गुरुवार, 22 सितंबर 2016

देखिये यह होता है जन आन्दोलन का असर !

देखिये यह होता है जन आन्दोलन का असर !
समाचार मिल रहा है कि गुजरात में चल रहे दलित आन्दोलन के प्रभाव से गुजरात के १६ जिलों में एस सी /एस टी एक्ट के मामलों के लिए विशेष अदालतों का गठन किया जा रहा है. इससे पहले ससौदा गाँव के २०० से अधिक दलित परिवारों को दो दिन पहले भूमि का कब्ज़ा देना शुरू कर दिया गया है जब कि इसके लिए दलित २००६ से आन्दोलन तथा न्यायालय से गुहार लगा रहे थे.
परन्तु दुर्भाग्य से दलित राजनीतिक पार्टियों के नेता जनांदोलन से डरते हैं क्योंकि जनांदोलन से नये नेता पैदा होते हैं जिन से इन नेताओं को खतरा महसूस होता है. दूसरा जनांदोलन का रास्ता संघर्ष का रास्ता होता है जिस में पुलिस की लाठी, गोली झेलना तथा जेल जाना पड़ता है. परन्तु दलित नेता जाति की राजनीति का आसान रास्ता अपनाते हैं.
१९९५ में जब मैंने कांशी राम जी से यह सवाल पूछा कि आप की पार्टी किसी दलित मुद्दे को लेकर जनांदोलन क्यों नहीं करती जिसमें आन्दोलनकारी पुलिस की लाठी गोली खा कर तथा जेल जा कर मज़बूत होते हैं और उनकी उस मुद्दे के प्रति प्रतिबद्धता बढ़ती है तो उन्होंने कहा था कि दलित बहुत कमज़ोर लोग हैं और वे पुलिस का डंडा नहीं झेल पायेंगे. इस पर मैंने कहा था कि मैं पुलिस वाला हूँ और जनता हूँ कि जब तक वे जनांदोलन में पुलिस का लाठी डंडा नहीं खायेंगे कमज़ोर ही बने रहेंगे. इसी लिए इस कमजोरी का असर उक्त पार्टी पर स्पष्ट दिखाई देता है.
दरअसल जनांदोलन से परहेज़ के पीछे दलित नेताओं का एक तो अपने आप को संघर्ष के कठिन रास्ते से बचाना है दूसरे इसमें किसी नेतृत्व को न उभरने देना है. इसके इलावा उनका इरादा दलितों को कमज़ोर और डरपोक बना कर केवल अपने ऊपर आश्रित रखना होता है जैसा कि दूसरी पार्टियों के नेता भी करते आये हैं.
परन्तु गुजरात के वर्तमान दलित आन्दोलन ने दलित नेताओं की इन नीतियों और अवधारणाओं को गलत सिद्ध कर दिया है. इसने यह दिखा दिया है कि जनांदोलन की ताकत ही सरकार को दलित समस्यायों का समाधान निकालने के लिए बाध्य कर सकती है. दूसरे जन आन्दोलन से कार्यकर्त्ता मज़बूत होते हैं और नया नेतृत्व उभरता है. इसने यह भी दिखा दिया है कि दलित न तो कमज़ोर और बुजदिल हैं और न ही नेताओं पर ही निर्भर हैं. वे अपनी लड़ाई खुद भी लड़ सकते हैं.
बाबासाहेब ने तो बहुत स्पष्ट तौर पर कहा था, "सदियों से छिने हुए अधिकार जालिमों की सदिच्छा को अपील करने से नहीं मिला करते. उन्हें तो सतत संघर्ष करके छीनना पड़ता है."
बाबासाहेब के सर्वप्रिय नारे "शिक्षित करो , संघर्ष करो और संघठित करो" में तो जनांदोलन के माध्यम से ही संगठित करने का आदेश है. मेरे विचार में अब दलितों को नेताओं का मुंह ताकना छोड़ कर अपने उद्दों के लिए स्वयम जनांदोलन का रास्ता अपनाना चाहिए जैसा कि गुजरात के दलितों ने अपनाया है.
इसके साथ ही हमें लेनिन की यह बात भी याद रखनी चाहिए कि "क्रांतिकारी विचार के बिना कभी क्रांति नहीं हो सकती." इसी लिए दलितों को क्रांति करने के लिए, जिसके बिना उनका उद्धार नहीं हो सकता, क्रांतिकारी विचार ग्रहण करना चाहिए. बाबासाहेब ने हमें व्यवस्था परिवर्तन और संघर्ष का क्रांतिकारी विचार दिया है. इसके इलावा दलितों को अन्य क्रन्तिकारियों से भी क्रांतिकारी विचार ग्रहण करने चाहिए. मेरा यह भी सुझाव है कि हरेक दलित को भगत सिंह का "अछूत समस्या" पर लेख http://dalitmukti.blogspot.in/…/achoot-samasya-bhagat-singh… ज़रूर पढ़ना चाहिए.

बुधवार, 7 सितंबर 2016

दलित एवं आदिवासी तथा भूमि का प्रश्न



दलित एवं आदिवासी तथा भूमि का प्रश्न
-एस.आर. दारापुरी, भूतपूर्व पुलिस महानिरीक्षक एवं राष्ट्रीय प्रवक्ता, आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट
 भारत एक गाँव प्रधान देश है. 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में 6,40,867 गाँव हैं. इसी जनगणना के अनुसार भारत की कुल आबादी 121 करोड़ में से 83.3 करोड़ देहात क्षेत्र में और केवल 37.7 करोड़ शहरी आबादी है. इस प्रकार आबादी का लगभग 70% हिस्सा ग्रामीण क्षेत्र में और 30% हिस्सा शहरी क्षेत्र में आवासित है.  देश की आबादी के कुल 24.39 करोड़ परिवारों में से 17.92 करोड़ परिवार ग्रामीण क्षेत्र में रहते हैं जिन में से 3.31 करोड़ अनुसूचित जाति (दलित) तथा 1.96 करोड़ अनुसूचित जनजाति (आदिवासी) ग्रामीण क्षेत्र में हैं. भारत में दलितों की जनसँख्या 20.14 करोड़ है जो देश की कुल जनसँख्या का 16.6% है. आदिवासियों की जनसँख्या 10.42 करोड़ है जो देश की कुल जनसँख्या का 8.6% है.
 सामाजिक-आर्थिक एवं जाति जनगणना -2011 के आंकड़ों के अनुसार ग्रामीण भारत में 56% परिवार भूमिहीन हैं जिन में से लगभग 73% दलित तथा 79%  आदिवासी परिवार हैं. ग्रामीण दलित परिवारों में से 45% तथा आदिवासियों में से 30% परिवार केवल हाथ की मजदूरी करते हैं. इसी प्रकार ग्रामीण दलित परिवारों में से 18.35% तथा आदिवासी परिवारों में 38% खेतिहर हैं. इस जनगणना से एक यह बात भी उभर कर आई है कि हमारी जनसँख्या का केवल 40% हिस्सा ही नियमित रोज़गार में है और शेष 60% हिस्सा अनियमित रोज़गार में है जिस कारण वे अधिक समय रोज़गारविहीन रहते हैं.
