रविवार, 8 फ़रवरी 2026

भारत में लोकतांत्रिक अवनति: एक आंबेडकरवादी संवैधानिक विश्लेषण

 

भारत में लोकतांत्रिक अवनति: एक आंबेडकरवादी संवैधानिक विश्लेषण

-       - एस आर दारापुरी, राष्ट्रीय अध्यक्ष, आल इंडिया पीपुल्स फ्रन्ट

यह लेख भारत में लोकतांत्रिक शासन, संवैधानिक अधिकारों, धर्मनिरपेक्षता तथा न्यायपालिका की स्वतंत्रता की वर्तमान स्थिति का आंबेडकरवादी–संवैधानिक दृष्टिकोण से विश्लेषण करता है। लेख का तर्क है कि यद्यपि भारत औपचारिक रूप से एक संवैधानिक लोकतंत्र बना हुआ है, तथापि इसके लोकतांत्रिक सार (substance) में गंभीर क्षरण हुआ है। बहुसंख्यकवादी राष्ट्रवाद, कार्यपालिका का केंद्रीकरण और संवैधानिक नैतिकता के क्षय ने भारतीय लोकतंत्र को भीतर से खोखला कर दिया है। डॉ. भीमराव आंबेडकर की उस अवधारणा के आलोक में—जिसमें लोकतंत्र को केवल चुनावी प्रक्रिया नहीं बल्कि सामाजिक नैतिक व्यवस्था माना गया है—यह लेख भारत को ‘लोकतांत्रिक अवनति’ (democratic backsliding) के एक प्रमुख उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करता है।

1. भूमिका

भारतीय संविधान केवल शासन की एक रूपरेखा नहीं, बल्कि सामाजिक रूपांतरण का एक क्रांतिकारी दस्तावेज़ है। इसका उद्देश्य ऐतिहासिक रूप से जड़ जमाए जाति, धर्म, लिंग और वर्ग आधारित असमानताओं को समाप्त कर स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व पर आधारित लोकतांत्रिक समाज का निर्माण करना था। संविधान के प्रमुख शिल्पकार डॉ. भीमराव आंबेडकर ने बार-बार चेताया था कि यदि संविधानिक लोकतंत्र को सामाजिक लोकतंत्र का आधार नहीं मिला, तो वह टिकाऊ नहीं रह सकेगा।

हाल के वर्षों में भारत में लोकतांत्रिक संस्थाओं के क्षरण, संवैधानिक अधिकारों के संकुचन, धर्मनिरपेक्षता के अवसान तथा न्यायपालिका की भूमिका पर गंभीर प्रश्न उठे हैं। यह लेख इन प्रवृत्तियों का विश्लेषण आंबेडकरवादी संवैधानिक दृष्टिकोण से करता है और यह तर्क प्रस्तुत करता है कि भारत में लोकतंत्र का पतन किसी आकस्मिक संकट का परिणाम नहीं, बल्कि एक संरचनात्मक और वैचारिक प्रक्रिया का हिस्सा है।

2. आंबेडकर की संवैधानिक लोकतंत्र की अवधारणा

डॉ. आंबेडकर के लिए लोकतंत्र केवल शासन की एक पद्धति नहीं था, बल्कि ‘सहजीवी जीवन पद्धति’ (associated mode of living) था, जो स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व जैसे नैतिक मूल्यों पर आधारित हो। उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल राजनीतिक लोकतंत्र—अर्थात् सार्वभौमिक मताधिकार—तब तक अर्थपूर्ण नहीं हो सकता जब तक उसके साथ सामाजिक लोकतंत्र न जुड़ा हो।

आंबेडकर की अवधारणा में संवैधानिक नैतिकता का केंद्रीय स्थान है। इसका आशय संविधान की केवल औपचारिक स्वीकृति से नहीं, बल्कि उसके मूल्यों, सीमाओं और उद्देश्यों के प्रति संस्थागत तथा सामाजिक प्रतिबद्धता से है। उन्होंने यह भी चेतावनी दी थी कि भारतीय समाज की जाति-आधारित संरचना लोकतंत्र के लिए मूलतः प्रतिकूल है और ऐसे समाज में बहुसंख्यकवाद लोकतंत्र को आसानी से अधिनायकवाद में परिवर्तित कर सकता है।

