गुरुवार, 3 अक्तूबर 2013

क्या शिक्षा क्षेत्र में आरक्षण से मेरिट का ह्रास होता है?



क्या शिक्षा क्षेत्र में आरक्षण से मेरिट का ह्रास होता है?
एस आर दारापुरी आई. पी, एस (से.नि.) 

आरक्षण विरोधी शिक्षा क्षेत्र में आरक्षण के विरुद्ध यह तर्क देते हैं कि इस से दलित और पिछड़े वर्ग के छात्रों के कम अंकों से  प्रवेश पाने से मेरिट का ह्रास होता है. इस संद्दर्भ में हाल में किंग जार्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय, लखनऊ (केजीएमयू) के एम.बी.बी.एस डिग्री के दीक्षांत समारोह में आये परिणाम आरक्षण विरोधियों के इस कुतर्क का बिलकुल सही उत्तर है. इस समारोह में वंदना नाम की दलित छात्रा ने कुल 32 मैडलों में से सब से अधिक 17 मैडल जीते जिन में तीन शीर्ष मैडल भी शामिल हैं. यह भी सही है कि उसने में एम.बी.बी.एस में आरक्षण द्वारा प्रवेश प्राप्त किया था. यदि आरक्षण विरोधियों का आरक्षण से मेरिट के ह्रास का तर्क सही होता तो वंदना कभी भी मैडल जीतना तो दूर आसानी से पास भी न हो पाती. अतः इस ताजा उदहारण से यह स्पष्ट है का आरक्षण के कारण मेरिट में ह्रास का तर्क पूरी तरह से  खोखला और पूर्वाग्रह ग्रस्त है. इस के विपरीत सच्चाई यह है कि उच्च शिक्षण संस्थानों में दलित वर्ग के छात्रों के साथ घोर भेद भाव किया जाता है और उन्हें पढ़ने से हतोत्साहित किया जाता है. उन्हें वार वार विभिन्न विषयों में जान-बूझ  कर फेल किया जाता है. इन्हीं कारणों से आईआईटी और एम्स जैसे संस्थानों में यदा-कदा दलित छात्र उत्पीड़न और उत्साहभंग किये जाने के कारण अवसादग्रस्त हो कर आत्म हत्याएं करते रहते हैं.
अब यहाँ तक शिक्षा क्षेत्र में  मेरिट की बात है वह तो अवसर की उप्लब्धत्ता, अनुकूल परिस्थितियां और मेहनत पर निर्भर करती है. शिक्षा क्षेत्र में आरक्षण केवल प्रारंभिक स्तर पर प्रवेश का अवसर उपलब्ध कराता है. उस के बाद तो छात्र को अपनी योग्यता से ही सामान्य  परीक्षा पास करनी होती है क्योंकि कि परीक्षा के आधार पर मिलने वाली डिग्री में कोई भी आरक्षण नहीं होता है. यह भी एक नग्न सत्य है कि व्यवसायिक संस्थानों में छात्रों के मूल्यांकन, खास करके साक्षात्कार आधारित मूल्यांकन, में भारी भेदभाव और पक्षपात किया जाता है जिस का सब से अधिक शिकार दलित छात्र ही होते हैं. कई अध्ययनों से यह पाया गया है कि लिखित परीक्षायों में जहाँ पर छात्र की पहचान ज़ाहिर नहीं होती वहां पर दलित और पिछड़ी जातियों के छात्रों के अंक सामान्य जातियों के छात्रों से किसी भी तरह कम नहीं होते  बल्कि उन से अधिक ही होते हैं. परन्तु जहाँ जहाँ पर आन्तरिक मूल्यांकन और फेस टू फेस मूल्यांकन की व्यवस्था है वहां वहां पर इस वर्ग के छात्रों के अंक सामान्य वर्ग के छात्रों से कम हो जाते हैं. इस के कारण किसी से छिपे हुए नहीं हैं. इस के अतिरिक्त यह तथ्य भी उभर कर आया है कि किसी भी कोर्स के अंत में परीक्षाफल से यह पाया गया है कि दलित और पिछड़े वर्ग के छात्रों की शैषिक परफॉरमेंस में प्रवेशस्तर की अपेक्षा अंतिम परीक्षा में सामान्य जातियों के छात्रों के मुकाबले में सापेक्ष सुधार (relative improvement) अधिक ऊँचा होता है.   
अब अगर वंदना के मामले को ही देखा जाये तो उस से यह विदित होता है कि उस ने भी आरक्षण के आधार पर एम.बी.बी.एस कोर्स में प्रवेश पाया था और उसे कोटे वाली होने के ताने भी सहने पड़े थे परन्तु उस ने अपनी मेहनत से यह सिद्ध कर दिया है कि अवसर और अनुकूल वातावरण मिलने पर दलित छात्र भी वैसी ही योग्यता प्राप्त कर सकते हैं जिस का दावा उच्च जाति के छात्र करते हैं. इस अवसर पर मैं आत्मप्रशंसा के लिए नहीं बल्कि दलित छात्रों की योग्यता की दृष्टि से अपनी उदाहरण देना चाहूँगा. मेरे माता पिता भी भूमिहीन मजदूर थे परन्तु  मुझे पढ़ने  की लगन थी. मैं प्राईमरी स्तर से ही पढ़ने में बहुत तेज़ था. मैंने 1958  में पंजाब शिक्षा विभाग की मिडिल स्टैण्डर्ड परीक्षा  में 700 अंकों में से 566 अंक प्राप्त करके पंजाब के ग्रामीण क्षेत्र के सभी स्कूलों में प्रथम स्थान प्राप्त किया था. इसी प्रकार 1960  में मैं ने पंजाब विश्वविद्यालय की मैट्रिक परीक्षा में 850 अंकों में से 697 अंक प्राप्त करके सम्पूर्ण पंजाब में मेरिट में 35वां स्थान प्राप्त किया था और मेरिट स्कालरशिप जीता था.  इस परीक्षा में मैंने अपने स्कूल के मैट्रिक परीक्षा के 680 अंकों के पहले के रिकार्ड को तोड़ कर नया रिकार्ड स्थापित किया था जो आज तक चल रहा है. मेरी इस उपलब्धि में मेरे शिक्षकों और स्कूल के अच्छे  वातावरण का बहुत बड़ा योगदान था जिस ने मुझे मेहनत करके बहुत अच्छे अंक प्राप्त करने का मौका दिया.  बाद में सिविल सेवा परीक्षा (1972) आई. पी. एस में भी मैंने 60 अभ्यर्थियों में आधों से ऊपर सामान्य मेरिट में स्थान प्राप्त किया था. इस से स्पष्ट है कि अवसर और अनुकूल वातावरण मिलने पर कोई भी व्यक्ति  मेहनत करके बहुत अच्छी मेरिट दिखा सकता है.
    अब यह भी वैज्ञानिक तौर पर सिद्ध हो चुका है कि जन्म के समय सब बच्चों का आई-क्यू बराबर होता है जब तक कि उस में कोई मानसिक विकलांगता अथवा जन्मजात कमी न हो. बाद में बच्चे के आई-क्यू में यदि कोई अंतर आता है तो वह पारिवारिक परिस्थितियों के कारण आता है. वैसे यह भी पाया गया है कि आई-क्यू का मूल्यांकन भी कोई ईमानदार मूल्यांकन नहीं है. वह भी कई प्रकार के पूर्वाग्रहों और चालबाजियों से ग्रस्त होता है. अतः यह कहना गलत है कि दलित वर्ग के छात्र उच्च वर्ग के छात्रों से आई-क्यू में किसी भी तरह से कम होते है. अगर कोई कमी है तो वह है अवसर और अनुकूल वातावरण की जिसे दूर करके सभी को आगे बढ़ने का अवसर दिया जाना राष्ट्रहित में है.
अब अगर मेरिट देखनी हो तो तमाम ऐसे उदाहरण मिलेंगे जिस में अनुकूल अवसर मिलने पर दलित वर्ग के लोगों ने उच्च मेरिट का प्रदर्शन किया है.  हमारे देश के संविधान निर्माता डॉ. आंबेडकर इस की एक चमकती हुयी उदाहरण हैं जिन की गिनती दुनियां के चंद सब से अधिक शिक्षित व्यक्तियों में की जाती है. इसी लिए डॉ. आंबेडकर ने एक वार कहा था कि मैं अकेला ही 6 ग्रेजुएट्स के बराबर हूँ. एक वार उन्होंने सवर्ण हिन्दुओं की मेरिट पर कटाक्ष करते हुए जवाहर लाल नेहरु के व्यक्तिगत सचिव रहे जॉन मथाई से कहा था, “हिन्दुओं ने वेद व्यास से वेद लिखवाने का काम लिया जो कि उच्च जाति से नहीं था. हिन्दुओं ने महाभारत का महाकाव्य वाल्मीकि से लिखवाया जो कि अछूत था. अब  हिन्दू संविधान लिखवाने का काम मुझ से ले रहे हैं.” इसी लिए मेरिट का दावा करने और शिखा क्षेत्र में आरक्षण से मेरिट में गिरावट आने का आरोप लगाने वालों को समझ लेना चाहिए कि मेरिट किसी जाति या वर्ग की बपौती नहीं है. समान अवसर और अनुकूल वातावारण मिलने पर कोई भी व्यक्ति मेहनत करके उच्च मेरिट प्राप्त कर सकता है.     