उपरोक्त आंकड़ों से दलितों तथा आदिवासियों के सम्बन्ध में कुछ महत्वपूरण बातें उभर कर आती हैं. एक तो यह है कि ग्रामीण दलित परिवारों का लगभग 73% तथा आदिवासी  परिवारों का 79% हिस्सा हाथ की मजदूरी पर निर्भर हैं. दूसरे अधिकतर दलित एवं आदिवासी परिवार वंचित हैं. तीसरे उनके पास अपना उत्पादन का कोई साधन जैसे ज़मीन आदि नहीं है तथा कोई अन्य हुनर न होने के कारण वे अधिकतर केवल हाथ की मजदूरी पर निर्भर हैं. वे अधिकतर भूमिहीन हैं तथा बहुत थोड़े परिवार खेतिहर हैं. इस प्रकार अधिकतर दलित एवं आदिवासी परिवार कृषि मजदूर हैं जिसके लिए वे उच्च जातियों के भूमिधारकों पर निर्भर हैं. इतना ही नहीं वे अपने जानवरों के लिए घास पट्ठा तथा टट्टी पेशाब के लिए भी उन्हीं पर निर्भर हैं. उनके पास ज़मीन न होने तथा खेती में मौसमी सीमित रोज़गार होने के कारण उन्हें अधिक समय तक बेरोज़गारी का सामना करना पड़ता है.
यह भी सर्वविदित है कि भारत एक कृषि प्रधान देश है और इसकी लगभग 60% आबादी कृषि से खेतिहर तथा  खेतिहर मजदूर के तौर पर जुड़ी हुयी है. उपरोक्त आंकड़ों से यह भी स्पष्ट है कि अधिकतर दलित एवं  आदिवासी भूमिहीन हैं और वे केवल हाथ की मजदूरी ही कर सकते हैं. भूमिहीनता और केवल हाथ की मजदूरी उनकी सब से बड़ी दुर्बलताएं हैं. इनके कारण न तो वे जातिभेद और छुआछूत के कारण अपने ऊपर होने वाले अत्याचारों का मजबूती से सामना कर पाते हैं और न ही मजदूरी के सवाल पर सही ताकत से लडाई. क्योंकि खेती में रोज़गार केवल मौसमी होता है अतः उन्हें शेष समय मजदूरी के लिए अन्यत्र खोजना पड़ता है या फिर बेरोजगार रहना पड़ता है. इसी कारण ग्रामीण क्षेत्र में 73% दलित तथा 79% आदिवासी परिवार वंचित एवं भूमिहीन हैं.
ग्रामीण क्षेत्र में यह भी एक यथार्थ है कि भूमि न केवल उत्पादन का साधन है बल्कि यह सम्मान और सामाजिक दर्जे का भी प्रतीक है. गाँव में जिस के पास ज़मीन है वह न केवल आर्थिक तौर पर मज़बूत है बल्कि सामाजिक तौर पर भी सम्मानित है. अब चूँकि अधिकतर दलितों के पास न तो ज़मीन है और न ही नियमित रोज़गार, अतः वें न तो सामाजिक तौर पर सम्मानित हैं और न ही आर्थिक तौर पर मज़बूत. ग्रामीण क्षेत्र में दलित तभी सशक्त हो सकते हैं जब उन के पास ज़मीन आये और उन्हें नियमित रोज़गार मिले. अतः भूमि वितरण और सुरक्षित रोज़गार की उपलब्धता दलितों और आदिवासियों तथा अन्य भूमिहीनों की प्रथम ज़रुरत है. 
भारत के स्वतंत्र होने पर देश में संसाधनों के पुनर्वितरण हेतु ज़मींदारी व्यवस्था समाप्त करके भूमि सुधार लागू किये गए थे. इस द्वारा देश में व्याप्त भूमि सीमारोपण कानून बनाये गए थे जिस से भूमिहीनों को आवंटन के लिए भूमि उपलब्ध करायी जानी थी. परन्तु इन कानूनों को लागू करने में बहुत बेईमानी की गयी क्योंकि उस समय सत्ताधारी पार्टी कांग्रेस में अधिकतर नेता पुराने ज़मीदार ही थे और प्रशासन में भी इसी वर्ग का बर्चस्व था. इसी लिए एक तो इन कानूनों से बहुत कम ज़मीन निकली और जो निकली भी उसका भूमिहीनों को वितरण नहीं किया गया. परिणामस्वरूप इन कानूनों को लागू करने से पहले जिन लोगों के पास उक्त ज़मीन थी वह उनके पास ही बनी रही. आज भी विभिन्न राज्यों में बेनामी और ट्रस्टों व मंदिरों के नाम हजारों हजारों एकड़ ज़मीन बनी हुयी है. इसी का परिणाम है कि आज देश में 18.53% लघु एवं 64.77% सीमांत जोत के किसान हैं जिन के पास कुल जोत क्षेत्र का केवल 41.52% हिस्सा है. शेष 59% क्षेत्रफल पर 17% मध्यम एवं बड़े किसानों का कब्ज़ा है.
सामाजिक-आर्थिक एवं जाति जनगणना के आंकड़ों के विश्लेषण से स्पष्ट है ग्रामीण क्षेत्र के दलितों एवं आदिवासियों के लिए भूमि का प्रश्न सब से महत्वपूर्ण प्रश्न है जिसे भूमि सुधारों को सही ढंग से लागू किये बिना हल करना संभव नहीं है. परन्तु यह बहुत बड़ी बिडम्बना है कि भूमि सुधार और भूमि वितरण किसी भी दलित अथवा गैर दलित पार्टी के एजंडे पर नहीं है. अतः दलितों एवं आदिवासियों का तब तक सशक्तिकरण संभव नहीं है जब तक उन्हें भूमि वितरण द्वारा भूमि उपलब्ध नहीं करायी जाती.यह देखा गया है कि जिन राज्यों जैसे पच्छिमी बंगाल और केरल में भूमि सुधार लागू करके दलितों को भूमि उपलब्ध करायी गयी थी वहां पर उनकी सामाजिक और आर्थिक स्थिति में बहुत सुधार हुआ है.  
यह ज्ञातव्य है कि उत्तर प्रदेश में  1995 से लेकर 2012 तक मा यावती चार बार मुख्य मंत्री रही है. उसके शासनकाल में केवल 1995 में उत्तर प्रदेश के मध्य तथा पच्छिमी क्षेत्र को छोड़ कर शेष भागों में कोई भी भूमि आवंटन नहीं किया गया. पूर्वी उत्तर प्रदेश जहाँ दलितों की सब से घनी आबादी है में तो गोरखपुर को छोड़ कर कहीं भी भूमि आवंटन नहीं हुआ. ऐसा नहीं है कि उत्तर प्रदेश में आवंटन के लिए भूमि उपलब्ध नहीं थी. 1995 में उत्तर प्रदेश में सीलिंग की अतिरिक्त भूमि, ग्राम समाज तथा भूदान की इतनी भूमि उपलब्ध थी कि उससे  न केवल दलित बल्कि अन्य जातियों के भूमिहीनों को भी गुज़ारे लायक भूमि मिल सकती थी परन्तु मायावती ने उसका आवंटन नहीं किया. इतना ही नहीं जो आवंटन किया भी गया या जो भूमि पूर्व में आवंटित थी उसके कब्ज़े दिलाने के लिए भी कोई कार्रवाही नहीं की. 1995 के बाद तो फिर सर्वजन की राजनीति के चक्कर में न तो कोई आवंटन किया गया और न ही कोई कब्ज़ा ही दिलवाया गया. 2001 की जनगणना से यह एक बात उभर कर आई थी कि 1991-2001 के दशक में उत्तर प्रदेश के 23% दलित भूमिधारक से भूमिहीन की श्रेणी में आ गये थे. यह विचारणीय है कि इस अवधि में मायावती तीन बार उत्तर प्रदेश की मुख्य मंत्री रही थी. 
