मंगलवार, 3 जून 2014

बलातकार और जाति



 बलातकार और जाति
एस आर दारापुरी
हाल में उत्तर प्रदेश के बदायूं जनपद में अति पिछड़ी जाति की दो नाबालिग बच्चियों के साथ बलातकार और हत्या की घटना ने कई सवाल खड़े किये हैं. इस में एक तो पुलिस की लापरवाही और संलिप्तता और दूसरे अधिकतर बलात्कारों में दलित और समाज के कमज़ोर तबकों की महिलायों और लड़कियों को ही शिकार बनाया जाना है. इस में एक ओर जहाँ पुलिस की भूमिका पर प्रशन उठ रहे हैं वहीँ दूसरी ओर ऐसे अपराधों में हमारे समाज की जाति संरचना भी काफी हद तक जिम्मेवार दिखाई देती है.
इस घटना में पुलिस की लापरवाही और संलिप्तता के साथ साथ पुलिस का जाति विशेष के प्रति पूर्वाग्रह भी दिखाई देता है. इसके लिए पुलिस का जातिकरण और राजनीतिकरण भी काफी हद तक जिम्मेवार है. जैसा कि अब तक उभर कर आया है कि जब मृतक लड़की का पिता पुलिस के पास लड़कियों को अगवा किये जाने की शिकायत लेकर गया तो सब से पहले पुलिस वालों ने उसकी जात पूछी. जब उस ने अपनी जाति बताई तो पुलिस वालों ने उस का अपमान किया और उसका मज़ाक उड़ाया तथा उस की शिकायत पर कोई कार्रवाई नहीं की जिस का नतीजा यह हुआ कि दोनों लड़कियों का बलात्कार करके उन्हें पेड़ पर लटका दिया गया.
पुलिस के इस व्यवहार से यह उभर कर आया है कि थाने पर पुलिस का व्यवहार समाज के सभी वर्गों के प्रति समान नहीं है. वहां पर भी समाज के कमज़ोर तबकों के साथ जातिभेद किया जाता है. काफी लोगों का कहना है कि थाने पर जाति देख कर कार्रवाई की जाती है. इस का मुख्य कारण यह है कि हमारी पुलिस की संरचना भी जाति तथा सम्प्रदाय निरपेक्ष नहीं है. इस के इलावा पुलिस अधिकारियों और कर्मचारियों के व्यक्तिगत जाति तथा सम्प्रदाय के पूराग्रह भी काफी हद तक उनकी कार्यप्रणाली को प्रभावित करते हैं. अतः यह ज़रूरी है कि एक तो पुलिस में सभी जातियों और सम्प्रदायों का उचित प्रतिनिधित्व होना चाहिए और दूसरे पुलिस कर्मचारियों को इन वर्गों और महिलायों के प्रति अधिक संवेदनशील बनाने के लिए प्रभावी प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए. इस सम्बन्ध में जानबूझकर गलती करने वालों को अनुकरणीय दंड दिया जाना चाहिए. इस के अतिरिक्त पुलिस को बाहरी दबावों से मुक्त करने के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा आदेशित पुलिस सुधार लागू करने के लिए जन दबाव पैदा किया जाना चाहिए.
दलित और कमज़ोर वर्गों की महिलायों पर सब से अधिक बलात्कार ग्रामीण क्षेत्र में होते हैं. यह इस लिए है कि हमारी ग्रामीण समाज व्यवस्था आज भी सामंती और जाति आधारित है. ग्रामीण क्षेत्र में आज़ादी के बाद पुराने सामंतों की जगह नए सामंत पैदा हो गए हैं जो न केवल आर्थिक तौर पर मज़बूत हैं बल्कि उन्हें राजनैतिक और प्रशासनिक सत्ता का भी पूरा सहयोग रहता है. गाँव में यह सामंत पूरी तरह स्वेच्छाचारी आचरण करने के लिए स्वतन्त्र हैं. इसी लिए वे दलित और कमज़ोर वर्ग की औरतों और लड़कियों का निडर हो कर यौन शोषण करते हैं क्योंकि इन वर्गों की शिकायतों की पर थाने पर अथवा अन्यत्र वैसी सुनवाई नहीं होती जैसी कि कानून के अनुसार अपेक्षित है. दलित और अन्य कमज़ोर वर्ग के लोग इन सामंतों की ज्यादितियों का उचित प्रतिरोध इसी लिए भी नहीं कर पाते क्योंकि वे सामाजिक, आर्थिक और राजनितिक तौर पर कमज़ोर हैं और उन्ही सामंतों पर काफी हद तक आश्रित भी हैं.
गाँव में होने वाले बलात्कार के मामलों के विश्लेषण से यह भी पाया गया है कि ऐसी घटनाएँ अधिकतर उस समय होती हैं जब महिलाएं शाम/रात को शौच निवृति के लिए जाती हैं. यह बहुत शर्म की बात है कि हमारे देश में लगभग 50% घरों में शौचालय ही नहीं हैं जिस के लिए औरतों को घर के बाहर जाना पड़ता है जहाँ पर इस प्रकार की घटनाओं की अधिक सम्भावना रहती है. अतः अगर हम अपने आप को एक सभ्य देश कहलाना चाहते हैं तो हमें हरेक घर में शौचालय की व्यवस्था करनी चाहिए. मेरे विचार में नयी सरकार को इस काम को राष्ट्रीय अभियान के तौर पर चलाना चाहिए और आगामी बजट में इस के लिए विशेष प्रावधान करना चाहिए.
अतः दलित और समाज के कमज़ोर तबकों की महिलायों का यौन शोषण और उन पर होने वाले  अत्याचारों को रोकने के लिए यह ज़रूरी है कि इन वर्गों को उचित कानूनी संरक्षण मिले. पुलिस को सामंतों और राजनेताओं की तरफदारी करने की बजाये जनता के प्रति उत्तरदायी बनाया जाये जिस के लिए पुलिस सुधारों का लागू होना बहुत ज़रूरी है. इस के साथ साथ दलित और समाज के अन्य कमज़ोर तबकों का सशक्तिकरण किया जाये ताकि उन की सामंतों पर निर्भरता ख़तम हो सके. इस के लिए भूमि सुधारों का लागू होना बहुत ज़रूरी है. इस के लिए हमें डॉ. आंबेडकर के “जातिविहीन एवं वर्गविहीन समाज की स्थापना” के लक्ष्य को साकार करना होगा.