शनिवार, 28 सितंबर 2013

साम्प्रदायिक दंगे और उनका इलाज - भगतसिंह (1928)


साम्प्रदायिक दंगे और उनका इलाज

भगतसिंह (1928)


1919 के जालियँवाला बाग हत्याकाण्ड के बाद ब्रिटिष सरकार ने साम्प्रदायिक दंगों का खूब प्रचार शुरु किया। इसके असर से 1924 में कोहाट में बहुत ही अमानवीय ढंग से हिन्दू-मुस्लिम दंगे हुए। इसके बाद राष्ट्रीय राजनीतिक चेतना में साम्प्रदायिक दंगों पर लम्बी बहस चली। इन्हें समाप्त करने की जरूरत तो सबने महसूस की, लेकिन कांग्रेसी नेताओं ने हिन्दू-मुस्लिम नेताओं में सुलहनामा लिखाकर दंगों को रोकने के यत्न किये।
इस समस्या के निश्चित हल के लिए क्रान्तिकारी आन्दोलन ने अपने विचार प्रस्तुत किये। प्रस्तुत लेख जून, 1928 के ‘किरती’ में छपा। यह लेख इस समस्या पर शहीद भगतसिंह और उनके साथियों के विचारों का सार है। – सं.

भारत वर्ष की दशा इस समय बड़ी दयनीय है। एक धर्म के अनुयायी दूसरे धर्म के अनुयायियों के जानी दुश्मन हैं। अब तो एक धर्म का होना ही दूसरे धर्म का कट्टर शत्रु होना है। यदि इस बात का अभी यकीन न हो तो लाहौर के ताजा दंगे ही देख लें। किस प्रकार मुसलमानों ने निर्दोष सिखों, हिन्दुओं को मारा है और किस प्रकार सिखों ने भी वश चलते कोई कसर नहीं छोड़ी है। यह मार-काट इसलिए नहीं की गयी कि फलाँ आदमी दोषी है, वरन इसलिए कि फलाँ आदमी हिन्दू है या सिख है या मुसलमान है। बस किसी व्यक्ति का सिख या हिन्दू होना मुसलमानों द्वारा मारे जाने के लिए काफी था और इसी तरह किसी व्यक्ति का मुसलमान होना ही उसकी जान लेने के लिए पर्याप्त तर्क था। जब स्थिति ऐसी हो तो हिन्दुस्तान का ईश्वर ही मालिक है।
ऐसी स्थिति में हिन्दुस्तान का भविष्य बहुत अन्धकारमय नजर आता है। इन ‘धर्मों’ ने हिन्दुस्तान का बेड़ा गर्क कर दिया है। और अभी पता नहीं कि यह धार्मिक दंगे भारतवर्ष का पीछा कब छोड़ेंगे। इन दंगों ने संसार की नजरों में भारत को बदनाम कर दिया है। और हमने देखा है कि इस अन्धविश्वास के बहाव में सभी बह जाते हैं। कोई बिरला ही हिन्दू, मुसलमान या सिख होता है, जो अपना दिमाग ठण्डा रखता है, बाकी सब के सब धर्म के यह नामलेवा अपने नामलेवा धर्म के रौब को कायम रखने के लिए डण्डे लाठियाँ, तलवारें-छुरें हाथ में पकड़ लेते हैं और आपस में सर-फोड़-फोड़कर मर जाते हैं। बाकी कुछ तो फाँसी चढ़ जाते हैं और कुछ जेलों में फेंक दिये जाते हैं। इतना रक्तपात होने पर इन ‘धर्मजनों’ पर अंग्रेजी सरकार का डण्डा बरसता है और फिर इनके दिमाग का कीड़ा ठिकाने आ जाता है।
यहाँ तक देखा गया है, इन दंगों के पीछे साम्प्रदायिक नेताओं और अखबारों का हाथ है। इस समय हिन्दुस्तान के नेताओं ने ऐसी लीद की है कि चुप ही भली। वही नेता जिन्होंने भारत को स्वतन्त्रा कराने का बीड़ा अपने सिरों पर उठाया हुआ था और जो ‘समान राष्ट्रीयता’ और ‘स्वराज्य-स्वराज्य’ के दमगजे मारते नहीं थकते थे, वही या तो अपने सिर छिपाये चुपचाप बैठे हैं या इसी धर्मान्धता के बहाव में बह चले हैं। सिर छिपाकर बैठने वालों की संख्या भी क्या कम है? लेकिन ऐसे नेता जो साम्प्रदायिक आन्दोलन में जा मिले हैं, जमीन खोदने से सैकड़ों निकल आते हैं। जो नेता हृदय से सबका भला चाहते हैं, ऐसे बहुत ही कम हैं। और साम्प्रदायिकता की ऐसी प्रबल बाढ़ आयी हुई है कि वे भी इसे रोक नहीं पा रहे। ऐसा लग रहा है कि भारत में नेतृत्व का दिवाला पिट गया है।
दूसरे सज्जन जो साम्प्रदायिक दंगों को भड़काने में विशेष हिस्सा लेते रहे हैं, अखबार वाले हैं। पत्रकारिता का व्यवसाय, किसी समय बहुत ऊँचा समझा जाता था। आज बहुत ही गन्दा हो गया है। यह लोग एक-दूसरे के विरुद्ध बड़े मोटे-मोटे शीर्षक देकर लोगों की भावनाएँ भड़काते हैं और परस्पर सिर फुटौव्वल करवाते हैं। एक-दो जगह ही नहीं, कितनी ही जगहों पर इसलिए दंगे हुए हैं कि स्थानीय अखबारों ने बड़े उत्तेजनापूर्ण लेख लिखे हैं। ऐसे लेखक बहुत कम है जिनका दिल व दिमाग ऐसे दिनों में भी शान्त रहा हो।
अखबारों का असली कर्त्तव्य शिक्षा देना, लोगों से संकीर्णता निकालना, साम्प्रदायिक भावनाएँ हटाना, परस्पर मेल-मिलाप बढ़ाना और भारत की साझी राष्ट्रीयता बनाना था लेकिन इन्होंने अपना मुख्य कर्त्तव्य अज्ञान फैलाना, संकीर्णता का प्रचार करना, साम्प्रदायिक बनाना, लड़ाई-झगड़े करवाना और भारत की साझी राष्ट्रीयता को नष्ट करना बना लिया है। यही कारण है कि भारतवर्ष की वर्तमान दशा पर विचार कर आंखों से रक्त के आँसू बहने लगते हैं और दिल में सवाल उठता है कि ‘भारत का बनेगा क्या?’
जो लोग असहयोग के दिनों के जोश व उभार को जानते हैं, उन्हें यह स्थिति देख रोना आता है। कहाँ थे वे दिन कि स्वतन्त्राता की झलक सामने दिखाई देती थी और कहाँ आज यह दिन कि स्वराज्य एक सपना मात्रा बन गया है। बस यही तीसरा लाभ है, जो इन दंगों से अत्याचारियों को मिला है। जिसके अस्तित्व को खतरा पैदा हो गया था, कि आज गयी, कल गयी वही नौकरशाही आज अपनी जड़ें इतनी मजबूत कर चुकी हैं कि उसे हिलाना कोई मामूली काम नहीं है।