उत्तर प्रदेश में जब 2002 में मुलायम सिंह यादव की सरकार आई तो उन्होंने राजस्व कानून में संशोधन करके दलितों की भूमि आवंटन की वरीयता को ही बदल दिया और उसे अन्य भूमिहीन वर्गों के साथ जोड़ दिया. उनकी सरकार में भूमि आवंटन तो हुआ परन्तु ज़मीन दलितों को न दे कर अन्य जातियों को दे दी गयी. इसके साथ ही उन्होंने कानून में संशोधन करके दलितों की ज़मीन को गैर दलितों द्वारा ख़रीदे जाने वाले प्रतिबंध को भी हटा दिया. उस समय तो यह कानूनी संशोधन टल गया था परन्तु अब उन्होंने इसे विधिवत कानून का रूप दे दिया है. इस प्रकार मायावती द्वारा दलितों को भूमि आवंटन न करने, मुलायम सिंह द्वारा कानून में दलितों की भूमि आवंटन की वरीयता को समाप्त करने के कारण उत्तर प्रदेश के दलितों को भूमि आवंटन नहीं हो सका और ग्रामीण क्षेत्र में उनकी स्थिति अति दयनीय बनी हुयी है. 
आदिवासियों के सशक्तिकरण हेतु वनाधिकार कानून- 2006 तथा नियमावली 2008 में लागू हुयी थी. इस कानून के अंतर्गत सुरक्षित जंगल क्षेत्र में रहने वाले आदिवासियों तथा गैर आदिवासियों को उनके कब्ज़े की आवासीय तथा कृषि भूमि का पट्टा दिया जाना था. इस सम्बन्ध में आदिवासियों द्वारा अपने दावे प्रस्तुत किये जाने थे. उस समय उत्तर प्रदेश में मायावती की सरकार थी परन्तु उसकी सरकार ने इस दिशा में कोई भी प्रभावी कार्रवाही नहीं की जिस का नतीजा यह हुआ कि 30.1.2012 को उत्तर प्रदेश में आदिवासियों द्वारा प्रस्तुत कुल 92,406 दावों में से 74,701 दावे अर्थात 81% दावे रद्द कर दिए गए और केवल 17,705 अर्थात केवल 19% दावे स्वीकार किये गए तथा कुल 1,39,777 एकड़ भूमि आवंटित की गयी.
 मायावती सरकार की आदिवासियों को भूमि आवंटन में लापरवाही और दलित/आदिवासी विरोधी मानसिकता को देख कर आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दाखिल की थी जिस पर उच्च न्यायालय ने अगस्त, 2013 में राज्य सरकार को वनाधिकार कानून के अंतर्गत दावों को पुनः सुन कर तेज़ी से निस्तारित करने के आदेश दिए थे परन्तु उस पर भी कोई ध्यान नहीं दिया गया. इस प्रकार मायावती तथा मुलायम सरकार की लापरवाही तथा डाली/आदिवासी विरोधी मानसिकता के कारण 80% दावे रद्द कर दिए गए. उत्तर प्रदेश सरकार ने यह भी दिखाया है की सरकारी स्तर पर कोई भी दावा लंबित नहीं है. इसी प्रकार दिनांक 30.04.2016 तक राष्ट्रीय स्तर पर कुल 44,23,464 दावों में से 38,57,379 दावों का निस्तारण किया गया जिन में केवल 17,44,274 दावे स्वीकार किये गए तथा कुल 1.03,58,376 एकड़ भूमि आवंटित की गयी जो कि प्रति दावा लगभग 5 एकड़ बैठती है. राष्ट्रीय स्तर पर अस्वीकृत दावों की औसत 53.8 % है जब कि उत्तर प्त्देश में यह 80.15% है. इससे स्पष्ट है कि उत्तर प्रदेश में वनाधिकार कानून को लागू करने में घोर लापरवाही बरती गयी है जिस के लिए मायावती तथा मुलायम सरकार बराबर के ज़िम्मेदार हैं.

अब यदि गुजरात की स्थिति देखी जाये तो यह और भी भयावह है. गुजरात में दिनांक 30.04.2016 तक वनाधिकार कानून के अंतर्गत 1,90,097 दावे प्राप्त हुए थे जिन में से केवल 77.038 दावों को ही स्वीकार किया गया तथा कुल 11,92,351 एकड़ भूमि आवंटित की गयी. इस प्रकार 65% दावे अस्वीकृत कर दिए  गए. इससे स्पष्ट है कि मोदी के गुजरात के विकास माडल में केवल 35% आदिवासियों और वनवासियों को ही भूमि आवंटित की गयी. इसी लिए तो गुजरात दलित आन्दोलन में भूमिहीन दलितों को 5 एकड़ ज़मीन के साथ साथ वनाधिकार कानून के अंतर्गत आदिवासियों और वनवासियों को भूमि आवंटन की मांग भी उठानी पड़ी है.    
दलितों को भूमि आवंटन तथा आदिवासियों के मामले में वनाधिकार कानून को लागू करने में राज्यों तथा केन्द्रीय सरकार द्वारा जो लापरवाही एवं उदासीनता दिखाई गयी है उससे स्पष्ट है सत्ताधारी पार्टियाँ तथा दलित एवं गैर दलित पार्टियाँ नहीं चाहतीं कि दलितों/आदिवासियों का सशक्तिकरण हो. वे सभी दलितों/आदिवासियों  को निर्धन एवं अशक्त रख कर उनका जाति के नाम पर वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल करना चाहती हैं. उत्तर प्रदेश इसकी सब से बड़ी उदहारण है जहाँ चार वार दलित मुख्य मंत्री रही है परन्तु न तो दलितों को भूमि आवंटित की गयी और न ही आदिवासियों को वनाधिकार कानून के अंतर्गत ज़मीन के पट्टे दिए गए जैसा कि उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट है. यह भी भारतीय राजनीति का दिवालिपन ही है कि वर्तमान में भूमि सुधार एवं भूमि आवंटन किसी भी पार्टी, चाहे वह दलित हो या गैर दलित, के एजंडे में नहीं हैं. सभी पार्टियाँ केवल जाति समीकरण व सम्प्रदाय की राजनीति करके सत्ता पाने की होड़ में लगी है. उत्तर प्रदेश में 2017 के चुनाव में भी सपा, बसपा, भाजपा और कांग्रेस केवल जाति एवं धर्म के गठजोड़ का ताना बाना बुनने में लगी हैं  परन्तु भूमि सुधार तथा भूमि आवंटन उनके एजंडे में कोई स्थान नहीं रखता है जो कि दलितों, आदिवासियों और अन्य भूमिहीन तबकों के सशक्तिकरण की बुनियादी ज़रुरत है.
