शनिवार, 26 मई 2018

डॉं आंबेडकर एवं कार्ल मार्क्स - वर्ण बनाम वर्ग


-संजीव खुदशाह
आज हम कार्ल मार्क्स की 200 वी जयंती के उपलक्ष में वर्ग बनाम वर्ण पर बात करने जा रहे हैं। मेरी आप सब से गुज़ारिश है कि मेरी बातों को बिना किसी पूर्वाग्रह के गौर करने का कष्ट करें तभी शायद मैं अपनी बात आप तक सही ढंग से पहुंचाने में सफल हो सकूंगा। दूसरी बिनती मैं यह करना चाहता हूं की यहां पर अपनी बात रखने का मकसद यह नहीं है कि किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचे। मैं एक स्वस्थ चर्चा करने पर विश्वास रखता हूं।
वर्ग बनाम वर्ण की चर्चा इससे पहले भी होती रही है। लेकिन जब हम कार्ल मार्क्स के बरअक्स इस चर्चा को आगे बढ़ाते हैंतो यहां पर वर्ग के मायने कुछ अलग हो जाते हैं। भारत में वर्ग के मायने होते हैं अमीर वर्ग और गरीब वर्ग। लेकिन कार्ल मार्क्स जिस वर्ग की बात कर रहे हैं। उसमें मालिक वर्ग और मजदूर वर्ग है। इसलिए हमें बहुत ही सावधानी पूर्वक इस अंतर को समझते हुए बात करनी होगी।इसी प्रकार वर्ण की भी विभीन्‍न परिभाषाएं सामने आती है। कई बार वर्ण को रंगों के विभाजन के तौर पर देखा जाता है। तो कई बार वर्णों को जाति व्यवस्था की एक महत्वपूर्ण इकाई के तौर पर भी देखा जाता है। हम यहां पर चर्चा के दौरान इसे इसी परिभाषा के तौर पर आगे बातचीत करेंगे।
मार्क्स ने जिस मालिक और मजदूर की बात की और उनके संघर्ष को महत्वपूर्ण बताया तथा पूंजीवाद को इन वर्ग के सिद्धांतों के आधार पर परिभाषित किया। वह अपने स्थान पर महत्वपूर्ण है लेकिन इन सिद्धांतों को उसी वर्ग के आधार पर भारत के परिप्रेक्ष में लागू करना कहीं ना कहीं जल्दबाजी करने जैसा रहा है। क्योंकि भारत में वर्ग का अस्त्वि कभी भी मालिक और नौकर की तरह नहीं रहा है। भारत में पूंजीपति वर्ग और मजदूर वर्ग कहा गया या फिर अमीर वर्ग गरीब वर्ग कहां गया। लेकिन जैसा रिश्ता यूरोप में मालिक और मजदूर के बीच रहा है वैसा रिश्ता भारत में अमीर और गरीब के बीच कभी भी नहीं रहा है।भारत में इन वर्गों के बीच जातीय संरचना भी है जो मालिक और नौकर के सिद्धांत पर नहीं चलती।
मुझे लगता है यह भारत के परिपेक्ष में मार्क्सवादी सिद्धांतों को मालिक और नौकर के नजरिए से नहीं बल्कि जाति व्यवस्था की जटिलताओं उनके बीच भेदभाव उनके बीच अछूतपन और धार्मिक संहीता को ध्यान में रखते हुए देखना होगा।
भारत में एक छोटी जाति का व्यक्ति अमीर तो हो सकता है। उसके कल कारखाने भी हो सकते है। इसके पहले भी हुए हैं। गंगू तेली का उदाहरण सामने पड़ा है। शिवाजी का उदाहरण है लेकिन इन्हें धार्मिक स्वीकृति या कहें सामाजिक राजनीतिक स्वीकृति प्रदान नहीं होती है। इस कारण राजा होने के बावजूद शिवाजी को राज तिलक करवाने के लिए पापड़ बेलने पड़ते हैं। और किसी ब्राम्हण के पैर के अंगुठे से अपने माथे पर राज तिलक करवाने के लिए मजबूर होना पड़ता है। यह उदाहरण बेहद महत्वपूर्ण है जब हम वर्ग बनाम वर्ण की बात करते हैं।
गंगू तेली और शिवाजी के उदाहरण से यह बात स्पष्ट तौर पर सामने आती है कि भारत के परिप्रेक्ष में साम्यवाद या समाजवादजिसकी बात कार्ल मार्क्स कहते हैं। वह और उसका आधार आर्थिक नहीं है उससे कहीं आगे है। भारत के परिपेक्ष में आर्थिक समानता कभी भी राजनीतिक और सामाजिक समानता का रूप नहीं ले पाती है। और ना ले पाई है। इसके तमाम उदाहरण इतिहास में मौजूद है। शायद मार्क्सवाद के सिद्धांत को भारत में लागू करने से पहले इन ऐतिहासिक तथ्यों को नजरअंदाज कर दिया गया।
इस कारण भारत के परिपेक्ष में कम्युनिस्ट विचारधारा फेल हो गई या फिर सिर्फ पूंजी की लड़ाई तक सीमित रह गई या फिर उन जगह ही रह पाई जहां पर फैक्ट्री और मजदूर रहे हैं। यह लड़ाई कभी भी किसानों तक नहीं पहुंच पाई ना ही उन दलित पिछड़ा वर्ग आदिवासियों तक पहुंच पाई जिन्हें समानता साम्यवाद या समाजवाद की जरूरत थी। उन प्राइवेट दुकानों संस्थानों तक नहीं पहुंच पाई जहां पर पढ़ा-लिखा कलम चलाने वाला मजदूर शोषण का शिकार रोज होता है।
जहां एक ओर यूरोप में पूंजीवाद के गर्भ से श्रमिक वर्ग का जन्म हुआ वहीं भारत में श्रमिक वर्ग मां के गर्भ से पैदा होता है।
भारत में युरोप का वर्ग नहीं है और जब वर्ग ही नहीं तो वर्ग संघर्ष का सवाल ही पैदा नहीं होता। बल्कि भारत में वर्ग की जगह वर्ण संघर्ष हो रहा है। जिसे मार्क्स ने भी भूल स्वीकार करते हुए कहा कि भारत में वर्ण संघर्ष ही संभव है और उसके बाद ही वर्ग संघर्ष हो सकता है। इसे इमीएस नम्बूदरीपाद ने भी स्वीकार कियाजिनके नेतृत्व में केरल में पहली बार कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार बनी थी। बी. टी. रणदीवे ने भी स्वीकार कियाक्योंकि भारत में सत्ता और संपत्ति पर सवर्ण वर्ग का ही कब्जा है।
दरअसल हमें मार्क्स के साम्यवाद को नए सिरे से भारत के परिप्रेक्ष में परिभाषित करना पड़ेगा। यहां पर आर्थिक समानता से कहीं ज्यादा जरूरी सामाजिक और राजनीतिक समानता की बात है। कार्ल मार्क्स ने जिन स्थानों पर काम किया वहां पर आर्थिक विषमता तो थी लेकिन सामाजिक तथा राजनीतिक विषमताएं नहीं रही। इसीलिए उन्होंने यह सिद्धांत दिया की पूंजी का समान वितरण होने पर साम्यवाद स्थापित हो सकेगा।
डॉ आंबेडकर अपनी किताब बुद्ध अथवा कार्ल मार्क्स में कार्ल मार्क्स की अवधारणा को 10 बिंदुओं में रेखांकित करते हैं। जिन पर कार्ल मार्क्स के सिद्धांत खड़े हुए हैं।
1 दर्शन का उद्देश्य विश्व का पुनः निर्माण करना है ब्रह्मांड की उत्पत्ति की व्याख्या करना नहीं है।
2 जो शक्तियां इतिहास की दिशा को निश्चित करती है वह मुख्यतः आर्थिक होती हैं।
3 समाज दो वर्गों में विभक्त है मालिक तथा मजदूर ।
4 इन दोनों वर्गों के बीच हमेशा संघर्ष चलता रहता है ।