यदि इन साम्प्रदायिक दंगों की जड़ खोजें तो हमें इसका कारण आर्थिक ही जान पड़ता है। असहयोग के दिनों में नेताओं व पत्राकारों ने ढेरों कुर्बानियाँ दीं। उनकी आर्थिक दशा बिगड़ गयी थी। असहयोग आन्दोलन के धीमा पड़ने पर नेताओं पर अविश्वास-सा हो गया जिससे आजकल के बहुत से साम्प्रदायिक नेताओं के धन्धे चौपट हो गये। विश्व में जो भी काम होता है, उसकी तह में पेट का सवाल जरूर होता है। कार्ल मार्क्स के तीन बड़े सिद्धान्तों में से यह एक मुख्य सिद्धान्त है। इसी सिद्धान्त के कारण ही तबलीग, तनकीम, शुद्धि आदि संगठन शुरू हुए और इसी कारण से आज हमारी ऐसी दुर्दशा हुई, जो अवर्णनीय है।
बस, सभी दंगों का इलाज यदि कोई हो सकता है तो वह भारत की आर्थिक दशा में सुधार से ही हो सकता है दरअसल भारत के आम लोगों की आर्थिक दशा इतनी खराब है कि एक व्यक्ति दूसरे को चवन्नी देकर किसी और को अपमानित करवा सकता है। भूख और दुख से आतुर होकर मनुष्य सभी सिद्धान्त ताक पर रख देता है। सच है, मरता क्या न करता। लेकिन वर्तमान स्थिति में आर्थिक सुधार होेना अत्यन्त कठिन है क्योंकि सरकार विदेशी है और लोगों की स्थिति को सुधरने नहीं देती। इसीलिए लोगों को हाथ धोकर इसके पीछे पड़ जाना चाहिये और जब तक सरकार बदल न जाये, चैन की सांस न लेना चाहिए।
लोगों को परस्पर लड़ने से रोकने के लिए वर्ग-चेतना की जरूरत है। गरीब, मेहनतकशों व किसानों को स्पष्ट समझा देना चाहिए कि तुम्हारे असली दुश्मन पूँजीपति हैं। इसलिए तुम्हें इनके हथकंडों से बचकर रहना चाहिए और इनके हत्थे चढ़ कुछ न करना चाहिए। संसार के सभी गरीबों के, चाहे वे किसी भी जाति, रंग, धर्म या राष्ट्र के हों, अधिकार एक ही हैं। तुम्हारी भलाई इसी में है कि तुम धर्म, रंग, नस्ल और राष्ट्रीयता व देश के भेदभाव मिटाकर एकजुट हो जाओ और सरकार की ताकत अपने हाथों मंे लेने का प्रयत्न करो। इन यत्नों से तुम्हारा नुकसान कुछ नहीं होगा, इससे किसी दिन तुम्हारी जंजीरें कट जायेंगी और तुम्हें आर्थिक स्वतन्त्राता मिलेगी।
जो लोग रूस का इतिहास जानते हैं, उन्हें मालूम है कि जार के समय वहाँ भी ऐसी ही स्थितियाँ थीं वहाँ भी कितने ही समुदाय थे जो परस्पर जूत-पतांग करते रहते थे। लेकिन जिस दिन से वहाँ श्रमिक-शासन हुआ है, वहाँ नक्शा ही बदल गया है। अब वहाँ कभी दंगे नहीं हुए। अब वहाँ सभी को ‘इन्सान’ समझा जाता है, ‘धर्मजन’ नहीं। जार के समय लोगों की आर्थिक दशा बहुत ही खराब थी। इसलिए सब दंगे-फसाद होते थे। लेकिन अब रूसियों की आर्थिक दशा सुधर गयी है और उनमें वर्ग-चेतना आ गयी है इसलिए अब वहाँ से कभी किसी दंगे की खबर नहीं आयी।
इन दंगों में वैसे तो बड़े निराशाजनक समाचार सुनने में आते हैं, लेकिन कलकत्ते के दंगों मंे एक बात बहुत खुशी की सुनने में आयी। वह यह कि वहाँ दंगों में ट्रेड यूनियन के मजदूरों ने हिस्सा नहीं लिया और न ही वे परस्पर गुत्थमगुत्था ही हुए, वरन् सभी हिन्दू-मुसलमान बड़े प्रेम से कारखानों आदि में उठते-बैठते और दंगे रोकने के भी यत्न करते रहे। यह इसलिए कि उनमें वर्ग-चेतना थी और वे अपने वर्गहित को अच्छी तरह पहचानते थे। वर्गचेतना का यही सुन्दर रास्ता है, जो साम्प्रदायिक दंगे रोक सकता है।
यह खुशी का समाचार हमारे कानों को मिला है कि भारत के नवयुवक अब वैसे धर्मों से जो परस्पर लड़ाना व घृणा करना सिखाते हैं, तंग आकर हाथ धो रहे हैं। उनमें इतना खुलापन आ गया है कि वे भारत के लोगों को धर्म की नजर से-हिन्दू, मुसलमान या सिख रूप में नहीं, वरन् सभी को पहले इन्सान समझते हैं, फिर भारतवासी। भारत के युवकों में इन विचारों के पैदा होने से पता चलता है कि भारत का भविष्य सुनहला है। भारतवासियों को इन दंगों आदि को देखकर घबराना नहीं चाहिए। उन्हें यत्न करना चाहिए कि ऐसा वातावरण ही न बने, और दंगे हों ही नहीं।
1914-15 के शहीदों ने धर्म को राजनीति से अलग कर दिया था। वे समझते थे कि धर्म व्यक्ति का व्यक्तिगत मामला है इसमें दूसरे का कोई दखल नहीं। न ही इसे राजनीति में घुसाना चाहिए क्योंकि यह सरबत को मिलकर एक जगह काम नहीं करने देता। इसलिए गदर पार्टी जैसे आन्दोलन एकजुट व एकजान रहे, जिसमें सिख बढ़-चढ़कर फाँसियों पर चढ़े और हिन्दू मुसलमान भी पीछे नहीं रहे।
इस समय कुछ भारतीय नेता भी मैदान में उतरे हैं जो धर्म को राजनीति से अलग करना चाहते हैं। झगड़ा मिटाने का यह भी एक सुन्दर इलाज है और हम इसका समर्थन करते हैं।
यदि धर्म को अलग कर दिया जाये तो राजनीति पर हम सभी इकट्ठे हो सकते है। धर्मों में हम चाहे अलग-अलग ही रहें।
हमारा ख्याल है कि भारत के सच्चे हमदर्द हमारे बताये इलाज पर जरूर विचार करेंगे और भारत का इस समय जो आत्मघात हो रहा है, उससे हमे बचा लेंगे।