अतः जब सरकारों और राजनीतिक पार्टियों का दलितों और आदिवासियों के सशक्तिकरण की बुनियादी ज़रुरत भूमि सुधार तथा भूमि आवंटन के प्रति घोर लापरवाही तथा जानबूझ कर उपेक्षा का रवैया है तो फिर इन वर्गों के सामने जनांदोलन के सिवाय क्या चारा बचता है. इतिहास गवाह है दलितों और आदिवासियों ने इससे पहले भी कई वार भूमि आन्दोलन का रास्ता अपनाया है. 1953 में डॉ. आंबेडकर के निर्देशन में हैदराबाद स्टेट के मराठवाड़ा क्षेत्र में तथा 1958 में महाराष्ट्र के कोंकण क्षेत्र में दलितों द्वारा भूमि आन्दोलन चलाया गया था. दलितों का सब से बड़ा अखिल भारतीय भूमि आन्दोलन रिपब्लिकन पार्टी आफ इंडिया (आरपीआई) के आवाहन पर 6 दिसंबर, 1964 से 10 फरवरी, 1965 तक चलाया गया था जिस में लगभग 3 लाख सत्याग्रही जेल गए थे. यह आन्दोलन इतना ज़बरदस्त था कि तत्कालीन प्रधान मंत्री लाल बहादर शास्त्री को दलितों की भूमि आवंटन तथा अन्य  मांगे माननी पड़ीं थीं.  इसके फलस्वरूप ही कांग्रेस सरकारों को भूमिहीन दलितों को कुछ भूमि आवंटन करना पड़ा. परन्तु इसके बाद आज तक कोई भी बड़ा भूमि आन्दोलन नहीं हुआ. इतना ज़रूर है कि सत्ता में आने से पहले कांशी राम ने “जो ज़मीन सरकारी है, वो ज़मीन हमारी है” का नारा तो दिया था परन्तु मायावती के कुर्सी पर बैठने पर उसे सर्वजन के चक्कर में पूरी तरह से भुला दिया गया.
दलितों के लिए भूमि के महत्त्व पर डॉ. आंबेडकर ने 23 मार्च, 1956 को आगरा के भाषण में कहा था, ”मैं गाँव में रहने वाले भूमिहीन मजदूरों के लिए काफी चिंतित हूँ. मैं उनके लिए ज्यादा कुछ नहीं कर पाया हूँ. मैं उनके दुःख और तकलीफें सहन नहीं कर पा रहा हूँ.उनकी तबाहियों का मुख्य कारण यह है कि उनके पास ज़मीन नहीं है. इसी लिए वे अत्याचार और अपमान का शिकार होते हैं. वे अपना उत्थान नहीं कर पाएंगे. मैं इनके लिए संघर्ष करूँगा. यदि सरकार इस कार्य में कोई बाधा उत्पन्न करती है तो मैं इन लोगों का नेतृत्व करूँगा और इन की वैधानिक लड़ाई लडूंगा. लेकिन किसी भी हालत में भूमिहीन लोगों को  ज़मीन दिलवाने का प्रयास करूँगा. इस से स्पष्ट है कि बाबासाहेब दलितों के उत्थान के लिए भूमि के महत्व को जानते थे और इसे प्राप्त करने के लिए वे कानून तथा जनांदोलन के रास्ते को अपनाने वाले थे परन्तु वे इसे मूर्त रूप देने के लिए अधिक दिन तक जीवित नहीं रहे.
इस बीच देश के विभिन्न हिस्सों में आदिवासियों द्वारा “भूमि अधिकार आन्दोलन” चलाया जाता रहा है परन्तु दलितों द्वारा कोई भी बड़ा भूमि आन्दोलन नहीं चलाया गया है जिस कारण उन्हें कहीं भी भूमि आवंटन नहीं हुयी है. नाक्साल्बदी आन्दोलन का मुख्य एजंडा दलितों/आदिवासियों को भूमि दिलाना ही था. दक्षिण भारत के  राज्यों जैसे तमिलनाडू तथा आन्ध्र प्रदेश में “पांच एकड़” भूमि का नारा दिया गया है. हाल में गुजरात दलित आन्दोलन के दौरान भी दलितों को पांच एकड़ भूमि तथा आदिवासियों को वनाधिकार कानून के अंतर्गत ज़मीन देने की मांग उठाई गयी है जो कि दलित राजनीति को जाति के मक्कड़जाल  से बाहर निकालने का काम कर सकती है. यदि इस मांग को अन्य राज्यों में भी अपना कर इसे दलित आन्दोलन और दलित राजनीति के एजंडे में प्रमुख स्थान दिया जाता है तो यह दलितों और आदिवासियों के वास्तविक सशक्तिकरण में बहुत कारगर सिद्ध हो सकता है. अब तो जिन राज्यों में दलितों/आदिवासियों को आवंटन के लिए सरकारी भूमि उपलब्ध नहीं है उसे अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति सब प्लान के बजट से खरीद कर दिया जा सकता है.
अतः अगर दलितों और आदिवासियों का वास्तविक सशक्तिकरण करना है तो वह भूमि सुधारों को कड़ाई से लागू करके तथा भूमिहीनों को भूमि आवंटित करके ही किया जा सकता है. इसके लिए वांछित स्तर की राजनीतिक इच्छा शक्ति की ज़रुरत है जिस का वर्तमान में सर्वथा अभाव है. अतः भूमि सुधारों को लागू कराने  तथा भूमिहीन दलितों/आदिवासियों को भूमि आवंटन कराने के लिए एक मज़बूत भूमि आन्दोलन चलाये जाने की आवश्यकता है. इस आन्दोलन को बसपा जैसी अवसरवादी और केवल जाति की राजनीति करने वाली पार्टी नहीं चला सकती है क्योंकि इसे सभी प्रकार के आंदोलनों से परहेज़ है. आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट ने भूमि सुधार और भूमि आवंटन को अपने एजंडे में प्रमुख स्थान दिया है और इसके लिए अदालत में तथा ज़मीन पर भी लड़ाई लड़ी है. इसी पार्टी ने उत्तर प्रदेश में वनाधिकार कानून को ईमानदारी से लागू कराने के लिए इलाहाबाद उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर करके आदेश भी प्राप्त किया था जिसे मायवती और मुलायम की सरकार ने विफल कर दिया. आइपीएफ़ अब पुनः उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल क्षेत्र में भूमि आन्दोलन प्रारंभ करने जा रहा है. अत आइपीएफ सभी दलित/आदिवासी हितैषी संगठनों और दलित/गैर दलित  राजनीतिक पार्टियों का आवाहन करता है कि वे अगर सहमत हों तो उत्तर प्रदेश के 2017 के चुनाव में भूमि सुधार और भूमि आवंटन को सभी राजनीतिक पार्टियों के एजंडे में शामिल कराने के लिए जनदबाव बनाने में सहयोग दें.

शनिवार, 3 सितंबर 2016

उत्तर प्रदेश में सुरक्षित नहीं दलित महिलायें



उत्तर प्रदेश में सुरक्षित नहीं दलित महिलायें
-एस.आर. दारापुरी, भूतपूर्व पुलिस महानिरीक्षक एवं राष्ट्रीय प्रवक्ता, आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट
हाल में राष्ट्रीय अपराध अनुसंधान ब्यूरो द्वारा क्राईम इन इंडिया- 2015 रिपोर्ट जारी की गयी है. इस रिपोर्ट में वर्ष 2015 में पूरे देश में दलित उत्पीड़न के अपराध के जो आंकड़े छपे हैं उनसे यह उभर कर आया है कि इसमें उत्तर प्रदेश काफी आगे है. उत्तर प्रदेश की दलित आबादी देश में सब से अधिक आबादी है जो कि उत्तर प्रदेश की आबादी का 20.5 प्रतिशत है. रिपोर्ट के अनुसार देश में वर्ष 2015 में दलितों के विरुद्ध उत्पीड़न के कुल 45,003 अपराध घटित हुए जिन में से उत्तर प्रदेश में 8,358 अपराध घटित हुए जो कि राष्ट्रीय स्तर पर कुल घटित अपराध का 18.6 प्रतिशत है. इस अवधि में राष्ट्रीय स्तर पर प्रति एक लाख दलित आबादी पर घटित अपराध की दर 22.3 रही और उत्तर प्रदेश की यह दर 20.2 रही. यह भी उल्लेखनीय है कि 2013 की राष्ट्रीय दर 19.6 के मुकाबले में यह काफी अधिक है. इन आंकड़ों से एक बात उभर कर आई है कि उत्तर प्रदेश में दलित महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं क्योंकि दलित महिलाओं पर अत्याचार के मामलों की संख्या और दर राष्ट्रीय दर से काफी ऊँची है और कुछ अपराधों में तो सब से अधिक है. यद्यपि उत्तर प्रदेश में दलितों के विरुद्ध कुल अपराध की दर राष्ट्रीय दर से कुछ कम है परन्तु आंकड़ों के निम्नलिखित विश्लेषण से यह पाया गया है कि गंभीर अपराधों के मामले में यह राष्ट्रीय दर से काफी ऊँची है.