5 मजदूरों का मालिकों द्वारा शोषण किया जाता है। मालिक उस अतिरिक्त मूल्य का दुरुपयोग करते हैं जो उन्हें अपनी मजदूरों के परिश्रम के परिणाम स्वरुप मिलता है।
6 उत्पादन के साधनों का राष्ट्रीयकरण अर्थात व्यक्तिगत संपत्ति का उन्मूलन करके शोषण को समाप्त किया जा सकता है।
7 इस शोषण के फलस्वरुप श्रमिक और अधिकाधिक निर्बल व दरिद्र बनाए जा रहे हैं।
8 श्रमिकों की इस बढ़ती हुई दरिद्रता व निर्बलता के कारण श्रमिकों की क्रांतिकारी भावना उत्पन्न हो रही है और परस्पर विरोध वर्ग संघर्ष के रूप में बदल रहा है।
9 चूंकि श्रमिकों की संख्या स्वामियों की संख्या से अधिक है। अतः श्रमिकों द्वारा राज्य को हथियाना और अपना शासन स्थापित करना स्वाभाविक है। इसे उसने सर्वहारा वर्ग की तानाशाही के नाम से घोषित किया है।
10 इन तत्वों का प्रतिरोध नहीं किया जा सकता इसलिए समाजवाद अपरिहार्य है.।
पृष्ठ क्रमांक 346 वॉल्यूम 7
यहां पर आप देख सकते हैं की कंडिका 9 मे इस बात का जिक्र किया गया है कि श्रमिकों द्वारा उनकी संख्या ज्यादा होने के कारण बलपूर्वक अपना शासन स्थापित करना स्वाभाविक है। जिसे उन्होंने सर्वहारा वर्ग की तानाशाही नाम घोषित किया है। यानी कार्ल मार्क्स श्रमिकों के द्वारा तानाशाही शासन की अनुमति देते हैं।
जबकि डॉ आंबेडकर कहते हैं बलपूर्वक प्राप्त किया गया शासन वह भी तानाशाही वाला शासन ज्यादा दिन तक नहीं टिक सकता। भविष्य में भी संघर्ष की संभावनाएं बनी रहती है। वह कहते हैं "मार्क्सवादी सिद्धांत को 19वी शताब्दी के मध्य में जिस समय प्रस्तुत किया गया था उसी समय से उसकी काफी आलोचना होती रही है इस आलोचना के फलस्वरुप कार्ल मार्क्स द्वारा प्रस्तुत विचारधारा का काफी बड़ा ढांचा ध्वस्त हो चुका है इसमें कोई संदेह नहीं कि मांस का यह दावा कि उसका समाजवाद अपरिहार्य है पूर्णतया असत्य सिद्ध हो चुका है सर्वहारा वर्ग की तानाशाही सर्वप्रथम 19 सौ 17 में उसकी पुस्तक दास कैपिटल समाजवाद का सिद्धांत के प्रकाशित होने के लगभग 70 वर्ष के बाद सिर्फ एक देश में स्थापित हुई थी यहां तक कि साम्यवाद जो कि सर्वहारा वर्ग की तानाशाही का दूसरा नाम है और उसमें आया तो यह किसी प्रकार की मानवीय प्रयास के बिना किसी अपरिहार्य वस्तु के रूप में नहीं आया था वहां एक क्रांति हुई थी और इसके रूस में आने से पहले भारी रक्तपात हुआ था तथा अत्यधिक हिंसा के साथ वहां सोद्देश्य योजना करनी पड़ी थी शेष विश्व में अभी भी सर्वहारा वर्ग की तानाशाही के आने की प्रतीक्षा की जा रही है मार्क्सवाद का कहना है कि समाजवाद अपरिहार्य है उसके इस सिद्धांत के झूठे पर जाने के अलावा सूचियों में वर्णित अन्य अनेक विचार भी तर्क तथा अनुभव दोनों के द्वारा ध्‍वस्‍त  हो गए हैं अब कोई भी व्यक्ति इतिहास की आर्थिक व्याख्या को यह इतिहास की केवल एक मात्र परिभाषा स्वीकार नहीं करता इस बात को कोई स्वीकार नहीं करता कि सर्वहारा वर्ग को उत्तरोत्तर कंगाल बनाया गया है और यही बात उसके अन्य तर्क के संबंध में भी सही है" पृष्ठ क्रमांक 347 वॉल्यूम 7
 भारत के परिप्रेक्ष्य में वर्ग की लड़ाई
जब आप वर्ग की लड़ाई लड़ते हैं तो आप सिर्फ आर्थिक समानता की बात करते हैं दरअसल भारत में जो वर्गीय अंतर है वह सिर्फ आर्थिक नहीं है। यह समझना होगा। यहां पर जातीय असमानता है। राजनीतिक असमानताएं गहरे पैठ बनाए हुए हैं। और इन जटिलताओं को सुलझाने के लिए समानता लाने के लिए आर्थिक गैरबराबरी को खत्म करना काफी नहीं है। जातीय एवं राजनीतिक असमानता को खत्म करने के लिए तमाम क्षेत्रों में प्रतिनिधित्व देना जरूरी है । यह प्रतिनिधित्व राजनीतिधार्मिकसमाजिक पदवी मेंप्रशासन मेंन्यायालय में देना होगा। डॉ अंबेडकर ने इसी प्रतिनिधित्व को रिजर्वेशन का नाम दिया। रिजर्वेशन कभी भी गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम के तौर पर नहीं तैयार किया गया। दरअसल यह भारत में फैली असामान्यताओं को खत्म करने के लिए बेहद जरूरी कार्यक्रम है। इसीलिए डॉक्टर अंबेडकर ने आजादी के पहले गोलमेज सम्मेलन में प्रतिनिधित्व के अधिकार की मांग की थी।
यह बात सही है कि डॉ आंबेडकर और मार्क्स दोनों समाज में समानता चाहते थे। लेकिन दोनों के समानता के उद्देश्य में बुनियादी फर्क है।
एक वर्ण व्यवस्था में समानता की बात करते हैं तो दूसरे वर्ग व्यवस्था में समानता की बात करते हैं।
एक वर्ग व्यवस्था में समानता के लिए संघर्ष की बात करते हैं। चाहे इसके लिए सर्वहारा तानाशाही ही क्यों ना करनी पड़े।
दूसरे वर्ण व्यवस्था में समानता लाने के लिए लोकतांत्रिक उपाय किए जाने की बात करते हैं जिसमें खूनी संघर्ष और तानाशाही के लिए कोई जगह नहीं है। वे जाति व्‍यवस्‍था का उन्‍मूलन में सबको साथ लेकर चलने की बात करते है। डॉं अंबेडकर कहते है एक ऊंच नीच वाली प्रणाली को खत्‍म करने के लिए नई ऊंच नीच वाली प्रणाली का निर्माण नही किया जाना चाहिए।
जब आप वर्ण यानी जाति व्यवस्था की लड़ाई लड़ते हैं तो आप सामाजिक आर्थिक राजनैतिक तीनों प्रकार की समानता की बात करते हैं।
यह बात शायद भारतीय मार्क्सवादियों ने नजरअंदाज कर दिया होगा। क्योंकि बीमारी डायग्नोसिस करना किसी भी बीमारी के इलाज का पहला चरण होता है। डायग्नोज करने के बाद ही उसी हिसाब से उसका इलाज किया जा सकता है। जहां पर वर्ग की समस्या नहीं है वहां पर आप वर्ग के हिसाब से उसका इलाज करेंगे तो रिजल्ट्स नहीं आने वाले। जहां पर वर्ण की समस्या हैवर्ण संघर्ष की समस्या है वहां पर वर्ण के हिसाब से ही उसका इलाज करना होगा। तब कहीं जाकर उसके परिणाम सामने आ सकेंगे। यही जो बुनियादी फर्क है। वर्ग और वर्ण में। उसे समझना होगा। तब कहीं जाकर हम मार्क्सवाद और अंबेडकरवाद के समानता के सिद्धांत को अमलीजामा पहना पाएंगे।