आभार : यह फाइल आरोही, ए-2/128, सैक्टर-11, रोहिणी, नई दिल्ली — 110085 द्वारा प्रकाशित संकलन ‘इन्कलाब ज़िन्दाबाद’ (सम्पादक : राजेश उपाध्याय एवं मुकेश मानस) के मूल फाइल से ली गयी है।
Date Written: June 1928
Author: Bhagat Singh
Title: Communal Riots and their Cure ( Sampradayik dangen aur unka illaj)
First Published: in Punjabi monthly Kirti in June 1928.
* Courtesy: This file has been taken from original file of Aarohi Books' publication Inquilab Zindadad – A Collection of Essays by Bhagat Singh and his friends, edited by Rajesh Upadhyaya and Mukesh Manas.

गुरुवार, 26 सितंबर 2013

श्रीलंका की स्थिति : रामायण की प्रमाणिकता को चुनौती



श्रीलंका की स्थिति : रामायण की प्रमाणिकता को चुनौती
मूल लेखक: भगवान दास
अनुवादक: एस आर. दारापुरी
अधिकतर इतिहासकार रामायण को एक काल्पनिक कृति मानते हैं. फिर भी बहुत पढ़े लिखे, अनपढ़ और अज्ञानी हिन्दू इसे इतिहास की पुस्तक मानते हैं जो कि यह बिलकुल नहीं है. भारत में रामायण के पांच रूपांतर प्रचलित हैं और वे सभी श्लोकों और कांडों की संख्या एवं वृतांत में भिन्न भिन्न हैं. अयोध्या के उत्तर प्रदेश में स्थित होने का विश्वास किया जाता है. अयोध्या में पुरातत्व विभाग द्वारा की गयी खुदाई में ऐसा कुछ भी नहीं मिला है जिस का राम या रामायण से दूर दूर तक का कोई सम्बन्ध हो. खोज करने वालों को बौद्धों से जुडी कुछ वस्तुएं तो ज़रूर मिलीं थीं. उन्नीसवी सदी से रावण की राजधानी श्रीलंका की स्थिति के बारे में वाद विवाद चल रहा है. हिन्दू मानते हैं कि आज की श्रीलंका रावण की राजधानी थी जिस पर राम ने हमला किया था. श्रीलंका के विदवान खास करके बौद्ध विद्वान् इस पर बिलकुल  विश्वास नहीं करते क्योंकि उनके इतिहास में हिन्दुओं के विशवास और ब्राह्मणों विद्वानों के बार बार किये गए दावों को सिद्ध करने के लिए कुछ भी नहीं है. इतिहास और पुरातत्व अन्वेषी भी ब्राह्मण विद्वानों के दावों को झुठलाते हैं. एक विद्वान्  जिस ने कर्नाटक में बीसवीं सदी के प्रारंभ में अन्वेषण किये थे के अनुसार ऐसे कोई भी प्रमाण नहीं हैं जिन से यह कहा जा सके कि राम नर्मदा नदी के उस पार कभी गए भी थे. अन्वेषक विद्वानों के अनुसार लंका विन्ध्याचल या उड़ीसा के बीच कहीं स्थित रही है.
प्रसिद्ध अन्वेषक विदवान डॉ. एच डी सांकलिया के अनुसार लंका कन्या कुमारी के उस पार न हो कर उड़ीसा में कहीं स्थित थी. 8 मार्च, 1980 को भंज नगर ( उड़ीसा) में “उड़ीसा इतिहास कांग्रेस” के अधिवेशन में विद्वानों और इतिहासकारों ने लंका के उड़ीसा में स्थित होने के प्रश्न पर विचार विमर्श किया था. प्रो. आर पी दास ने डॉ. सांकलिया के निष्कर्षों के सन्दर्भ में कहा था कि रामायण का लेखन पांचवी सदी ईसा पूर्व से पहले का नहीं है. सांकलिया का निष्कर्ष था रामायण के लेखक या लेखकों ने कभी दक्षिण भारत या लंका (श्रीलंका) को नहीं देखा था और उन्होंने काल्पनिक शहर बनाये थे. डॉ. नवीन कुमार साहू, एक प्रसिद्ध विदवान और संबलपुर विश्वविद्याल्याके कुलपति ने दावा किया कि रामायण में कहीं भी श्रीलंका (लंका) के द्वीप को सही रूप से चिन्हित नहीं किया गया है. इस द्वीप का नाम तो मुश्किल से 500 वर्ष पूर्व जब यह चोला राजाओं के अधीन आया “लंका” रखा गया था. डॉ. साहू ने यह भी इंगित किया कि  एतिहासिक अभिलेखों और यात्रा वृतांतों (चीनी यात्री ह्युन्सांग जो इस द्वीप पर आया था) में कहीं भी लंका का नाम अंकित नहीं है. तब इसे सिंहल द्वीप कहा जाता था. सभी इतिहासकार सहमत हैं कि वाल्मीकि को चाहे वह ब्राह्मण या अस्पृश्य (अछूत) रहा हो, नर्मदा के परे दक्षिण भारत के भूगोल, फूल व पेड़ पौदों के बारे में बहुत कम जानकारी थी.
लंका के ब्राह्मण विद्वानों की गालियों और निंदा का निशाना बनने का एक कारण भारत में बौद्ध धम्म का लोप हो जाने पर भी बौद्ध धम्म का मज़बूत गढ़ बना रहना था. ब्राह्मणवाद और चातुरवर्ण के रक्षक राम को देवता बनाने, अवतारवाद को लोकप्रिय बनाने और उसकी मानवीय कमियों को छुपाने के लिए रामायण में बहुत से शलोक क्षेपक के रूप में जोड़ दिए गए हैं. रामायण के एक शलोक में बुद्ध की तुलना एक चोर से की गयी है जिस की बात नहीं सुननी चाहिए क्योंकि वह वेदों में विश्वास नहीं करते.
जर्मन विद्वान् जाकोबी जिस ने रामायण का गहन अध्ययन किया था से लेकर फादर कामिल बुल्के जिन का शोध ग्रन्थ “रामकथा” जो इस विषय के सभी ग्रंथों में अगरगणी है, कोई भी यह सिद्ध नहीं करता कि रामायण एक एतहासिक पुस्तक है. फिर भी यह विवाद बना रहेगा क्योंकि यह कहानी दूर दूर तक पहुँच चुकी है. बेशक भारत को छोड़ कर किसी भी देश में राम को देवता नहीं माना जाता जिसे इस दुनिया में ब्राह्मणों के चातुरवर्ण को बचाने और रामायण को एक धार्मिक ग्रन्थ के रूप में मनवाने के लिए भेजा गया था.  
नोट: पिछले कुछ समय से राम सेतु को लेकर उठाये गए विवाद की सत्यता भी रामायण की प्रमाणिकता से ही आंकी जा सकती है. श्रीलंका का पूर्व नाम सिंहल द्वीप था जिसे चोला राजा ने बदल कर श्रीलंका रखा था. मध्य प्रदेश में आज भी कोरकू जनजाति के लोग हैं जो अपने आप को रावण और मेघनाथ के वंशज होने का दावा करते हैं और त्योहार मना कर उनकी पूजा करते है. आप इस सम्बन्ध में मध्य प्रदेश के कोरकू आदिवासियों के इस दावे को you Tube के इस लिंक http://www.youtube.com/watch?v=7j4pOCXfi14 पर सुन भी सकते हैं.