हत्या: वर्ष 2015 में पूरे देश में दलितों की हत्यायों की संख्या 707 थी जिन में अकेले उत्तर प्रदेश में 204 हत्याएं हुयीं. इस अपराध की राष्ट्रीय दर 0.4 के विपरीत उत्तर प्रदेश की दर 0.5 रही जो की काफी ऊँची है. इससे स्पष्ट है कि दलित हत्यायों के मामले में उत्तर प्रदेश काफी आगे है.
बलात्कार: वर्ष 2015 में पूरे देश में दलित महिलाओं के बलात्कार के 2,332 अपराध घटित हुए जिन में से अकेले उत्तर प्रदेश में 444 तथा बलात्कार के प्रयास के 22 मामले दर्ज हुए. यद्यपि इस अपराध की राष्ट्रीय दर 1.2 के विपरीत उत्तर प्रदेश की दर 1.1 रही परन्तु कुल अपराधों की संख्या काफी अधिक रही.
शीलभंग के प्रयास में हमला: वर्ष 2015 में पूरे देश में दलित महिलाओं के शीलभंग के प्रयास में हमला के 2.800 अपराध घटित हुए जिन में से अकेले उत्तर प्रदेश में 756 अपराध हुए. इस अपराध की राष्ट्रीय दर 1.4 के विरुद्ध उत्तर प्रदेश की यह दर 1.8 रही जो कि बहुत अधिक है.
यौन उत्पीड़न: वर्ष 2015 में पूरे देश में दलित महिलाओं के यौन उत्पीड़न के 1,317 अपराध दर्ज हुए जिन में से अकेले उत्तर प्रदेश में 704 मामले घटित हुए. इस अपराध की राष्ट्रीय दर 0.7 रही जबकि उत्तर प्रदेश की यह दर 1.7 थी जो कि देश में सब से ऊँची है.
विवाह के लिए अपहरण: वर्ष 2015 में पूरे देश में विवाह के लिए अपहरण के कुल 455 मामले घटित हुए जिन में से अकेले उत्तर प्रदेश में 338 अपराध घटित हुए. इस अपराध की राष्ट्रीय दर 0.2 के विपरीत उत्तर प्रदेश की यह दर 0.8 रही जो कि पूरे देश में सब से ऊँची है. इसी प्रकार पूरे वर्ष में दलितों के अपहरण के 687 मामले दर्ज हुए जिन में से अकेले उत्तर प्रदेश में 415 मामले घटित हुए. राष्ट्रीय स्तर पर इस अपराध की दर 0.3 रही जबकि उत्तर प्रदेश की यह दर 1.0 रही जो कि देश में सब से ऊँची है.
गंभीर चोट: उपरोक्त अवधि में पूरे देश में गंभीर चोट के 1,007 मामले दर्ज हुए जिन में से अकेले उत्तर प्रदेश में 366 मामले घटित हुए. इसकी राष्ट्रीय दर 0.5 रही जबकि उत्तर प्रदेश की यह दर 0.9 रही जो कि काफी अधिक है.
बलवा: वर्ष 2015 में पूरे देश में दलितों के विरुद्ध बलवे के 1,465 मामले दर्ज हुये जिन में से अकेले उत्तर प्रदेश में 632 मामले घटित हुए. इस अपराध की राष्ट्रीय दर 0.7 थी जबकि उत्तर प्रदेश की यह दर 1.5 रही जो कि काफी अधिक है.
एससी/एसटी एक्ट के अपराध: वर्ष 2015 में पूरे देश में दलितों के उत्पीडन के 38,564 अपराध दर्ज हुए जिन में से अकेले उत्तर प्रदेश में 8,357 केस दर्ज हुए. इस एक्ट के अंतर्गत अपराधों की राष्ट्रीय दर 19.2 रही जबकि उत्तर प्रदेश की यह दर 20.2 रही जो कि काफी अधिक है.
उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि यद्यपि वर्ष 2015 में उत्तर प्रदेश में दलितों के विरुद्ध घटित कुल अपराध की दर राष्ट्रीय दर से कुछ कम है परन्तु दलितों के विरुद्ध गंभीर अपराध जैसे हत्या, शीलभंग का प्रयास, यौन उत्पीड़न, गंभीर चोट, अपहरण और विवाह के लिए अपहरण, बलवा और एससी/एसटी एक्ट के अंतर्गत घटित अपराध की दर राष्ट्रीय दर से काफी अधिक रही. इन आंकड़ों से एक बात उभर कर सामने आई है कि उत्तर प्रदेश में दलित महिलाओं के विरुद्ध अपराध जैसे बलात्कार, शीलभंग का प्रयास, अपहरण, यौन उत्पीड़न तथा विवाह के लिए अपहरण आदि की संख्या एवं दर राष्ट्रीय दर से काफी अधिक है. अपहरण और विवाह के लिए अपहरण एवं यौन उत्पीड़न की दर तो देश में सब से ऊँची है. इससे यह स्पष्ट है कि उत्तर प्रदेश की समाजवादी सरकार में दलित महिलाएं बिलकुल सुरक्षित नहीं हैं.
एससी/एसटी की नियमावली 1995 में यह आदेश है कि इस एक्ट के मामलों की सुनवाई हेतु विशेष न्यायालयों की स्थापना की जाएगी परन्तु उत्तर प्रदेश में ऐसा न करके केवल वर्तमान अदालतों को ही विशेष अदालतों का नाम दे दिया गया है जिस से इन मामलों के निस्तारण में लम्बी अवधि लगती है. इससे यह  भी लगता है कि उत्तर प्रदेश में दलितों के उत्पीड़न के अपराधों को रोकने के लिए प्रभावी कार्रवाही नहीं की जा रही है और न ही दोषियों को सज़ा दिलाने के लिए उचित व्यवस्था. समाजवादी सरकार को तो छोड़िये मायावती ने भी इस ओर कभी ध्यान नहीं दिया. इसी प्रकार नियमों के अनुसार मुख्य मंत्री को दलित  उत्पीड़न के मामलों की समीक्षा हेतु वर्ष में दो बार समीक्षा मीटिंग बुलानी चाहिए परन्तु न तो चार वार मुख्य मंत्री रही मायावती ने और न ही वर्तमान मुख्य मंत्री ने आज तक ऐसी कोई मीटिंग बुलाई है. लगभग यही स्थिति जिला स्तर पर जिलाधिकारी की अध्यक्षता में प्रति माह बुलाये  जाने वाली समीक्षा मीटिंगों की भी है.