शनिवार, 21 अप्रैल 2018

कितने दलित मित्र हैं योगी आदित्य नाथ?- एस.आर.दारापुरी


कितने दलित मित्र हैं योगी आदित्य नाथ?
-एस.आर.दारापुरी, आई.पी.एस.(से.नि.) एवं संयोजक जन मंच उत्तर प्रदेश



हाल में 14 अप्रैल को आंबेडकर जयंती के अवसर पर आंबेडकर महासभा, लखनऊ के अध्यक्ष लालजी प्रसाद निर्मल द्वारा उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री योगी आदित्य नाथ को महासभा के आयोजन में “दलित मित्र” का सम्मान दिया गया है जिसका दलित समाज द्वारा व्यापक विरोध तथा निंदा की जा रही है. यह ज्ञातव्य है कि आंबेडकर महासभा दलितों की एक विख्यात संस्था है जिसकी स्थापना 1991 में आंबेडकर शताब्दी समारोह के अंतर्गत की गयी थी. महासभा का मुख्य उद्देश्य बाबासाहेब की विचारधारा का प्रचार प्रसार करना तथा दलितों के हित को सुरक्षित करने तथा उसे बढ़ाने का है. वरिष्ठ आई.ए.एस., पी.सी.एस., आई.पी.एस.तथा अन्य सेवाओं के सेवारत तथा सेवा निवृत अधिकारी, बुद्धिजीवी तथा समाजसेवी महासभा के सदस्य रहे हैं और आज भी हैं. दलित वर्ग के इलावा अन्य वर्गों के लोग भी इसके सदस्य हैं. महासभा दलितों, पिछड़ों, तथा अल्पसंख्यकों के हितों को सुरक्षित रखने तथा उनको कानूनी सहायता पहुँचाने में प्रयासरत रही है. इस प्रकार महासभा उत्तर भारत में दलितों, पिछड़ों की एक प्रमुख संस्था के रूप में जानी जाती है. महासभा में राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, मायावती को छोड़ कर सभी मुख्य मंत्री/मंत्री आते रहे हैं. भंते प्रज्ञानंद तथा डॉ. छेदीलाल साथी इसके अध्यक्ष रहे हैं.
यह ज्ञातव्य है कि उत्तर प्रदेश  में दलितों की आबादी लगभग 4 करोड़14 लाख है जो कि उत्तर प्रदेश की कुल आबादी का 21% है तथा यह आबादी देश के किसी भी राज्य की दलित आबादी से अधिक है.  इसमें चार बार दलित मुख्य मन्त्री रही हैं. परन्तु एक बहुत चिंता की बात यह है कि उत्तर प्रदेश में दलितों पर सबसे अधिक अत्याचार होते हैं जिसका एक कारण तो दलितों की सबसे बड़ी आबादी है और दूसरे उत्तर प्रदेश की सामंती/ जातिवादी व्यवस्था है जो आज़ादी के 70 साल बाद भी बरकरार है. हाल में राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो द्वारा क्राईम इन इंडिया-2016 रिपोर्ट जारी की गयी है जिसके अनुसार उत्तर प्रदेश में 2016 में दलितों पर अत्याचारों की संख्या 10,426 थी जो कि देश में दलितों पर कुल घटित अपराध का 26 % है जबकि उत्तर प्रदेश में दलितों की आबादी 21% ही है. इससे स्पष्ट है कि उत्तर प्रदेश में दलितों पर अत्याचार की स्थिति बहुत गंभीर है. यही स्थिति 2015 और 2014 में भी थी और वह 2017 में भी है जैसाकि समाचार पत्रों में प्रतिदिन छपने वाली घटनाओं से स्पष्ट है.
मार्च 2017 से उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार बनी है तथा योगी आदित्य नाथ इसके मुख्य मंत्री हैं. सहारनपुर के शब्बीरपुर गाँव में 5 मई, 2017 को कुछ सवर्णों (राजपूतों) द्वारा दलितों पर किया गया हमला अति गंभीर घटना थी जिसमें दलितों के लगभग 60 घर जलाये गये थे तथा  21 लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे. यह भी बताया गया है कि जिस दिन लखनऊ में योगी द्वारा शपथ ग्रहण की गयी थी उसी दिन शब्बीरपुर में राजपूतों द्वारा जुलूस निकाला गया था जिसमे “यूपी में रहना है तो योगी योगी कहना होगा” जैसे नारे लगाये गये थे जिसका मूल मकसद दलितों को यह जिताना था कि अब यूपी में हमारी सरकार आ गयी है और आपको सवर्णों  से डर कर रहना होगा. इसके बाद 5 मई को शब्बीरपुर में महराणा प्रताप जयंती के अवसर पर बिना किसी अनुमति के नंगी तलवारें तथा भाले लेकर दलित बस्ती के सामने डीजे बजा कर जुलुस निकाला गया जिसमें अन्य नारों के साथ साथ डॉ. आंबेडकर मुर्दाबाद के नारे भी लगाये गये. इस पर जब दलितों ने एतराज़ किया तो उन पर बड़ी संख्या में हमला किया गया, उनके घर जलाए गये तथा भारी संख्या में दलितों को चोटें पहुंचाई गयीं. यह उल्लेखनीय है कि दलितों पर यह हमला पुलिस की मौजूदगी में किया गया था परन्तु उसने कोई कार्रवाही  नहीं की. दलितों ने इस प्रकार के हमले की सम्भावना के बारे में पुलिस एवं प्रशासन को पहले ही अवगत कराया था परन्तु रोकथाम की कोई कार्रवाही नहीं की गयी. इससे पहले कुछ सवर्णों द्वारा प्रशासन से मिल कर दलितों को रविदास मंदिर के प्रांगण में आंबेडकर की मूर्ती लगाने नहीं दी गयी थी.  
शब्बीरपुर में दलितों द्वारा  5 मई को सवर्णों के हमले के दौरान जो भी पथराव किया गया वह केवल आत्मरक्षा की कार्रवाही  थी जिसका उन्हें कानूनी अधिकार प्राप्त था. परन्तु इसके बावजूद पुलिस द्वारा दलितों को ही हमले का दोषी मान कर 7 दलितों की गिरफ्तारी की गयी तथा उनमें से दो पर रासुका भी लगा दिया गया. सवर्णों की तरफ से केवल 7 लोगों को गिरफ्तार किया गया तथा दो पर रासुका लगाया गया. इस प्रकार पुलिस ने हमला करने वाले सामंती सवर्ण तथा हमले का शिकार हुए दलितों पर एक जैसी कार्रवाही करके दोहरा अन्याय किया. यह उल्लेखनीय है कि शब्बीरपुर के सभी दलित अभी तक जेल में हैं. इसी प्रकार जब पुलिस ने हमले के शिकार हुए दलितों के सम्बन्ध में उचित कार्रवाही  नहीं की तो भीम आर्मी के लोगों ने 9 मई को विरोध प्रदर्शन करना चाहा तो पुलिस ने बल प्रयोग करके अराजकता पैदा की जिसके  फलस्वरूप शहर में कुछ पथराव तथा पुलिस से टकराव हुआ. पुलिस ने इस सम्बन्ध में भीम आर्मी के लोगों पर उसके संस्थापक चंद्रशेखर सहित 19 मुक़दमे दर्ज कर लिए. उसके बाद भीम आर्मी के सदस्यों का दमन तथा गिरफ्तारियां शुरू की गईं. चंद्रशेखर सहित भीम आर्मी के 40 लोग गिरफ्तार किये गये जिनमें से कुछ लोग कई कई महीने जेल में रह कर रिहा हुए हैं. चंद्रशेखर को हाई कोर्ट से जमानत मिल जाने के बावजूद भी उस पर रासुका लगा दिया गया तथा वह लगभग एक साल से जेल में है जिसकी रिहाई के लिए बराबर धरना व् प्रदर्शन चल रहे हैं. इस घटना से ही स्पष्ट है कि योगी सरकार कितनी  दलित मित्र है.  