3. लोकतांत्रिक शासन और कार्यपालिका का केंद्रीकरण

भारत में नियमित चुनावों और उच्च मतदाता भागीदारी के कारण लोकतंत्र का औपचारिक ढांचा अब भी मौजूद है। किंतु शासन की वास्तविक प्रक्रिया में कार्यपालिका का असाधारण केंद्रीकरण देखने को मिलता है। संसद की भूमिका निरंतर सीमित होती गई है—संसदीय सत्रों की संख्या में कमी, महत्वपूर्ण विधेयकों पर अपर्याप्त बहस, अध्यादेशों और धन विधेयकों का बढ़ता प्रयोग इस प्रवृत्ति को दर्शाता है।

आंबेडकर के दृष्टिकोण से यह स्थिति अत्यंत चिंताजनक है। उन्होंने कार्यपालिका की निरंकुशता को स्वतंत्रता के लिए सबसे बड़ा खतरा माना था, विशेषकर ऐसे समाज में जहाँ सामाजिक असमानताएँ गहरी हों। राजनीतिक विरोधियों के विरुद्ध जाँच एजेंसियों के चयनात्मक प्रयोग ने लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा की निष्पक्षता को भी कमजोर किया है।

4. संवैधानिक अधिकार और वास्तविक समानता का संकट

भारतीय संविधान में निहित मौलिक अधिकार आज भी विधिक रूप से विद्यमान हैं, किंतु उनके वास्तविक प्रयोग पर गंभीर प्रतिबंध लगे हैं। राजद्रोह, गैरकानूनी गतिविधि (निवारण) अधिनियम और निवारक निरोध कानूनों के बढ़ते प्रयोग ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, संगठन की स्वतंत्रता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सीमित किया है। बिना मुकदमे के लंबी अवधि तक कारावास एक सामान्य प्रशासनिक व्यवहार बनता जा रहा है।

आंबेडकर के अनुसार मौलिक अधिकार विशेष रूप से दलितों, आदिवासियों और अन्य वंचित समुदायों के सामाजिक सशक्तिकरण के उपकरण थे। कानून के चयनात्मक प्रयोग और अल्पसंख्यकों तथा असहमत स्वरों के प्रति कठोर रुख संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 की भावना के प्रतिकूल है। यह स्थिति अधिकार-आधारित संवैधानिकता से ‘व्यवस्था और सुरक्षा’ आधारित शासन की ओर संक्रमण को दर्शाती है।

5. धर्मनिरपेक्षता और बहुसंख्यकवादी राष्ट्रवाद

धर्मनिरपेक्षता भारतीय संविधान की आधारभूत विशेषताओं में से एक है, जिसका तात्पर्य सभी धर्मों के प्रति राज्य की समान दूरी और सम्मान से है। समकालीन भारत में यह सिद्धांत गंभीर संकट में है। राज्य की नीतियों और राजनीतिक विमर्श में बहुसंख्यक धार्मिक पहचान को विशेषाधिकार प्राप्त होता दिखाई देता है।

आंबेडकर धर्म और राजनीति के घालमेल के घोर आलोचक थे। उनका मानना था कि धार्मिक बहुसंख्यकवाद लोकतंत्र के लिए घातक है, क्योंकि यह अल्पसंख्यकों को समान नागरिक के बजाय अधीन प्रजा में बदल देता है। सांप्रदायिक ध्रुवीकरण, घृणास्पद भाषणों पर चयनात्मक कार्रवाई और साम्प्रदायिक हिंसा के मामलों में राज्य की निष्क्रियता धर्मनिरपेक्ष संवैधानिक व्यवस्था के क्षरण को रेखांकित करती है।

6. न्यायपालिका की स्वतंत्रता और संवैधानिक संरक्षण

आंबेडकर ने न्यायपालिका को संविधान का ‘संरक्षक’ माना था। औपचारिक रूप से भारतीय न्यायपालिका अब भी स्वतंत्र है, किंतु उसके समकालीन आचरण में गंभीर सीमाएँ दिखाई देती हैं। संवैधानिक रूप से महत्वपूर्ण और राजनीतिक रूप से संवेदनशील मामलों की सुनवाई में अत्यधिक विलंब, मामलों की चयनात्मक प्राथमिकता और कार्यपालिका के प्रति बढ़ती न्यायिक संकोचशीलता चिंता का विषय है।

यह स्थिति प्रत्यक्ष न्यायिक अधिग्रहण (capture) की बजाय न्यायिक निष्क्रियता या संयम के नाम पर त्याग (judicial abdication) को दर्शाती है, जिसके परिणामस्वरूप असंवैधानिक व्यवहार धीरे-धीरे सामान्यीकृत हो जाता है।

