गुरुवार, 12 मार्च 2015

दलित और गोमांस पर प्रतिबंध


दलित और गोमांस पर प्रतिबंध
एस.आर. दारापुरी आईपीएस (से. नि.)  

(भोपाल में गोमांस पर प्रतिबंध के खिलाफ धरना)
हाल में महाराष्ट्र की भाजपा सरकार ने एक कानून बनाया है जिस के अनुसार उस राज्य में कोई भी व्यक्ति गोमांस खाने के लिए किसी भी गोवंशीय पशु जैसेबैल और बछड़ा का न तो वध कर सकता है, न ही उस का मांस बेच सकता, न ही उसे अपने पास रख सकता और न ही खा सकता है. यह ज्ञातव्य है कि महाराष्ट्र में अन्य कई राज्यों की तरह पहले से ही गो हत्या पर प्रतिबंध लगा है. इस से पहले इन सभी जानवरों डाक्टर के प्रमाण पर देने पर काटा जा सकता था. परन्तु अब यह सब पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया गया है. इसी प्रकार की मांग की हिन्दू राष्ट्र के पैरोकारों द्वारा भाजपा द्वारा शासित अन्य राज्यों तथा इस भाजपा की केन्द्रीय सरकार द्वारा केन्द्रीय कानून बनाने की जा रही है. ज्ञात हुआ है कि हरियाणा की भाजपा सरकार भी इसी प्रकार का कानून बनाने जा रही है. वास्तव में यह हिंदुत्व के सांस्कृतिक फासीवाद का ही विस्तार है जिस का मुख्य उद्देश्य भारत को जल्दी से जल्दी हिन्दू राष्ट्र बनाना है.
यद्यपि महाराष्ट्र में यह कानून गोवंश की रक्षा के नाम पर बनाया गया है परन्तु वास्तव में यहं हिन्दू राष्ट्रवादियों की गो माता को पवित्र मानने और मनवाने के लिए सत्ता का दुरूपयोग है. यह सभी जानते हैं कि गाय के इलावा अन्य जानवरों का मांस दलितों, आदिवासियो, ईसाईयों और मुसलामानों द्वारा खाया जाता रहा है और वह भी अधिकतर इन वर्गों के गरीब तबकों द्वारा. इतना ही नहीं दलित तो सदियों से मरे पशुयों का मांस खाने के लिए बाध्य थे क्योंकि उन्हें तो केवल गधे और कुत्ते पालने का ही अधिकार दिया गया था. अतः न तो वे इन जानवरों को मार कर मांस खा सकते थे और न ही इन का दूध पी सकते थे. उन के लिए स्वादिष्ट अथवा अच्छा भोजन खाने की मनाही थी क्योंकि उन्हें केवल दूसरे वर्णों की जूठन खाने का ही अधिकार था. इस लिए जीवित रहने के लिए वे मरे पशुयों जिन्हें उठाना उन का कर्तव्य था का मांस खा कर ही जीवित रहने के लिए बाध्य थे. भगवान दास जी इस में भी अछूतों की अकलमंदी समझाते थे क्योंकि उन्होंने मरे पशुयों का मांस खा कर अपने आप को जीवित तो रखा. यह बात अलग है कि बाद में डॉ. आंबेडकर ने उन्हें मरे पशुयों का मांस खाने की मनाही की और काफी दलितों ने इसे खाना छोड़ भी दिया है.