इसी प्रकार जब 2 अप्रैल को एससी/एसटी एक्ट को लेकर दलितों द्वारा देशव्यापी भारत बंद किया गया तो पुलिस द्वारा मेरठ में जानबूझ कर शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर लाठी चार्ज करके अव्यवस्था पैदा की गयी जिसमें पुलिस द्वारा फायरिंग से एक नौजवान मारा गया. पुलिस ने 9000 प्रदर्शनकारियों पर केस दर्ज किये तथा अब तक 500 से अधिक गिरफ्तारियां  की जा चुकी हैं. इतना ही नहीं एक विधायक को खुले आम बेइज्ज़त करके गिरफ्तार किया गया. दलित नवयुवकों को गिरफ्तार करके कंकड़खेड़ा थाने में बेरहमी से पीटा गया. दूसरी जगह पर भी दलित नवयुवकों को बुरी तरह से पीटा गया तथा उनके हाथों में कट्टे दिखा कर गिरफ्तार किया गया. मेरठ में अभी भी अधिकतर नौजवान घरों से भगे हुए हैं. इसी प्रकार जब मुज़फ्फर नगर में कुछ असमाजिक तथा अपराधी तत्वों ने दलितों के जुलूस में घुस कर तोड़फोड़ की तो पुलिस ने उन तत्वों  को न पकड़ कर दलितों पर ही गोली चलाई जिससे एक लड़का मारा गया. इस पर पुलिस ने 7000 दलितों पर केस दर्ज किये हैं. अब तक 250 गिरफ्तारियां की जा चुकी हैं  तथा आगे भी जारी हैं. इसी प्रकार जब 2 अप्रैल को सहारनपुर में भीम आर्मी के सदस्यों ने जुलूस निकाल कर चंद्रशेखर की रिहाई के लिए प्र्त्यावेदन दिया तो 900 लड़कों पर केस दर्ज कर लिया गया. इसके इलावा उसी दिन हापुड़ तथा बुलंदशहर में भी दलितों पर बड़ी संख्या में केस दर्ज किये गये हैं तथा गिरफ्तारियां  की जा रही हैं. इसी प्रकार 2 अप्रैल को इलाहाबाद में भी 27 छात्र नेताओं पर भी गंभीर धारायों में केस दर्ज किया गया है. इन सभी स्थलों पर पुलिस चुन चुन कर दबिश दे रही है और दलित घर छोड़ कर भगे हुए हैं. ऐसा प्रतीत होता कि है योगी सरकार दलित दमन पर पूरी तरह से उतर आई है.
दलित दमन की उपरोक्त घटनाओं के इलावा पूरे उत्तर प्रदेश में दलितों पर अत्याचार हो रहे हैं. इनमें उन्नाव में बलात्कार के बाद दलित लड़की का जलाया जाना, बाँदा में दलित औरत का बलात्कार तथा बलिया में एक दलित औरत को पीट पीट कर मारने जैसी घटनाएँ प्रमुख हैं. पूरे प्रदेश में दलित हिन्दुत्ववादियों तथा सामंती सवर्णों  के निशाने पर हैं परन्तु सरकार की तरफ से उन्हें कोई संरक्षण अथवा राहत नहीं मिल रही है.  इसके साथ ही दलितों को फर्जी मुठभेड़ों में मारा जा रहा है तथा पैरों एवं टांगों में गोलियां मार कर जख्मी करके जेलों में सड़ाया जा रहा है. ऐसी हालत में क्या कोई सोच सकता है कि योगी आदित्य नाथ दलितों के मित्र हैं?
इसी माह की 3 तारीख को जब दैनिक हिंदुस्तान में आंबेडकर महासभा के अध्यक्ष लालजी प्रसाद निर्मल की तरफ से यह खबर छपी कि 14 अप्रैल को आंबेडकर महासभा की तरफ से योगी आदित्य नाथ को “दलित मित्र” का सम्मान दिया जायेगा तो हम सब लोग हतप्रभ रह गए. इस पर आंबेडकर महासभा के संस्थापक सदस्य हरीश चन्द्र, आई.ए.एस.(से.नि.) ने विरोध जिताते हुए तुरंत ब्यान दिया कि आंबेडकर महासभा में किसी को भी इस प्रकार का सम्मान देने का प्रावधान नहीं है और न ही महासभा की कार्यकारिणी में इस प्रकार का कोई निर्णय ही लिया गया है. यह सम्मान पूर्णतया अवैधानिक है तथा इसे देने का निर्णय लालजी प्रसाद निर्मल का व्यक्तिगत निर्णय है, महासभा का नहीं है. अतः यह सम्मान नहीं दिया जाना चाहिए. उनका यह ब्यान 4 अप्रैल के टाइम्स आफ इंडिया में प्रकाशित भी हुआ था. इसके बाद हम लोगों ने 5 अप्रैल को महासभा के आजीवन सदस्यों  की बैठक बुलाई, इस सम्मान की वैधता तथा औचित्य पर विचार विमर्श किया तथा वर्तमान में दलित दमन तथा महासभा के सदस्यों द्वारा विरोध के परिपेक्ष्य में ऐसा सम्मान न देने का अनुरोध किया. इस पर उसने कहा कि वह इस पर पुनर्विचार करेगा परन्तु फिर उसने इस सम्बन्ध में कोई बातचीत नहीं की. इस बीच में हम लोगों ने 13 अप्रैल को मुख्यमंत्री जी को भी एक पत्र भेजा जिसमे कार्यकारिणी के सदस्यों की तरफ से यह अंकित किया गया था कि महासभा ने किसी को भी इस प्रकार का सम्मान देने का निर्णय नहीं लिया है. यह सम्मान पूर्णतया अवैधानिक है तथा लालजी प्रसाद का व्यक्तिगत निर्णय है. हम लोगों ने उक्त पत्र में मुख्य मंत्री जी से इस सम्मान को न लेने का अनुरोध भी किया था. इस सम्बन्ध में हम लोगों ने प्रेस के माद्यम से तथा मौखिक तौर पर प्रशासन को स्पष्ट कर दिया था कि यदि महासभा में उक्त सम्मान देने का प्रयास किया जाता है तो हम लोग हर संभव तरीके से इसका विरोध करेंगे. 
इसी बीच लालजी प्रसाद निर्मल ने हरीश चन्द्र तथा मेरे विरुद्ध जिला प्रशासन को लिखित शिकायत भेजी कि हम लोग 14 अप्रैल को महासभा में मुख्य मंत्री को उक्त सम्मान देने का विरोध करने वाले हैं, अतः हमारे विरुद्ध उचित कानूनी कार्रवाही की जाये. इस पर प्रशासन ने हम लोगों से पूछा तो हम लोगों ने साफ़ कह दिया कि हमें मुख्य मंत्री जी के महासभा में आने पर कोई आपत्ति नहीं है परन्तु हम लोग सम्मान देने का हर संभव तरीके से विरोध करेंगे. इस पर 14 अप्रैल को जब हम लोग महासभा में आंबेडकर जयंती में भाग लेने के लिये पहुंचे तो पुलिस ने हमें अन्दर नहीं जाने दिया तथा हरीश चन्द्र, गजोधर प्रसाद, एन.एस.चौरसिया तथा मुझे गिरफ्तार कर लिया और तीन घंटे हिरासत में रखा. इस बीच लालजी प्रसाद निर्मल ने महासभा में मुख्य मन्त्री जी को “दलित मित्र” का सम्मान दे डाला. इतना ही नहीं पुलिस ने महासभा के अन्य कई सदस्यों को भी महासभा में प्रवेश नहीं करने दिया. इस प्रकार लालजी प्रसाद निर्मल ने महासभा के सभी सदस्यों तथा दलित समाज के विरोध को दरकिनार करके निहित स्वार्थ के लिए योगी आदित्य नाथ को “दलित मित्र” का सम्मान दिया है जो न केवल दलित समाज बल्कि डॉ. आंबेडकर का भी अपमान है.
अब यह पूरी तरह से स्पष्ट हो गया है कि महासभा के स्वयम्भू अध्यक्ष लालजी प्रसाद निर्मल योगी आदित्य नाथ को दलित सम्मान देने के लिए इतने लालायित क्यों थे. सम्मान देने के चार दिन बाद 18 अप्रैल को ही मुख्य मंत्री द्वारा लालजी प्रसाद निर्मल को उत्तर प्रदेश अनुसूचित जाति वित्त-विकास निगम के अध्यक्ष के रूप में  राज्य मंत्री का दर्जा दे दिया गया है. उसने यह पद पूरे दलित समाज के साथ गद्दारी करके तथा महासभा को बेच कर प्राप्त किया है जिसका उत्तर उन्हें दलित समाज को देना होगा. इसके साथ ही हम लोग जो महासभा की कार्यकारिणी के आजीवन सदस्य हैं, ने यह निर्णय लिया है कि हम महासभा की आम सभा बुलाकर लालजी प्रसाद निर्मल द्वारा पूरे समाज के साथ की गयी गद्दारी के लिए उसे महासभा के अध्यक्ष के पद से हटाने की कार्यवाही करेंगें. यह भी उल्लेखनीय है कि लालजी प्रसाद निर्मल ने महासभा के अध्यक्ष  का पद महासभा की फर्जी आम सभा दिखा कर तथा फर्जी अभिलेख तैयार करके प्राप्त किया है जिसके लिए उसके विरुद्ध कानूनी कार्रवाही भी की जायेगी.  

