बुधवार, 21 दिसंबर 2011

मायावती का मूर्तिकर्ण और दलित विकास का प्रशन
एस. आर. दारापुरी आई. पी. एस. ( से. नि. )

२००७ के विधान सभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में , खास करके दलित वर्ग ने मायावती की बहुजन समाज पार्टी को भारी बहुमत से इस लिए जिताया था कि वह इस बार स्थाई सरकार बना कर उ.प्र. के पिछड़ेपन के मक्कड़ जाल से निकालने के लिए विकास का एजेंडा लागू करेंगी. इस से पहले के तीन बार के मुख्य मंत्री काल के दौरान कोई भी विकास न कर सकने के पीछे मायावती का यह बहाना था कि उस समय वह सरकार चलाने के लिए दूसरी पार्टियों पर निर्भर थी और स्वतंत्र तौर पर काम करने के लिए उसे बहुमत की सरकार चाहिए. इसीलिए इस चुनाव में उ.प्र. की जनता ने उसे भारी बहुमत से जिताकर कर काम करने का मौका दिया. परन्तु इस बार भी मायावती जनता की इस अपेक्षा पर पूरी नहीं उतरीं. न तो विकास का कोई एजेंडा ही बना और न ही मायावाती दुआरा मूर्तियों और समारकों पर व्यय की जाने वाली फ़िज़ूल खर्ची में ही कोई कमी आई.

देखा जाये तो उ.प्र. आज भी विकास की दौड़ में देश के अति पिछड़े राज्यों में से एक है. आबादी की दृष्टि से २००१ की जनगणना के अनुसार उ.प्र. देश में सबसे अधिक आबादी १६.६१ करोड़ वाला प्रदेश है जो कि देश की कुल आबादी का १६.१६ % है. विकास के मानकों के अनुसार उ.प्र. में साक्षरता दर ५६.३ % ( पुरुष ६८.८ तथा महिलाएं ४२.२ % ) है जबकि राष्ट्रीय स्तर पर यह दर ६४.८४% ( पुरुष ७५.२६ तथा महिलाएं ५३.६७ % ) है. उ.प्र. में महिला और पुरुष का अनुपात ८९८ है जब कि राष्ट्रीय स्तर प़र यह अनुपात ९३३ है. उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार वर्ष २००५-०६ के दौरान उ.प्र. में प्रति व्यक्ति आय १३३६ रुपए थी जो कि बिहार ( ७८७ रूपए ) को छोड़ कर पूरे देश (२५७१६ रुपए ) की अपेक्षा सब से कम थी. इसी अवधि में प्रति व्यक्ति विद्युत् उत्पादन ११३ कि. वाट तथा उपभोग १६७ कि. वाट. था जबकि पूरे देश में यह ५६३ तथा ३७२ था. इस वर्ष उ.प्र. में विदुय्तिकृत ग्रामों का प्रतिशत ६८.३० प्रतिशत था जबकि राष्ट्रीय स्तर प् यह ७७.४% था. सार्वजानिक स्वास्थ्य की दृष्टि से उ.प्र. में जन्म दर ३०.४ %, मृत्यु दर ८.७ %तथा शिशु मृत्यु दर ७३ प्रति हज़ार थी जबकि राष्ट्रीय स्तर पर यह दर क्रमश: २३.८ %, ७.६ % तथा ५८ प्रति हज़ार थी. रोज़गार की दृष्टि से उ.प्र. में कुल जनसँख्या के केवल २३.७८ % व्यक्ति मुख्य कर्मकार थे और कुल कर्मकारों में से ६६ % व्यक्ति कृषि में लगे हुए थे. वर्ष २००५ में उ.प्र. में २५.५ % व्यक्ति गरीबी की रेखा से नीचे थे जबकि राष्ट्रीय स्तर पर यह दर केवल २१.८ % थी.

उपरोक्त संक्षिप्त विवरण से स्पष्ट है की भारत के अन्य प्रदेशों की अपेक्षा विकास की दृष्टि से उ.प्र. एक अति पिछड़ा प्रदेश है. ऐसी परिस्थिति में मायावती ही नहीं बल्कि किसी भी सरकार से यह अपेक्षा की जाती है कि वह विकास का एजेंडा बनाकर प्रदेश के सभी संसाधनों का इस्तेमाल उ.प्र. को पिछड़ेपन से बाहर निकलने के लिए करे, परन्तु पिछले कई वर्षों से ऐसा नहीं हुआ है.
१९९३-९४ और वर्ष१९९९ -२००१ के दौरान प्रतिव्यक्ति खर्च में कमी आई. इस समय भी उ.प्र. में प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय प्रति व्यक्ति आय रुपए ४६, ५०० का लगभग आधी है. कम आय का असर लोगों के जीवन स्तर पर पड़ता है. इस दशक में बसपा ने भाजपा से मिल कर दो बार सरकार बनाई परन्तु दशम पंचम वर्षीय योजना के मसोदे के अनुसार दलितों के जीवन स्तर में कोई सुधार नहीं हुआ. बसपा सरकार ने न तो दलितों और न ही प्रदेश के विकास का कोई एजेंडा बनाया. इसी प्रकार वर्ष २००३ और २००७ में भी सत्तासीन होने पर भी विकास का कोई एजेंडा नहीं बनाया बल्कि मायावती मूर्तियों और समार्कों के प्रतीकों की राजनीति ही करती रहीं