अब सवाल पैदा होता कि ब्राह्मण और अन्य सवर्ण जातियां जो आज दूसरों को गोमांस खाने से रोकने के लिए कानून बना रही हैं क्या उन्होंने कभी गोमांस नहीं खाया. इस का उत्तर हिंदुयों को ऋग्वेद, सत्पथ ब्राह्मण, आपस्तम्ब धर्म सूत्र, बुद्ध के कुतादंत सुत्त, संयुक्त निकाय तथा अन्य कई हिन्दू ग्रंथों में विस्तार से मिल जाता है. ऋग्वेद में दूध न देने वाली गाय का मांस खाने की मनाही नहीं है. वाल्मीकि रामायण में भी सीता स्वयंबर के लिए जाते समय विश्वामित्र के आश्रम में उन के पसंद के बछड़े का मांस खिलाने का उल्लेख है. वैसे भी जब राम, लक्ष्मण और सीता जंगल में रहे तो उन्होंने अपने भोजन की पूर्ती कैसे की होगी इस पर अधिक कुछ कहने की ज़रुरत नहीं है. क्या मरिचक हिरन को केवल उस की सुन्दर खाल के लिए ही मारा गया था या किसी अन्य प्रयोजन के लिए भी. इस विषय में अगर कोई अधिक विस्तार से जानने का इच्छुक है तो वह डॉ. आंबेडकर की पुस्तक “ अछूत कौन और कैसे” का “क्या हिन्दुओं ने कभी गोमांस खाया?” खंड पढ़ सकता है.( http://whowereuntouchables.blogspot.in/2007/07/blog-post_9602.html) वैसे ब्राह्मणों और सवर्णों को यह भी नहीं भूलना चाहिए आज भी अधिकतर ब्राह्मण और सवर्ण शाकाहारी नहीं बल्कि मांसाहारी हैं. मैं हिन्दुत्ववादियों का ध्यान स्वामी विवेकानंद के 2 फरवरी, 1900 को शैक्स्पेयर क्लब, पेसिडिना, कैलेफोर्निया में “बौद्धकालीन  भारत’ विषय पर दिए गए भाषण के इस अंश की ओर आकृष्ट कराना चाहूँगा जिस में उन्होंने कहा था,” आप हैरान हो जायेंगे अगर मैं आप को बताऊँ कि पुराने हिन्दू कर्मकांड के अनुसार गोमांस न खाने वाला अच्छा हिन्दू नहीं है. कुछ अवसरों पर उसे बैल की बलि अवश्य देनी होती है. “(स्वामी विव्वेकानंद सम्पूर्ण वांग्मय, जिल्द 3, अद्वैत आश्रम, कलकत्ता, 1997, पृष्ट 536).
अब अगर देखा जाये तो महाराष्ट्र सरकार का यह कानून भारत के नागरिकों के जीने के मौलिक अधिकार का खुला उलंघन है. भारत का संविधान भारत के प्रत्येक नागरिक को सम्मान सहित जीने का अधिकार देता है और जीवित रहने के लिए उचित भोजन ज़रूरी है. अब अगर आप के भोजन पर प्रतिबंध लगा दिया जाये तो फिर आप सम्मानजनक जीवन कैसे जी सकते है. इस लिए मेरे विचार में इस कानून को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जानी चाहिए क्योंकि महाराष्ट्र उच्च न्यायालय ने इस पर रोक लगाने से मना कर दिया है. यह भी उल्लेखनीय है कि बहुत सारे बेचारे न्यायमूर्ति भी ब्राह्मणवादी मानसिकता से ग्रस्त रहते हैं. अतः उनसे निरपेक्ष निर्णयों की अपेक्षा नहीं की जा सकती. फिलहाल हम लोग सुप्रीम कोर्ट पर कुछ भरोसा कर सकते हैं.  
यह भी ज्ञातव्य है कि हमारे देश में सरकारी आंकड़ों के अनुसार लगभग 42% बच्चे कुपोषण का शिकार हैं और ऐसी ही दयनीय स्थिति महिलायों की भी है. दलित और आदिवासी बच्चों और महिलायों की कुपोषण की स्थिति तो और भी भयाव्य है. करायी (CRY) संस्था द्वारा वर्ष 2007 में उत्तर प्रदेश जिस में एक दलित महिला चार बार मुख्य मंत्री रही है  के सर्वेक्षण से तो कुछ ब्लाकों में 70% दलित बच्चे कुपोषित पाए गए थे. कुपोषण की इस भयावह स्थिति को देखते हुए ही  हमारे पूर्व प्रधान मंत्री श्री मनमोहन सिंह जी ने इसे “राष्ट्रीय शर्म” की संज्ञा दी थी. परन्तु हमारी वर्तमान हिन्दुत्ववादी सरकार  से ऐसी संवेदना की उम्मीद नहीं की जा सकती. यह सर्व विदित है कि दलित, आदिवासी और मुसलामानों का अधिकतर गरीब तबका पशुयों का मांस खा कर कुपोषण से कुछ हद तक बच जाता है परन्तु अब गोमांस पर उक्त प्रतिबंध द्वारा उन का प्रोटीन का यह सस्ता श्रोत भी छीन लिया गया है. अब तो उन्हें मरना ही है चाहे वे कुपोषण से मरें या बीमारी से मरें.