7. निष्कर्ष: चौराहे पर खड़ा संवैधानिक लोकतंत्र

यह लेख तर्क देता है कि भारत में लोकतंत्र का संकट पूर्ण अधिनायकवाद का नहीं, बल्कि संवैधानिक लोकतंत्र के भीतर से खोखले होने का संकट है। चुनावी प्रक्रियाएँ बनी हुई हैं, किंतु अधिकार, धर्मनिरपेक्षता, संस्थागत संतुलन और न्यायिक संरक्षण जैसे लोकतंत्र के मूल तत्व कमजोर पड़ते जा रहे हैं।

आंबेडकर की यह चेतावनी आज पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक है कि संवैधानिक नैतिकता के अभाव में लोकतंत्र केवल एक औपचारिक आवरण बनकर रह जाएगा। भारतीय गणराज्य का भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि क्या वह सामाजिक लोकतंत्र, वास्तविक समानता और संवैधानिक मूल्यों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को पुनर्जीवित कर पाता है या नहीं।

 

बुधवार, 4 फ़रवरी 2026

संत रैदास की सामाजिक–धार्मिक दृष्टि पर बौद्ध प्रभाव: एक आलोचनात्मक अध्ययन

 

संत रैदास की सामाजिक–धार्मिक दृष्टि पर बौद्ध प्रभाव: एक आलोचनात्मक अध्ययन

लेखक: एस आर दारापुरी आई.पी.एस.(रिटायर्ड) 

यह लेख संत रैदास (15वीं–16वीं शताब्दी) की सामाजिक–धार्मिक दृष्टि का विश्लेषण बौद्ध दर्शन के संदर्भ में करता है। यद्यपि संत रैदास की औपचारिक बौद्ध पहचान के कोई प्रत्यक्ष ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं, तथापि उनकी शिक्षाओं में निहित जाति-विरोध, मानव समानता, श्रम की गरिमा तथा ‘बेगमपुरा’ की सामाजिक कल्पना बौद्ध नैतिकता और सामाजिक दर्शन से गहरा साम्य रखती है। यह अध्ययन तर्क देता है कि संत रैदास को एक ऐसे भक्ति संत के रूप में समझा जाना चाहिए जिनकी सामाजिक चेतना श्रमण–बौद्ध परंपरा की ऐतिहासिक स्मृति से अनुप्राणित है। यह लेख बौद्ध–ब्राह्मणवादी संघर्ष की दीर्घ परंपरा में संत रैदास के विचारों को स्थान देता है और डॉ. भीमराव आंबेडकर के विमर्शात्मक ढाँचे में उनका पुनर्पाठ प्रस्तुत करता है।

1. भूमिका (Introduction)

भारतीय सामाजिक इतिहास में संत रैदास का स्थान केवल एक भक्ति संत के रूप में नहीं, बल्कि एक जाति-विरोधी सामाजिक चिंतक के रूप में भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। भक्ति आंदोलन को प्रायः आध्यात्मिक सुधार आंदोलन के रूप में प्रस्तुत किया गया है, किंतु दलित–बहुजन दृष्टिकोण से देखने पर यह आंदोलन ब्राह्मणवादी सामाजिक संरचना के विरुद्ध प्रतिरोध की अभिव्यक्ति भी था।

यह प्रश्न कि क्या संत रैदास की शिक्षाओं पर बौद्ध प्रभाव था, केवल धार्मिक इतिहास का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह सामाजिक न्याय, समानता और ऐतिहासिक निरंतरता से जुड़ा हुआ प्रश्न है।

2. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: बौद्ध धर्म और भक्ति आंदोलन

गुप्तोत्तर काल के बाद भारत में बौद्ध धर्म का संस्थागत पतन अवश्य हुआ, किंतु उसका नैतिक और सामाजिक प्रभाव समाप्त नहीं हुआ। बौद्ध धर्म की मूल विशेषताएँ— जाति-व्यवस्था का निषेध, कर्मकांड-विरोध, नैतिक आचरण पर बल एवं श्रम और समानता की प्रतिष्ठा लोक परंपराओं, श्रमण संस्कृति और निम्नवर्गीय समुदायों के सामाजिक आचरण में जीवित रहीं।

भक्ति आंदोलन के अनेक संत—कबीर, रैदास, नामदेव—इसी सांस्कृतिक स्मृति के वाहक माने जा सकते हैं।

