी कारण उत्त्तर प्रदेश में कृषि में लगे दलितों की संख्या राष्ट्रीय औसत से कम है. वर्ष १९९०-९१ की कृषि जोत जनगणना के अनुसार उ. प्र. के दलित कृषकों में से ४१.७ प्रतिशत सीमांत, लघु और अर्ध मध्यम श्रेणी के तथा केवल २.४ प्रतिशत ही बड़ी जोत के मालिक थे. जोतों के क्षेत्रफल की दृष्टि से ३९.५ प्रतिशत दलित कृषक लघु/ सीमांत/अर्ध मध्यम एवं मध्यम श्रेणी के तथा केवल २.१ प्रतिशत दलित बड़ी जोत के मालिक थे. इस प्रकार दलितों के पास कुल जोत का १६.३ प्रतिशत तथा कुल जोत क्षेत्रफल का १०.५ प्रतिशात ही था जोकि उनकी २१.१५ प्रतिशा आबादी के मुकाबले में बहुत ही कम है. दलितों की जोत का औसत क्षेत्रफल ०.६० हेक्टेअर है. इस से स्पष्ट है कि उत्तर प्रदेश में अधिकतर दलित भूमिहीन हैं.
वर्ष २००१ की जनगणना के अनुसार उ.प्र. के ३०.९ प्रतिशत दलित काश्तकार की श्रेणी में हैं जबकि १९९१ की जनगणना में यह प्रतिशत ४२.६३ था. इस प्रकार १९९१ से वर्ष २००१ के दशक में लगभग १२ प्रतिशत दलित काश्तकार की श्रेणी से गिर क़र भूमिहीन की श्रेणी में आ गए हैं. यह स्थिति दलितों के सश्क्तिकर्ण की बजाये उनके अशक्तिकर्ण को दर्शाती है. दलितों के भूमि से इस वन्चितिकरण का एक कारण सरकारी कल्याणकारी योजनाओं में भ्रष्टाचार के कारण उनका का लाभ प्राप्त न होना और बेरोज़गारी है क्योंकि वर्तमान में कल्याणकारी योजनाओं में भ्रष्टाचार में कोई कमी आने की बजाये उसमे बढोतरी ही हुई है. इस के साथ ही रोजगार के कोई नए अवसर भी पैदा नहीं हुए हैं. मजदूर परिवारों को नरेगा में १०० दिन का रोजगार देने वाली योजना का यह हाल है कि पिछले वर्षों में ग्रामीण मजदूरों को केवल ८ दिन का रोज़गार ही मिला था जैसाकि केग की रिपोर्ट में है. मायावती ने तो २००७ में प्रधान मंत्री बनने पर इस योजना को ही ख़तम कर देने की घोषणा कर दी थी. मनरेगा में व्यापक भ्रष्टाचार किसी से छुपा नहीं है और मायावती इस को रोकने में बिलकुल असफल रही हैं जिसका खमियाजा दलितों को भुगतना पड़ रहा है.
पिछले ३६ वर्षों से उ.प्र.में दलितों सहित अन्य भूमिहीनों को थोड़ी थोड़ी ज़मीन आबंटित की जाती रही है . एक तो यह भूमि अधिकतर अनुपजाऊ तथा बंजर किस्म की रही है. दूसरी ओर अधिकतर आबंटियों को इन पर कब्ज़े ही नहीं मिले. इस का एक सब से बढ़िया उदाहरण हरदोई जनपद के दलितों द्वारा विधान भवन के सामने किये गये धरने एवं अनशन का है. उनकी शिकायत थी कि उन्हें 32 वर्ष पूर्व मिले भूमि पटटों का आज तक कब्ज़ा नहीं मिला है. उनकी भूमि प़र कब्ज़ा करने वाले सवर्णों को उस क्षेत्र के बसपा विधायक का संरक्षण प्राप्त है. बहुत दिन तक धरना और अनशन के बाद उन्हें कहीं कब्ज़ा मिल सका. ऐसी स्थिति पूरे उ.प्र. में है. दलितों के पटटों पर दबंगों के कब्ज़े हैं परन्तु मायावती अपने सर्वजन समाज को नाराज़ नहीं करना चाहती. अत: दलितों के पट्टे आज भी दबंगों के कब्जे में हैं और दलितों की कोई सुनवाई नहीं है.