यह सर्वविदित है कि मायावाती ने कभी विकास को अपना मुद्दा नहीं बनाया. बसपा ने चुनाव में एक वार को छोड़ क़र कभी भी घोषणा पत्र जारी नहीं किया. ऐसा जान बूज कर किया गया क्यंकि घोषणा पत्र जारी करने से बाद में उसे लागू करने की वाध्यता हो जाती है और लागू न करने पर जनता की नाराजगी झेलनी पड़ती है. इसी पारकर जब कांशी राम ने बाबा साहेब का मिशन पूरा कारने का नारा दिया तो उस मिशन को लिखित रूप में कभी परिभाषित नहीं किया. पहले सत्ता और बाद में कोई काम के वायदे से दलितों को समर्थन करने के लिए कहा गया. शुरू में दलितों को सवर्णों के खिलाफ गैर राजनीतिक मुद्दों पर भड़काकर लामबंद किया गया परन्तु बाद में उनसे ही गैर सैधांतिक और अवसरवादी समझौते कर लिए गए. अम्बेडकरवाद के सभी सिधान्तों को तिलांजलि दे क़र सत्ता प्राप्त करने हेतु अवसरवाद को महिमामंडित किया गया.दलित मुद्दों को न उठकर उनका जाति और स्वर्ण विरोध के नाम पर भावनात्मक शोषण किया गया और सत्ता प्राप्त कर व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा पूरी की गई. इस मुद्दाविहीन, विकासविहीन , भ्रष्ट और अवसरवादी राजनीति का परिणाम यह हुआ कि आज न केवल दलित बल्कि पूरा प्रदेश गरीबी, बेरोज़गारी, पिछड़ापन एवं विकासहीनता के गड़े में गिरा हुआ है.

अब यह विचारणीय है कि इस दौरान सरकार के बजट का खर्च किन मदों पर किया गया. जो पैसा कल्याणकारी योजनाओं पर खर्च भी हुआ वह व्यापक भ्रष्टाचार के कारण गरीबों तक नहीं पहुंचा. इसका सब से बड़ा कारण मायावती का व्यक्तिगत भ्रष्टाचार है जिस के लिए उन्हें निकट भविष्य में जेल भी जाना पड़ सकता है. उसके विरुद्ध ताज कोरिडोर का मामला हाई कोर्ट में और ३० करोड़ की अवैध संपत्ति में आरोप पत्तर दाखिल होने का मामला सुप्रीम कोर्ट में है जिस में अगले साल की प्रथम फरबरी की तारीख निश्चित है.मायावती के कई मंत्री भी भ्रष्टाचार में पकडे गए हैं और कितनों के विरुद्ध लोक्युक्त दुआरा जाँच की जा रही है. मायावती ने बजट का बड़ा हिस्सा लखनऊ और गाजिआबाद में मूर्तियाँ लगवाने, समारक बनवाने और शहर के सुन्द्रीकर्ण पर खर्च किया है . उन्होंने डॉ. आंबेडकर और कुछ अन्य दलित महापुरुषों के साथ साथ अपनी और कांशी राम की मूर्तियाँ लगवाईं हैं जो कि किसी जीवित व्यक्ति दुआरा अपनी मूर्तियाँ लगवाने की पहली मिसाल है. उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार मायावती ने अब तक मुर्तिओं, पार्कों और समार्कों पर लगभग ६००० करोड़ रुपए खर्च किये हैं. ये मूर्तियाँ और समारक इतने भव्य हैं कि शायद राजे महाराजे भी इन्हें न बनवा पाते. एक जर्मन विद्वान् के अनुसार मायावती ने अपमा रोम बनवाया है. एक अन्य विद्वान् के अनुसार यह जनता के पैसे का अपराधिक दुरूपयोग है.