अब अगर देश में पशुधन की स्थिति देखी जाये तो यह बहुत शोचनीय है. हमारे देश में पशुयों की संख्या तो बहुत है परन्तु उन से मिलने वाला दूध और मांस बहुत कम है. इस का मुख्य कारण हमारे पशुधन की घटिया नस्ल, उन का कुपोषित होना और बूढ़े तथा अलाभकारी पशुयों का बने रहना है. हमारे बहुत से राज्यों में पशु चारे का बराबर अकाल रहता है जिस के सम्मुख बूढ़े और अलाभकारी पशुयों का बने रहना दुधारू पशुयों के लिए बहुत शोषणकारी है. अब अगर बूढ़े और दूध न देने वाले पशुयों को मारने और उन का मांस खाने पर यह प्रतिबंध प्रभावी हो जाता है तो यह पशु पालकों द्वारा आत्म हत्या का एक और कारण बनेगा. इस के इलावा हमारे देश से भारी  मात्रा में गोमांस विदेशों को निर्यात किया जाता है और गुजरात इस मामले में सब से अगरगणी है. अब सोचा जा सकता है कि इस कानून का मांस के निर्यात और उस से होने वाली आय पर क्या असर पड़ेगा. इस के इलावा इस काम में लगे लाखों लोगों के रोज़गार का क्या होगा? लगता है हिन्दू राष्ट्र बनाने की धुन में लगे हिन्दुत्ववादियों को भारत के गरीबों के इन सरोकारों से कोई मतलब नहीं हैं. वे शायद इस कार्य को बहुत जल्दी जल्दी पूरा करने में लगे हैं. वैसे उपलब्ध सूचना के अनुसार अमेरिका में गोमांस का धंधा अधिकतर हिन्दू ही करते हैं.
डॉ. आंबेडकर अक्सर कहा करते थे कि भारत में हमेशा से “बहुसंख्यकों का आतंक” रहा है. वे आज़ादी के बाद इस आतंक के बढ़ जाने के खतरे की आशंका भी व्यक्त करते रहते थे. उनका यह भी निश्चित मत था कि भारत के विभाजन के लिए भी “बहुसंख्यकों का आतंक” ही एक प्रमुख कारण बना था. लगता है कि केंद्र में हिंदुत्ववादियों की सरकार बन जाने से यह आतंक एक अति उग्र रूप धारण करता जा रहा है जो दलितों, आदिवासियों, मुसलामानों और ईसाईयों के लिए बहुत बड़ा खतरा बन गया है. इस अंधरे में आशा की जो एक किरन दिखाई दे रही है वह है इस का जन विरोध. हाल में केरल में लोगों ने “ पशु मांस” की एक खुली दावत की है. इसी प्रकार भोपाल में भी हिन्दू साधु संतों ने इस कानून के खिलाफ धरना दिया है. अतः मेरे विचार में इस कानून के विरुद्ध पूरे देश में सभी वर्गों के लोगों, मजदूरों और किसानों को लामबंद हो कर विरोध करना चाहिए और इस को रद्द कराने के लिए सर्वोच्च न्यायालय में भी याचिकाएं दायर करनी चाहिए. यह कानून दलितों, आदिवासियों, मुसलमानों और ईसाईयों, मजदूरों और किसानों के हितों पर कुठाराघात है क्योंकि यह जीवन के मौलिक अधिकार, पेशे के मौलिक अधिकार और भोजन के मौलिक अधिकार के विरुद्ध है तथा किसानों और पशुपालकों के आर्थिक हितों के भी विपरीत है.    