दलित उत्पीडन में उत्तर प्रदेश सब से आगे
यह सर्वविदित है कि दलित उत्पीडन के मामले में उ.प्र. भारत में प्रथम स्थान रखता है. यह स्थिति राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो द्वारा वर्ष २०१० की रिपोर्ट से भी प्रकट होती है. इसका मुख्य कारण उ.प्र. में दलितों की बड़ी आबादी, सामंती सामाजिक व्यस्था तथा सरकार दुआरा उत्पीडन के मामलों की उपेक्षा है. उ.प्र. में यह पुरानी परम्परा रही है कि जो भी मुख्य मंत्री आता है वह अपने काल में अपराध के आंकड़े अपने पूर्व वाले मुख्य मंत्री के काल से कम कर के दिखाता है. मायावती भी इस का कोई अपवाद नहीं है. मायावती ने तो वर्ष १९९५ में अपने प्रथम मुख्य मंत्री काल में अपराध के आंकड़ों को लेकर पुलिस अधिकारियों को निलंबित और स्थानान्तित करके तहलका मचा दिया था. इसके बाद तो उन्होंने दलित उत्पीडन को रोकने के ध्येय से बनाये गए केन्द्रीय अधिनियम ( अनुसूचित जाति/ जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम १९८९ ) को लागू न करने का सरकारी आदेश जारी करके इस प़र रोक ही लगा दी थी. बाद में इस का बहुत विरोध होने और मामला हाई कोर्ट पहुँचने पर उसे वापस लिया गया परन्तु व्यव्हार में यह आदेश अब भी लागू है. इस समय इस एक्ट के दुरूपयोग को रोकने के नाम पर मायावती का मौखिक आदेश है कि इस एक्ट का प्रयोग केवल हत्या और बलात्कार के मामलों में ही किया जाये और वह भी डाक्टरी परीक्षण के बाद. दलित उत्पीडन के शेष १९ प्रकार के मामलों में यह लागू नहीं किया जाये. इस के कारण उ.प्र. में दलितों पर बराबर अत्याचार हो रहे हैं परन्तु पुलिस इस एक्ट के अंतर्गत मुकदमे दर्ज नहीं करती और दबंग अत्याचार करने के लिए स्वतन्त्र हैं. पुलिस अपराध के आंकड़े कम रखने के कारण दलित उत्पीडन की रिपोर्ट नहीं लिखती. इससे उत्तर प्रदेश के दलित न केवल सामंतों द्वारा किये जा रहे उत्पीडन को झेलने के लिए बाध्य हैं बल्कि उत्पीडन का शिकार होने पर मिलने वाली आर्थिक सहायता से भी वंचित रह रहे हैं.
वर्ष २००७ में समाचार पत्रों में दलित महिलायों के बलात्कार के छपे मामलों के अध्ययन के अनुसार वर्ष २००७ में दलित महिलायों के बलात्कार के ११० मामलों में से पुलिस दुआरा केवल ५० प्रतिशत मामले ही दर्ज किये गए थे. बलात्कार के इन मामलों में से ८५ प्रतिशत मामले नाबालिग दलित लड़कियों के साथ थे. इसी प्रकार बलात्कार के बाद हत्या के १९ मामलों में से ५० %, हत्या में से २५% , शीलभंग में से ७१%, तथा अपहरण में से ८०% मामले दर्ज ही नहीं किये गए थे. ऐसी ही स्थिति उत्पीडन के अन्य मामलों की भी है. वास्तव में मायावती सवर्ण वोटों के चक्कर में इस एक्ट को लागू करके उन्हें नाराज़ नहीं करना चाहती है जिस का खामिआज़ा दलितों को भुगतना पड़ रहा है.
देश के अन्य राज्यों के दलितों से तुलना करने पर यह स्पष्ट है कि उत्तर प्रदेश के दलित बिहार और ओड़िसा के दलितों को छोड़कर विकास के सभी मानकों पर अन्य राज्यों के दलितों से पिछड़े हुए हैं. यह भी विदित है कि मायावती १९९५ से लेकर अब तक चौथी बार उ.प्र. की मुख्य मंत्री बनी है परन्तु इस काल में दलितों की स्थिति में कोई भी सुधार नहीं हुआ है. इसके विपरीत दलितों की आर्थिक स्थिति पहले से बदतर हुई है. क्या उ.प्र. के दलितों के पिछड़ेपन के लिए मायावती को काफी हद तक जुम्मेदार नहीं माना जाना चाहिए? यह सर्वविदित है कि मायावती ने न तो पहले और न इस बार भी दलितों एवं प्रदेश का विकास का कोई एजेंडा बनाया है. विकास की किसी भी अवधारणा के अभाव में न तो प्रदेश का और न ही दलितों का कोई विकास हुआ है.