वर्ष २००१ की जनगणना के अनुसार उ .प्र. में दलितों की आबादी ३.५१ करोड़ है जो कि उ.प्र. की कुल आबादी का २१.१ प्रतिशत है. सामान्यतया यह अपेक्षा की जाती है कि जिस प्रदेश में एक दलित मुख्य मंत्री चौथी बार गद्दी पर आसीन हुआ हो वहां पर दलितों का बहुत विकास हुआ होग.परन्तु ज़मीनी सच्चाई इस के बिलकुल विपरीत है. वर्तमान में दलित पूरे प्रदेश की तरह विकास की दृष्टि से अति पिछड़े हुए हैं.विकास के मापदंडों पर देखने से यह पाया जाता है कि उ.प्र. के दलित उड़ीसा, और बिहार के दलितों को छोड़ कर देश के सभी राज्यों के दलितों से पिछड़े हुए हैं. २००१ की जनगणना के अनुसार उ.प्र. में दलितों का स्त्री -पुरुष अनुपात ९०० है जबकि राष्ट्रीय स्तर प़र दलितों का यह अनुपात ९३६ है. इसी तरह उ.प्र. के दलितों का साक्षरता दर ४६.३ % है जबकि राष्ट्रीय स्तर पर यह ५४.७ % है.पुरुषों और महिलायों का शिक्षा दर क्रमश: ६०.३ तथा ३०.५ % है जबकि राष्ट्रीय स्तर पर दलितों का यह अनुपात क्रमश: ६६.६ तथा ४१.९ % है. इसी जनगणना के अनुसार उ.प्र. में ५-१६ वर्ष आयु के १.३३ कारोड़ बच्चों में से केवल ५८.३ लाख ( ५६.४ % ) बच्चे ही स्कूल जा रहे थे.

जनगणना के अनुसार उ.प्र. के कुल दलितों का मात्र ४२.५ % ही कृषि मजदूरों का है जबकि पूरे भारत में दलितों की यह दर ४५. १ % है. अन्य मजदूरों की श्रेणी में यह औसत २२.२ % है जबकि राष्ट्रीय स्तर प़र यह औसत ३०.५ % है. उ.प्र. में दलितों का लगभग ६० % हिस्सा गरीबी क़ी रेखा से नीचे है. उ.प्र. में ८७.७ प्रतिशत दलित कृषि मजदूर हैं जबकि बिजली के अभाव में यहाँ कृषि अति पिछड़ी हुई है. वर्ष १९९१-२००१ के दशक में १२ % दलित काश्तकार की श्रेणी से गिर क़र भूमिहीन की श्रेणी में आ गए हैं. ग्रामीण क्षेत्र में भूमि के स्वामित्व का बहुत महत्व है परन्तु उ.प्र. में भूमिसुधारों को सही ढंग से लागु नहीं किया गया. आज भी लाखों हेक्टेर ज़मीं भूमि विवादों में फंसी हुई है जिन्हें सरकार दुआरा समाप्त कराके भूमिहीनों में आवंटित किया जा सकता था परन्तु इस दिशा कोई भी प्रभावी कार्रवाही नहीं की गई. आज भी जो भूमि दलितों और अन्य भूमिहीनों को आवंटित की गई थी वह भी पट्टे धारकों के कब्जे में नहीं है . मायावती ने सर्वजन के सवर्णों को खुश रखने के लिए इस दिशा में कब्जेदारों को हटाने की कोई भी कार्रवाही नहीं की.

उ.प्र. में सामंती व्यवस्था के कारण जातिभेद और छुआछुत के प्रचलन के फलस्वरूप दलितों पर उच्च जातिओं दुआरा अत्याचार किये जाते हैं जो कि पूरे भारत में सबसे अधिक हैं. एक दलित मुख्य मंत्री होने के कारण इन अपराधों में कमी होने और प्रभावी कार्रवाही किये जाने कि अपेक्षा की जाती है, परन्तु ज़मीनी सच्चाई इस के बिलकुल उल्ट है. मायावती ने अपने पूर्व कार्यकाल में दलित उत्पीडन के आंकड़े कम रखने के उद्देश्य से वर्ष २००१ में दलित उत्पीडन को रोकने और उन पर प्रभावी कार्रवाही करने के उद्द्देश्य से बनाए गए अनुसूचित जाति/ जन जाति अत्याचार निवारण अधिनियम -१९८९ को लिखित आदेश दे कर निष्प्रभावी कर दिया था जिसे बाद में कड़ा विरोध होने तथा मामला कोर्ट में पहुँच जाने पर २००३ में वापस लेना पड़ा था. परन्तु अपरोक्ष रूप से यह आदेश आज भी लागू है. परिणाम स्वरूप दलित उत्पीडन की घटनाएँ तो बराबर हो रही हैं परन्तु उनकी रिपोर्ट ठाणे प़र नहीं लिखी जाती है. इस के अतिरिक्त अन्य संस्थानों जैसे प्राइमरी स्कूलों में मध्यान्ह भोजन तथा हस्पतालों में छुआछुत का व्यवहार खुले आम हो रहा है परन्तु उनमे कोई ठोस कार्रवाही नहीं की जाती. उत्पादन के साधनों के अभाव में तथा बेरोज़गारी के कारण उत्तेर प्रदेश के दलित गाँव छोडकर बाहर जा रहे हैं.