उत्तर प्रदेश जहाँ पर देश की दलितों की सब से बड़ी आबादी है में दलितों पर होने वाले उत्पीड़न के अपराध खास करके संगीन अपराध बहुत अधिक हैं जो कि चिंता का विषय है. एक तो वैसे ही समाजवादी सरकार का अब तक का रवैय्या दलित विरोधी ही रहा है. इस की सब से बड़ी उदहारण यह है कि थानों पर थानाध्यक्षों की नियुक्ति में 21% का आरक्षण होने के बावजूद भी थानों पर उन की बहुत कम नियुक्ति की गयी है जिस का सीधा प्रभाव दलितों सम्बन्धी अपराध के पंजीकरण पर पड़ता है.  यह भी उल्लेखनीय है अपराध के यह सरकारी आंकड़े बहुत विश्वसनीय नहीं हैं क्योंकि बहुत से मामले तो दर्ज ही नहीं किये जाते. अतः दलितों के विरुद्ध घटित होने वाले अपराधों की तस्वीर सरकारी आंकड़ों से कहीं अधिक भयावह है. इस लिए उत्तर प्रदेश में दलितों के उत्पीड़न के मामलों को रोकने तथा उन पर प्रभावी कार्रवाही करवाने के लिए राजनितिक इच्छा शक्ति और जन दबाव  की ज़रुरत है जिसका फिलहाल सर्वथा अभाव है.   
  


गुरुवार, 1 सितंबर 2016

दलित उत्पीड़न में भाजपा शासित राज्य काफी आगे



दलित उत्पीड़न में भाजपा शासित राज्य काफी आगे
-एस.आर. दारापुरी, भूतपूर्व पुलिस महानिरीक्षक एवं राष्ट्रीय प्रवक्ता, आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट
राष्ट्रीय अपराध अनुसन्धान ब्यूरो (एनसीआरबी) द्वारा हाल में जारी की गयी क्राईम इन इंडिया– 2015 रिपोर्ट से एक बात पुनः उभर कर आई है कि भाजपा शासित राज्य दलित उत्पीड़न के मामले में देश के अन्य राज्यों से काफी आगे हैं. लगभग यही स्थिति वर्ष 2014 में भी थी. वर्तमान में भाजपा शासित राज्य गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, हरियाणा, छत्तीसगढ़, गोवा और हिमाचल प्रदेश हैं. इनके इलावा कुछ अन्य राज्य जैसे उड़ीसा, आन्ध्र प्रदेश, तेलन्गाना, उत्तर प्रदेश और बिहार हैं जिन में दलित उत्पीड़न के मामले राष्ट्रीय दर (प्रति एक लाख दलित आबादी पर) से ज्यादा हैं. भाजपा शासित राज्यों व् अन्य  राज्यों में दलितों पर उपरोक्त रिपोर्ट के अनुसार घटित अपराधों की स्थिति निम्न प्रकार है:-
दलितों पर 2015 में कुल घटित अपराध: इस वर्ष में यह संख्या 45,003 है जो कि यद्यपि वर्ष 2014 की संख्या 47,064 से कम है परन्तु 2013 की संख्या 39,408 से लगभग 5,500 अधिक है. इसी प्रकार 2015 में प्रति एक लाख दलित आबादी पर घटित अपराध की राष्ट्रीय दर 22.3 है जो कि यद्यपि 2014 की 23.4 से कम है परन्तु  2013 की 19.6 से 2.7 अधिक है. इस से स्पष्ट है कि यद्यपि 2015 में कुल घटित अपराध में पिछले वर्ष की अपेक्षा कुछ कमी आई है परन्तु यह 2013 की अपेक्षा काफी बढ़ा है. यह वृद्धि अधिकतर भाजपा शासित राज्यों में अपराध में बढ़ोतरी के कारण ही है.
दलितों पर वर्ष 2015 में घटित अपराधों में से उत्तर प्रदेश- 8,358, राजस्थान- 6,998, बिहार- 6,438,  आंध्र प्रदेश- 4,415, मध्य प्रदेश- 4,188, उड़ीसा- 2,305, महाराष्ट्र- 1,816, तमिलनाडु– 1,782, गुजरात- 1,046, छत्तीसगढ़- 1,028 तथा झारखण्ड- 752 अपराध घटित हुए हैं. इसी प्रकार 22.3 की राष्ट्रीय दर के विपरीत राजस्थान- 57.2, आन्ध्र प्रदेश- 52.3, गोवा- 51.1, बिहार- 38.9, मध्य प्रदेश- 36.9, उड़ीसा- 32.1,छत्तीसगढ़- 31.4, तेलन्गाना-30.9, गुजरात- 25.7, केरल- 24.7, उत्तर प्रदेश- 20.2 रही है. इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि भाजपा शासित राज्य राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात, छत्तीसगढ़, गोवा तथा अन्य राज्य जैसे आन्ध्र प्रदेश, बिहार, उड़ीसा, तेलन्गाना, केरल, उत्तर प्रदेश में दलितोंपर घटित अपराध की दर राष्ट्रिय दर से काफी अधिक है.  
 हत्या: 2015 में दलितों की हत्या के 707 अपराध हुए थे और राष्ट्रीय औसत 0.4 थी. इन में से मध्य प्रदेश-80, राजस्थान- 71, बिहार- 78, महाराष्ट्र- 42, उड़ीसा- 21, गुजरात- 17, तमिलनाडु- 48, तेलन्गाना -17, हरियाणा- 22, आन्ध्र प्रदेश- 23 तथा उत्तर प्रदेश- 204 थे. हत्या के अपराध की राष्ट्रीय औसत दर 0.4 थी  परन्तु भाजपा शासित राज्य मध्य प्रदेश (0.7), राजस्थान (0.6), झारखण्ड (0.5), बिहार (0.5), उत्तर प्रदेश (0.5), हरियाणा (0.4) और गुजरात में (0.4) थी. इन आकड़ों से स्पष्ट है कि भाजपा शासित राज्यों मध्य प्रदेश, राजस्थान में दलित हत्यायों की दर राष्ट्रीय दर से काफी अधिक रही है.
बलात्कार: वर्ष 2015 में दलित महिलायों के बलात्कार के राष्ट्रीय स्तर पर कुल मामले 2,326 थे तथा राष्ट्रीय दर 1.2 थी. इन में से मध्य प्रदेश (460), उत्तर प्रदेश (444), राजस्थान (318), महाराष्ट्र (238), उड़ीसा (129), हरियाणा (107), तेलन्गाना (107), आन्ध्र प्रदेश (104), केरल (99) छत्तीसगढ़ (81), गुजरात (65), तमिलनाडु (43) और बिहार (42) में रहे. इसी प्रकार बलात्कार की राष्ट्रीय दर 1.2 थी जबकि इसके मुकाबले में मध्य प्रदेश (4.1), केरल (3.3), राजस्थान (2.6), छत्तीसगढ़ (2.5), हरियाणा (2.1), तेलन्गाना (2.0), महाराष्ट्र (1.8), उड़ीसा (1.8), गुजरात (1.6) और आन्ध्र प्रदेश (1.2) रही. इन आंकड़ों से भी स्पष्ट है कि दलित महिलाओं पर बलात्कार के मामले में मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, हरियाणा, महाराष्ट्र और गुजरात में अपराध दर राष्ट्रीय दर से काफी अधिक रही है.