             

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श्रमिक कल्याण में डॉ. अंबेडकर की ऐतिहासिक भूमिका एस.आर. दारापुरी, राष्ट्रीय अध्यक्ष, अखिल भारतीय पीपुल्स फ्रंट (आज 1 मई को अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस पर विशेष) भीमराव रामजी अंबेडकर ने आधुनिक भारत में श्रम कल्याण नीति को आकार देने में एक बुनियादी और अक्सर कम सराही गई भूमिका निभाई। उनका योगदान केवल संवैधानिक आदर्शों तक ही सीमित नहीं था, बल्कि वायसराय की कार्यकारी परिषद (1942–1946) में 'श्रम सदस्य' के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने व्यावहारिक श्रम सुधारों में भी गहरी भूमिका निभाई। उनके काम ने कई ऐसे अधिकारों और सुरक्षा उपायों की नींव रखी, जिनसे भारतीय श्रमिकों को आज भी लाभ मिल रहा है। 1. संस्थागत और नीतिगत नेतृत्व ब्रिटिश भारत के तहत 'श्रम सदस्य' के रूप में, अंबेडकर असल में 'श्रम मंत्री' ही थे। इस भूमिका में, उन्होंने श्रम प्रशासन को एक औपनिवेशिक, शोषणकारी ढांचे से बदलकर अधिक कल्याण-उन्मुख प्रणाली में बदल दिया। उन्होंने श्रमिकों को अनियंत्रित पूंजीवाद से बचाने के लिए राज्य के हस्तक्षेप की आवश्यकता पर ज़ोर दिया। उन्होंने भारत के भीतर अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के ढांचे को मज़बूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिससे भारतीय श्रम नीतियां अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप हो गईं। 2. काम के घंटों में कमी अंबेडकर की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक भारत में '8 घंटे के कार्यदिवस' की शुरुआत करना था। इस सुधार से पहले, औद्योगिक श्रमिक अक्सर कठोर परिस्थितियों में दिन में 12–14 घंटे काम करते थे। इस सुधार ने भारत को वैश्विक श्रम मानकों के बराबर ला खड़ा किया और मानवीय कार्य परिस्थितियों की दिशा में एक बड़ा बदलाव लाया। 3. सामाजिक सुरक्षा उपाय अंबेडकर का दृढ़ विश्वास था कि राजनीतिक लोकतंत्र के साथ-साथ आर्थिक सुरक्षा भी होनी चाहिए। उन्होंने कई सामाजिक सुरक्षा उपायों की वकालत की और उन्हें शुरू किया, जिनमें शामिल हैं: महिला श्रमिकों के लिए मातृत्व लाभ, कार्यस्थल पर चोट लगने पर मुआवज़ा, और भविष्य निधि (Provident fund) योजनाएं इन उपायों ने बाद में 'कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम, 1948' और 'कर्मचारी भविष्य निधि और विविध प्रावधान अधिनियम, 1952' जैसे कानूनों को प्रभावित किया। 4. महिला श्रमिकों की सुरक्षा अंबेडकर श्रम क्षेत्र में लैंगिक न्याय के प्रबल समर्थक थे। उन्होंने ऐसी नीतियां पेश कीं जिनसे यह सुनिश्चित हो सके: सवेतन मातृत्व अवकाश, खदानों में महिलाओं के लिए भूमिगत काम पर प्रतिबंध, और समान वेतन तथा बेहतर कार्य-स्थितियां। उस समय के हिसाब से उनका दृष्टिकोण प्रगतिशील था और सामाजिक न्याय के उनके व्यापक दृष्टिकोण के अनुरूप था। 