राज्य सरकार के बजट का काफी बड़ा हिस्सा गैर योजनागत व्यय पर लगाया गया है. कई अरब की धन राशी भव्य समारोहों, स्मारकों. एवं अपनी मूर्तिओं सहित अन्य मूर्तियों प़र खर्च की गयी जबकि यह धनराशी प्रदेश के विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य एवं अन्य कल्याणकारी योजनाओं प़र खर्च की जा सकती थी. मायावती सरकार द्वारा  प्रतीकों की राजनीति करने से दलितों का कुछ भावनात्मक तुष्टिकरण तो हुआ परन्तु उनका कोई भी विकास नहीं हुआ. व्यापक भ्रष्टाचार के कारण उन्हें कल्याणकारी योजनाओं का भी कोई लाभ नहीं ,मिल सका .
पिछले वर्ष के ट्रांसपेरेंसी इंटरनॅशनल संस्था द्वारा किये गए विवेचन से यह पाया गया था कि भ्रष्टाचार के मामले में उ.प्र. चिंतनीय दशा से भ्रष्ट राज्य है. प्रदेश में सर्वत्र विकास का अभाव इस का दुश्परिणाम है. प्रदेश के दो बड़े नेता- मुलायम सिंह तथा मायावाती भ्रष्टाचार के मामलों में आरोपित हैं. मुलायम सिंह के विरुद्ध तो अभी जांच चल ही रही है पान्तु मायावती के खिलाफ तो विवेचना पूरी हो चुकी है. उसके विरुद्ध ताज कोरिडोर का मामला इलाहाबाद उच्च न्यायलय तथा ३० करोड़ की अवैध संपत्ति में आरोप पत्तर दाखिल करने का मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है जिस पर अगले साल के फरवरी माह की प्रथम तारीख को आरोप पत्र दाखिल करने का आदेश होने की सम्भावना है. इस पर मायावती को ज़मानत कराने के लिए अदालत में समर्पण करना होगा और उस समय उसकी जेल जाने की नौबत भी आ सकती है.
मायावती के व्यक्तिगत भ्रष्टाचार का असर उ.प्र. की राजनीति और नौकरशाही पर भी पड़ा है. यही कारण है कि प्रदेश में घोर भ्रष्टाचार व्याप्त है. सभी कल्याणकारी योजनायें जैसे मनरेगा, राशन वितरण प्रणाली, बाल विकास, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन, विधवा पेंशन, वृदा पेंशन, जननी सुरक्षा योजना आदि घोर भ्रष्टाचार का शिकार हो गयीं हैं जिससे न केवल दलित बल्कि सभी लोग इनके वांछित लाभ से वंचित रह गए हैं . शिक्षा एवं स्वास्थ्य मायावती सरकार के सब से कम वरीयता वाले क्षेत्र रहे हैं. २००९ के चुनाव के समय मायावती देश का प्रधान मंत्री का सपना देख रही थीं जो पूरा नहीं हुआ और चुनाव में बड़ी मुश्किल से २० सीटें ही मिल पायीं. अब तो २०१२ के चुनाव में उत्तर प्रदेश में सरकार बनाने की भी कोई सम्भावना नहीं है जैसा कि जनता की आवाज़ सुनाई पड़ रही है.
उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट है की उत्तर प्रदेश के दलितों की अधोगति के लिए मायावती को काफी हद तक जुम्मेवार ठहराया जा सकता है जोकि उसके व्यक्तिगत भ्रष्टाचार और सिद्धान्तहीन राजनीति का ही दुष्परिणाम है. उम्मीद है कि उत्तर प्रदेश के दलित भी अब समझ गए होंगे कि केवल किसी भी तरह से सत्ता पा लेने से ही समस्याएँ हल नहीं हो जातीं. उसके लिए डॉ. आंबेडकर जैसी सैद्धांतिक तथा एजेंडा आधारित मौलिक परिवर्तन की राजनीति की ज़रुरत है.

सोनभद्र के आदिवासी बसपा, सपा,भाजपा और कांग्रेस को वोट क्यों नहीं देंगे?

सोनभद्र के आदिवासी बसपा, सपा,भाजपा और कांग्रेस को वोट क्यों नहीं देंगे?