रविवार, 8 सितंबर 2013

ऐ रहबर-ए-मुल्क-ओ-कौम बता ये किसका लहू है, कौन मरा- साहिर लुधियानवी



ऐ रहबर-ए-मुल्क-ओ-कौम बता
ये किसका लहू है, कौन मरा

ये कटते हुए तन किसके हैं
नफ़रत के अंधे तूफां में
लुटते हुए गुलशन किसके हैं
बदबख्त फिजाएं किसकी हैं
बर्बाद नशेमन किसके हैं
कुछ हम भी सुनें, हमको भी सुना


किस काम के हैं ये दीन धरम
जो शर्म का दामन चाक़ करे
किस तरह का है ये देश बता
जो बसते घरों को खाक़ करे
ये रूहें कैसी रूहें हैं
जो धरती को नापाक़ करे
आंखें तो उठा, नज़रें तो मिला


जिस राम के नाम पे खून बहे
उस राम की इज्ज़त क्या होगी
जिस दीन के हाथों लाज लुटे
उस दीन की क़ीमत क्या होगी
इंसान की इस जिल्लत से परे
शैतान की जिल्लत क्या होगी
ये वेद हटा, क़ुरान उठा

बुधवार, 28 अगस्त 2013

काजू भुने पलेट में, विस्की गिलास में ... ( अदम गोंडवी )






काजू भुने पलेट में, विस्की गिलास में
उतरा है रामराज विधायक निवास में

पक्के समाजवादी हैं, तस्कर हों या डकैत
इतना असर है ख़ादी के उजले लिबास में

आजादी का वो जश्न मनायें तो किस तरह
जो आ गए फुटपाथ पर घर की तलाश में

पैसे से आप चाहें तो सरकार गिरा दें
संसद बदल गयी है यहाँ की नख़ास में

जनता के पास एक ही चारा है बगावत
यह बात कह रहा हूँ मैं होशो-हवास में

शुक्रवार, 9 अगस्त 2013

कँवल भारती की गिरफ्तारी अभिव्यक्ति की स्वंतत्रता पर हमला

कँवल भारती की गिरफ्तारी अभिव्यक्ति की स्वंतत्रता पर हमला

6.8.2013: आज जिस तरह रामपुर में एक बिलकुल फर्जी केस में दलित लेखक और चिन्तक श्री कँवल भारती की गिरतारी की गयी वह सपा सरकार का अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सीधा हमला है जिस की आईपीएफ कड़ी निंदा करती है क्योंकि उनके विरुद्ध मुकदमे का कोई भी आधार नहीं बनता है.
आज सवेरे श्री कँवल भारती ने अपनी फेसबुक की वाल पर निम्नलिखित टिप्पणी दर्ज की थी:
“आरक्षण और दुर्गाशक्ति नागपाल इन दोनों ही मुद्दों पर अखिलेश यादव की समाजवादी सरकार पूरी तरह फेल हो गयी है. अखिलेश, शिवपाल यादव, आज़म खां और मुलायम सिंह (यू.पी. के ये चारों मुख्य मंत्री) इन मुद्दों पर अपनी या अपनी सरकार की पीठ कितनी ही ठोक लें, लेकिन जो हकीकत ये देख नहीं पा रहे हैं, (क्योंकि जनता से पूरी तरह कट गये हैं) वह यह है कि जनता में इनकी थू-थू हो रही है, और लोकतंत्र के लिए जनता इन्हें नाकारा समझ रही है. अपराधियों के हौसले बुलंद हैं और बेलगाम मंत्री इंसान से हैवान बन गये हैं. ये अपने पतन की पट कथा खुद लिख रहे हैं. सत्ता के मद में अंधे हो गये इन लोगों को समझाने का मतलब है भैस के आगे बीन बजाना.”