     

गुरुवार, 19 अप्रैल 2018



भाजपा का उत्तर प्रदेश की 17 अति-पिछड़ी जातियों को अनुसूचित-जातियों की सूची में शामिल कराने का प्रयास असंवैधानिक - दारापुरी  
 “भाजपा का उत्तर प्रदेश की 17 अति-पिछड़ी जातियों को अनुसूचित-जातियों की सूची में शामिल कराने का प्रयास असंवैधानिक” - यह बात एस आर दारापुरी, पूर्व पुलिस महानिरीक्षक एवं संयोजक, जन मंच उत्तर प्रदेश ने प्रेस को जारी ब्यान में कही है. उन्होंने कहा है कि आज एक समाचार पत्र के माध्यम से ज्ञात हुआ है कि  उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार ने उत्तर प्रदेश की 17 अति पिछड़ी जातियां जिनमें निषाद, बिन्द, मल्लाह, केवट, कश्यप, भर, धीवर, बाथम, मछुआरा, प्रजापति, राजभर, कहार, कुम्हार, धीमर, मांझी, तुरहा तथा गौड़ आदि शामिल हैं, को अनुसूचित जातियों की सूची में शामिल करने के लिए प्रस्ताव तैयार कर केन्द्रीय सरकार को भेजने का निर्णय लिया है. यह उल्लेखनीय है कि भाजपा सरकार का यह कदम इन जातियों को कोई वास्तविक लाभ न पहुंचा कर केवल झांसा देकर आगामी चुनाव में उनका वोट बटोरने की चाल है. उन्होंने आगे कहा है कि इन जातियों को वास्तविक आरक्षण तभी मिल सकता है जब इन्हें ओबीसी के 27% आरक्षण कोटे में से इनकी आबादी के अनुपात में अलग कोटा मिले.
श्री दारापुरी ने आगे कहा है कि इससे पहले वर्ष 2016 में सपा सरकार ने भी 2017 के चुनाव के ठीक पहले इसी प्रकार का प्रस्ताव केन्द्रीय सरकार को भेजा था जो भाजपा की केन्द्रीय सरकार द्वारा अस्वीकार कर दिया गया था.  इस सम्बन्ध में यह भी स्मरण रहे कि इस से पहले वर्ष 2005 में मुलायम सिंह की सरकार ने भी 16 अति पिछड़ी जातियों को अनुसूचित-जातियों की सूची तथा 3 अनुसूचित जातियों को अनुसूचित-जनजाति की सूची में शामिल करने का शासनादेश जारी किया था जिसे आंबेडकर महासभा तथा अन्य दलित संगठनों द्वारा न्यायालय में चुनौती देकर रद्द करवा दिया गया था। इसके बाद वर्ष 2007 में सत्ता में आने पर मायावाती ने भी 2011 में इसी प्रकार से 16 अति पिछड़ी जातियों को अनुसूचित जातियों की सूचि में शामिल करने की संस्तुति केन्द्रीय सरकार को भेजी थी. इस पर केन्द्रीय कांग्रेस सरकार ने जब इस के औचित्य के बारे में सूचनाएं मांगी तो वह इस का कोई संतोषजनक उत्तर नहीं दे सकी थी और केन्द्रीय सरकार ने उस प्रस्ताव को वापस भेज दिया था.
उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि सपा और बसपा तथा अब भाजपा इन अति पिछड़ी जातियों को अनुसूचित जातियों की सूची में शामिल करा कर उन्हें अधिक आरक्षण दिलवाने का झांसा देकर केवल उनका वोट बटोरने की राजनीति करती रही हैं क्योंकि वे अच्छी तरह जानती हैं कि न तो उन्हें स्वयं इन जातियों को अनुसूचित जातियों की सूचि में शामिल करने का अधिकार है और न ही यह जातियां अनुसूचित जातियों के माप दंड (छुआछूत) को पूरा ही करती हैं। वर्तमान संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार किसी भी जाति को अनुसूचित जातियों की सूची में शामिल करने अथवा निकालने का अधिकार केवल पार्लियामेंट को ही है। राज्य सरकार औचित्य सहित केवल अपनी संस्तुति केन्द्रीय सरकार को भेज सकती है जो रजिस्ट्रार जनरल आफ इंडिया तथा रष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग से परामर्श के बाद पार्लियामेंट के माध्यम से ही किसी जाति को सूचि में शामिल अथवा निकाल सकती है। संविधान की धारा 341 में राष्ट्रपति ही राज्यपाल से परामर्श करके संसद द्वारा कानून पास करवा कर इस सूची में किसी जाति का प्रवेश अथवा निष्कासन कर सकता है। इस में राज्य सरकार को कोई भी शक्ति प्राप्त नहीं है।
वास्तव में अब तक सभी राजनीतिक पार्टियाँ अपनी संस्तुति केन्द्रीय सरकार को भेज कर सारा मामला केंद्र सरकार की झोली में डालकर यह प्रचार करती रही हैं कि हम तो आप को अनुसूचित जातियों की सूचि में डलवाना चाहते हैं परन्तु केंद्र सरकार उसे नहीं कर रही है। अब पता चला है कि इस बार भाजपा की केन्द्रीय सरकार भी इस प्रस्ताव को स्वीकार करने के लिए तैयार है. परन्तु भाजपा के लिए लोकसभा में भारी बहुमत के बावजूद इसे राज्य सभा में पारित कराना आसान नहीं होगा.
यह ज्ञातव्य है कि यह अति पिछड़ी जातियों को केवल गुमराह करके वोट बटोरने का राजनीतिक यडयंत्र है जिसे अब यह जातियां बहुत अच्छी तरह से समझ गयी हैं। यह उल्लेखनीय है कि यदि भाजपा सरकार इन अति पिछड़ी जातियों को आरक्षण का वांछित लाभ देना चाहती है जोकि वार्तमान में पिछड़ों में समृद्ध जातियों (यादव, कुर्मी तथा जाट आदि ) के कारण नहीं मिल पा रहा है तो उसे इन जातियों की सूची को तीन हिस्सों में बाँट कर उनके लिए 27% के आरक्षण को उनकी आबादी के अनुपात में बाँट देना चाहिए। देश के अन्य कई राज्य बिहार, तमिलनाडु तथा कर्नाटक आदि में यह व्यवस्था पहले से ही लागू है। मंडल आयोग की रिपोर्ट में भी इस प्रकार की संस्तुति की गयी है।
उत्तर प्रदेश में इस सम्बन्ध में 1976 में डॉ छेदी लाल साथी की अध्यक्षता में “सर्वाधिक पिछड़ा वर्ग आयोग” बना था जिस ने अपनी रिपोर्ट 1977 में उत्तर प्रदेश सरकार को सौंप दी थी परन्तु उस पर आज तक कोई भी कार्रवाही नहीं की गयी। साथी आयोग ने पिछड़े वर्ग की जातियों को तीन श्रेणियों में बाँटने तथा उन्हें 29.5 % आरक्षण देने की संस्तुति की थी: "अ" श्रेणी में उन जातियों को रखा गया था जो पूर्णरूपेण भूमिहीन, गैर-दस्तकार, अकुशल श्रमिक, घरेलू सेवक हैं और हर प्रकार से ऊँची जातियों पर निर्भर हैं। इनको 17% आरक्षण देने की संस्तुति की गयी थी। "ब" श्रेणी में पिछड़े वर्ग की वह जातियां थीं, जो कृषक या दस्तकार हैं। इनको 10% आरक्षण देने की संस्तुति की गयी थी।. "स" श्रेणी में पिछड़े वर्ग की मुस्लिम जातियां थीं जिनको 2.5 % आरक्षण देने की संस्तुति की गयी थी। वर्तमान में उत्तर प्रदेश में पिछड़ी जातियों के लिए 27% आरक्षण उपलब्ध है। अतः इसे डॉ. छेदी लाल साथी आयोग की संस्तुतियों के अनुरूप पिछड़ी जातियों को तीन हिस्सों में उनकी आबादी के अनुपात में बाँटना अधिक न्यायोचित होगा। इस से अति पिछड़ी जातियों को अपने हिस्से के अंतर्गत आरक्षण मिलना संभव हो सकेगा। इन अति पिछड़ी जातियों को यह भी समझना होगा कि भाजपा सरकार इन उन्हें इस सूची से हटा कर समृद्ध जातियों यादव, कुर्मी और जाट के लिए आरक्षण बढ़ाना चाहती है और उन्हें अनुसूचित जातियों से लड़ाना चाहती है। अतः उन्हें भाजपा की इस चाल को समझाना चाहिए और उसके झांसे में न आ कर डॉ छेदी लाल साथी आयोग की संस्तुतियों के अनुसार अपना आरक्षण अलग कराने की मांग उठानी चाहिए। हाल में सुहेलदेव समाज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर ने भी यही मांग रखी थी परन्तु इसे दूसरी तरफ घुमा दिया गया है. इसी प्रकार कुछ जातियां कोल, कोरवा तथा धांगर जो वर्तमान में अनुसूचित जातियों की सूचि में हैं, उन्हें अनुसूचित जनजातियों की सूचि में होना चाहिए को इसकी  की मांग करनी चाहिए.  जन मंच इन जातियों की मांग का बराबर समर्थन करता रहा है. अतः इन अति पिछड़ी जातियों को उपरोक्तानुसार अपनी मांग उठानी चाहिए वरना वे भाजपा द्वारा अनुसूचित जातियों की सूची में शामिल कराने के झांसे में आ कर पूर्व की भांति ठगे जायेंगे.
एस.आर.दारापुरी,
पूर्व पुलिस महानिरीक्षक एवं संयोजक जन मंच उत्तर प्रदेश
मोब: 9415164845