5. ट्रेड यूनियन अधिकार और औद्योगिक संबंध अंबेडकर ने सामूहिक सौदेबाजी के महत्व को पहचाना और ट्रेड यूनियनों के विकास का समर्थन किया। उन्होंने इन लक्ष्यों की दिशा में काम किया: ट्रेड यूनियनों को कानूनी मान्यता, औद्योगिक विवादों के समाधान के लिए तंत्र, और त्रिपक्षीय श्रम सम्मेलनों (सरकार, नियोक्ता, श्रमिक) को बढ़ावा देना उनके प्रयासों ने संवाद को संस्थागत बनाने और औद्योगिक संघर्ष को कम करने में मदद की। 6. न्यूनतम वेतन और उचित स्थितियां हालांकि न्यूनतम वेतन अधिनियम, 1948 स्वतंत्रता के बाद लागू किया गया था, लेकिन अंबेडकर के विचारों ने इसके ढांचे को काफी हद तक प्रभावित किया। उन्होंने लगातार यह तर्क दिया कि श्रम कोई वस्तु नहीं है, और एक गरिमापूर्ण जीवन सुनिश्चित करने के लिए श्रमिकों को उचित पारिश्रमिक मिलना चाहिए। 7. श्रमिक कल्याण कोष और आवास अंबेडकर ने श्रमिकों के आवास, स्वास्थ्य और शिक्षा में सहायता के लिए कल्याण कोष की वकालत की। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि औद्योगिक विकास में कार्यस्थल से परे श्रमिकों की भलाई के लिए भी प्रावधान शामिल होने चाहिए। 8. श्रमिक कल्याण के लिए संवैधानिक दृष्टिकोण भारतीय संविधान की प्रारूप समिति के अध्यक्ष के रूप में, अंबेडकर ने श्रमिक कल्याण को 'राज्य के नीति निदेशक तत्वों' (अनुच्छेद: 39, 41, 42 और 43) में शामिल किया, जिसमें ये अधिकार शामिल हैं: काम का अधिकार, काम की न्यायसंगत और मानवीय स्थितियां, जीवन-निर्वाह योग्य वेतन, और बेरोजगारी, बीमारी तथा वृद्धावस्था की स्थिति में सार्वजनिक सहायता ये सिद्धांत उनके इस विश्वास को दर्शाते हैं कि लोकतंत्र को सामाजिक और आर्थिक न्याय सुनिश्चित करना ही चाहिए। 9. व्यापक दार्शनिक योगदान अंबेडकर का श्रम दर्शन गरिमा, समानता और सामाजिक न्याय पर आधारित था। कार्ल मार्क्स जैसे विचारकों से प्रभावित होने के बावजूद, उनका दृष्टिकोण उनसे भिन्न था; उन्होंने हिंसक क्रांति को अस्वीकार कर दिया और इसके बजाय श्रमिक अधिकारों को प्राप्त करने के लिए संवैधानिक तरीकों की वकालत की। निष्कर्ष श्रमिक कल्याण के क्षेत्र में डॉ. अंबेडकर का योगदान अत्यंत परिवर्तनकारी था। उन्होंने केवल आर्थिक उत्पादकता पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय, मानव गरिमा और सामाजिक न्याय को केंद्र में ला दिया। समकालीन भारत में श्रमिकों को प्राप्त कई सुरक्षात्मक उपाय और अधिकार, उन्हीं के दृष्टिकोण और नीतिगत पहलों से प्रेरित हैं। डा. अंबेडकर मजदूरों को न केवल अपने अधिकारों के लिए ही लड़ने के लिए संगठित होने बल्कि राजनीतिक सत्ता प्राप्त करने के लिए भी प्रेरित किया। उनका कार्य हमें यह याद दिलाता है कि श्रमिक कल्याण केवल एक आर्थिक मुद्दा नहीं है, बल्कि एक नैतिक और संवैधानिक अनिवार्यता है, जो एक न्यायपूर्ण समाज के लिए अत्यंत केंद्रीय महत्व रखती है।

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