- एस. आर. दारापुरी, राष्ट्रीय प्रवक्ता , आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट
उत्तर प्रदेश के सोनभद्र ज़िले में आदिवासियों की सबसे बड़ी आबादी है। इस चुनाव में हाल में आइपीएफ द्वारा आदिवासियों के लिए आरक्षित कराई गई दो सीटों दुद्धी और ओबरा पर सभी पार्टियों ने उम्मीदवार खड़े किये हैं। आइपीएफ भी ओबरा सीट पर एक आदिवासी मज़दूर को चुनाव लड़ा रही है। इस चुनाव में इन आदिवासी आरक्षित सीटों के क्षेत्र के आदिवासी सपा, बसपा भाजपा और कांग्रेस से सख्त नाराज़ हैं और उन्हें वोट नहीं देंगे क्योंकि:
1. 2008 में जब वनाधिकार कानून लागू हुआ था उस समय उत्तर प्रदेश में मायावती की सरकार थी।इस कानून के अंतर्गत सभी आदिवासियों/वनवासियों को उनके कब्ज़े की ज़मीन का मालिकाना हक उनके अधिकार के रूप मे दिया जाना था। परंतु मायावती सरकार ने आदिवासियों को ज़मीन न देकर सोनभद्र के 65000 परिवारों के दावों में से 53000 दावों को निरस्त कर दिया। इसके साथ ही पूरे उत्तर प्रदेश में आदिवासियों के 81%दावे निरस्त कर दिए गए। क्या आदिवासियों के साथ इससे बड़ा कोई अन्याय हो सकता है?
मायावती सरकार के इस अन्याय के विरुद्ध आइपीएफ ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर करके सभी आदिवासियों के दावे पुनः तैयार कराकर सभी को भूमि आवंटित करने का अनुरोध किया। माननीय उच्च न्यायालय ने इस अनुरोध को स्वीकार कर अगस्त 2013 में सभी आदिवासियों के दावों का पुनर्परीक्षण कर भूमि आवंटित करने का आदेश दिया। तब तक उत्तर प्रदेश में सपा की सरकार आ गयी थी। आइपीएफ बराबर अखिलेश सरकार से हाई कोर्ट के आदेश का अनुपालन करने का अनुरोध करता रहा परंतु उसने इस दिशा में कोई भी कार्रवाही नहीं की। इस तथ्य को सभी आदिवासी बहुत अच्छी तरह से जानते हैं। आइपीएफ ने इसको अपना प्रमुख चुनावी मुद्दा बनाया है।
2. उत्तर प्रदेश में आदिवासियों की आबादी लगभग 12 लाख है परंतु उनके लिए किसी भी स्तर पर स्थानीय निकायों तथा विधान सभा एवं लोकसभा में कोई भी आरक्षण उपलब्ध नहीं था। आइपीएफ इन्हें आरक्षण दिलाने की लड़ाई पिछले 10 सालों से हाई कोर्ट, सुप्रीमकोर्ट तथा चुनाव आयोग में लड़ता रहा है। 2010 में जब इलाहबाद हाई कोर्ट ने आदिवासियों को पंचायत राज में आरक्षण देने का आदेश दिया तो मायावती सरकार ने सुप्रीमकोर्ट से स्थगन आदेश प्राप्त कर लिया और आदिवासियों को पंचायती राज में आरक्षण नहीं मिल सका। इतना ही नहीं बसपा, सपा, भाजपा तथा कांग्रेस आदिवासियों के विधानसभा तथा लोकसभा में आरक्षण का हाइकोर्ट एवं सुप्रीम कोर्ट म लगातार विरोध करती आई हैं। 2010 में इलाहबाद हाई कोर्ट ने जब आदिवासियों के लिए दो विधानसभा सीटें आरक्षित करने का आदेश दिया तो सभी राजनीतिक पार्टियों ने इसका विरोध किया। केंद्र की कांग्रेस सरकार भी इसको रखी रही और खानापूर्ति के लिए 2013 में ऑर्डिनेन्स जारी करके बैठ गयी परंतु लोकसभा में आरक्षण बिल पास नहीं कराया। 2014 में जब भाजपा सरकार आयी तो उसने इस बिल को पास कराने की बजाए इसे वापस ले लिया और आदिवासियों को मिलने वाले प्रतिनिधित्व के अधिकार का गला घोंट दिया। इस पर आइपीएफ ने 2014 में जंतर मंतर पर धरना दिया जिसमें आइपीएफ के राष्ट्रीय संतोजक, अखिलेन्द्र प्रताप सिंह ने 10 दिन का अनशन भी रखा। इसी बीच राष्ट्रीय अभियान के राष्ट्रीय संयोजक प्रशांत भूषण के माध्यम से राष्ट्रीय चुनाव आयोग को पिटीशन भी दी गयी।