इस से पहले 2 अगस्त को कँवल भारती जी ने अपनी फेसबुक पर यह लिखा था:
“आपका "आज तक" कैसे सबसे तेज है? आपको तो यह ही नहीं पता कि रामपुर में सालों पुराना मदरसा बुलडोजर चलवा कर गिरा दिया गया और संचालक को विरोध करने पर जेल भेज दिया गया जो अभी भी जेल में ही है. अखिलेश की सरकार ने रामपुर में तो किसी भी अधिकारी को सस्पेंड नहीं किया. वह इसलिए कि रामपुर में आज़म खां का राज चलता है, अखिलेश का नहीं.”

उन की उप्रोकर टिप्पणियों पर सिविल लाइन्स थाना रामपुर ने आज सुबह उन्हें कुछ लोगों की शिकायत पर साम्प्रदायिक सद्भाव बिगाड़ने तथा एक विशेष समुदाय की धार्मिक भावनाओं को आहत करने के आरोप में धारा 153 ए तथा धारा 295 ए भारतीय दंड विधान के अंतर्गत मुकदमा दर्ज करके गिरफ्तार कर लिया.
अब अगर कानून की दृष्टि से देखा जाये तो उन पर लगाये गए दोनों आरोप असत्य एवं निराधार हैं. भारतीय दंड विधान की धारा 153 ए के अनुसार यदि कोई व्यक्ति धर्म, मूलवंश, भाषा इत्यादी के आधारों पार विभिन्न समूहों के बीच शत्रुता का संप्रवर्तन और सौहार्द बनाए रखने के प्रतिकूल कार्य करता है तो वह इस धारा के अंतर्गत अपराध करने का दोषी है.
भारतीय दंड विधान की धारा 295 ए के अनुसार यदि कोई व्यक्ति विमशित और विदुएश्पूर्ण कार्य जो किसी वर्ग के धर्म या धार्मिक विश्वासों का अपमान करके उस की धार्मिक भावनाओं को आहत करने के आशय से करता है तो वह इस धारा का अपराध करता है.
अब अगर श्री कँवल भारती की उक्त टिप्पणियों को देखा जाए तो इस में न तो कोई साम्प्रदायिक सद्भाव बिगाड़ने और न ही किसी समुदाय की धार्मिक भावनाओं को आहत करने जैसी कोई बात लिखी गयी है. इस में केवल दो मुद्दों: दलितों का आरक्षण और दुर्गाशक्ति नागपाल के निलंबन को लेकर सरकार के रवैये की आलोचना की गयी जो कि पहले ही इतने व्यापक स्तर पर चौतरफा हो रही है.

हाँ! इतना ज़रूर है कि इन टिप्पणियों में अखिलेश यादव, शिवपाल यादव और मुलायम सिंह यादव के साथ आज़म खान का नाम भी है. अब यह बड़ी हैरानी की बात है कि केवल रामपुर, जो कि श्री आज़म खान का शहर है, में ही इस टिप्पणी से साम्प्रदायिक सद्भाव बिगड़ने और एक विशेष समुदाय की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुचने की बात कह कर मुकदमा दर्ज कराया गया और श्री कँवल भारती को गिरफ्तार कर लिया गया. यह अलग बात है न्यायालय द्वारा उन्हें ज़मानत दे दी गयी है.

क्या यह सपा सरकार के मंत्री आज़म खान द्वारा अपने गृह जनपद में अपनी आलोचना पर सभी प्रकार की पाबन्दी लगाने का प्रयास नहीं है? क्या लोगों को सरकार की विफलताओं की आलोचना करने का भी अधिकार नहीं है? क्या उत्तर प्रदेश में आपात काल लग गया है जिस में जनता के सभी मौलिक अधिकार निलंबित हो गए हैं? क्या राममनोहर लोहिया के समाजवाद का क्या यही वर्तमान स्वरूप है?

ऐसा प्रतीत होता है कि सपा की सरकार अपनी विफलताओं और चौतरफा आलोचनाओं से हताश हो गयी है और वह हर विरोध को कुचलने पर उतर आई है. दुर्गाशक्ति के निलंबन के मामले से उसकी जो छीछालेदर हुयी है उस से वह हडबडा गयी है और सत्ता के डंडे से आलोचनाओं पर काबू पाना चाहती है. श्री कँवल भारती की गिरफ्तारी इसी का ही दुष्परिणाम है. आईपीएफ सपा सरकार की इस कार्रवाही की कड़ी निंदा करती है.

एस. आर. दारापुरी,
राष्ट्रीय प्रवक्ता, आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट
मोबाइल: 9415164845

कँवल भारती की गिरफ्तारी अवैधानिक एवं विद्वेषपूर्ण


आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट (र)
प्रांतीय कार्यालय: 4 मॉल ऐवेन्यू, निकट फिरोज़ कोठी, लखनऊ.
कँवल भारती की गिरफ्तारी अवैधानिक एवं विद्वेषपूर्ण

अब तक यह स्पष्ट हो चुका है कि दिनांक 6/8/13 को प्रख्यात दलित लेखक श्री कँवल भारती की गिरफ्तारी उन द्वारा फेसबुक पर लिखी गयी जिन दो पोस्टों को लेकर की गयी है वास्तव में उन में साम्प्रदायिक सद्भाव बिगाड़ने और किसी समुदाय की धार्मिक भावनाओं को ठेस पंहुचाने जैसी कोई बात ही नहीं है. दरअसल जिस अपराध में उन्हें गिरफ्तार किया गया है यदि उसे सही भी मान लिया जाये तो भी इस अपराध में उनकी गिरफ्तारी की ही नहीं जा सकती थी क्योंकि इस की अधिकतम सजा 3 वर्ष है. पुलिस ने इस मामले में कोई भी तफ्तीश न करके सबसे पहले उन्हें गिरफ्तार करने का काम ही किया जो कि विवेचना की निर्धारित प्रक्रिया के विपरीत है. उनकी गिरफ्तारी में कानून के प्रावधानों का खुला उलंघन किया गया और उनकी गरिमा को ठेस पहुंचाई गयी. इस प्रकार उन की गिरफ्तारी पूर्णतया अवैधानिक एवं विद्वेषपूर्ण है जो कि निंदनीय भी है.

श्री कँवल भारती ने के अनुसार उस दिन रामपुर पुलिस द्वारा उन्हें प्रातः 7.30 बजे उनके घर से बनियान और पजामा में गिरफ्तार करके थाने पर लाया गया और उन्हें केवल इतना बताया गया कि थाने पर उन के विरुद्ध एक शिकायत प्राप्त हुयी है. वहां उन्हें दोपहर तक बैठाये रखा गया परन्तु उन की गिरफतारी के कारण के बारे में उन्हें नहीं बताया गया. थाने पर उन्हें बिलकुल भूखे प्यासे रखा गया और उनके घर वालों को उनसे मिलने तक नहीं दिया गया. बाद में थाने पर ही उन्होंने अपने घर से मंगवा कर कपडे पहने.

