गुरुवार, 8 दिसंबर 2011

डॉ. आंबेडकर की राजनैतिक पार्टी और सत्ता की अवधारणा

डॉ. आंबेडकर की राजनैतिक पार्टी और सत्ता की अवधारणा
एस. आर. दारापुरी, राष्ट्रीय प्रवक्ता, आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट
डॉ. आंबेडकर ने 1952 में शैड्युल्ड  कास्ट्स फेडरेशन के संविधान में राजनैतिक  पार्टी की भूमिका की व्याख्या करते हुए कहा था, "राजनैतिक पार्टी का काम केवल चुनाव जीतना ही नहीं होता है बल्कि यह लोगों को राजनैतिक तौर पर शिक्षित करने, उन्हें उद्देलित करने और संघटित करने का होता है." इसी प्रकार एक दलित नेता के गुणों को बताते हुए उन्होंने कहा था, " आपके नेता का साहस और बुद्धिमत्ता  किसी भी पार्टी के सर्वोच्च नेता से कम नहीं होनीं चाहिए. दक्ष नेताओं के आभाव में पार्टी ख़तम हो जाती है." अतः अब यह उचित होगा कि वर्तमान दलित राजनीति और दलित नेताओं का मूल्यांकन इन मानकों पर किया जाये.

अब यदि डॉ. आंबेडकर द्वारा  राजनैतिक पार्टी की बताई गयी मुख्य भूमिका के परिपेक्ष्य में बसपा को देखा जाए तो यह स्पष्ट है की इस ने इसे नकार कर केवल चुनाव जीतने को ही अपना मुख्य ध्येय बनाया है जिसका परिणाम हमारे सामने है, उसे राजनैतिक  सत्ता तो कई बार मिली है परन्तु उस के मुख्य मतदाता राजनैतिक  शिक्षा से वंचित हैं और अंध अनुयायिओं के रूप में मायावती के हर सही गलत कार्य को स्वीकार  कर रहे हैं. राजनैतिक शिक्षा और राजनैतिक जागरूकता के अभाव में राजनैतिक सत्ता का लाभ दलितों की जगह दूसरों को मिल रहा है.

डॉ. आंबेडकर का अक्सर दोहराया जाने वाला नारा' "राजनैतिक सत्ता सब समस्याओं की चाबी है" मायावती के हाथों नाकाम हो गया है. इसका मुख्य कारण उसका दलितों के सामजिक व् आर्थिक सश्क्तिकर्ण का कोई भी एजेंडा  न होना है. वास्तव में उसमें  ऐसी दृष्टि का सर्वथा अभाव है. राजनीति की भूमिका पर विचार प्रकट करते हुए डॉ. आंबेडकर ने कहा था, "किसी भी राष्ट्र के जीवन में राजनीति ही सब कुछ नहीं होती है. हमें भारतीय समस्यायों के राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक कारणों का अध्ययन करना  चाहिए और पद दलित वर्गों की समस्यायों को हल करने के लिए अपने ढंग से प्रयास करना चाहिए." परन्तु मायावती के लिए राजनैतिक सत्ता जीतना ही सब कुछ है. डॉ. आंबेडकर ने तो यह कहा था कि "सत्ता का इस्तेमाल समाज के विकास के लिए किया जाना चाहिए"  परन्तु मायावती के  सत्ता के व्यक्तिगत लाभ के लिए दुरूपयोग एवं  भ्रष्टाचार ने विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं के लाभों का हरण कर लिया है. केंद्रीय जांच ब्यूरो 30 करोड़ की अवैध संपत्ति अर्जित करने का आरोप पत्र कभी भी उसके विरुद्ध न्यायालय में दाखिल कर सकती है जो उसके लिए बहुत बड़ी मुसीबत का कारण बन सकता है.

प्रशासन की भूमिका की व्याख्या करते हुए डॉ. आंबेडकर ने कहा था, "लोगों के कल्याण के लिए स्वच्छ प्रशासन ज़रूरी है. लोगों को रोटी और कपड़ा देने में कठिनाई हो सकती है परन्तु जनता को स्वच्छ प्रशासन देने में कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए." परन्तु मायावती स्वच्छ प्रशासन देने में बिलकुल नाकाम रही है. उसके व्यक्तिगत भ्रष्टाचार की छूत सरकार के सभी विभागों तक फ़ैल गयी है. उसने इस कहावत को "सत्ता भ्रष्ट कर देती है और निरंकुश सत्ता निरंकुश रूप से भ्रष्ट कर देती है " को पूरी तरह से सही सिद्ध कर दिया है. उसने उत्तर प्रदेश के लिए "चिंता जनक रूप से भ्रष्ट राज्य" की ख्याति अर्जित कर दी है.