चुनाव आयोग ने जब 4 फरवरी , 2014 को दुद्धी और ओबरा की दो विधान सभा सीटें आदिवासियों के लिए आरक्षित करने का आदेश दिया तो इस पर बसपा, सपा, भाजपा और कांग्रेस एकजुट होकर हाइकोर्ट में विरोध करने के लिए पहुँच गयीं। आइपीएफ द्वारा मज़बूत पैरवी के कारण ही हाइकोर्ट ने इन पार्टियों के विरोध को निरस्त करके इन सीटों को आदिवासियों के लिए आरक्षित करने के आदेश को बरकरार रखा है। आदिवासी इतिहास में यह पहला अवसर है जब आइपीएफ के लंबे संघर्ष के फलस्वरूप आदिवासियों को जनप्रतिनिधित्व का लोकतान्त्रिक अधिकार मिल सका है। आदिवासी आइपीएफ के इस संघर्ष को बहुत अच्छी तरह से जानते हैं और चुनाव में सपा, बसपा, भाजपा और कांग्रेस को वोट नहीं देंगे।
3. उत्तर प्रदेश का सोनभद्र क्षेत्र पत्थर, बालू और कोयले का घर है। परंतु इस क्षेत्र में सरकारी सहमति से अंधाधुंध अवैध खनन हुआ है। इस खनन में मुख्य मंत्री स्तर पर भ्रष्टाचार / लूट हुयी है जिसे इस क्षेत्र में वीआईपी टैक्स के नाम से जाना जाता है। यह बालू तथा पत्थर के यातायात में सरकारी स्तर पर अवैध वसूली के रूप में होती रही है। इसके अंतर्गत 1100 रुपये का रवन्ना ब्लैक में 3000 से 5000 रूपये में बेचा जाता रहा है। वैसे तो वीआईपी टैक्स वसूली का धंधा राजनाथ सिंह की सरकार के समय से शुरू हुआ था जो भाजपा सरकार के भ्रष्टाचार मुक्त होने का दावा कर रहे हैं। मायावती सरकार के दौरान इसकी वसूली मायावती का बहुत नज़दीकी खनिज मंत्री बाबू सिंह कुशवाहा करके मायावती को पहुंचाता रहा। सपा सरकार में यह जुम्मेदारी अखिलेश के खनिज मंत्री गायत्री प्रजापति जो मुलायम सिंह के दत्तक पुत्र हैं,  को दी गयी थी जो अब बलात्कार के आरोप में फरार है। राजनैतिक माफियाओं की इस वीआईपी लूट को इस जिले का बच्चा बच्चा जानता है। आइपीएफ ने वीआईपी लूट के राजनीतिक माफियाओं को सजा देने का नारा दिया है जिसे भारी जनसमर्थन मिल रहा है।
4. सोनभद्र का आदिवासी क्षेत्र उत्तर प्रदेश का कालाहांडी है। इस क्षेत्र में बुनियादी सुविधायों शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षित पेयजल, सिंचाई, बिजली तथा यातायात के साधनों का घोर अभाव है। इसके फलस्वरूप इस क्षेत्र में हर साल हज़ारों औरतें, मर्द तथा बच्चे मौत का शिकार होते हैं। आदिवासी चुआड़ तथा नदी नालों का गंदा पानी पी कर बीमार होते हैं। इस क्षेत्र के विकास के लिए जो भी पैसा आता है उसे राजनेता, ठेकेदार तथा अधिकारी मिल कर बाँट लेते हैं। इस क्षेत्र की इस दुर्दशा को लेकर आदिवासियों में सभी राजनीतिक पार्टियों के विरुद्ध आक्रोश व्याप्त है। इसी लिए उन्होंने इस चुनाव में अपने पिछड़ेपन के लिए ज़िम्मेदार पार्टियों को सबक सिखाने का फैसला लिया है।

रविवार, 5 फ़रवरी 2017

क्या मायावती का दलित वोट बैंक खिसका है?

क्या मायावती का दलित वोट बैंक खिसका है?
-एस. आर. दारापुरी, राष्ट्रीय प्रवक्ता, आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट
पिछले लोक सभा चुनाव के परिणामों पर मायावती ने प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा था  कि उन की हार के पीछे मुख्य कारण गुमराह हुए ब्राह्मण, पिछड़े और मुसलमान समाज द्वारा वोट न देना है जिस के लिए उन्हें बाद में पछताना पड़ेगा. इस प्रकार मायावती ने स्पष्ट तौर पर मान लिया था कि उस का सोशल इंजीनियरिंग का फार्मूला फेल हो गया है. मायावती ने यह भी कहा था कि उस की हार के लिए उसका यूपीए को समर्थन देना भी था. उस ने आगे यह भी कहा था कि कांग्रेस और सपा ने उस के मुस्लिम और पिछड़े वोटरों को यह कह कर गुमराह कर दिया था कि दलित वोट भाजपा की तरफ जा रहा है. परन्तु इस के साथ ही उस ने यह दावा किया था कि उत्तर प्रदेश में उसकी पार्टी को कोई भी सीट न मिलने के बावजूद उस का दलित वोट बैंक बिलकुल नहीं गिरा है. इसके विपरीत उसने अपने वोट बैंक में इजाफा होने का दावा भी किया था.