यहां पर यह अंकित करना उचित होगा कि गिरफतारी सम्बन्धी वर्तमान आदेशों के अंतर्गत श्री. कँवल भारती को इस मामले में गिरफ्तार नहीं किया जा सकता था क्योंकि उस अपराध की जिन धाराओं ( धारा 153 ए और 295 आई. पी.सी.) में में केवल 3 वर्ष और 2 वर्ष की सजा का प्राविधान है. सुप्रीम कोर्ट के आदेशों में यह स्पष्ट कहा गया है कि जिन मामलों में 7 वर्ष से कम सजा है उनमे पुलिस अभियुक्त को गिरफ्तार नहीं कर सकती. दूसरे किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तार करते समय उसे गिरफ्तारी का कारण बताना ज़रूरी है जो कि इस मामले में नहीं बताया गया. गिरफ्तारी में व्यक्ति की गरिमा का भी पूरा ख्याल रखना आवश्यक है जो कि जान बुझ कर नहीं रखा गया क्योंकि पुलिस उन्हें बनियान और पजामे में घर से उठा कर ले गयी.

घर से गिरफ्तारी के समय पुलिस उन का कम्प्यूटर और मोडम भी गैर क़ानूनी ढंग से उठा कर ले गयी क्योंकि मौके पर कोई भी सीज़र मीमो तैयार नहीं किया गया जो कि क़ानूनी प्रक्रिया का उलंघन है. इसी कारण कल श्री. कँवल भारती ने न्यायालय में इस के बारे में एक शिकायती प्रार्थना पत्र भी दिया है.

इस के अतिरिक्त पुलिस में जो शिकायत दर्ज की गयी है उस में वादी ने श्री कँवल भारती की 2 अगस्त वाली पोस्ट में " आज़म खान रामपुर में कुछ भी कर सकते है क्योंकि यह उन का क्षेत्र है और खुदा भी उन्हें नहीं रोक सकता है" अपनी तरफ से जोड़ दिया है जब कि पोस्ट में यह वाक्य हैं ही नहीं. कँवल भारती की गिरफ्तारी करने से पहले पुलिस के लिए यह ज़रूरी था कि वह पोस्ट की सत्यता के बारे में जांच करती परन्तु जान बूझ कर ऐसा नहीं किया गया.

उपरोक्त तथ्यों से ऐसा प्रतीत होता है कि श्री कँवल भारती की पुलिस द्वारा गिरफ्तारी रामपुर के अति प्रभावशाली नेता श्री आज़म खान के इशारे पर सभी नियमों और कानून को ताक पर रख कर की गयी है जो कि अवैधानिक एवं विद्वेषपूर्ण है जिस की आईपीएफ निदा करती है. आईपीएफ यह भी मांग करती है कि कँवल भारती के विरुद्ध बनाये गए फर्जी मामले को तुरंत समाप्त किया जाये और विधि विरुद्ध कार्य करने वाले पुलिस अधिकारियों के विरुद्ध दंडात्मक कार्रवाही की जाये. यदि ऐसा नहीं किया गया तो आईपीएफ इस मांग को लेकर जनांदोलन करेगी और जनहित याचिका दायर करने पर भी विचार करेगी.
एस. आर. दारापुरी
राष्ट्रीय प्रवक्ता,
आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट उ.प्र..
लखनऊ.
मोबाइल: 9415164845