मंगलवार, 23 जनवरी 2018

भाजपा शासित राज्यों में दलित उत्पीड़न अधिक

भाजपा शासित राज्यों में दलित उत्पीड़न अधिक
-एस.आर.दारापुरी, आई.पी.एस. (से.नि.) एवं संयोजक, जनमंच उत्तर प्रदेश
राष्ट्रीय अपराध अनुसन्धान ब्यूरो (एनसीआरबी) द्वारा हाल में जारी की गयी क्राईम इन इंडिया2016 रिपोर्ट से एक बात पुनः उभर कर आई है कि भाजपा शासित राज्य दलित उत्पीड़न के मामले में देश के अन्य राज्यों से काफी आगे हैं. लगभग यही स्थिति वर्ष 2015 में भी थी. वर्तमान में भाजपा शासित राज्य गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, हरियाणा, छत्तीसगढ़, गोवा तथा झारखण्ड हैं जिनमे दलित उत्पीड़न के अपराध दूसरे राज्यों की अपेक्षा काफी अधिक हैं. यह स्थिति मोदी जी की दलितों के बारे में दिखाई गयी सहानुभूति तथा उनके दलित प्रेम की पोल खोलती है. इनके इलावा कुछ अन्य राज्य जैसे उड़ीसा, आन्ध्र प्रदेश, तेलन्गाना, उत्तर प्रदेश और बिहार हैं जिन में दलित उत्पीड़न के मामले राष्ट्रीय दर (प्रति एक लाख दलित आबादी पर) से ज्यादा हैं.
दलितों पर 2016 में कुल घटित अपराध:  इस वर्ष यह संख्या 40,801 है जो कि वर्ष 2015 की संख्या 38,670 से 2,131 अधिक है. इस प्रकार 2016 में पिछले वर्ष की अपेक्षा 5.5% की वृद्धि हुयी है. इस वर्ष प्रति एक लाख दलित आबादी पर घटित अपराध की राष्ट्रीय दर 20.3 रही है. इन अपराधों में दलित महिलाओं के शील भंग के कुल मामले 3,172 थे जो कि दलितों पर कुल घटित अपराध का 7.7% थे. इसी प्रकार बलात्कार के कुल मामले 2,541 थे जो कि कुल अपराध का 6.2% थे. इसी प्रकार उक्त अवधि में जनजाति वर्ग के विरुद्ध 6,568 अपराध घटित हुए जो कि 2015 की अपेक्षा में 4.7 % अधिक थे.
जनजाति वर्ग की महिलाओं पर बलात्कार के 974 मामले घटित हुए जो कि उन पर घटित कुल अपराध का 14.8% हैं. उन पर शील भंग के 835 मामले हुए जो कुल अपराध का 12.7% थे. इससे स्पष्ट है कि भाजपा राज में दलित महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं.
दलितों पर वर्ष 2016 में घटित अपराध की दृष्टि से भाजपा शासित राज्यों की स्थिति देखी जाये तो मध्य प्रदेश प्रथम स्थान पर है जिसमे 4,922 अपराध घटित हुए तथा अपराध की दर 43.4 रही जो कि राष्ट्रीय दर 20.3 से दुगनी है. इसी प्रकार राजस्थान दलित अपराध में देश में दूसरे नंबर पर है जहाँ 5,134 अपराध तथा उसकी दर 42.0 रही जो कि राष्ट्रीय दर (20.3) से दुगनी है. इसमें गोवा तीसरे स्थान पर है जहाँ अपराध दर 36.7 है. इसमें गुजरात 5वें स्थान पर है जहाँ अपराध दर 32.2 है जो कि राष्ट्रीय दर 20.3 से लगभग डेढ़ गुना है. इससे स्पष्ट है कि अधिकतर भाजपा शासित राज्यों में दलितों पर अपराध राष्ट्रीय औसत से काफी अधिक हैं.
अपराध वार राज्यों की स्थिति निम्न प्रकार है:-
1 हत्या : उक्त अवधि में देश में दलितों की हत्या के 786 अपराध हुए तथा प्रति लाख दर 0.4 रही. इसमें गुजरात के 32 मामलों में 35 दलितों की हत्याएं हुयीं और 0.8 की दर के कारण पूरे देश में प्रथम स्थान रहा. इसके बाद मध्य प्रदेश 81, हरियाणा 34 तथा उत्तर प्रदेश 271 मामलों में 274 हत्याएं एवं 0.7 की दर के साथ दूसरे स्थान पर रहे, राजस्थान 66 मामलों में 67 हत्याएं तथा 0.5 की दर के साथ पांचवें स्थान पर रहा. इससे स्पष्ट है कि हत्या के मामले में भाजपा शासित राज्यों की स्थिति बहुत बुरी है.
2. हत्या का प्रयास: उक्त अवधि में पूरे देश में 732 अपराध घटित हुए तथा अपराध की प्रति लाख दर 0.4 रही. इस अपराध में राजस्थान 106 और गुजरात 35 तथा अपराध की दर 0.9 जो कि राष्ट्रीय दर की दुगनी से भी अधिक है, के साथ प्रथम स्थान पर रहे. महाराष्ट्र में 60 मामले जिसमे 71 व्यक्ति प्रभावित हुए तथा दर 0.5 रही. यह भी राष्ट्रीय दर से अधिक है. इससे स्पष्ट है अधिकतर भाजपा शासित राज्यों में दलित सुरक्षित नहीं हैं.  
3. गंभीर चोट: इस अपराध के अंतर्गत पूरे देश में 1,070 मामले हुए जिनमें 1,148 व्यक्ति घायल हुए तथा राष्ट्रीय औसत दर 0.5 रही. इस अपराध की दर गुजरात में 1.6, बिहार में 1.5, उड़ीसा में 1.3, केरल में 1.0, मध्य प्रदेश में 0.8 रही जो कि राष्ट्रीय दर से काफी अधिक है.
4.  दलित महिलाओं के शील भंग के प्रयास का अपराध: उपरोक्त अवधि में पूरे देश में दलित महिलाओं के शील भंग के प्रयास के 3,172 अपराध तथा राष्ट्रीय अपराध दर 1.6 रही. इस अपराध की दर मध्य प्रदेश में 6.0, आन्ध्र प्रदेश में 3.6, महारष्ट्र में 2.7,  हरियाणा में 2.0 तथा गुजरात में 1.8 रही जो कि राष्ट्रीय औसत दर 1.6 से काफी अधिक है.
5. शील भंग: इस अपराध के अंतर्गत 2016 में कुल 1,268 अपराध हुए तथा राष्ट्रीय दर 0.6 रही. इस अपराध की दर मध्य प्रदेश में 3.6, छत्तीसगढ़ में 1.1, महाराष्ट्र में 1.3, राजस्थान में 0.8, हरियाणा में 0.7 तथा  गुजरात में 0.6 रही जो कि राष्ट्रीय दर 0.6 से काफी अधिक है.
6. बलात्कार : इस अपराध के अंतर्गत पूरे देश में 2,536 मामले हुए जिनमें 2,540 दलित महिलाएं बलात्कार का शिकार हुयीं तथा अपराध की राष्ट्रीय दर 1.3 रही. इस अपराध की दर केरल में 4.7, मध्य प्रदेश में 3.9, छत्तीसगढ़ में 2.9, राजस्थान में 2.7, हरियाणा में 1.9, गुजरात तथा महाराष्ट्र में 1.7 रही जो कि राष्ट्रीय दर 1.3 से बहुत अधिक है. इससे स्पष्ट है कि अधिकतर भाजपा शासित राज्यों में दलित महिलाएं असुरक्षित हैं. वास्तव में दलित महिलायों पर बलात्कार को दलितों का मनोबल  गिराने के लिए हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है.
7. अनुसूचित जाति/जन जाति अत्याचार निवारण एक्ट के अंतर्गत अपराध: इस श्रेणी के अंतर्गत पूरे देश में 35,676 अपराध घटित हुए जिनमें 36,855 व्यक्ति पीड़ित हुए तथा अपराध की राष्ट्रीय दर 18.0 प्रति एक लाख व्यक्ति रही. इस अपराध की दर मध्य प्रदेश में 43.4, राजस्थान में 41.1, बिहार में 32.9, गुजरात में 28.4, ओड़िसा में 25.0, केरल में 23.7, उत्तर प्रदेश में 22.6 रही जो कि राष्ट्रीय दर 18.0 से बहुत अधिक है.
  
उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि अधिकतर भाजपा शासित राज्य दलित उत्पीड़न में दूसरे राज्यों से काफी आगे हैं. यह आंकड़े मोदी जी द्वारा दलित उत्पीड़न को ले कर दिखाई गयी हमदर्दी तथा उनके “सब का साथ, सब का विकास” के नारे की भी पोल खोलती है. हाल में कोरगांव में दलितों पर हुआ हमला भी भाजपा की करनी और कथनी के अंतर को बेपर्दा करता है.   

 