अब यदि मूर्तिकर्ण के पीछे मायावती दुआरा दलित महापुरुषों को सम्मान देने के तर्क को देखा जाये तो यह काफी हद तक उनकी विचारधारा के विपरीत है. यदि डॉ. आंबेडकर को ही लें तो उन्होंने स्वयम कहा था " मैं मूर्ती पूजक नहीं, मैं मूर्ती भंजक हूँ ' वे राजनीति में भक्ति के विरुद्ध थे. वे व्यक्ति पूजा और किसी व्यक्ति को देवता बनाने के खिलाफ थे. परन्तु आज मायावती स्वयम को दलितों की देवी कह रही हैं.

२८ मार्च, १९१६ को डॉ. आंबेडकर ने फिरोजशाह मेहता की मूर्ती लगाने की आलोचना की थी तथा गोपाल कृषण गोखले की समृति में उनके सर्वन्ट्स ऑफ़ इंडिया संस्था की शाखाएँ पूरे भारत में खोलने की प्रशंसा की थी. उन्होंने इस सम्बन्ध में बम्बई क्रोनिकल में छपे पत्र में कहा था की मेहता तो बम्बई म्युनिस्पल कार्यालय के सामने बुत्त के रूप में खड़े हो जायेंगे. उन्होंने उनकी मूर्ती लगाने पर दुःख व्यक्त करते हुए लिखा था की क्या उनका समारक ऐसा नहीं बन सकता जो आगे आने वाली पीड़ीओं के काम आ सके. उन्होंने सुझाव दिया था कि मेहता का स्मारक एक पुस्कालय के रूप में बनाया जाये. डॉ अम्बेद्कार ने अमेरिका के सबसे बड़े विश्व विद्यालय के पुस्तकालय से सबक लेते हुए चिंता व्यक्त कि थी कि हम लोगों ने समाज और व्यक्ति क़ी प्रगति में पुस्तकालयों के योगदान को नहीं समझा है. बाद में इन्हीं सिधान्तों पर चलते हुए उन्होंने दलितों के विकास में शिक्षा के महत्त्व को समझाते हुए १९४४ में पीपुल्स एजुकेशन सोसाइटी की स्थापना की. वर्ष १९४४ में सिद्धार्थ कालेज और वर्ष १९५० में मिलिंद महाविद्यालय की स्थापना की. इसके लिए उन्होंने बम्बई और अति पिछड़े इलाके मराठवाडा को चुना. उन्होंने अपने शिक्षा संस्थानों के नाम की परेरना तक्षिला, नालंदा , विक्रिम्शिला , सोमापुरा और ओदंतपुरी बौद्ध विशाव्विद्य्ल्यों से ली. काश मायावती ने डॉ. अम्बेडकर के जीवन से कोई प्रेरणा ले कर विश्व विद्यालय , महा विद्यालय और पुस्तकालयों की स्थापना की होती जिस से न केवल दलित बल्कि समाज के सभी वगों के बच्चे सदियों तक लाभान्वित होते.

लोगों का कहना है कि महापुरुषों की मूर्तियाँ लोगों के लिए प्रेरणा का श्रोत होती हैं, परन्तु यह बात केवल कुछ हद तक ही सही है क्योंकि मूर्तियों से मिलने वाली प्रेरणा की एक सीमा होती है और मूर्तियाँ लगाने की भी. महापुरुषों के जीवन से स्थाई प्रेरणा उनके जीवन के आदर्शों और उनकी विचारधारा के प्रचार प्रसार और उस पर चलने से मिलती है परन्तु अफ़सोस है की मायावती ने इस दिशा में कुछ भी नहीं किया. यदि इन महापुरुषों की मूर्तियों पर व्यय की गई धनराशी उनके नाम पर शैक्षिक संस्थानों की स्थापना पर लगाई होती तो समाज में एक नई चेतना का विकास हुआ होता और उस में एक गुणात्मक परिवर्तन आता.
उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट है की दलितों का विकास मूर्तियाँ लगाने से नहीं बलिक उनके विकास हेतु योजनाएं बनाने और उन्हें ईमानदारी से लागू कारने से होगा. महापुरुषों के नाम पर असंख्य मूर्तियाँ लगा कर जनता के धन का दुरूपयोग करने की बजाए उनके नाम पर शैक्षिक संस्थाएं, अस्पताल एवं अन्य जनउपयोगी संस्थाओं की स्थापना करना न केवल समाज के लिए लाभप्रद होगा बल्कि यह उनके प्रति एक सच्ची श्रधांजलि और सम्मान का प्रतीक भी होगा.

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