बुधवार, 31 जुलाई 2013

सफाई कर्मचारी दिवस -एस. आर. दारापुरी

सफाई कर्मचारी दिवस -एस. आर. दारापुरी
 31 जुलाई देश भर में "सफाई कर्मचारी दिवस" के रूप में मनाया जाता है. इस दिन दिल्ली, नागपुर और शिमला नगरपालिका में सफाई कर्मचारियों को छुट्टी होती है. इस दिन सफाई कर्मचारी इकठ्ठा हो कर अपनी समस्यायों पर विचार.विमर्श करते हैं और अपनी मांगें सामूहिक रूप से उठाते हैं.
 सफाई कर्मचारी दिवस का इतिहास यह है कि 29 जुलाई, 1957 को दिल्ली म्युनिसिपल कमेटी के सफाई कर्मचारियों ने अपने वेतन तथा कुछ काम सम्बन्धी सुविधायों की मांग को लेकर हड़ताल शुरू की थी. उसी दिन केन्द्रीय सरकार के कर्मचारियों की फेडरेशन ने भी हड़ताल करने की चेतावनी दी थी. पंडित नेहरु उस समय भारत के प्रधान मंत्री थे.  उन्होंने केन्द्रीय सरकार के कर्मचारियों तथा सभी हड़ताल करने वालों को कड़े शब्दों में चेतावनी दी कि उनकी हड़ताल को सख्ती से दबा दिया जायेगा.
 30 जुलाई को नई दिल्ली सफाई कर्मचारियों की हड़ताल शुरू हो गयी नगरपालिका ने हड़ताल को तोड़ने के लिए बाहर से लोगों को भर्ती करके काम चलाने की कोशिश की. उधर सफाई कर्मचारियों ने एक तरफ तो कूड़ा ले जाने वाली गाड़ियों को नए भर्ती हुए कर्मचारियों को काम करने के लिए जाने से रोका और दूसरी ओर काम करने वालों से जाति के नाम पर अपील की कि वे उनके संघर्ष को सफल बनायेंण् हुमायूँ रोड, काका नगर, निजामुद्दीन आदि के करीब हड़ताली तथा नए भर्ती सफाई कर्मचारियों की झडपें भी हुयीं. 31 जुलाई को दोपहर तीन बजे के करीब भंगी कालोनी रीडिंग रोड से नए भर्ती किये गए कर्मचारियों को लारियों में ले जाने की कोशिश की गयी. सफाई कर्मचारियों ने इसे रोकने की कोशिश की.  पुलिस की सहायता से एक लारी निकाल ली गयी. परंतु जब दूसरी लारी निकली जाने लगी तो हड़ताल करने वाले कर्मचारियों ने ज्यादा जोर से इस का विरोध किया. पुलिस ने टिमलू नाम के एक कर्मचारी को बुरी तरह से पीटना शुरू किया. उस पर भीड़ उतेजित हो गयी और किसी ने पुलिस पर पत्थर फेंके.  उस समय मौके पर मौजूद डिप्टी एस पी ने भीड़ पर गोली चलाने का आदेश दे दिया. बस्ती के लोगों का कहना है कि पुलिस ने बस्ती के अन्दर आ कर लोगों को मारा और गोलियां चलायीं. गोली चलाने के पहले न तो कोई लाठी चार्ज किया गया और न ही आंसू गैस ही छोड़ी गयी. कितनी गोलिया चलाई गयीं पता नहीं. पुलिस का कहना था कि 13 गोलिया चलायी गयीं.
 इस गोली कांड में भूप सिंह नाम का एक नवयुवक मारा गया जो कि सफाई कर्मचारी तो नहीं था परन्तु वहां पर मेहमानी में आया हुआ था. जो नगरपालिका सफाई कर्चारियों की 30 जुलाई तक कोई भी मांग मानने को तैयार नहीं थी,  हड़ताल शुरू होने के बाद मानने को तैयार हो गयी. हड़ताल के दौरान पुलिस द्वारा गोली चलाये जाने और एक आदमी की मौत हो जाने के कारण सफाई कर्मचारियों में गुस्सा और जोश बढ़ा जो भयानक रूप ले सकता था. बहुत से लोगों ने हमदर्दी जताई और आहिस्ता.आहिस्ता लोग इस घटना को भूलने लगे. 
 भंगी कालोनी में रहने वाले कर्मचारी नौकरी खो जाने के डर से किसी भी गैर कांग्रेसी राजनीतक पार्टी को नजदीक नहीं आने देते थे. उधर कर्मचारी इस इस घटना को भुलाना भी नहीं चाहते थे. वे गोली का शिकार हुए नौजवान भूप सिंह की मौत को अधिक महत्व देते थे. उस की मौत के कारणों को या शासकों के रवैये को नहीं. उनकी भावनायों को ध्यान में रखते हुए इस बस्ती में रहने वाले नेताओं ने भूप सिंह की बर्सी मनाने की प्रथा शुरू कर दी. 1957 के बाद हर वर्ष पंचकुयीआं रोड स्थित भंगी कालोनी में भूप सिंह शहीदी दिवस मनाया जाने लगा और भूप सिंह को इस आन्दोलन का हीरो बनाया जाने लगाण् भूप सिंह की बड़ी सी तस्वीर बाल्मीकि मंदिर से जुड़े कमरे में लगायी गयी. इस मीटिंग में हर वर्ष भूप सिंह को श्रदांजलि पेश की जाती है.
 बाबा साहेब आंबेडकर की बड़ी इच्छा थी कि समूचे भारत के सफाई कर्मचारियों को एक मंच पर इकठ्ठा किया जाये. उनकी एक देशव्यापी संस्था बनायीं जाये जो उनके उत्थान और प्रगति के लिए संघर्ष करे और उन्हें गंदे पेशे तथा गुलामी से निकाल सके. उन्होंने 1942 से 1946 तक जब वे वाईसराय की एग्जीक्यूटिव कोंसिल के श्रम सदस्य थेए सफाई मजदूरों की समस्याओं के अध्ययन के लिए एक समिति भी बनायीं थी. दरअसल बाबा साहेब भंगियों से झाड़ू छुड़वाना चाहते थे और इसी लिए उन्होंने "भंगी झाड़ू छोडो" का नारा भी दिया था. 
 सफाई कर्मचारियों पर सब से अधिक प्रभाव गाँधी जी, कांग्रेस और हिन्दू राजनेताओं और धार्मिक नेताओं का रहा है. उन्होंने एक ओर तो सफाई कर्मचारियों को बाबा साहेब के स्वतंत्र आन्दोलन से दूर रखा और दूसरी ओर उन्हें अनपढ़, पिछड़ा, निर्धन और असंगठित रखने का प्रयास किया है ताकि वे सदा के लिए हिंदुयों पर निर्भर रहें, असंगठित रहें और पखाना साफ़ करने और कूड़ा ढोने का काम करते रहें. दूसरी ओर उनकी संस्थाओं को स्वंतत्र और मज़बूत बनने से रोका. उनकी लगाम हमेशा कांग्रेसी हिन्दुओं के हाथ में रही है.
 सफाई कर्मचारियों में हमेशा से संगठन का अभाव रहा है क्योंकि बाल्मीकि या सुपच के नाम से समूचे भारत के सफाई कर्मचारियों को एक मंच पर इकट्ठा नहीं किया जा सकता. ऐसा करने से उन में जातिगत टकराहट का भय रहता है. अतः सफाई कर्मचारियों को बतौर ""सफाई कर्मचारी" संगठित करना ज़रूरी है. इसी उद्देश्य से "अम्बेडकर मिशन सोसाइटी" जिस की स्थापना श्री भगवान दास जी ने की थी, ने 1964 में यह तय किया कि मजदूर दिवस की तरह दिल्ली में भी "सफाई कर्मचारी दिवस" मनाया जायेगा ताकि उस दिन सफाई कर्मचारी अपनी समस्याओं और मांगों पर विचार विमर्श कर सकें और उन्हें संगठित रूप से उठा सकें.
 धीरे धीरे भारत के अन्य शहरों में भी 31 जुलाई को स्वीपर. डे अथवा सफाई कर्मचारी दिवस के नाम से मनाया जाने लगा. दिल्ली के बाद नागपुर पहला शहर है जहाँ पर 1978 के बाद से बाकायदा हर वर्ष स्वीपर.डे पब्लिक जलसे के तौर पर मनाया जाता है. इस दिन वहां पर अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने, दुर्घटनाओं तथा अपनी सेवाकाल के दौरान मरने वाले सफाई कर्मचारियों को श्रदांजलि पेश की जाती है और अन्य समस्याओं के समाधान के लिए विचार विमर्श किया जाता है. प्रस्ताव पास करके सरकार को भेजे जाते है और सफाई कर्मचारियों की उन्नति और प्रगति के लिए प्रोग्राम बनाये जाते हैं.
 भगवान दास जी ने अपनी पुस्तक "सफाई कर्मचारी दिवस 31, जुलाई" में "सफाई दिवस कैसे मनाएं?" में इसे सार्थक रूप से मनाने पर चर्चा में कहा है कि इसे बाल दिवस, शिक्षक दिवस और मजदूर दिवस की तरह मनाया जाना चाहिए. उन्होंने आगे कहा है कि इस दिन जलसे में उनकी व्यवसायिक, आर्थिक तथा सामाजिक व्यवस्था और शिक्षा आदि समस्याओं पर चर्चा करना उचित होगा. शिक्षा के प्रसार खास करके लड़कियों तथा महिलायों की शिक्षा पर जोर दिया जाना चाहिए. शिक्षा में सहायता के ज़रूरतमंद छात्र-छात्राओं को पुरुस्कार, संगीत तथा चित्रकारी, मूर्ति कला तथा खेलों को प्रोत्साहन देने तथा छोटे परिवार, स्वास्थ्य और नशा उन्मूलन पर जोर दिया जाना चाहिए.  इस जलसे में मंत्रियों और बाहरी नेतायों नहीं बुलाया जाना चाहिए. बाबा साहेब तथा अन्य महापुरुषों के जीवन संघर्ष आदि से लोगों को परिचित कराया जाना चाहिए ताकि उन्हें इस से प्रेरणा मिले और उनमे साहस एवं उत्साह बढ़े और वे खुद आगे की ओर बढ़ने की कोशिश करें.
 वास्तव में सफाई कर्मचारी दिवस को कर्मचारियों में संगठन, जागृति, शिक्षा और उत्थान के लिए पूरी तरह से उपयोगी त्योहार के रूप में मनाया जाना चाहिए क्योंकि वे ही सब से अधिक शोषित, घृणित और पिछड़ा मजदूर वर्ग है.