डॉ. अम्बेडकर ने एक वार कहा था ,"मेरे  विरोधी मेरे विरुद्ध सभी प्रकार के आरोप लगाते रहे हैं परन्तु कोई भी मेरे  चरित्र और सत्यनिष्ठा पर ऊँगली उठाने का साहस नहीं कर सका." क्या मायावती अपने लिए इस प्रकार का दावा कार सकती है? स्वतंत्र मजदूर पार्टी की मीटिंग में डॉ. आंबेडकर  ने कहा था "मजदूरों के दो दुश्मन हैं- एक पूंजीवाद और दूसरा ब्राह्मणवाद. उन्हें इन से कभी भी समझौता नहीं करना चाहिए." परन्तु मायावती ने इन दोनों को पूरी तरह से स्वीकार कर लिया है. ब्राह्मणवाद को सर्वजन के रूप में और पूंजीवाद को कारपोरेटीकरण  के रूप में.

डॉ. आंबेडकर ने संघर्ष और ज़मीनी स्तर के सामजिक और राजनैतिक  आंदोलनों को बहुत महत्व दिया था. वास्तव में यह आन्दोलन ही उनकी राजनीति का आधार थे. परन्तु मायावती की बसपा इन आंदोलनों से बिलकुल परहेज़ करती है. यह सर्वमान्य है की ज़मीनी स्तर के आंदोलनों और जन दबाव के अभाव में राजनैतिक सत्ता का दुरूपयोग होने की सम्भावना रहती है, जैसा कि मायावती के मामले में हुआ भी है. संदेहस्पद तरीके से पैसा कमाने के साथ साथ वह जनता के धन का दुरूपयोग स्मारक बनाने और अपने को अमर बनाने के इरादे  से  अपनी मूर्तियाँ भी लगा रही है.

व्यक्ति पूजा के खतरों  से सावधान करते हुए डॉ. आंबेडकर ने कहा था, "अगर आप लोगों ने शुरू में ही इसको नहीं रोका तो व्यक्ति पूजा आप लोगों को बर्बाद कर देगी. किसी व्यक्ति को देवता बना कर आप अपनी सुरक्षा और मुक्ति के लिए एक व्यक्ति में आस्था रखने लगते हैं. परिणाम स्वरुप आप अपने कर्तव्य के प्रति उदासीन होने की आदत डाल लेते हैं. अगर आप ऐसे विचारों का शिकार हो जायेंगे तो आप जीवन की राष्ट्रीय धारा में लकड़ी के लट्ठे से भी बुरे हो जायेंगे. आपका संघर्ष ख़तम हो जायेगा." परन्तु मायावती के अंध भक्त डॉ. आंबेडकर की इस चेतावनी को पूरी तरह से नज़रंदाज़ कर रहे हैं.

अब प्रशन उठता है कि इस परिस्थिति में क्या किया जाये? अगर मायावती राजनैतिक  सत्ता का इस्तेमाल सामाजिक  प्रगति की चाबी के रूप में न करके अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए ही कर रही है तो दलितों को क्या करना चाहिए. इस सम्बन्ध में हमें डॉ. आंबेडकर का उपरोक्त कथन " राजनैतिक पार्टी का काम केवल चुनाव जीतना ही नहीं होता है बल्कि इसका का असली काम जनता को शिक्षित, आंदोलित और संगठित करने का होता है" पर पुनर्विचार करना होगा. एक निश्चित दलित अजेंडा बनाया जाना चाहिए और इस पर अमल करने के लिए सभी राजनीतिक पार्टियों पर दबाव डाला जाना चाहिए. इसके लिए दलित मुद्दों को लेकर जनसंघर्ष और ज़मीनी स्तर के आन्दोलन शुरू किये जाने चाहिए. भूमि सुधार एवं रोज़गार दलित एजेंडा  का प्रस्थान  बिन्दु होना चाहिए. इस के लिए दलितों को रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इंडिया की तरह 1964-65 में चलाये गए भूमि अधिकार  आन्दोलन जैसी कार्यवाही करनी चाहिए. समग्र दृष्टि और दलित मुक्ति  एजेंडा  के बिना राजनैतिक  सत्ता की प्राप्ति न तो दलितों और न ही राज्य की समस्यायों को हल कर सकती है. संरचनातमक परिवर्तन एवं योजनाओं को लागू करने की प्रक्रिया में सुधार के बिना दलितों के बीच व्याप्त ग़रीबी को दूर नहीं किया जा सकता है.
यह सर्वविदित है ज़मीनी स्तर के आंदोलनों द्वारा  ही राजनेताओं एवं प्रशासन तंत्र पर सही कार्य करने का दबाव बनाया जा सकता है. यह उचित समय है कि दलितों और उत्तर प्रदेश के पिछड़ेपन के लिए मायावती की भूमिका का मूल्यांकन आलोचनात्मक एवं भावावेश रहित ढंग से किया जाना चाहिए और तुरंत सुधारात्मक कदम उठाये जाने चाहिए. दरअसल अब दलितों को जातिवादी राजनीति और स्वार्थी नेताओं के चंगुल से निकल कर डॉ. आंबेडकर की रेडिकल और जनांदोलन की राजनीति को अपनाने की ज़रुरत है. इस के लिए  डॉ. आंबेडकर और उनके राजनैतिक आदर्शों का मूल्यांकन और अनुसरण किया जाना चाहिए अन्यथा यह एक खोया हुआ अवसर ही सिद्ध होगा.



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