आइये उस के इस दावे की सत्यता की जांच उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर करें:-
यदि बसपा के 2007 से लेकर अब तक चुनाव परिणामों को देखा जाये तो यह बात स्पष्ट तौर पर उभर कर आती है कि जब से मायावती ने बहुजन की राजनीति के स्थान पर सर्वजन की राजनीति शुरू की है तब से बसपा का दलित जनाधार बराबर घट रहा है. 2007 के असेंबली चुनाव में बसपा को 30.46%, 2009 के लोकसभा चुनाव में 27.42% (-3.02%), 2012 के असेंबली चुनाव में 25.90% (-1.52%) तथा 2014 के लोक सभा चुनाव में 19.60% (-6.3%) वोट मिला था. इस से स्पष्ट है कि मायावती का दलित वोट बैंक के स्थिर रहने का दावा उपलब्ध आंकड़ों पर सही नहीं उतरता है.
मायावती का यह दावा कि उस का उत्तर प्रदेश में वोट बैंक 2009 में 1.51 करोड़ से बढ़ कर 2014 में 1.60 करोड़ हो गया है भी सही नहीं है क्योंकि इस चुनाव में पूरे उत्तर प्रदेश में बढ़े 1.61 करोड़ नए मतदाताओं में से बसपा के हिस्से में केवल 9 लाख मतदाता ही आये थे. राष्ट्रीय चुनाव आयोग द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार भी बसपा का वोट बैंक 2009 के 6.17 % से 2% से अधिक गिरावट के कारण घट कर 4.1% रह गया था. सेंटर फार स्टडी आफ डेवलपिंग सोसाइटी के निदेशक संजय कुमार ने भी बसपा के कोर दलित वोट बैंक में सेंध लगने की बात कही थी.
मायावती का कुछ दलितों द्वारा गुमराह हो कर भाजपा तथा अन्य पार्टियों को वोट देने का आरोप भी बेबुनियाद है. मायावती यह अच्छी तरह से जानती हैं कि दलितों का एक बड़ा हिस्सा चमारों सहित 2012 के असेंबली चुनाव में ही उस से अलग हो गया था. इसका मुख्य कारण शायद यह था कि मायावती ने दलित राजनीति को उन्हीं गुण्डों. माफियों और पूंजीपतियों के हाथों बेच दिया है जो कि उनके वर्ग शत्रु हैं. इस से नाराज़ हो कर चमारों/जाटवों का एक हिस्सा और अन्य दलित उपजातियां बसपा से अलग हो गयी हैं.. मायावती का बोली लगा कर टिकट बेचना और दलित वोटों को भेड़ बकरियों की मानिंद किसी के भी हाथों बेच देना और इस वोट बैंक को किसी को भी हस्तांतरित कर देने का दावा करना दलितों को एक समय के बाद रास नहीं आया. इसी लिए पिछले असेंबली चुनाव और  लोक सभा चुनाव में दलितों ने उसे उसकी हैसियत बता दी थी.
किसी भी दलित विकास के एजंडे के अभाव में दलितों को मायावती की केवल कुर्सी की राजनीति भी पसंद नहीं आई है क्योंकि इस से मायावती के चार बार मुख्य मंत्री बनने के बावजूद भी दलितों की माली हालत में कोई परिवर्तन नहीं आया है. एक अध्ययन के अनुसार उत्तर प्रदेश के दलित बिहार. उड़ीसा, मध्य प्रदेश और राजस्थान के दलितों को छोड़ कर विकास के सभी मापदंडों जैसे: पुरुष/महिला शिक्षा दर, पुरुष/महिला तथा 0-6 वर्ष के बच्चों के लैंगिक अनुपात और नियमित नौकरी पेशे आदि में हिस्सेदारी में सब से पिछड़े हैं. मायावती के व्यक्तिगत और राजनीतिक भ्रष्टाचार के कारण दलितों को राज्य की कल्याणकारी योजनाओं का भी लाभ नहीं मिल सका. दूसरी तरफ बसपा पार्टी के पदाधिकारियों की दिन दुगनी और रात चौगनी खुशहाली से भी दलित नाराज़ हुए हैं जिस का इज़हार उन्होंने लोकसभा चुनाव में खुल कर किया था. यह भी ज्ञातव्य है कि उत्तर प्रदेश की 40 सीटें ऐसी हैं जहाँ दलितों की आबादी 25% से भी अधिक है. 2009 के लोक सभा चुनाव में बसपा 17 सुरक्षित सीटों पर नंबर दो पर थी जो कि 2014 में  कम हो कर 11 रह गयी थी. इस से स्पष्ट है कि मायावती का दलित वोट बैंक के बरकरार रहने का दावा तथ्यों के विपरीत है.