बुधवार, 27 दिसंबर 2017

आतंकवाद विरोधी कानून से भी कठोर है यूपीकोका

आतंकवाद विरोधी कानून से भी कठोर है यूपीकोका
-एस.आर. दारापुरी, पूर्व पुलिस महानिरीक्षक एवं संयोजक, जन मंच उत्तर प्रदेश
हाल में उत्तर प्रदेश की योगी सरकार द्वारा यूपीकोका अर्थात उत्तर प्रदेश संगठित अपराध नियंत्रण विधेयक- 2017 लाया गया है जो कि आतंकवाद विरोधी कानून (विधि विरुद्ध क्रिया-कलाप निवारण अधिनियम-1967) से भी कठोर है. इसमें पुलिस को इस प्रकार की शक्तियां दी गयी हैं जो कि आज तक किसी भी कानून में नहीं दी गयी हैं. योगी सरकार ने इसे बड़ी चालाकी से विधान सभा के पटल पर रखा और अगले दिन ही इसे ध्वनी मत से पारित भी करा दिया. अधिकतर विधायकों तथा विरोधी पक्ष के सदस्यों तक को इसे उपलब्ध नहीं कराया गया. इस कारण अधिकतर विधायक इसके लोकतंत्र तथा मानवाधिकार विरोधी प्राविधानों के बारे में जान तक नहीं सके और वे उस पर कोई चर्चा तथा आपत्ति भी नहीं उठा पाए. इसके अभाव में विपक्ष केवल इसके विपक्षीगण तथा दलितों एवं मुसलामानों के विरुद्ध दुरूपयोग की बात करता रहा और इसके कठोर प्रावधानों और पुलिस को बहुत शक्तियां दिए जाने की बात नहीं उठा सका. यही स्थिति प्रेस की भी रही. वह केवल सरकार के संगठित अपराध पर नियंत्रण पाने के दावे तथा विपक्ष द्वारा अपने विरुद्ध दुरूपयोग के आरोप की ही बात करता रहा. किसी ने भी इस कानून के कठोर प्रावधानों तथा पुलिस को दी जा रही असीमित शक्तियों पर कोई चर्चा नहीं की तथा आपत्ति नहीं उठाई.
फिलहाल यह बिल विधान सभा से पास हो कर विधान परिषद् को भेजा गया है जिसे सलेक्ट कमेटी को संदर्भित कर दिया गया है. यदि यह किसी तरह वहां से भी पास हो जाता है तो फिर यह राष्ट्रपति को स्वीकृति  के लिए भेजा जायेगा जहाँ पर इसे स्वीकृति मिल जाने की पूरी सम्भावना है. यह ज्ञातव्य है कि जो मायावती इस समय इसका विरोध कर रही है उसी मायावती ने अपने शासनकाल में 2008 में इसे विधान सभा और विधान परिषद् से पास कराकर कर राष्ट्रपति के पास भेजा था परन्तु वहां पर इसे स्वीकृति नहीं मिल पायी थी. वर्तमान में विपक्ष द्वारा इस बिल का सही और जोरदार ढंग से विरोध नहीं किया गया जिस कारण यह विधान सभा में बड़ी आसानी से पास हो गया. विपक्ष केवल इसके विपक्षीगण, दलितों और मुसलामानों के विरुद्ध दुरूपयोग की बात करता रहा परन्तु बिल के अति कठोर प्राविधानों और पुलिस को दी जा रही असीमित शक्तियों की बात नहीं उठा सका जिस कारण भाजपा के लिए उनका प्रतिकार करना बहुत आसान रहा.
वास्तव में इस कानून के कठोर प्राविधान जिनका दुरूपयोग होने की पूरी सम्भावना है हमारी चिंता का मुख्य विषय होना चाहिए. इस कानून के अंतर्गत सबसे कड़ा प्रावधान यह है कि इसकी धरा 28(2) में सीआरपीसी की धारा 167 जिसमें न्यायालय को गिरफ्तार व्यक्ति को अपराध की प्रकृति के अनुसार 15 दिन, 60 दिन तथा 90 दिन तक जेल (न्यायिक हिरासत) में रखने के अधिकार को बढ़ा कर 60, 180 तथा 365 दिन कर दिया गया है. इसका अर्थ यह है कि यदि कोई व्यक्ति इस कानून के अंतर्गत गिरफ्तार किया जाता है तो उसे एक वर्ष तक अदालत में मुकदमा शुरू होने से पहले जेल में रहना पड़ सकता है जब कि सामान्य कानून के अंतर्गत यह अवधि अधिकतम 90 दिन ही थी. इसके मुकाबले में आतंकवाद विरोधी कानून  के अंतर्गत यह अवधि क्रमशः 30, 60 तथा 90 दिन ही है. इस प्रकार गिरफ्तार व्यक्ति को जेल में रखने के मामले में यूपीकोका के प्रावधान अधिक कठोर हैं. यह अवधि मकोका (महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण अधिनियम-1999 ) से भी अधिक है क्योंकि उसमे जेल कस्टडी की अधितम अवधि 90 दिन ही है. अब अगर यूपीकोका के अंतर्गत आरोपी व्यक्ति मुकदमे में छूट भी जाता है तो उसे विवेचना के दौरान 365 दिन तक जेल में रहना पड़ सकता है. यह सर्वविदित है कि पुलिस बहुत से मामलों में निर्दोष व्यक्तियों को गिरफ्तार करके जेल में डाल देती है जहाँ उन्हें इस कानून के अंतर्गत लम्बे समय तक जेल में रहना पड़ सकता है.