 3. संत रैदास का सामाजिक दृष्टिकोण

संत रैदास का जन्म चर्मकार समुदाय में हुआ, जो ब्राह्मणवादी सामाजिक व्यवस्था में ‘अछूत’ माना जाता था। उनकी वाणी में निम्नलिखित तत्व प्रमुख हैं:

जाति-आधारित श्रेष्ठता का निषेध, श्रम की गरिमा और आत्मसम्मान, मानव समानता का नैतिक आधार तथा कर्मकांड और पवित्रता-अशुद्धता की आलोचना।

संत रैदास का धर्म व्यक्ति के आचरण और सामाजिक संबंधों से निर्मित होता है, न कि जन्म या शास्त्रों से।

4. ‘बेगमपुरा’: बौद्ध सामाजिक कल्पना से साम्य

संत रैदास की सर्वाधिक चर्चित अवधारणा बेगमपुरा’ है—एक ऐसा नगर जहाँ: कोई दुख नहीं, कोई कर नहीं, कोई भय नहीं, कोई जाति नहीं तथा कोई ऊँच-नीच नहीं।

यह कल्पना कई स्तरों पर बौद्ध चिंतन से मेल खाती है:

4.1 बुद्ध का संघ (Sangha)

बुद्ध का संघ जन्म-आधारित भेदभाव से मुक्त था और समानता पर आधारित था।

4.2 अशोक का धम्म

अशोक का धम्म नैतिक शासन, करुणा और सामाजिक कल्याण पर केंद्रित था।

4.3 आंबेडकर का नवयान

डॉ. आंबेडकर द्वारा प्रतिपादित नवयान बौद्ध धर्म भी इसी धरती पर न्यायपूर्ण समाज की परिकल्पना करता है।

इस प्रकार, बेगमपुरा एक आध्यात्मिक स्वर्ग नहीं, बल्कि एक सामाजिक–नैतिक आदर्श राज्य है, जो बौद्ध परंपरा की केंद्रीय विशेषता है।

. ब्राह्मणवाद की आलोचना: बौद्ध परंपरा की निरंतरता

संत रैदास की आलोचना प्रत्यक्ष रूप से ब्राह्मणवाद के विरुद्ध है:

वे शुद्धता–अशुद्धता की अवधारणा को अस्वीकार करते हैं, पुरोहिती (ब्राह्मणवादी) वर्चस्व को चुनौती देते हैं तथा धर्म को नैतिकता और समानता से जोड़ते हैं।

यह वही दृष्टि है जिसे डॉ. आंबेडकर ने बौद्ध धम्म की सामाजिक क्रांति कहा है।

6. अंतर और सीमाएँ

यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि:

संत रैदास ईश्वर-भक्ति की जिस भाषा का प्रयोग करते हैं वह बौद्ध दर्शन नास्तिक और अनीश्वरवादी है तथा संत रैदास ने कोई दार्शनिक तंत्र नहीं गढ़ा।

अतः बौद्ध प्रभाव को धार्मिक नहीं, सामाजिक–नैतिक प्रभाव के रूप में समझा जाना चाहिए।

7. आंबेडकरवादी पुनर्पाठ

डॉ. भीमराव आंबेडकर ने भले ही संत रैदास पर प्रत्यक्ष लेखन न किया हो, किंतु उनके विचार-ढाँचे में रैदास को बौद्ध–श्रमण परंपरा की निरंतर कड़ी, ब्राह्मणवादी सामाजिक व्यवस्था के आलोचक तथा दलित मुक्ति चेतना के ऐतिहासिक अग्रदूत के रूप में देखा जा सकता है।

निष्कर्ष (Conclusion)

यह लेख इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि संत रैदास बौद्ध नहीं थे, किंतु उनकी सामाजिक दृष्टि बौद्ध नैतिकता और सामाजिक दर्शन से गहराई से प्रभावित थी।
उनकी जाति-विरोधी चेतना, मानव समानता पर बल और बेगमपुरा की समाज-कल्पना बौद्ध धम्म की ऐतिहासिक विरासत का विस्तार प्रतीत होती है।

इस प्रकार, संत रैदास को भारतीय इतिहास में भक्ति और बौद्ध सामाजिक चेतना के सेतु के रूप में समझा जाना चाहिए।

भारत में लोकतांत्रिक अवनति: एक आंबेडकरवादी संवैधानिक विश्लेषण

  भारत में लोकतांत्रिक अवनति: एक आंबेडकरवादी संवैधानिक विश्लेषण -        -  एस आर दारापुरी, राष्ट्रीय अध्यक्ष, आल इंडिया पीपुल्स फ्रन्ट ...