मायावती ने 2012 के असेंबली चुनाव में भी मुसलामानों पर आरोप लगाया था कि उन्होंने उसे वोट नहीं दिया. पिछले लोकसभा चुनाव में मायावती ने इस आरोप को न केवल दोहराया था बल्कि बाद में उनके पछताने की बात भी कही थी. मायावती यह भूल जाती हैं कि मुसलामानों को दूर करने के लिए वह स्वयं ही जिम्मेवार हैं. 1993 के चुनाव में मुसलामानों ने जिस उम्मीद के साथ उसे वोट दिया था मायावती ने उस के विपरीत मुख्य मंत्री बनने की लालसा में 1995 में मुसलामानों की धुर विरोधी पार्टी भाजपा से हाथ मिला लिया था. इस के बाद भी उसने कुर्सी पाने के लिए दो बार भाजपा से सहारा लिया था. इतना ही नहीं 2003 में उस ने गुजरात में मुसलमानों के कत्ले आम के जिम्मेवार मोदी को कलीन चिट दी थी तथा उस के पक्ष में गुजरात जा कर चुनाव प्रचार भी किया था. आगे भी मायावती भाजपा से हाथ नहीं मिलाएगी इस की कोई गारंटी नहीं है. ऐसी मौकापरस्ती के बरक्स मायावती यह कैसे उम्मीद करती है कि मुसलमान उसे आँख बंद कर के वोट देते रहेंगे. मुज़फ्फरनगर के दंगे में  मायावती द्वारा कोई भी प्रतिक्रिया न दिया जाना भी मुसलामानों को काफी नागुबार गुज़रा था.
मायावती द्वारा पिछली तथा 2014 की हार के लिए अपनी कोई भी गलती न मानना भी दलितों और मुसलामानों के लिए असहनीय रहा है. 2012 में उसने इस का दोष मुसलामानों को दिया था. 2014 में उसने इसे कांग्रेस सरकार को समर्थन देना बताया था . अगर यह सही है तो मायावती के पास इस का क्या जवाब है कि उस ने कांग्रेस सरकार को समर्थन क्यों दिया? केवल कट्टरपंथी ताकतों को रोकने की कोशिश वाली बात भी जचती नहीं. दरअसल असली बात तो सीबीआई के शिकंजे से बचने की मजबूरी थी जो कि आय से अधिक संपत्ति के मामले में अभी भी बनी हुयी है. भाजपा भी मायावती की इसी मजबूरी का फायदा उठाती रही है और आगे भी उठाएगी.
उपरोक्त संक्षिप्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि दलितों ने पिछली बार मायावती के सर्वजन वाले फार्मूले को बुरी तरह से नकार दिया था. मुसलामानों ने भी उस से किनारा कर लिया था. इस चुनाव में भी इस स्थिति में कोई विशेष परिवर्तन आने की सम्भावना दिखाई नहीं देती है.  वर्तमान में दलितों, मुसलामानों, मजदूरों, किसानों और छोटे कारखानेदारों और दुकानदारों के लिए मोदी की कार्पोरेटप्रस्त हिंदुत्व फासीवादी राजनीति सब से बड़ा खतरा है जिस का मुकाबला मायावती और मुलायम सिंह आदि की सौदेबाज, अवसरवादी  और कार्पोरेटप्रस्त राजनीति द्वारा नहीं किया जा सकता है. इस के लिए सभी वामपंथी, प्रगतिशील और अम्बेडकरवादी ताकतों को एकजुट हो कर कार्पोरेट और फासीवाद विरोध की जनवादी राजनीति को अपनाना होगा.

दलित राजनीति की दरिद्रता

दलित राजनीति की दरिद्रता
-एस.आर.दारापुरी, राष्ट्रीय प्रवक्ता, आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट
क्या यह दलित राजनीति की दरिद्रता नहीं है कि यह केवल आरक्षण तक ही सीमित हो कर रह जाती है या इसे जानबूझ कर सीमित कर दिया जाता है? क्या दलितों की भूमिहीनता, गरीबी, बेरोज़गारी, अशिक्षा, तथा सामाजिक एवं आर्थिक शोषण एवं पिछड़ापन दलित राजनीति के लिए कोई मुद्दा नहीं है? भाजपा भी आरएसएस के माध्यम से चुनाव में आरक्षण के मुद्दे को जानबूझ कर उठवाती है ताकि दलितों का कोई दूसरा मुद्दा चुनावी मुद्दा न बन सके। इसके माध्यम से वह हिन्दू मुस्लिम की तरह आरक्षण समर्थक और आरक्षण विरोधियों का ध्रुवीकरण करने का प्रयास करती है जैसा कि पिछले बिहार चुनाव से पहले किया गया था. ऐसा करके वह दलित नेताओं का काम भी आसान कर देती है क्योंकि इससे उन्हें दलितों के किसी दूसरे मुद्दे पर चर्चा करने की ज़रुरत ही नहीं पड़ती। इसी लिए तो दलित पार्टियां को चुनावी घोषणा पत्र  बनाने और जारी करने की ज़रूरत नहीं पड़ती। परिणाम यह होता है कि दलित मुद्दे चुनाव के केंद्र बिंदु नहीं बन पाते.