 इस कानून का ऐसा ही दूसरा कड़ा प्राविधान पुलिस रिमांड को लेकर है. वर्तमान में सामान्य अपराधों में पुलिस को अधिकतम रिमांड 15 दिन तक ही मिल सकता है जबकि इस कानून की धारा 28(3)(क) में इसे बढ़ा कर 60 दिन कर दिया गया है. इसके विपरीत आतंकवाद विरोधी कानून में पुलिस रिमांड की अधिकतम अवधि 15 दिन की ही है.  पुलिस रिमांड की यह अवधि मकोका की १५ दिन की अवधि के मुकाबले में काफी अधिक है. यह सर्वविदित है कि पुलिस रिमांड के दौरान पुलिस हिरासत में गिरफ्तारशुदा व्यक्तियों का उत्पीड़न (टार्चर) किया जाता है जिस कारण कई बार उस व्यक्ति की मौत तक हो जाती है. हमारे देश में पुलिस हिरासत में टार्चर की शिकायतें बहुत अधिक होती हैं तथा पुलिस कस्टडी में मौतों की संख्या भी बहुत अधिक है. वैसे भी उत्तर प्रदेश पुलिस मानवाधिकार हनन के मामलों में देश में अव्वल है जैसा कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के आंकड़ों से स्पष्ट है. इसके अनुसार 2013-14 से 2015-16 के दौरान पूरे देश में से 44% शिकायतें अकेले उत्तरप्रदेश से थीं. इसी माह 10 दिसंबर को अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस के अवसर पर उत्तर प्रदेश मानवाधिकार आयोग ने भी कहा है कि मानवाधिकार हनन की 67% शिकायतें पुलिस के विरुद्ध हैं. अब यूपीकोका के अंतर्गत पुलिस रिमांड की अवधि को 15 दिन से बढ़ा कर 60 दिन करना पुलिस को टार्चर के लिए खुली छूट देना है.
इतना ही नहीं इस कानून की धारा 33 (तीन) में जेल में निरुद्ध व्यक्ति से मुलाकात की प्रक्रिया को भी कठिन कर दिया गया है. इसके अनुसार जेल बंदी से मुलाकात जिलाधिकारी की पूर्वानुमति से ही हो सकेगी और वह भी हफ्ते में अधिकतम दो बार ही. इसी प्रकार इस कानून की धारा 28(4) के अंतर्गत आरोपी को किसी भी न्यायालय से अग्रिम जमानत नहीं मिल सकेगी. इस कानून की धारा 3 (ख) और 5 में यह प्रावधान किया गया है कि न्यायालय इस कानून के अंतर्गत किसी मामले में अदालती कार्रवाही प्रकाशित करने पर प्रतिबंध लगा सकता है जिसका उलंघन करने पर सम्बंधित व्यक्ति को 1 माह की सजा तथा 1 हज़ार रूपये का जुर्माना तक हो सकता है. इस प्रकार यह कानून प्रेस की अभिव्यक्ति की आज़ादी को भी प्रतिबंधित करता है. इसी प्रकार इस कानून में किसी व्यक्ति के एक मामले में दण्डित होने के बाद दूसरे मामले में बढ़ी हुयी सजा दिए जाने का भी प्राविधान है.
उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि यद्यपि यूपीकोका संगठित अपराध को कम करने में कुछ हद तक उपयोगी हो सकता है परन्तु इसमें विवेचना के दौरान आरोपी को सामान्य अपराध में अधिकतम 90 दिन की बजाये एक साल तक जेल में रखने तथा पुलिस रिमांड की अवधि 15 दिन से बढ़ा कर 60 दिन किया जाना मानवाधिकारों के हनन और टार्चर को बढ़ावा देना है. इसी प्रकार इस कानून के अंतर्गत पुलिस को अपनी कस्टडी में अभियुक्त को टार्चर करके इकबालिया ब्यान पर हस्ताक्षर कराकर उसका इस्तेमाल करने की भी छूट मिल जाएगी जिस से निर्दोष व्यक्तियों को दण्डित करने की सम्भावना बहुत बढ़ जाएगी.  अदालत में इस कानून के कई प्रावधान आतंकवाद विरोधी कानून तथा मकोका से भी कड़े हैं जिनके दुरूपयोग की पूरी सम्भावना है.  इसी लिए इन प्रावधानों का विरोध किया जाना तथा उन्हें हटवाया जाना ज़रूरी है.    



मंगलवार, 26 दिसंबर 2017

बुध्द विष्णु के अवतार नहीं हैं ।

dmaindia.online: बुध्द विष्णु के अवतार नही है।: बुध्द पूर्णीमा पर विशेष पिछड़ा वर्ग के अध्ययन से बुद्ध की जाति पर पुनर्विचार करना लाजमी है , क्योंकि इस जाति के आधार पर ही बुद्ध को ब्र...

भारत की पहली संविधान सभा का डॉ. आंबेडकर का समापन भाषण

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डॉं आंबेडकर एवं कार्ल मार्क्स - वर्ण बनाम वर्ग

-संजीव खुदशाह आज हम कार्ल मार्क्स की 200 वी जयंती के उपलक्ष में वर्ग बनाम वर्ण पर बात करने जा रहे हैं। मेरी आप सब से गुज़ारिश है कि...