दलित महिलाओं पर शील भंग के लिए हमला:  वर्ष 2015 में राष्ट्रीय स्तर पर इस शीर्षक के अंतर्गत कुल 2,800 अपराध घटित हुए तथा राष्ट्रीय दर 1.4 रही. इन में से मध्य प्रदेश- 777, उत्तर प्रदेश- 756, महाराष्ट्र- 353, आन्ध्र प्रदेश- 153, उड़ीसा- 155, हरियाणा- 109, राजस्थान- 107, कर्नटका- 60 और गुजरात- 51 थे.  इस प्रकार के अपराध की राष्ट्रीय दर 1.4 थी जबकि यह मध्य प्रदेश- 6.9, महाराष्ट्र- 2.7, हरियाणा- 2.1, केरल- 2.2, उड़ीसा- 2.2, आन्ध्र प्रदेश एवं तेलन्गाना- 1.8, उत्तर प्रदेश -1.8 रही. इन आंकड़ों से भी स्पष्ट है भाजपा शासित राज्यों मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, हरियाणा में दलितों महिलायों पर शीलभंग के लिए हमले के अपराध की दर राष्ट्रीय दर से काफी ऊँची रही है.
दलित महिलायों का अपहरण: वर्ष 2015 में इस प्रकार के कुल 687 अपराध हुए तथा राष्ट्रीय दर 0.3 रही. इस प्रकृति के अपराध उत्तर प्रदेश- 415, राजस्थान- 62, मध्य प्रदेश- 43, गुजरात- 37, महाराष्ट्र- 34, हरियाणा-29, उड़ीसा- 22 और आन्ध्र प्रदेश- 10 थे. इसकी राज्यवार दर उत्तर प्रदेश- 1.0, गुजरात- 0.9, राजस्थान- 0.5, मध्य प्रदेश- 0.4, महाराष्ट्र और उड़ीसा- 0.3 रही. इस विश्लेषण से भी स्पष्ट है कि इस अपराध में भी उत्तर प्रदेश, गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश की दर राष्ट्रीय दर से काफी ऊपर रही.
दलित महिलायों का विवाह के लिए अपहरण: वर्ष 2015 में पूरे देश में इस प्रकार के 455 प्रकरण हुए तथा राष्ट्रीय दर 0.2 रही. इनमे उत्तर प्रदेश- 338, राजस्थान- 28, गुजरात- 20, मध्य प्रदेश- 18, महाराष्ट्र- 18 तथा मध्य प्रदेश- 18 घटित हुए.  इसकी राज्यवार दर उत्तर प्रदेश- 0.8, गुजरात- 0.5, मध्य प्रदेश और राजस्थान- 0.2  रही. इससे से भी स्पष्ट है इस अपराध में भी उत्तर प्रदेश के बाद राजस्थान, गुजरात और राजस्थान की दर राष्ट्रीय दर से ऊँची रही.
आगजनी: वर्ष 2015 में आगजनी के कुल 179 मामले हुए तथा राष्ट्रीय दर 0.1 रही. इसमें से छत्तीसगढ़- 43, उत्तर प्रदेश- 30, मध्य प्रदेश- 21, राजस्थान- 21, तमिलनाडु- 14, उड़ीसा- 15 तथा महाराष्ट्र- 11 में अपराध घटित हुए.  दर की दृष्टि से छत्तीसगढ़- 0.3, मध्य प्रदेश- 0.2, राजस्थान- 0.2, गुजरात- 0.2 की दर रही. इस से भी  स्पष्ट है कि छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान और गुजरात में आगजनी के अपराध की दर राष्ट्रीय औसत से अधिक रही.
एससी/एसटी एक्ट के अपराध: इस एक्ट के अंतर्गत वर्ष 2005 में कुल 6,005 अपराध पंजीकृत हुए और राष्ट्रीय दर 3.0 रही. इनमें से मध्य प्रदेश-1, महाराष्ट्र- 290, हिमाचल प्रदेश- 74, गुजरात- 190, छत्तीसगढ़- 0, हरियाणा- 19, उड़ीसा- 1, राजस्थान- 92 तथा तेलन्गाना- 358 पंजीकृत हुए. इस अपराध के अंतर्गत भाजपा शासित राज्यों में कम आंकड़ों का कारण इन राज्यों में इस अपराध का कम होना नहीं बल्कि इस एक्ट का प्रयोग न किया जाना है.
एससी/एसटी एक्ट का प्रयोग न किया जाना: उपरोक्त रिपोर्ट में दिए गए आंकड़ों से यह तथ्य भी उभर कर आया है कि लगभग सभी भाजपा शासित राज्यों में एससी/एसटी एक्ट का प्रयोग नहीं किया जा रहा है जिस कारण दलितों पर अत्याचार के मामले सामान्य कानून के अन्तर्गत दर्ज किये जाते हैं. इससे दलितों को अत्याचार के मामलों में न तो कोई मुयाव्ज़ा मिलता है और न ही दोषियों को कड़ी सजा. इन राज्यों में 6,009 आईपीसी अपराध के मामलों में इस एक्ट का प्रयोग नहीं किया गया है. राज्यवार स्थिति यह है: आन्ध्र प्रदेश -2050, राजस्थान- 1,040, छत्तीसगढ़- 790, मध्य प्रदेश- 638, उड़ीसा- 482, तेलन्गाना- 357, हरियाणा- 322, कर्नाटक- 131. इन आंकड़ों के विश्लेषण से स्पष्ट है कि भाजपा शासित राज्यों राजस्थान, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, हरियाणा के इलावा आन्ध्र प्रदेश, तेलन्गाना, उड़ीसा और कर्नाटक में भी एससी/एसटी एक्ट का प्रयोग नहीं किया जा रहा है जो कि इन राज्यों के दलितों के साथ बहुत बड़ा अन्याय और धोखा है.
अनुसूचित जनजातियों पर अत्याचार: वर्ष 2015 में इस वर्ग पर 10,914 अपराध घटित हुए और अपराध की राष्ट्रीय दर 10.5 रही जो 2014 के कुल अपराध 11, 415 और राष्ट्रीय दर 11.0 से तो कुछ कम है परन्तु 2013 के 6,793 अपराध और राष्ट्रीय दर 6.5 से काफी अधिक है. 2015 के कुल अपराध में से राजस्थान -3,207, मध्य प्रदेश- 1,531, छत्तीसगढ़- 1,518, उड़ीसा- 1,307, आन्ध्र प्रदेश- 719, तेलन्गाना- 698, महारष्ट्र-483, गुजरात- 256 और झारखण्ड में 269 अपराध घटित हुए. इनकी राज्यवार दर राजस्थान- 34.7, आन्ध्र प्रदेश- 27.3, तेलन्गाना- 21.2, छत्तीसगढ़- 19.4 और उड़ीसा- 14.5 है जो कि राष्ट्रीय दर से काफी अधिक है.
उक्त रिपोर्ट के अनुसार 2015 में अनुसूचित जनजातियों पर इस वर्ष कुल 10,914 अपराध घटित हुए तथा अपराध की राष्ट्रीय दर 10.5 रही. इनमें से राजस्थान- 3,207, मध्य प्रदेश- 1,531, छत्तीसगढ़- 1,518, उड़ीसा- 1,387, आन्ध्र प्रदेश- 719, तेलन्गाना- 698 में अपराध घटित हुए. दर की दृष्टि से केरल- 36.3, राजस्थान- 34.7, आन्ध्र प्रदेश- 27.3, तेलन्गाना- 21.2, छत्तीसगढ़- 19.4, उड़ीसा- 14.5, मध्य प्रदेश- 10.0 की दर रही. इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि केरल, उड़ीसा, आन्ध्र प्रदेश तथा तेलन्गाना को छोड़ कर शेष भाजपा शासित राज्यों राजस्थान, छत्तीसगढ़, और मध्य प्रदेश में अपराध की दर राष्ट्रीय दर से काफी ऊँची रही है.