इसके मुकाबले में ज़रा डॉ. आंबेडकर की राजनीतिक पार्टियों के घोषणा पत्र पढ़िए जो कि बहुत व्यापक और रैडिकल होते थे। कृपया इस संबंध में www.dalitmukti.blogspot.com पर "डॉ. आंबेडकर और जाति की राजनीति" आलेख पढ़िए और उसकी तुलना वर्तमान दलित राजनीति से कीजिये। इसके विवेचन से एक बात बहुत स्पष्ट हो जाती है कि डॉ. आंबेडकर जाति की राजनीति के कतई पक्षधर नहीं थे क्योंकि इस से जाति मजबूत होती है. इस से हिंदुत्व मजबूत होता है जो कि जाति व्यवस्था की उपज है. डॉ. आंबेडकर का लक्ष्य तो जाति का विनाश करके भारत में जातिविहीन और वर्गविहीन समाज की स्थापना करना था. डॉ. आंबेडकर ने जो भी राजनैतिक पार्टियाँ बनायीं वे जातिगत पार्टियाँ नहीं थीं क्योंकि उन के लक्ष्य और उद्देश्य व्यापक थे. यह बात सही है कि उनके केंद्र में दलित थे परन्तु उन के कार्यक्रम व्यापक और जाति निरपेक्ष थे. वे सभी कमज़ोर वर्गों के उत्थान के लिए थे. इसी लिए जब तक उन द्वारा स्थापित की गयी पार्टी आरपीआई उन के सिद्धांतों और एजंडा पर चलती रही तब तक वह दलितों, मजदूरों और अल्पसंख्यकों को एकजुट करने में सफल रही. जब तक उन में आन्तरिक लोकतंत्र रहा और वे जन मुद्दों को लेकर संघर्ष करती रही तब तक वह फलती फूलती रही. जैसे ही वह व्यक्तिवादी और जातिवादी राजनीति के चंगुल में पड़ी उसका पतन हो गया. यह अति खेद की बात है कि वर्तमान दलित राजनीति व्यक्तिवाद, जातिवाद, अवसरवाद, भ्रष्टाचार और मुद्दाविहिनता का बुरी तरह से शिकार हो गयी है. इसका दुष्परिणाम यह हुआ है कि दलित वर्ग जो कि सामाजिक तौर पर उपजातियों में विभाजित है, अब राजनितिक तौर पर भी बुरी तरह से विभाजित हो गया है जिसका लाभ सबसे अधिक हिंदुत्व की पक्षधर पार्टी भाजपा ने उठाया है. पिछले लिक्सभा चुनाव से यह बात बिलकुल स्पष्ट हो गयी है और वर्तमान विधानसभा चुनाव में भी इसकी महत्वपूरण भूमिका रहेगी.

 यह दलित राजनीति की त्रासदी ही है कि गैरदलित पार्टियों को तो छोडिये, दलित राजनीतिक पार्टियाँ भी दलितों के ठोस मुद्दों पर कोई संघर्ष करने की बजाये चुनाव में जाति के नाम पर उनका भावनात्मक शोषण करके वोट बटोर लेती हैं और दलित जैसे थे वैसे ही बने रहते हैं. अतः मेरा यह निश्चित मत है कि जब तक दलित राजनीति जाति की राजनीति के मक्कड़जाल से निकल कर व्यापक दलित मुद्दों पर नहीं आएगी तब तक दलितों का उद्धार नहीं हो सकेगा। इसके लिए दलित राजनीति को एक रेडिकल  एजंडा अपनाना होगा. आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट ने इस दिशा में एक बड़ी पहल की है. 

डॉ. बी. आर. अंबेडकर की कम्यूनिज़्म की आलोचना और कम्युनिस्टों के साथ उनके संबंध

  डॉ. बी. आर. अंबेडकर की कम्यूनिज़्म की आलोचना और कम्युनिस्टों के साथ उनके संबंध एस आर दारापुरी आई.पी.एस.(सेवानिवृत) परिचय आधुनिक भ...