हत्या:  वर्ष 2015 में अनुसूचित जनजाति के विरुद्ध हत्या की 144 अपराध घटित हुए जिन में से मध्य प्रदेश- 50, राजस्थान- 22, उड़ीसा- 14, गुजरात- 13, महाराष्ट्र- 11 में घटित हुए. इससे भी स्पष्ट है इस वर्ग पर भाजपा शासित राज्यों में हत्या के अधिक अपराध हुए.
बलात्कार: उक्त अवधि में पूरे देश में अनुसूचित जनजातियों की महिलाओं पर बलात्कार के 952 अपराध घटित हुए और इसकी राष्ट्रीय दर 0.9 रही. इन में से मध्य प्रदेश- 359, छत्तीसगढ़- 138, महाराष्ट्र- 99, उड़ीसा- 94, राजस्थान- 80, केरल- 47, गुजरात और तेलन्गाना- 44, तथा आन्ध्र प्रदेश- 21 में अपराध हुए. दर की दृष्टि से केरल- 9.7, मध्य प्रदेश- 2.3, छत्तीसगढ़- 1.8, तेलन्गाना- 1.3, उड़ीसा- 1.0, महाराष्ट्र- 0.9 की दर रही. इस विश्लेषण से स्पष्ट है कि केरल को छोड़ कर शेष भाजपा शासित राज्यों में ब्लात्कार की दर राष्ट्रिय दर से काफी अधिक रही है.
महिलायों पर शीलभंग के लिए हमले:  वर्ष 2015 में अनुसूचित जनजातियों पर इस प्रकार के 818 अपराध घटित हुए तथा राष्ट्रीय दर 0.8 रही. इनमें से मध्य प्रदेश- 378, महाराष्ट्र- 146, छत्तीसगढ़- 86, उड़ीसा- 65, तेलन्गाना- 32 तथा आन्ध्र प्रदेश- 29 में अपराध घटित हुए. दर की दृष्टि से केरल- 3.9, मध्य प्रदेश- 2.5, महाराष्ट्र- 1.4, छत्तीसगढ़ और आन्ध्र प्रदेश- 1.1, तेलन्गाना- 1.0 की रही. इन आंकड़ों से भी स्पष्ट है किकेरल को छोड़ कर शेष सभी भाजपा शासित राज्यों में इस वर्ग पर सब से अधिक अपराध घटित हुए हैं.    
एससी/एसटी एक्ट के अंतर्गत अपराध: वर्ष 2015 में पूरे देश में अनुसूचित जनजाति पर अत्याचार के सम्बन्ध में इस एक्ट के अंतर्गत 6,275 अपराध पंजीकृत हुए. इनमें से राजस्थान- 1,409, मध्य प्रदेश- 1,358, उड़ीसा- 691, महाराष्ट्र- 481, तेलन्गाना और कर्नाटक- 386, छत्तीसगढ़- 373, आन्ध्र प्रदेश- 362 और गुजरात- 248, केरल- 165 घटित हुए. दर की दृष्टि से केरल- 34.0, राजस्थान- 15.3, आन्ध्र प्रदेश- 13.8,तेलन्गाना- 11.7, मध्य प्रदेश- 8.9, उड़ीसा- 7.2 की रही. इस विश्लेषण से भी स्पष्ट है कि केरल को छोड़ कर भाजपा शासित राज्य इस अपराध में भी अन्य से आगे हैं.   
एससी/एसटी एक्ट का लागू न किया जाना: वर्ष 2015 के दौरान अनुसूचित जनजाति के विरुद्ध आईपीसी के 4203 मामले रहे हैं जिन में इस एक्ट का प्रयोग ही नहीं किया गया. इनमें से राजस्थान- 1,746, छत्तीसगढ़- 816, उड़ीसा- 696, आन्ध्र प्रदेश- 352, तेलन्गाना- 302 तथा मध्य प्रदेश- 171 में घटित हुए. दर की दृष्टि से राजस्थान- 18.9, आन्ध्र प्रदेश- 13.4, छत्तीसगढ़- 10.4, तेलन्गाना- 9.2, उड़ीसा- 7.3 रही. इन आंकड़ों से भी स्पष्ट है कि आन्ध्र प्रदेश, तेलन्गाना और उड़ीसा को छोड़ कर शेष भाजपा शासित राज्यों में एससी/एसटी एक्ट को लागू न करने की दर काफी ऊँची है.  
दलित उत्पीड़न के मामलों में न्यायालय से सज़ा की दर: वर्ष 2015 के दलित उत्पीड़न के मामलों के न्यायालय द्वारा निस्तारण के अनुसार इस वर्ष में 17,012 मामले निस्तारित किये गए जिन में से केवल 4,702 मामलों में ही सजा हुयी तथा 12,310 मामलों में आरोपी दोष मुक्त हो गए. इस प्रकार सजा होने की दर केवल 27.6 प्रतिशत रही. इसी प्रकार उक्त अवधि में न्यायालय द्वारा अनुसूचित जनजाति के 4,894 मामले निस्तारित किये गए जिन में से केवल 1,349 मामलों में सजा हुयी और 3,545 मामलों में आरोपी रिहा हो गए. इस मामले में भी सजा की दर केवल 27.6 ही रही. इन आंकड़ों से यह स्पष्ट हो जाता है कि अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति को उत्पीड़न के मामलों में न्याय दिलाने के लिए सरकारों की क्या प्रतिबद्धता है?
वर्ष 2015 के अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति पर अत्याचार के मामलों के आंकड़ों के विश्लेषण से यह स्पष्ट है कि भाजपा शासित राज्यों गुजरात, महारष्ट्र, राजस्थान, छत्तीसगढ़, हरियाणा में इन वर्गों पर अत्याचार के मामले आन्ध्र प्रदेश, उड़ीसा, तेलन्गाना, कर्नाटक को छोड़ कर बहुत अधिक हैं. इन राज्यों में न तो एससी/एसटी एक्ट का इस्तेमाल किया जा रहा है और न ही दोषियों को सजा दिलाने के लिए प्रभावी कार्रवाही  की जा रही है. इन राज्यों में 2013 के मुकाबले में अत्याचार के मामलों में बहुत वृद्धि हुयी है. यह भी सर्वविदित है कि सरकारी आंकड़ों में दिखाया गया अपराध वास्तविक आंकड़ों का एक छोटा हिस्सा होता है. कुल घटित अपराध तो इससे कहीं अधिक होता है. मोदी सरकार ने एक तरफ तो एससी/एसटी एक्ट में संशोधन करने का दिखावा किया है वहीँ दूसरी ओर इस एक्ट को भाजपा शासित तथा कुछ अन्य राज्यों में लागू ही नहीं किया जा रहा है. गुजरात का दलित आक्रोश इसी की परिणति है. ऐसी परिस्थिति में दलितों को इस सम्बन्ध में गंभीरता से मनन करना चाहिए और दलित नेताओं और भाजपा शासित तथा अन्य राज्यों की सरकारों के विरुद्ध एससी/एसटी एक्ट को सख्ती से लागू करने के लिए जनांदोलन करना चाहिए.